Ayodhya KandaPrakarana 1420 Verses

Prakarana 14

यह सोपान ‘त्याग-धर्म’ और ‘अन्तः-राज्य’ का द्वार है: राजसुख के बीच राम-धर्म का चुनाव, और फिर वन-जीवन में भी ‘अयोध्या’ (अन्तर-नगर) की स्थापना। प्रस्तुत अंश में सोपान-गति स्पष्ट है—पहले ‘भक्त-लक्षण’ (अहंकार, काम-क्रोध-लोभ आदि का क्षय) का निरूपण, फिर ‘सत्संग-निर्देश’ (चित्रकूट-निवास), और अंततः ‘प्रकृति का रूपान्तरण’ (वन का मंगलमय हो जाना) जो संकेत करता है कि भगवान के सान्निध्य से बाह्य जगत भी साधना-क्षेत्र बन जाता है।

অযোধ্যাকাণ্ডের রস-কেন্দ্র করুণা ও শান্তির সংযোগ; রাজ-পরিত্যাগের বেদনার ভিতর বৈরাগ্যের আলো ফুটে ওঠে। এই খণ্ডের গঠন ‘মর্যাদা’কে কেবল সামাজিক নীতি নয়, মুক্তি-মার্গের শাসন করে তোলে: যে রামের জন্য সব ত্যাগ করে, তার অন্তরে রাম ‘উর-ডেরা’ করেন। এখানে ভক্ত-লক্ষণগুলির তালিকা (কাম-ক্রোধ-মদ-মান-মোহ প্রভৃতির ত্যাগ; পর-নারীকে জননীসম; পরের সম্পদে হর্ষ/পরের বিপদে দুঃখ) মনোবিজ্ঞানকে সাধনায় রূপান্তরিত করে—এ ‘অন্তঃশুদ্ধি’র ব্যবহারিক বিধান। তারপর চিত্রকূটের নির্দেশ তীর্থ-ভূগোল নয়, সাধনা-ভূগোল: মন্দাকিনী, মুনি-আশ্রম, ও বন-সমতা—সব মিলিয়ে শরণাগতির পরীক্ষাগার। শেষে কোল-কিরাতদের প্রেম ও বনের মঙ্গলময়তা জানায়—রাম-সান্নিধ্যে প্রকৃতি, সমাজ ও চিত্ত—তিনটিরই ‘ধর্ম-পরিবর্তন’ ঘটে।

Spoken translationRamcharitmanas Ayodhya Kanda, Prakarana 14

Verses

চৌপাই 130.1-4

काम कोह मद मान न मोहा।लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।।

जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया।तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।।

सब के प्रिय सब के हितकारी।दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।।

कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी।जागत सोवत सरन तुम्हारी।।

तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं।राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।।

जननी सम जानहिं परनारी।धनु पराव बिष तें बिष भारी।।

जे हरषहिं पर संपति देखी।दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।।

जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे।तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।

