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सोपान का ‘समापन-संस्कार’: लीला-परिणति के बाद समाज, मन और साधना का ‘स्थिर-धर्म’ में प्रतिष्ठापन। यहाँ रामराज्य बाह्य-राज्य नहीं, अंतःकरण का राज्य बनता है—गुणगान, सत्संग, संत-लक्षण, असंत-स्वभाव और ‘प्रताप-रवि’ (ज्ञान/कृपा) के उदय से अविद्या-निशा का क्षय। यह चरण साधक को कथा-रस से ‘नित्याचार’ (स्मरण, संग, विवेक) में उतारता है, जिससे मुक्ति का मार्ग लोक-जीवन के भीतर ही चलने लगता है।
উত্তরকাণ্ডে ‘শান্ত’ রসকে প্রধান করে তা ‘ভক্তি-শৃঙ্গার’ (রাম-সীতার শোভা), ‘দাস্য’ (সেবক-ত্রাণ), এবং ‘নীতি/ধর্ম’-এর উপদেশধর্মী স্বরে পরিণত হয়। এই খণ্ডে নগর-জনের রাম-গুণগান (লোক-ধর্ম) দিয়ে শুরু করে রাম-প্রতাপকে ‘দিনেশ’ (সূর্য) রূপকে দেখানো হয়েছে: অবিদ্যা-নিশার নাশ, কাম-ক্রোধ প্রভৃতির সংকোচ, এবং ধর্ম-তড়াগে জ্ঞান-পঙ্কজের বিকাশ। তারপর সনকাদি-আগমন ও স্তুতি-প্রার্থনায় নির্গুণ-সগুণ সমন্বয় দৃঢ় হয়—‘অনন্ত অনাময়’-এর সঙ্গে ‘ইন্দিরারমন’। শেষে ভরত-এর প্রশ্নকে উপলক্ষ করে সন্ত-অসন্তের লক্ষণ-পরম্পরা দেওয়া হয়, যা কাহিনিকে সমাজ-শিক্ষা ও সাধক-আত্মপরীক্ষার উপকরণে রূপ দেয়। এইভাবে উত্তরকাণ্ড লীলার ‘ফল’ দিয়ে সাধনার ‘স্থায়ী বিধান’ নির্মাণ করে।
Verse 68 (दोहा/सोरठा)
अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज। सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज।।26।।
avadhapurī bāsinh kara sukha saṃpadā samāja | sahasa seṣa nahiṃ kahi sakahiṃ jahã nr̥pa rāma birāja ||26||
অযোধ্যাবাসীরা আনন্দ ও ঐশ্বর্যে সম্পূর্ণ পরিপূর্ণ ছিল; যেখানে রাজা রাম রাজত্ব করতেন, সেখানে সহস্রজিহ্বা শेषও তার মহিমা সম্পূর্ণ বর্ণনা করতে অক্ষম।
Verse 69 (चौपाई)
नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा।। दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं।। जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं।। पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर।। नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई।। महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा।। धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत।। बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं।।
nārada-ādi sanakādi munīsā | darasana lāgi kosalādhīsā || dina prati sakala ajodhyā āvahiṃ | dekhi nagaru birāgu bisarāvahiṃ || jāta-rūpa mani racita aṭārīṃ | nānā raṅga rucira gaca ḍhārīṃ || pura cahũ pāsa koṭ ati suṃdara | race kaṅgūrā raṅga raṅga bara || nava graha nikara anīka banāī | janu gherī amarāvatī āī || mahi bahu raṅga racita gaca kā̃cā | jo biloki munibara mana nācā || dhavala dhāma ūpara nabha cuṃbata | kalasa manahũ rabi sasi duti niṃdata || bahu mani racita jharokhā bhrājahĩ | gṛha gṛha prati mani dīpa birājahĩ ||
নারদ ও সনকাদি মুনিশ্রেষ্ঠরা কোশলাধীশ শ্রীরামের দর্শনলাভের জন্য আগমন করেন। দিনে দিনে সকলে অযোধ্যায় উপস্থিত হন; নগর দর্শনে তাঁদের বিরাগ বিস্মৃত হয়। রত্নখচিত স্বর্ণময় অট্টালিকাসমূহ বিবিধ রঙের মনোরম চুনে আবৃত। নগরের চতুর্দিকে অতি সুন্দর প্রাচীর, বিভিন্ন রঙের কংগুরায় রচিত। নবগ্রহমণ্ডল যেন এসে নগর পরিবেষ্টন করেছে, মনে হয় অমরাবতী নগরী এসে উপস্থিত হয়েছে। ভূমি বহুরঙা কাচের ন্যায় মসৃণ; দেখে মুনিশ্রেষ্ঠদের মন নৃত্য করে। শ্বেত প্রাসাদসমূহ আকাশ চুম্বন করে; তাদের কলশগুলি সূর্য ও চন্দ্রের প্রভা অপেক্ষা উজ্জ্বল। রত্ননির্মিত ঝরোখাগুলি ভাস্বর, প্রতিটি গৃহে রত্নদীপ বিরাজমান।
Verse 70 (छंद)
मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची। मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची।। सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे। प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे।।
mani dīpa rājahiṃ bhavana bhrājahiṃ deharīṃ bidruma racī | mani khaṃbha bhīti birañci biracī kanaka mani marakata khacī || suṃdara manohara mandirāyata ajira rucira phaṭika race | prati dvāra dvāra kapāṭa puraṭ banāi bahu bajranhi khace ||
রত্নদীপসমূহ উজ্জ্বলিত; প্রাসাদগুলি দ্যুতিমান, তাদের দেহলিসমূহ প্রবালে নির্মিত। রত্নস্তম্ভ ও প্রাচীরগুলি ব্রহ্মার সৃষ্টির ন্যায় স্বর্ণ, রত্ন ও মারকতমণিতে খচিত। সুন্দর মনোহর মন্দিরাকৃতি গৃহসমূহে রমণীয় ফটকানি স্ফটিকে নির্মিত। প্রতিটি দ্বারে স্বর্ণদ্বার নির্মিত এবং অসংখ্য বজ্রমণিতে খচিত।
Verse 71 (दोहा/सोरठा)
चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ। राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ।।27।।
cāru citrasālā gṛha gṛha prati likhe banāi | rāma carita je nirakha muni te mana lehiṃ corāi ||27||
প্রতিটি গৃহে ছিল মনোহর চিত্রশোভিত প্রাসাদ-প্রাঙ্গণ, নানাবিধ অঙ্কনে সুশোভিত; আর রামের লীলা দর্শনকারী ঋষিদের মন চুরি হয়ে গেল—সম্পূর্ণরূপে মোহিত হল।
Verse 72 (चौपाई)
सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई।। लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बंसत कि नाई।। गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर।। नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए।। मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत।। जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं।। सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक।। राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रूचिर बजारू।।
sumana bāṭikā sabahiṃ lagāī | bibidha bhā̃ti kari jatana banāī || latā lalita bahu jāti suhāī | phūlahiṃ sadā basaṃta ki nāī || guṃjata madhukara mukhara manohara | māruta tri-bidha sadā baha suṃdara || nānā khaga bālakanhi jiāe | bolata madhura uṛāta suhāe || mora haṃsa sāras pārāvata | bhavanani para sobhā ati pāvata || jahã tahã dekhahiṃ nija parichāhīṃ | bahu bidhi kūjahiṃ nr̥tya karāhīṃ || suka sārikā paṛhāvahiṃ bālaka | kahahu rāma raghupati jana-pālaka || rāja duāra sakala bidhi cāru | bīthīṃ cauhaṭ rucira bajārū ||
সকলে পুষ্পোদ্যান রোপণ করেছেন, বিবিধ উপায়ে যত্নসহকারে নির্মাণ করেছেন। বহুপ্রকার লতাসমূহ সুশোভিত, সর্বদা পুষ্পিত, যেন বসন্তকাল চিরন্তন। ভ্রমরসমূহ মধুর গুঞ্জন করে, মনোহর সুমন্দ্র সর্বদা প্রবাহিত। শিশুরা নানা পক্ষী প্রতিপালন করে; তারা মধুরস্বরে বলে ও আনন্দে উড়ে বেড়ায়। ময়ূর, হংস, সারস ও পারাবত ভবনসমূহে অত্যন্ত শোভা বর্ধন করে। ইতস্তত নিজ প্রতিবিম্ব দেখে বহুবিধ কূজন করে ও নৃত্য করে। শুক ও শারিকাকে শিশুরা শেখায়: রাম বল, রঘুপতি জনপালক! রাজদ্বার সর্বপ্রকারে সুন্দর; বীথিকা, চৌক ও বাজার রমণীয়।
Verse 73 (छंद)
बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए। जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए।। बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते। सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे।।
bājāra rucira na banai baranata bastu binu gatha pāiye. jahã bhūpa ramā-nivāsa tahã kī saṁpadā kimi gāiye. baiṭhe bajāja sarāpha banika aneka manahũ kubera te. saba sukhī saba saccarita sundara nāri nara sisu jaraṭha je.
