
अध्याय २९ — वासुदेव–संजय संवादः (Karma, Varṇa-Dharma, and the Ethics of Governance)
Upa-parva: Sañjaya–Vāsudeva Saṃvāda (Udyoga Parva: Ethical Counsel on Karma, Varṇa-Dharma, and Court Failure)
Krishna addresses Saṃjaya with a stated wish for the Pāṇḍavas’ non-destruction and welfare, while also expressing regard for Dhṛtarāṣṭra’s prosperity—framing his stance as peace-oriented yet principled. He argues that true śama (conciliation) is difficult when the Kuru side is driven by acquisitiveness, and questions Saṃjaya’s role if he withholds dharmic counsel in service of partisan court interests. The chapter advances a karma-centered doctrine: disciplined action produces tangible results in the world, illustrated through cosmic agents (sun, moon, wind, fire, earth, waters) whose constancy is portrayed as ‘work’ sustaining order. Krishna then enumerates varṇa-dharma: the Brāhmaṇa’s learning, sacrifice, giving, teaching; the Kṣatriya’s protection, lawful rule, sacrifice; the Vaiśya’s agriculture, trade, wealth stewardship; and the Śūdra’s service and diligence. He critiques predatory appropriation (theft by stealth or force) as blameworthy, recalls the Kuru court’s earlier failure to restrain the Draupadī humiliation, and frames restitution of the Pāṇḍavas’ share as ethically primary. Metaphors of trees, forest, and tigers depict mutual dependence between rulers and warrior-protectors, urging Dhṛtarāṣṭra to act appropriately: accept peace if possible, and recognize that continued injustice invites destructive consequences.
Chapter Arc: सभा के मध्य संजय को विदा करते हुए युधिष्ठिर धर्म और मर्यादा के साथ दूत-कार्य का आरम्भ कराते हैं—“अनुज्ञातः संजय स्वस्ति गच्छ”। → युधिष्ठिर संजय को विस्तृत संदेश सौंपते हैं: कृष्ण, भीम, अर्जुन, माद्रीसुत (नकुल/सहदेव), सात्यकि, चेकितान आदि का कुशल-समाचार; ब्राह्मण, तपस्वी, भिक्षु, वनवासी ऋषियों का अभिवादन; भीष्म जैसे कुरुवृद्धों के चरणों में निवेदन; और कुरु-युवाओं, पुत्र-पौत्रों, भ्राताओं तथा विविध दिशाओं के शूरवीरों का हाल पूछने की आज्ञा। → युधिष्ठिर का कठोरतम संदेश दुर्योधन के लिए उभरता है—उसकी देह-हृदय को जलाने वाली ‘कामना’ (कुरुओं को निष्पत्न करने की लालसा) को लक्ष्य कर चेतावनी: इस हठ की कोई युक्ति नहीं; या तो न्यायोचित अंश दे, या युद्ध के लिए प्रस्तुत हो। → संजय को स्पष्ट निर्देश मिलते हैं कि वह सबके प्रति शिष्टाचार निभाते हुए भीष्म-सभा और धृतराष्ट्र-दुर्योधन तक पांडवों का धर्मयुक्त, पर अडिग, पक्ष पहुँचा दे। → संजय हस्तिनापुर में यह संदेश सुनाएगा—पर क्या धृतराष्ट्र और दुर्योधन इसे स्वीकार करेंगे, या हठ युद्ध को अवश्यंभावी बना देगा?
Verse 1
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५९ “लोक हैं।] - इस प्रकार यद्यपि गृहस्थाश्रममें रहने और संन्यास लेनेका भी शास्त्रद्वारा ही विधान किया गया है
সঞ্জয় বললেন—হে নরদেবদেব, হে পাণ্ডব, তোমার মঙ্গল হোক। আমি এখন বিদায় নিয়ে হস্তিনাপুরে যাচ্ছি। বলো তো—মনের আকস্মিক আবেগে কি আমি মুখে এমন কোনো অনুচিত বা কষ্টদায়ক কথা বলে ফেলেছি, যা তোমাকে ব্যথিত করেছে?