kāma koha mada māna na mohā |lobha na chobha na rāga na drohā ||

jinha keṁ kapaṭa daṁbha nahiṁ māyā |tinha keṁ hṛdaya basahu raghurāyā ||

saba ke priya saba ke hitakārī |dukha sukha sarisa prasaṁsā gārī ||

kahahiṁ satya priya bacana bicārī |jāgata sovata sarana tumhārī ||

tumhahi chāṛi gati dūsari nāhīṁ |rāma basahu tinha ke mana māhīṁ ||

jananī sama jānahiṁ paranārī |dhanu parāva biṣa teṁ biṣa bhārī ||

je haraṣahiṁ para saṁpati dekhī |dukhita hohiṁ para bipati biseṣī ||

jinhahi rāma tumha prānapiāre |tinha ke mana subha sadana tumhāre ||

যাদের মধ্যে কাম, ক্রোধ, অহংকার বা অভিমান নেই, মোহ নেই, লোভ নেই, উত্তেজনা নেই, রাগ নেই এবং বিদ্বেষ নেই, যাদের মধ্যে ছল, ভণ্ডামি বা মায়া নেই, হে রঘুরায়, তাদের হৃদয়ে বাস করো। যারা সকলের প্রিয়, সকলের হিতকারী, যাদের কাছে দুঃখ ও সুখ সমান, এবং প্রশংসা ও নিন্দা একইরূপ, যারা বিচার করে সত্য ও প্রিয় বচন বলে, এবং জাগ্রত বা ঘুমন্ত অবস্থায় তোমার শরণ নেয়, যাদের তোমাকে ছাড়া অন্য কোনো গতি নেই, হে রাম, তাদের মনে বাস করো। যারা অন্যের স্ত্রীকে মাতার ন্যায় জানে, এবং অন্যের ধনকে বিষের চেয়েও ভারী বিষ বলে মনে করে, যারা অন্যের সম্পদ দেখে আনন্দিত হয়, এবং অন্যের বিপদে বিশেষভাবে দুঃখিত হয়, যাদের কাছে হে রাম, তুমি প্রাণের চেয়েও প্রিয়, তাদের মন তোমার শুভ বাসস্থান।

দোহা 130

स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात।।⁠130।।

svāmi sakhā pitu mātu gura jinha ke saba tumha tāta |mana maṁdira tinha keṁ basahu sīya sahita dou bhrāta ||⁠130||

যাদের স্বামী, সখা, পিতা, মাতা ও গুরু সবই তুমি, হে তাত - তাদের মনের মন্দিরে সীতাসহ দুই ভ্রাতা বাস করো।

চৌপাই 131.1-4

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं।बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।।

नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका।घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका।।

गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा।जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा।।

राम भगत प्रिय लागहिं जेही।तेहि उर बसहु सहित बैदेही।।

जाति पाँति धनु धरम बड़ाई।प्रिय परिवार सदन सुखदाई।।

सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई।तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई।।

सरगु नरकु अपबरगु समाना।जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।।

करम बचन मन राउर चेरा।राम करहु तेहि कें उर डेरा।।

avaguna taji saba ke guna gahahīṁ |bipra dhenu hita saṁkaṭa sahahīṁ ||

nīti nipuna jinha kai jaga līkā |ghara tumhāra tinha kara manu nīkā ||

guna tumhāra samujhai nija dosā |jehi saba bhā̃ti tumhāra bharosā ||

rāma bhagata priya lāgahiṁ jehī |tehi ura basahu sahita baidehī ||

jāti pā̃ti dhanu dharama baṛāī |priya parivāra sadana sukhadāī ||

saba taji tumhahi rahai ura lāī |tehi ke hṛdayã rahahu raghurāī ||

saragu naraku apabaragu samānā |jahã tahã dekha dhareṁ dhanu bānā ||

karama bacana mana rāura cerā |rāma karahu tehi keṁ ura ḍerā ||

যাঁরা অবগুণ ত্যাগ করে সকলের গুণ গ্রহণ করেন, এবং ব্রাহ্মণ ও গরুর হিতে সংকট সহ্য করেন। যাঁদের নীতিতে নিপুণতার খ্যাতি জগতে প্রসিদ্ধ, তাঁদের হৃদয় আপনার সুন্দর নিবাসস্থান। যাঁরা আপনার গুণ বোঝেন ও নিজের দোষ বোঝেন, যাঁরা সর্বপ্রকারে আপনার ভরসা করেন। যাঁদের কাছে রামের ভক্তরা প্রিয়, তাঁদের হৃদয়ে বৈদেহী সহ বাস করুন। জাতি-গোত্র, ধন, ধর্ম ও বড়ত্ব, প্রিয় পরিবার ও সুখদায়ী গৃহ। সব ত্যাগ করে যিনি কেবল আপনাকে হৃদয়ে ধারণ করেন, তাঁর হৃদয়ে বাস করুন, হে রঘুরাই। যাঁদের কাছে স্বর্গ, নরক ও মোক্ষ সমান, যেখানে সর্বত্র তাঁরা ধনু-বাণ ধারণ করা আপনাকে দেখেন। যাঁরা কর্মে, বাক্যে ও মনে আপনার দাস, হে রাম, তাঁদের হৃদয়ে বাস করুন।

দোহা 131

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।।⁠131।।

jāhi na cāhia kabahũ kachu tumha sana sahaja sanehu |basahu niraṁtara tāsu mana so rāura nija gehu ||⁠131||

যিনি কখনো আপনার কাছে কিছু চান না, এবং যার আপনার প্রতি ভালোবাসা স্বাভাবিক ও সহজ, তার মনে নিরন্তর বাস করুন, কারণ সেটাই আপনার নিজের ঘর।

