Adhyaya 19
AdhyakshapracharaAdhyaya 19

Adhyaya 19

Book 2 operationalizes the Vijigīṣu’s power by turning administration into measurable routines. Chapter 2.19 assigns the Pautavādhyakṣa the duty of making and enforcing standards for weights and measures (pautava-karmānta), including grain/seed-based units, metal-weight equivalences, and the construction specifications of balances and counterweights. The pragmatic objective is to close a core leakage-point of the kośa: fraud in trade, taxation, and state purchases. By defining conversion ladders (māṣa, suvarṇa, karṣa, pala; rūpya-māṣaka; dharaṇa; vajra-dharaṇa) and mandating stable materials and designs (iron/stone standards resistant to water/heat distortion), the text builds an administrative ‘metrology regime.’ This regime strengthens the treasury indirectly: fair exchange increases compliance, predictable pricing stabilizes supply, and standardized assessment enables consistent fines and dues. In the Saptāṅga body, this is the treasury’s skeletal system—rigid measures that let fiscal muscles act without slipping.

Sutras

Sutra 1

पौतवाध्यक्षः पौतवकर्मान्तान् कारयेत् ॥ कZ_०२.१९.०१ ॥

तौल-माप के अधीक्षक (पौतवाध्यक्ष) तौल-माप-स्थापना के कार्यों को कराए।

Sutra 2

धान्यमाषा दश सुवर्णमाषकः पञ्च वा गुञ्जाः ॥ कZ_०२.१९.०२ ॥

दस धान्य-माष से एक सुवर्ण-माषक होता है; अथवा पाँच गुञ्जा [से एक सुवर्ण-माषक]।

Sutra 3

ते षोडश सुवर्णः कर्षो वा ॥ कZ_०२.१९.०३ ॥

वे सोलह सुवर्ण (सुवर्ण-माषक) मिलकर एक कर्ष (करष) होते हैं।

Sutra 4

चतुष्कर्षं पलम् ॥ कZ_०२.१९.०४ ॥

चार कर्ष मिलकर एक पल होता है।

Sutra 5

अष्टाशीतिर्गौरसर्षपा रूप्यमाषकः ॥ कZ_०२.१९.०५ ॥

चौरासी सफ़ेद सरसों के दाने एक रौप्य-माषक (चाँदी का माषक) होते हैं।

Sutra 6

ते षोडश धरणं शौम्ब्यानि वा विंशतिः ॥ कZ_०२.१९.०६ ॥

वे (रौप्य-माषक) सोलह मिलकर एक धरण होते हैं; या शौम्ब्यानी गणना में बीस (मिलकर धरण होते हैं)।

Sutra 7

विंशतितण्डुलं वज्रधरणम् ॥ कZ_०२.१९.०७ ॥

वज्र-धरण (एक मानक भार-इकाई) बीस चावल के दानों के बराबर है।

Sutra 8

अर्धमाषकः माषकः द्वौ चत्वारः अष्टौ माषकाः सुवर्णो द्वौ चत्वारः अष्टौ सुवर्णाः दश विंशतिः त्रिंशत् चत्वारिंशत् शतमिति ॥ कZ_०२.१९.०८ ॥

मूल्य-इकाइयों का क्रम यह है: आधा माषक; एक माषक; दो, चार और आठ माषक; फिर एक सुवर्ण; दो, चार और आठ सुवर्ण; और फिर दस, बीस, तीस, चालीस और सौ (इकाइयाँ)।

Sutra 9

तेन धरणानि व्याख्यातानि ॥ कZ_०२.१९.०९ ॥

उस (गणना/क्रम) से धरण-भार (धरण) परिभाषित/व्याख्यायित होते हैं।

Sutra 10

प्रतिमानान्ययोमयानि मागधमेकलशैलमयानि यानि वा नोदकप्रदेहाभ्यां वृद्धिं गच्छेयुरुष्णेन वा ह्रासम् ॥ कZ_०२.१९.१० ॥

मानक माप (प्रतिमान) लोहे के, या मागध-शिला के, या एकलशैल-शिला के बनवाए; अथवा किसी भी ऐसे पदार्थ के, जो पानी से भिगोने/लेपने पर बढ़े नहीं और गर्मी से घटे नहीं।