বাজার অতি রমণীয়, বর্ণনা করা যায় না; সুসংযুক্ত বিবরণ ব্যতিরেকে তা অবগত হওয়া যায় না। যেখানে রাজা রাম লক্ষ্মীর বাসস্থান অবস্থান করেন, সেখানকার সমৃদ্ধি কীভাবে গাইব? কাপড়ের ব্যবসায়ী, সোনারি ও বণিকগণ অনেক বসে আছেন, যেন কুবেরগণ। সকলে সুখী, সকলে সদাচারী, নারী পুরুষ শিশু বৃদ্ধ সকলেই সুন্দর।
Verse 74 (दोहा/सोरठा)
उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर। बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर।।28।।
uttara disi sarajū baha nirmala jala gambhīra. bā̃dhe ghāṭa manohara svalpa paṅka nahĩ tīra ||28||
উত্তরে প্রবাহিত ছিল সরযূ—তার জল নির্মল ও গভীর। তার তীরে তীরে মনোরম ঘাট নির্মিত ছিল, আর কূলে কাদার চিহ্ন প্রায় ছিলই না।
Verse 75 (चौपाई)
दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।। पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना।। राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।। तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर।। कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी।। तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई।। पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई।। देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा।।
dūri pharāka rucira so ghāṭā. jahã jala piyahĩ bāji gaja ṭhāṭā. panighaṭa parama manohara nānā. tahā̃ na puruṣa karahĩ asnānā. rājaghāṭa saba bidhi sundara bara. majjahĩ tahā̃ barana cāriũ nara. tīra tīra devanha ke mandira. cahũ disi tinh ke upabana sundara. kahũ kahũ saritā tīra udāsī. basahĩ gyāna rata muni sannyāsī. tīra tīra tulasikā suhāī. bṛnda bṛnda bahu muninh lagāī. pura sobhā kachu barani na jāī. bāhera nagara parama rucirāī. dekhata purī akhila agha bhāgā. bana upabana bāpikā taṛāgā.
দূরে দূরে সুন্দর ঘাট বিস্তৃত, যেখানে অশ্ব ও হস্তী সারিবদ্ধভাবে জল পান করে। অনেক স্নানঘাট অতি মনোহর; সেখানে পুরুষেরা স্নান করে না। রাজঘাট সর্বপ্রকারে সুন্দর; সেখানে চার বর্ণের মানুষ স্নান করেন। তীরে তীরে দেবতাদের মন্দির, চতুর্দিকে তাদের সুন্দর উপবন। কোথাও কোথাও নদীর তীরে উদাসীন সন্ন্যাসী মুনিগণ জ্ঞানে রত হয়ে বাস করেন। তীরে তীরে তুলসী সুশোভিত, মুনিগণ বৃন্দে বৃন্দে রোপণ করেছেন। নগরের শোভা বর্ণনা করা যায় না; নগরের বাইরেও পরম রমণীয়। সেই পুরী দর্শনে সকল পাপ বিনাশ হয়; বন, উপবন, কূপ ও পুষ্করিণী সর্বত্র।
Verse 76 (छंद)
बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं। सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं।। बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं। आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं।।
bāpī̃ taṛāga anūpa kūpa manoharāyata sohahī̃. sopāna sundara nīra nirmala dekhi sura muni mohahī̃. bahu raṅga kañja aneka khaga kūjahī̃ madhupa gũjārahī̃. ārāma ramya pikādi khaga rava janu pathika hãkārahī̃.
