Atharva Veda Anuvaka 3
Kanda 110 Suktas41 Mantras

Anuvaka 3

मुख्य विषय: अपोत्प्रेरक (अपशकुन-निवारक) रक्षा और भैषज्य-चिकित्सा का संयोग—शरीर की पूर्णता (वर्ण, त्वचा, ज्वर) को पुनः स्थापित करते हुए राक्षसों, टोने-टोटके और मृत्यु-वह शक्तियों को दूर भगाना। उप-विषय: (1) इन्द्र अग्र-रक्षक और अभय-प्रदाता। (2) हरिमा (पीलिया-सदृश पीतिमा/रुग्ण पीलापन) का निष्कासन तथा आयुस्/वर्ण की पुनर्प्राप्ति। (3) अशुभ श्वेतता का प्रत्यावर्तन—किलास और पलित। (4) पृथ्वी-जन्मी औषधि के रूप में श्यामा/आसुरी की औषध-शक्ति। (5) तक्मन् (ज्वर) को नाम-बंध, चेतन व्याधि मानकर संबोधन। (6) रक्षोघ्न (राक्षस-नाशक) संरक्षण और शान्ति-प्रयोजन।

Suktas in Anuvaka 3

Sukta 21

यह संक्षिप्त अनुष्टुभ्-छन्द का स्तोत्र इन्द्र-स्तुति है, जो शान्ति तथा शत्रु-निवारण हेतु अपोत्प्रायिक (अपभिचारिक) मन्त्र के रूप में प्रयुक्त होता है। इसमें समुदाय के अग्रभाग में इन्द्र को ‘कल्याण’ और ‘अभय’ के दाता के रूप में स्थापित किया जाता है। आज्ञार्थक वाणी द्वारा राक्षस-तुल्य उपद्रव, शत्रुतापूर्ण आक्रमण और शत्रु के क्रोध को दूर भगाने की प्रार्थना की जाती है, तथा ‘महत् शर्म’—विस्तृत, श्रेष्ठ आश्रय—माँगा जाता है, जो प्राणघातक प्रहारों को भी प्रत्यावर्तित कर दे।

Rishi: Indra-focused Atharvanic tradition (specific r̥ṣi attribution varies by Anukramaṇī; commonly treated as an Indra-stuti within Atharvanic collections). | Devata: Indra (as Vṛtrahan, Somapā, Abhayaṃkara). | 4 Mantras

Sukta 22

अथर्ववेद 1.22 एक संक्षिप्त उपचार-मंत्र है, जो हरिमा́ (पीलिया/दुर्बलता की रोगजन्य “पीतिमा”) को दूर करके आयुस् (दीर्घायु) तथा स्वस्थ, अरुणिम युक्त वर्ण (रक्तिम-स्वस्थ कांति) को पुनः स्थापित करता है। यह स्थानांतरण-आधारित जादुई क्रिया (transference-magic) से कार्य करता है—रोग-रंग को वनस्पति-आधारों और पीले माध्यमों में स्थानांतरित कर देता है—और साथ ही रोगी के चारों ओर शुभ लाल आभा को रक्षात्मक आवरण के रूप में दृढ़ करता है।

Rishi: Atharvanic tradition (attributed within the Atharvan corpus; specific r̥ṣi assignment varies by anukramaṇī tradition for this hymn). | Devata: Āyus (Long Life) / Varṇa (healthy complexion) as functional ‘deities’; implicitly the healing power resident in the charm. | 4 Mantras

Sukta 23

अथर्ववेद (AVŚ) 1.23 एक संक्षिप्त अथर्वणीय चिकित्सात्मक मंत्र है, जो उस अशुभ श्वेतता को फिर से “काला/गाढ़ा” करता है जो विकार-रूप में प्रकट हो गई हो—विशेषतः किलास (त्वचा के श्वेत धब्बे) और पलित (असमय श्वेत/धूसर केश)। इसमें रात्रि-जन्य, कृष्ण-वर्ण औषधि का आह्वान रजनी (रात्रि) के साथ किया जाता है, ताकि वर्ण-विकार उलट जाए, निरृति-सदृश अनिष्ट दूर हो, और ब्रह्मन् (मंत्र-शक्ति) के प्रभाव से श्वेत चिह्न लुप्त हो जाए।

