
उद्योगपर्व — अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर संवादः (विदुरनीतिः)
Upa-parva: Vidura-Nīti (Counsel to Dhṛtarāṣṭra) — Udyoga Parva Context
Vaiśaṃpāyana narrates Dhṛtarāṣṭra’s summons of Vidura through the palace doorkeeper, establishing court procedure and Dhṛtarāṣṭra’s readiness to receive counsel. Dhṛtarāṣṭra reports that Saṃjaya has returned after reproaching him and will speak in the assembly the next day; uncertainty about that speech produces insomnia and somatic agitation. Vidura begins with diagnostic counsel, asking whether the king is afflicted by major moral faults (e.g., coveting others’ wealth), then proceeds into an extended niti catalogue. The chapter defines the paṇḍita through behavioral markers: discernment, restraint from anger and pride, confidentiality, steadiness under heat/cold, fear/pleasure, prosperity/adversity, and prioritization of dharma and artha over kāma. In contrast, it profiles the mūḍha through impulsive speech, misplaced alliances, procrastination, and envy. Vidura enumerates governance hazards (vices, leaks of counsel, mismanagement of resources), prescribes durable virtues (truth, generosity, non-sloth, non-envy, forbearance, firmness), and frames leadership as measured discipline combined with compassion. The discourse culminates in a direct political-ethical recommendation: Dhṛtarāṣṭra should provide the Pāṇḍavas their due share of sovereignty, aligning state stability with justice and kinship responsibility.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र अनिष्ट की आशंका से व्याकुल होकर विदुर को बुलाते हैं और कहते हैं—‘कवे-तने! अजातशत्रु युधिष्ठिर के हित में जो पथ्य और श्रेयस्कर हो, वही मुझे यथावत् समझाओ।’ → विदुर ‘अपृष्ट’ होकर भी हितवचन कहने के धर्म का उद्घोष करते हैं—प्रिय-अप्रिय, शुभ-अशुभ से परे जाकर वही बोलना चाहिए जिससे श्रोता का पराभव न हो। फिर वे राजधर्म, इन्द्रिय-निग्रह, दण्ड-नीति, और वाणी की मर्यादा का क्रमशः प्रतिपादन करते हैं, यह दिखाते हुए कि काम-क्रोध जैसे दो ‘महामत्स्य’ बुद्धि को जाल में फँसी मछलियों की तरह लूट लेते हैं। → विदुर का निर्णायक उपदेश: युधिष्ठिर ही राजलक्षणों से सम्पन्न, त्रैलोक्य-राज्य के योग्य, और धृतराष्ट्र का आज्ञाकारी शिष्य-सदृश है; वह करुणा और अनृशंस्य से प्रेरित होकर धृतराष्ट्र के कारण अनेक क्लेश सह रहा है—अतः उसी के साथ न्याय करना ही राज्य और कुल का श्रेय है। → अध्याय का अंत विदुर के नीति-वचन को एक स्पष्ट दिशा देता है—राजा को धैर्यवान, परीक्ष्य-कारी, इन्द्रियजयी, और सुभाषित-वाणी वाला बनकर निर्णय करना चाहिए; अन्यथा दुर्भाषित और विकार राज्य को अनर्थ में ले जाते हैं। → विदुरनीति का प्रवाह यहीं से आरम्भ होकर आगे के अध्यायों में और तीक्ष्ण होकर धृतराष्ट्र के मोह, दुर्योधन की हठ, तथा राज्य-धर्म के निर्णायक प्रश्नों की ओर बढ़ता है।
Verse 1
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल १२९ “लोक हैं।] हि. 770 8 2 बक। न मा * इस ३३ वें अध्यायसे प्रारम्भ होकर ४० वें अध्यायतक “विदुरनीति' है। > यहाँ 'उपास्ते” के स्थानपर “उपासते” यह प्रयोग आर्ष समझना चाहिये। - मुहूर्त शब्दका अर्थ दो घड़ी होता है। एक घड़ी २४ मिनटकी मानी जाती है। चतुस्त्रिं5 ध्याय: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन धृतराष्ट उवाच जाग्रतो दहयमानस्य यत् कार्यमनुपश्यसि । तद् ब्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलो हासि,धृतराष्ट्र बोले--तात! मैं चिन्तासे जलता हुआ अभीतक जाग रहा हूँ; तुम मेरे करनेयोग्य जो कार्य समझो, उसे बताओ; क्योंकि हमलोगोंमें तुम्हीं धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण हो
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে তাত! উদ্বেগের দাহে দগ্ধ হয়ে আমি এতক্ষণ জেগে আছি। কী করা উচিত বলে তুমি মনে কর, তা বলো; কারণ আমাদের মধ্যে ধর্ম ও অর্থের জ্ঞান তোমারই সর্বাধিক সুদৃঢ়।
Verse 2
त्वं मां यथावद् विदुर प्रशाधि प्रज्ञापूर्व सर्वमजातशत्रो: | यन्मन्यसे पथ्यमदीनसत्त्व श्रेयस्करं ब्रूहि तद् वै कुरूणाम्,उदारचित्त विदुर! तुम अपनी बुद्धिसे विचारकर मुझे ठीक-ठीक उपदेश करो। जो बात युधिष्ठिरके लिये हितकर और कौरवोंके लिये कल्याणकारी समझो, वह सब अवश्य बताओ
উদারচিত্ত বিদুর! তোমার প্রজ্ঞা দিয়ে বিচার করে আমাকে যথাযথভাবে উপদেশ দাও। অজাতশত্রু যুধিষ্ঠিরের জন্য যা হিতকর এবং কুরুবংশের কল্যাণসাধক বলে তুমি মনে কর—সে সবই বলো।
Verse 3
पापाशड्की पापमेवानुपश्यन् पृच्छामि त्वां व्याकुलेनात्मनाहम् । कवे तने ब्रूहि सर्व यथाव- न्मनीषितं सर्वमजातशत्रो:,विद्वन! मेरे मनमें अनिष्टकी आशंका बनी रहती है, इसलिये मैं सर्वत्र अनिष्ट ही देखता हूँ, अतः व्याकुल हृदयसे मैं तुमसे पूछ रहा हँ--अजातशत्रु युधिष्ठिर क्या चाहते हैं, सो सब ठीक-ठीक बताओ
হে বিদ্বান! পাপের আশঙ্কায় আমার মন সদা কাঁপে, তাই সর্বত্রই আমি অমঙ্গল দেখি। এই ব্যাকুল হৃদয়ে তোমাকে জিজ্ঞাসা করছি—হে কবি, হে তাত! অজাতশত্রু যুধিষ্ঠিরের মনোভাব ও অভিপ্রায় যা কিছু, সবই যথাযথভাবে বলো।
Verse 4
