Adhyaya 90
Udyoga ParvaAdhyaya 9051 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; कूटनीति का निर्णायक चरण—शान्ति-प्रयास और अहंकार की टक्कर से युद्ध की अनिवार्यता बढ़ती प्रतीत होती है।

Adhyaya 90

विदुरस्य कृष्णं प्रति शमोपदेशः (Vidura’s Counsel to Krishna on the Limits of Peace)

Upa-parva: Krishna–Vidura Saṃvāda (Peace-Counsel Context within Udyoga-parva)

Vaiśaṃpāyana reports a nocturnal exchange in which Vidura addresses Kṛṣṇa after Kṛṣṇa has eaten and rested. Vidura argues that Kṛṣṇa’s proposed visit/mission to the Kaurava side is not “well-resolved” in terms of practical reception, because Duryodhana is characterized as transgressing artha and dharma, disregarding śāstra, and being driven by pride, suspicion, ingratitude, and preference for pleasing falsehoods. Vidura predicts that even beneficial advice (śreyo’pi) will not be accepted due to impulsive belligerence. He notes the psychological effect of amassed forces: Duryodhana mistakes military concentration for accomplished success and relies on Karṇa’s perceived capacity to defeat opponents. The chapter further frames the Kaurava coalition as collectively decided against giving the Pāṇḍavas their due, rendering conciliatory speech ineffective—likened to singing to the deaf. Vidura cautions against entering the hostile assembly amid many ill-disposed actors, while simultaneously affirming Kṛṣṇa’s extraordinary power and intelligence; his warning is presented as arising from affection for the Pāṇḍavas and respectful friendship toward Kṛṣṇa.

Chapter Arc: शान्तिदूत बनकर जनार्दन श्रीकृष्ण हस्तिनापुर में दुर्योधन के भवन में प्रवेश करते हैं—ऐसे घर में, जो इन्द्र-भवन के समान वैभवशाली है, पर भीतर नीति का अन्धकार छिपा है। → कक्ष-द्वारों और प्रहरी-व्यवस्था को लाँघते हुए कृष्ण सभा-भवन तक पहुँचते हैं, जहाँ कुरु-राजा और सहस्रों राजाओं की भीड़ है। दुर्योधन पक्ष के लोग औपचारिक सत्कार करते हैं, पर कृष्ण का आगमन उनके अहंकार और भय—दोनों को चुभता है। कृष्ण स्पष्ट कर देते हैं कि उनका आत्मभाव धर्मचारी पाण्डवों से एक है—जो पाण्डवों से द्वेष करता है, वह कृष्ण से भी द्वेष करता है। → दुर्योधन कृष्ण को भोजन-निमन्त्रण देता है; पर केशव उसे अस्वीकार कर देते हैं—दूत का अन्न पहले न्याय से, शान्ति-प्रयास की स्वीकृति से, और धर्म-मार्ग पर चलने की प्रतिज्ञा से जुड़ा है; अन्यथा वह सत्कार भी अपमान बन जाता है। → सभा में कृष्ण का तेज ‘निर्मल सूर्य’ के समान दीखता है; कौरव-राजा और अन्य राजागण उपासना-सत्कार करते हैं, पर कृष्ण का निर्णय अडिग रहता है—वे दुर्योधन के वैभव से नहीं, धर्म के पक्ष से बँधे हैं। → दुर्योधन पूछता है—‘आपके लिए प्रस्तुत अन्न-जल-वस्त्र-शय्या आपने क्यों नहीं ग्रहण किए?’—और आगे होने वाली तीखी नीति-वार्ता का द्वार खुल जाता है।

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ “लोक मिलाकर कुल १०६ ३“लोक हैं।] #सस्न का तन (0) अनजाने एकनवतितमो< ध्याय: श्रीकृष्णका दुर्योधनके घर जाना एवं उसके निमन्त्रणको अस्वीकार करके विदुरजीके घरपर भोजन करना वैशम्पायन उवाच पृथामामन्त्रय गोविन्द: कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम्‌ । दुर्योधनगृहं शौरिर्भ्यगच्छदरिंदम:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शत्रुओंका दमन करनेवाले शूरनन्दन श्रीकृष्ण कुन्तीकी परिक्रमा करके एवं उनकी आज्ञा ले दुर्योधनके घर गये

বৈশম্পায়ন বললেন— পৃথা (কুন্তী)-র নিকট বিদায় নিয়ে এবং শ্রদ্ধায় তাঁর প্রদক্ষিণা করে, শত্রুদমনকারী শৌরিনন্দন গোবিন্দ শ্রীকৃষ্ণ দুর্যোধনের গৃহে গেলেন।

Verse 2

लक्ष्म्या परमया युक्त पुरन्दरगृहोपमम्‌ । विचित्रैरासनैर्युक्त प्रविवेश जनार्दन:,वह घर इन्द्रभवनके समान उत्तम शोभासे सम्पन्न था। उसमें यथास्थान विचित्र आसन सजाकर रखे गये थे। श्रीकृष्णने उस गृहमें प्रवेश किया

