
Udyoga-parva Adhyāya 28: Dharmādharmalakṣaṇa in Āpad (Crisis-Discernment of Right and Wrong)
Upa-parva: Sañjaya–Yudhiṣṭhira Dharmādharmaviveka (Ethical Discernment in Crisis)
Yudhiṣṭhira addresses Sañjaya and accepts the premise that dharma is superior among human undertakings, while insisting on accountability: Sañjaya should censure him if he strays into adharma. He then articulates the epistemic difficulty of moral judgment in crisis—adharma can wear the forms of dharma and dharma can appear as adharma; therefore, only the wise, through बुद्धि (reflective intelligence), can correctly perceive the distinction. He proposes a diagnostic rule for āpaddharma: the ‘first sign’ (ādya-liṅga) or primary indicator becomes the measure for determining what is legitimate under distress. He notes that when normal conditions (prakṛti) are disrupted, acts undertaken to accomplish necessary ends may still be blameworthy, and even those who remain in ordinary conditions while behaving as if in crisis can be censurable. He references prāyaścitta (expiation) as a divinely instituted corrective for Brahmins seeking non-violation, and he frames improper crisis-conduct (vikarma) as subject to critique. The chapter contrasts disciplined ethical inquiry with indiscriminate negationism and extreme prescriptions. It culminates in a pragmatic turn: Yudhiṣṭhira invokes Kṛṣṇa (Keśava/Vāsudeva) as a competent arbiter of action and consequence, describing the Yādava-Vṛṣṇi-Andhaka political strength and Kṛṣṇa’s capacity to guide rulers, and requests Kṛṣṇa’s counsel on whether relinquishment or battle would avoid blame while preserving svadharma.
Chapter Arc: संजय के वचनों के प्रत्युत्तर में श्रीकृष्ण का स्वर कठोर हो उठता है—वे धृतराष्ट्र के लिए चेतावनी बनकर कहते हैं कि पाण्डवों की अविनाशिता और धर्म-बल को हल्के में लेना विनाश को बुलाना है। → कृष्ण धृतराष्ट्र-पुत्रों की लोभ-ग्रस्तता और सभा की कायर चुप्पी को उघाड़ते हैं: युधिष्ठिर का शम (क्षमा-शान्ति) ‘सुदुष्कर’ होते हुए भी प्रदर्शित हुआ, फिर भी धृतराष्ट्र सपरिवार गृद्ध (लालची) बना रहा—ऐसे में कलह क्यों न भड़के? वे संकेत करते हैं कि यदि पाण्डव पितृ-धर्म निभाते हुए भी दिष्टवश मृत्यु को प्राप्त हों, तो वह भी उनके लिए प्रशस्त निधन होगा—पर अधर्मियों के लिए नहीं। → सभा-धर्म का निर्णायक क्षण आता है: द्यूतकाले शकुनि की निकृष्ट वाणी और छल का स्मरण कराया जाता है, और बताया जाता है कि कैसे ‘कार्पण्य’ से ग्रस्त राजाओं ने प्रतिवचन न किया; केवल विदुर (क्षत्ता) ने धर्म्य अर्थ बोलकर अल्पबुद्धि को प्रत्युत्तर दिया। यही बिन्दु धृतराष्ट्र के राज्य में अधर्म के संस्थानीकरण का प्रमाण बनता है। → कृष्ण संजय के माध्यम से धृतराष्ट्र को अंतिम रूप से स्पष्ट करते हैं: पाण्डव शान्ति के लिए स्थिर हैं, सेवा-भाव से भी खड़े हैं, पर वे योद्धा भी समर्थ हैं—धृतराष्ट्र जो कर्तव्य चुनेगा, वही परिणाम का द्वार खोलेगा। क्षत्रिय-धर्म, प्रजा-रक्षा, दान-यज्ञ और धर्म-अध्ययन का स्मरण कराकर वे नीति का मार्ग दिखाते हैं। → धृतराष्ट्र क्या विदुर-वाणी और कृष्ण-चेतावनी को स्वीकार करेगा, या पुत्र-मोह और शकुनि-नीति के साथ चलकर युद्ध को अपरिहार्य बना देगा?
Verse 1
ऑपन-माज बक। डे: एकोनत्रिशो< ध्याय: संजयकी बातोंका प्रत्युत्तर देते हुए श्रीकृष्णका उसे धृतराष्ट्रके लिये चेतावनी देना वायुदेव उवाच अविनाशं संजय पाण्डवाना- मिच्छाम्यहं भूतिमेषां प्रियं च । तथा राज्ञो धृतराष्ट्रस्य सूत समाशंसे बहुपुत्रस्य वृद्धिम्,भगवान् श्रीकृष्णने कहा--सूत संजय! मैं जिस प्रकार पाण्डवोंको विनाशसे बचाना, उनको ऐश्वर्य दिलाना तथा उनका प्रिय करना चाहता हूँ, उसी प्रकार अनेक पुत्रोंसे युक्त राजा धृतराष्ट्रका भी अभ्युदय चाहता हूँ
বায়ুদেব বললেন—হে সূত সঞ্জয়, আমি পাণ্ডবদের বিনাশ থেকে রক্ষা করতে, তাদের ঐশ্বর্য নিশ্চিত করতে এবং যা তাদের প্রিয় তা সাধন করতে চাই। তেমনি বহু পুত্রসমৃদ্ধ বৃদ্ধ রাজা ধৃতরাষ্ট্রেরও কল্যাণ ও উন্নতি আমি কামনা করি।
Verse 2
१ ॥ जज है ्द् जि - ] अ&24७०॥ के ५ | क 5" ः घ. - न है. २ पे ० > 5760४. ह «२७ | ७ शक $ कैप: + 65 30 प्र. ४७०० २७. कामो हि मे संजय नित्यमेव नान्यद् ब्रूयां तान् प्रति शाम्यतेति । राज्ञश्न हि प्रियमेतच्छुणोमि मन्ये चैतत् पाण्डवानां समक्षम्,सूत! मेरी भी सदा यही अभिलाषा है कि दोनों पक्षोंमें शान्ति बनी रहे। “कुन्तीकुमारो! कौरवोंसे संधि करो, उनके प्रति शान्त बने रहो,” इसके सिवा दूसरी कोई बात मैं पाण्डवोंके सामने नहीं कहता हूँ। राजा युधिष्ठिरके मुँहसे भी ऐसा ही प्रिय वचन सुनता हूँ और स्वयं भी इसीको ठीक मानता हूँ
বায়ু বললেন—হে সঞ্জয়, আমার চিরন্তন কামনা একটাই—উভয় পক্ষের মধ্যে শান্তি স্থাপিত হোক। পাণ্ডবদের সামনে আমি এর বাইরে কিছু বলি না—“কৌরবদের সঙ্গে সন্ধি করো, তাদের প্রতি শান্ত থেকো।” রাজা যুধিষ্ঠিরের মুখেও আমি এই একই প্রিয় উপদেশ শুনি, এবং আমিও একে যথার্থ বলে মানি।
Verse 3
सुदुष्करस्तत्र शमो हि नून॑ प्रदर्शित: संजय पाण्डवेन । यस्मिन् गृद्धो धृतराष्ट्र: सपुत्र: कस्मादेषां कलहो नावमूच्छेत्,संजय! जैसा कि पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने प्रकट किया है, राज्यके प्रश्नोंको लेकर दोनों पक्षोंमें शान्ति बनी रहे, यह अत्यन्त दुष्कर जान पड़ता है। पुत्रों-सहित धृतराष्ट्र (इनके स्वत्वरूप) जिस राज्यमें आसक्त होकर उसे लेनेकी इच्छा करते हैं, उसके लिये इन कौरव- पाण्डवोंमें कलह कैसे नहीं बढ़ेगा?
সঞ্জয়! পাণ্ডব যে শান্তির পথ সেখানে দেখিয়েছেন, তা রক্ষা করা নিঃসন্দেহে অতিশয় দুষ্কর। যে রাজ্যে পুত্রসমেত ধৃতরাষ্ট্র লোভে আসক্ত এবং অধিকার করতে উদ্গ্রীব—সে রাজ্যকে কেন্দ্র করে এই কৌরব ও পাণ্ডবদের মধ্যে বিবাদ কীভাবে না জ্বলে উঠবে ও বৃদ্ধি পাবে?
Verse 4
न त्वं धर्म विचारं संजयेह मत्तश्न जानासि युधिष्ठिराच्च । अथो कस्मात् संजय पाण्डवस्य उत्साहिन: पूरयत: स्वकर्म,संजय! तुम यह अच्छी तरह जानते हो कि मुझसे और युधिष्छिरसे धर्मका लोप नहीं हो सकता, तो भी जो उत्साहपूर्वक स्वधर्मका पालन करते हैं तथा शास्त्रोंमें जैसा बताया गया है, उसके अनुसार ही कुट॒म्ब (गृहस्थाश्रम)-में रहते हैं, उन्हीं पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके धर्मलोपकी चर्चा या आशंका तुमने पहले किस आधारपर की है? गृहस्थ आश्रममें रहनेकी जो शास्त्रोक्त विधि है, उसके होते हुए भी इसके ग्रहण अथवा त्यागके विषयमें वेदज्ञ ब्राह्मणोंके भिन्न-भिन्न विचार हैं
সঞ্জয়! ধর্ম বিষয়ে সংশয় কোরো না। তুমি ভালোই জানো—আমার থেকে এবং যুধিষ্ঠিরের থেকে ধর্মচ্যুতি হতে পারে না। তবে যে পাণ্ডব যুধিষ্ঠির উদ্যমসহকারে নিজের কর্তব্য পূর্ণ করে, তার ধর্মহানির আশঙ্কা তুমি আগে কোন ভিত্তিতে করেছিলে?