অতুল বাওলি, পুকুর আর মনোহর কূপে দেশ শোভিত ছিল। তাদের শুভ্র সিঁড়ি আর নির্মল জল দেখিলে দেবতা ও ঋষির মনও মুগ্ধ হতো। নানা বর্ণের পদ্ম ফুটিত; অগণিত পাখি গাহিত, ভ্রমর গুঞ্জরিত। মনোরম উদ্যানসমূহে কোকিল ও অন্যান্য পক্ষীর ডাক যেন পথিককে অগ্রসর হতে আহ্বান করিত।
Verse 77 (दोहा/सोरठा)
रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ। अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ।।29।।
ramā-nātha jahã rājā so pura barani ki jāi. animādika sukha saṁpadā rahī̃ avadha saba chāi ||29||
যে নগরে লক্ষ্মীপতি রাম রাজা—সে নগরের বর্ণনা কী করে হয়? অযোধ্যায় সর্বত্র সুখ-সমৃদ্ধি, এমনকি অণিমা প্রভৃতি সিদ্ধিও ছড়াইয়া ছিল।
Verse 78 (चौपाई)
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं।। भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि। जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि। धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि। काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि। लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि। संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि। जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि। बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि। मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि।।
jahã-tahã nara raghupati guna gāvahĩ | baiṭhi parasapara ihai sikhāvahĩ || bhajahu pranata-pratipālaka rāmahi | sobhā sīla rūpa guna dhāmahi || jalaja-bilocana syāmala gātahi | palaka nayana iva sevaka trātahi || dhṛta sara rucira cāpa tūnīrahi | santa kañja-bana ravi raṇa-dhīrahi || kāla karāla byāla khaga-rājahi | namata rāma akāma mamatā jahi || lobha moha mṛga-jūtha kirātahi | manasija kari hari jana sukha-dātahi || saṁsaya soka nibiṛa tama bhānūhi | danuja gahana ghana dahana kṛsānūhi || janaka-sutā sameta raghu-vīrahi | kasa na bhajahu bhañjana bhava-bhīrahi || bahu bāsanā masaka hima-rāsihi | sadā eka-rasa aja abināsihi || muni-rañjana bhañjana mahi-bhārahi | tulasīdāsa ke prabhūhi udārahi ||
সর্বত্র মানুষ রঘুপতির গুণ গায়; পরস্পর বসে এই শিক্ষা দেয়: রামকে ভজ কর, যিনি শরণাগতের পালনকর্তা, শোভা, শীল, রূপ ও গুণের ধাম। পদ্মনয়ন, শ্যামবর্ণ দেহ, তিনি সেবকদের রক্ষা করেন যেমন পলক নয়নের রক্ষা করে। ধনুক, তূণীর ও বাণ ধারণ করে তিনি সাধুদের পদ্মবনে সূর্য এবং রণে বীর। ভয়ংকর কাল ও সর্পের নিকট তিনি গরুড়; রামকে প্রণাম করলে কাম ও মমতা দূর হয়। তিনি লোভ ও মোহের মৃগয়ায় কিরাত; কামদেব রূপ কামনা বিনাশ করে জনসাধারণকে সুখ দেন। সংশয় ও শোকের ঘন অন্ধকারে তিনি সূর্য; দানবদের ঘন অরণ্যে তিনি অগ্নি। জনকসুতা সহ রঘুবীর ভবভয় নাশ করেন, তাঁকে না ভজিবে কেমন করে? বাসনার তুষাররাশিতে তিনি সূর্য; সদা একরস, অজ ও অবিনাশী। মুনিগণকে রঞ্জিত করে পৃথিবীর ভার হরণ করেন, তুলসীদাসের প্রভু উদার।
Verse 79 (दोहा/सोरठा)
एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान। सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान।।30।।
ehi bidhi nagara nāri nara karahĩ rāma guna-gāna | sānukūla saba para rahahĩ santata kṛpā-nidhāna ||30||
