Adhyaya 193
Udyoga ParvaAdhyaya 19325 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; यह अध्याय युद्ध-पूर्व मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक तैयारी में पाण्डव-पक्ष के मनोबल को सुदृढ़ करता है।

Adhyaya 193

Śikhaṇḍin’s Transformation, Daśārṇa Verification, and Kubera’s Conditional Curse (Udyoga Parva 193)

Upa-parva: Śikhaṇḍi–Sthūṇa Yakṣa Saṃvāda (Episode on the exchange of gender-markers and its political verification)

Bhīṣma narrates how, after hearing Śikhaṇḍin’s appeal, the yakṣa Sthūṇa—describing himself as capable of wish-fulfillment and shape-change—agrees to a pact: he will lend his male bodily marker to Śikhaṇḍin for a period, while adopting the female marker in return. The exchange occurs under a mutual non-harm agreement, enabling Śikhaṇḍin to enter the city with social recognition and to report the events to Drupada. Because a marital alliance is at stake, the Daśārṇa king reacts with anger and sends a Brahmin envoy; Drupada replies and a verification mission is conducted, after which Śikhaṇḍin is confirmed as male and the alliance is normalized with gifts and hospitality. Later, Kubera (Vaiśravaṇa) visits Sthūṇa’s residence, learns that Sthūṇa has not approached him due to shame in a feminized form, and curses Sthūṇa to remain so. Yakṣas intercede, and Kubera limits the curse: Sthūṇa will regain his original form after Śikhaṇḍin is killed in battle. When Śikhaṇḍin returns at the agreed time, Sthūṇa explains the curse and releases him. Bhīṣma concludes with a strategic-ethical declaration: knowing Śikhaṇḍin’s birth history (linked to Amba), he will not direct weapons at Śikhaṇḍin, consistent with his vow regarding striking women or one socially marked as such. Sañjaya reports that Duryodhana accepts Bhīṣma’s reasoning as appropriate.

Chapter Arc: कौरव-सभा में यह प्रश्न गूंजता है—किस समय और किस उपाय से पाण्डवों की सेना को शीघ्र नष्ट किया जा सकता है? इसी के प्रत्युत्तर में पाण्डव-पक्ष अपनी वास्तविक शक्ति का उद्घोष करने को बाध्य होता है। → युधिष्ठिर अपने गुप्तचरों से धृतराष्ट्र की सेना के भीतर चल रही चर्चाओं और योजनाओं का वृत्तान्त सुनाते हैं—दुर्योधन की जिज्ञासा, सभासदों की धृष्टता, और ‘पाँच दिनों में पाण्डव-सेना का संहार’ जैसे दर्पपूर्ण दावे। यह सुनकर पाण्डव-पक्ष में सतर्कता और आत्म-प्रतिष्ठा दोनों जागते हैं। → अर्जुन (गुडाकेश) वासुदेव की ओर देखकर दृढ़ वाणी में अपनी, अपने सहायकों की, और युधिष्ठिर की सामर्थ्य का परिचय देते हैं—पाण्डव-सेना के प्रमुख वीरों (घटोत्कच-वंश, सात्यकि, विराट-द्रुपद, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, भीम, नकुल-सहदेव आदि) की युद्ध-क्षमता का क्रमशः उद्घाटन करते हुए कौरवों के ‘त्वरित-विजय’ के भ्रम को तोड़ते हैं। → अध्याय का निष्कर्ष यह बनता है कि कौरव-पक्ष के आत्मविश्वास के विरुद्ध पाण्डव-पक्ष भी संगठित, बहुवीर्य, और रणनीतिक रूप से सक्षम है; युद्ध यदि अनिवार्य हुआ तो वह एक-दो दावों से नहीं, दीर्घ और भीषण संघर्ष से ही निर्णीत होगा। → कौरवों के दर्प और पाण्डवों के प्रत्युत्तर के बाद प्रश्न शेष रहता है—क्या यह शक्ति-प्रदर्शन शान्ति की ओर ले जाएगा, या युद्ध को और निकट खींच लाएगा?