Verse 2
जनार्दनं भीमसेनार्जुनौ च माद्रीसुतो सात्यकिं चेकितानम् । आमन्त्रय गच्छामि शिवं सुखं व: सौम्येन मां पश्यत चक्षुषा नूपा:
সঞ্জয় বললেন—জনার্দন (শ্রীকৃষ্ণ), ভীমসেন ও অর্জুন, এবং মাদ্রীর পুত্রদ্বয়, সাত্যকি ও চেকিতান—সবার কাছ থেকে বিদায় নিয়ে আমি যাত্রা করছি। তোমাদের মঙ্গল ও সুখ হোক। হে রাজাগণ, স্নেহভরা দৃষ্টিতে আমার দিকে চেয়ে থাকো।
Verse 3
युधिछिर उवाच अनुज्ञात: संजय स्वस्ति गच्छ न नः स्मरस्यप्रियं जातु विद्वन् विद्यश्ष त्वां ते च वयं च सर्वे शुद्धात्मानं मध्यगतं सभास्थम्
যুধিষ্ঠির বললেন—সঞ্জয়, তোমার যাওয়ার অনুমতি রইল; মঙ্গলসহকারে যাও। হে বিদ্বান, তুমি কখনও আমাদের অমঙ্গল চিন্তা করো না। তাই কৌরবগণ এবং আমরা সকলেই তোমাকে শুদ্ধচিত্ত, নিরপেক্ষ—সভামধ্যস্থ বিশ্বাসযোগ্য ব্যক্তি বলে মানি।
Verse 4
आप्तो दूत: संजय सुप्रियो5सि कल्याणवाक् शीलवांस्तृप्तिमांश्व न मुहोस्त्वं संजय जातु मत्या न च क़्ुद्धोरुच्यमानो दुरुक्तै:
যুধিষ্ঠির বললেন—সঞ্জয়, তুমি বিশ্বস্ত দূত এবং আমাদের অতি প্রিয়। তোমার বাক্য মঙ্গলময় ও হিতকর; তুমি শীলবান ও সন্তুষ্টচিত্ত। তোমার বিচারবুদ্ধি কখনও আচ্ছন্ন হয় না, আর কঠোর কথা শুনলেও তুমি ক্রুদ্ধ হও না।
Verse 5
न मर्मगां जातु वक्तासि रूक्षां नोपश्रुतिं कटुकां नोत मुक्ताम् । धर्मारामामर्थवतीमहिंस्रा- मेतां वाचं तव जानीम सूत
যুধিষ্ঠির বললেন—হে সূত, তোমার মুখ থেকে কখনও এমন কথা বেরোয় না যা মর্মে আঘাত করে—রূঢ়, তিক্ত, বা অসাবধানতায় ছুটে যাওয়া। তুমি শুষ্ক বা প্রসঙ্গহীন কথাও বল না। আমরা ভালোই জানি, তোমার বাক্য ধর্মসম্মত—সজ্জনদের প্রিয়, অর্থবহ, এবং হিংসার অভিপ্রায়শূন্য।
Verse 6
त्वमेव न: प्रियतमो5सि दूत इहागच्छेद् विदुरो वा द्वितीय: । अभीक्षणदृष्टोडसि पुरा हि नस्त्वं धनंजयस्यात्मसम: सखासि
যুধিষ্ঠির বললেন—সঞ্জয়, তুমিই আমাদের সর্বাধিক প্রিয় দূত। মনে হয় যেন বিদুরই দ্বিতীয় দূত হয়ে এখানে এসেছেন। কারণ পূর্বেও তুমি বারবার আমাদের সঙ্গে সাক্ষাৎ করেছ; আর ধনঞ্জয় (অর্জুন)-এর কাছে তুমি নিজের আত্মার মতোই প্রিয় সখা, হে সঞ্জয়।
Verse 7
इतो गत्वा संजय क्षिप्रमेव उपातिष्ठेथा ब्राह्मणान् ये तदर्हा: । विशुद्धवीर्याश्वरणोपपन्ना: कुले जाता: सर्वधर्मोपपन्ना:
যুধিষ্ঠির বললেন—সঞ্জয়, এখান থেকে গিয়ে বিলম্ব না করে সেই ব্রাহ্মণদের কাছে উপস্থিত হও, যাঁরা সম্মানের যোগ্য—যাঁদের তেজ পবিত্র, যাঁরা ব্রহ্মচর্য পালন করে বেদস্বাধ্যায়ে নিয়ত, কুলীন এবং সর্বধর্মে প্রতিষ্ঠিত। তাঁদের কাছে আমাদের প্রণাম নিবেদন করো।
Verse 8
स्वाध्यायिनो ब्राह्मणा भिक्षवश्न तपस्विनो ये च नित्या वनेषु । अभिवाद्या वै मद्धचनेन वृद्धा- स्तथेतरेषां कुशलं वदेथा:
যুধিষ্ঠির বললেন—বেদস্বাধ্যায়ে নিবিষ্ট ব্রাহ্মণদের, ভিক্ষুদের এবং অরণ্যে নিত্যবাসী তপস্বী ঋষিদের আমার নামে প্রণাম জানিও। বয়োজ্যেষ্ঠদের যথাবিধি অভিবাদন করো, আর অন্য সকলেরও কুশল সংবাদ জিজ্ঞাসা করো।
Verse 9
पुरोहित धृतराष्ट्रस्य राज्ञ- स्तथा55चायनित्विजो ये च तस्य । तैश्न त्वं तात सहितैर्य थाई संगच्छेथा: कुशलेनैव सूत