विदुर उवाच शुभं वा यदि वा पापं द्वेष्यं वा यदि वा प्रियम् । अपृष्टस्तस्य तद् ब्रूयाद् यस्य नेच्छेत् पराभवम्,विदुरजीने कहा--राजन्! मनुष्यको चाहिये कि वह जिसकी पराजय नहीं चाहता, उसको बिना पूछे भी अच्छी अथवा बुरी, कल्याण करनेवाली या अनिष्ट करनेवाली--जो भी बात हो, बता दे
বিদুর বললেন—হে রাজন! কথা মঙ্গলজনক হোক বা অমঙ্গলজনক, শুনতে অপ্রিয় হোক বা প্রিয়—যার পরাভব তুমি চাও না, তাকে না জিজ্ঞাসা করলেও সেই কথা বলে দেওয়া উচিত।
Verse 5
तस्माद् वक्ष्यामि ते राजन हित॑ं यत् स्यात् कुरून् प्रति । वच: श्रेयस्करं धर्म्य ब्रुवतस्तन्निबोध मे
অতএব, হে রাজন, কুরুদের প্রতি যা হিতকর, তাই আমি তোমাকে বলব। আমি যে কল্যাণকর ও ধর্মসম্মত বাক্য বলছি, তা মনোযোগ দিয়ে শোন।
Verse 6
इसलिये राजन्! जिससे समस्त कौरवोंका हित हो, मैं वही बात आपसे कहूँगा। मैं जो कल्याणकारी एवं धर्मयुक्त वचन कह रहा हूँ, उन्हें आप ध्यान देकर सुनें ।। मिथ्योपेतानि कर्माणि सिध्येयुर्यानि भारत । अनुपायप्रयुक्तानि मा सम तेषु मन: कृथा:,भारत! असत् उपायों (अन्यायपूर्वक युद्ध एवं द्यूत) आदिका प्रयोग करके जो कपटपूर्ण कार्य सिद्ध होते हैं, उनमें आप मन मत लगाइये
হে ভারত, যে কর্মগুলি ছলনায় যুক্ত হয়ে অনুচিত উপায়ে সিদ্ধ হয়, সেগুলিতে মন দিও না।
Verse 7
तथैव योगविहितं यत् तु कर्म न सिध्यति । उपाययुक्त मेधावी न तत्र ग्लपयेन्मन:,इसी प्रकार अच्छे उपायोंका उपयोग करके सावधानीके साथ किया गया कोई कर्म यदि सफल न हो तो बुद्धिमान् पुरुषको उसके लिये मनमें ग्लानि नहीं करनी चाहिये
তদ্রূপ, যথাযথ উপায়ে ও সংযত পরামর্শে করা কোনো কাজ যদি সিদ্ধ না হয়, তবে বুদ্ধিমান ব্যক্তি সে কারণে মনে অনুতাপ পোষণ করবে না।
Verse 8
अनुबन्धानपेक्षेत सानुबन्धेषु कर्मसु । सम्प्रधार्य च कुर्वीत न वेगेन समाचरेत्,किसी प्रयोजनसे किये गये कर्मोमें पहले प्रयोजनको समझ लेना चाहिये। खूब सोच- विचारकर काम करना चाहिये, जल्दबाजीसे किसी कामका आरम्भ नहीं करना चाहिये
যে কাজের সঙ্গে পরিণামের যোগ আছে, তাতে আগে তার অনুবন্ধ—অর্থাৎ পরবর্তী সংযুক্ত ফল—বিবেচনা করা উচিত। ভালোভাবে চিন্তা করে কাজ করতে হবে; তাড়াহুড়ো করে কোনো কাজ শুরু করা উচিত নয়।
Verse 9
अनुबन्ध॑ च सम्प्रेक्ष्य विपाकं॑ चैव कर्मणाम् । उत्थानमात्मनश्वैव धीर: कुर्वीत वा न वा,धीर मनुष्यको उचित है कि पहले कर्मोंका प्रयोजन, परिणाम तथा अपनी उन्नतिका विचार करके फिर काम आरम्भ करे या न करे
ধীর ব্যক্তি আগে কাজের অনুবন্ধ, কর্মফল-পরিণতি এবং নিজের উন্নতির সামর্থ্য বিচার করে তারপর কাজ করবে কি করবে না, তা স্থির করবে।
Verse 10
यः प्रमाणं न जानाति स्थाने वृद्धौँ तथा क्षये । कोशे जनपदे दण्डे न स राज्येडवतिषछते,जो राजा स्थिति, लाभ, हानि, खजाना, देश तथा दण्ड आदिकी मात्राको नहीं जानता, वह राज्यपर स्थिर नहीं रह सकता
যে রাজা স্থিতি, বৃদ্ধি ও ক্ষয়ে; কোষে, জনপদে এবং দণ্ডপ্রয়োগে যথাযথ পরিমাপ জানে না, সে রাজ্যে দৃঢ়ভাবে প্রতিষ্ঠিত থাকতে পারে না।
Verse 11
यस्त्वेतानि प्रमाणानि यथोक्तान्यनुपश्यति । युक्तो धर्मार्थयोज्ञनि स राज्यमधिगच्छति,जो इनके प्रमाणोंको उपर्युक्त प्रकारसे ठीक-ठीक जानता है तथा धर्म और अर्थके ज्ञानमें दत्तचित्त रहता है, वह राज्यको प्राप्त करता है
যে ব্যক্তি এই বিচার-প্রমাণগুলিকে যেমন বলা হয়েছে তেমনই যথাযথভাবে পর্যবেক্ষণ করে, এবং ধর্ম ও অর্থের জ্ঞান-প্রয়োগে অবিচল থাকে, সে-ই রাজ্য লাভের যোগ্য হয়।
Verse 12
न राज्यं प्राप्तमित्येव वर्तितव्यमसाम्प्रतम् । श्रियं हविनयो हन्ति जरा रूपमिवोत्तमम्
‘রাজ্য পাইনি’—এই ভাবনায় অনুচিত আচরণ করা উচিত নয়। অবিনয় যেমন লক্ষ্মীকে নষ্ট করে, তেমনি জরা শ্রেষ্ঠ রূপকেও বিনষ্ট করে।
Verse 13
“अब तो राज्य प्राप्त ही हो गया'--ऐसा समझ-कर अनुचित बर्ताव नहीं करना चाहिये। उद्ण्डता सम्पत्तिको उसी प्रकार नष्ट कर देती है, जैसे सुन्दर रूपको बुढ़ापा ।। भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्न॑ मत्स्यो बडिशमायसम् | लोभाभिपाती ग्रसते नानुबन्धमवेक्षते,जैसे मछली बढ़िया खाद्य वस्तुसे ढकी हुई लोहेकी काँटीको लोभमें पड़कर निगल जाती है, उससे होनेवाले परिणामपर विचार नहीं करती (अतएव मर जाती है)
‘এবার তো রাজ্য নিশ্চিত’—এই ভেবে অনুচিত আচরণ করা উচিত নয়। উদ্ধত অবিনয় সম্পদকে নষ্ট করে, যেমন জরা সুন্দর রূপকে নষ্ট করে। যেমন মাছ উৎকৃষ্ট টোপে ঢাকা লোহার বঁড়শি লোভে গিলে ফেলে এবং পরিণাম দেখে না, তেমনি লাভলোভে অন্ধ মানুষ পরবর্তী অনর্থ না ভেবে বিনাশের দিকে ধাবিত হয়।
Verse 14
यच्छव्यं ग्रसितु ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत् । हितं च परिणामे यत् तदाद्यं भूतिमिच्छता,अत: अपनी उन्नति चाहनेवाले पुरुषको वही वस्तु खानी (या ग्रहण करनी) चाहिये, (जो परिणाममें अनिष्टकर न हो अर्थात) जो खानेयोग्य हो तथा खायी जा सके, खाने (या ग्रहण करने)-पर पच सके और पच जानेपर हितकारी हो
যে সমৃদ্ধি চায়, তার উচিত কেবল সেইটিই গ্রহণ করা যা সত্যিই গ্রহণযোগ্য—যা নেওয়া যায়, নেওয়ার পরে ‘পচে’ যায়, এবং পরিণামে কল্যাণকর হয়।
Verse 15
वनस्पतेरपक्वानि फलानि प्रचिनोति यः । स नाप्रोति रसं तेभ्यो बीजं चास्य विनश्यति,जो पेड़से कच्चे फलोंको तोड़ता है, वह उन फलोंसे रस तो पाता नहीं, परंतु उस वृक्षके बीजका नाश हो जाता है
যে গাছের কাঁচা ফল তোলে, সে তাতে প্রকৃত রস পায় না; বরং সেই গাছের বীজই নষ্ট হয়ে যায়।
Verse 16
यस्तु पक््वमुपादत्ते काले परिणतं फलम् | फलाद् रसं स लभते बीजाच्चैव फलं पुन:,परंतु जो समयपर पके हुए फलको ग्रहण करता है, वह फलसे रस पाता है और उस बीजसे पुनः फल प्राप्त करता है
কিন্তু যে যথাসময়ে পাকা ফল গ্রহণ করে, সে ফলের রস পায়; আর সেই বীজ থেকেই পরে আবার ফল লাভ করে।