চৌপাই 132.1-4

एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए।बचन सप्रेम राम मन भाए।।

कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक।आश्रम कहउँ समय सुखदायक।।

चित्रकूट गिरि करहु निवासू।तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू।।

सैलु सुहावन कानन चारू।करि केहरि मृग बिहग बिहारू।।

नदी पुनीत पुरान बखानी।अत्रिप्रिया निज तपबल आनी।।

सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि।जो सब पातक पोतक डाकिनि।।

अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं।करहिं जोग जप तप तन कसहीं।।

चलहु सफल श्रम सब कर करहू।राम देहु गौरव गिरिबरहू।।

ehi bidhi munibara bhavana dekhāe |bacana saprema rāma mana bhāe ||

kaha muni sunahu bhānukulanāyaka |āśrama kahaũ samaya sukhadāyaka ||

citrakūṭa giri karahu nivāsū |tahã tumhāra saba bhā̃ti supāsū ||

sailu suhāvana kānana cārū |kari kehari mṛga bihaga bihārū ||

nadī punīta purāna bakhānī |atripriyā nija tapabala ānī ||

surasari dhāra nāũ maṁdākini |jo saba pātaka potaka ḍākini ||

atri ādi munibara bahu basahīṁ |karahiṁ joga japa tapa tana kasahīṁ ||

calahu saphala śrama saba kara karahū |rāma dehu gaurava giribarahū ||

এইভাবে মুনিবর বাসস্থান দেখালেন, এবং তাঁর স্নেহভরিয়া বচন রামের মনকে প্রীত করল। মুনি বললেন: শোনো, হে সূর্যবংশের নায়ক, আমি সময়োপযোগী এবং সুখদায়ী এক আশ্রমের কথা বলছি। চিত্রকূট পর্বতে বাস করো; সেখানে তোমার সব রকমের সুবিধা হবে। পর্বত মনোরম এবং বন সুন্দর; হাতি, সিংহ, হরিণ ও পাখি সেখানে বিহার করে। এক পবিত্র নদী আছে, পুরাণে বর্ণিত, যা অত্রির পত্নী নিজের তপোবলে সেখানে এনেছিলেন। সে স্বর্গগঙ্গার ধারা, নাম মন্দাকিনী, যা সব পাপের সন্তানকে শ্বাসরোধ করে মারে এমন ডাকিনী। অত্রি প্রভৃতি অনেক মুনিবর সেখানে বাস করেন; তাঁরা যোগ, জপ ও তপ করে শরীর ক্ষয় করেন। যাও, সকলের শ্রম সফল করো, এবং হে রাম, গিরিবরকে সম্মান দাও।

দোহা 132

चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ।आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ।।⁠132।।

citrakūṭa mahimā amita kahīṁ mahāmuni gāi |āe nahāe sarita bara siya sameta dou bhāi ||⁠132||

মহামুনি চিত্রকূটের অসীম মহিমা গাই বর্ণনা করলেন। তারপর সীতাসহ দুই ভাই এসে সেই উত্তম নদীতে স্নান করলেন।

চৌপাই 133.1-4

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू।करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू।।

लखन दीख पय उतर करारा।चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा।।

नदी पनच सर सम दम दाना।सकल कलुष कलि साउज नाना।।

चित्रकूट जनु अचल अहेरी।चुकइ न घात मार मुठभेरी।।

अस कहि लखन ठाउँ देखरावा।थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा।।