সেই গৃহটি পরম শ্রীতে বিভূষিত, পুরন্দর (ইন্দ্র)-এর প্রাসাদের ন্যায় ছিল। যথাস্থানে বিচিত্র আসন সাজানো ছিল। জনার্দন শ্রীকৃষ্ণ সেই গৃহে প্রবেশ করলেন।

Verse 3

तस्य कक्ष्या व्यतिक्रम्य तिस्रो द्वा:स्थैरवारित: । ततो<भ्रघनसंकाशं गिरिकूटमिवोच्छितम्‌

তার বাহ্য প্রাঙ্গণ অতিক্রম করে, দ্বাররক্ষীদের দ্বারা পরপর তিনটি দ্বারে নিবৃত্ত হয়ে, তিনি তারপর এক উচ্চতর দৃশ্য দেখলেন—ঘন মেঘপুঞ্জের ন্যায় শ্যাম, আর পর্বতশৃঙ্গের মতো উঁচুতে উদিত।

Verse 4

तत्र राजसहसैश्न कुरुभिश्चाभिसंवृतम्‌

সেখানে সেই স্থানটি সহস্র সহস্র রাজা ও কুরুদের দ্বারা চারিদিক থেকে পরিবেষ্টিত, জনসমুদ্রে পরিপূর্ণ ছিল—যেন এক মহারাজসভা, যেখানে ক্ষমতা, মৈত্রী ও ধর্মের প্রশ্ন প্রকাশ্যে বিচারিত হচ্ছিল।

Verse 5

दुःशासनं च कर्ण च शकुनिं चापि सौबलम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—“(তিনি) দুঃশাসন, কর্ণ এবং সৌবলপুত্র শকুনির নামও উচ্চারণ করলেন।” এই পংক্তি সেই প্রধান পরামর্শদাতা ও বৈরসাধকদের সামনে আনে, যাদের সিদ্ধান্ত যুদ্ধের দিকে নৈতিক পতনকে ত্বরান্বিত করে।

Verse 6

अभ्यागच्छति दाशाहें धार्तराष्ट्री महायशा:

বৈশম্পায়ন বললেন—নির্ধারিত সময়ে মহাযশস্বিনী ধৃতরাষ্ট্রপত্নী (গান্ধারী) অগ্রসর হয়ে এলেন। এই পংক্তি তাঁর গম্ভীর, মর্যাদাময় প্রবেশের ইঙ্গিত দেয়, এবং কুরুগৃহে উপদেশ ও নৈতিক চাপের পর্বকে সামনে আনে, যখন যুদ্ধের সংকট ঘনিয়ে আসে।

Verse 7

समेत्य धार्तराष्ट्रेण सहामात्येन केशव:

বৈশম্পায়ন বললেন—কেশব (কৃষ্ণ) ধৃতরাষ্ট্র ও তাঁর অমাত্যদের সঙ্গে একত্র হয়ে (বিষয়টি নিয়ে কথা বলতে/পরামর্শ করতে অগ্রসর হলেন)। এই পংক্তি রাষ্ট্রস্তরের আনুষ্ঠানিক পরামর্শের ইঙ্গিত দেয়, যেখানে দায় ভাগাভাগি—এমন এক নৈতিক মুহূর্ত, যখন জ্ঞানী উপদেশে সংঘাত সংযত হয়ে ধর্ম রক্ষা পাওয়া উচিত।

Verse 8

तत्र जाम्बूनदमयं पर्यड्कं सुपरिष्कृतम्‌

সেখানে জাম্বূনদ স্বর্ণে নির্মিত, অতিশয় সুসজ্জিত ও অলংকৃত একটি পর্যঙ্ক (শয্যা/আসন) রাখা ছিল—যা রাজঐশ্বর্য ও দরবারি আতিথ্যের সূক্ষ্ম বিধানকে প্রকাশ করে, যদিও অন্তরে অন্তরে রাজনৈতিক টানাপোড়েন বাড়ছিল।

Verse 9

विविधास्तरणास्तीर्णमभ्युपाविशदच्युत: । उस राजसभामें सुन्दर रत्नोंसे विभूषित एक सुवर्णमय पर्यक रखा हुआ था, जिसपर भाँति-भाँतिके बिछौने बिछे हुए थे। भगवान्‌ श्रीकृष्ण उसीपर विराजमान हुए ।। ८ ह ।। तस्मिन्‌ गां मधुपर्क चाप्युदकं च जनार्दने

বৈশম্পায়ন বললেন—অচ্যুত শ্রীকৃষ্ণ নানাবিধ আচ্ছাদনে বিছানো সেই শয্যায় আসন গ্রহণ করলেন। রাজসভায় সুন্দর রত্নে বিভূষিত এক স্বর্ণময় পালঙ্ক স্থাপিত ছিল; তাতে নানা প্রকার শয্যাবস্ত্র পাতা ছিল, এবং সেইখানেই ভগবান শ্রীকৃষ্ণ মহিমায় অধিষ্ঠিত হলেন। তারপর জনার্দনের সম্মানে অতিথিধর্ম অনুসারে গাভী, মধুপর্ক ও জল আনা হল।

Verse 10

तत्र गोविन्दमासीन प्रसन्नादित्यवर्चसम्‌

সেখানে তিনি গোবিন্দকে আসীন দেখলেন—প্রসন্ন, এবং সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান।