এইভাবে নগরজুড়ে নারী-পুরুষ সকলেই রামের গুণগান করে; আর করুণার নিধি সর্বদাই সকলের প্রতি প্রসন্ন থাকেন।
Verse 80 (चौपाई)
जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा।। पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका।। जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी।। अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने।। बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ।। मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा।। धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना।। सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका।।
jaba te rāma pratāpa khagesā | udita bhayau ati prabala dinesā || pūri prakāsa raheu tihũ lokā | bahuteṅha sukha bahutana mana sokā || jinhahi soka te kahaũ bakhānī | prathama abidyā nisā nasānī || agha ulūka jahã-tahã lukāne | kāma krodha kairava sakucāne || bibidha karma guna kāla subhāū | e cakora sukha lahahĩ na kāū || matsara māna moha mada corā | inha kara hunara na kavanihũ orā || dharama taṛāga gyāna bigyānā | e paṅkaja bikase bidhi nānā || sukha santoṣa birāga bibekā | bigata soka e koka anekā ||
যখন থেকে রামের প্রতাপ গরুড়ের ন্যায় অতি প্রবল সূর্যরূপে উদিত হল, তিন লোক আলোকে পূর্ণ হল। অনেকে সুখ পেল; অনেকের মনে শোক রইল। যাঁদের শোক আছে তাঁদের বলি: প্রথমে অবিদ্যার রাত্রি নাশ হল। পাপ পেঁচা লুকিয়ে গেল; কাম ও ক্রোধ নিশাপুষ্পের ন্যায় কুঞ্চিত হল। কিন্তু কর্ম, গুণ, কাল ও স্বভাবের বিবিধ প্রকার চকোরের ন্যায় সেই আলোকে সুখ পেল না। ঈর্ষা, অহংকার, মোহ ও মদ চোর; তাদের কৌশল কোথাও আশ্রয় পায় না। ধর্মের পুষ্করিণীতে জ্ঞান ও বিজ্ঞান পদ্ম বিভিন্ন প্রকারে বিকশিত হল; সুখ, সন্তোষ, বিরাগ ও বিবেক অনেক কোকিল গান করল, শোক গেল।
Verse 81 (दोहा/सोरठा)
यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास। पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास।।31।।
yaha pratāpa rabi jākẽ ura jaba karai prakāsa | pachile bāṛhahĩ prathama je kahe te pāvahĩ nāsa ||31||
যখন এই যশের সূর্য হৃদয়ের মধ্যে উদিত হয়, তখন পূর্বোক্ত শৈথিল্য-প্রবৃত্তিগুলি আর বৃদ্ধি পায় না—তাদের বিনাশ ঘটে।
Verse 82 (चौपाई)
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा।। सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए।। जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए।। ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना।। रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा।। आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।। तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी।। राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी।।
bhrātanha sahita rāmu eka bārā | saṅga parama priya pavan-kumārā || sundara upabana dekhana gae | saba taru kusumita pallava nae || jāni samaya sanakādika āe | teja-puñja guna sīla suhāe || brahmānanda sadā laya-līnā | dekhata bālaka bahu-kālīnā || rūpa dharẽ janu cāriu bedā | sama-darasī muni bigata bibhedā || āsā basana byasana yaha tinhahī̃ | raghupati carita hoi tahã sunahī̃ || tahā̃ rahe sanakādi bhavānī | jahã ghaṭ-saṁbhava muni-bara gyānī || rāma kathā muni-bara bahu baranī | gyāna-jonī pāvaka jimi aranī ||