Sutra 11

षडङ्गुलादूर्ध्वमष्टाङ्गुलोत्तरा दश तुलाः कारयेत् लोहपलादूर्ध्वमेकपलोत्तराः यन्त्रमुभयतःशिक्यं वा ॥ कZ_०२.१९.११ ॥

वह दस तराजू-दंड (तुला) बनवाए—छह अंगुल से ऊपर, हर बार आठ अंगुल की वृद्धि के साथ; और (साथ में) लोहे के बाट—एक पल से ऊपर, हर बार एक पल की वृद्धि के साथ; अथवा दोनों ओर से लटकने वाला तौल-यंत्र।

Sutra 12

पञ्चत्रिंशत्पललोहां द्विसप्तत्यङ्गुलायामां समवृत्तां कारयेत् ॥ कZ_०२.१९.१२ ॥

वह पैंतीस पल वज़न की लोहे की (मानक) छड़/कांटा बनवाए—बहत्तर अंगुल लंबी, और समान गोलाकार (वृत्ताकार) रूप वाली।

Sutra 13

तस्याः पञ्चपलिकं मण्डलं बद्ध्वा समकरणं कारयेत् ॥ कZ_०२.१९.१३ ॥

उस पर पाँच पल का गोल टुकड़ा बाँधकर यंत्र को सम (संतुलित) करवाए।

Sutra 14

ततः कर्षोत्तरं पलं पलोत्तरं दशपलं द्वादश पञ्चदश विंशतिरिति पदानि कारयेत् ॥ कZ_०२.१९.१४ ॥

फिर मानक बाट क्रमशः बनवाए: एक करष अधिक वाला एक पल; फिर पल-पल की वृद्धि में; फिर दस-पल, बारह, पंद्रह और बीस (इकाइयों) के बाट।

Sutra 15

तत आशताद्दशोत्तरं कारयेत् ॥ कZ_०२.१९.१५ ॥

फिर सौ के आगे दस-दस की वृद्धि वाले (उच्च) बाट बनवाए।

Sutra 16

अक्षेषु नान्दीपिनद्धं कारयेत् ॥ कZ_०२.१९.१६ ॥

धुरियों/धुरी-बिंदुओं पर नान्दी-बन्धन (कसाव/लॉक) बनवाए।

Sutra 17

द्विगुणलोहां तुलामतः षण्णवत्यङ्गुलायामां परिमाणीं कारयेत् ॥ कZ_०२.१९.१७ ॥

वह तुलामत (मानक तौल-प्रणाली) के अनुसार, दुगुने मोटे धातु की, छियानवे अङ्गुल लंबी परिमाणी (मानक माप-छड़/बीम) बनवाए।

Sutra 18

तस्याः शतपदादूर्ध्वं विंशतिः पञ्चाशत् शतमिति पदानि कारयेत् ॥ कZ_०२.१९.१८ ॥

उस पर सौ-पद (शतपद) के ऊपर आगे बीस, पचास और सौ के अनुसार चरण-चिह्न (पद) बनवाए।

Sutra 19

विंशतितौलिको भारः ॥ कZ_०२.१९.१९ ॥

बीस तौलिक का भार ‘भार’ कहलाता है।

Sutra 20

दशधारणिकं पलम् ॥ कZ_०२.१९.२० ॥

दस धारणिक का ‘पल’ होता है।

Sutra 21

तत्पलशतमायमानी ॥ कZ_०२.१९.२१ ॥

आयमानी (मानक धारिता-माप) उन पलों के सौ के अनुसार निर्धारित है (अर्थात 100-पल का मानक)।

Sutra 22

पञ्चपलावरा व्यावहारिकी भाजन्यन्तःपुरभाजनी च ॥ कZ_०२.१९.२२ ॥

मापन के लिए (मानक) पात्र हों—व्यावहारिकी (व्यापारिक) और अन्तःपुर-भाजनी; इनकी अनुमेय कमी की सीमा पाँच पल है।