যুধিষ্ঠির বললেন—প্রিয় সঞ্জয়, সূত! তুমি যখন রাজা ধৃতরাষ্ট্রের পুরোহিত, আচার্য এবং তাঁর যজ্ঞকর্মে নিয়োজিত ঋত্বিজদের সঙ্গে সাক্ষাৎ করবে, তখন শিষ্টতা ও সদ্ভাব নিয়ে তাদের কাছে যাবে। আমাদের পক্ষ থেকে কেবল তাদের কুশল-মঙ্গল জিজ্ঞাসা করে নমস্কার জানাবে—যাতে সংঘাত বাড়লেও ধর্মের সৌজন্য ও সম্মানজনক বাক্য পরিত্যক্ত না হয়।
Verse 10
(ततोड्व्यग्रस्तन्मना: प्राउ्जलि श्व कुर्या नमो मद्धवचनेन तेभ्य: ।) तदनन्तर शान्तभावसे उन्हींकी ओर मनकी वृत्तियोंको एकाग्र करके हाथ जोड़कर मेरे कहनेसे उन सबको प्रणाम निवेदन करना। अश्रोत्रिया ये च वसन्ति वृद्धा मनस्विन: शीलबलोपपन्ना: । आशंसन्तो<5स्माकमनुस्मरन्तो यथाशक्ति धर्ममात्रां चरन्त:
তারপর আগামীকাল মন একাগ্র করে, করজোড়ে, শান্তচিত্তে আমার নামে তাদের সকলকে প্রণাম নিবেদন করবে। এরপর সেখানে বসবাসকারী সেই বৃদ্ধদেরও কুশল জিজ্ঞাসা করবে—যাঁরা যদিও বৈদিক পাঠে পারদর্শী নন, তবু উচ্চমনা, শীল ও বলসম্পন্ন; যারা আমাদের মঙ্গল কামনা করেন, আমাদের স্মরণ করেন এবং যথাশক্তি ধর্মের পরিমিত পথ অনুসরণ করেন।
Verse 11
ये जीवन्ति व्यवहारेण राष्टरे पशुूंश्ष ये पालयन्तो वसन्ति
যারা কৌরব-রাজ্যে বাণিজ্য করে জীবিকা নির্বাহ করে, যারা পশুপালন করে বসবাস করে, এবং যারা কৃষিকর্মে সকলকে ধারণ করে—সেই সকল বৈশ্যেরও কুশল সংবাদ জিজ্ঞাসা করবে।
Verse 12
आचार्य इष्टो नयगो विधेयो वेदानभीप्सन् ब्रह्मचर्य चचार । योअस्त्रं चतुष्पात् पुनरेव चक्रे द्रोण: प्रसन्नोडभिवाद्यस्त्ववासौ
যুধিষ্ঠির বললেন—আমাদের প্রিয়, নীতিজ্ঞ, বিনয়ী ও সদা প্রসন্নচিত্ত আচার্য দ্রোণ প্রথমে বেদ আয়ত্ত করার জন্য ব্রহ্মচর্য পালন করেছিলেন। তারপর মন্ত্র, উপচার, প্রয়োগ ও সংহার—এই চার পাদে সম্পূর্ণ অস্ত্রবিদ্যাকে তিনি সুসংবদ্ধ করেছিলেন। সেই আচার্য দ্রোণ আমাদের অভিবাদনের যোগ্য; তাঁর কাছেও আমার প্রণাম পৌঁছে দিও।
Verse 13
अधीतविद्यक्षरणोपपतन्नो योअस्त्रं चतुष्पात् पुनरेव चक्रे । गन्धर्वपुत्रप्रतिमं तरस्विनं तमश्वत्थामानं कुशल सम पृच्छे:
যুধিষ্ঠির বললেন—যিনি বেদাধ্যয়নে সম্পন্ন ও সদাচারী, চার পাদে সম্পূর্ণ অস্ত্রবিদ্যায় সুপ্রশিক্ষিত, এবং গন্ধর্বপুত্রের ন্যায় বেগবান বীর—সেই আচার্যপুত্র অশ্বত্থামারও কুশল সংবাদ জিজ্ঞাসা করবে।
Verse 14
शारद्वतस्यावसथ्ं सम गत्वा महारथस्यात्मविदां वरस्य । त्वं मामभीक्ष्णं परिकीर्तयन् वै कृपस्य पादौ संजय पाणिना स्पृशे:
সঞ্জয়! শারদ্বতপুত্র, আত্মবিদ্যায় শ্রেষ্ঠ মহারথী কৃপাচার্যের গৃহে গিয়ে বারবার আমার নাম উচ্চারণ করতে করতে, নিজের হাতে তাঁর উভয় চরণ স্পর্শ করো।
Verse 15
यस्मिन् शौर्यमानृशंस्यं तपश्च प्रज्ञा शीलं॑ श्रुतिसत्त्वे धृतिश्व । पादौ गृहीत्वा कुरुसत्तमस्य भीष्मस्य मां तत्र निवेदयेथा:
যাঁর মধ্যে বীর্য, দয়া, তপস্যা, প্রজ্ঞা, শীল, শ্রুতি-জ্ঞান, সত্ত্ব ও ধৈর্য—এই সকল গুণ বিরাজমান, সেই কুরুশ্রেষ্ঠ পিতামহ ভীষ্মের উভয় চরণ ধারণ করে সেখানে আমার প্রণাম নিবেদন করো।
Verse 16
प्रज्ञाचक्षुर्य: प्रणेता कुरूणां बहुश्रुतो वृद्धसेवी मनीषी । तस्मै राज्ञे स्थविरायाभिवाद्य आचक्षीथा: संजय मामरोगम्
সঞ্জয়! যিনি কৌরবদের নেতা, বহুশ্রুত, বৃদ্ধসেবী ও মনীষী—সেই প্রজ্ঞাচক্ষু বৃদ্ধ রাজা ধৃতরাষ্ট্রকে প্রণাম জানিয়ে বলো যে যুধিষ্ঠির নিরোগ ও কুশল আছে।