Verse 11

ततो दुर्योधनो राजा वार्ष्णेयं जयतां वरम्‌

তারপর রাজা দুর্যোধন বার্ষ্ণেয়কে—বিজয়ীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠকে—সম্বোধন করল।

Verse 12

ततो दुर्योधन: कृष्णमब्रवीत्‌ कुरुसंसदि

তারপর কুরুদের সভায় দুর্যোধন শ্রীকৃষ্ণকে বলল।

Verse 13

मृदुपूर्व शठोदर्क कर्णमाभाष्य कौरव: । तब कुरुराज दुर्योधनने कर्णसे सलाह लेकर कौरवसभामें श्रीकृष्णसे पूछा। पूछते समय उसकी वाणीमें पहले तो मृदुता थी, परंतु अन्तमें शठता प्रकट होने लगी थी ।। १२ ६ || कस्मादन्नानि पानानि वासांसि शयनानि च

বৈশম্পায়ন বললেন—কৌরব দুর্যোধন প্রথমে কর্ণকে মৃদু ভাষায় সম্বোধন করল, কিন্তু শেষে তার বাক্যে ছলনার আভাস প্রকাশ পেল। কর্ণের পরামর্শ নিয়ে সে কৌরবসভায় শ্রীকৃষ্ণকে জিজ্ঞাসা করল—“কেন অন্ন-পান, বস্ত্র এবং শয়ন প্রভৃতির ব্যবস্থা করা হচ্ছে?”

Verse 14

उभयोश्वाददा: साहामुभयोश्व हिते रत:,आपने तो दोनों पक्षोंको ही सहायता दी है, आप उभयपक्षके हित-साधनमें तत्पर हैं। माधव! महाराज धूृतराष्ट्रके आप प्रिय सम्बन्धी भी हैं। चक्र और गदा धारण करनेवाले गोविन्द! आपको धर्म और अर्थका सम्पूर्णरूपसे यथार्थ ज्ञान भी है; फिर मेरा आतिथ्य ग्रहण न करनेका क्या कारण है; यह मैं सुनना चाहता हूँ

বৈশম্পায়ন বললেন—আপনি উভয় পক্ষকেই সাহায্য করেছেন এবং উভয়ের মঙ্গলে নিবিষ্ট। মাধব, আপনি রাজা ধৃতরাষ্ট্রের প্রিয় আত্মীয়ও বটে। চক্র-গদাধারী গোবিন্দ, ধর্ম ও অর্থের যথার্থ ও সম্পূর্ণ জ্ঞান আপনার আছে; তবে আমার আতিথ্য গ্রহণ না করার কারণ কী? আমি তা শুনতে চাই।

Verse 15

सम्बन्धी दयितश्नासि धृतराष्ट्रस्य माधव । त्वं हि गोविन्द धर्मार्थो वेत्थ तत्त्वेन सर्वश: । तत्र कारणमिच्छामि श्रोतुं चक्रगदाधर,आपने तो दोनों पक्षोंको ही सहायता दी है, आप उभयपक्षके हित-साधनमें तत्पर हैं। माधव! महाराज धूृतराष्ट्रके आप प्रिय सम्बन्धी भी हैं। चक्र और गदा धारण करनेवाले गोविन्द! आपको धर्म और अर्थका सम्पूर्णरूपसे यथार्थ ज्ञान भी है; फिर मेरा आतिथ्य ग्रहण न करनेका क्या कारण है; यह मैं सुनना चाहता हूँ

মাধব, আপনি ধৃতরাষ্ট্রের প্রিয় আত্মীয়। গোবিন্দ, আপনি ধর্ম ও অর্থকে তত্ত্বতঃ সর্বতোভাবে জানেন। অতএব, হে চক্র-গদাধারী, আপনি কেন আমার আতিথ্য গ্রহণ করছেন না—তার কারণ আমি শুনতে চাই।

Verse 16

वैशम्पायन उवाच स एवमुक्तो गोविन्द: प्रत्युवाच महामना: । उद्यन्मेघस्वन: काले प्रगृह्म विपुलं भुजम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार पूछे जानेपर उस समय महामनस्वी कमलनयन श्रीकृष्णने अपनी विशाल भुजा ऊपर उठाकर राजा दुर्योधनको सजल जलधरके समान गम्भीर वाणीमें उत्तर देना आरम्भ किया। उनका वह वचन परम उत्तम, युक्तिसंगत, दैन्य-रहित प्रत्येक अक्षरकी स्पष्टतासे सुशोभित तथा स्थान-श्रष्टता एवं संकीर्णता आदि दोषोंसे रहित था

বৈশম্পায়ন বললেন—এভাবে সম্বোধিত হলে মহামনা গোবিন্দ প্রত্যুত্তর দিলেন। সেই সময় তিনি তাঁর বিশাল বাহু উঁচু করে, উদিত মেঘের গর্জনের মতো গভীর স্বরে কথা আরম্ভ করলেন।