Rishi: Atharvanic tradition (often transmitted without a single named ṛṣi for minor healing charms; assigned in some indices to Atharvan/Angiras lineages). | Devata: Oṣadhi (the herb) and Rājanī/Night (personified night-power). | 4 Mantras

Sukta 24

अथर्ववेद 1.24 एक संक्षिप्त भैषज्य सूक्त है, जो एक विशिष्ट पृथ्वीजनित ओषधि-शक्ति, श्यामा/आसुरी, को किलास (एक वर्णहीन/त्वचा-विकृति उत्पन्न करने वाला रोग) के विरुद्ध एक पुनर्स्थापक औषधि के रूप में सक्रिय करता है। मंत्र इस उपचार को एक भौतिक औषधि और एक सशरीर शक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो 'रूप' को पुनः संरचित करती है, त्वचा और शरीर को पूर्णता और समान रूप में लौटाती है। मिथकीय विजय और वनस्पति प्रभाव इस मंत्र के आधार हैं, जो विकार (रोग/शत्रुता) को व्यवस्थित, नियंत्रित चिकित्सा शक्ति में परिवर्तित करते हैं।

Rishi: Atharvanic seer (traditionally assigned within the AV medicinal corpus; specific r̥ṣi attribution for 1.24 to be confirmed against Śaunaka anukramaṇī) | Devata: Oṣadhi (Śyāmā) / Pṛthivī-derived healing power | 4 Mantras

Sukta 25

अथर्ववेद 1.25 एक संक्षिप्त अथर्वणीय चिकित्सात्मक मंत्र है, जो तक्मन् (ज्वर) को चेतन, नाम-बंधित उपद्रव मानकर संबोधित करता है और उसे आदेश देता है कि वह रोगी से चारों ओर से “उतर/छूट” जाए। यह सूक्त ज्वर की गुप्त उत्पत्तियों और रूपों की पहचान करता है—दाहक ताप, आवर्तक दौरे, शोक-सदृश क्षय, यहाँ तक कि वरुण से दंडात्मक संबंध—और फिर उसे बाध्यकारी ज्ञान (गुप्त नाम, जन्मस्थान) तथा बार-बार के निष्कासन-वाक्यों द्वारा निष्प्रभावी कर देता है।

Rishi: Atharvanic tradition (often transmitted under Atharvan/Angiras attribution for Takman hymns; exact r̥ṣi assignment depends on Anukramaṇī). | Devata: Takman (fever) addressed and coerced; also an invoked ‘harita’-linked divine power by epithet. | 4 Mantras

Sukta 26

अथर्ववेद 1.26 एक संक्षिप्त अथर्वणीय रक्षात्मक‑चिकित्सात्मक मंत्र है, जो पहले घातक और शत्रुतापूर्ण शक्तियों—“प्रक्षेप्य/बाण” तथा यम से संबद्ध मृत्यु‑तत्त्व—को दूर हटा देता है, और फिर शरीर तथा वंश के कल्याण को सुनिश्चित करने की ओर मुड़ता है। इसकी शक्ति आदेशात्मक निष्कासन (अपोत्प्रायिक वाणी) और प्रसादकारी कोमलता के संयोग में है—आहूत शक्ति/शक्तियों से “अनुग्रही” होने तथा गृह में आरोग्य, सुख‑समृद्धि और कल्याण स्थापित करने की प्रार्थना की जाती है।

Rishi: Atharvanic tradition (seer attribution varies by anukramaṇī for the surrounding hymn) | Devata: A propitiated protective/healing power (often addressed as a benevolent agent capable of both expulsion and grace; specific devatā depends on the hymn’s heading in the anukramaṇī) | 4 Mantras