Verse 5
यथा55ख्यातमावसत: कुट॒म्बे पुरा कस्मात् साधुविलोपमात्थ । अस्मिन् विधौ वर्तमाने यथाव- दुच्चावचा मतयो ब्राह्मणानाम्,संजय! तुम यह अच्छी तरह जानते हो कि मुझसे और युधिष्छिरसे धर्मका लोप नहीं हो सकता, तो भी जो उत्साहपूर्वक स्वधर्मका पालन करते हैं तथा शास्त्रोंमें जैसा बताया गया है, उसके अनुसार ही कुट॒म्ब (गृहस्थाश्रम)-में रहते हैं, उन्हीं पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके धर्मलोपकी चर्चा या आशंका तुमने पहले किस आधारपर की है? गृहस्थ आश्रममें रहनेकी जो शास्त्रोक्त विधि है, उसके होते हुए भी इसके ग्रहण अथवा त्यागके विषयमें वेदज्ञ ब्राह्मणोंके भिन्न-भिन्न विचार हैं
সঞ্জয়! যে ব্যক্তি পরম্পরানুসারে গৃহস্থাশ্রমে বাস করে, তার বিষয়ে তুমি আগে ‘সাধুতার লোপ’ কেন বলেছিলে? গৃহস্থধর্মের এই শাস্ত্রবিধি বিদ্যমান থাকলেও, তা গ্রহণ করা না ত্যাগ করা—এই বিষয়ে বেদজ্ঞ ব্রাহ্মণদের মত নানা রকম।
Verse 6
कर्मणा<<हु: सिद्धिमेके परत्र हित्वा कर्म विद्यया सिद्धिमेके । नाभुज्जानो भक्ष्यभोज्यस्य तृप्येद् विद्वानपीह विदहितं ब्राह्म॒णानाम्,कोई तो (गृहस्थाश्रममें रहकर) कर्मयोगके द्वारा ही परलोकमें सिद्धि-लाभ होनेकी बात बताते हैं,- दूसरे लोग कर्मको त्यागकर ज्ञानके द्वारा ही सिद्धि (मोक्ष)-का प्रतिपादन करते हैं। विद्वान् पुरुष भी इस जगत्में भक्ष्य-भोज्य पदार्थोको भोजन किये बिना तृप्त नहीं हो सकता, अतएव दिद्वान् ब्राह्मणके लिये भी क्षुधानिवृत्तिके लिये भोजन करनेका विधान है
কেউ বলেন—কর্মের দ্বারাই পরলোকে সিদ্ধি লাভ হয়; আবার কেউ বলেন—কর্ম ত্যাগ করে জ্ঞানের দ্বারাই সিদ্ধি (মোক্ষ) অর্জিত হয়। কিন্তু এই জগতে বিদ্বান ব্যক্তিও ভক্ষ্য-ভোজ্য গ্রহণ না করলে তৃপ্ত হতে পারে না; অতএব ব্রাহ্মণদের জন্যও ক্ষুধানিবারণের উদ্দেশ্যে আহার বিধেয়।
Verse 7
या वै विद्या: साधयन्तीह कर्म तासां फलं विद्यते नेतरासाम् । तत्रेह वै दृष्टफलं तु कर्म पीत्वोदकं शाम्यति तृष्णयाडडर्त:,जो विद्याएँ कर्मका सम्पादन करती हैं, उन्हींका फल दृष्टिगोचर होता है, दूसरी विद्याओंका नहीं। विद्या तथा कर्ममें भी कर्मका ही फल यहाँ प्रत्यक्ष दिखायी देता है। प्याससे पीड़ित मनुष्य जल पीकर ही शान्त होता है (उसे जानकर नहीं; अतः गृहस्थाश्रममें रहकर सत्कर्म करना ही श्रेष्ठ है)
যে বিদ্যাগুলি এখানে কর্মসম্পাদনে সহায় হয়, তাদের ফলই প্রত্যক্ষ; অন্য বিদ্যার নয়। এই জগতে কর্মের ফলই চোখে পড়ে—যেমন তৃষ্ণায় কাতর মানুষ জল পান করলেই শান্ত হয়, কেবল জেনে নিলেই নয়।
Verse 8
सो<यं विधिर्विहिित: कर्मणैव संवर्तते संजय तत्र कर्म | तत्र योडन्यत् कर्मण: साधु मन्ये- न्मोघं तस्यालपितं दुर्बलस्य,संजय! ज्ञानका विधान भी कर्मको साथ लेकर ही है; अतः ज्ञानमें भी कर्म विद्यमान है। जो कर्मसे भिन्न कर्मोके त्यागको श्रेष्ठ मानता है, वह दुर्बल है, उसका कथन व्यर्थ ही है
হে সঞ্জয়! এই যে বিধান নির্দিষ্ট হয়েছে, তা কর্মের সঙ্গেই প্রবাহিত হয়; সেখানে কর্মই অন্তর্নিহিত। যে কর্ম থেকে একে বিচ্ছিন্ন করে কর্মত্যাগকে শ্রেয় মনে করে, সে দুর্বল; তার বাক্য নিষ্ফল, হে সঞ্জয়।
Verse 9
कर्मणामी भान्ति देवा: परत्र कर्मणैवेह प्लवते मातरिश्वा । अहोरात्रे विदधत् कर्मणैव अतनन््द्रितो नित्यमुदेति सूर्य:,ये देवता कर्मसे ही स्वर्गलोकमें प्रकाशित होते हैं। वायुदेव कर्मको अपनाकर ही सम्पूर्ण जगत्में विचरण करते हैं तथा सूर्यदेव आलस्य छोड़कर कर्म-द्वारा ही दिन-रातका विभाग करते हुए प्रतिदिन उदित होते हैं
দেবতারা তাঁদের কর্মের দ্বারাই পরলোকে দীপ্তিমান হন। এখানেও মাতরিশ্বা (বায়ু) কর্মকে আশ্রয় করে সমগ্র জগতে বিচরণ করেন; আর সূর্যদেব অলসতাহীন হয়ে কর্মের দ্বারাই দিন-রাত্রির বিভাগ করে প্রতিদিন উদিত হন।
Verse 10
मासार्धमासानथ नक्षत्रयोगा- नतन्द्रितश्रन्द्रमा श्चा भ्युपैति । अतन्द्रितो दहते जातवेदा: समिध्यमान: कर्म कुर्वन् प्रजाभ्य:,चन्द्रमा भी आलस्य त्यागकर (कर्मके द्वारा ही) मास, पक्ष तथा नक्षत्रोंका योग प्राप्त करते हैं; इसी प्रकार जातवेदा (अग्निदेव) भी आलस्यरहित होकर प्रजाके लिये कर्म करते हुए ही प्रज्वलित होकर दाह-क्रिया सम्पन्न करते हैं
চন্দ্রও অলসতা ত্যাগ করে কর্মের দ্বারাই মাস, পক্ষ এবং নক্ষত্র-যোগ লাভ করে। তেমনি জাতবেদা (অগ্নিদেব)ও অলসতাহীন হয়ে, প্রজাদের কল্যাণার্থে নিজের কর্তব্য সম্পাদন করতে করতে, প্রজ্বলিত হলে দহনক্রিয়া সম্পন্ন করে।
Verse 11
अतन्द्रिता भारमिमं महान्तं बिभर्ति देवी पृथिवी बलेन । अतन्द्रिता: शीघ्रमपो वहन्ति संतर्पयन्त्य: सर्वभूतानि नद्यः,पृथ्वीदेवी भी आलस्यशून्य हो (कर्ममें तत्पर रहकर ही) बलपूर्वक विश्वके इस महान् भारको ढोती हैं। ये नदियाँ भी आलस्य छोड़कर (कर्मपरायण हो) सम्पूर्ण प्राणियोंको तृप्त करती हुई शीघ्रतापूर्वक जल बहाया करती हैं
পৃথিবীদেবীও ক্লান্তিহীন হয়ে, কর্মে নিবিষ্ট থেকে, নিজের শক্তিতে এই মহাভার বহন করেন। নদীগুলিও অলসতা ত্যাগ করে দ্রুত জল বহন করে, সকল প্রাণীকে তৃপ্ত করে।
Verse 12
अतन्द्रितो वर्षति भूरितेजा: संनादयजन्नन्तरिक्षं दिशश्चव । अतनन््द्रितो ब्रह्मचर्य चचार श्रेष्ठव्वमिच्छन् बलभिद् देवतानाम्
অলসতাহীন হয়ে, অপরিমেয় তেজস্বী তিনি বৃষ্টি বর্ষণ করলেন—আকাশমণ্ডল ও দিকসমূহ গর্জনে মুখরিত হল। আবার অলসতাহীন হয়েই তিনি ব্রহ্মচর্য পালন করলেন, দেবতাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠত্ব কামনা করে—তিনি শক্তিভেদী।
Verse 13