Verse 17
ज्येष्ठ: पुत्रो धृतराष्ट्रस्य मन्दो मूर्ख: शठ: संजय पापशील: । यस्यापवाद: पृथिवीं याति सर्वा सुयोधनं कुशलं तात पृच्छे:
প্রিয় সঞ্জয়! ধৃতরাষ্ট্রের জ্যেষ্ঠ পুত্র যে মন্দবুদ্ধি, মূর্খ, শঠ ও পাপাচারী—যার নিন্দা সমগ্র পৃথিবীতে ছড়িয়ে পড়েছে—সেই সুয়োধনের কাছেও আমার পক্ষ থেকে কুশল-মঙ্গল জিজ্ঞাসা করো।
Verse 18
भ्राता कनीयानपि तस्य मन्द- स्तथाशील: संजय सो<पि शश्चवत् | महेष्वास: शूरतम: कुरूणां दुःशासन: कुशलं तात वाच्य:
প্রিয় সঞ্জয়! দুর্যোধনের কনিষ্ঠ ভ্রাতা, যে তারই মতো মন্দবুদ্ধি এবং চিরকাল পাপে প্রবৃত্ত—কুরুদের মধ্যে মহাধনুর্ধর ও প্রসিদ্ধ বীর দুঃশাসনের কাছেও কুশল জিজ্ঞাসা করে আমার কুশল-সংবাদ পৌঁছে দিও।
Verse 19
यस्य कामो वर्तते नित्यमेव नान्य: शमाद् भारतानामिति सम | स बाह्लिकानामृषभो मनीषी त्वयाभिवाद्य: संजय साधुशील:
যুধিষ্ঠির বললেন—হে সঞ্জয়! ভরতবংশীয়দের মধ্যে চিরকাল শান্তি ও ঐক্য বজায় থাকুক—এই একটিই যাঁর নিত্য কামনা, মন-প্রশমন ও সৌহার্দ্য-স্থাপনের বাইরে যাঁর আর কোনো বাসনা নেই, বাহ্লীকদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সেই জ্ঞানী ও সদাচারী বাহ্লীককে আমার পক্ষ থেকে সশ্রদ্ধ প্রণাম জানিও।
Verse 20
गुणैरनेकै: प्रवरैश्न युक्तो विज्ञानवान् नैव च निष्ठरो यः । स्नेहादमर्ष सहते सदैव स सोमदत्त: पूजनीयो मतो मे
যুধিষ্ঠির বললেন—যিনি বহু উৎকৃষ্ট গুণে ভূষিত, বিবেকসম্পন্ন, বিন্দুমাত্র কঠোর নন; আর স্নেহবশত আমাদের ক্রোধও সদা সহ্য করেন—সেই সোমদত্তও আমার মতে পূজনীয়।
Verse 21
अर्हत्तम: कुरुषु सौमदत्ति: स नो भ्राता संजय मत्सखा च | महेष्वासो रथिनामुत्तमो्ई: सहामात्य: कुशल तस्य पृच्छे:
যুধিষ্ঠির বললেন—হে সঞ্জয়! কুরুদের মধ্যে সৌমদত্তি (ভূরিশ্রবা) সর্বাধিক সম্মানযোগ্য। তিনি আমাদের আত্মীয় এবং আমার প্রিয় সখা। মহারথীদের মধ্যে তিনি অগ্রগণ্য—মহাধনুর্ধর ও শ্রদ্ধেয় বীর। আমার পক্ষ থেকে তাঁর মন্ত্রীদেরসহ কুশল সংবাদ জিজ্ঞাসা করো।
Verse 22
ये चैवान्ये कुरुमुख्या युवान: पुत्रा: पौत्रा भ्रातरश्वैव ये नः । यं यमेषां मन्यसे येन योग्यं तत् तत् प्रोच्यानामयं सूत वाच्या:
যুধিষ্ঠির বললেন—হে সঞ্জয়! এদের ছাড়াও কুরুবংশের যে অন্যান্য প্রধান যুবকরা আছে—যারা আমাদের পুত্র, পৌত্র ও ভ্রাতৃসম—তাদের মধ্যে যাকে যেমন সম্বোধন করা উচিত বলে তুমি মনে কর, তাকে তেমনই বলে কথা বলো। হে সূত! সকলকে জানিয়ে দিও—পাণ্ডবরা সুস্থ ও আনন্দিত।
Verse 23
ये राजान: पाण्डवायोधनाय समानीता धार्तराष्ट्रेण केचित् । वशातय: शाल्वका: केकयाश्ष तथाम्बष्ठा ये त्रिगर्ताश्न॒ मुख्या:
যুধিষ্ঠির বললেন—হে সঞ্জয়! ধৃতরাষ্ট্রপুত্র পাণ্ডবদের বিরুদ্ধে যুদ্ধে যেসব রাজাকে আহ্বান করেছে—যেমন বশাতি, শাল্ব, কেকয়, অম্বষ্ঠ এবং ত্রিগর্তদের প্রধান বীরগণ—তাঁদের সকলের কুশল-মঙ্গল আমার পক্ষ থেকে জিজ্ঞাসা করো।
Verse 24
प्राच्योदीच्या दाक्षिणात्याश्व शूरा- स्तथा प्रतीच्या: पर्वतीयाश्न सर्वे अनुशंसा: शीलवृत्तोपपन्ना- स्तेषां सर्वेषां कुशलं सूत पृच्छे:
যুধিষ্ঠির বললেন—পূর্ব, উত্তর, দক্ষিণ ও পশ্চিম দিকের বীরগণ এবং সকল পর্বতরাজ সেখানে উপস্থিত। তাঁরা সকলেই সদ্ভাবসম্পন্ন, দয়ালু, শীল ও সদাচারে প্রতিষ্ঠিত। হে সূত! আমার পক্ষ থেকে তাঁদের সকলের কুশল-মঙ্গল জিজ্ঞাসা করো।