একবার রাম ভ্রাতাদের সহিত পবনকুমার হনুমানকে সঙ্গে নিয়ে সুন্দর উপবন দর্শনে গেলেন; প্রতিটি বৃক্ষ নবপল্লবে পুষ্পিত। সময় জানতে পেরে সনকাদি মুনিগণ উপস্থিত হলেন, তেজের পুঞ্জ, গুণ ও শীলে সুশোভিত, সদা ব্রহ্মানন্দে লীন, বহুকালীন বালকরূপে দৃশ্যমান। তাঁরা চার বেদের মূর্তি স্বরূপ, সমদর্শী মুনি, বিভেদ রহিত। তাঁদের একমাত্র আসক্তি এই যে রঘুপতির চরিত যেখানে শ্রবণ হয় সেখানে তাঁরা শ্রবণ করেন। সেখানে হে ভবানী সনকাদি অবস্থান করতেন, যেখানে ঘটসম্ভব মুনিশ্রেষ্ঠ জ্ঞানী অগস্ত্যও ছিলেন। মুনিশ্রেষ্ঠগণ রামকথা বহুপ্রকারে বর্ণনা করেন; তা জ্ঞানের উৎস, অরণি থেকে অগ্নি উৎপন্নের ন্যায়।
Verse 83 (दोहा/सोरठा)
देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह। स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह।।32।।
dekhi rāma muni āvata haraṣi daṇḍavata kīnha | savāgata pūँchi pīta paṭa prabhu baiṭhana kahaँ dīnha ||32||
ঋষিকে আসিতে দেখিয়া রামচন্দ্র আনন্দিত হলেন এবং সাষ্টাঙ্গ প্রণাম করিলেন। তিনি তাঁকে অভ্যর্থনা করিলেন, কুশল জিজ্ঞাসা করিলেন, এবং আসনরূপে বসিবার জন্য একখানি পীতবস্ত্র অর্পণ করিলেন।
Verse 84 (चौपाई)
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।। मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी।। स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन।। एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं।। तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा।। कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे।। आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा।। बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा।।
kīnha daṇḍavata tīnīuँ bhāī | sahita pavanasuta sukha adhikāī || muni raghupati chabi atula bilokī | bhae magana mana sake na rokī || śyāmala gāta saroruha locana | suṁdarətā maṁdira bhava mocana || ekṭaka rahe nimeṣa na lāvahiṁ | prabhu kara joreṁ sīsa navāvahiṁ || tinha kai dasā dekhi raghubīrā | stravata nayana jala pulaka sarīrā || kara gahi prabhu munibara baiṭhāre | parama manohara bacana ucāre || āju dhanya maiṁ sunahu munīsā | tumhareṁ darasa jāhiṁ agh khīsā || baṛe bhāga pāiba satasaṅgā | binahiṁ prayāsa hohiṁ bhava bhaṅgā ||
তিন ভ্রাতা বায়ুপুত্রসহ সাষ্টাঙ্গ প্রণাম করিলেন; তাঁদের আনন্দ ক্রমে ক্রমে বাড়িতেই লাগিল। ঋষি রঘুপতির অতুল সৌন্দর্য দেখিয়া মুগ্ধ হইলেন—মন আর সংযত রহিল না। শ্যামাঙ্গ, পদ্মনয়ন, সৌন্দর্যের ধাম, সংসারবন্ধন-হরণকারী—তিনি নিমেষহীন দৃষ্টিতে চাহিয়া রহিলেন, করযুগল জোড়া, মস্তক নত। তাঁদের অবস্থা দেখিয়া রঘুবীরের নয়ন অশ্রুসজল হইল, দেহে ভক্তির শিহরণ জাগিল। প্রভু ঋষির হাত ধরিয়া শ্রেষ্ঠ তপস্বীকে আসনে বসাইলেন এবং অতি মধুর বাক্য কহিলেন— “আজ আমি ধন্য—শুন হে মুনি। তোমার দর্শনে পাপ দূর হয়। সাধুসঙ্গ লাভ করাই মহাভাগ্য; অনায়াসে ভববন্ধন ছিন্ন হয়।”
Verse 85 (दोहा/सोरठा)
संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ। कहहि संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ।।33।।