जिन्होंने देवताओंमें श्रेष्ठ स्थान पानेकी इच्छासे तन््द्रारहित होकर ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया था, वे महातेजस्वी बलसूदन इन्द्र भी आलस्य छोड़कर (कर्मपरायण होकर ही) मेघगर्जनाद्वारा आकाश तथा दिशाओंको गुँजाते हुए समय-समयपर वर्षा करते हैं ।। हित्वा सुखं मनसश्न प्रियाणि तेन शक्र: कर्मणा श्रैष्ठ्यमाप । सत्यं धर्म पालयन्नप्रमत्तो दमं तितिक्षां समतां प्रियं च,इन्द्रने सुख तथा मनको प्रिय लगनेवाली वस्तुओंका त्याग करके सत्कर्मके बलसे ही देवताओंमें ऊँची स्थिति प्राप्त की। उन्होंने सावधान होकर सत्य, धर्म, इन्द्रियसंयम, सहिष्णुता, समदर्शिता तथा सबको प्रिय लगनेवाले उत्तम बर्तावका पालन किया था। इन समस्त सदगुणोंका सेवन करनेके कारण ही इन्द्रको देवसग्राट्का श्रेष्ठ पद प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार बृहस्पतिजीने भी नियमपूर्वक समाहित एवं संयतचित्त होकर सुखका परित्याग करके समस्त इन्द्रियोंकों अपने वशमें रखते हुए ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया था। इसी सत्कर्मके प्रभावसे उन्होंने देवगुरुका सम्मानित पद प्राप्त किया है। आकाशके सारे नक्षत्र सत्कर्मके ही प्रभावसे परलोकमें प्रकाशित हो रहे हैं। रुद्र, आदित्य, वसु तथा विश्वदेवगण भी कर्मबलसे ही महत्त्वको प्राप्त हुए हैं
বায়ু বললেন—সুখ ও মনের প্রিয় বস্তুসমূহ ত্যাগ করে শক্র (ইন্দ্র) নিয়মানুবর্তী কর্মের দ্বারা সর্বোচ্চ উৎকর্ষ লাভ করেছিলেন। তিনি সদা সতর্ক থেকে সত্য ও ধর্ম রক্ষা করতেন এবং ইন্দ্রিয়সংযম, সহিষ্ণুতা, সমদৃষ্টি ও সকলের প্রিয় ও কল্যাণকর আচরণ অনুশীলন করতেন।
Verse 14
एतानि सर्वाण्युपसेवमान: स देवराज्यं मघवान् प्राप मुख्यम् । बृहस्पतिर्तब्रह्मचर्य चचार समाहित: संशितात्मा यथावत्,इन्द्रने सुख तथा मनको प्रिय लगनेवाली वस्तुओंका त्याग करके सत्कर्मके बलसे ही देवताओंमें ऊँची स्थिति प्राप्त की। उन्होंने सावधान होकर सत्य, धर्म, इन्द्रियसंयम, सहिष्णुता, समदर्शिता तथा सबको प्रिय लगनेवाले उत्तम बर्तावका पालन किया था। इन समस्त सदगुणोंका सेवन करनेके कारण ही इन्द्रको देवसग्राट्का श्रेष्ठ पद प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार बृहस्पतिजीने भी नियमपूर्वक समाहित एवं संयतचित्त होकर सुखका परित्याग करके समस्त इन्द्रियोंकों अपने वशमें रखते हुए ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया था। इसी सत्कर्मके प्रभावसे उन्होंने देवगुरुका सम्मानित पद प्राप्त किया है। आकाशके सारे नक्षत्र सत्कर्मके ही प्रभावसे परलोकमें प्रकाशित हो रहे हैं। रुद्र, आदित्य, वसु तथा विश्वदेवगण भी कर्मबलसे ही महत्त्वको प्राप्त हुए हैं
বায়ু বললেন—এই সকল গুণ সাধন করে মঘবান (ইন্দ্র) দেবলোকের সর্বোচ্চ রাজ্য লাভ করেছিলেন। তদ্রূপ বৃহস্পতিও সংহতচিত্ত ও সংযত আত্মা হয়ে যথাবিধি ব্রহ্মচর্য পালন করেছিলেন।
Verse 15
हित्वा सुखं प्रतिरुध्येन्द्रियाणि तेन देवानामगमद् गौरवं सः । तथा नक्षत्राणि कर्मणामुत्र भान्ति रुद्रादित्या वसवो5थापि विश्वे,इन्द्रने सुख तथा मनको प्रिय लगनेवाली वस्तुओंका त्याग करके सत्कर्मके बलसे ही देवताओंमें ऊँची स्थिति प्राप्त की। उन्होंने सावधान होकर सत्य, धर्म, इन्द्रियसंयम, सहिष्णुता, समदर्शिता तथा सबको प्रिय लगनेवाले उत्तम बर्तावका पालन किया था। इन समस्त सदगुणोंका सेवन करनेके कारण ही इन्द्रको देवसग्राट्का श्रेष्ठ पद प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार बृहस्पतिजीने भी नियमपूर्वक समाहित एवं संयतचित्त होकर सुखका परित्याग करके समस्त इन्द्रियोंकों अपने वशमें रखते हुए ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया था। इसी सत्कर्मके प्रभावसे उन्होंने देवगुरुका सम्मानित पद प्राप्त किया है। आकाशके सारे नक्षत्र सत्कर्मके ही प्रभावसे परलोकमें प्रकाशित हो रहे हैं। रुद्र, आदित्य, वसु तथा विश्वदेवगण भी कर्मबलसे ही महत्त्वको प्राप्त हुए हैं
বায়ু বললেন—সুখ ত্যাগ করে এবং ইন্দ্রিয়সমূহ সংযত করে, তিনি সৎকর্মের বলেই দেবদের মধ্যে মহান গৌরব লাভ করেছিলেন। তদ্রূপ নক্ষত্রসমূহও পরলোকে নিজেদের কর্মের প্রভাবে দীপ্তিমান; আর রুদ্র, আদিত্য, বসু ও বিশ্বদেবগণও কর্মবলেই মহত্ত্বে পৌঁছেছেন।
Verse 16
यमो राजा वैश्रवण: कुबेरो गन्धर्वयक्षाप्सरसश्व सूत । ब्रह्मविद्यां ब्रह्मचर्य क्रियां च निषेवमाणा ऋषयोअमुत्र भान्ति,सूत! यमराज, विश्रवाके पुत्र कुबेर, गन्धर्व, यक्ष तथा अप्सराएँ भी अपने-अपने कर्मोंके प्रभावसे ही स्वर्गमें विराजमान हैं। ब्रह्मज्ञान तथा ब्रह्मचर्यकर्मका सेवन करनेवाले महर्षि भी कर्मबलसे ही परलोकमें प्रकाशमान हो रहे हैं
বায়ু বললেন—হে সূত! রাজা যম, বৈশ্রবণ কুবের, এবং গন্ধর্ব, যক্ষ ও অপ্সরাগণও নিজেদের কর্মের বলেই স্বর্গে দীপ্তিমান। তদ্রূপ ব্রহ্মবিদ্যা, ব্রহ্মচর্য ও বৈদিক আচার-অনুষ্ঠানে নিবিষ্ট মহর্ষিরাও পরলোকে অনুশীলিত কর্মের শক্তিতে উজ্জ্বল হন।
Verse 17
जानन्निमं सर्वलोकस्य धर्म विप्रेन्द्राणां क्षत्रियाणां विशां च । स कस्मात् त्वं जानतां ज्ञानवान् सन् व्यायच्छसे संजय कौरवार्थे
বায়ু বললেন—তুমি সেই ধর্ম জানো যা সকল লোককে ধারণ করে—ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ, ক্ষত্রিয় এবং বৈশ্যদের যথোচিত আচরণ। তবে হে সংজয়! জ্ঞানীদের মধ্যে জ্ঞানবান হয়েও কৌরবদের স্বার্থে তুমি কেন নিজেকে সংযত করে পিছিয়ে থাকছ?
Verse 18
संजय! तुम श्रेष्ठ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा सम्पूर्ण लोकोंके इस सुप्रसिद्ध धर्मको जानते हो। तुम ज्ञानियोंमें भी श्रेष्ठ ज्ञानी हो, तो भी तुम कौरवोंकी स्वार्थसिद्धिके लिये क्यों वाग्जाल फैला रहे हो? ।। आम्नायेषु नित्यसंयोगमस्य तथाश्वमेधे राजसूये च विद्धि । संयुज्यते धनुषा वर्मणा च हस्त्यश्वाद्यै रथशस्त्रैश्न भूय:,राजा युधिष्ठिरका वेद-शास्त्रोंके साथ स्वाध्यायके रूपमें सदा सम्बन्ध बना रहता है। इसी प्रकार अश्वमेध तथा राजसूय आदि यज्ञोंसे भी इनका सदा लगाव है। ये धनुष और कवचसे भी संयुक्त हैं। हाथी-घोड़े आदि वाहनों, रथों और अस्त्र-शस्त्रोंकी भी इनके पास कमी नहीं है। ये कुन्तीपुत्र यदि कौरवोंका वध किये बिना ही अपने राज्यकी प्राप्तिका कोई दूसरा उपाय जान लेंगे, तो भीमसेनको आग्रहपूर्वक आर्य पुरुषोंके द्वारा आचरित सद्व्यवहारमें लगाकर धर्मरक्षारूप पुण्यका ही सम्पादन करेंगे, तुम ऐसा (भलीभाँति) समझ लो
