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यह सोपान ‘धर्म-युद्ध’ का नहीं, ‘अहंकार-क्षय’ का द्वार है। लंका काण्ड में बाह्य रण के भीतर अन्तःकरण का रण चलता है: माया (मेघनाद), मोह-बल (राक्षस-सेना), और भय (नागपाश) के बीच शरणागति का सत्य उजागर होता है। साधक के लिए यह चरण बताता है कि मुक्ति का मार्ग केवल पराक्रम से नहीं, प्रभु-कृपा और नाम-आश्रय से प्रशस्त होता है—जहाँ ‘बंधन’ भी लीला बनकर बंधन काटने की शिक्षा देता है।
লঙ্কাকাণ্ডের প্রধান রস বীর, কিন্তু তুলসীর বীর-রস ‘ক্রোধ-উন্মাদ’ নয়—তা দীপ্ত ‘ধর্ম-প্রতিষ্ঠা’ ও ‘কৃপা-প্রভাব’-এ। এই খণ্ডে ভীত বানর-ভালুক-দল, প্রভুর করুণা-সংবেদন, এবং রাক্ষসী শক্তির উচ্ছেদ—এই তিনে মিলে সাধকের অন্তরে জাগা ত্রাস, শরণাগতি, ও অনুগ্রহ-জনিত বিজয়ের ত্রয়ী রচনা হয়। মেঘনাদের মায়াময় রথ, অস্ত্র-বৃষ্টি, ও নাগপাশ ‘মায়া’-র দার্শনিক প্রতিমা: সে দৃশ্য-শক্তি দিয়ে সত্যকে বাঁধে বলে মনে হয়, কিন্তু প্রভুর স্বাতন্ত্র্য (স্ববশ অনন্ত) তাকে লীলা করে ছিন্ন করে দেয়। জাম্ববানের প্রতিরোধ ও গরুড়ের আগমন ইঙ্গিত করে—সৎসঙ্গ/গুরু-কৃপা এবং দৈব সহায়তা সাধকের বন্ধন-নিবারণে নির্ণায়ক। এইভাবে এই খণ্ড নির্গুণ-সগুণ সমন্বয়কে রণ-রূপকে স্থাপন করে ভক্তিকে ‘মুক্তি-সোপান’ করে তোলে।
Verse 133 (दोहा/सोरठा)
भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत। कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत।।45।।
bhuja bala ripu dala dalamali dekhi divasa kara aṃta | kūde jugala bigata śrama āe jahã bhagavaṃta ||45||
বাহুবলের মহিমায় শত্রুসেনা চূর্ণ করে, দিন শেষের দিকে আসতে দেখে সেই যুগল ফিরে লাফিয়ে এল—ক্লান্তি দূর হয়ে গেল—এবং প্রভুর কাছে উপস্থিত হল। (৪৫)
Verse 134 (चौपाई)
प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए।। राम कृपा करि जुगल निहारे। भए बिगतश्रम परम सुखारे।। गए जानि अंगद हनुमाना। फिरे भालु मर्कट भट नाना।। जातुधान प्रदोष बल पाई। धाए करि दससीस दोहाई।। निसिचर अनी देखि कपि फिरे। जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे।। द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी। लरत सुभट नहिं मानहिं हारी।। महाबीर निसिचर सब कारे। नाना बरन बलीमुख भारे।। सबल जुगल दल समबल जोधा। कौतुक करत लरत करि क्रोधा।। प्राबिट सरद पयोद घनेरे। लरत मनहुँ मारुत के प्रेरे।। अनिप अकंपन अरु अतिकाया। बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया।। भयउ निमिष महँ अति अँधियारा। बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा।।
prabhu pada kamala sīsa tinh nāe | dekhi subhaṭ raghupati mana bhāe || rāma kṛpā kari jugala nihāre | bhae bigataśrama parama sukhāre || gae jāni aṅgada hanumānā | phire bhālu markaṭ bhaṭ nānā || jātudhāna pradoṣa bala pāī | dhāe kari dasa-sīsa dohāī || nisicara anī dekhi kapi phire | jahã tahã kaṭakaṭāi bhaṭ bhire || dvau dala prabala pacāri-pacārī | larata subhaṭ nahiṃ mānahiṃ hārī || mahābīra nisicara saba kāre | nānā barana balīmukha bhāre || sabala jugala dala samabala jodhā | kautuka karata larata kari krodhā || prābiṭ sarada payoda ghanere | larata manahũ māruta ke prere || anipa akaṃpana aru atikāyā | bicalata sena kīnhi inh māyā || bhayau nimiṣa mãha ati ãdhiyārā | bṛṣṭi hoi rudhiropala chārā ||