Verse 17

अलघूकृतमग्रस्तमनिरस्तमसंकुलम्‌ । राजीवनेत्रो राजानं हेतुमद्‌ वाक्यमुत्तमम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार पूछे जानेपर उस समय महामनस्वी कमलनयन श्रीकृष्णने अपनी विशाल भुजा ऊपर उठाकर राजा दुर्योधनको सजल जलधरके समान गम्भीर वाणीमें उत्तर देना आरम्भ किया। उनका वह वचन परम उत्तम, युक्तिसंगत, दैन्य-रहित प्रत्येक अक्षरकी स्पष्टतासे सुशोभित तथा स्थान-श्रष्टता एवं संकीर्णता आदि दोषोंसे रहित था

পদ্মনয়ন কৃষ্ণ রাজাকে এমন এক উৎকৃষ্ট, উদ্দেশ্যপূর্ণ বাক্য বললেন—যা তুচ্ছ নয়, অসম্পূর্ণ নয়, অপ্রাসঙ্গিক নয়, এবং জটিলতাহীন।

Verse 18

कृतार्था भुज्जते दूता: पूजां गृह्नन्ति चैव ह । कृतार्थ मां सहामात्यं समर्चिष्यसि भारत,“भारत! ऐसा नियम है कि दूत अपना प्रयोजन सिद्ध होनेपर ही भोजन और सम्मान स्वीकार करते हैं। तुम भी मेरा उद्देश्य सिद्ध हो जानेपर ही मेरा और मेरे मन्त्रियोंका सत्कार करना'

এটি নিয়ম যে দূতেরা কাজ সিদ্ধ হলে তবেই আহার করে এবং সম্মান গ্রহণ করে। অতএব, হে ভারত! আমার উদ্দেশ্য পূর্ণ হলে তুমি আমার ও আমার মন্ত্রীদের সঙ্গে যথোচিতভাবে আমাকে সম্মান করবে।

Verse 19

एवमुक्तः प्रत्युवाच धार्तराष्ट्रो जनार्दनम्‌ । न युक्त भवतास्मासु प्रतिपत्तुमसाम्प्रतम्‌,यह सुनकर दुर्योधनने जनार्दनसे कहा--“आपको हमलोगोंके साथ ऐसा अनुचित बर्ताव नहीं करना चाहिये”

এভাবে সম্বোধিত হয়ে ধৃতরাষ্ট্রপুত্র দুর্যোধন জনার্দনকে উত্তর দিল—“এ সময় আমাদের প্রতি আপনার অনুচিত আচরণ করা শোভন নয়।”

Verse 20

कृतार्थ वाकृतार्थ च त्वां वयं मधुसूदन । यतामहे पूजयितुं दाशाह न च शकक्‍्नुम:,“दशाहनन्दन मधुसूदन! आपका उद्देश्य सफल हो या न हो, हमलोग तो आपके सम्मानका प्रयत्न करते ही हैं; किंतु हमें सफलता नहीं मिल रही है

“হে মধুসূদন! আপনার উদ্দেশ্য সফল হোক বা না হোক, হে দাশার্হ, আমরা আপনাকে পূজা-সম্মান করতে চেষ্টা করি; কিন্তু পারি না।”

Verse 21

न च तत्‌ कारणं विद्यो यस्मिन्‌ नो मधुसूदन । पूजां कृतां प्रीयमाणैर्नामंस्था: पुरुषोत्तम,“मधुदैत्यका विनाश करनेवाले पुरुषोत्तम! हमें ऐसा कोई कारण नहीं जान पड़ता, जिसके होनेसे आप हमारी प्रेमपूर्वक अर्पित की हुई पूजा ग्रहण न कर सकें

“হে মধুসূদন! এমন কোনো কারণ আমরা জানি না, যার জন্য আপনি আমাদের প্রেমভরে নিবেদিত পূজা গ্রহণ করবেন না। হে পুরুষোত্তম! আমাদের এই শ্রদ্ধার থেকে বিমুখ হবেন না।”

Verse 22

वैरं नो नास्ति भवता गोविन्द न च विग्रह: । स भवान्‌ प्रसमीक्ष्यैतन्नेदृशं वक्तुमहीति,“गोविन्द! आपके साथ हमलोगोंका न तो कोई वैर है और न झगड़ा ही है। इन सब बातोंका विचार करके आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये”

“গোবিন্দ! আপনার সঙ্গে আমাদের না কোনো বৈর আছে, না কোনো বিবাদ। এসব ভেবে-চিন্তে আপনার এমন কথা বলা উচিত নয়।”

Verse 23

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तः: प्रत्युवाच धार्तराष्ट्रं जनार्दन: । अभिवीक्ष्य सहामात्यं दाशार्ह: प्रहसन्निव,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! यह सुनकर दशार्हकुलभूषण जनार्दनने मन्त्रियोंसहित दुर्योधनकी ओर देखकर हँसते हुए-से उत्तर दिया

বৈশম্পায়ন বললেন—এভাবে বলা হলে জনার্দন ধার্তারাষ্ট্র (দুর্যোধন)-কে উত্তর দিলেন। দাশার্হ শ্রীকৃষ্ণ তার মন্ত্রীদেরসহ তার দিকে চেয়ে, যেন মৃদু হাসি হেসে, বললেন।