বায়ু বললেন— “সঞ্জয়! শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণ, ক্ষত্রিয়, বৈশ্য এবং সমগ্র লোকসমাজ যে সুপ্রসিদ্ধ ধর্ম পালন করে, তুমি তা জানো। তুমি জ্ঞানীদের মধ্যেও শ্রেষ্ঠ; তবু কৌরবদের স্বার্থসিদ্ধির জন্য কেন বাক্যজাল বিস্তার করছ? জেনে রেখো—রাজা যুধিষ্ঠির নিত্য স্বাধ্যায়ের দ্বারা বেদ-শাস্ত্রের সঙ্গে যুক্ত; অশ্বমেধ ও রাজসূয় প্রভৃতি মহাযজ্ঞেও তাঁর অবিচল অনুরাগ। তিনি ধনুক ও বর্মে সজ্জিত, এবং হাতি-ঘোড়া, রথ ও অস্ত্রশস্ত্রেও তাঁর প্রাচুর্য আছে। যদি কুন্তীপুত্রেরা কৌরবদের বধ না করেই রাজ্য পুনরুদ্ধারের কোনো উপায় জানতে পারে, তবে তারা ভীমসেনকে সংযত করে আর্যজনের আচরিত সদ্বৃত্তে স্থাপন করবে এবং ধর্মরক্ষারূপ পুণ্যই অর্জন করবে—এ কথা স্পষ্ট জেনে রেখো।”
Verse 19
ते चेदिमे कौरवाणामुपाय- मवगच्छेयुरवधेनैव पार्था: । धर्मत्राणं पुण्यमेषां कृतं स्था- दार्ये वृत्ते भीमसेनं निगृहा,राजा युधिष्ठिरका वेद-शास्त्रोंके साथ स्वाध्यायके रूपमें सदा सम्बन्ध बना रहता है। इसी प्रकार अश्वमेध तथा राजसूय आदि यज्ञोंसे भी इनका सदा लगाव है। ये धनुष और कवचसे भी संयुक्त हैं। हाथी-घोड़े आदि वाहनों, रथों और अस्त्र-शस्त्रोंकी भी इनके पास कमी नहीं है। ये कुन्तीपुत्र यदि कौरवोंका वध किये बिना ही अपने राज्यकी प्राप्तिका कोई दूसरा उपाय जान लेंगे, तो भीमसेनको आग्रहपूर्वक आर्य पुरुषोंके द्वारा आचरित सद्व्यवहारमें लगाकर धर्मरक्षारूप पुण्यका ही सम्पादन करेंगे, तुम ऐसा (भलीभाँति) समझ लो
বায়ু বললেন— “যদি এই পার্থেরা কৌরবদের সঙ্গে বধ ছাড়াই কোনো উপায় অবগত হয়, তবে তারা ভীমসেনকে সংযত করে আর্যজনের আচরিত সদ্বৃত্তে স্থাপন করবে; আর তাদের এই কর্ম হবে ধর্মরক্ষারূপ পুণ্য। এটি ভালো করে জেনে রেখো।”
Verse 20
ते चेत् पित्रये कर्मणि वर्तमाना आपसट्येरन् दिष्टवशेन मृत्युम् । यथाशक्त्या पूरयन्त: स्वकर्म तदप्येषां निधन स्यात् प्रशस्तम्,पाण्डव अपने बाप-दादोंके कर्म-क्षात्रधर्म (युद्ध आदि)-में प्रवृत्त हो यथाशक्ति अपने कर्तव्यका पालन करते हुए यदि दैववश मृत्युको भी प्राप्त हो जायेँ तो इनकी वह मृत्यु उत्तम ही मानी जायगी
যদি তারা পিতৃপরম্পরাগত কর্মে—অর্থাৎ ক্ষাত্রধর্মে (যুদ্ধাদি)—প্রবৃত্ত হয়ে যথাশক্তি কর্তব্য পালন করতে করতে, ভাগ্যবশত মৃত্যুকেও বরণ করে, তবে সেই মৃত্যুও তাদের জন্য প্রশস্ত ও মহৎ বলে গণ্য হবে।
Verse 21
उताहो त्वं मन्यसे शाम्यमेव राज्ञां युद्धे वर्तते धर्मतन्त्रम् । अयुद्धे वा वर्तते धर्मतन्त्रं तथैव ते वाचमिमां शृणोमि
বায়ু বললেন— “অথবা তুমি কি মনে কর যে রাজাদের ধর্মের বুনন কেবল যুদ্ধেই কার্যকর? নাকি যুদ্ধ না করলেও সেই একই ধর্মসূত্র চলে? তোমার কথা শুনে তো তেমনই মনে হয়।”
Verse 22
यदि तुम शान्ति धारण करना ही ठीक समझते हो तो बताओ, युद्धमें प्रवृत्त होनेसे राजाओंके धर्मका ठीक-ठीक पालन होता है या युद्ध छोड़कर भाग जानेसे? क्षत्रियधर्मका विचार करते हुए तुम जो कुछ भी कहोगे, मैं तुम्हारी वही बात सुननेको उद्यत हूँ ।। चातुर्वर्ण्यस्य प्रथमं संविभाग- मवेक्ष्य त्वं संजय स्वं च कर्म । निशम्याथो पाण्डवानां च कर्म प्रशंस वा निन्द वा या मतिस्ते,संजय! तुम पहले ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके विभाग तथा उनमेंसे प्रत्येक वर्णके अपने-अपने कर्मको देख लो। फिर पाण्डवोंके वर्तमान कर्मपर दृष्टिपात करो; तत्पश्चात् जैसा तुम्हारा विचार हो, उसके अनुसार इनकी प्रशंसा अथवा निन््दा करना
বায়ু বললেন— “যদি তুমি সত্যিই মনে কর যে শান্তি ধারণ করাই যথার্থ পথ, তবে বলো—রাজাদের ধর্ম কি যথাযথভাবে যুদ্ধ গ্রহণ করলে পালিত হয়, না যুদ্ধ ত্যাগ করে পলায়ন করলে? ক্ষাত্রধর্ম বিচার করে তুমি যা বলবে, আমি তাই শুনতে প্রস্তুত। প্রথমে, সঞ্জয়, চতুর্বর্ণের মূল বিভাগ এবং প্রত্যেকের নির্দিষ্ট কর্ম দেখো, এবং নিজের কর্তব্যও বিবেচনা করো। তারপর পাণ্ডবদের বর্তমান আচরণ মনোযোগ দিয়ে লক্ষ করো; এরপর তোমার বিচার অনুযায়ী তাদের প্রশংসা করো বা নিন্দা।”
Verse 23
अधीयीत ब्राह्मणो वै यजेत दद्यादीयात् तीर्थमुख्यानि चैव । अध्यापयेद् याजयेच्चापि याज्यान् प्रतिग्रहान् वा विहितान् प्रतीच्छेत्,ब्राह्मण अध्ययन, यज्ञ एवं दान करे तथा प्रधान-प्रधान तीर्थोंकी यात्रा करे, शिष्योंको पढ़ावे और यजमानोंका यज्ञ करावे अथवा शाख्त्रविहित प्रतिग्रह (दान) स्वीकार करे
বায়ু বললেন—ব্রাহ্মণকে বেদাধ্যয়নে নিবিষ্ট থাকতে হবে; যজ্ঞ করতে হবে; বিধিমতো দান করতে এবং যা উপযুক্ত তা গ্রহণ করতে হবে; এবং প্রধান তীর্থসমূহে গমন করতে হবে। সে শিষ্যদের অধ্যাপন করবে, যোগ্য যজমানের যজ্ঞ সম্পাদন করাবে, আর কেবল শাস্ত্রসম্মত দানই গ্রহণ করবে।
Verse 24
(अधीयीत क्षत्रियो5थो यजेत दद्याद् दानं न तु याचेत किंचित् । न याजयेन्नापि चाध्यापयीत एष स्मृतः क्षत्रधर्म: पुराण: ।। ) इसी प्रकार क्षत्रिय स्वाध्याय, यज्ञ और दान करे। किसीसे किसी भी वस्तुकी याचना न करे। वह न तो दूसरोंका यज्ञ करावे और न अध्यापनका ही कार्य करे; यही धर्मशास्त्रोंमें क्षत्रियोंका प्राचीन धर्म बताया गया है। तथा राजन्यो रक्षणं वै प्रजानां कृत्वा धर्मेणाप्रमत्तो5थ दत्त्वा । यज्जैरिष्टवा सर्ववेदानधीत्य दारान् कृत्वा पुण्यकृदावसेद् गृहान्
বায়ু বললেন—ক্ষত্রিয়ও স্বাধ্যায় করবে, যজ্ঞ করবে এবং দান দেবে; কিন্তু কোনো কিছুর জন্য ভিক্ষা চাইবে না। সে অন্যের যজ্ঞ করাবে না, অধ্যাপনও করবে না—এটাই স্মৃতিতে ঘোষিত ক্ষত্রধর্ম, প্রাচীন। সে ধর্মপথে প্রজারক্ষা করে, দান করে, যজ্ঞে ইষ্ট করে, সকল বেদ অধ্যয়ন করে, বিবাহ করে, পুণ্যকর্মে রত হয়ে গৃহে বাস করবে।
Verse 25
वैश्यो5धीत्य कृषिगोरक्षपण्यै- वित्त चिन्चन् पालयन्नप्रमत्त:
বায়ু বললেন—বৈশ্য নিজের কর্তব্য জেনে কৃষি, গোরক্ষা ও বাণিজ্যের দ্বারা ধন উপার্জন করবে এবং তা সতর্কভাবে রক্ষা ও পরিচালনা করবে; কখনও অসাবধান হবে না।
Verse 26
प्रियं कुर्वन् ब्राह्मणक्षत्रियाणां धर्मशील: पुण्यकृदावसेद् गृहान् । वैश्य अध्ययन करके कृषि, गोरक्षा तथा व्यापारद्वारा धनोपार्जन करते हुए सावधानीके साथ उसकी रक्षा करे। ब्राह्मणों और क्षत्रियोंका प्रिय करते हुए धर्मशील एवं पुण्यात्मा होकर वह गृहस्थाश्रममें निवास करे ।। परिचर्या वन्दनं ब्राह्मणानां नाधीयीत प्रतिषिद्धो5स्य यज्ञ: । नित्योत्थितो भूतये5तन्द्रित: स्या- देवं स्मृतः शूद्रधर्म: पुराण: २६ ।। शूद्र ब्राह्मणोंकी सेवा तथा वन्दना करे, वेदोंका स्वाध्याय न करे। उसके लिये यज्ञका भी निषेध है। वह सदा उद्योगी और आलस्यरहित होकर अपने कल्याणके लिये चेष्टा करे। इस प्रकार शूद्रोंका प्राचीन धर्म बताया गया है