Verse 17
यथा मधु समादत्ते रक्षन् पुष्पाणि षट्पद:ः । तद्वदर्थान् मनुष्येभ्य आदद्यादविहिंसया,जैसे भौंरा फूलोंकी रक्षा करता हुआ ही उनके मधुका ग्रहण करता है, उसी प्रकार राजा भी प्रजाजनोंको कष्ट दिये बिना ही उनसे धन ले
যেমন ভ্রমর ফুলকে রক্ষা করেই মধু সংগ্রহ করে, তেমনই রাজাও প্রজাদের কষ্ট না দিয়ে তাদের থেকে ধন গ্রহণ করবে।
Verse 18
पुष्पं पुष्पं विचिन्वीत मूलच्छेदं॑ न कारयेत् । मालाकार इवारामे न यथाड्रारकारक:,जैसे माली बगीचेमें एक-एक फूल तोड़ता है, उसकी जड़ नहीं काटता, उसी प्रकार राजा प्रजाकी रक्षापूर्वक उनसे कर ले। कोयला बनानेवालेकी तरह जड़से नहीं काटे
উদ্যানে মালী যেমন এক-একটি ফুল বেছে তোলে, শিকড় কাটে না; তেমনই রাজা প্রজাকে রক্ষা করে সংযমে কর নেবে—কয়লা-কারের মতো গোড়া থেকে কেটে ফেলবে না।
Verse 19
किन्नु मे स्यादिदं कृत्वा किन्नु मे स्यादकुर्वतः । इति कर्माणि संचिन्त्य कुर्याद् वा पुरुषो न वा,इसे करनेसे मेरा क्या लाभ होगा और न करनेसे क्या हानि होगी--इस प्रकार कर्मोंके विषयमें भलीभाँति विचार करके फिर मनुष्य (कर्म) करे या न करे
এটি করলে আমার কী লাভ হবে, আর না করলে কী ক্ষতি—এইভাবে কর্ম সম্বন্ধে ভালো করে ভেবে মানুষ কাজ করবে কি করবে না স্থির করবে।
Verse 20
अनारशभ्या भवन्त्यर्था: केचिन्नित्यं तथागता: । कृत: पुरुषकारो हि भवेद् येषु निरर्थक:,कुछ ऐसे व्यर्थ कार्य हैं, जो नित्य अप्राप्त होनेके कारण आरम्भ करनेयोग्य नहीं होते; क्योंकि उनके लिये किया हुआ पुरुषार्थ भी व्यर्थ हो जाता है
কিছু উদ্দেশ্য স্বভাবতই সর্বদা অপ্রাপ্য; তাই সেগুলি আরম্ভ করা উচিত নয়। কারণ সেসব ক্ষেত্রে আন্তরিক মানবপ্রয়াসও শেষ পর্যন্ত নিষ্ফল হয়ে যায়।
Verse 21
प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थक: । न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्ढं पतिमिव स्त्रिय:,जिसकी प्रसन्नताका कोई फल नहीं और क्रोध भी व्यर्थ है, उसको प्रजा स्वामी बनाना नहीं चाहती--जैसे स्त्री नपुंसकको पति नहीं बनाना चाहती
যার অনুগ্রহ ফলহীন এবং ক্রোধও অর্থহীন, তাকে প্রজারা প্রভু হিসেবে চায় না—যেমন নারীরা নপুংসককে স্বামী হিসেবে চায় না।
Verse 22
कांश्रचिदर्थान् नर: प्राज्ञो लघुमूलान् महाफलान् । क्षिप्रमारभते कर्तु न विध्नयति तादृशान्,जिनका मूल (साधन) छोटा और फल महान हो, बुद्धिमान् पुरुष उनको शीघ्र ही आरम्भ कर देता है; वैसे कामोंमें वह विघ्न नहीं आने देता
যে কাজের উপায় সামান্য অথচ ফল মহৎ, জ্ঞানী ব্যক্তি তা দ্রুত আরম্ভ করে এবং তেমন কাজে বাধা আসতে দেয় না।
Verse 23
ऋणजु पश्यति य: सर्व चक्षुषानुपिबन्निव | आसीनमपि तूष्णीकमनुरज्यन्ति तं प्रजा:
যে সকলকে সরল স্নেহময় দৃষ্টিতে দেখে—যেন চোখ দিয়ে পান করছে—প্রজারা তার প্রতি অনুরক্ত হয়; সে নীরবে বসে থাকলেও।
Verse 24
जो राजा इस प्रकार प्रेमके साथ कोमल दृष्टिसे देखता है, मानो आँखोंसे पीना चाहता है, वह चुपचाप बैठा भी रहे, तो भी प्रजा उससे अनुराग रखती है ।। सुपुष्पित: स्यादफल: फलित: स्याद् दुरारुह: । अपक्व: पक्वसंकाशो न तु शीर्येत कहिचित्,राजा वृक्षकी भाँति अच्छी तरह फूलने (प्रसन्न रहने) पर भी फलसे खाली रहे (अधिक देनेवाला न हो)। यदि फलसे युक्त (देनेवाला) हो तो भी जिसपर चढ़ा न जा सके, ऐसा (पहुँचके बाहर) होकर रहे। कच्चा (कम शक्तिवाला) होनेपर भी पके (शक्तिसम्पन्न)-की भाँति अपनेको प्रकट करे। ऐसा करनेसे वह नष्ट नहीं होता
রাজা যেন বৃক্ষের মতো হয়: সে সুপুষ্পিত হলেও ফলশূন্য থাকুক (অতিদানশীল না হোক); যদি ফলবান হয়, তবু আরোহন-অসাধ্য হোক (সহজে ধরা না দিক); আর যদি অপরিপক্বও হয়, তবু পরিপক্বের ন্যায় প্রতীয়মান হোক। এভাবে চললে সে কখনও বিনষ্ট হয় না।
Verse 25
चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम् | प्रसादयति यो लोक॑ तं लोको<नुप्रसीदति,जो राजा नेत्र, मन, वाणी और कर्म--इन चारोंसे प्रजाको प्रसन्न करता है, उसीसे प्रजा प्रसन्न रहती है
যে রাজা দৃষ্টি, মন, বাক্য ও কর্ম—এই চার উপায়ে প্রজাদের প্রসন্ন করেন, প্রজারাও তেমনি তাঁর প্রতি সদ্ভাব রাখে।
Verse 26
यस्मात् त्रस्यन्ति भूतानि मृगव्याधान्मृगा इव । सागरान्तामपि महीं लब्ध्वा स परिहीयते,जैसे व्याधसे हरिन भयभीत होते हैं, उसी प्रकार जिससे समस्त प्राणी डरते हैं, वह समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राज्य पाकर भी प्रजाजनोंके द्वारा त्याग दिया जाता है
যার ভয়ে সকল প্রাণী শিকারির ভয়ে হরিণের মতো সন্ত্রস্ত হয়, সে সমুদ্র-পর্যন্ত পৃথিবীর রাজ্য পেলেও প্রজাদের দ্বারা পরিত্যক্ত হয়।
Verse 27
पितृपैतामहं राज्यं प्राप्तवान् स्वेन कर्मणा । वायुरभ्रमिवासाद्य भ्रंशयत्यनये स्थित:,अन्यायमें स्थित हुआ राजा बाप-दादोंका राज्य पाकर भी अपने कर्मोंसे उसे इस तरह भ्रष्ट कर देता है, जैसे हवा बादलको छिज्न-भिन्न कर देती है
অন্যায়ে স্থিত রাজা, নিজের প্রচেষ্টায় পিতৃ-পৈতামহিক রাজ্য লাভ করেও, নিজের কর্মে তাকে এমনই ধ্বংস করে—যেমন বায়ু মেঘকে আঘাত করে ছিন্নভিন্ন করে দেয়।
Verse 28
धर्ममाचरतो राज्ञ: सद्धिश्नरितमादित: । वसुधा वसुसम्पूर्णा वर्धते भूतिवर्धिनी,परम्परासे सज्जन पुरुषोंद्वारा किये हुए धर्मका आचरण करनेवाले राजाके राज्यकी पृथ्वी धन-धान्यसे पूर्ण होकर उन्नतिको प्राप्त होती है और उसके ऐश्वर्यको बढ़ाती है
যে রাজা আদিকাল থেকে সজ্জনদের দ্বারা প্রতিষ্ঠিত শিষ্টাচার অনুসারে ধর্ম পালন করেন, তাঁর রাজ্যের ভূমি ধন-ধান্যে পরিপূর্ণ হয়ে সমৃদ্ধি লাভ করে এবং তাঁর ঐশ্বর্য বৃদ্ধি করে।
Verse 29