Verse 24

नाहं कामाजन्न संरम्भान्न द्वेषान्नार्थकारणात्‌ । न हेतुवादाल्लोभाद्‌ वा धर्म जह्यां कथंचन,“राजन! मैं कामसे, क्रोधसे, द्वेषसे, स्वार्थवश, बहानेबाजी अथवा लोभसे भी किसी प्रकार धर्मका त्याग नहीं कर सकता

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! কামনা, উন্মত্ত ক্রোধ, দ্বেষ, স্বার্থসিদ্ধি, কূটতর্কের অজুহাত কিংবা লোভ—কোনো কারণেই আমি কখনও ধর্ম ত্যাগ করি না।

Verse 25

सम्प्रीतिभोज्यान्यन्नानि आपद्धोज्यानि वा पुनः । न च सम्प्रीयसे राजन्‌ न चैवापद्गता वयम्‌,“किसीके घरका अन्न या तो प्रेमके कारण भोजन किया जाता है या आप त्तिमें पड़नेपर। नरेश्वर! प्रेम तो तुम नहीं रखते और किसी आपफत्तिमें हम नहीं पड़े हैं

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! অন্যের গৃহের অন্ন হয় স্নেহের কারণে ভোজন করা হয়, নয়তো বিপদে পড়লে। কিন্তু তুমি আমাদের প্রতি স্নেহবান নও, আর আমরা কোনো বিপদেও পড়িনি।

Verse 26

अकम्माद्‌ द्वेष्टि वै राजन्‌ जन्मप्रभृति पाण्डवान्‌ | प्रियानुवर्तिनो भ्रातृन्‌ सर्व: समुदितान्‌ गुणै:ः,“राजन! पाण्डव तुम्हारे भाई ही हैं, वे अपने प्रेमियोंका साथ देनेवाले और समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न हैं, तथापि तुम जन्मसे ही उनके साथ अकारण ही द्वेष करते हो

হে রাজন! পাণ্ডবরা তোমারই ভ্রাতা—তারা প্রিয়জনের অনুগামী এবং সর্বগুণে সমৃদ্ধ; তবু তুমি জন্ম থেকেই তাদের প্রতি অকারণে দ্বেষ পোষণ করছ।

Verse 27

अकस्माच्चैव पार्थानां द्वेषणं नोपपद्यते । धर्मे स्थिता: पाण्डवेया: कस्तान्‌ कि वक्तुमहति,“बिना कारण ही कदुन्तीपुत्रोंके साथ द्वेष रखना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है। पाण्डव सदा अपने धर्ममें स्थित रहते हैं, अतः उनके विरुद्ध कौन क्या कह सकता है?

বৈশম্পায়ন বললেন—পৃথাপুত্রদের প্রতি হঠাৎ, অকারণে দ্বেষ রাখা শোভন নয়। পাণ্ডবরা ধর্মে স্থিত; অতএব তাদের বিরুদ্ধে কে কী বলার যোগ্য?

Verse 28

यस्तान्‌ दवेष्टि स मां द्वेष्टि यस्ताननु स मामनु । ऐकात्म्यं मां गतं विद्धि पाण्डवैर्धर्मचारिभि:,'जो पाण्डवोंसे द्वेष करता है, वह मुझसे भी द्वेष करता है और जो उनके अनुकूल है, वह मेरे भी अनुकूल है। तुम मुझे धर्मात्मा पाण्डवोंके साथ एकरूप हुआ ही समझो

বৈশম্পায়ন বললেন—যে তাদের ঘৃণা করে, সে আমাকেও ঘৃণা করে; আর যে তাদের পক্ষে, সে আমারও পক্ষে। জেনে রেখো, ধর্মচারী পাণ্ডবদের সঙ্গে আমি একাত্ম হয়েছি।

Verse 29

कामक्रोधानुवर्ती हि यो मोहाद्‌ विरुरुत्सति । गुणवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहु: पुरुषाधमम्‌,“जो काम और क्रोधके वशीभूत होकर मोहवश किसी गुणवान्‌ पुरुषके साथ विरोध करना चाहता है, उसे पुरुषोंमें अधम कहा गया है

যে কাম ও ক্রোধের বশবর্তী হয়ে মোহবশত গুণবান ব্যক্তির বিরোধ করতে চায় এবং তাকে দ্বেষ করে—তাকে মানুষের মধ্যে অধম বলা হয়।

Verse 30

य: कल्याणगुणान्‌ ज्ञातीन्‌ मोहाल्लो भाद दिदृक्षते । सो<जितात्माजितक्रोधो न चिरं तिष्ठति श्रियम्‌,“जो कल्याणमय गुणोंसे युक्त अपने कुटुम्बीजनोंको मोह$ और लोभःकी दृष्टिसे देखना चाहता है, वह अपने मन और क्रोधको न जीतनेवाला पुरुष दीर्घकालतक राजलक्ष्मीका उपभोग नहीं कर सकता

যে মোহ ও লোভে নিজেরই কল্যাণগুণসম্পন্ন আত্মীয়দের স্বার্থের দৃষ্টিতে দেখে—যে মন ও ক্রোধ জয় করতে পারেনি, সে দীর্ঘকাল রাজসমৃদ্ধি ধরে রাখতে পারে না।