বায়ু বললেন—বৈশ্য ব্রাহ্মণ ও ক্ষত্রিয়দের প্রিয় সাধন করে, ধর্মশীল ও পুণ্যকর্মে রত হয়ে গৃহস্থাশ্রমে বাস করবে। আর শূদ্র ব্রাহ্মণদের সেবা ও বন্দনা করবে; বেদাধ্যয়ন করবে না—তার জন্য যজ্ঞ নিষিদ্ধ। সে সর্বদা কর্মোদ্যত থাকবে, অলসতামুক্ত হয়ে নিজের কল্যাণে চেষ্টা করবে—এটাই শূদ্রের প্রাচীন ধর্ম বলে স্মৃত।
Verse 27
एतान् राजा पालयजन्नप्रमत्तो नियोजयन् सर्ववर्णान् स्वधर्मे । अकामात्मा समतवृत्तिः प्रजासु नाधार्मिकाननुरुध्येत कामान्,राजा सावधानीके साथ इन सब वर्णोका पालन करते हुए ही इन्हें अपने-अपने धर्ममें लगावे। वह कामभोगमें आसक्त न होकर समस्त प्रजाओंके साथ समानभावसे बर्ताव करे और पापपूर्ण इच्छाओंका कदापि अनुसरण न करे
বায়ু বললেন—রাজা সতর্ক ও অপ্রমত্ত হয়ে এদের রক্ষা করবে এবং সকল বর্ণকে তাদের নিজ নিজ স্বধর্মে নিয়োজিত করবে। সে কামনায় আসক্ত হবে না, প্রজাদের প্রতি সমদৃষ্টি রাখবে, এবং অধার্মিক বাসনার অনুসরণ কখনও করবে না।
Verse 28
श्रेयांस्तस्माद् यदि विद्येत कश्नि- दभिज्ञात: सर्वधर्मोपपन्न: । सतं द्रष्टमनुशिष्यात् प्रजानां न चैतद् बुध्येदिति तस्मिन्नसाधु:,यदि राजाको यह ज्ञात हो जाय कि उसके राज्यमें कोई सर्वधर्मसम्पन्न श्रेष्ठ पुरुष निवास करता है तो वह उसीको प्रजाके गुण-दोषका निरीक्षण करनेके लिये नियुक्त करे तथा उसके द्वारा पता लगवावे कि मेरे राज्यमें कोई पापकर्म करनेवाला तो नहीं है
অতএব রাজা যদি নিজের রাজ্যে এমন কোনো উৎকৃষ্ট পুরুষকে জানতে পারেন—যিনি বিচক্ষণ এবং সর্বধর্মে সুপ্রতিষ্ঠিত—তবে সেই অভিজ্ঞ সজ্জনকে প্রজাদের আচরণ পর্যবেক্ষণ ও শাসনের জন্য নিযুক্ত করা উচিত। তাঁর মাধ্যমেই রাজা জেনে নেবেন, রাজ্যে কেউ পাপকর্মে লিপ্ত কি না; যে এ কথা বুঝেও কার্যকর করে না, সে এই বিষয়ে সৎপথে নেই।
Verse 29
यदा गृध्येत् परभूतौ नृशंसो विधिप्रकोपाद् बलमाददान: । ततो राज्ञामभवद् युद्धमेतत् तत्र जात॑ वर्म शस्त्र धनुश्च,जब कोई क्रूर मनुष्य दूसरेकी धन-सम्पत्तिमें लालच रखकर उसे ले लेनेकी इच्छा करता है और विधाताके कोपसे (परपीडनके लिये) सेना-संग्रह करने लगता है, उस समय राजाओंमें युद्धका अवसर उपस्थित होता है। इस युद्धके लिये ही कवच, अस्त्र-शस्त्र और धनुषका आविष्कार हुआ है इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि कृष्णवाक्ये एकोनत्रिंशो 5ध्याय:
যখন কোনো নিষ্ঠুর ব্যক্তি অন্যের ধনসম্পত্তির প্রতি লোভ করে এবং বিধির ক্রোধে প্ররোচিত হয়ে পরকে পীড়া দিতে শক্তি সঞ্চয় করতে থাকে, তখন রাজাদের মধ্যে যুদ্ধের উপলক্ষ উপস্থিত হয়। এই যুদ্ধের জন্যই বর্ম, অস্ত্রশস্ত্র ও ধনুকের উদ্ভব—সংঘর্ষ ও লোভেরই সন্তান এগুলি।
Verse 30
इन्द्रेणेतद् दस्युवधाय कर्म उत्पादितं वर्म शस्त्र धनुश्च,स्वयं देवराज इन्द्रने ऐसे लुटेरोंका वध करनेके लिये कवच, अस्त्र-शस्त्र और धनुषका आविष्कार किया है
দস্যুদের বধের জন্যই ইন্দ্র এই ব্যবস্থা উৎপন্ন করেছিলেন; স্বয়ং দেবরাজ ইন্দ্রই বর্ম, অস্ত্রশস্ত্র ও ধনুক নির্মাণ করেছিলেন, যাতে এমন লুটেরাদের দমন ও বিনাশ করা যায়।
Verse 31
तत्र पुण्यं दस्युवधेन लभ्यते सो<यं दोष: कुरुभिस्तीव्ररूप: । अधर्मजिर्धर्ममबुध्यमानै: प्रादुर्भूत: संजय साधु तन्न,(राजाओंको) लुटेरोंका वध करनेसे पुण्यकी प्राप्ति होती है। संजय! कौरवोंमें यह लुटेरेपनका दोष तीव्ररूपसे प्रकट हो गया है, जो अच्छा नहीं है। वे अधर्मके तो पूरे पण्डित हैं; परंतु धर्मकी बात बिलकुल नहीं जानते
এমন ক্ষেত্রে দস্যু বধে পুণ্য লাভ হয়। কিন্তু, হে সংজয়, কুরুবংশে সেই দোষই—লুটেরার মতো প্রবৃত্তি—ভয়ংকর রূপে প্রকাশ পেয়েছে; এটি শুভ নয়। তারা অধর্মে দক্ষ, অথচ ধর্মকে বুঝতেই পারে না।
Verse 32
तत्र राजा धृतराष्ट्र: सपुत्रो धर्म्य हरेत् पाण्डवानामकस्मात् | नावेक्षन्ते राजधर्म पुराणं तदन्वया: कुरव: सर्व एव,राजा धृतराष्ट्र अपने पुत्रोंके साथ मिलकर सहसा पाण्डवोंके धर्मतः प्राप्त उनके पैतृक राज्यका अपहरण करनेको उतारू हो गये हैं। अन्य समस्त कौरव भी उन्हींका अनुसरण कर रहे हैं। वे प्राचीन राजधर्मकी ओर नहीं देखते हैं
সেখানে রাজা ধৃতরাষ্ট্র পুত্রসমেত হঠাৎই পাণ্ডবদের সেই পৈতৃক রাজ্য—যা ধর্মানুসারে তাদের প্রাপ্য—হরণ করতে উদ্যত হয়েছেন। আর তাঁর অনুসারী সকল কুরু প্রাচীন রাজধর্মের দিকে দৃষ্টি দেয় না; যুগযুগান্তরের রাজমর্যাদা তারা উপেক্ষা করছে।
Verse 33
स्तेनो हरेद् यत्र धन हादृष्ट: प्रसह वा यत्र हरेत दृष्ट: । उभौ गह्याँ भवतः संजयैतौ कि वै पृथक्त्वं धृतराष्ट्रस्य पुत्रे,चोर छिपा रहकर धन चुरा ले जाय अथवा सामने आकर डाका डाले, दोनों ही दशाओंमें वे चोर-डाकू निन्दाके ही पात्र होते हैं। संजय! तुम्हीं कहो, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन और उन चोर-डाकुओंमें क्या अन्तर है?
চোর অদৃশ্য থেকে ধন চুরি করুক, কিংবা চোখের সামনেই বলপ্রয়োগে কেড়ে নিক—উভয় অবস্থাতেই সে নিন্দনীয় এবং ধরা পড়বার যোগ্য। সঞ্জয়, বলো তো—এমন চোর-ডাকাতদের সঙ্গে ধৃতরাষ্ট্রপুত্র দুর্যোধনের প্রকৃত পার্থক্য কোথায়?
Verse 34
सो<यं लोभान्मन्यते धर्ममेतं यमिच्छति क्रोधवशानुगामी । भाग: पुनः पाण्डवानां निविष्ट- स्तं न: कस्मादाददीरन् परे वै,दुर्योधन क्रोधके वशीभूत हो उसके अनुसार चलनेवाला है और वह लोभसे राज्यको ले लेना चाहता है। इसे वह धर्म मान रहा है; परंतु वह तो पाण्डवोंका भाग है, जो कौरवोंके यहाँ धरोहरके रूपमें रखा गया है। संजय! हमारे उस भागको हमसे शत्रुता रखनेवाले कौरव कैसे ले सकते हैं?
লোভে চালিত হয়ে, ক্রোধের বশবর্তী এই দুর্যোধন যে পথ চায় তাকেই ‘ধর্ম’ বলে মনে করছে এবং রাজ্য হরণ করতে উদ্যত। কিন্তু সে অংশ তো পাণ্ডবদেরই; কৌরবদের কাছে তা কেবল আমানতরূপে রাখা আছে। সঞ্জয়! আমাদের প্রতি বৈরী সেই কৌরবরা কীভাবে আমাদের সেই অংশ আমাদের থেকে কেড়ে নিতে পারে?