अथ संत्यजतो धर्ममधर्म चानुतिष्ठत: । प्रतिसंवेष्टते भूमिरग्नौ चर्माहितं यथा,जो राजा धर्मको छोड़ता और अधर्मका अनुष्ठान करता है, उसकी राज्यभूमि आगपर रखे हुए चमड़ेकी भाँति संकुचित हो जाती है
যে রাজা ধর্ম ত্যাগ করে অধর্ম আচরণ করে, তার রাজ্যের ভূমি আগুনে রাখা চামড়ার মতো সঙ্কুচিত হয়ে যায়।
Verse 30
य एव यत्न: क्रियते परराष्ट्रविमर्दने । स एव यत्न: कर्तव्य: स्वराष्ट्रपरिपालने,दूसरे राष्ट्रोंका नाश करनेके लिये जिस प्रकारका प्रयत्न किया जाता है, उसी प्रकारकी तत्परता अपने राज्यकी रक्षाके लिये करनी चाहिये
অন্য রাজ্যকে দমন করতে যে দৃঢ় প্রচেষ্টা করা হয়, সেই একই প্রচেষ্টা—একটুও শৈথিল্য না এনে—নিজ রাজ্যের রক্ষা ও সুশাসনে নিয়োজিত করা উচিত।
Verse 31
धर्मेण राज्यं विन्देत धर्मेण परिपालयेत् । धर्ममूलां श्रियं प्राप्प न जहाति न हीयते,धर्मसे ही राज्य प्राप्त करे और धर्मसे ही उसकी रक्षा करे; क्योंकि धर्ममूलक राज्यलक्ष्मीको पाकर न तो राजा उसे छोड़ता है और न वही राजाको छोड़ती है
ধর্মের দ্বারা রাজ্য লাভ করা উচিত এবং ধর্মের দ্বারাই তা রক্ষা করা উচিত; কারণ ধর্মমূলক রাজলক্ষ্মী লাভ করলে রাজা তাকে ত্যাগ করে না, আর সে লক্ষ্মীও রাজাকে ত্যাগ করে না।
Verse 32
अप्युन्मत्तात् प्रलपतो बालाच्च परिजल्पत: । सर्वत: सारमादद्यादश्मभ्य इव काउ्चनम्,निरर्थक बोलनेवाले, पागल तथा बकवाद करनेवाले बच्चेसे भी सब ओरसे उसी भाँति सार बात ग्रहण करनी चाहिये, जैसे पत्थरोंमेंसे सोना लिया जाता है
অর্থহীন প্রলাপ করা উন্মত্ত ব্যক্তি থেকেও এবং বকবক করা শিশুর কাছ থেকেও চারদিক থেকে সারবস্তু গ্রহণ করা উচিত—যেমন পাথরের ভেতর থেকে সোনা আহরণ করা হয়।
Verse 33
सुव्याहृतानि सूक्तानि सुकृतानि ततस्तत: । संचिन्वन् धीर आसीत शिलाहारी शिलं यथा,जैसे शिलोज्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाला अनाज-का एक-एक दाना चुगता रहता है, उसी प्रकार धीर पुरुषको जहाँ-तहाँसे भावपूर्ण वचनों, सूक्तियों और सत्कर्मोका संग्रह करते रहना चाहिये
যেমন পাথুরে জমি থেকে দানা কুড়িয়ে জীবিকা চালানো ব্যক্তি এক-একটি শস্যকণা সংগ্রহ করে, তেমনই ধীর পুরুষের উচিত যেখানে-সেখানে থেকে সুভাষিত বাক্য, নীতিবচন ও সৎকর্ম সংগ্রহ করে চলা।
Verse 34
गन्धेन गाव: पश्यन्ति वेद: पश्यन्ति ब्राह्मणा: । चारै: पश्यन्ति राजानश्नक्षुभ्यामितरे जना:,इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरनीतिवाक्ये चतुस्त्रिंशो 5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्ााभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत प्रजागरपर्वमें विदुर-नीतिवाक्यविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
গন্ধের দ্বারা গাভী দেখে, বেদের দ্বারা ব্রাহ্মণ দেখে; গুপ্তচরের দ্বারা রাজা দেখে, আর অন্য লোকেরা চোখের দ্বারা দেখে।
Verse 35
गौएँ गन्धसे, ब्राह्मणलोग वेदोंसे, राजा गुप्तचरोंसे और अन्य साधारण लोग आँखोंसे देखा करते हैं ।। भूयांसं लभते क्लेशं या गौर्भवति दुर्दुहा । अथ या सुदुहा राजन नैव तां वितुदन्त्यपि,राजन्! जो गाय बड़ी कठिनाईसे दुहने देती है, वह बहुत क्लेश उठाती है; किंतु जो आसानीसे दूध देती है, उसे लोग कष्ट नहीं देते
গাভী গন্ধে পরিচিত, ব্রাহ্মণ বেদে, রাজা গুপ্তচরে, আর সাধারণ লোক চোখে দেখা প্রমাণে। যে গাভী কষ্টে দুধ দেয়, সে নিজেই বহু ক্লেশ ভোগ করে; কিন্তু যে সহজে দুধ দেয়, তাকে কেউ পীড়ন করে না।
Verse 36
यदतप्तं प्रणमति न तत् संतापयन्त्यपि । यच्च स्वयं नतं दारु न तत् संनमयन्त्यपि,जो धातु बिना गरम किये मुड़ जाते हैं, उन्हें आगमें नहीं तपाते। जो काठ स्वयं झुका होता है, उसे कोई झुकानेका प्रयत्न नहीं करता
যে ধাতু না গরম করেই বেঁকে যায়, তাকে আর আগুনে তাপানো হয় না; আর যে কাঠ নিজে থেকেই নত, তাকে আবার জোর করে নত করা হয় না।
Verse 37
एतयोपमया धीर: संनमेत बलीयसे । इन्द्राय स प्रणमते नमते यो बलीयसे,इस दृष्टान्तके अनुसार बुद्धिमान् पुरुषको अधिक बलवानके सामने झुक जाना चाहिये; जो अधिक बलवानके सामने झुकता है, वह मानो इन्द्रको प्रणाम करता है
এই উপমা অনুসারে ধীর ব্যক্তি শক্তিশালীর কাছে নত হবে; যে অধিক বলবানের সামনে বিনীত হয়, সে যেন ইন্দ্রকে প্রণাম করে।
Verse 38
पर्जन्यनाथा: पशवो राजानो मन्त्रिबान्धवा: | पतयो बान्धवा: स्त्रीणां ब्राह्मणा वेदबान्धवा:,पशुओंके रक्षक या स्वामी हैं बादल, राजाओंके सहायक हैं मन्त्री, स्त्रियोंके बन्धु (रक्षक) हैं पति और ब्राह्मणोंके बान्धव हैं वेद
পশুর নাথ পर्जন্য (বৃষ্টি), রাজার বन्धু মন্ত্রী, নারীর বन्धু স্বামী, আর ব্রাহ্মণের বन्धু বেদ।
Verse 39
सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते । मृजया रक्ष्यते रूप॑ कुल वृत्तेन रक्ष्यते,सत्यसे धर्मकी रक्षा होती है, योगसे विद्या सुरक्षित होती है, सफाईसे (सुन्दर) रूपकी रक्षा होती है और सदाचारसे कुलकी रक्षा होती है
সত্যে ধর্ম রক্ষিত হয়, যোগ-অনুশাসনে বিদ্যা রক্ষিত হয়; পরিচ্ছন্নতায় রূপ রক্ষিত হয়, আর সদাচারে কুল রক্ষিত হয়।
Verse 40
मानेन रक्ष्यते धान्यमश्चान् रक्षत्यनुक्रम: । अभीक्ष्णदर्शनं गाश्च स्त्रियो रक्ष्या: कुचैलत:,भलीभाँति सँभालकर रखनेसे नाजकी रक्षा होती है, फेरनेसे घोड़े सुरक्षित रहते हैं, बारंबार देख-भाल करनेसे गौओंकी तथा मैले वस्त्रोंसे स्त्रियोंकी रक्षा होती है
বিদুর বলেন—যথাযথ মাপজোক ও সম্মানসহকারে রক্ষণ করলে শস্য সুরক্ষিত থাকে; শৃঙ্খলা ও নিয়মে ঘোড়া নিরাপদ থাকে; ঘন ঘন তদারকিতে গরু রক্ষা পায়; আর নারীদের রক্ষা করতে হয় মলিন বস্ত্র ও অশুচি পরিবেশজনিত অনর্থ থেকে।
Verse 41