Verse 31

अथ यो गुणसम्पन्नान्‌ हृदयस्याप्रियानपि । प्रियेण कुरुते वश्यांश्विरं यशसि तिष्ठति,“जो अपने मनको प्रिय न लगनेवाले गुणवान्‌ व्यक्तियोंको भी अपने प्रिय व्यवहारद्वारा वशमें कर लेता है, वह दीर्घकालतक यशस्वी बना रहता है

আর যে ব্যক্তি হৃদয়ের অপ্রীতিকর হলেও গুণবান লোকদেরকে নিজের প্রিয় ও মধুর আচরণে অনুকূল করে তোলে—সে দীর্ঘকাল যশে প্রতিষ্ঠিত থাকে।

Verse 32

(द्विषदन्न न भोक्तव्यं द्विषन्तं नैव भोजयेत्‌ । पाण्डवान्‌ द्विषसे राजन्‌ मम प्राणा हि पाण्डवा: ।। ) “जो द्वेष रखता हो, उसका अन्न नहीं खाना चाहिये। द्वेष रखनेवालेको खिलाना भी नहीं चाहिये। राजन! तुम पाण्डवोंसे द्वेष रखते हो और पाण्डव मेरे प्राण हैं। सर्वमेतन्न भोक्तव्यमन्नं दुष्टगाभिसंहितम्‌ । क्षत्तुरेकस्य भोक्तव्यमिति मे धीयते मति:,“तुम्हारा यह सारा अन्न दुर्भावनासे दूषित है। अतः मेरे भोजन करनेयोग्य नहीं है। मेरे लिये तो यहाँ केवल विदुरका ही अन्न खानेयोग्य है। यह मेरी निश्चित धारणा है”

যে দ্বেষ পোষে তার অন্ন ভক্ষণ করা উচিত নয়, আর দ্বেষীকে অন্ন খাওয়ানোও উচিত নয়। রাজন, তুমি পাণ্ডবদের প্রতি দ্বেষ রাখো—আর পাণ্ডবরাই আমার প্রাণ। অতএব তোমার এই সমগ্র ভোজ্যদ্রব্য বিদ্বেষে কলুষিত; আমার ভক্ষণযোগ্য নয়। আমার স্থির মত—এখানে কেবল বিদুরের অন্নই আমার আহার্য।

Verse 33

एवमुक्‍्त्वा महाबाहुर्दुर्योधनममर्षणम्‌ । निश्चक्राम ततः शुभ्राद्‌ धार्तराष्ट्रनिवेशनात्‌,अमर्षशील दुर्योधनसे ऐसा कहकर महाबाहु श्रीकृष्ण उसके भव्य भवनसे बाहर निकले

এ কথা বলে মহাবাহু শ্রীকৃষ্ণ অসহিষ্ণু দুর্যোধনকে সেখানেই রেখে ধৃতরাষ্ট্রের শুভ্র-ভব্য প্রাসাদ থেকে বেরিয়ে গেলেন।

Verse 34

निर्याय च महाबाहुर्वासुदेवो महामना: । निवेशाय ययौ वेश्म विदुरस्य महात्मन:,वहाँसे निकलकर महामना महाबाहु भगवान्‌ वासुदेव ठहरनेके लिये महात्मा विदुरके भवनमें गये

সেখান থেকে প্রস্থান করে মহাবাহু, মহামনা বাসুদেব রাত্রিযাপনের জন্য মহাত্মা বিদুরের গৃহে গেলেন।

Verse 35

तमभ्यगच्छद्‌ द्रोणश्व॒ कृपो भीष्मो5थ बाह्लिक:ः । कुरवश्न महाबाहुं विदुरस्य गृहे स्थितम्‌,उस समय द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म, बाह्नलीक तथा अन्य कौरवोंने भी महाबाहु श्रीकृष्णका अनुसरण किया। विदुरके घरमें ठहरे हुए यदुवंशी वीर मधुसूदनसे वे सब कौरव बोले--'वृष्णिनन्दन! हमलोग रत्न-धनसे सम्पन्न अपने घरोंको आपकी सेवामें समर्पित करते हैं!

তখন দ্রোণ, কৃপ, ভীষ্ম, বাহ্লীক এবং অন্যান্য কুরুগণ বিদুরের গৃহে অবস্থানরত মহাবাহুর (শ্রীকৃষ্ণের) নিকট উপস্থিত হলেন।

Verse 36

श्रिया ज्वलन्तं प्रासादमारुरोह महायशा: । द्वारपालोंने रोक-टोक नहीं की। उस राजभवनकी तीन ड्योढ़ियाँ पार करके महायशस्वी श्रीकृष्ण एक ऐसे प्रासादपर आरूढ़ हुए, जो आकाशमें छाये हुए शरद्‌-ऋतुके बादलोंके समान श्वेत, पर्वतशिखरके समान ऊँचा तथा अपनी अद्भुत प्रभासे प्रकाशमान था,त ऊचुर्माधवं वीरं कुरवो मधुसूदनम्‌ । निवेदयामो वार्ष्णेय सरत्नांस्ते गृहान्‌ वयम्‌ उस समय द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म, बाह्नलीक तथा अन्य कौरवोंने भी महाबाहु श्रीकृष्णका अनुसरण किया। विदुरके घरमें ठहरे हुए यदुवंशी वीर मधुसूदनसे वे सब कौरव बोले--'वृष्णिनन्दन! हमलोग रत्न-धनसे सम्पन्न अपने घरोंको आपकी सेवामें समर्पित करते हैं!