Verse 35
अस्मिन् पदे युध्यतां नो वधो5पि श्लाघ्य: पित्रयं परराज्याद् विशिष्टम् । एतान् धर्मान् कौरवाणां पुराणा- नाचक्षीथा: संजय राजमध्ये,सूत! इस राज्यभागकी प्राप्तिके लिये युद्ध करते हुए हमलोगोंका वध हो जाय तो वह भी हमारे लिये स्पृहणीय ही है। बाप-दादोंका राज्य पराये राज्यकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। संजय! तुम राजाओंकी मण्डलीमें राजाओंके इन प्राचीन धर्मोंका कौरवोंके समक्ष वर्णन करना
এই ন্যায্য অংশ লাভের জন্য যুদ্ধ করতে গিয়ে যদি আমাদের মৃত্যু পর্যন্ত হয়, তবু তা আমাদের জন্য গৌরবেরই বিষয়। পিতৃপুরুষের রাজ্য পরের রাজ্যের চেয়ে শ্রেষ্ঠ। অতএব, সঞ্জয়—হে সূত! রাজাদের সভামাঝে কৌরবদের এই প্রাচীন ধর্ম-নীতি ঘোষণা করো।
Verse 36
एते मदान्मृत्युवशाभिपन्ना: समानीता धार्तराष्ट्रेण मूढा: । इदं पुनः कर्म पापीय एव सभामध्ये पश्य वृत्तं कुरूणाम्,दुर्योधनने जिन्हें युद्धके लिये बुलवाया है, वे मूर्ख राजा बलके मदसे मोहित होकर मौतके फंदेमें फँस गये हैं। संजय! भरी सभामें कौरवोंने जो यह अत्यन्त पापपूर्ण कर्म किया था, उनके इस दुराचारपर दृष्टि डालो
যুদ্ধের জন্য যাদের দুর্যোধন ডেকেছে, সেই মূঢ় রাজারা শক্তির মদে মোহিত হয়ে মৃত্যুর ফাঁদে এসে পড়েছে। সঞ্জয়! রাজসভামাঝে কৌরবরা যে অতিশয় পাপপূর্ণ কর্ম করেছিল—তাদের সেই দুষ্কর্মের দিকে আবার দৃষ্টি দাও।
Verse 37
प्रियां भार्या द्रौपदी पाण्डवानां यशस्विनीं शीलवृत्तोपपन्नाम् | यदुपैक्षन्त कुरवो भीष्ममुख्या: कामानुगेनोपरुद्धां व्रजन्तीम्,पाण्डवोंकी प्यारी पत्नी यशस्विनी द्रौपदी जो शील और सदाचारसे सम्पन्न है, रजस्वला-अवस्थामें सभाके भीतर लायी जा रही थी, परंतु भीष्म आदि प्रधान कौरवोंने भी उसकी ओरसे उपेक्षा दिखायी
পাণ্ডবদের প্রিয় পত্নী, যশস্বিনী দ্রৌপদী—যিনি শীল ও সদাচারে সমৃদ্ধ—কামান্ধদের দ্বারা অপমানিত হয়ে অসহায় অবস্থায় সভার দিকে টেনে নিয়ে যাওয়া হচ্ছিল; তবু ভীষ্মপ্রমুখ কৌরবরা তাকে রক্ষা না করে উদাসীন দৃষ্টিতে তাকিয়ে রইল।
Verse 38
त॑ चेत् तदा ते सकुमारवृद्धा अवारयिष्यन् कुरव: समेता: । मम प्रियं धृतराष्ट्रो5करिष्यत् पुत्राणां च कृतमस्याभविष्यत्,यदि बालकसे लेकर बूढ़ेतक सभी कौरव उस समय दुःशासनको रोक देते तो राजा धृतराष्ट्र मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करते तथा उनके पुत्रोंका भी प्रिय मनोरथ सिद्ध हो जाता
বায়ু বললেন— যদি সেই সময় কিশোর থেকে বৃদ্ধ পর্যন্ত সকল কুরু একত্র হয়ে দুঃশাসনকে নিবৃত্ত করত, তবে রাজা ধৃতরাষ্ট্র আমার অতি প্রিয় কাজটি করতেন; আর তাঁর পুত্রদেরও প্রিয় অভিপ্রায় সিদ্ধ হত।
Verse 39
दुःशासन: प्रातिलोम्यान्निनाय सभामध्ये श्वशुराणां च कृष्णाम् । सा तत्र नीता करुणं व्यपेक्ष्य नानय॑ क्षत्तु्नाथमवाप किंचित्,दुःशासन मर्यादाके विपरीत द्रौपदीको सभाके भीतर श्वशुरजनोंके समक्ष घसीट ले गया। द्रौपदीने वहाँ जाकर कातरभावसे चारों ओर करुणदृष्टि डाली, परंतु उसने वहाँ विदुरजीके सिवा और किसीको अपना रक्षक नहीं पाया
দুঃশাসন শিষ্টাচার ও ন্যায়ক্রমের সম্পূর্ণ বিরুদ্ধ আচরণ করে কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)-কে টেনে হিঁচড়ে সভামধ্যে, শ্বশুরকুলের জ্যেষ্ঠদের সম্মুখে নিয়ে গেল। সেখানে আনা হলে তিনি করুণ দৃষ্টিতে চারদিকে চেয়ে আশ্রয় খুঁজলেন; কিন্তু সেই সভায় বিদুর ক্ষত্তা ব্যতীত আর কাউকে সত্য রক্ষক রূপে পেলেন না।
Verse 40
कार्पण्यादेव सहितास्तत्र भूपा नाशवनुवन् प्रतिवक्तुं सभायाम् | एक: क्षत्ता धर्म्यमर्थ ब्रुवाणो धर्मबुद्धा प्रत्युवाचाल्पबुद्धिम्,उस समय सभामें बहुत-से भूपाल एकत्रित थे, परंतु अपनी कायरताके कारण वे उस अन्यायका प्रतिवाद न कर सके। एकमात्र विदुरजीने अपना धर्म समझकर मन्दबुद्धि दुर्योधनसे धर्मानुकूल वचन कहकर उसके अन्यायका विरोध किया
সেই রাজসভায় বহু রাজা সমবেত ছিলেন; কিন্তু ভীরুতার কারণে তারা সেই অন্যায়ের প্রতিবাদ করতে সাহস পেলেন না। একমাত্র ক্ষত্তা বিদুরই ধর্মবুদ্ধিতে ধর্মসঙ্গত কথা বলে মন্দবুদ্ধি দুর্যোধনকে উত্তর দিলেন এবং তার দুষ্কর্মের বিরোধিতা করলেন।
Verse 41
अबुदृध्वा त्वं धर्ममेतं सभाया- मथेच्छसे पाण्डवस्योपदेष्टम् । कृष्णा त्वेतत् कर्म चकार शुद्ध सुदुष्करं तत्र सभां समेत्य,संजय! द्यूतसभामें जो अन्याय हुआ था, उसे भुलाकर तुम पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको धर्मका उपदेश देना चाहते हो। द्रौपदीने उस दिन सभामें जाकर अत्यन्त दुष्कर और पवित्र कार्य किया कि उसने पाण्डवों तथा अपनेको महान् संकटसे बचा लिया; ठीक उसी तरह, जैसे नौका समुद्रकी अगाध जलराशिमें डूबनेसे बचा लेती है। उस सभामें कृष्णा श्वशुरजनोंके समीप खड़ी थी, तो भी सूतपुत्र कर्णने उसे अपमानित करते हुए कहा --'याज्ञसेनि! अब तेरे लिये दूसरी गति नहीं है, तू दासी बनकर दुर्योधनके महलमें चली जा। पाण्डव जूएमें अपनेको हार चुके हैं, अतः अब वे तेरे पति नहीं रहे। भाविनि! अब तू किसी दूसरेको अपना पति वरण कर ले'
সঞ্জয়! সভায় যে ধর্ম-ব্যবস্থা ছিল, তা যথার্থ না বুঝেই তুমি পাণ্ডুনন্দন যুধিষ্ঠিরকে ধর্মোপদেশ দিতে চাও। অথচ কৃষ্ণা (দ্রৌপদী) সেই সভায় প্রবেশ করে এক অতি দুষ্কর ও পবিত্র কর্ম করেছিল—যার দ্বারা সে পাণ্ডবদের ও নিজেকে মহাবিপদ থেকে উদ্ধার করেছিল, যেমন নৌকা সমুদ্রের প্রবল স্রোত থেকে রক্ষা করে। আর সেই সভাতেই, শ্বশুরকুলের জ্যেষ্ঠদের নিকটে দাঁড়িয়ে থাকা কৃষ্ণাকে সূতপুত্র কর্ণ অপমান করে বলেছিল— ‘যাজ্ঞসেনী! এখন তোমার আর কোনো গতি নেই; দাসী হয়ে দুর্যোধনের প্রাসাদে যাও। পাণ্ডবেরা পাশায় নিজেদেরই হেরে গেছে; অতএব তারা আর তোমার স্বামী নয়। ভবিনী! এখন অন্য কাউকে স্বামী হিসেবে বরণ কর।’
Verse 42
येन कृच्छात् पाण्डवानुज्जहार तथा5त्मानं नौरिव सागरौघात् | यत्राब्रवीत् सूतपुत्र: सभायां कृष्णां स्थितां श्वशुराणां समीपे,संजय! द्यूतसभामें जो अन्याय हुआ था, उसे भुलाकर तुम पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको धर्मका उपदेश देना चाहते हो। द्रौपदीने उस दिन सभामें जाकर अत्यन्त दुष्कर और पवित्र कार्य किया कि उसने पाण्डवों तथा अपनेको महान् संकटसे बचा लिया; ठीक उसी तरह, जैसे नौका समुद्रकी अगाध जलराशिमें डूबनेसे बचा लेती है। उस सभामें कृष्णा श्वशुरजनोंके समीप खड़ी थी, तो भी सूतपुत्र कर्णने उसे अपमानित करते हुए कहा --'याज्ञसेनि! अब तेरे लिये दूसरी गति नहीं है, तू दासी बनकर दुर्योधनके महलमें चली जा। पाण्डव जूएमें अपनेको हार चुके हैं, अतः अब वे तेरे पति नहीं रहे। भाविनि! अब तू किसी दूसरेको अपना पति वरण कर ले'
সঞ্জয়! সেই কর্ম স্মরণ কর—যার দ্বারা দ্রৌপদী মহাকষ্টে পাণ্ডবদের ও নিজেকে বিপদ থেকে উদ্ধার করেছিল, যেমন নৌকা সমুদ্রের উচ্ছ্বসিত স্রোত থেকে রক্ষা করে। আর সেই সভাতেই, শ্বশুরকুলের জ্যেষ্ঠদের নিকটে দাঁড়িয়ে থাকা কৃষ্ণাকে সূতপুত্র কর্ণ অপমানজনক কথা বলেছিল। তবু পাশাখেলার সভার সেই অন্যায় উপেক্ষা করে তুমি পাণ্ডুনন্দন যুধিষ্ঠিরকে ধর্মোপদেশ দিতে চাও!