Shlokas

Verse 1

अत्-४#-#क+ चतुन॑वर्त्याधेकशततमो< ध्याय: अर्जुनके द्वारा अपनी, अपने सहायकोंकी तथा युधिष्ठिरकी भी शक्तिका परिचय देना वैशम्पायन उवाच एतच्छुत्वा तु कौन्तेय: सर्वान्‌ भ्रात्‌नुपह्नरे । आहूय भरतश्रेष्ठ इंदं वचनमत्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ जनमेजय! कौरव-सेनामें जो बातचीत हुई थी, उसका समाचार पाकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंको एकान्तमें बुलाकर इस प्रकार कहा

বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ জনমেজয়! এই সংবাদ শুনে কুন্তীনন্দন যুধিষ্ঠির সকল ভ্রাতাকে একান্ত স্থানে ডেকে এনে এই কথা বললেন।

Verse 2

युधिछिर उवाच धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु ये चारपुरुषा मम । ते प्रवृत्ति प्रयच्छन्ति ममेमां व्युषितां निशाम्‌,युधिष्ठिर बोले--धृतराष्ट्रकी सेनामें जो मेरे गुप्तचर नियुक्त हैं, उन्होंने मुझे यह समाचार दिया है कि इसी विगत रात्रिमें दुर्योधनने महान्‌ व्रतधारी गंगानन्दन भीष्मसे यह प्रश्न॒ किया था कि प्रभो! आप पाण्डवोंकी सेनाका कितने समयमें संहार कर सकते हैं

যুধিষ্ঠির বললেন—ধৃতরাষ্ট্রের সেনাদলে নিযুক্ত আমার গুপ্তচরেরা গত রাত্রির ঘটনাবলি আমাকে জানিয়েছে।

Verse 3

दुर्योधन: किलापृच्छदापगेयं महाव्रतम्‌ । केन कालेन पाण्डूनां हन्या: सैन्यमिति प्रभो,युधिष्ठिर बोले--धृतराष्ट्रकी सेनामें जो मेरे गुप्तचर नियुक्त हैं, उन्होंने मुझे यह समाचार दिया है कि इसी विगत रात्रिमें दुर्योधनने महान्‌ व्रतधारी गंगानन्दन भीष्मसे यह प्रश्न॒ किया था कि प्रभो! आप पाण्डवोंकी सेनाका कितने समयमें संहार कर सकते हैं

যুধিষ্ঠির বললেন—শোনা গেছে, দুর্যোধন গঙ্গানন্দন মহাব্রতধারী ভীষ্মকে জিজ্ঞাসা করেছিল—‘প্রভু! পাণ্ডবদের সেনা কত সময়ে বিনাশ করা সম্ভব?’

Verse 4

मासेनेति च तेनोक्तो धार्तराष्ट्र: सुदुर्मति: । तावता चापि कालेन द्रोणो5पि प्रतिजज्ञिवान्‌,भीष्मजीने धृतराष्ट्रके पुत्र दुर्बुद्धि दुर्योधनको यह उत्तर दिया कि मैं एक महीनेमें पाण्डव-सेनाका विनाश कर सकता हूँ। द्रोणाचार्यने भी उतने ही समयमें वैसा करनेकी प्रतिज्ञा की। कृपाचार्यने दो महीनेका समय बताया। यह बात हमारे सुननेमें आयी है तथा महान्‌ अस्त्रवेत्ता अश्वत्थामाने दस ही दिनोंमें पाण्डव-सेनाके संहारकी प्रतिज्ञा की है

যুধিষ্ঠির বললেন—সেই দুর্মতি ধৃতরাষ্ট্রপুত্রকে ভীষ্ম বলেছিলেন—‘এক মাসে।’ আর সেই একই সময়সীমায় দ্রোণও প্রতিজ্ঞা করলেন।

Verse 5

गौतमो द्विगुणं कालमुक्तवानिति नः श्रुतम्‌ । द्रौणिस्तु दशरात्रेण प्रतिजज्ञे महास्त्रवित्‌,भीष्मजीने धृतराष्ट्रके पुत्र दुर्बुद्धि दुर्योधनको यह उत्तर दिया कि मैं एक महीनेमें पाण्डव-सेनाका विनाश कर सकता हूँ। द्रोणाचार्यने भी उतने ही समयमें वैसा करनेकी प्रतिज्ञा की। कृपाचार्यने दो महीनेका समय बताया। यह बात हमारे सुननेमें आयी है तथा महान्‌ अस्त्रवेत्ता अश्वत्थामाने दस ही दिनोंमें पाण्डव-सेनाके संहारकी प्रतिज्ञा की है

