
Book 2 places the Vijigīṣu’s power on administrative rails: offices, audits, and coercive institutions that make conquest governable. In 2.36, the prison is treated not as a moral afterthought but as a state instrument whose misuse can corrode sovereignty. The sūtras here prescribe periodic viśodhana (inspection/cleansing) of detention facilities and outline channels by which confinement may be relaxed or remitted—through labor, corporal punishment substitution, or monetary favor—thereby converting custodial burden into productive or compensatory outcomes. Further, Kautilya permits releases on high-significance political and dynastic moments (new conquests, yuvarāja-abhiṣeka, birth of a son), using mercy as a deliberate signal of stability and auspicious renewal. This integrates daṇḍa with prasāda: coercion maintains order daily, while measured clemency periodically resets social temperature, reduces custodial congestion, and reaffirms the king’s role as both disciplinarian and benefactor—strengthening the Durga limb and, by extension, the entire Saptāṅga organism.
Sutra 1
समाहर्तृवन्नागरिको नगरं चिन्तयेत् ॥ कZ_०२.३६.०१ ॥
समाहर्ता की तरह नगरिक (नगर-अधीक्षक) को नगर का निरंतर निरीक्षण और प्रबंधन करना चाहिए।
Sutra 2
दशकुलीं गोपो विंशतिकुलीं चत्वारिंशत्कुलीं वा ॥ कZ_०२.३६.०२ ॥
गोप (स्थानीय वार्ड अधिकारी) को दस परिवारों पर—या बीस परिवारों पर—या चालीस परिवारों पर नियुक्त किया जाए।
Sutra 3
स तस्यां स्त्रीपुरुषाणां जातिगोत्रनामकर्मभिः जङ्घाग्रमायव्ययौ च विद्यात् ॥ कZ_०२.३६.०३ ॥
उस इकाई में वह स्त्री-पुरुषों को उनकी जाति-गोत्र, नाम और पेशे से जाने; और उनके पैदल आवागमन तथा आय-व्यय को भी जान ले।
Sutra 4
एवं दुर्गचतुर्भागं स्थानिकश्चिन्तयेत् ॥ कZ_०२.३६.०४ ॥
इसी प्रकार स्थानिक को दुर्ग (किलेबंद नगर) के चारों भागों का निरंतर निरीक्षण और पर्यवेक्षण करना चाहिए।
Sutra 5
धर्मावसथिनः पाषण्डिपथिकानावेद्य वासयेयुः स्वप्रत्ययाश्च तपस्विनः श्रोत्रियांश्च ॥ कZ_०२.३६.०५ ॥
धर्मशालाओं के प्रबंधक पाषण्डी भिक्षुकों और पथिकों को सूचना देकर ही ठहराएँ; इसी प्रकार तपस्वियों और श्रोत्रियों को भी केवल तब ठहराएँ जब उनकी पहचान और प्रमाण स्वयं जाँच लें।
Sutra 6
कारुशिल्पिनः स्वकर्मस्थानेषु स्वजनं वासयेयुः वैदेहकाश्चान्योन्यं स्वकर्मस्थानेषु ॥ कZ_०२.३६.०६ ॥
कारीगर और शिल्पी अपने-अपने कार्य-स्थानों/मुहल्लों में अपने लोगों को बसाएँ; और वैदेहक भी परस्पर एक-दूसरे को अपने निर्धारित कार्य-क्षेत्रों में ही ठहराएँ।