Verse 43
न ते गतिर्विद्यते याज्ञसेनि प्रपद्य दासी धार्तराष्ट्रस्य वेश्म | पराजितास्ते पतयो न सन्ति पतिं चान्यं भाविनि त्वं वृणीष्व,संजय! द्यूतसभामें जो अन्याय हुआ था, उसे भुलाकर तुम पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको धर्मका उपदेश देना चाहते हो। द्रौपदीने उस दिन सभामें जाकर अत्यन्त दुष्कर और पवित्र कार्य किया कि उसने पाण्डवों तथा अपनेको महान् संकटसे बचा लिया; ठीक उसी तरह, जैसे नौका समुद्रकी अगाध जलराशिमें डूबनेसे बचा लेती है। उस सभामें कृष्णा श्वशुरजनोंके समीप खड़ी थी, तो भी सूतपुत्र कर्णने उसे अपमानित करते हुए कहा --'याज्ञसेनि! अब तेरे लिये दूसरी गति नहीं है, तू दासी बनकर दुर्योधनके महलमें चली जा। पाण्डव जूएमें अपनेको हार चुके हैं, अतः अब वे तेरे पति नहीं रहे। भाविनि! अब तू किसी दूसरेको अपना पति वरण कर ले'
বায়ু বললেন— “হে যাজ্ঞসেনী, তোমার আর কোনো গতি নেই। ধৃতরাষ্ট্র-পুত্রের গৃহে গিয়ে দাসীরূপে আশ্রয় নাও। তোমার স্বামীরা পরাজিত; তারা আর তোমার স্বামী নয়। হে ভবিনী, অন্য এক পুরুষকে স্বামী হিসেবে বরণ করো, হে সঞ্জয়।”
Verse 44
यो बीभत्सोहदये प्रोत आसी- दस्थिच्छिन्दन् मर्मघाती सुघोर: । कर्णाच्छरो वाड्मयस्तिग्मतेजा: प्रतिष्ठितो हृदये फाल्गुनस्य,कर्णके मुखसे निकला हुआ वह अत्यन्त घोर कटुवचनरूपी बाण मर्मपर चोट पहुँचानेवाला था। वह कानके रास्तेसे भीतर जाकर हड्डियोंको छेदता हुआ अर्जुनके हृदयमें धँस गया। तीखी कसक पैदा करनेवाला वह वाग्बाण आज भी अर्जुनके हृदयमें गड़ा हुआ है (और इनके कलेजेको साल रहा है)
বায়ু বললেন— “সে ভয়ংকর বাক্য-শর—মর্মভেদী, যেন অস্থি চিরে দেয়—কর্ণপথে প্রবেশ করে ফাল্গুনের হৃদয়ে গেঁথে গেল। তীক্ষ্ণ তেজে দীপ্ত সেই বাগ্বাণ আজও সেখানেই স্থির, তাকে অবিরত দগ্ধ করে।”
Verse 45
कृष्णाजिनानि परिधित्समानान् दुःशासन: कटुकान्य भ्यभाषत् । एते सर्वे षण्ढतिला विनष्टा: क्षयं गता नरक॑ दीर्घकालम्,जिस समय पाण्डव वनमें जानेके लिये कृष्ण-मृगचर्म धारण करना चाहते थे, उस समय दुःशासनने उनके प्रति कितनी ही कड़वी बातें कहीं--'ये सब-के-सब हीजड़े अब नष्ट हो गये, चिरकालके लिये नरकके गर्तमें गिर गये”
পাণ্ডবেরা বনযাত্রার জন্য কৃষ্ণমৃগচর্ম পরিধান করতে উদ্যত হলে, দুঃশাসন কঠোর বাক্যে বলল— “এরা সকলেই ধ্বংসপ্রাপ্ত; নপুংসক-সদৃশ তুচ্ছ লোক—বিনাশে পতিত, দীর্ঘকাল নরকে নিক্ষিপ্ত হবে।”
Verse 46
गान्धारराज: शकुनिर्निकृत्या यदब्रवीद् द्यूतकाले स पार्थम् पराजितो नन्दन: कि तवास्ति कृष्णया त्वं दीव्य वै याज्ञसेन्या,गान्धारराज शकुनिने द्यूतक्रीड़ाके समय कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरसे शठतापूर्वक यह बात कही थी कि अब तो तुम अपने छोटे भाईको भी हार गये, अब तुम्हारे पास क्या है? इसलिये इस समय तुम द्रुपदनन्दिनी कृष्णाको दाँवपर रखकर जूआ खेलो
বায়ু বললেন— “দ্যূতকালে গন্ধাররাজ শকুনি ছল করে পার্থকে বলেছিল— ‘হে পুত্র, তুমি পরাজিত; এখন তোমার কাছে আর কী আছে? অতএব যাজ্ঞসেনীর কন্যা কৃষ্ণাকে পণ রেখে খেলো।’”
Verse 47
जानासि त्वं संजय सर्वमेतद् द्यूते वाक्यं गहमिवं यथोक्तम् । स्वयं त्वहं प्रार्थये तत्र गन्तुं समाधातु कार्यमेतद् विपन्नम्,संजय! (कहाँतक गिनाऊँ,) जूएके समय जितने और जैसे निन्दनीय वचन कहे गये थे, वे सब तुम्हें ज्ञात हैं, तथापि इस बिगड़े हुए कार्यको बनानेके लिये मैं स्वयं हस्तिनापुर चलना चाहता हूँ
“সঞ্জয়, দ্যূতকালে যে নিন্দনীয় বাক্যগুলি যেমন উচ্চারিত হয়েছিল, সবই তুমি জানো। তবু এই বিপর্যস্ত বিষয়টি সংশোধন করতে আমি নিজেই সেখানে যেতে চাই, সঞ্জয়।”
Verse 48
अहापयित्वा यदि पाण्डवार्थ शमं कुरूणामपि चेच्छकेयम् | पुण्यं च मे स्याच्चरितं महोदयं मुच्येरंश्न॒ कुरवो मृत्युपाशात्,यदि पाण्डवोंका स्वार्थ नष्ट किये बिना ही मैं कौरवोंके साथ इनकी संधि करानेमें सफल हो सका तो मेरे द्वारा यह परम पवित्र और महान् अभ्युदयका कार्य सम्पन्न हो जायगा तथा कौरव भी मौतके फंदेसे छूट जायँगे
বায়ু বললেন— পাণ্ডবদের ন্যায্য স্বার্থে আঘাত না করে যদি আমি কুরুদের মধ্যেও শান্তি স্থাপন করতে পারি, তবে আমার দ্বারা এক পরম পবিত্র ও মহামঙ্গলকর কর্ম সম্পন্ন হবে; আর কুরুরাও মৃত্যুর পাশ থেকে মুক্ত হবে।
Verse 49
अपि मे वाचं भाषमाणस्य काव्यां धर्मारामामर्थवतीमहिंस्राम् । अवेक्षेरन् धार्तराष्ट्रा: समक्ष॑ मां च प्राप्त कुरव: पूजयेयु:,मैं वहाँ जाकर शुक्रनीतिके अनुसार धर्म और अर्थसे युक्त ऐसी बातें कहूँगा, जो हिंसावृत्तिको दबानेवाली होंगी। क्या धृतराष्ट्रके पुत्र मेरी उन बातोंपर विचार करेंगे? क्या कौरवगण अपने सामने उपस्थित होनेपर मेरा सम्मान करेंगे?
আমি সেখানে গিয়ে শুক্রনীতির অনুসারে ধর্মে রমণীয়, অর্থবহ এবং হিংসা-নিবারক সুগঠিত বাক্য উচ্চারণ করব। ধৃতরাষ্ট্রের পুত্রেরা কি আমার কথায় সত্যিই মনোযোগ দেবে? আর আমি তাদের সামনে উপস্থিত হলে কুরুরা কি আমাকে সম্মান করবে?