Verse 25
हस्त्यारोहा रथिन: सादिनश्न पदातयश्चार्यसड्घा महान्त: । आख्याय मां कुशलिन सम नित्य- मनामयं परिपृच्छे: समग्रान्
যুধিষ্ঠির বললেন—হস্তিরোহী, রথী, অশ্বারোহী, পদাতিক এবং মহৎ আর্যজনসমূহ সেখানে উপস্থিত। প্রথমে আমার কুশল সংবাদ জানিয়ে, তারপর তাঁদের সকলের স্বাস্থ্য ও নিরাময়তার খবর সম্পূর্ণভাবে জিজ্ঞাসা করো।
Verse 26
तथा रज्ञो हार्थयुक्तानमात्यान् दौवारिकान् ये च सेनां नयन्ति । आयदव्ययं ये गणयन्ति नित्य- मर्थाश्न ये महतश्षिन्तयन्ति
যুধিষ্ঠির বললেন—রাজার হিতসাধনে নিয়োজিত মন্ত্রীগণ, দ্বাররক্ষক, সেনানায়ক, নিত্য আয়-ব্যয়ের হিসাবকারী এবং যারা সর্বদা মহৎ কার্য ও গুরুতর প্রশ্নে চিন্তা করেন—তাঁদেরও কুশল সংবাদ জিজ্ঞাসা করো।
Verse 27
वृन्दारक॑ कुरुमध्येष्वमूढं महाप्रज्ञं सर्वधर्मोपपन्नम् । न तस्य युद्ध रोचते वै कदाचिद् वैश्यापुत्रं कुशलं तात पृच्छे:
যুধিষ্ঠির বললেন—হে শ্রেষ্ঠজন! কুরুদের মধ্যে বৈশ্যাপুত্র যুযুৎসু আছে—সে মোহহীন, মহাপ্রজ্ঞ এবং সর্বধর্মে সম্পন্ন। কৌরব ও পাণ্ডবের যুদ্ধ তাকে কখনও প্রীতিকর লাগে না। প্রিয়! আমার পক্ষ থেকে তারও কুশল-মঙ্গল জিজ্ঞাসা করো।
Verse 28
निकर्तने देवने योउद्धितीय- श्छन्नोपथ: साधुदेवी मताक्ष: । यो दुर्जयो देवरथेन संख्ये स चित्रसेन: कुशलं तात वाच्य:
যুধিষ্ঠির বললেন—প্রিয়! যে ধনহরণ ও দ্যূতক্রীড়ায় অদ্বিতীয়, কৌশল গোপন রেখে নিপুণভাবে পাশা খেলে, পাশা নিক্ষেপে পারদর্শী, এবং যুদ্ধে দিব্য রথারূঢ় বীরের পক্ষেও দুর্জয়—সেই চিত্রসেনেরও কুশল সংবাদ জিজ্ঞাসা করে আমাকে জানিও।
Verse 29
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यसम्बन्धी उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত সঞ্জয়যানপর্বে শ্রীকৃষ্ণবাক্য-সম্বন্ধীয় ঊনত্রিংশ অধ্যায় সমাপ্ত হল। বায়ুদেব বললেন—হে সঞ্জয়! পর্বতবাসী গান্ধাররাজ শকুনিরও কুশল জিজ্ঞাসা করো—যে পাশাখেলার কৌশলে এবং পাশা খেলে পরের ধন হরণে নিজেকে অতুল মনে করে, আর যে সর্বদা দুর্যোধনকে মান্য করে ও তোষামোদ করে; সেই ভ্রান্তবুদ্ধি ব্যক্তিরও মঙ্গল সংবাদ জেনে নিও।
Verse 30
यः पाण्डवानेकरथेन वीर: समुत्सहत्यप्रधृष्यान् विजेतुम् । यो मुहातां मोहयिताद्वितीयो वैकर्तन: कुशलं तस्य पृच्छे:
যে বীর একটিমাত্র রথের ভরসায় অজেয় পাণ্ডবদেরও জয় করতে উদ্যত, এবং যে মূঢ়তায় নিমগ্ন ধৃতরাষ্ট্রপুত্রদের আরও মোহগ্রস্ত করে—সেই বৈকর্তন কর্ণেরও কুশল জিজ্ঞাসা করো।
Verse 31
स एव भक्त: स गुरु: स भर्ता सवैपिता सच माता सुद्ृच्च । अगाधबुद्धि्विंदुरो दीर्घदर्शी स नो मन्त्री कुशलं तं सम पृच्छे:
তিনিই প্রকৃত ভক্ত, তিনিই গুরু, তিনিই পালনকর্তা ও আশ্রয়; তিনিই পিতা এবং তিনিই মাতা—অটল ও নির্ভরযোগ্য। অগাধ বুদ্ধিসম্পন্ন, দূরদর্শী বিদুর আমাদের মন্ত্রী। হে সঞ্জয়, যথোচিত সম্মানসহ তাঁর কাছে আমাদের মঙ্গল ও কল্যাণের কথা জিজ্ঞাসা করো।
Verse 32
अगाधबुद्धि दूरदर्शी विदुरजी हमलोगोंके प्रेमी, गुर, पालक, पिता-माता और सुहूृद् हैं, वे ही हमारे मन्त्री भी हैं। संजय! तुम मेरी ओरसे उनकी भी कुशल पूछना ।।