তারা প্রভুর পদ্মপদে মস্তক নত করল; সেই বীরদের দেখে রঘুপতির হৃদয় প্রসন্ন হল। শ্রীরাম কৃপাপূর্বক দুজনের প্রতি দৃষ্টি দিলেন, তাদের ক্লান্তি দূর হল এবং তারা পরম আনন্দিত হলেন। অঙ্গদ ও হনুমান গেছেন জেনে অনেক ভাল্লুক ও বানর যোদ্ধা ফিরে এল। সন্ধ্যায় রাক্ষসরা শক্তি সঞ্চয় করে দশমুখের নামে যুদ্ধে অগ্রসর হল। রাক্ষস সেনা দেখে বানররা ঘুরে দাঁড়াল; সর্বত্র যোদ্ধারা গর্জনসহ সংঘর্ষে লিপ্ত হল। দুই প্রবল সেনা পরস্পরকে চ্যালেঞ্জ জানাল; বীররা যুদ্ধ করল, পরাজয় স্বীকার করতে চাইল না। মহান রাক্ষস বীরেরা সকলেই কৃষ্ণবর্ণ; বানরমুখগুলি বিভিন্ন বর্ণে ভারাক্রান্ত। উভয় পক্ষ, সমান শক্তিসম্পন্ন, ক্রোধে যুদ্ধ করল, যেন ক্রীড়া করছে। ঘন শরৎকালীন মেঘ সমাহার হল; তারা যুদ্ধ করল যেন বায়ু দ্বারা প্রেরিত। ইন্দ্রজিৎ, অকম্পন ও অতিকায় সেনা বিচলিত দেখে মায়া প্রয়োগ করল, মুহূর্তের মধ্যে মহাঅন্ধকার হল, এবং রক্ত-শিলাবৃষ্টি ও ধূলিঝড় বর্ষিত হল।
Verse 135 (दोहा/सोरठा)
देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार। एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार।।46।।
dekhi nibiṛ tama dasahũ disi kapidala bhayau khabhāra | ekahi eka na dekhī jahã tahã karahiṃ pukāra ||46||
দশ দিকেই ঘন অন্ধকার দেখে বানরসেনা বিভ্রান্ত হয়ে পড়ল; কেউ কাউকে দেখতে পেল না, আর সর্বত্র তারা আর্তনাদ তুলল। (৪৬)
Verse 136 (चौपाई)
सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना।। समाचार सब कहि समुझाए। सुनत कोपि कपिकुंजर धाए।। पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा।। भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं।। भालु बलीमुख पाइ प्रकासा। धाए हरष बिगत श्रम त्रासा।। हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे।। भागत पट पटकहिं धरि धरनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी।। गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं।।
sakala maramu raghunāyaka jānā | liye boli aṅgada hanūmānā || samācāra saba kahi samujhāe | sunata kopi kapikuñjara dhāe || puni kṛpāla haṁsi cāpa caṛhāvā | pāvaka sāyaka sapadi calāvā || bhayu prakāsa katahuṁ tama nāhīṁ | gyāna udayaṁ jimi saṁsaya jāhīṁ || bhālu balīmukha pāi prakāsā | dhāe haraṣa bigata śrama trāsā || hanūmāna aṅgada rana gāje | hāṁka sunata rajanīcara bhāje || bhāgata paṭa paṭakahiṁ dhari dharanī | karahiṁ bhālu kapi adbhuta karanī || gahi pada ḍārahiṁ sāgara māhīṁ | makara uraga jhaṣa dhari-dhari khāhīṁ ||
রঘুনাথ সমগ্র অর্থ বুঝতে পারলেন। তিনি অঙ্গদ ও হনুমানকে ডেকে নিলেন। তারা সমস্ত সংবাদ বিস্তারিত বলল; শুনে মহাবানরগণ ক্রোধে ছুটে এলেন। তখন করুণাময় প্রভু হেসে ধনুক ধারণ করলেন এবং তৎক্ষণাৎ অগ্নিসম বাণ নিক্ষেপ করলেন। সর্বত্র আলো ছড়িয়ে পড়ল; কোথাও অন্ধকার রইল না, যেমন জ্ঞানোদয়ে সকল সন্দেহ দূর হয়। ভাল্লুক ও বলবান বানররা সেই আলো পেয়ে আনন্দে ছুটে এল, তাদের ক্লান্তি ও ভয় দূর হল। হনুমান ও অঙ্গদ যুদ্ধে গর্জন করলেন; তাদের চিৎকার শুনে রাক্ষসরা পলায়ন করল। পলায়নরতদের মারধর করে মাটিতে ফেলা হল; ভাল্লুক ও বানররা অদ্ভুত কীর্তি সম্পাদন করল। তাদের পা ধরে সমুদ্রে নিক্ষেপ করা হল, যেখানে কুমীর, সর্প ও মৎস্যরা তাদের ধরে ভক্ষণ করল।
Verse 137 (दोहा/सोरठा)
कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ। गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ।।47।।
kachu māre kachu ghāyala kachu gaṛha caṛhe parāi | garjahiṁ bhālu balīmukha ripu dala bala bicalāi ||47||
কেউ নিহত হল, কেউ আহত, আর কেউ দুর্গের প্রাচীর বেয়ে উঠে অগ্রসর হতে লাগল। ভালুক ও মহাবীর বানরগণ গর্জে উঠল; শত্রুসেনার সারি ভেঙে বিশৃঙ্খলা ছড়িয়ে পড়ল। (৪৭)
Verse 138 (चौपाई)
निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी।। राम कृपा करि चितवा सबही। भए बिगतश्रम बानर तबही।। उहाँ दसानन सचिव हँकारे। सब सन कहेसि सुभट जे मारे।। आधा कटकु कपिन्ह संघारा। कहहु बेगि का करिअ बिचारा।। माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर।। बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन।। जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी।। बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहुँ न सुख पायो।।