মহাযশস্বী শ্রীকৃষ্ণ শ্রীতে জ্বলন্ত প্রাসাদে আরোহণ করলেন। তখন কুরুগণ বীর মধুসূদন মাধবকে বলল—“হে বার্ষ্ণেয়! রত্নসমৃদ্ধ আমাদের গৃহসমূহ আমরা আপনার সেবায় নিবেদন করছি।”

Verse 37

तानुवाच महातेजा: कौरवान्‌ मधुसूदन: । सर्वे भवन्तो गच्छन्तु सर्वा मेड5पचिति: कृता,तब महातेजस्वी मधुसूदनने कौरवोंसे कहा--“आप सब लोग अपने घरोंको जाया; आपके द्वारा मेरा सारा सम्मान सम्पन्न हो गया”

তখন মহাতেজস্বী মধুসূদন কুরুদের বললেন—“আপনারা সকলেই এখন যান; আপনাদের দ্বারা আমার সমগ্র সম্মান-সত্কার সম্পন্ন হয়েছে।”

Verse 38

यातेषु कुरुषु क्षत्ता दाशार्हमपराजितम्‌ । अभ्यर्चयामास तदा सर्वकामै: प्रयत्नवान्‌

কুরুগণ চলে গেলে কর্তব্যনিষ্ঠ ক্ষত্তা (বিদুর) তখন অপরাজিত দাশার্হ (শ্রীকৃষ্ণ)-কে সর্বপ্রকার কাম্য উপচারে যত্নসহকারে পূজা-সত্কার করলেন।

Verse 39

कौरवोंके चले जानेपर विदुरजीने कभी पराजित न होनेवाले दशार्हनन्दन श्रीकृष्णको समस्त मनोवांछित वस्तुएँ समर्पित करके प्रयत्नपूर्वक उनका पूजन किया ।। ततः क्षत्तान्नपानानि शुचीनि गुणवन्ति च । उपाहरदनेकानि केशवाय महात्मने

কৌরবরা চলে গেলে বিদুর মহাত্মা কেশব শ্রীকৃষ্ণের জন্য বহু প্রকার শুচি ও গুণসম্পন্ন অন্ন-পানীয় এনে নিবেদন করলেন এবং মনোবাঞ্ছিত দ্রব্য অর্পণ করে যত্নসহকারে তাঁর পূজা করলেন।

Verse 40

तदनन्तर उन्होंने अनेक प्रकारके पवित्र एवं गुणकारक अन्न-पान महात्मा केशवको अर्पित किये ।। तैस्तर्पयित्वा प्रथमं ब्राह्मणान्‌ मघुसूदन: । वेदविद्धयो ददौ कृष्ण: परमद्रविणान्यपि,मधुसूदनने उस अन्न-पानसे पहले ब्राह्मणोंको तृप्त किया, फिर उन्होंने उन वेदवेत्ताओंको श्रेष्ठ धन भी दिया

তারপর তাঁরা মহাত্মা কেশবকে বহু প্রকার পবিত্র ও গুণকর অন্ন-পানীয় নিবেদন করলেন। মধুসূদন প্রথমে সেই আহারেই ব্রাহ্মণদের তৃপ্ত করলেন, তারপর বেদবিদদের উৎকৃষ্ট ধনও দান করলেন।

Verse 41

ततो<नुयायिभि: सार्थ मरुद्धिरिव वासव: । विदुरान्नानि बुभुजे शुचीनि गुणवन्ति च,तदनन्तर देवताओंसहित इन्द्रकी भाँति अनुचरोंसहित भगवान्‌ श्रीकृष्णने विदुरजीके पवित्र एवं गुणकारक अन्न-पान ग्रहण किये

তারপর অনুচরদের সঙ্গে—যেমন মরুৎগণসহ বাসব (ইন্দ্র)—ভগবান শ্রীকৃষ্ণ বিদুরের নিবেদিত শুচি ও গুণসম্পন্ন অন্ন গ্রহণ করলেন।

Verse 46

धार्तराष्ट्र महाबाहुं ददर्शासीनमासने । वहाँ उन्होंने सिंहासनपर बैठे हुए धृतराष्ट्रपुत्र महाबाहु दुर्योधनको देखा, जो सहस्रों राजाओं तथा कौरवोंसे घिरा हुआ था

সেখানে তিনি সিংহাসনে উপবিষ্ট ধৃতরাষ্ট্রপুত্র মহাবাহু দুর্যোধনকে দেখলেন—যিনি কৌরবদের ও সহস্র রাজাদের দ্বারা পরিবেষ্টিত ছিলেন।