रमेउ राम मनु देवन्ह जाना।चले सहित सुर थपति प्रधाना।।

कोल किरात बेष सब आए।रचे परन तृन सदन सुहाए।।

बरनि न जाहि मंजु दुइ साला।एक ललित लघु एक बिसाला।।

raghubara kaheu lakhana bhala ghāṭū |karahu katahũ aba ṭhāhara ṭhāṭū ||

lakhana dīkha paya utara karārā |cahũ disi phireu dhanuṣa jimi nārā ||

nadī panaca sara sama dama dānā |sakala kaluṣa kali sāuja nānā ||

citrakūṭa janu acala aherī |cukai na ghāta māra muṭhabherī ||

asa kahi lakhana ṭhāũ dekharāvā |thalu biloki raghubara sukhu pāvā ||

rameu rāma manu devanha jānā |cale sahita sura thapati pradhānā ||

kola kirāta beṣa saba āe |race parana tṛna sadana suhāe ||

barani na jāhi maṁju dui sālā |eka lalita laghu eka bisālā ||

রঘুবর বললেন, "লক্ষ্মণ, এটি উত্তম ঘাট। এখন এখানে কোথাও বাসস্থানের ব্যবস্থা করো।" লক্ষ্মণ পয়ঃস্বিনীর উত্তর পাড়ে উঁচু কূল দেখলেন, যা চারদিকে ধনুকের মতো বাঁক নিয়ে ঘুরে গেছে। নদীটি ছিল ধনুকের অম্বর, সংযম, ইন্দ্রিয়-নিগ্রহ ও দান ছিল বাণ, আর কলিযুগের সমস্ত পাপ ছিল নানা শিকার। চিত্রকূট যেন এক স্থির শিকারি, যে কখনো লক্ষ্য ভ্রষ্ট করে না এবং নিকটে গিয়ে হত্যা করে। এই বলে লক্ষ্মণ সেই স্থান দেখিয়ে দিলেন, আর সেই স্থান দেখে রঘুবর আনন্দ পেলেন। রামের মন আনন্দিত হল, দেবতারা তা জানতে পেরে দিব্য শিল্পীদের প্রধানের সঙ্গে সবাই রওনা হলেন। কোল ও কিরাতের বেশে সকলে এলেন, আর পাতা ও ঘাসের সুন্দর কুটির নির্মাণ করলেন। দুটি সুন্দর কুটির যার বর্ণনা দেওয়া যায় না, একটি ছোট ও মনোরম, অন্যটি বিশাল।

দোহা 133

लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत।सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत।।⁠133।।

lakhana jānakī sahita prabhu rājata rucira niketa |soha madanu muni beṣa janu rati riturāja sameta ||⁠133||

প্রভু লক্ষণ ও জানকীর সঙ্গে সেই সুন্দর আবাসে উজ্জ্বল হলেন, যেন মদন মুনির ছদ্মবেশে রতি ও ঋতুরাজের সঙ্গে শোভা পান।

চৌপাই 134.1-4

अमर नाग किंनर दिसिपाला।चित्रकूट आए तेहि काला।।

राम प्रनामु कीन्ह सब काहू।मुदित देव लहि लोचन लाहू।।

बरषि सुमन कह देव समाजू।नाथ सनाथ भए हम आजू।।

करि बिनती दुख दुसह सुनाए।हरषित निज निज सदन सिधाए।।

चित्रकूट रघुनंदनु छाए।समाचार सुनि सुनि मुनि आए।।

आवत देखि मुदित मुनिबृंदा।कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा।।

मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं।सुफल होन हित आसिष देहीं।।

सिय सौमित्र राम छबि देखहिं।साधन सकल सफल करि लेखहिं।।

amara nāga kiṁnara disipālā |citrakūṭa āe tehi kālā ||

rāma pranāmu kīnha saba kāhū |mudita deva lahi locana lāhū ||

baraṣi sumana kaha deva samājū |nātha sanātha bhae hama ājū ||

kari binatī dukha dusaha sunāe |haraṣita nija nija sadana sidhāe ||

citrakūṭa raghunaṁdanu chāe |samācāra suni suni muni āe ||

āvata dekhi mudita munibṛṁdā |kīnha daṁḍavata raghukula caṁdā ||

muni raghubarahi lāi ura lehīṁ |suphala hona hita āsiṣa dehīṁ ||

siya saumitra rāma chabi dekhahiṁ |sādhana sakala saphala kari lekhahiṁ ||

অমর, নাগ, কিন্নর ও দিকপালেরা সেই সময় চিত্রকূটে এসেছিলেন। সকলে রামকে প্রণাম করলেন, দেবতারা আনন্দে নয়নের লাভ করলেন। পুষ্পবৃষ্টি করে দেবসমাজ বললেন, হে নাথ, আজ আমরা সনাথ হলাম। বিনতি করে দুঃসহ দুঃখ জানালেন, তারপর আনন্দিত হয়ে নিজ নিজ সদনে গেলেন। চিত্রকূটে রঘুনন্দন বাস করছেন, সংবাদ বারবার শুনে মুনিরা এলেন। মুনিসমাজ আসতে দেখে রঘুকুলচন্দ্র আনন্দিত হয়ে দণ্ডবৎ প্রণাম করলেন। মুনিরা রাঘবকে বক্ষে লাগিয়ে নিলেন, সুফল হওয়ার জন্য আশীর্বাদ দিলেন। সীতা, সৌমিত্রি ও রামের ছবি দেখলেন, সকল সাধন সফল বলে গণনা করলেন।