nisā jāni kapi cāriu anī | āe jahāṁ kosalā dhanī || rāma kṛpā kari citavā sabahī | bhae bigata-śrama bānara tabahī || uhāṁ dasānana saciva haṁkāre | saba sana kahesi subhaṭa je māre || ādhā kaṭaku kapinha saṅghārā | kahahu begi kā kari'a bicārā || mālyavanta ati jaraṭha nisācara | rāvana mātu-pitā maṁtrī bara || bolā bacana nīti ati pāvana | sunahu tāta kachu mora sikhāvana || jaba te tumha sītā hari ānī | asaguna hohiṁ na jāhiṁ bakhānī || beda purāna jāsu jasu gāyo | rāma bimukha kāhūṁ na sukha pāyo ||
রাত বুঝতে পেরে চার বানর দল কোসলাধীশের কাছে এল। শ্রীরাম কৃপাপূর্বক সকলের প্রতি দৃষ্টি দিলেন; তৎক্ষণাৎ বানরদের ক্লান্তি দূর হল। সেখানে রাবণ তার মন্ত্রীদের ডেকে যোদ্ধাদের মৃত্যুর কথা জানালেন। 'আমাদের অর্ধেক সেনা বানররা ধ্বংস করেছে, শীঘ্র বল, আমরা কী পরামর্শ গ্রহণ করব?' মাল্যবান, অতি বৃদ্ধ রাক্ষস, প্রধান মন্ত্রী, রাবণের মাতামহ, পবিত্র নীতিবাক্য উচ্চারণ করলেন: 'শোন বৎস, আমার কিঞ্চিৎ উপদেশ গ্রহণ কর। যেদিন থেকে তুমি সীতাকে চুরি করে এনেছ, অশুভ লক্ষণ দেখা দিয়েছে যা বর্ণনাতীত। যাঁর যশ বেদ ও পুরাণ গায়, শ্রীরাম থেকে বিমুখ কেউ সুখ পায়নি।'
Verse 139 (दोहा/सोरठा)
हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान। जेहि मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान।।48(क)।। कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध। सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध।।48(ख)।।
hiraṇyāccha bhrātā sahita madhu kaiṭabha balavān | jehi māre soi avatareu kṛpāsiṁdhu bhagavān ||48(ka)|| kālarūpa khala-bana-dahana guṇa-āgāra ghanabodha | śiva birañci jehi sevahiṁ tāsoṁ kavan birodha ||48(kha)||
যিনি ভ্রাতাসহ হিরণ্যাক্ষকে, আর মহাবীর মধু ও কৈটভকে সংহার করেছিলেন— সেই করুণাসিন্ধু প্রভুই আজ অবতীর্ণ হয়েছেন। (৪৮ক) কালস্বরূপ, দুষ্টবনের দাহক, গুণভাণ্ডার, অচল জ্ঞানস্বরূপ— যাঁকে শিব ও ব্রহ্মাও আরাধনা করেন; তাঁর সঙ্গে বিরোধই বা কার? (৪৮খ)
Verse 140 (चौपाई)
परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही।। ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुह करि जाहि अभागे।। बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही।। तेहि अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना।। सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा।। कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा।। सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा।। करत बिचार भयउ भिनुसारा। लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा।। कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा। नगर कोलाहलु भयउ घनेरा।। बिबिधायुध धर निसिचर धाए। गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए।।
parihari bayaru dehu baidehī | bhajahu kṛpānidhi parama sanehī || tāke bacana bāna sama lāge | kariyā muha kari jāhi abhāge || būṛha bhaesi na ta marateuṁ tohī | aba jani nayana dekhāvasi mohī || tehi apane mana asa anumānā | badhyo cahata ehi kṛpānidhānā || so uṭhi gayau kahata durbādā | taba sakopa boleu ghananādā || kautuka prāta dekhi'ahu morā | karihauṁ bahuta kahauṁ kā thorā || suni suta bacana bharosā āvā | prīti sameta aṅka baiṭhāvā || karata bicāra bhayu bhinusārā | lāge kapi puni cahuṁ duārā || kopi kapinha durghaṭa gaṛhu gherā | nagara kolāhalu bhayu ghanerā || bibidhāyudha dhari nisicara dhāe | gaṛha te parabata sikhara ḍhahāe ||