Sutra 23

तासामर्धधरणावरं पलम् द्विपलावरमुत्तरलोहं षडङ्गुलावराश्चायामाः ॥ कZ_०२.१९.२३ ॥

उन पात्रों के लिए पल-मान में आधे धारणक की कमी स्वीकार्य है; उत्तरलोह के मान में दो पल की कमी स्वीकार्य है; और उनकी लंबाई में छह अंगुल की कमी स्वीकार्य है।

Sutra 24

पूर्वयोः पञ्चपलिकः प्रयामो मांसलोहलवणमणिवर्जम् ॥ कZ_०२.१९.२४ ॥

पूर्व के दोनों (मापों) के लिए निर्धारित क्षमता पाँच पल है—मांस, धातु, नमक और मणि (रत्न) के लिए (इनका उपयोग) वर्जित है।

Sutra 25

काष्ठतुला अष्टहस्ता पदवती प्रतिमानवती मयूरपदाधिष्ठिता ॥ कZ_०२.१९.२५ ॥

काष्ठ-तुला आठ हस्त लंबी हो; उसमें पद (अंकन/विभाजन) हों, मानक प्रतिमान (बाट) लगे हों, और वह मयूर-पद (मोर-पाँव) आधार पर स्थापित हो।

Sutra 26

काष्ठपञ्चविंशतिपलं तण्डुलप्रस्थसाधनम् ॥ कZ_०२.१९.२६ ॥

पच्चीस पल का काष्ठ-मान तण्डुल (चावल) के प्रस्थ-मान को स्थापित/जाँचने का साधन होगा।

Sutra 27

एष प्रदेशो बह्वल्पयोः ॥ कZ_०२.१९.२७ ॥

बड़े और छोटे मापों के लिए यही प्रदेश/मान-सीमा (मानक-परास) है।

Sutra 28

इति तुलाप्रतिमानं व्याख्यातम् ॥ कZ_०२.१९.२८ ॥

इस प्रकार तराजू/तुला के मानक का वर्णन किया गया।

Sutra 29

अथ धान्यमाषद्विपलशतं द्रोणमायमानं सप्ताशीतिपलशतमर्धपलं च व्यावहारिकम् पञ्चसप्ततिपलशतं भाजनीयम् द्विषष्टिपलशतमर्धपलं चान्तःपुरभाजनीयम् ॥ कZ_०२.१९.२९ ॥

अब धान्य के लिए: द्रोण-माप (भार-समतुल्य) दो सौ पल का माना जाए। इनमें 785½ पल ‘व्यावहारिक’ मानक है; 575 पल ‘भाजनीय’ (राशन-वितरण) मानक है; और 625½ पल ‘अन्तःपुर-भाजनीय’ (अन्तःपुर के लिए) मानक है।

Sutra 30

तेषामाढकप्रस्थकुडुबाश्चतुर्भागावराः ॥ कZ_०२.१९.३० ॥

इनमें आढक, प्रस्थ और कुडुब क्रमशः एक-चौथाई कम (माप में) होते हैं।

Sutra 31

षोडशद्रोणा खारी ॥ कZ_०२.१९.३१ ॥

सोलह द्रोण मिलकर एक खारी होते हैं।

Sutra 32

विंशतिद्रोणिकः कुम्भः ॥ कZ_०२.१९.३२ ॥

कुम्भ बीस द्रोण के बराबर होता है।

Sutra 33

कुम्भैर्दशभिर्वहः ॥ कZ_०२.१९.३३ ॥

दस कुम्भ मिलकर एक ‘वह’ बनते हैं।

Sutra 34

शुष्कसारदारुमयं समं चतुर्भागशिखं मानं कारयेत् अन्तःशिखं वा ॥ कZ_०२.१९.३४ ॥

वह माप-पात्र सूखी, सुदृढ़ हृदय-काष्ठ से, सम और ठीक, चौथाई भाग की ‘शिखा’ (किनारा/उभार) के मानक सहित बनवाए; या फिर भीतर की ओर ‘अन्तःशिखा’ वाला।