অগাধ বুদ্ধি ও দূরদর্শী বিদুর আমাদের প্রিয়, গুরু, পালনকর্তা, পিতা-মাতা ও সুহৃদ; তিনিই আমাদের মন্ত্রীও। হে সঞ্জয়, আমার পক্ষ থেকে তাঁর কুশল জিজ্ঞাসা করো। আর রাজবংশের যে সদ্গুণসম্পন্ন বৃদ্ধা নারীরা আছেন, সঞ্জয়, আমরা তাঁদের মাতৃসম জ্ঞান করি। তাদের সকলের কাছে একত্রে গিয়ে, সেই সকল শ্রদ্ধেয় নারীর সমক্ষে আমাদের প্রণাম নিবেদন করো।
Verse 33
कच्चित् पुत्रा जीवपुत्रा: सुसम्यग् वर्तन्ते वो वृत्तिमनृशंसरूपा: । इति स्मोक््त्वा संजय ब्रूहि पश्चा- दजातशत्रुः कुशली सपुत्र:
হে সঞ্জয়, সেই বৃদ্ধা নারীদের এভাবে বলো—“মাতৃগণ, তোমাদের পুত্রেরা কি তোমাদের সঙ্গে যথাযথভাবে আচরণ করছে? তাদের মধ্যে কি কোনো নিষ্ঠুরতা জন্মেছে? আর তোমরা কি সকলেই দীর্ঘায়ু পুত্রে ধন্য হয়েছ?” এ কথা বলে পরে জানাবে যে অজাতশত্রু যুধিষ্ঠির তাঁর পুত্রদেরসহ কুশলে আছেন।
Verse 34
या नो भार्या: संजय वेत्थ तत्र तासां सर्वासां कुशल तात पृच्छे: । सुसंगुप्ता: सुरभयो5नवद्या: कच्चिद् गृहानावसथाप्रमत्ता:
যুধিষ্ঠির বললেন— “সঞ্জয়, হস্তিনাপুরে আমাদের ভ্রাতাদের যে পত্নীরা আছেন, তুমি তাদের সকলকেই চেন। প্রিয়, তাদের সবার কুশল জিজ্ঞাসা করো। তারা কি যথাযথভাবে রক্ষিত এবং নির্দোষ আচরণে জীবনযাপন করছে? সুগন্ধি উবটান প্রভৃতি প্রয়োজনীয় প্রসাধন-সামগ্রী কি তারা পায়? গৃহের মধ্যে কি তারা সতর্ক ও অপ্রমত্ত থাকে?”
Verse 35
कच्चिद् वृत्तिं श्वशुरेषु भद्रा: कल्याणी वर्तध्वमनृशंसरूपाम् । यथा च व: स्यु: पतयो5नुकूला- स्तथा वृत्तिमात्मन: स्थापयध्वम्
যুধিষ্ঠির বললেন— “ভদ্র নারীরা কি শ্বশুরকুলের মধ্যে কল্যাণকর, কোমল ও নির্দয়তাহীন আচরণ বজায় রাখে? আর কি তারা এমনভাবে নিজেদের আচরণ স্থির করে যে তাদের স্বামীরা সদা অনুকূল থাকে? প্রিয় সঞ্জয়, তাদের কুশল অবশ্যই জিজ্ঞাসা করো।”
Verse 36
या नः स्नुषा: संजय वेत्थ तत्र प्राप्ता: कुलेभ्यश्व गुणोपपन्ना: । प्रजावत्यो ब्रूहि समेत्य ताश्न युधिष्ठिरो वो$भ्यवदत् प्रसन्न:
যুধিষ্ঠির বললেন— “সঞ্জয়, সেখানে আমাদের যে পুত্রবধূরা আছে—যারা উত্তম কুল থেকে এসেছে, গুণে সমৃদ্ধ এবং সন্তানবতী—তাদেরও তুমি চেন। গিয়ে তাদের সঙ্গে সাক্ষাৎ করো এবং বলো— ‘বধূগণ, প্রসন্নচিত্ত যুধিষ্ঠির তোমাদের কুশল জিজ্ঞাসা করছেন।’”
Verse 37
कन्या: स्वजेथा: सदनेषु संजय अनामयं मद्वगचनेन पृष्टवा । कल्याणा व: सन्तु पतयोडनुकूला यूयं पतीनां भवतानुकूला:
যুধিষ্ঠির বললেন— “সঞ্জয়, রাজপ্রাসাদে যে কন্যারা আছে, তাদের নিজের কন্যার মতো স্নেহ করে বুকে টেনে নেবে। আমার পক্ষ থেকে তাদের আরোগ্য জিজ্ঞাসা করে বলবে— ‘কন্যাগণ, তোমরা যেন মঙ্গলময় ও অনুকূল স্বামী লাভ করো; আর তোমরাও যেন স্বামীদের প্রতি অনুকূল ও নিবেদিত থাকো।’”
Verse 38
अलंकृता वस्त्रवत्य: सुगन्धा अबीभत्सा: सुखिता भोगवत्य: । लघु यासां दर्शनं वाक् च लघ्वी वेशस्त्रिय: कुशल तात पृच्छे:
যুধিষ্ঠির বললেন— “প্রিয় সঞ্জয়, যারা সাজসজ্জা ও পরিধানের কাজে নিয়োজিত সেই নারীদেরও কুশল জিজ্ঞাসা করো—যাদের দর্শন মনোহর, বাক্য কোমল; যারা অলংকারে ভূষিতা, উৎকৃষ্ট বস্ত্রে সুশোভিতা, সুগন্ধময়; ঘৃণ্য আচরণহীন, সুখে বাস করে এবং ভোগসামগ্রীতে সমৃদ্ধ।”
Verse 39