'শত্রুতা ত্যাগ কর; বৈদেহীকে ফিরিয়ে দাও, এবং করুণার ভান্ডার, পরম স্নেহময় প্রভুকে ভজনা কর।' সেই বাক্য বাণের মতো বিদ্ধ হল; অপমানে মুখ কালো করে দুর্জন প্রস্থান করল। 'তুমি বৃদ্ধ না হলে তোমাকে হত্যা করতাম; এখন আমাকে আর মুখ দেখিও না!' নিজের মনে সে অনুমান করল, "এই করুণানিধান আমার মৃত্যু কামনা করেন।" উঠে অপমানজনক বাক্য বলতে বলতে সে চলে গেল; তখন ঘননাদ রাবণ ক্রোধে বললেন: 'প্রভাতে আমার কৌতুক দেখ; আমি অনেক করব, কম বলে কী হবে?' পুত্রের বাক্য শুনে তার আত্মবিশ্বাস ফিরে এল; স্নেহে তাকে কোলে বসালেন। তারা পরামর্শ করছিল, এমন সময় প্রভাত হল; এবং বানররা পুনরায় চার দ্বারে অবস্থান নিল। ক্রুদ্ধ বানররা দুর্ভেদ্য দুর্গ ঘিরে ধরল; নগরে মহা কোলাহল উঠল। রাক্ষসরা বিভিন্ন অস্ত্র নিয়ে ছুটে এল, এবং দুর্গ থেকে পর্বতশৃঙ্গ নিক্ষেপ করল।
Verse 141 (छंद)
ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले॥ घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले॥ मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए॥ गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहँ सो तहँ निसिचर हए॥
ḍhāhe mahīdhara sikhara koṭinh bibidha bidhi golā cale. ghaharāta jimi pabi-pāta garjata janu pralaya ke bādale. markaṭ bikaṭ bhaṭ juṭata kaṭata na laṭata tana jarjara bhae. gahi sail tehi gaṛha para calāvahiṃ jahã so tahã nisi-cara hae.
তারা কোটি কোটি পর্বতশৃঙ্গ ধ্বংস করল এবং বিভিন্ন প্রকারে শিলা নিক্ষেপ করল। সেই ধ্বসের শব্দ বজ্রপাতের মতো গর্জন করল, যেন প্রলয়ের মেঘ ফেটে পড়ছে। উগ্র বানরযোদ্ধারা সংঘর্ষে লিপ্ত হল, ক্ষতবিক্ষত হল, তবু টলল না যদিও তাদের দেহ ক্ষত-বিক্ষত হয়ে গেল। শিলা তুলে তারা দুর্গের উপর নিক্ষেপ করল, এবং সর্বত্র রাক্ষসরা আঘাতপ্রাপ্ত হল।
Verse 142 (दोहा/सोरठा)
मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ु पुनि छेंका आइ। उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ।।49।।
meghanāda suni śravaṇa asa gaṛhu puni chẽkā āi. utaryo bīra durga tẽ sanmukha calyo bajāi. ||49||
এ কথা শুনে মেঘনাদ এসে আবার দুর্গ রক্ষা করতে লাগল; বীরটি দুর্গপ্রাসাদ থেকে নেমে যুদ্ধনিনাদ তুলে সম্মুখসমরে অগ্রসর হল।
Verse 143 (चौपाई)
कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता। धन्वी सकल लोक बिख्याता।। कहँ नल नील दुबिद सुग्रीवा। अंगद हनूमंत बल सींवा।। कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही। आजु सबहि हठि मारउँ ओही।। अस कहि कठिन बान संधाने। अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने।। सर समुह सो छाड़ै लागा। जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा।। जहँ तहँ परत देखिअहिं बानर। सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर।। जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा। बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा।। सो कपि भालु न रन महँ देखा। कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा।।
kahã kosalādhīsa dvau bhrātā. dhanvī sakala loka bikhyātā. kahã nala nīla dubida sugrīvā. aṅgada hanūmaṃta bala sī̃vā. kahã bibhīṣanu bhrātā-drohī. āju sabahi haṭhi māraũ ohī. asa kahi kaṭhina bāna saṃdhāne. atisaya krodha śravaṇa lagi tāne. sara samuha so chāṛai lāgā. janu sa-paccha dhāvahiṃ bahu nāgā. jahã tahã parata dekhi'ahiṃ bānara. sanmukha hoi na sake tehi avasara. jahã tahã bhāgi cale kapi rīchā. bisarī sabahi juddha kai īchā. so kapi bhālu na rana mahã dekhā. kīnhesi jehi na prāna avaseṣā.