Sutra 35

रसस्य तु सुरायाः पुष्पफलयोस्तुषाङ्गाराणां सुधायाश्च शिखामानं द्विगुणोत्तरा वृद्धिः ॥ कZ_०२.१९.३५ ॥

परन्तु रस/द्रव, सुरा, पुष्प-फल, भूसी-कोयला तथा चूने के लिए ‘शिखा’ का मान दुगुना (अधिक) बढ़ाया जाए।

Sutra 36

सपादपणो द्रोणमूल्यमाढकस्य पादोनः षण्माषकाः प्रस्थस्य माषकः कुडुबस्य ॥ कZ_०२.१९.३६ ॥

द्रोण का मूल्य सवा पण है; आढक का उससे चौथाई कम; प्रस्थ का छह माषक; और कुडुब का एक माषक।

Sutra 37

द्विगुणं रसादीनां मानमूल्यम् ॥ कZ_०२.१९.३७ ॥

रस आदि द्रव पदार्थों के लिए माप-शुल्क/मूल्य (मान-मूल्य) दोगुना निर्धारित होगा।

Sutra 38

विंशतिपणाः प्रतिमानस्य ॥ कZ_०२.१९.३८ ॥

मानक माप (प्रतिमान) का शुल्क बीस पण होगा।

Sutra 39

तुलामूल्यं त्रिभागः ॥ कZ_०२.१९.३९ ॥

तुला-मूल्य का शुल्क/मूल्य एक-तिहाई होगा।

Sutra 40

चतुर्मासिकं प्रातिवेधनिकं कारयेत् ॥ कZ_०२.१९.४० ॥

वह प्रत्येक चार मास पर सत्यापन/मुहर (प्रातिवेधनिक) कराए।

Sutra 41

अप्रतिविद्धस्यात्ययः सपादः सप्तविंशतिपणः ॥ कZ_०२.१९.४१ ॥

जिसका माप असत्यापित/बिना मुहर का हो, उसका दंड सत्ताईस पण और चौथाई (27¼) होगा।

Sutra 42

प्रातिवेधनिकं काकणीकमहरहः पौतवाध्यक्षाय दद्युः ॥ कZ_०२.१९.४२ ॥

वे सत्यापन शुल्क—एक काकणी—प्रतिदिन तौल-माप अधीक्षक को दें।

Sutra 43

द्वात्रिंशद्भागस्तप्तव्याजी सर्पिषः चतुःषष्टिभागस्तैलस्य ॥ कZ_०२.१९.४३ ॥

घी के लिए तपाने से होने वाली स्वीकार्य कमी (तप्त-व्याजी) 1/32 और तेल के लिए 1/64 होगी।

Sutra 44

पञ्चाशद्भागो मानस्रावो द्रवाणाम् ॥ कZ_०२.१९.४४ ॥

द्रव पदार्थों के लिए स्वीकार्य रिसाव-हानि (मान-स्राव) 1/50 होगी।

Sutra 45

कुडुबार्धचतुरष्टभागानि मानानि कारयेत् ॥ कZ_०२.१९.४५ ॥

वह कुडुब इकाई में तथा उसके आधे, चौथाई और आठवें भाग के माप बनवाए।

Sutra 46

कुडुबाश्चतुरशीतिर्वारकः सर्पिषो मतः ॥ कZ_०२.१९.४६ ॥

घी के लिए एक वारक को चौरासी कुडुब के बराबर माना गया है।

Sutra 47

चतुःषष्टिस्तु तैलस्य पादश्च घटिकानयोः ॥ कZ_०२.१९.४७ ॥

तैल के लिए मान चौंसठ (इकाइयाँ) है; और दोनों ‘घटिका’ मापों के मामले में चौथाई भाग लागू होता है।

Frequently Asked Questions

Market trust and price stability rise; disputes over quantity/quality fall; state procurement and taxation become predictable; fraud becomes detectable—supporting prosperity and fiscal resilience (kośa-strengthening welfare).

This passage itself specifies standards rather than explicit fines; enforcement is implied through inspection and the general Arthashastric rule that falsifying weights/measures triggers penalties and confiscation under market/trade regulation administered by relevant adhyakṣas.