দোহা 134

जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद।।⁠134।।

jathājoga sanamāni prabhu bidā kie munibṛṁda |karahi joga japa jāga tapa nija āśramanhi suchaṁda ||⁠134||

যথাযোগ্য সম্মান করিয়া প্রভু মুনিবৃন্দকে বিদায় দিলেন, এবং তাঁরা নিজ নিজ আশ্রমে সুখে যোগ, জপ, যজ্ঞ ও তপ করিতে লাগলেন।

চৌপাই 135.1-4

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई।हरषे जनु नव निधि घर आई।।

कंद मूल फल भरि भरि दोना।चले रंक जनु लूटन सोना।।

तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता।अपर तिन्हहि पूँछहि मगु जाता।।

कहत सुनत रघुबीर निकाई।आइ सबन्हि देखे रघुराई।।

करहिं जोहारु भेंट धरि आगे।प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे।।

चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े।पुलक सरीर नयन जल बाढ़े।।

राम सनेह मगन सब जाने।कहि प्रिय बचन सकल सनमाने।।

प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी।बचन बिनीत कहहिं कर जोरी।।

yaha sudhi kola kirātanha pāī |haraṣe janu nava nidhi ghara āī ||

kaṁda mūla phala bhari bhari donā |cale raṁka janu lūṭana sonā ||

tinha mahã jinha dekhe dou bhrātā |apara tinhahi pū̃chahi magu jātā ||

kahata sunata raghubīra nikāī |āi sabanhi dekhe raghurāī ||

karahiṁ johāru bheṁṭa dhari āge |prabhuhi bilokahiṁ ati anurāge ||

citra likhe janu jahã tahã ṭhāṛhe |pulaka sarīra nayana jala bāṛhe ||

rāma saneha magana saba jāne |kahi priya bacana sakala sanamāne ||

prabhuhi johāri bahori bahorī |bacana binīta kahahiṁ kara jorī ||

এই সংবাদ কোল ও কিরাতরা পেয়ে আনন্দে আহ্লাদিত হল, যেন নবনিধি তাদের ঘরে এসেছে। কন্দ, মূল ও ফল দিয়ে পাতার দোনা বারবার ভরে তারা বেরিয়ে পড়ল, যেন দরিদ্র ব্যক্তি সোনা লুটতে ছুটছে। তাদের মধ্যে যারা দুই ভ্রাতাকে দেখেছিল, অন্যরা রাস্তায় চলার সময় তাদেরকে জিজ্ঞাসা করতে লাগল। রঘুবীরের কথা বলতে ও শুনতে শুনতে তারা সবাই এসে রঘুরাইকে দেখল। তারা প্রণাম করে, ভেট সামনে রেখে, অতিশয় অনুরাগে প্রভুকে দেখতে লাগল। তারা এখানে-ওখানে দাঁড়িয়ে রইল যেন চিত্রে আঁকা মূর্তি, শরীরে রোমাঞ্চ জাগল এবং চোখে জল বৃদ্ধি পেল। রাম বুঝলেন তারা সকলেই প্রেমে মগ্ন, এবং প্রিয় বচন বলে সকলকে সম্মান করলেন। প্রভুকে বারবার প্রণাম করে, হাত জোড় করে তারা বিনীত বচন বলতে লাগল।

দোহা 135

अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय।भाग हमारे आगमनु राउर कोसलराय।।⁠135।।

aba hama nātha sanātha saba bhae dekhi prabhu pāya |bhāga hamāre āgamanu rāura kosalarāya ||⁠135||

এখন, হে প্রভু, আপনার চরণ দেখে আমরা সকলে সনাথ হয়েছি। হে কোসলরায়, আপনার আগমন আমাদের ভাগ্য।

চৌপাই 136.1-4

धन्य भूमि बन पंथ पहारा।जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा।।

धन्य बिहग मृग काननचारी।सफल जनम भए तुम्हहि निहारी।।

हम सब धन्य सहित परिवारा।दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा।।

कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी।इहाँ सकल रितु रहब सुखारी।।

हम सब भाँति करब सेवकाई।करि केहरि अहि बाघ बराई।।

बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा।सब हमार प्रभु पग पग जोहा।।

तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब।सर निरझर जलठाउँ देखाउब।।

हम सेवक परिवार समेता।नाथ न सकुचब आयसु देता।।

dhanya bhūmi bana paṁtha pahārā |jahã jahã nātha pāu tumha dhārā ||

dhanya bihaga mṛga kānanacārī |saphala janama bhae tumhahi nihārī ||

hama saba dhanya sahita parivārā |dīkha darasu bhari nayana tumhārā ||

kīnha bāsu bhala ṭhāũ bicārī |ihā̃ sakala ritu rahaba sukhārī ||

hama saba bhā̃ti karaba sevakāī |kari kehari ahi bāgha barāī ||

bana behaṛa giri kaṁdara khohā |saba hamāra prabhu paga paga johā ||

tahã tahã tumhahi ahera khelāuba |sara nirajhara jalaṭhāũ dekhāuba ||

hama sevaka parivāra sametā |nātha na sakucaba āyasu detā ||

ধন্য ভূমি, বন, পথ ও পর্বত, যেখানে যেখানে হে নাথ তুমি পদ রাখিয়াছ। ধন্য পক্ষী ও হরিণ, যাহারা বনে বিচরণ করে, তোমাকে দেখিয়া তাহাদের জন্ম সফল হইয়াছে। আমরাও সপরিবার সকলে ধন্য, কারণ আমাদের নয়ন তোমার দর্শনে পরিপূর্ণ হইয়াছে। তুমি উত্তম স্থান বিবেচনা করিয়া বাস করিয়াছ; ইহাতে সকল ঋতুতে সুখে থাকিবে। আমরা সর্বপ্রকারে সেবা করিব, সিংহ, সর্প, ব্যাঘ্র দূরে রাখিয়া। বন, অরণ্য, পর্বত, গুহা ও গহ্বর, সকল হে প্রভু, আমরা পদে পদে অন্বেষণ করিয়াছি। সেই সেই স্থানে তোমাকে শিকারে লইয়া যাইব, এবং সরোবর, ঝর্ণা ও জলস্থান দেখাইব। আমরা সপরিবার তোমার দাস; হে নাথ, আজ্ঞা দিতে সংকোচ করিও না।

দোহা 136

बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन।।⁠136।।

beda bacana muni mana agama te prabhu karunā aina |bacana kirātanha ke sunata jimi pitu bālaka baina ||⁠136||

যিনি বেদের বাক্য ও মুনিদের মনের অগম্য, সেই প্রভু করুণার ধাম, কিরাতদের কথা শুনলেন যেমন পিতা তার সন্তানের কথা শোনেন।

চৌপাই 137.1-4

रामहि केवल प्रेमु पिआरा।जानि लेउ जो जाननिहारा।।

राम सकल बनचर तब तोषे।कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे।।

बिदा किए सिर नाइ सिधाए।प्रभु गुन कहत सुनत घर आए।।

एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई।बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई।।

जब ते आइ रहे रघुनायकु।तब तें भयउ बनु मंगलदायकु।।

फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना।मंजु बलित बर बेलि बिताना।।

सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए।मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए।।

गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी।त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी।।