"কোথায় দুই ভ্রাতা, কোসলাধীশ, সেই বিখ্যাত ধনুর্ধর? কোথায় নল ও নীল, দ্বিবিদ ও সুগ্রীব, অঙ্গদ ও হনুমান, বলের সীমা? আর কোথায় বিভীষণ, সেই ভ্রাতৃদ্রোহী? আজ আমি দৃঢ়সংকল্পে সকলকে হত্যা করব!" এই বলে সে কঠিন বাণ ধনুকে স্থাপন করল এবং ক্রোধে কর্ণ পর্যন্ত টেনে ধরল। তখন সে বাণের বৃষ্টি বর্ষণ করতে লাগল, যেন অনেক ডানাযুক্ত সর্প ছুটে আসছে। সর্বত্র বানররা পতিত হতে দেখা গেল; সেই মুহূর্তে কেউ তার সম্মুখে দাঁড়াতে পারল না। বানর ও ভাল্লুকরা সর্বদিকে পলায়ন করল, এবং সকলের যুদ্ধেচ্ছা মুছে গেল। কোন বানর বা ভাল্লুক যুদ্ধক্ষেত্রে দেখা গেল না যাকে সে আঘাত করেনি যে প্রাণবায়ু অবশিষ্ট রইল না।
Verse 144 (दोहा/सोरठा)
दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर। सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर।।50।।
dasa-dasa sara saba māresi pare bhūmi kapi bīra. siṃha-nāda kari garjā meghanāda bala dhīra. ||50||
প্রত্যেককে দশটি বাণে বিদ্ধ করে সে বানর-যোদ্ধাদের ভূমিতে শুইয়ে দিল; তারপর মহাবলী, দৃঢ়প্রতিজ্ঞ মেঘনাদ সিংহনাদ করে গর্জে উঠল।
Verse 145 (चौपाई)
देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला।। महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा।। आवत देखि गयउ नभ सोई। रथ सारथी तुरग सब खोई।। बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना।। रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भाँति करेसि दुर्बादा।। अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे।। देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना। करै लाग माया बिधि नाना।। जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला। डरपावै गहि स्वल्प सपेला।।
dekhi pavanasuta kaṭaka bihālā. krodhavanta janu dhāyau kālā. mahāsaila eka turata upārā. ati risa meghanāda para ḍārā. āvata dekhi gayau nabha soī. ratha sārathī turaga saba khoī. bāra-bāra pacāra hanumānā. nikaṭa na āva maramu so jānā. raghupati nikaṭa gayau ghananādā. nānā bhā̃ti karesi durbādā. astra sastra āyudha saba ḍāre. kautukahī̃ prabhu kāṭi nivāre. dekhi pratāpa mūṛha khisiānā. karai lāga māyā bidhi nānā. jimi kou karai garuṛa saĩ khelā. ḍarapāvai gahi svalpa sapelā.
বায়ুপুত্র ও সেনাদলকে বিপন্ন দেখে, হনুমান ক্রোধে যমের মতো ছুটে গেলেন। তিনি তৎক্ষণাৎ এক বিশাল পর্বত উপড়ে ফেললেন এবং প্রচণ্ড ক্রোধে মেঘনাদের দিকে নিক্ষেপ করলেন। সেটি আসতে দেখে মেঘনাদ আকাশে পালিয়ে গেল, রথ, সারথি ও অশ্ব সবই হারিয়ে ফেলল। বারবার হনুমান তাকে আহ্বান করলেন, কিন্তু সে কাছে এল না - রহস্য বুঝে নিয়েছিল। মেঘনাদ বজ্রকণ্ঠে রঘুপতির কাছে গিয়ে নানাভাবে অপমান করল। সে সব রকমের অস্ত্রশস্ত্র নিক্ষেপ করল; প্রভু খেলার মতো সেগুলো কেটে সরিয়ে দিলেন। সেই মহিমা দেখে মূর্খটি বিহ্বল হয়ে নানা মায়ার উপায় অবলম্বন করল। এটা অনেকটা গরুড়ের সাথে খেলতে চাওয়ার মতো - একটি ক্ষুদ্র সাপ ধরে তাকে ভয় দেখানোর মতো।
Verse 146 (दोहा/सोरठा)
जासु प्रबल माया बल सिव बिरंचि बड़ छोट। ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट।।51।।
jāsu prabala māyā-bala siva birañci baṛa choṭa | tāhi dikhāvai nisi-cara nija māyā mati khoṭa ||51||
যাঁর মহামায়াশক্তি শিব ও ব্রহ্মাকেও কখনো মহান, কখনো ক্ষুদ্র বলে প্রতীয়মান করাতে পারে—সেই প্রভুর সামনেই নিশাচর, নিজের কুটিল মনের বশে, তুচ্ছ মায়া প্রদর্শন করতে চায়।
Verse 147 (चौपाई)
नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा।। नाना भाँति पिसाच पिसाची। मारु काटु धुनि बोलहिं नाची।। बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा। बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा।। बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा। सूझ न आपन हाथ पसारा।। कपि अकुलाने माया देखें। सब कर मरन बना एहि लेखें।। कौतुक देखि राम मुसुकाने। भए सभीत सकल कपि जाने।। एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया।। कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके।।