Sukta 27

अथर्ववेद 1.27 एक संक्षिप्त रक्षोघ्न सूक्त है, जिसमें मंत्र स्वयं शस्त्र बनकर शत्रुतापूर्ण अभिप्राय, प्रेत-संबद्ध अमंगल और गृह के विरुद्ध किए गए अभिचार/प्रतिअभिचार को तितर-बितर करता, काटता और बाहर खदेड़ देता है। रुद्र के पिनाक-रूपक से ‘छेदन-प्रसारण’ की शक्ति प्राप्त होती है, और इन्द्राणी को अग्रभाग/द्वार-देहरी पर विजयी उपस्थिति के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है, जिससे गृह पुनः कल्याण से भर उठे और दुष्ट-इच्छा रखने वाले निष्फल हों।

Rishi: Atharvanic/Angiras-type attribution (hymn-level assignment varies by anukramaṇī tradition; verse itself is weapon-apotropaic). | Devata: Rudra/Pināka as invoked power-symbol; the operative deity is the protective, weapon-bearing force that cuts and disperses evil. | 4 Mantras

Sukta 28

अथर्ववेद 1.28 एक संक्षिप्त रक्षोघ्न (राक्षस‑और‑डायन‑निवारक) सूक्त है, जो यातुधानी के शाप, स्तम्भन/मूर्च्छा‑मंत्र और नवजात पर किए गए प्राण‑हरणकारी आक्रमण को उलटकर उसी पर लौटा देता है। इसमें दाह, प्रत्यावर्तन (प्रति‑) और दण्डात्मक ‘स्व‑भक्षण’ की प्रतिमाएँ आती हैं, ताकि वह दुष्ट शक्ति अपने ही उद्गम पर गिरकर स्वयं नष्ट हो जाए और शिशु तथा गृहस्थ के लिए सुरक्षा पुनः स्थापित हो।

Rishi: Atharvanic/Angiras-type attribution (exact r̥ṣi for 1.28 requires full anukramaṇī data). | Devata: Counter-sorcery against a yātudhānī/witch-like female agent (functional ‘devatā’ is the addressed/targeted malefic power). | 4 Mantras

Sukta 29

अथर्ववेद 1.29 एक संक्षिप्त प्रति-टोना (अभिचार-निवारक) तथा प्रतिद्वन्द्वी-दमन सूक्त है, जो शत्रुतापूर्ण शक्तियों को “घेर” कर बाँध देता है और रक्षक शक्ति को समुदाय के ऊपर प्रहरी की भाँति खड़े रहने की आज्ञा देता है। इसका समापन सप्तनक्षयण मणि (प्रतिद्वन्द्वी-क्षयकारी ताबीज) को बाँधने में होता है, जिससे विजय, राजनीतिक स्थिरता (राष्ट्र) और विरोधियों व निन्दकों पर मान्य श्रेष्ठता सुनिश्चित हो।

Rishi: Atharvanic/Angirasa tradition (hymn-level attribution varies by Anukramaṇī; commonly treated as Atharvanic protective speech) | Devata: Indra or a generalized protective power (mantra functions as a command to the protector rather than a descriptive praise) | 6 Mantras

Sukta 30

AVŚ 1.30 दीर्घायु और संरक्षण का संक्षिप्त मंत्र है, जो लाभार्थी को समष्टि-देवताओं—विश्वे देवाः, वसु और आदित्य—की सतर्क रक्षा में रखता है, ताकि मनुष्य-जनित मृत्यु उसे न पहुँचे। यह रक्षा को व्यक्तिगत सुरक्षा से आगे बढ़ाकर यज्ञ/अनुष्ठान-स्थल की सुरक्षा तक फैलाता है—पाँचों दिशाओं में यथोचित भाग-प्राप्त देवताओं को “स्थापित” करके—और व्यक्ति को शुभ, सुव्यवस्थित तथा भली-भाँति रक्षित परिधि के भीतर सील कर देता है।

Rishi: Atharvanic tradition (often transmitted under Atharvan/Angiras rubric; specific r̥ṣi attribution depends on anukramaṇī) | Devata: Viśve Devāḥ; Vasus; Ādityas (collective protective deities) | 4 Mantras

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