Sutra 7
पण्यानामदेशकालविक्रेतारमस्वकरणं च निवेदयेयुः ॥ कZ_०२.३६.०७ ॥
जो लोग अनुचित स्थान या समय पर वस्तुएँ बेचते हों, और जो बिना अधिकार/बिना उचित अनुपालन के कार्य करते हों—उनकी सूचना दें।
Sutra 8
शौण्डिकपाक्वमांसिकाउदनिकरूपाजीवाः परिज्ञातमावासयेयुः ॥ कZ_०२.३६.०८ ॥
शराब-विक्रेता, पका-मांस बेचने वाले, पानी-विक्रेता, और प्रदर्शन/नाट्य आदि से जीविका चलाने वाले—केवल ऐसे परिसरों में ठहराए जाएँ जो अधिकारियों को ज्ञात और पहचाने हुए हों।
Sutra 9
अतिव्ययकर्तारमत्याहितकर्माणं च निवेदयेयुः ॥ कZ_०२.३६.०९ ॥
जो अत्यधिक खर्च करते हों, और जो अत्यन्त संदिग्ध/हानिकारक कर्मों में लगे हों—उनकी सूचना दें।
Sutra 10
चिकित्सकः प्रच्छन्नव्रणप्रतीकारकारयितारमपथ्यकारिणं च गृहस्वामी च निवेद्य गोपस्थानिकयोर्मुच्येत अन्यथा तुल्यदोषः स्यात् ॥ कZ_०२.३६.१० ॥
चिकित्सक—और इसी प्रकार गृहस्वामी भी—जो छिपे घाव का उपचार कराना चाहता हो, तथा जो पथ्य/नियत आहार-विहार के विरुद्ध आचरण करता हो—उसकी सूचना दें; सूचना देने पर वह गोप और स्थानिक के समक्ष दोषमुक्त होता है; अन्यथा उसे समान दोष लगेगा।
Sutra 11
प्रस्थितागतौ च निवेदयेत् अन्यथा रात्रिदोषं भजेत ॥ कZ_०२.३६.११ ॥
प्रस्थान और आगमन की सूचना देनी चाहिए; अन्यथा रात्रि में होने वाले अपराधों का दायित्व वह वहन करेगा।
Sutra 12
क्षेमरात्रिषु त्रिपणं दद्यात् ॥ कZ_०२.३६.१२ ॥
सुरक्षित रखी गई रातों के लिए तीन पण का पुरस्कार दिया जाए।
Sutra 13
पथिकोत्पथिकाश्च बहिरन्तश्च नगरस्य देवगृहपुण्यस्थानवनश्मशानेषु सव्रणमनिष्टोपकरणमुद्भाण्डीकृतमाविग्नमतिस्वप्नमध्वक्लान्तमपूर्वं वा गृह्णीयुः ॥ कZ_०२.३६.१३ ॥
नगर के बाहर और भीतर—देवगृहों, पुण्यस्थानों, वनों और श्मशानों में—यात्री और पथभ्रष्ट यात्री यदि घावों सहित, आपत्तिजनक औज़ारों सहित, माल को गठरी/पोटली बनाकर, घबराए हुए, अत्यधिक उनींदे, यात्रा से थके हुए, या अन्यथा अपरिचित प्रतीत हों, तो उन्हें पकड़ लिया जाए।
Sutra 14
एवमभ्यन्तरे शून्यनिवेशावेशनशौण्डिकाउदनिकपाक्वमांसिकद्यूतपाषण्डावासेषु विचयं कुर्युः ॥ कZ_०२.३६.१४ ॥
इसी प्रकार नगर के भीतर भी वे खाली घरों, सराय/आवास-गृहों, मदिरा-दुकानों, जल/भोजन-सेवा की दुकानों, पका-मांस की दुकानों, जुआ-घरों और पाखंडी/मतानुयायी निवासों में तलाशी/जांच करें।
Sutra 15
अग्निप्रतीकारं च ग्रीष्मे ॥ कZ_०२.३६.१५ ॥
ग्रीष्म ऋतु में अग्नि-निवारण तथा अग्नि-प्रतिकार (आग लगने पर प्रतिक्रिया) के उपाय स्थापित किए जाएँ।
Sutra 16
मध्यमयोरह्नश्चतुर्भागयोरष्टभागोऽग्निदण्डः ॥ कZ_०२.३६.१६ ॥
दिन के चार भागों में से बीच के दो भागों में ‘अग्निदण्ड’ (अग्नि-चौकी/लेवी) आकलित हिस्से का आठवाँ भाग होगा।