दास्य: स्युर्या ये च दासा: कुरूणां तदाश्रया बहव: कुब्जखजञ्जा: | आखूयाय मां कुशलिन सम तेभ्यो- 5प्यनामयं परिपृच्छेर्जघन्यम्
যুধিষ্ঠির বললেন—কৌরবদের যে দাস-দাসী আছে এবং তাদের আশ্রয়ে যে বহু কুঁজো ও খোঁড়া লোক বাস করে, তাদের সকলকে আমার কুশল সংবাদ জানাবে; আর শেষে আমার পক্ষ থেকে তাদেরও কুশল-ক্ষেম জিজ্ঞাসা করবে।
Verse 40
कच्चिद् वृत्तिं वर्तते वै पुराणीं कच्चिद् भोगान् धार्तराष्ट्रो ददाति । अंगहीनान् कृपणान् वामनान् वा यानानृशंस्यो धृतराष्ट्रो बिभर्ति
যুধিষ্ঠির বললেন—তাদের প্রাচীন জীবিকা-বৃত্তি কি এখনও চলেছে? ধার্তারাষ্ট্র (দুর্যোধন) কি তাদের ভোগ্যসামগ্রী ও জীবিকা-উপকরণ দেয়? আর দয়ালু ধৃতরাষ্ট্র যাদের—অঙ্গহীন, দীন, কিংবা বামন—পালন করেন, দুর্যোধন কি তাদের রক্ষণাবেক্ষণের জন্য প্রয়োজনীয় উপকরণ যোগায়?
Verse 41
अन्धांश्व सर्वान् स्थविरांस्तथैव हस्त्याजीवा बहवो ये>त्र सन्ति । आखूयाय मां कुशलिन सम तेभ्यो- 5प्यनामयं परिपृच्छेर्जघन्यम्
যুধিষ্ঠির বললেন—এখানে যারা সকল অন্ধ, তেমনি যারা সকল বৃদ্ধ, আর যারা বহুজন হাতির দ্বারা জীবিকা নির্বাহ করে—তাদের সকলকে আমার কুশল জানাবে; এবং শেষে তাদেরও আরোগ্য ও মঙ্গল জিজ্ঞাসা করবে। তাদের মধ্যে নিতান্ত তুচ্ছতম জনও যেন অজিজ্ঞাসিত না থাকে।
Verse 42
हस्तिनापुरमें जो बहुत-से हाथीवान हैं तथा जो अन्धे और बूढ़े हैं, उन सबको मेरी कुशल बताकर अन्तमें मेरी ओरसे उनके भी आरोग्य आदिका समाचार पूछना ।।
যুধিষ্ঠির বললেন—হস্তিনাপুরে যারা বহু হাতিওয়ালা, আর যারা অন্ধ ও বৃদ্ধ—তাদের সকলকে আমার কুশল সংবাদ জানাবে; এবং শেষে আমার পক্ষ থেকে তাদেরও আরোগ্যাদি মঙ্গল জিজ্ঞাসা করবে। তারপর তাদের আশ্বাস দিয়ে আমার এই বার্তা শোনাবে—দুঃখ বা নীচ জীবনযাপনের কারণে ভয় পেয়ো না; নিশ্চয়ই এটি পূর্বজন্মে কৃত পাপের ফল পেকে উঠেছে। অচিরেই আমি শত্রুদের দমন করে বন্দী করব, সুহৃদদের প্রতি অনুগ্রহ করব, এবং অন্ন ও বস্ত্র দিয়ে তোমাদের পালন করব।
Verse 43
सन्त्येव मे ब्राह्मणेभ्य: कृतानि भावीन्यथो नो बत वर्तयन्ति । तान् पश्यामि युक्तरूपांस्तथैव तामेव सिद्धि श्रावयेथा नृपं तम्
যুধিষ্ঠির বললেন—কিছু ব্রাহ্মণের জন্য আমি বার্ষিক জীবিকা-বৃত্তি নির্ধারণ করে রেখেছিলাম; কিন্তু হায়, তা যথাযথভাবে পরিচালিত হচ্ছে না। আমি চাই সেই ব্রাহ্মণদের আবার পূর্বের মতোই যথোচিতভাবে সেই বৃত্তিগুলির দ্বারা সংযুক্ত দেখতে। অতএব দূতের মাধ্যমে সেই রাজাকে জানিয়ে দিও—এখন থেকে সেই বৃত্তিগুলি যথাবিধি রূপে পালন করা হচ্ছে।
Verse 44
ये चानाथा दुबला: सर्वकाल- मात्मन्येव प्रयतन्ते5थ मूढा: । तांश्वापि त्वं कृपणान् सर्वथैव हास्मद्वाक्यात् कुशलं तात पृच्छे:
আর যাঁরা আশ্রয়হীন, দুর্বল ও মোহগ্রস্ত—যাঁরা সর্বদা কেবল দেহধারণের জন্যই চেষ্টা করেন—হে সংজয়, আমার কথায় তুমি দয়া করে সেই দীনজনদের কাছেও গিয়ে সর্বপ্রকারে তাদের কুশল সংবাদ জিজ্ঞাসা করো।
Verse 45
ये चाप्यन्ये संश्रिता धार्तराष्ट्रान् नानादिग्भ्यो5 भ्यागता: सूतपुत्र । दृष्टवा तांश्चैवार्हतश्चापि सर्वान् सम्पृच्छेथा: कुशलं चाव्ययं च
আর এদের ছাড়াও নানা দিক থেকে এসে ধৃতরাষ্ট্রপুত্রদের আশ্রয়ে থাকা অন্য লোকেরাও আছে—হে সূতপুত্র, তাদের এবং সকল মান্যজনকে দেখলে তাদের কুশল জিজ্ঞাসা করবে, আর তারা নিরাপদ ও অক্ষত আছে কি না তাও জানতে চাইবে।