saṁta saṅga apabarga kara kāmī bhava kara paṁtha | kahahiṁ saṁta kabi kobida śruti purāna sadagraṁtha ||33||
সাধুসঙ্গ মুক্তির পথ; কাম-প্রবৃত্ত জন চলে সেই পথে, যাহা সংসারবন্ধন গাঁথে। এই কথাই সাধু, কবি, জ্ঞানী, এবং বেদ-পুরাণসহ সকল সত্য শাস্ত্র ঘোষণা করেন।
Verse 86 (चौपाई)
सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी।। जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय।। जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर।। जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर।। ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद।। तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन।। सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय।। द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। ह्रदि बसि राम काम मद गंजय।।
suni prabhu bacana haraṣi muni cārī | pulakita tana astuti anusārī || jaya bhagavaṁta anaṁta anāmaya | anagha aneka eka karuṇāmaya || jaya nirguṇa jaya jaya guṇa sāgara | sukha maṁdira suṁdara ati nāgara || jaya iṁdirā ramana jaya bhūdhara | anupama aja anādi sobhākara || gyāna nidhāna amāna mānaprada | pāvana sujasa purāna beda bada || tagya kṛtagya agyatā bhaṁjana | nāma aneka anāma niraṁjana || sarba sarbagata sarba urālaya | basasi sadā hama kahaुँ paripālaya || dvaṁda bipati bhava phaṁda bibhaṁjaya | hr̥di basi rāma kāma mada gaṁjaya ||
প্রভুর বাক্য শুনিয়া চার ঋষি হর্ষিত হইলেন; দেহে শিহরণ উঠিল, মুখে স্তবধারা প্রবাহিত হইল— “জয় জয় ভগবান—অনন্ত, সর্বদুঃখহর, নিষ্পাপ; বহুরূপে প্রকাশিত হয়েও এক, করুণাময় স্বরূপ। নির্গুণের জয়; আবার সগুণ-সিন্ধুর জয়—আনন্দধাম, পরম মনোহর ও পরম জ্ঞানী। লক্ষ্মীপতির জয়, ধরাধর জয়—অতুল, অজ, অনাদি, তেজের স্রষ্টা। জ্ঞানভাণ্ডার, অহংকারাতীত তবু সম্মানদাতা; যাঁহার নির্মল যশ বেদ-পুরাণে গীত। তত্ত্বজ্ঞ, কৃতজ্ঞ, অজ্ঞাননাশক; বহু নামে বিভূষিত, তবু নামহীন; নির্মল, কলঙ্কহীন। সর্বস্ব, সর্বব্যাপী, সর্বহৃদয়বাসী—চিরকাল আমাদের সঙ্গে থাকো, রক্ষা করো। দ্বৈত, বিপদ, ভবজালের ফাঁদ ভাঙো; আমাদের হৃদয়ে বাস করো, হে রাম, কাম ও মান চূর্ণ করো।”
Verse 87 (दोहा/सोरठा)
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम। प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम।।34।।
paramānaṁda kṛpāyatana mana paripūrana kāma | prema bhagati anapāyinī dehu hamahi śrīrāma ||34||
হে শ্রী রাম—পরমানন্দ, করুণাধাম, সকল সত্য পুরুষার্থের সিদ্ধিদাতা—আমাদের এমন প্রেমময় ভক্তি দাও, যাহা কখনও বিচ্ছিন্ন না হয়।
परंपरा के अनुसार उत्तरकाण्ड के रामराज्य-प्रसंग और संत-लक्षण का पाठ ‘सत्संग-वृद्धि’, ‘विवेक-जागरण’ और ‘अविद्या-नाश’ में सहायक माना जाता है—विशेषतः दोहा 31 के ‘प्रताप-रवि’ भाव से अंतःकरण का तम घटता और दुष्प्रवृत्तियाँ (काम-क्रोध-मोह) संकुचित होती हैं।
सत्संग/भक्ति-वृद्धि हेतु प्रचलित संपुट: ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-स्मरण) अथवा ‘राम राम’ का जप; और स्तुति-खंड (दोहा 34–35) के साथ ‘प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम’ को भाव-संपुट रूप में दोहराने की परंपरा भी मिलती है।
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