Sutra 17
बहिरधिश्रयणं वा कुर्युः ॥ कZ_०२.३६.१७ ॥
या वे (चूल्हा/रसोई का) पकाने का प्रबंध घर के बाहर करें।
Sutra 18
पादः पञ्चघटीनां कुम्भद्रोणिनिह्श्रेणीपरशुशूर्पाङ्कुशकचग्रहणीदृतीनां चाकरणे ॥ कZ_०२.३६.१८ ॥
यदि ये वस्तुएँ तैयार न रखी जाएँ—पाँच घड़े; एक कुम्भ और एक द्रोणी; सीढ़ी; कुल्हाड़ी; सूप; अंकुश; रस्सी; पकड़ने का उपकरण; और चमड़े की पानी की थैली—तो चौथाई (दण्ड/हिस्सा) लगेगा।
Sutra 19
तृणकटच्छन्नान्यपनयेत् ॥ कZ_०२.३६.१९ ॥
घास और सरकंडे की छप्पर/छाजन हटाए जाएँ।
Sutra 20
अग्निजीविन एकस्थान्वासयेत् ॥ कZ_०२.३६.२० ॥
अग्नि पर निर्भर जीविका करने वालों को एक ही निर्धारित स्थान पर बसाया जाए।
Sutra 21
स्वगृहप्रद्वारेषु गृहस्वामिनो वसेयुः असम्पातिनो रात्रौ ॥ कZ_०२.३६.२१ ॥
रात में गृहस्वामी अपने ही घरों के मुख्य द्वार पर रहें, सतर्क रहें और लापरवाही न करें।
Sutra 22
रथ्यासु कुटव्रजाः सहस्रं तिष्ठेयुः चतुष्पथद्वारराजपरिग्रहेषु च ॥ कZ_०२.३६.२२ ॥
गलियों/सड़कों पर कुटव्रज नामक दलों के एक-एक हजार सैनिक तैनात रहें; तथा चौराहों, द्वारों और राज-परिसरों में भी।
Sutra 23
प्रदीप्तमनभिधावतो गृहस्वामिनो द्वादशपणो दण्डः षट्पणोऽवक्रयिणः ॥ कZ_०२.३६.२३ ॥
यदि आग भड़क उठने पर गृहस्वामी दौड़कर (सहायता हेतु) न पहुँचे, तो 12 पण दण्ड; और जो कर्तव्य से बचता/टालता है, उस पर 6 पण।
Sutra 24
प्रमादाद्दीप्तेषु चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः ॥ कZ_०२.३६.२४ ॥
यदि प्रमाद से आग लग जाए/फैल जाए, तो 54 पण दण्ड।
Sutra 25
प्रदीपिकोऽग्निना वध्यः ॥ कZ_०२.३६.२५ ॥
आग लगाने वाला (अग्निदाहक) आग से दण्डित होकर मृत्यु-दण्ड का पात्र है।
Sutra 26
पांसुन्यासे रथ्यायामष्टभागो दण्डः पङ्कोदकसम्निरोधे पादः ॥ कZ_०२.३६.२६ ॥
सड़क पर धूल/कूड़ा फेंकने पर मानक दण्ड का आठवाँ भाग जुर्माना; कीचड़ और पानी के प्रवाह को रोकने पर चौथाई जुर्माना।
Sutra 27
राजमार्गे द्विगुणः ॥ कZ_०२.३६.२७ ॥
राजमार्ग (मुख्य सड़क) पर दण्ड दुगुना है।
Sutra 28
पण्यस्थानोदकस्थानदेवगृहराजपरिग्रहेषु पणोत्तरा विष्टादण्डाः मूत्रेष्वर्धदण्डाः ॥ कZ_०२.३६.२८ ॥
बाज़ारों, जल-स्थानों, देवालयों और राजकीय परिसरों में: मल (गंदगी) करने पर ‘पणोत्तर’ (एक पन अधिक) दण्ड; मूत्र करने पर उसका आधा दण्ड।
Sutra 29
भैषज्यव्याधिभयनिमित्तमदण्ड्याः ॥ कZ_०२.३६.२९ ॥
औषध-उपचार, बीमारी या भय के कारण करने वाले दण्डनीय नहीं हैं।
Sutra 30
मार्जारश्वनकुलसर्पप्रेतानां नगरस्यान्तरुत्सर्गे त्रिपणो दण्डः खरोष्ट्राश्वतराश्वप्रेतानां षट्पणः मनुष्यप्रेतानां पञ्चाशत्पणः ॥ कZ_०२.३६.३० ॥