Verse 46
एवं सर्वानागताभ्यागतांश्ष॒ राज्ञो दूतान् सर्वदिग्भ्यो<्भ्युपेतान् । पृष्टवा सर्वान् कुशल तांश्व सूत पश्चादहं कुशली तेषु वाच्य:
এইভাবে সর্বদিক থেকে আগত রাজদূতদের এবং অন্যান্য সকল অতিথি-অভ্যাগতদের আগে কুশল জিজ্ঞাসা করে, হে সূত, শেষে তাদের কাছে আমার কুশল সংবাদও জানিয়ে দিও।
Verse 47
न हीदृशा: सन्त्यपरे पृथिव्यां ये योधका धार्तराष्ट्रेण लब्धा: । धर्मस्तु नित्यो मम धर्म एव महाबल: शत्रुनिबर्हणाय
এই পৃথিবীতে ধৃতরাষ্ট্রপুত্র যে যোদ্ধাদের সংগ্রহ করেছে, তাদের মতো আর কেউ নেই। তবু ধর্মই চিরন্তন; আর আমার পক্ষে শত্রুনাশের জন্য ধর্মই সর্বশ্রেষ্ঠ বল।
Verse 48
इदं पुनर्वचन धार्त॑राष्ट्र सुयोधनं संजय श्रावयेथा: । यस्ते शरीरे हृदयं दुनोति काम: कुरूनसपत्नो<नुशिष्याम्
হে সংজয়, ধৃতরাষ্ট্রপুত্র সুয়োধনকে আমার এই বাণী আবার শোনাবে—“তোমার অন্তরে যে বাসনা জেগেছে—কুরুবংশে প্রতিদ্বন্দ্বীহীন রাজত্ব করব—তা কেবল তোমার হৃদয়কে দগ্ধ করছে। তার সিদ্ধির কোনো উপায় নেই। আমরা এতটা পৌরুষহীন নই যে তোমার প্রিয় বাসনা পূর্ণ হতে দেব। হে ভরতবংশের শ্রেষ্ঠ বীর, ইন্দ্রপ্রস্থ আমাকে ফিরিয়ে দাও, নতুবা যুদ্ধ বেছে নাও।”
Verse 49
न विद्यते युक्तिरेतस्य काचि- न्नैवंविधा: स्याम यथा प्रियं ते । ददस्व वा शक्रपुरी ममैव युध्यस्व वा भारतमुख्य वीर
যুধিষ্ঠির বললেন—“তোমার এই বাসনা পূর্ণ করার কোনো উপায় নেই। আমরা এত দুর্বল নই যে আমাদের ক্ষতিতে তোমার প্রিয় কাজ সম্পন্ন হতে দেব। অতএব, হে ভরতবংশের শ্রেষ্ঠ বীর! শক্রপুরী (ইন্দ্রপ্রস্থ) আমাকে ফিরিয়ে দাও, নতুবা যুদ্ধ কর।”
Verse 106
श्लाघस्व मां कुशलिन सम तेभ्यो हानामयं तात पृच्छेर्जघन्यम् । तात! जो अअभ्रोत्रिय (शूद्र) वृद्ध पुरुष मनस्वी तथा शील और बलसे सम्पन्न हैं एवं हस्तिनापुरमें निवास करते हैं
যুধিষ্ঠির বললেন—“হে সৌভাগ্যবান! তাদের সকলকে আমার প্রণাম জানাবে, প্রিয়, এবং তাদের কুশল-ক্ষেম ও রোগমুক্তির সংবাদ জিজ্ঞাসা করবে। বিশেষ করে হস্তিনাপুরে বসবাসকারী সেই বৃদ্ধগণ—যাঁরা শূদ্র এবং বৈদিক অধ্যয়নে অধিকারী নন, তবু দৃঢ়চিত্ত, শীলবান ও বলবান; যাঁরা যথাশক্তি ধর্মাচরণ করেন, আমাদের মঙ্গল কামনা করেন এবং বারবার আমাদের স্মরণ করেন—তাঁদের সকলকে আমাদের কুশল সংবাদ জানাবে। তারপর মনোযোগ দিয়ে তাঁদের স্বাস্থ্যের খোঁজ নেবে।”
How to preserve kinship and political stability through peace while refusing to legitimize greed-based dispossession—i.e., whether conciliation remains ethical when restitution is systematically denied.
That karma—steady, role-aligned action—sustains both cosmic order and social order; therefore governance must be disciplined, lawful, and corrective rather than driven by desire or anger.
No explicit phalaśruti is stated; instead the chapter uses consequential reasoning—social and cosmic analogies—to imply that understanding and practicing dharma-aligned action yields stability, while injustice yields systemic collapse.