Atharva Veda Anuvaka 4
Kanda 1910 Suktas71 Mantras

Anuvaka 4

मणि और औषधि-आधारित रक्षा व पुनर्स्थापन का विधान: समृद्धि की स्थापना, शत्रु/विरोधी शक्तियों का निवारण, तथा क्षय/ज्वर का उपचार—मेधा की मरम्मत/पुनर्संस्कार सहित। उपविषय: (1) पौष्टिक प्रयोजन से गौ-वृद्धि और गृह-समृद्धि (स्फाति) (2) दर्भ/कुशा को सार्वभौम अपोत्प्रायिक औषधि तथा बँधे हुए ताबीज के रूप में (3) जाङ्गिड़-मणि को सर्वतोमुखी रक्षक और चिकित्सक के रूप में (4) यक्ष्मा, राक्षस, यातुधानी और शपथ-बल (शापथ) का निष्कासन (5) राजकीय/कर्तृ-शक्ति का वर्चस्, बल, ओजस्, सहस् से संवर्धन (6) औषधीय राल/गोंद आदि का उपचारात्मक प्रयोग।

Suktas in Anuvaka 4

Sukta 31

यह पौष्टिक सूक्त औदुम्बर-काष्ठ के मणि-ताबीज को इस हेतु समर्थ करता है कि वह समृद्धि को उत्पन्न करे और स्थिर करे—विशेषतः गोष्ठ (गौशाला) में गौओं की वृद्धि, आरोग्य और उन्नति (स्फाति) के लिए। सविता को ‘वेधस्’ (बुद्धिमान विधानकर्ता तथा समृद्धि-प्रेरक) रूप में आह्वान कर प्रार्थना की जाती है कि वह ऐश्वर्य को दृढ़तापूर्वक ‘स्थापित’ करे। साथ ही यह मणि प्रतिद्वन्द्वी-विनाशक के रूप में भी प्रशंसित है, जिससे प्राप्त लाभ पर कोई विवाद न हो और वह नष्ट या छिन न जाए।

Rishi: Atharvanic tradition | Devata: Savitṛ (as vedhas, prosperity-impeller) | 14 Mantras

Sukta 32

अथर्ववेद 19.32 एक दर्भ (कुश) सूक्त है, जिसमें इस घास को उग्र, सार्वभौम ओषधि के रूप में माना गया है, जिसकी पहुँच तीन स्वर्गों और तीन पृथ्वियों तक फैली है; इसलिए वह शत्रु शक्तियों को ‘वश’ करने में समर्थ है। इसका प्रयोग रक्षा और दीर्घायु को बाँधने के लिए किया जाता है, और साथ ही प्रतिद्वन्द्वियों को अधीन करने के लिए भी—विशेषतः शत्रु की जिह्वा को दबाकर, तथा शाप, निन्दा या आरोपात्मक वाणी को निष्फल करके। यह सूक्त ओषधि-ताबीज की रक्षा को अभिचारिक वाणी-बंधन के साथ जोड़ता है और दर्भ को ढाल भी और शस्त्र भी रूप में प्रस्तुत करता है।

Rishi: Atharvanic tradition (often treated as Atharvan/Angiras-type for such charms) | Devata: Darbha (personified as a power/implement); indirectly the cosmic order it spans (heavens/earths) | 10 Mantras

Sukta 33

अथर्ववेद 19.33 एक मणि-सूक्त है, जो दर्भ-घास और उससे बने बँधे हुए ताबीज-रूप को संरक्षण और दीर्घायु के लिए संकेंद्रित, दिव्य ओजस् (प्राणबल) के रूप में पवित्र ठहराता है। यह सूक्त दर्भ की स्तुति एक राजस, जीवन को एकत्र करने वाली शक्ति के रूप में करता हुआ आगे बढ़ता है; फिर उसे यज्ञ-भूमि पर शुद्धिकारक के रूप में प्रतिष्ठित करता है; और अंत में स्वस्ति (कल्याण) तथा जरस् (परिपक्व वृद्धावस्था) के लिए उग्र, विष- तथा राक्षस-नाशक सामर्थ्य को बाँधकर धारण कराता है।