न कुल वृत्तहीनस्य प्रमाणमिति मे मति: । अन्तेष्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते,मेरा ऐसा विचार है कि सदाचारसे हीन मनुष्यका केवल ऊँचा कुल मान्य नहीं हो सकता; क्योंकि नीच कुलमें उत्पन्न मनुष्यका भी सदाचार श्रेष्ठ माना जाता है
আমার মতে, সদাচারহীন ব্যক্তির জন্য কেবল উচ্চকুল কোনো প্রমাণ নয়; কারণ নীচকুলে জন্মালেও সদাচারই শ্রেষ্ঠ বলে গণ্য হয়।
Verse 42
य ईर्षु: परवित्तेषु रूपे वीर्ये कुलान्वये । सुखसौ भाग्यसत्कारे तस्य व्याधिरनन्तक:ः,जो दूसरोंके धन, रूप, पराक्रम, कुलीनता, सुख, सौभाग्य और सम्मानपर डाह करता है, उसका यह रोग असाध्य है
যে অন্যের ধন, রূপ, বীর্য, কুলপরম্পরা, সুখ, সৌভাগ্য ও সম্মানে ঈর্ষা করে—তার এই ঈর্ষা এক অসাধ্য ব্যাধি।
Verse 43
अकार्यकरणाद् भीत: कार्याणां च विवर्जनात् | अकाले मन्त्रभेदाच्च येन माद्येन्न तत् पिबेत्,न करनेयोग्य काम करनेसे, करनेयोग्य काममें प्रमाद करनेसे तथा कार्यसिद्धि होनेके पहले ही मन्त्र प्रकट हो जानेसे डरना चाहिये और जिससे नशा चढ़े, ऐसी मादक वस्तु नहीं पीनी चाहिये
অকর্তব্য কাজ করা, কর্তব্যে অবহেলা করা, এবং কাজ সিদ্ধ হওয়ার আগেই গোপন পরামর্শ ফাঁস হয়ে যাওয়া—এ সব থেকে ভয় করা উচিত; আর যা নেশা আনে, এমন মাদক দ্রব্য পান করা উচিত নয়।
Verse 44
विद्यामदो धनमदस्तृतीयोडभिजनो मद: । मदा एते5वलिप्तानामेत एव सतां दमा:,विद्याका मद, धनका मद और तीसरा ऊँचे कुलका मद है। ये घमंडी पुरुषोंके लिये तो मद हैं, परंतु ये (विद्या, धन और कुलीनता) ही सज्जन पुरुषोंके लिये दमके साधन हैं
বিদ্যার গর্ব, ধনের গর্ব এবং তৃতীয়ত উচ্চকুলের গর্ব—এগুলো উদ্ধতদের কাছে নেশা; কিন্তু সজ্জনদের কাছে এই বিদ্যা, ধন ও কুলীনতাই সংযমের উপায় হয়ে ওঠে।
Verse 45
असन्तो< भ्यर्थिता: सद्धिः क्वचित्कार्ये कदाचन । मन्यन्ते सन््तमात्मानमसन्तमपि विश्रुतम्,कभी किसी कार्यमें सज्जनोंद्वारा प्रार्थित होनेपर दुष्टलोग अपनेको प्रसिद्ध दुष्ट जानते हुए भी सज्जन मानने लगते हैं
কখনও কোনো কাজে সজ্জনদের অনুরোধ পেলে দুষ্ট লোকেরা—নিজেদের দুষ্ট বলে প্রসিদ্ধ জেনেও—নিজেকেই সজ্জন মনে করতে শুরু করে।
Verse 46
गतिरात्मवतां सन्त: सन््त एव सतां गति: । असतां च गति: सन््तो न त्वसन्त: सतां गति:,मनस्वी पुरुषोंको सहारा देनेवाले संत हैं; संतोंके भी सहारे संत ही हैं, दुष्टोंकी भी सहारा देनेवाले संत हैं, पर दुष्टलोग संतोंको सहारा नहीं देते
আত্মসংযমীদের আশ্রয় সজ্জন; আর সজ্জনের আশ্রয়ও সজ্জনই। দুষ্টদেরও আশ্রয় সজ্জন হন, কিন্তু দুষ্টরা কখনও সজ্জনের আশ্রয় হয় না।
Verse 47
जिता सभा वस्त्रवता मिष्टाशा गोमता जिता । अध्वा जितो यानवता सर्व शीलवता जितम्,अच्छे वस्त्रवाला सभाको जीतता (अपना प्रभाव जमा लेता) है; जिसके पास गौ है, वह (दूध, घी, मक्खन, खोवा आदि पदार्थोके आस्वादनसे) मीठे स्वादकी आकांक्षाको जीत लेता है, सवारीसे चलनेवाला मार्गको जीत लेता (तय कर लेता) है और शीलस्वभाववाला पुरुष सबपर विजय पा लेता है
সু-বস্ত্রধারী সভায় প্রভাব বিস্তার করে; যার গোধন আছে সে মিষ্ট ও সমৃদ্ধ স্বাদের লালসা জয় করে; যার বাহন আছে সে পথকে জয় করে; আর শীলবান পুরুষ সর্বত্র বিজয়ী হয়।
Verse 48
शीलं प्रधान पुरुषे तद् यस्येह प्रणश्यति । न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभि:,पुरुषमें शील ही प्रधान है; जिसका वही नष्ट हो जाता है, इस संसारमें उसका जीवन, धन और बन्धुओंसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता
মানুষের মধ্যে শীলই প্রধান; যার শীল এ জগতে নষ্ট হয়ে যায়, তার কাছে না জীবনের কোনো মূল্য থাকে, না ধনের, না আত্মীয়স্বজনের।
Verse 49
आढ्यानां मांसपरमं मध्यानां गोरसोत्तरम् तैलोत्तरं दरिद्राणां भोजनं भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ। धनोन्मत्त (तामस स्वभाववाले) पुरुषोंके भोजनमें मांसकी, मध्यम श्रेणीवालोंके भोजनमें गोरसकी तथा दरिद्रोंक भोजनमें तेलकी प्रधानता होती है
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! ধনীদের আহারে মাংসের প্রাধান্য, মধ্যবিত্তদের আহারে গোরস (দুধাদি) প্রাধান্য, আর দরিদ্রদের আহারে তেলের প্রাধান্য দেখা যায়।
Verse 50
सम्पन्नतरमेवान्नं दरिद्रा भुज्जते सदा । क्षुत् स्वादुतां जनयति सा चाढ्येषु सुदुर्लभा,दरिद्र पुरुष सदा स्वादिष्ट भोजन ही करते हैं; क्योंकि भूख उनके भोजनमें (विशेष) स्वाद उत्पन्न कर देती है और वह भूख धनियोंके लिये सर्वथा दुर्लभ है
দরিদ্রেরা সর্বদা তাদের অন্নকে যেন অতি উৎকৃষ্ট—এইভাবেই ভোজন করে; কারণ ক্ষুধাই তাতে রুচি ও মাধুর্য জাগায়, আর সেই ক্ষুধা ধনীদের মধ্যে অত্যন্ত দুর্লভ।
Verse 51
प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते जीर्यन्त्यपि हि काष्ठानि दरिद्राणां महीपते,राजन! संसारमें धनियोंको प्रायः भोजनको पचानेकी शक्ति नहीं होती, किंतु दरिद्रोंके पेटमें काठ भी पच जाते हैं
হে রাজন! এই জগতে ধনীদের প্রায়ই ভোগ ও পরিপাকের শক্তি থাকে না; কিন্তু দরিদ্রদের উদরে তো কাঠও হজম হয়ে যায়।
Verse 52
अवृत्तिर्भयमन्त्यानां मध्यानां मरणाद् भयम् । उत्तमानां तु मर्त्यानामवमानात् परं भयम्,अधम पुरुषोंको जीविका न होनेसे भय लगता है, मध्यम श्रेणीके मनुष्योंको मृत्युसे भय होता है; परंतु उत्तम पुरुषोंको अपमानसे ही महान् भय होता है
অধমদের ভয় জীবিকার অভাব; মধ্যমদের ভয় মৃত্যু; কিন্তু উত্তম মানুষের কাছে অপমানের চেয়ে বড় ভয় আর নেই।
Verse 53
ऐश्वर्यमदपापिष्ठा मदा: पानमदादय: । ऐश्वर्यमदमत्तो हि नापतित्वा विबुध्यते,यों तो (मादक वस्तुओंके) पीनेका नशा आदि भी नशा ही है, किंतु ऐश्वर्यका नशा तो बहुत ही बुरा है; क्योंकि ऐश्वर्यके मदसे मतवाला पुरुष भ्रष्ट हुए बिना होशमें नहीं आता