rāmahi kevala premu piārā |jāni leu jo jānanihārā ||

rāma sakala banacara taba toṣe |kahi mṛdu bacana prema paripoṣe ||

bidā kie sira nāi sidhāe |prabhu guna kahata sunata ghara āe ||

ehi bidhi siya sameta dou bhāī |basahiṁ bipina sura muni sukhadāī ||

jaba te āi rahe raghunāyaku |taba teṁ bhayau banu maṁgaladāyaku ||

phūlahiṁ phalahiṁ biṭapa bidhi nānā |maṁju balita bara beli bitānā ||

surataru sarisa subhāyã suhāe |manahũ bibudha bana parihari āe ||

gaṁja maṁjutara madhukara śrenī |tribidha bayāri bahai sukha denī ||

রাম কেবল প্রেমকেই ভালোবাসেন। যিনি জানতে সমর্থ, তিনি জেনে নিন। তখন রাম সমস্ত বনচরকে তুষ্ট করলেন, কোমল বচন বলে তাঁদের প্রেম পরিপোষিত করলেন। বিদা দিয়ে শির নত করে তারা প্রস্থান করল। প্রভুর গুণ বর্ণনা করতে করতে ও শুনতে শুনতে তারা ঘরে ফিরে এল। এইভাবে সীতা সহ দুই ভ্রাতা বনে বাস করতে লাগলেন, দেবতা ও মুনিদের সুখদাতা হয়ে। যে সময় থেকে রঘুনাথ এসে বাস করলেন, সে সময় থেকে বন মঙ্গলদায়ক হল। নানা প্রকার বৃক্ষ ফুলে ও ফলে পরিপূর্ণ হল, সুন্দর উত্তম লতাগুলি বিতান বিস্তার করল। স্বভাবতই সুন্দর, স্বর্গের বৃক্ষের ন্যায়, যেন দেবতাদের বন ত্যাগ করে এখানে এসেছে। ভ্রমরের শ্রেণী মধুর গুঞ্জনে গুঞ্জিত হল, ত্রিবিধ বায়ু প্রবাহিত হল, সুখ দান করে।

দোহা 137

नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर।।⁠137।।

nīlakaṁṭha kalakaṁṭha suka cātaka cakka cakora |bhā̃ti bhā̃ti bolahiṁ bihaga śravana sukhada cita cora ||⁠137||

নীলকণ্ঠ, কলকণ্ঠ, শুক, চাতক, চক্ক ও চকোর প্রভৃতি বিবিধ পক্ষী নানা প্রকারে ডাকছে, কানে সুখ দিচ্ছে এবং মন চুরি করছে।

চৌপাই 138.1-4

केरि केहरि कपि कोल कुरंगा।बिगतबैर बिचरहिं सब संगा।।

फिरत अहेर राम छबि देखी।होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी।।

बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं।देखि राम बनु सकल सिहाहीं।।

सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या।मेकलसुता गोदावरि धन्या।।

सब सर सिंधु नदी नद नाना।मंदाकिनि कर करहिं बखाना।।

उदय अस्त गिरि अरु कैलासू।मंदर मेरु सकल सुरबासू।।

सैल हिमाचल आदिक जेते।चित्रकूट जसु गावहिं तेते।।

बिंधि मुदित मन सुखु न समाई।श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई।।

keri kehari kapi kola kuraṁgā |bigatabaira bicarahiṁ saba saṁgā ||

phirata ahera rāma chabi dekhī |hohiṁ mudita mṛgabaṁda biseṣī ||

bibudha bipina jahã lagi jaga māhīṁ |dekhi rāma banu sakala sihāhīṁ ||

surasari sarasai dinakara kanyā |mekalasutā godāvari dhanyā ||

saba sara siṁdhu nadī nada nānā |maṁdākini kara karahiṁ bakhānā ||

udaya asta giri aru kailāsū |maṁdara meru sakala surabāsū ||

saila himācala ādika jete |citrakūṭa jasu gāvahiṁ tete ||

biṁdhi mudita mana sukhu na samāī |śrama binu bipula baṛāī pāī ||

হাতি, সিংহ, বানর, বন্যশূকর ও হরিণ, সবাই শত্রুতা ত্যাগ করে একসঙ্গে বিচরণ করত। শিকার করতে করতে ফেরার সময় রামের ছবি দেখে হরিণের পাল বিশেষভাবে আনন্দিত হত। জগতে যত দেববন আছে, সবই রামের বন দেখে ঈর্ষা করত। গঙ্গা, সরস্বতী, সূর্যকন্যা যমুনা, মেকলের কন্যা নর্মদা এবং ধন্য গোদাবরী, সমস্ত সরোবর, সমুদ্র এবং নানা নদী ও নদ, মন্দাকিনীর প্রশংসা করত। উদয় ও অস্তাচল পর্বত, কৈলাস, মন্দর ও মেরু, সমস্ত দেবতার বাসস্থান, হিমাচল প্রভৃতি যত পর্বত আছে, ততটাই চিত্রকূটের যশ গাইত। বিন্ধ্য পর্বত আনন্দে এমন হল যে মনে সুখ ধরে রাখা গেল না, কারণ বিনা পরিশ্রমে বিপুল বড়াই পেল।

দোহা 138

चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति।पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति।।⁠138।।

citrakūṭa ke bihaga mṛga beli biṭapa tṛna jāti |punya puṁja saba dhanya asa kahahiṁ deva dina rāti ||⁠138||

চিত্রকূটের পাখি, হরিণ, লতা, বৃক্ষ ও তৃণজাতি সকলেই পুণ্যের স্তূপ এবং ধন্য, দেবতারা দিনরাত এই কথা বলেন।