Verse 56

दुर्योधनसमीपे तानासनस्थान्‌ ददर्श सः । दुर्योधनके पास ही दुःशासन, कर्ण तथा सुबलपुत्र शकुनि--ये भी आसनोंपर बैठे थे। श्रीकृष्णने उनको भी देखा

দুর্যোধনের নিকটে নির্দিষ্ট আসনে উপবিষ্ট দুঃশাসন, কর্ণ এবং সুবলপুত্র শকুনিকেও শ্রীকৃষ্ণ দেখলেন।

Verse 66

उदतिष्ठत्‌ सहामात्य: पूजयन्‌ मधुसूदनम्‌ । दशाहनन्दन श्रीकृष्णके आते ही महायशस्वी दुर्योधन मधुसूदनका सम्मान करते हुए मन्त्रियोंसहित उठकर खड़ा हो गया

শ্রীকৃষ্ণ উপস্থিত হতেই মহাযশস্বী ধৃতরাষ্ট্রনন্দন দুর্যোধন, মধুসূদনকে সম্মান জানিয়ে, মন্ত্রীদের সঙ্গে উঠে দাঁড়াল।

Verse 76

राजभिस्तत्र वाष्णेय: समागच्छद्‌ यथावय: । मन्त्रियोंसहित दुर्योधनसे मिलकर वृष्णिकुलभूषण केशव अवस्थाके अनुसार वहाँ सभी राजाओंसे यथायोग्य मिले

সেখানে বৃষ্ণিকুলভূষণ কেশব, দুর্যোধনের সঙ্গে ও মন্ত্রীদের সহিত, প্রত্যেকের মর্যাদা ও অবস্থান অনুসারে, সমবেত সকল রাজাদের সঙ্গে যথাযথভাবে সাক্ষাৎ করলেন।

Verse 90

इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्ण-कुन्ती- संवादविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে পবিত্র মহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে শ্রীকৃষ্ণ-কুন্তী-সংবাদবিষয়ক নব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 91

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णदुर्योधनसंवादे एकनवतितमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের ভগবদ্যানপর্বে শ্রীকৃষ্ণ-দুর্যোধন-সংবাদবিষয়ক একানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 96

निवेदयामास तदा गृहान्‌ राज्यं च कौरव: । उस समय कुरुराजने जनार्दनकी सेवामें गौ, मधुपर्क, जल, गृह तथा राज्य सब कुछ निवेदन कर दिया

তখন কৌরবরাজ জনার্দনের সেবায় নিজের গৃহ, জল, মধুপর্ক, গাভী—এমনকি রাজ্য পর্যন্ত—সমস্তই নিবেদন করলেন।

Verse 106

उपासांचक्रिरे सर्वे कुरवो राजभि: सह । उस पर्यकपर बैठे हुए भगवान्‌ गोविन्द निर्मल सूर्यके समान तेजस्वी प्रतीत हो रहे थे। उस समय राजाओंसहित समस्त कौरव उनके पास आकर बैठ गये

বৈশম্পায়ন বললেন—সমবেত রাজাদের সঙ্গে সমস্ত কুরুগণ শ্রদ্ধাভরে গোবিন্দকে প্রণাম করল। শয্যায় উপবিষ্ট ভগবান গোবিন্দ নির্মল, মেঘহীন সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান প্রতীয়মান হচ্ছিলেন। তারপর রাজাদের সহিত সমগ্র কৌরবসমাজ তাঁর নিকটে এসে বসিল।

Verse 116

न्यमन्त्रयद्‌ भोजनेन नाभ्यनन्दच्च केशव: । तदनन्तर राजा दुर्योधनने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णको भोजनके लिये निमन्त्रित किया; परंतु केशवने उस निमन्त्रणको स्वीकार नहीं किया

বৈশম্পায়ন বললেন—রাজা দুর্যোধন বিজয়ী বীরশ্রেষ্ঠ শ্রীকৃষ্ণকে ভোজনের জন্য নিমন্ত্রণ করল; কিন্তু কেশব সেই নিমন্ত্রণকে না গ্রহণ করলেন, না তাতে সন্তোষ প্রকাশ করলেন।

Verse 136

त्वदर्थमुपनीतानि नाग्रहीस्त्वं जनार्दन | (दुर्योधन बोला--) जनार्दन! आपके लिये अन्न, जल, वस्त्र और शय्या आदि जो वस्तुएँ प्रस्तुत की गयीं, उन्हें आपने ग्रहण क्‍यों नहीं किया?

দুর্যোধন বলল—জনার্দন! আপনার জন্য অন্ন, জল, বস্ত্র ও শয্যা প্রভৃতি যা উপস্থিত করা হয়েছিল, আপনি কেন তা গ্রহণ করলেন না?

Frequently Asked Questions

Whether a principled peace mission should proceed when the opposing leadership is assessed as unwilling to accept equitable restitution—raising the dilemma between attempting śama through counsel and avoiding futile or risky engagement in a hostile assembly.

Effective ethical action requires both right intention and situational discernment: speech and counsel have limits when recipients are governed by passion and prestige, and when collective resolve is fixed against justice.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-level function is diagnostic—clarifying how adharma can become institutionally stabilized, thereby explaining why even exemplary counsel may not alter outcomes.