পানাদি নেশাও নেশাই বটে; কিন্তু ঐশ্বর্যের মদই সর্বাধিক পাপময়। কারণ ঐশ্বর্য-মদে উন্মত্ত ব্যক্তি পতিত না হলে জ্ঞান ফিরে পায় না।
Verse 54
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु वर्तमानैरनिग्रहै: । तैरयं ताप्यते लोको नक्षत्राणि ग्रहैरिव,वशमें न होनेके कारण विषयोंमें रमनेवाली इन्द्रियोंसे यह संसार उसी भाँति कष्ट पाता है, जैसे सूर्य आदि ग्रहोंसे नक्षत्र तिरस्कृत हो जाते हैं
ইন্দ্রিয়গুলি যখন সংযমহীন হয়ে বিষয়ের মধ্যে বিচরণ করে, তখন তারা এই জগতকে দগ্ধ করে—যেমন গ্রহের তেজে নক্ষত্র ম্লান হয়ে যায়।
Verse 55
यो जित: पञठ्चवर्गेण सहजेनात्मकर्षिणा । आपदस्तस्य वर्धन्ते शुक्लपक्ष इवोडुराट्,जो मनुष्य जीवोंको वशमें करनेवाली सहज पाँच इन्द्रियोंसे जीत लिया गया, उसकी आपत्तियाँ शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति बढ़ती हैं
যে মানুষ আত্মাকে বাহিরের দিকে টেনে নেওয়া সহজ পাঁচ ইন্দ্রিয়ের দলে পরাভূত হয়, তার বিপদ শ্বেতপক্ষের চন্দ্রের মতো ক্রমে ক্রমে বৃদ্ধি পায়।
Verse 56
अविजित्य य आत्मानममात्यान् विजिगीषते । अमित्रान् वाजितामात्य: सोडवश: परिहीयते,इन्द्रियोंसहित मनको जीते बिना ही जो मन्त्रियोंको जीतनेकी इच्छा करता है या मन्त्रियोंको अपने अधीन किये बिना शत्रुको जीतना चाहता है, उस अजितेन्द्रिय पुरुषको सब लोग त्याग देते हैं
যে ব্যক্তি প্রথমে নিজেকে জয় না করেই মন্ত্রীদের বশ করতে চায়, অথবা মন্ত্রীদের নিয়ন্ত্রণ না করে শত্রু জয় করতে উদ্যত হয়—সে অজিতেন্দ্রিয় মানুষ অসহায় হয়ে ক্ষয়প্রাপ্ত হয় এবং সকলের দ্বারা পরিত্যক্ত হয়।
Verse 57
आत्मानमेव प्रथम द्वेष्यरूपेण यो जयेत् । ततोअमात्यानमित्रांश्व न मोघं विजिगीषते,जो पहले इन्द्रियोंसहित मनको ही शत्रु समझकर जीत लेता है, उसके बाद यदि वह मन्त्रियों तथा शत्रुओंको जीतनेकी इच्छा करे तो उसे सफलता मिलती है
যে ব্যক্তি প্রথমে মন ও ইন্দ্রিয়সমেত নিজের আত্মাকেই শত্রুরূপে জয় করে, তারপর যদি সে মন্ত্রী ও শত্রুদের জয় করতে চায়, তবে তার চেষ্টা বৃথা যায় না—সে সাফল্য লাভ করে।
Verse 58
वश्येन्द्रियं जितात्मानं धृतदण्डं विकारिषु | परीक्ष्य कारिणं धीरमत्यन्तं श्रीनिषेवते,इन्द्रियों तथा मनको जीतनेवाले, अपराधियोंको दण्ड देनेवाले और जाँच-परखकर काम करनेवाले धीर पुरुषकी लक्ष्मी अत्यन्त सेवा करती है
যার ইন্দ্রিয় সংযত, যে নিজেকে জয় করেছে, যে অপরাধীদের প্রয়োজনে দণ্ড দেয় এবং বিচার-বিবেচনা করে কাজ করে—সেই ধীর পুরুষকে লক্ষ্মী অতি নিবিড়ভাবে আশ্রয় করে।
Verse 59
रथ: शरीरं पुरुषस्य राज- न्नात्मा नियन्तेन्द्रियाण्यस्य चाश्वा: | तैरप्रमत्त: कुशली सदश्नै- दन्ति: सुखं याति रथीव धीर:,राजन! मनुष्यका शरीर रथ है, बुद्धि सारथि है और इन्द्रियाँ इसके घोड़े हैं। इनको वशमें करके सावधान रहनेवाला चतुर एवं धीर पुरुष काबूमें किये हुए घोड़ोंसे रथीकी भाँति सुखपूर्वक संसारपथका अतिक्रमण करता है
রাজন! মানুষের শরীর রথ, অন্তরাত্মা তার নিয়ন্তা, আর ইন্দ্রিয়সমূহ তার অশ্ব। যে ব্যক্তি এই অশ্বগুলিকে বশে রেখে সতর্ক, কুশলী ও ধীর থাকে, সে সংযত অশ্বযুক্ত রথীর মতো সুখে সংসারপথ অতিক্রম করে।
Verse 60
एतान्यनिगृहीतानि व्यापादयितुमप्यलम् । अविधेया इवादान्ता हया: पथि कुसारथिम्,शिक्षा न पाये हुए तथा काबूमें न आनेवाले घोड़े जैसे मूर्ख सारथिको मार्गमें मार गिराते हैं, वैसे ही ये इन्द्रियाँ वशमें न रहनेपर पुरुषको मार डालनेमें भी समर्थ होती हैं
এই ইন্দ্রিয়গুলি যদি সংযত না থাকে, তবে মানুষের বিনাশ ঘটাতেও সক্ষম। যেমন পথে প্রশিক্ষণহীন, দুর্দমনীয় ঘোড়া অযোগ্য সারথিকে ফেলে দিয়ে মেরে ফেলে, তেমনি নিয়ন্ত্রণহীন ইন্দ্রিয়ও মানুষকে সর্বনাশের দিকে ঠেলে দেয়।
Verse 61
अनर्थमर्थतः पश्यन्नर्थ चैवाप्यनर्थत: । इन्द्रियेरजितैर्बाल: सुदुःखं मनन््यते सुखम्,इन्द्रियोंको वशमें न रखनेके कारण अर्थको अनर्थ और अनर्थको अर्थ समझकर अज्ञानी पुरुष बहुत बड़े दुःखको भी सुख मान बैठता है
যে মূঢ় ব্যক্তি ইন্দ্রিয়কে জয় করতে পারেনি, সে অনর্থকে অর্থ আর প্রকৃত অর্থকে অনর্থ বলে দেখে; ইন্দ্রিয়ের বিভ্রান্তিতে সে তীব্র দুঃখকেও সুখ বলে মনে করে।
Verse 62
धर्मार्थो यः परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशानुग: । श्रीप्राणधनदारेभ्य: क्षिप्रं स परिहीयते,जो धर्म और अर्थका परित्याग करके इन्द्रियोंके वशमें हो जाता है, वह शीघ्र ही ऐश्वर्य, प्राण, धन तथा स्त्रीसे भी हाथ धो बैठता है
যে ব্যক্তি ধর্ম ও অর্থ ত্যাগ করে ইন্দ্রিয়ের অধীন হয়ে চলে, সে অচিরেই শ্রী, প্রাণ, ধন ও দারার—সবকিছুর থেকেই বিচ্যুত হয়।
Verse 63
अर्थनामीश्वरो यः स्यादिन्द्रियाणामनी श्वर: । इन्द्रियाणामनैश्वयदिदश्वर्याद् भ्रश्यते हि सः,जो अधिक धनका स्वामी होकर भी इन्द्रियोॉंपर अधिकार नहीं रखता, वह इन्द्रियोंको वशमें न रखनेके कारण ही एऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाता है
যে ব্যক্তি ধনের অধিপতি হয়েও ইন্দ্রিয়ের অধিপতি নয়, সে ইন্দ্রিয়-অধীনতার কারণেই নিজের ঐশ্বর্য থেকে পতিত হয়।
Verse 64
आत्मना55त्मानमन्विच्छेन्मनोबुद्धीन्द्रियैर्यतै: । आत्मा होवात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:,मन, बुद्धि और इन्द्रियोंको अपने अधीनकर अपनेसे ही अपने आत्माको जाननेकी इच्छा करे; क्योंकि आत्मा ही अपना बन्धु और आत्मा ही अपना शत्रु है