nabha caṛhi baraṣa bipula aṅgārā | mahi te pragaṭa hohiṃ jala-dhārā || nānā bhā̃ti pisāca pisācī | māru kāṭu dhuni bolahiṃ nācī || biṣṭā pūya rudhira kaca hāṛā | baraṣai kabahũ upala bahu chāṛā || baraṣi dhūri kīnhe-si ãdhiārā | sūjha na āpana hātha pasārā || kapi akulāne māyā dekheṃ | saba kara marana banā ehi lekheṃ || kautuka dekhi rāma musukāne | bhae sabhīta sakala kapi jāne || eka bāna kāṭī saba māyā | jimi dinakara hara timira nikāyā || kṛpā-dṛṣṭi kapi bhālu biloke | bhae prabala rana rahahiṃ na roke ||
আকাশে আরোহণ করে অঙ্গারের প্রচুর বৃষ্টি বর্ষিত হল; পৃথিবী থেকেই জলধারা উদ্ভাসিত হল। নানা রূপে পিশাচ ও পিশাচিনীরা নেচে উঠল, 'মারো! কাটো!' বলে চিৎকার করতে লাগল। মলমূত্র, পুঁজ, রক্ত, চুল ও হাড় বর্ষিত হল; মাঝে মাঝে বিশাল শিলাও নিক্ষেপ করা হল। ধূলি পতিত হয়ে এমন অন্ধকার হল যে নিজের হাত প্রসারিত করেও দেখা যাচ্ছিল না। বানররা এই মায়া দেখে ব্যাকুল হয়ে পড়ল, যেন সকলের মৃত্যু লিখিত হয়েছে। রাম এই দৃশ্য দেখে শুধু হাসলেন - কিন্তু সকল বানর ভয়ে ভীত হল। একটি মাত্র বাণে তিনি সমস্ত মায়া বিদীর্ণ করলেন, যেমন সূর্য জমাট অন্ধকার দূর করে। আর যখন তিনি বানর ও ভাল্লুকদের প্রতি করুণাময় দৃষ্টি দিলেন, তারা প্রবল হয়ে উঠল এবং যুদ্ধে কেউ তাদের রোধ করতে পারল না।
Verse 148 (दोहा/सोरठा)
आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ। लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ।।52।।
āyasu māgi rāma pahiṃ aṅgadādi kapi sātha | lachimana cale kruddha hoi bāna sarāsana hātha ||52||
রামের নিকট বিদায় নিয়ে, পাশে অঙ্গদ ও অন্যান্য বানরদের রেখে, লক্ষ্মণ ক্রোধে অগ্রসর হলেন—হাতে ধনুক, তীরে প্রস্তুত।
Verse 149 (चौपाई)
छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला।। इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए।। भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी।। भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी।। मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं। कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं।। मारु मारु धरु धरु धरु मारू। सीस तोरि गहि भुजा उपारू।। असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा।। देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा। कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा।।
chataj nayana ura bāhu bisālā | himagiri nibha tanu kachu eka lālā || ihã dāsānana subhaṭ paṭhāe | nānā astra sastra gahi dhāe || bhūdhara nakha biṭapa-āyudha dhārī | dhāe kapi jaya rāma pukārī || bhire sakala jorihi sana jorī | ita uta jaya icchā nahiṃ thorī || muṭhikanha lātanha dātanha kāṭahiṃ | kapi jaya-sīla māri puni ḍāṭahiṃ || māru māru dharu dharu dharu mārū | sīsa tori gahi bhujā upārū || asi rava pūri rahī nava khaṇḍā | dhāvahiṃ jahã tahã ruṇḍa pracaṇḍā || dekhahiṃ kautuka nabha sura bṛndā | kabahũka bisamaya kabahũ anandā ||
তাম্রবর্ণ চোখ, প্রশস্ত বক্ষ ও বিশাল বাহু - তাঁর দেহ হিমালয়ের মতো, তাতে এক অদ্ভুত আভা। রাবণ তাঁর বীর যোদ্ধাদের প্রেরণ করলেন, তারা নানা অস্ত্রশস্ত্র হাতে নিয়ে ছুটে এল। বানররাও পর্বত, নখর ও বৃক্ষ অস্ত্র হিসেবে ধারণ করে 'জয় রাম!' বলে ছুটে গেল। সকলে সংঘর্ষে লিপ্ত হল, শক্তির সাথে শক্তির মোকাবিলা হল; সর্বত্র জয়ের ইচ্ছা তীব্র ছিল। মুষ্টি, লাথি এমনকি দাঁত দিয়ে তারা কাটাকাটি করল; জয়ে অভ্যস্ত বানররা আঘাত করে আবার প্রতিহত করল। 'মারো! মারো! ধরো! ধরো! মেরে ফেলো!' - এমন চিৎকার উঠল, মাথা চূর্ণ হল আর বাহু উপড়ে গেল। সেই গর্জন নব দিক পূর্ণ করল; সর্বত্র মস্তকহীন দেহ ভয়ানক রূপে ছুটে বেড়াল। আকাশ থেকে দেবগণ এই দৃশ্য দেখলেন - কখনও বিস্ময়ে, কখনও আনন্দে।