नगर के भीतर शव फेंकने पर: बिल्ली, कुत्ता, नेवला और साँप के शव—3 पण दण्ड; गधा, ऊँट, खच्चर और घोड़े के शव—6 पण; मनुष्य के शव—50 पण।
Sutra 31
मार्गविपर्यासे शवद्वारादन्यतश्च शवनिर्णयने पूर्वः साहसदण्डः ॥ कZ_०२.३६.३१ ॥
निर्धारित मार्ग से हटने पर, शव-द्वार के अलावा किसी अन्य द्वार से शव ले जाने पर, तथा निर्धारित विधि के बजाय अन्य प्रकार से शव का निस्तारण करने पर—‘प्रथम’ साहस-दण्ड लागू होता है।
Sutra 32
द्वाःस्थानां द्विशतम् ॥ कZ_०२.३६.३२ ॥
द्वारपालों (द्वारों पर तैनात) के लिए दण्ड दो सौ (पण) है।
Sutra 33
श्मशानादन्यत्र न्यासे दहने च द्वादशपणो दण्डः ॥ कZ_०२.३६.३३ ॥
श्मशान के अलावा कहीं और शव रखने या उसका दाह करने पर 12 पण का दण्ड है।
Sutra 34
विषण्णालिकमुभयतोरात्रं यामतूर्यम् ॥ कZ_०२.३६.३४ ॥
दोनों रातों में ‘विषण्णालिका’ संकेत हो, और प्रत्येक प्रहर के लिए पहरा-संकेत (याम-तूर्य) हो।
Sutra 35
तूर्यशब्दे राज्ञो गृहाभ्याशे सपादपणं अक्षणताडनं प्रथमपश्चिमयामिकं मध्यमयामिकं द्विगुणमन्तश्चतुर्गुणम् ॥ कZ_०२.३६.३५ ॥
तूर्य (अलार्म) की ध्वनि पर, राजा के निवास के पास दण्ड सवा पण है। बिना चोट पहुँचाए मारने पर दण्ड पहर के अनुसार है: पहले और आख़िरी पहर में मूल, मध्य पहर में दुगुना, और भीतर (अंतः) चार गुना।
Sutra 36
शङ्कनीये देशे लिङ्गे पूर्वापदाने च गृहीतमनुयुञ्जीत ॥ कZ_०२.३६.३६ ॥
गिरफ्तार व्यक्ति से (i) संदिग्ध स्थान, (ii) पहचान-चिह्न/साक्ष्य, और (iii) पूर्व कथन/पूर्ववृत्त के संदर्भ में पूछताछ की जाए।
Sutra 37
राजपरिग्रहोपगमने नगररक्षारोहणे च मध्यमः साहसदण्डः ॥ कZ_०२.३६.३७ ॥
राज-परिग्रह (राजकीय घेरा/अधिगृहीत क्षेत्र) में प्रवेश करने और नगर-रक्षा-चौकी पर चढ़ने/हस्तक्षेप करने पर ‘मध्यम’ साहस-दण्ड (जुर्माना) है।
Sutra 38
सूतिकाचिकित्सकप्रेतप्रदीपयाननागरिकतूर्यप्रेक्षाग्निनिमित्तं मुद्राभिश्चाग्राह्याः ॥ कZ_०२.३६.३८ ॥
प्रसूति-सेवा, चिकित्सा, शव-परिवहन/संस्कार, दीप/प्रकाश-वाहन, यात्रा/परिवहन, नगर-कार्य, वाद्य/संकट-ध्वनि, सार्वजनिक तमाशा, तथा अग्नि-सम्बन्धी आपात-कार्य में लगे लोग—यदि उनके पास राज-मुद्राएँ हों—तो उन्हें हिरासत में नहीं लिया जाए।
Sutra 39
चाररात्रिषु प्रच्छन्नविपरीतवेषाः प्रव्रजिता दण्डशस्त्रहस्ताश्च मनुष्या दोषतो दण्ड्याः ॥ कZ_०२.३६.३९ ॥
गश्त/कड़ी निगरानी की रातों में छिपे या छलपूर्ण वेश वाले, भिक्षुक-वृत्ति में घूमने वाले, तथा डंडे या हथियार लिए हुए लोग—अपने दोष की गंभीरता के अनुसार दण्डनीय हैं।
Sutra 40
रक्षिणामवार्यं वारयतां वार्यं चावारयतां क्षणद्विगुणो दण्डः ॥ कZ_०२.३६.४० ॥
रक्षकों के लिए: जो रोकने योग्य नहीं है उसे रोकने पर, और जो रोकना चाहिए उसे न रोकने पर—प्रत्येक क्षण/प्रत्येक अवसर के लिए दण्ड दुगुना है।