মন, বুদ্ধি ও ইন্দ্রিয়কে সংযত করে মানুষ নিজের দ্বারাই নিজের আত্মাকে অনুসন্ধান করুক; কারণ আত্মাই আত্মার বন্ধু, আর আত্মাই আত্মার শত্রু।
Verse 65
बन्धुरात्मा55त्मनस्तस्य येनैवात्मा55त्मना जित: । स एव नियतो बन्धु: स एवानियतो रिपु:,जिसने स्वयं अपने आत्माको ही जीत लिया है, उसका आत्मा ही उसका बन्धु है। वही आत्मा जीता गया होनेपर सच्चा बन्धु और वही न जीता हुआ होनेपर शत्रु है
যে আত্মসংযমে নিজের আত্মাকে জয় করেছে, তার আত্মাই তার প্রকৃত বন্ধু; আর সেই আত্মাই যদি অনিয়ন্ত্রিত থাকে, তবে শত্রু হয়ে তাকে সর্বনাশের পথে টেনে নিয়ে যায়।
Verse 66
क्षुद्राक्षेगेव जालेन झषावपिहितावुरू । कामश्न राजन् क्रोधश्व तौ प्रज्ञानं विलुम्पत:,राजन! जिस प्रकार सूक्ष्म छेदवाले जालमें फँसी हुई दो बड़ी-बड़ी मछलियाँ मिलकर जालको काट डालती हैं, उसी प्रकार ये काम और क्रोध--दोनों विवेकको लुप्त कर देते हैं
রাজন! যেমন সূক্ষ্ম ছিদ্রযুক্ত জালে ধরা দুই বৃহৎ মাছ ছটফট করে জাল ছিঁড়ে ফেলে, তেমনি কাম ও ক্রোধ—এই দুই—মানুষের প্রজ্ঞা হরণ করে।
Verse 67
समवेक्ष्येह धर्मार्थी सम्भारान् योडधिगच्छति । स वै सम्भूतसम्भार: सततं सुखमेधते,जो इस जगतमें धर्म तथा अर्थका विचार करके विजयसाधन-सामग्रीका संग्रह करता है, वही उस सामग्रीसे युक्त होनेके कारण सदा सुखपूर्वक समृद्धिशाली होता रहता है
যে ব্যক্তি এই জগতে ধর্ম ও অর্থ বিচার করে সাফল্যের উপকরণ সংগ্রহ করে, সে যথাযথ প্রস্তুতিতে সমৃদ্ধ হয়ে সর্বদা সুখে উন্নতি লাভ করে।
Verse 68
यः पज्चाभ्यन्तराउ्छत्रूनविजित्य मनोमयान् । जिगीषति रिपूनन्यान् रिपवो5भिभवन्ति तम्,जो चित्तके विकारभूत पाँच इन्द्रियरूपी भीतरी शत्रुओंको जीते बिना ही दूसरे शत्रुओंको जीतना चाहता है, उसे शत्रु पराजित कर देते हैं
যে ব্যক্তি মনের জন্ম দেওয়া পাঁচ অন্তঃশত্রুকে জয় না করেই বাহ্য শত্রুদের জয় করতে চায়, তাকে সেই শত্রুরাই পরাভূত করে।
Verse 69
दृश्यन्ते हि महात्मानो बध्यमाना: स्वकर्मभि: । इन्द्रियाणामनीशत्वाद् राजानो राज्यवि श्रमै:,इन्द्रियोंपर अधिकार न होनेके कारण बड़े-बड़े साधु भी अपने कर्मोंसे तथा राजालोग राज्यके भोग-विलासोंसे बँधे रहते हैं
দেখা যায়, মহাত্মারাও নিজেদের কর্মফলে আবদ্ধ হন; আর রাজারা ইন্দ্রিয়-অসংযমের কারণে রাজ্যভোগ-বিলাসের মোহে বাঁধা পড়ে থাকেন।
Verse 70
असंत्यागात् पापकृतामपापां- स्तुल्यो दण्ड: स्पृशते मिश्रभावात् | शुष्केणाद दहाते मिश्रभावात् तस्मात् पापै: सह सन्धिं न कुर्यात्,पापाचारी दुष्टोंका त्याग न करके उनके साथ मिले रहनेसे निरपराध सज्जनोंको भी उन (पापियों)-के समान ही दण्ड प्राप्त होता है, जैसे सूखी लकड़ीमें मिल जानेसे गीली भी जल जाती है; इसलिये दुष्ट पुरुषोंक साथ कभी मेल न करे
পাপাচারীদের ত্যাগ না করলে তাদের সঙ্গ ও মিশ্রতার ফলে নির্দোষ সজ্জনও তাদেরই মতো দণ্ডভোগ করে। যেমন শুকনো কাঠের সঙ্গে মিশলে ভেজা কাঠও পুড়ে যায়, তেমনি দুষ্টদের সঙ্গে কখনও সন্ধি বা ঘনিষ্ঠতা করা উচিত নয়।
Verse 71
निजानुत्पतत: शत्रून्ू पजच पउठ्चप्रयोजनान् । यो मोहान्न निगृह्नाति तमापद् ग्रसते नरम्,जो पाँच विषयोंकी ओर दौड़नेवाले अपने पाँच इन्द्रियरूपी शत्रुओंको मोहके कारण वशमें नहीं करता, उस मनुष्यको विपत्ति ग्रस लेती है
যে মানুষ মোহের বশে পাঁচ বিষয়ের দিকে ধাবমান নিজের পাঁচ ইন্দ্রিয়রূপ শত্রুকে সংযত করতে পারে না, তাকে বিপদ গ্রাস করে।
Verse 72
अनसूया<<्जवं शौचं संतोष: प्रियवादिता | दम: सत्यमनायासो न भवन्न्ति दुरात्मनाम्,गुणोंमें दोष न देखना, सरलता, पवित्रता, संतोष, प्रिय वचन बोलना, इन्द्रियदमन, सत्यभाषण तथा सरलता--ये गुण दुरात्मा पुरुषोंमें नहीं होते
দোষ না দেখা, সরলতা, পবিত্রতা, সন্তোষ, মধুর বাক্য, ইন্দ্রিয়সংযম, সত্যভাষণ ও নিষ্কপট আচরণ—এই গুণগুলি দুষ্টস্বভাব মানুষের মধ্যে জন্মায় না।
Verse 73
आत्मज्ञानमसंरम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता | वाक् चैव गुप्ता दानं॑ च नैतान्यन्त्येषु भारत,भारत! आत्मज्ञान, अक्रोध, सहनशीलता, धर्म-परायणता, वचनकी रक्षा तथा दान--ये गुण अधम पुरुषोंमें नहीं होते
হে ভারত! আত্মজ্ঞান, অক্রোধ, সহিষ্ণুতা, ধর্মে নিত্য স্থিতি, সংযত বাক্য এবং দান—এই গুণগুলি অধমচিত্ত মানুষের মধ্যে থাকে না।
Verse 74
आक्रोशपरिवादाभ्यां विहिंसन्त्यबुधा बुधान् । वक्ता पापमुपादत्ते क्षममाणो विमुच्यते,मूर्ख मनुष्य विद्वानोंको गाली और निन्दासे कष्ट पहुँचाते हैं। गाली देनेवाला पापका भागी होता है और क्षमा करनेवाला पापसे मुक्त हो जाता है
মূর্খেরা গালি ও নিন্দার দ্বারা জ্ঞানীদের আঘাত করে। যে গালি দেয় সে পাপ গ্রহণ করে, আর যে ক্ষমা করে সে সেই পাপ থেকে মুক্ত হয়।
Verse 75
हिंसा बलमसाधूनां राज्ञां दण्डविधिबलम् | शुश्रूषा तु बल॑ स्त्रीणां क्षमा गुणवतां बलम्,दुष्ट पुरुषोंका बल है हिंसा, राजाओंका बल है दण्ड देना, स्त्रियोंका बल है सेवा और गुणवानोंका बल है क्षमा
দুষ্টদের বল হলো হিংসা; রাজাদের বল হলো ন্যায়সঙ্গত দণ্ডবিধান; নারীদের বল হলো সেবা-পরায়ণতা; আর গুণবানদের বল হলো ক্ষমা।
Verse 76
वाक्संयमो हि नृपते सुदुष्करतमो मत: । अर्थवच्च विचित्र च न शक््यं बहु भाषितुम्,राजन! वाणीका पूर्ण संयम तो बहुत कठिन माना ही गया है; परंतु विशेष अर्थयुक्त और चमत्कारपूर्ण वाणी भी अधिक नहीं बोली जा सकती (इसलिये अत्यन्त दुष्कर होनेपर भी वाणीका संयम करना ही उचित है)
হে রাজন! বাক্সংযম সর্বাধিক দুরূহ বলে মানা হয়; আর অর্থবহ ও বিচিত্র বাক্যও অধিক বলা যায় না—অতএব কঠিন হলেও বাক্সংযমই যথোচিত।
Verse 77