Verse 150 (दोहा/सोरठा)
रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ। जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ।।53।।
rudhira gāṛa bhari-bhari jamyo ūpara dhūri uṛāi | janu aṅgāra rāsinha para mṛtaka dhūma rahyo chāi ||53||
ঘন রক্ত স্তূপে স্তূপে জমে বারবার জমাট বাঁধছিল, আর ধুলো ঘূর্ণি তুলে আকাশে উঠছিল; যেন অঙ্গারের ঢিবির উপর নিহতদের ধোঁয়া ছড়িয়ে পড়ে থিতিয়ে গেছে।
Verse 151 (चौपाई)
घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमित किंसुक के तरु जैसे।। लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा।। एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती।। क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता।। नाना बिधि प्रहार कर सेषा। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा।। रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना।। बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेज पुंज लछिमन उर लागी।। मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें।।
ghāyala bīra birājahĩ kaise | kusumita kiṁsuka ke taru jaise || lachimana meghnāda dvau jodhā | bhirahĩ parasapara kari ati krodhā || ekahi eka sakai nahĩ jītī | nisicara chala bala karai anītī || krodhavanta taba bhayu anantā | bhaṁjeu ratha sārathī turaṁtā || nānā bidhi prahāra kari seṣā | rācchasa bhayu prāna avaseṣā || rāvana suta nija mana anumānā | saṁkaṭa bhayu harihi mama prānā || bīraghātinī chāḍisi sāṅgī | teja puñja lachimana ura lāgī || muruchā bhaī sakti ke lāgẽ | taba cali gayu nikaṭa bhaya tyāgẽ ||
আহত বীররা কত সুন্দর দেখাচ্ছিল - যেন পূর্ণ রক্তবর্ণ পলাশ বৃক্ষ। লক্ষ্মণ ও মেঘনাদ, দুই বীর যোদ্ধা, পরস্পরের সাথে প্রচণ্ড ক্রোধে সংঘর্ষে লিপ্ত হল। কেউ কাউকে জয় করতে পারল না; রাক্ষসটি প্রতারণাপূর্ণ শক্তি ও অধর্মের আশ্রয় নিল। তারপর অসীম ক্রোধে সে লক্ষ্মণের রথ ও সারথি তৎক্ষণাৎ ধ্বংস করল। নানা প্রকার আঘাতের পর, রাক্ষসটি অবশিষ্ট প্রাণ নিয়ে রইল। রাবণপুত্র মনে মনে বিবেচনা করল: 'সংকট এসেছে - সে আমার প্রাণ নেবে!' সে বীরঘাতিনী শক্তি নিক্ষেপ করল; এক জ্বলন্ত ভর লক্ষ্মণের বক্ষে আঘাত করল। শক্তি অস্ত্রের আঘাতে লক্ষ্মণ মূর্ছিত হল; তবু শত্রু ভয় ত্যাগ করে এগিয়ে এল।
Verse 152 (दोहा/सोरठा)
मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ। जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ।।54।।
meghnāda sama koṭi sata jodhā rahe uṭhāi | jagadādhāra seṣa kimi uṭhai cale khisiāi ||54||
মেঘনাদের মতো শত শত কোটি যোদ্ধা চেষ্টাও করল, তবু তাকে তুলতে পারল না। বিশ্বধারী শেষনাগই বা কী করে তুলবেন? তারা হতাশ হয়ে ফিরে গেল। (৫৪)
Verse 153 (चौपाई)
सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू।। सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही।। यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई।। संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी।। ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर।। तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना।। जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना।। धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता।।
sunu girijā krodhānala jāsū | jārai bhuvana cāridasa āsū || saka saṅgrāma jīti ko tāhī | sevahĩ sura nara aga jaga jāhī || yaha kautūhala jānai soī | jā para kṛpā rāma kai hoī || saṁdhyā bhai phiri dvau bāhanī | lage saṁbhārana nija nija anī || byāpaka brahma ajita bhuvaneśvara | lachimana kahā̃ būjha karunākara || taba lagi lai āyu hanumāna | anuja dekhi prabhu ati dukha mānā || jāmavaṁta kaha baida suṣenā | laṅkā̃ rahai ko paṭhaī lenā || dhari laghu rūpa gayu hanumaṁtā | āneu bhavana sameta turaṁtā ||