Rishi: Atharvanic tradition (maṇi-hymn attribution varies by anukramaṇī; commonly treated as Atharvan/Angirasic). | Devata: Protective power embodied in the bound object (rakṣoghna/viṣaghna ojas). | 5 Mantras

Sukta 34

अथर्ववेद 19.34 जाङ्गिड-मणि का सूक्त है, जो जाङ्गिडा औषधि/ताबीज का अभिषेक कर उसे सर्वतोमुखी रक्षक और चिकित्सक के रूप में प्रयुक्त करता है। इसमें जाङ्गिडा को एक जीवित अपोत्पादक शक्ति के रूप में निरूपित किया गया है, जो “अपवित्र करने वाले को ही अपवित्र” कर देता है—कृत्या (टोना-टोटका), अराति (शत्रुतापूर्ण अभिप्राय) तथा नामोक्त रोगों को निष्फल करता हुआ, रोगी के प्राणों को सुरक्षित रूप से आगे बढ़ाता है।

Rishi: Atharvanic tradition (hymn to Jāṅgiḍa; seer not securely fixed across all lists) | Devata: Jāṅgiḍa (personified protective herb/amulet) | 10 Mantras

Sukta 35

अथर्ववेद 19.35 एक रक्षात्मक-चिकित्सात्मक ताबीज-स्तोत्र है, जो जाङ्गिड़ (व्यक्तित्व-प्राप्त ताबीज/औषधि) को रोगी या गृह के चारों ओर जीवित, जाग्रत प्रहरी के रूप में स्थापित करता है। यह मंत्र-बल को दिव्य आदर्श पर टिकाता है—देवों और ऋषियों की परंपरा में, इन्द्र के नाम से समर्थित—और फिर रक्षा को पूर्ण ब्रह्माण्डीय आवरण में फैलाता है: द्यौ, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, वनस्पतियाँ, समस्त प्राणी, आने वाला काल, तथा प्रत्येक दिशा। इसका प्रयोजन अपोत्प्रेय (अपशकुन-निवारक) है—दृष्टिदोष और शत्रुतापूर्ण प्रभावों को तोड़कर, जपकर्ता को सर्वतोमुखी, सर्वदिशात्मक सुरक्षा-घेरा प्रदान करना।

Rishi: Atharvanic tradition (amulet-hymn corpus; specific ṛṣi not securely fixed for this verse alone) | Devata: Jāṅgiḍa (personified amulet/plant) as protector; implicitly the quarters and cosmic regions | 5 Mantras

Sukta 36

यह संक्षिप्त मणि-सूक्त ताबीज़ (मणि) को ‘शत-निवारक’ शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जो यक्ष्मा (क्षयकारी रोग), राक्षसों तथा बार-बार लौटने वाले भूत-प्रेतजन्य उपद्रवों को दूर भगाता है। मणि को तेजस् (अग्नि-सदृश प्रखर सामर्थ्य) और वर्चस् (दीप्त प्रतिष्ठा) के साथ जोड़कर यह धारणकर्ता में शारीरिक बल, सामाजिक मान-प्रतिष्ठा और रक्षात्मक प्रभा का पुनर्स्थापन करता है। सूक्त में ‘शत’ का बारंबार प्रयोग अनुष्ठानिक तीव्रता बढ़ाने का साधन है, जो सर्वथा और अनेक दिशाओं से होने वाली पूर्ण रक्षा का उद्घोष करता है।

Rishi: Atharvanic tradition (maṇi-hymn corpus) | Devata: Maṇi (amulet) personified; allied with Tejas/Varcas as powers | 6 Mantras

Sukta 37

अथर्ववेद 19.37 उत्तरकालीन अथर्वणिक सशक्तीकरण-सूक्त है, जो किसी व्यक्ति (प्रायः राजा या राजकीय प्रतिनिधि) तथा/अथवा किसी राज-उपकरण में वर्चस् (तेज), बल (शक्ति), ओज (वीर्य), सहस् (प्रचण्ड बल) और अभिभूति (विजयी प्रभुत्व) का ‘आरोपण’ करता है। अग्नि को वीर-शक्तियों के दाता के रूप में स्मरण करते हुए यह सूक्त साधक के भीतर इन शक्तियों के आत्मसात् होने और अनुष्ठान में उन्हें ‘पर्यूहण’—अर्थात् धारण कर चारों ओर वहन करने—के माध्यम से प्रतिष्ठित करता है। अंत में ‘शतं शरदः’ (सौ शरदों तक) की दीर्घायु-वाणी से अभिषेक/दीक्षा को मुहरबंद कर, स्थिर राज्य और राष्ट्र-समर्थक सामर्थ्य की प्राप्ति का लक्ष्य रखता है।