अभ्यावहति कल्याणं विविधं वाक् सुभाषिता | सैव दुर्भाषिता राजन्ननर्थायोपपद्यते,राजन! मधुर शब्दोंमें कही हुई बात अनेक प्रकारसे कल्याण करती है; किंतु वही यदि कट शब्दोंमें कही जाय तो महान् अनर्थका कारण बन जाती है
হে রাজন! সুভাষিত বাক্য নানা প্রকার কল্যাণ আনে; কিন্তু সেই একই কথা যদি কটু ও অসংযত ভাষায় বলা হয়, তবে তা মহা অনর্থের কারণ হয়ে দাঁড়ায়।
Verse 78
रोहते सायकैर्िंद्ध वनं परशुना हतम् । वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम्,बाणोंसे बिंधा हुआ तथा फरसेसे काटा हुआ वन भी अंकुरित हो जाता है; किंतु कट वचन कहकर वाणीसे किया हुआ भयानक घाव नहीं भरता
তীরে বিদ্ধ ও কুঠারে কাটা বনও আবার গজিয়ে ওঠে; কিন্তু কটু বাক্যে বাণী দ্বারা দেওয়া ভয়ংকর ক্ষত আর সারে না।
Verse 79
कर्णिनालीकनाराचान् निर्हरन्ति शरीरत: । वाक्शल्यस्तु न निर्हर्तु शक्यो हृदिशयो हि सः
কাঁটাযুক্ত ও লৌহমুণ্ড বাণ শরীর থেকে টেনে বের করা যায়; কিন্তু নিষ্ঠুর বাক্যের শল্য বের করা যায় না, কারণ তা হৃদয়ে গেঁথে থাকে।
Verse 80
कर्णि, नालीक और नाराच नामक बाणोंको शरीरसे निकाल सकते हैं, परंतु कटु वचनरूपी बाण नहीं निकाला जा सकता; क्योंकि वह हृदयके भीतर धँस जाता है ।। वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहत: शोचति रात्र्यहानि । परस्य नामर्मसु ते पतन्ति तान् पण्डितो नावसूजेत् परेभ्य:,कट वचनरूपी बाण मुखसे निकलकर दूसरोंके मर्मस्थानपर ही चोट करते हैं; उनसे आहत मनुष्य रात-दिन घुलता रहता है। अतः विद्वान पुरुष दूसरोंपर उनका प्रयोग न करे
বিদুর বললেন— কর্ণী, নালীক ও নারাচ প্রভৃতি তীর শরীর থেকে টেনে বের করা যায়; কিন্তু কটু বাক্যরূপ তীর বের করা যায় না, কারণ তা হৃদয়ের গভীরে গেঁথে যায়। বাক্যতীর মুখ থেকে ছুটে বেরোয়; তাতে আহত মানুষ দিন-রাত শোকে দগ্ধ হয়। সেগুলি অপরের মর্মস্থানে আঘাত করে; অতএব পণ্ডিত ব্যক্তি অন্যের প্রতি এমন বাক্য নিক্ষেপ করবে না।
Verse 81
यस्मै देवा: प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम् | बुद्धि तस्पापकर्षन्ति सोडवाचीनानि पश्यति,देवतालोग जिसे पराजय देते हैं, उसकी बुद्धिको पहले ही हर लेते हैं; इससे वह नीच कर्मोंपर ही अधिक दृष्टि रखता है
বিদুর বললেন— যাকে দেবতারা পরাজয় দিতে চান, তার বুদ্ধি তারা আগে থেকেই হরণ করেন; তখন সে বিবেকহীন হয়ে নীচ ও অনুচিত কর্মেই মন স্থির করে এবং সেই পথেই বিনাশের দিকে এগোয়।
Verse 82
बुद्धी कलुषभूतायां विनाशे प्रत्युपस्थिते । अनयो नयसंकाशो हृदयान्नापसर्पति,विनाशकाल उपस्थित होनेपर बुद्धि मलिन हो जाती है; फिर तो न्यायके समान प्रतीत होनेवाला अन्याय हृदयसे बाहर नहीं निकलता
বিদুর বললেন— বিনাশ যখন নিকটে আসে, তখন বুদ্ধি কলুষিত হয়ে যায়; তখন ন্যায়ের মতো দেখায় এমন অন্যায় হৃদয় থেকে সরে যায় না—সেখানেই লেগে থাকে, যেন সেটাই নীতি।
Verse 83
सेय॑ बुद्धि: परीता ते पुत्राणां भरतर्षभ । पाण्डवानां विरोधेन न चैनानवबुध्यसे,भरतश्रेष्ठ) आपके पुत्रोंकी वह बुद्धि पाण्डवोंके प्रति विरोधसे व्याप्त हो गयी है; आप इन्हें पहचान नहीं रहे हैं
বিদুর বললেন— হে ভরতশ্রেষ্ঠ! তোমার পুত্রদের বুদ্ধি পাণ্ডবদের প্রতি বৈরিতায় আচ্ছন্ন হয়েছে; তাই তুমি তাদের প্রকৃত অবস্থা যথার্থভাবে বুঝতে পারছ না।
Verse 84
राजा लक्षणसम्पन्नस्त्रैलोक्यस्यापि यो भवेत् | शिष्यस्ते शासिता सोडस्तु धृतराष्ट्र युधिष्ठिर:
বিদুর বললেন— হে ধৃতরাষ্ট্র! কোনো রাজা যদি সকল রাজলক্ষণে সম্পন্ন হয়ে ত্রিলোকেরও অধিপতি হন, তবু তাঁর শাসন-শৃঙ্খলা গ্রহণ করা উচিত। যুধিষ্ঠির তোমার শিষ্য—সে উপদেশে চলে, শাসনে নিয়ন্ত্রিত হয়; অতএব মোহ ত্যাগ করে পরামর্শমতে রাজ্য পরিচালনা করো।
Verse 85
महाराज धुतराष्ट्र!् जो राजलक्षणोंसे सम्पन्न होनेके कारण त्रिभुवनका भी राजा हो सकता है, वह आपका आज्ञाकारी युधिष्ठिर ही इस पृथ्वीका शासक होनेयोग्य है ।। अतीत्य सर्वान् पुत्रांस्ते भागधेयपुरस्कृत: । तेजसा प्रज्ञया चैव युक्तो धर्मार्थतत्त्ववित्,वह धर्म तथा अर्थके तत्त्वको जाननेवाला, तेज और बुद्धिसे युक्त, पूर्ण सौभाग्यशाली तथा आपके सभी पुत्रोंसे बढ़-चढ़कर है
বিদুর বললেন—হে মহারাজ ধৃতরাষ্ট্র! যিনি রাজলক্ষণে সম্পন্ন হয়ে ত্রিভুবনও শাসন করতে সক্ষম, আপনার আদেশ মান্যকারী সেই যুধিষ্ঠিরই এই পৃথিবী শাসনের যোগ্য। তিনি আপনার সকল পুত্রকে অতিক্রম করে ভাগ্যশালী, তেজ ও প্রজ্ঞায় যুক্ত, এবং ধর্ম ও অর্থের তত্ত্বজ্ঞ।
Verse 86
अनुक्रोशादानृशंस्याद् यो$सौ धर्मभृतां वर: । गौरवात् तव राजेन्द्र बहून् क्लेशांस्तितिक्षति,राजेन्द्र! धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर दया, सौम्यभाव तथा आपके प्रति गौरव-बुद्धिके कारण बहुत कष्ट सह रहा है
বিদুর বললেন—হে রাজেন্দ্র! ধর্মধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সেই যুধিষ্ঠির করুণা ও অক্রূর সৌম্যভাবের বশে, আর আপনার প্রতি গভীর শ্রদ্ধা-গৌরববোধের কারণে বহু কষ্ট সহ্য করছেন।
Dhṛtarāṣṭra’s conflict between attachment-driven political choices and the obligation to enact justice and stability—intensified by fear of Saṃjaya’s forthcoming public message.
Wise leadership is defined by self-mastery, truthful and measured speech, confidentiality in counsel, and prioritizing dharma and artha over impulsive desire; these traits prevent personal anxiety from becoming state disorder.
No formal phalaśruti is stated; the chapter instead embeds pragmatic ‘results’ language—linking virtues like truth, restraint, and secrecy of counsel to social trust, political stability, and avoidance of ruin.