Verse 50
अतो<न््यथा रथिना फाल्गुनेन भीमेन चैवाहवर्दशितेन । परासिक्तान धार्तराष्टांश्व विद्धि प्रदह्ममानान् कर्मणा स्वेन पापान्,संजय! यदि ऐसा नहीं हुआ--कौरवोंने इसके विपरीत भाव दिखाया तो समझ लो कि रथपर बैठे हुए अर्जुन और युद्धके लिये कवच धारण करके तैयार हुए भीमसेनके द्वारा पराजित होकर धूृतराष्ट्रके वे सभी पापात्मा पुत्र अपने ही कर्मदोषसे दग्ध हो जायूँगे
যদি তা না হয়—আর কৌরবরা বিপরীত মনোভাব প্রকাশ করে—তবে, সঞ্জয়, জেনে রেখো: ধৃতরাষ্ট্রের সেই পাপাত্মা পুত্রেরা রথী ফাল্গুন (অর্জুন) ও যুদ্ধের জন্য সজ্জিত ভীমের হাতে পরাস্ত ও ছত্রভঙ্গ হবে। নিজেদের কর্মফলের দাহে দগ্ধ হয়ে তারা নিজেদেরই দোষে বিনষ্ট হবে।
Verse 51
पराजितान् पाण्डवेयांस्तु वाचो रौद्रा रूक्षा भाषते धार्तराष्ट्र: । गदाहस्तो भीमसेनो <प्रमत्तो दुर्योधनं स्मारयिता हि काले
বায়ু বললেন— পাণ্ডুপুত্রেরা দমিত হয়েছে বলে ধৃতরাষ্ট্রের পুত্র রূঢ় ও ক্রোধময় বাক্য উচ্চারণ করে। কিন্তু যথাসময়ে গদা হাতে, প্রবল সংকল্পে উদ্দীপ্ত ভীমসেন দুর্যোধনকে (তার দম্ভের ফল) স্মরণ করিয়ে দেবে।
Verse 52
द्यूतके समय जब पाण्डव हार गये थे, तब दुर्योधनने उनके प्रति बड़ी भयानक और कड़वी बातें कही थीं; अतः सदा सावधान रहनेवाले भीमसेन युद्धके समय गदा हाथमें लेकर दुर्योधनको उन बातोंकी याद दिलायेंगे ।। सुयोधनो मन्युमयो महाद्रुम: स्कन्ध: कर्ण: शकुनिस्तस्य शाखा: । दुःशासन: पुष्पफले समद्धे मूलं राजा धृतराष्ट्रोइमनीषी
বায়ুদেব বললেন— পাশাখেলার সময় পাণ্ডবরা পরাজিত হলে দুর্যোধন তাদের প্রতি ভয়ংকর ও তিক্ত বাক্য বলেছিল। তাই সদা সতর্ক ভীমসেন যুদ্ধকালে গদা তুলে দুর্যোধনকে সেই কথাগুলি স্মরণ করিয়ে দেবে। সুয়োধন (দুর্যোধন) ক্রোধময় এক মহাবৃক্ষ— কর্ণ তার কাণ্ড, শকুনি তার শাখা; দুঃশাসন তার পুষ্প-ফলে সমৃদ্ধ; আর তার মূল অবিবেচক রাজা ধৃতরাষ্ট্র।
Verse 53
दुर्योधन क्रोधमय विशाल वृक्षके समान है, कर्ण उस वृक्षका स्कन्ध, शकुनि शाखा और दुःशासन समृद्ध फल-पुष्प है। अज्ञानी राजा धृतराष्ट्र ही इसके मूल (जड़) हैं |। युधिष्ठिरो धर्ममयो महाद्रुम: स्कन्धो<र्जुनो भीमसेनो5स्य शाखा: । माद्रीपुत्रौ पुष्पफले समृद्धे मूलं त्वहं ब्रह्म च ब्राह्मणाश्न,युधिष्ठिर धर्ममय विशाल वृक्ष हैं। अर्जुन (उस वृक्षके) स्कन्ध, भीमसेन शाखा और माद्रीनन्दन नकुल-सहदेव इसके समृद्ध फल-पुष्प हैं। मैं, वेद और ब्राह्मण ही इस वृक्षके मूल (जड़) हैं
বায়ু বললেন—দুর্যোধন ক্রোধময় এক মহাবৃক্ষের ন্যায়; কর্ণ তার কাণ্ড, শকুনি তার শাখা, আর দুঃশাসন তার সমৃদ্ধ পুষ্প-ফল। অজ্ঞ রাজা ধৃতরাষ্ট্রই তার মূল। কিন্তু যুধিষ্ঠির ধর্মময় মহাবৃক্ষ; অর্জুন তার কাণ্ড, ভীমসেন তার শাখা, আর মাদ্রীর পুত্রদ্বয় (নকুল-সহদেব) তার সমৃদ্ধ পুষ্প-ফল। সেই বৃক্ষের মূল আমি (বায়ু), বেদ, ব্রহ্ম এবং ব্রাহ্মণগণ।
Verse 54
वन॑ राजा धृतराष्ट्र: सपुत्रो व्याप्रास्ते वै संजय पाण्डुपुत्रा: । सिंहाभिगुप्तं न वनं विनश्येत् सिंहो न नश्येत वनाभिगुप्त:,संजय! पुत्रोंसहित राजा धृतराष्ट्र एक वन हैं और पाण्डव उस वनमें निवास करनेवाले व्याप्र हैं। सिंहोंसे रक्षित वन नष्ट नहीं होता एवं वनमें रहकर सुरक्षित सिंह नष्ट नहीं होता उस वनका उच्छेद न करो
বায়ু বললেন—হে সঞ্জয়, পুত্রসহ রাজা ধৃতরাষ্ট্র এক বনসদৃশ, আর পাণ্ডুপুত্রেরা সেই বনে বিচরণকারী ব্যাঘ্রসম। সিংহে রক্ষিত বন বিনষ্ট হয় না; আর বনে আশ্রিত সিংহও বিনষ্ট হয় না। অতএব সেই বনের উচ্ছেদ ঘটিও না।
Verse 55
निर्वनो वध्यते व्याप्रो निर्व्याच्रंं छिद्यते वनम् । तस्माद् व्याप्रो वन रक्षेद् वन॑ व्याप्रं च पालयेत्,क्योंकि वनसे बाहर निकला हुआ व्याप्र मारा जाता है और बिना व्याप्रके वनको सब लोग आसानीसे काट लेते हैं। अतः व्याप्र वनकी रक्षा करे और वन व्याप्रकी
বনের বাইরে গেলে ব্যাঘ্র নিহত হয়, আর ব্যাঘ্রহীন বন সহজেই কেটে ফেলা হয়। অতএব ব্যাঘ্র বনকে রক্ষা করুক, আর বনও ব্যাঘ্রকে পালন-রক্ষা করুক।
Verse 56
लताधर्मा धार्तराष्ट्रा: शाला: संजय पाण्डवा: । न लता वर्धते जातु महाद्रुममनाश्रिता,संजय! धृतराष्ट्रके पुत्र लताओंके समान हैं और पाण्डव शाल-वृक्षोंके समान। कोई भी लता किसी महान् वृक्षका आश्रय लिये बिना कभी नहीं बढ़ती है (अतः पाण्डवोंका आश्रय लेकर ही धृतराष्ट्रपुत्र बढ़ सकते हैं)
বায়ু বললেন—হে সঞ্জয়! ধৃতরাষ্ট্রের পুত্রেরা স্বভাবে লতার মতো, আর পাণ্ডবেরা শালবৃক্ষের মতো দৃঢ়। কোনো লতা মহাবৃক্ষের আশ্রয় না নিয়ে কখনোই বৃদ্ধি পায় না।
Verse 57
स्थिता: शुश्रूषितुं पार्था: स्थिता योद्धुमरिंदमा: । यत् कृत्यं धृतराष्ट्रस्य तत् करोतु नराधिप:,शत्रुओंका दमन करनेवाले कुन्तीपुत्र धृतराष्ट्रकी सेवा करनेके लिये भी उद्यत हैं और युद्धके लिये भी। अब राजा धृतराष्ट्रका जो कर्तव्य हो, उसका वे पालन करें
শত্রুদমনকারী কুন্তীপুত্রেরা ধৃতরাষ্ট্রের সেবা করতেও প্রস্তুত, আবার যুদ্ধ করতেও প্রস্তুত। এখন রাজা ধৃতরাষ্ট্রের যা কর্তব্য, নরাধিপ যেন তাই করেন।
Verse 58
स्थिता: शमे महात्मान: पाण्डवा धर्मचारिण: । योधा: समर्थास्तद् विद्वन्नाचक्षीथा यथातथम्,विद्वन् संजय! धर्मका आचरण करनेवाले महात्मा पाण्डव शान्तिके लिये भी तैयार हैं और युद्ध करनेमें भी समर्थ हैं। इन दोनों अवस्थाओंको समझकर तुम राजा धुृतराष्ट्रसे यथार्थ बातें कहना
বায়ু বললেন—ধর্মচারী মহাত্মা পাণ্ডবগণ সংযমে প্রতিষ্ঠিত এবং শান্তির জন্যও প্রস্তুত; তবু তাঁরা সক্ষম যোদ্ধা। হে বিদ্বান সঞ্জয়, এই দুই অবস্থাই বুঝে রাজা ধৃতরাষ্ট্রকে বিষয়টি যেমন তেমনই জানাও।
Verse 246
स धर्मात्मा धर्ममधीत्य पुण्यं यदिच्छया व्रजति ब्रह्मलोकम् । इसके सिवा क्षत्रिय धर्मके अनुसार सावधान रहकर प्रजाजनोंकी रक्षा करे, दान दे, यज्ञ करे, सम्पूर्ण वेदोॉंका अध्ययन करके विवाह करे और पुण्य कर्मोका अनुष्ठान करता हुआ गृहस्थाश्रममें रहे। इस प्रकार वह धर्मात्मा क्षत्रिय धर्म एवं पुण्यका सम्पादन करके अपनी इच्छाके अनुसार ब्रह्मलोकको जाता है
বায়ু বললেন—সে ধর্মাত্মা পুরুষ ধর্ম অধ্যয়ন করে ও বিধিপূর্বক আচরণ করে পুণ্য সঞ্চয় করে, এবং নিজের ইচ্ছানুসারে ব্রহ্মলোক লাভ করে। তদুপরি ক্ষত্রিয়-ধর্ম অনুসারে সতর্ক থেকে প্রজাদের রক্ষা করবে, দান দেবে, যজ্ঞ করবে, সম্পূর্ণ বেদ অধ্যয়ন করবে, বিবাহ করবে এবং গৃহস্থাশ্রমে থেকে পুণ্যকর্মের অনুশীলন অব্যাহত রাখবে। এভাবে ক্ষত্রিয়-ধর্ম ও পুণ্য সম্পাদন করে সে ইচ্ছামতো ব্রহ্মলোক প্রাপ্ত হয়।
The dilemma is how to choose a course of action under crisis when the usual outward markers of righteousness fail—i.e., when adharma can resemble dharma and dharma can look compromised—raising the question of what conduct is justifiable and who may rightly censure it.
Moral evaluation in āpad requires reasoned discernment (buddhi) and attention to primary indicators (liṅga) rather than reliance on appearances; ethical judgment must be context-sensitive while remaining accountable to critique and corrective mechanisms such as prāyaścitta.
No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; the chapter instead functions as methodological meta-ethics, emphasizing discernment, censure, and authoritative counsel as the interpretive frame for subsequent decisions.