Rishi: Atharvanic tradition (late book; specific r̥ṣi not securely fixed without Anukramaṇī consultation). | Devata: Abstract powers (Ūrj, Bala, Ojas, Sahas, Abhibhūti) oriented toward rāṣṭra (realm). | 4 Mantras

Sukta 38

यह संक्षिप्त उपचार-सूक्त सुगंधित औषधीय राल ‘गुग्गुलु’ को अथर्वणीय भेषज के रूप में प्रयुक्त करता है, ताकि यक्ष्मा (क्षय/शोष) को दूर भगाया जाए और शत्रुतापूर्ण शपथ/शाप (śapatha) को निष्प्रभावी किया जाए। गुग्गुलु को शुद्धिकारी लवणों के साथ मिलाकर तथा औषधि के ‘नाम’ को दृढ़तापूर्वक ग्रहण करके सूक्त यह प्रतिपादित करता है कि रोग और दुष्ट प्रभाव रोगी पर टिक नहीं सकते। इसकी शक्ति सुगंध, मिश्रण और ‘नाम-बल’ (nāman) के माध्यम से कर्मकाण्डीय मुहर की तरह कार्य करती है, जिससे अरिष्टताती—अक्षत, निर्विघ्न सुरक्षा—स्थापित होती है।

Rishi: Atharvanic healer tradition (specific r̥ṣi uncertain without Anukramaṇī). | Devata: Bheṣaja (medicine) embodied in guggulu; anti-yákṣma power. | 3 Mantras

Sukta 39

AVŚ 19.39 एक भैषज्य तथा रक्षोघ्न मंत्र है, जो हिमालय की औषधि ‘कुष्ठ’ को सजीव, दिव्य उद्धारक के रूप में आह्वान करता है, ताकि वह तक्मन् (ज्वर) के प्रत्येक रूप का संहार करे और यातुधानियों (हानिकारक, जादू-टोना करने वाली स्त्री-प्रेतसदृश शक्तियाँ) को दूर भगाए। यह सूक्त कुष्ठ की प्रभावशीलता को एक ब्रह्माण्डीय उत्पत्ति-कथा में स्थापित करता है—‘तृतीय स्वर्ग’ में अश्वत्थ से उत्पन्न, सोम के साथ संयुक्त रूप से स्थित—और फिर उसी अधिकार को प्रत्यक्ष आज्ञाओं में बदलकर रोग को रोगी के क्षेत्र से दूर, नीचे की ओर, और बाहर निकाल देता है।

Rishi: Atharvanic tradition (often transmitted under Atharvan/Angiras lineages for oṣadhi-sūktas; specific r̥ṣi attribution requires pada-anukramaṇī confirmation). | Devata: Kuṣṭha (oṣadhi as devatā); secondarily Takmán (as adversary) and Yātudhānīs (as adversaries). | 10 Mantras

Sukta 40

यह उत्तरकालीन अथर्ववैदिक सूक्त मेधा—बुद्धि, स्मृति और यज्ञीय वाणी-समर्थ्य—की पुनर्स्थापना हेतु एक संक्षिप्त शान्ति-आकर्षण है, जब चित्त और वाणी उद्वेग से ‘भेदित’ या बिखरी हुई प्रतीत हों। इसमें बृहस्पति से, सरस्वती और विश्वे देवाः के सहकार के साथ, जो कुछ हर लिया गया या छिन गया है उसे फिर से समेटकर यथास्थान स्थापित करने की प्रार्थना की जाती है। अंत में यह दीक्षा और तप के लिए शान्ति की मुहर लगाता है तथा अश्विनों के उस पोषण का आह्वान करता है जो ‘अन्धकार को पार कर’ ले जाता है।

Rishi: Atharvanic tradition (late AV strata) | Devata: Bṛhaspati (primary), with Sarasvatī and Viśve Devāḥ as supporting agencies | 4 Mantras

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