চৌপাই 139.1-4

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी।पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।।

परसि चरन रज अचर सुखारी।भए परम पद के अधिकारी।।

सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन।मंगलमय अति पावन पावन।।

महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू।सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू।।

पय पयोधि तजि अवध बिहाई।जहँ सिय लखनु रामु रहे आई।।

कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन।जौं सत सहस होंहिं सहसानन।।

सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं।डाबर कमठ कि मंदर लेहीं।।

सेवहिं लखनु करम मन बानी।जाइ न सीलु सनेहु बखानी।।

nayanavaṁta raghubarahi bilokī |pāi janama phala hohiṁ bisokī ||

parasi carana raja acara sukhārī |bhae parama pada ke adhikārī ||

so banu sailu subhāyã suhāvana |maṁgalamaya ati pāvana pāvana ||

mahimā kahia kavani bidhi tāsū |sukhasāgara jahã kīnha nivāsū ||

paya payodhi taji avadha bihāī |jahã siya lakhanu rāmu rahe āī ||

kahi na sakahiṁ suṣamā jasi kānana |jauṁ sata sahasa hoṁhiṁ sahasānana ||

so maiṁ barani kahauṁ bidhi kehīṁ |ḍābara kamaṭha ki maṁdara lehīṁ ||

sevahiṁ lakhanu karama mana bānī |jāi na sīlu sanehu bakhānī ||

যাঁহাদের চোখ আছে, তাঁরা রঘুবর শ্রেষ্ঠকে দেখে জন্মের ফল লাভ করেন এবং শোকমুক্ত হন। অচর বস্তুরা তাঁহার চরণরজ স্পর্শ করে সুখী হল এবং পরম পদের অধিকারী হল। সেই বন ও পর্বত স্বভাবতই সুন্দর, মঙ্গলময়, এবং পবিত্রদের মধ্যে পবিত্রতম। তাহার মহিমা কীভাবে বলা যায়, যেখানে সুখসাগর নিবাস করেছেন? ক্ষীরসাগর ত্যাগ করে অযোধ্যা বিসর্জন করে সীতা, লক্ষ্মণ ও রাম সেখানে এসে বাস করলেন। এক লক্ষ সহস্রমুখী শেষও সেই বনের সৌন্দর্য বর্ণনা করতে পারবে না। তবে আমি কীভাবে বর্ণনা করব? ডোবার কচ্ছপ কি মন্দর পর্বত তুলতে পারে? লক্ষ্মণ কর্ম, মন ও বাণী দিয়ে তাঁহাদের সেবা করেন; তাঁহার শীল ও স্নেহ বর্ণনা করা যায় না।

দোহা 139

छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु।।⁠139।।

chinu chinu lakhi siya rāma pada jāni āpu para nehu |karata na sapanehũ lakhanu citu baṁdhu mātu pitu gehu ||⁠139||

লক্ষ্মণ প্রতিমুহূর্তে সীতা ও রামের চরণ অবলোকন করে এবং তাঁদের নিজের প্রতি প্রেম অনুভব করে, স্বপ্নেও ভ্রাতা, মাতা, পিতা বা গৃহের দিকে মন ফেরাতেন না।

Frequently Asked Questions

परंपरागत मान्यता के अनुसार दोहा 130–131 के ‘भक्त-लक्षण’ का पाठ/श्रवण चित्त-शुद्धि, परदोष-दर्शन से निवृत्ति, और शरणागति की दृढ़ता देता है; चित्रकूट-प्रसंग (132–139) का पाठ ‘तीर्थ-स्मरण’ के समान पुण्यकारी माना जाता है और गृहस्थ/वनस्थ दोनों के लिए ‘राम-निवास’ (मन में) की सिद्धि का साधन कहा जाता है।

सामान्य सत्संग-परंपरा में शरणागति-प्रधान संपुट जोड़ा जाता है: ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम रामेति रामेति…’ (नाम-संपुट) — विशेषतः दोहा 131 के बाद, क्योंकि वहीं ‘बसहु निरंतर तासु मन’ का शरण-निष्कर्ष आता है।

Ask anything about Prakarana 14 of the Ramcharitmanas

Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.

Not sure where to start?

A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.

Read Ramcharitmanas in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Awadhi recitation where available, and more.

Download on the App StoreGet it on Google Play

Continue reading in the Vedapath app

Open in App
Download on the App StoreGet it on Google Play