শোনো হে গিরিজা, যার ক্রোধাগ্নি চৌদ্দ লোক একমুহূর্তে ভস্ম করতে পারে - সেই যুদ্ধে জয়ী হতে পারে; দেবতা, মানব, এমনকি অগ্নিদেব ও সমগ্র জগৎ তার সেবা করবে। যার প্রতি রামের করুণা আছে, সেই একমাত্র এই অদ্ভুত বিষয় বুঝতে পারে। সন্ধ্যা হল; তখন উভয় সেনা নিজ নিজ সারি পুনর্গঠনে প্রবৃত্ত হল। সর্বব্যাপী ব্রহ্ম, অজেয় জগদীশ্বর - করুণাময় কীভাবে জিজ্ঞাসা করবেন, 'লক্ষ্মণ কোথায়?' ইতিমধ্যে হনুমান ফিরে এল; অনুজকে দেখে প্রভু অত্যন্ত শোকার্ত হলন। জাম্ববান বললেন, 'লঙ্কায় সুষেণ নামে এক বৈদ্য আছে - তাকে ডেকে আনো।' হনুমান ক্ষুদ্র রূপ ধারণ করে গেল এবং তৎক্ষণাৎ তাকে গৃহসহ নিয়ে এল।
Verse 154 (दोहा/सोरठा)
राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन। कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन।।55।।
rāma padārabiṁda sira nāyu āi suṣena | kahā nāma giri auṣadhī jāhu pavanasuta lena ||55||
সুশেন এসে রামের পদপদ্মে মস্তক নত করল। সে পর্বতের নাম ও ঔষধির কথা বলল—“যাও, হে বায়ুপুত্র, তা এনে দাও।” (৫৫)
Verse 155 (चौपाई)
राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजन सुत बल भाषी।। उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावन कालनेमि गृह आवा।। दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना।। देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा।। भजि रघुपति करु हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना।। नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा।। मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू।। काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई।।
rāma carana sarasija ura rākhī | calā prabhañjana suta bala bhāṣī || uhā̃ dūta eka maramu janāvā | rāvana kālanemi gṛha āvā || dasamukha kahā maramu tehiṁ sunā | puni puni kālanemi siru dhunā || dekhata tumhahi nagaru jehiṁ jārā | tāsu pantha ko rokana pārā || bhaji raghupati karu hita āpanā | chā̃ḍahu nātha mṛṣā jalpanā || nīla kañja tanu suṁdara syāmā | hṛdayã rākhु locanābhirāmā || maĩ taĩ mora mūḍhatā tyāgū | mahā moha nisi sūtata jāgū || kāla byāla kara bhacchaka joī | sapanehũ samara ki jīti-a soī ||
হৃদয়ে রামের পদপদ্ম স্থাপন করে, বায়ুপুত্র দৃঢ় সংকল্পে কথা বলতে বলতে যাত্রা করলেন। সেখানে এক দূত গোপন সংবাদ দিল—রাবণ কালনেমির গৃহে এসেছে। তার মুখে পরিকল্পনা শুনে দশানন বারবার কালনেমির মাথা নাড়িয়ে তাকে তাগিদ দিল। “চোখের সামনেই সে নগরী দগ্ধ করেছে—তার পথ কে রোধ করবে? রঘুপতির আরাধনা করো, নিজের মঙ্গল চাও; হে প্রভু, এই মিথ্যা বাক্য ত্যাগ করো। হৃদয়ে ধারণ করো সেই শ্যাম সুন্দর রূপ—নীল পদ্মসম, নয়নসুখদায়ক। আমি আমার মূঢ়তা ত্যাগ করব; মহামোহরাত্রি থেকে জেগে উঠে দেখছি—মৃত্যুর সর্পই গ্রাসকারী; স্বপ্নেও তাকে যুদ্ধে জয় করা যায় না।”
परंपरा में इस खंड के पाठ से ‘भय-निवारण’ और ‘माया-बन्धन-क्षय’ का फल कहा जाता है—विशेषतः नागपाश-प्रसंग नाम-स्मरण की प्रभावशीलता दिखाता है। तुलसी का संकेत है कि जो ‘प्रनतारति हारी’ राम की शरण लेते हैं, उनका संकट-बंधन (भव-पास) कटता है।
सामान्यतः युद्धकाण्ड/लंका काण्ड के पाठ में शरणागति-प्रधान सम्पुट जोड़ा जाता है—‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-सम्पुट) या ‘राम राम’ का अनवरत जप। कुछ परंपराओं में ‘रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई’/‘सियाराम’ नाम-सम्पुट भी चलता है; स्थानीय पाठ-परंपरा के अनुसार चयन किया जाता है।
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