Sutra 41
स्त्रियं दासीमधिमेहयतां पूर्वः साहसदण्डः अदासीं मध्यमः कृतावरोधामुत्तमः कुलस्त्रियं वधः ॥ कZ_०२.३६.४१ ॥
किसी दासी स्त्री का बलात्/अनुचित भोग करने पर ‘न्यून’ साहस-दण्ड; दासी न होने वाली स्त्री पर ‘मध्यम’ साहस-दण्ड; अवरोध/एकान्त में रखी स्त्री पर ‘उत्तम’ साहस-दण्ड; और कुलीन/सम्मानित कुल-स्त्री का उल्लंघन करने पर मृत्यु-दण्ड।
Sutra 42
चेतनाचेतनिकं रात्रिदोषमशंसतो नागरिकस्य दोषानुरूपो दण्डः प्रमादस्थाने च ॥ कZ_०२.३६.४२ ॥
रात्रि में हुआ अपराध—चाहे जानबूझकर (व्यक्ति द्वारा) हो या अनजाने/दुर्घटनावश—यदि रिपोर्ट न किया जाए, तो नगरिक (नगराध्यक्ष/नगर-प्रभारी) को अपराध के अनुरूप दण्ड दिया जाए; तथा ज्ञात प्रमाद-स्थानों (लापरवाही के बिंदुओं) पर भी।
Sutra 43
नित्यमुदकस्थानमार्गभ्रमच्छन्नपथवप्रप्राकाररक्षावेक्षणं नष्टप्रस्मृतापसृतानां च रक्षणम् ॥ कZ_०२.३६.४३ ॥
जल-स्थानों, मार्गों, भ्रमकारी चौराहों/मोड़ों, छिपे रास्तों, खाइयों/मेड़ों, प्राकार/दीवारों तथा रक्षाव्यवस्था का प्रतिदिन निरीक्षण हो; और जो खो गए हों, भ्रमित/विस्मृत हों या भटक गए हों—उनकी भी रक्षा की जाए।
Sutra 44
बन्धनागारे च बालवृद्धव्याधितानाथानां जातनक्षत्रपौर्णमासीषु विसर्गः ॥ कZ_०२.३६.४४ ॥
कारागार में भी बच्चों, वृद्धों, रोगियों और अनाथ/असहायों को जन्मदिन/जन्म-नक्षत्र के दिनों तथा पूर्णिमा के दिनों में छोड़ दिया जाए (या अवकाश दिया जाए)।
Sutra 45
पण्यशीलाः समयानुबद्धा वा दोषनिष्क्रयं दद्युः ॥ कZ_०२.३६.४५ ॥
व्यापार-जीवी लोग, या समय-बंध अनुबंध से बँधे लोग, अपराध के लिए प्रतिकर-दण्ड (निष्क्रय) दें।
Sutra 46
कर्मणा कायदण्डेन हिरण्यानुग्रहेण वा ॥ कZ_०२.३६.४६च्द् ॥
मुक्ति/राहत श्रम-कार्य से, शारीरिक दण्ड से, या धन-प्रदान (भुगतान) से हो सकती है।
Sutra 47
पुत्रजन्मनि वा मोक्षो बन्धनस्य विधीयते ॥ कZ_०२.३६.४७च्द् ॥
या पुत्र-जन्म पर बंदन (कारावास) से मुक्ति का आदेश दिया जाता है।
Reduced custodial abuse and disorder, healthier detention conditions, lower risk of riots/escape, and increased public confidence that royal daṇḍa is regulated rather than arbitrary—strengthening internal security and legitimacy.
While this extract does not specify a penalty, Kautilya’s administrative logic implies liability of custodial officials for negligence or cruelty: fines, dismissal, and punitive daṇḍa proportional to harm caused (especially if unlawful suffering, death, or escape results from failure to inspect/maintain bandhanasthāna).