যুধিষ্ঠির বললেন—আমরা শুনেছি গৌতম (কৃপ) দ্বিগুণ সময় বলেছেন; কিন্তু মহাস্ত্রবিদ দ্রৌণি অশ্বত্থামা দশ রাত্রির মধ্যেই সংহার করার প্রতিজ্ঞা করেছে।

Verse 6

तथा दिव्यास्त्रवित्‌ कर्ण: सम्पृष्ट: कुरुसंसदि । पज्चभिर्दिवसैहन्तुं ससैन्यं प्रतिजज्ञिवान्‌,दिव्यास्त्रवेत्ता कर्णसे जब कौरवसभामें पूछा गया, तब उसने पाँच ही दिनोंमें हमारी सेनाको नष्ट करनेकी प्रतिज्ञा कर ली

তেমনি দিব্যাস্ত্রবিদ্ কর্ণকে কুরুসভায় জিজ্ঞাসা করা হলে, সে প্রতিজ্ঞা করল—মাত্র পাঁচ দিনের মধ্যেই আমাদের সেনাকে সমগ্র বাহিনীসহ ধ্বংস করবে।

Verse 7

तस्मादहमपीच्छामि श्रोतुमर्जुन ते वच: । कालेन कियता शत्रून्‌ क्षपयेरिति फाल्गुन,अतः अर्जुन! मैं भी तुम्हारी बात सुनना चाहता हूँ। फाल्गुन! तुम कितने समयमें शत्रुओंको नष्ट कर सकते हो?

অতএব, অর্জুন, আমিও তোমার কথা শুনতে চাই। হে ফাল্গুন, তুমি কত সময়ের মধ্যে শত্রুদের বিনাশ করতে পারবে বলে মনে কর?

Verse 8

एवमुक्तो गुडाकेश: पार्थिवेन धनंजय: । वासुदेव॑ समीक्ष्येदं वचन प्रत्यभाषत

রাজা এভাবে বললে নিদ্রাজয়ী ধনঞ্জয় অর্জুন বাসুদেবের দিকে চেয়ে তারপর এই কথা বলল।

Verse 9

राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर निद्राविजयी अर्जुनने भगवान्‌ श्रीकृष्णकी ओर देखकर यह बात कही-- सर्व एते महात्मान: कृतास्त्राश्चित्रयोधिन: । असंशयं महाराज हन्युरेव न संशय:,“महाराज! निःसंदेह ये सभी महामना योद्धा अस्त्रविद्याके विद्वान तथा विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेवाले हैं। अतः उतने दिनोंमें शत्रु-सेनाको मार सकते हैं, इसमें संशय नहीं है

অর্জুন ভগবান শ্রীকৃষ্ণের দিকে চেয়ে বলল—“মহারাজ, এরা সকলেই মহাত্মা যোদ্ধা; অস্ত্রবিদ্যায় সুপ্রশিক্ষিত এবং নানাবিধ রণকৌশলে পারদর্শী। নিঃসন্দেহে, ঐ ক’দিনের মধ্যেই তারা শত্রুসেনাকে বিনাশ করতে সক্ষম—এতে কোনো সংশয় নেই।”

Verse 10

अपैतु ते मनस्तापो यथा सत्य ब्रवीम्यहम्‌ । हन्यामेकरथेनैव वासुदेवसहायवान्‌,'परंतु इससे आपके मनमें संताप नहीं होना चाहिये। आपका मनस्ताप तो दूर ही हो जाना चाहिये। मैं जो सत्य बात कहने जा रहा हूँ, उसपर ध्यान दीजिये। मैं भगवान्‌ श्रीकृष्णकी सहायतासे युक्त हुआ एकमात्र रथको लेकर ही देवताओंसहित तीनों लोकों, सम्पूर्ण चराचर प्राणियों तथा भूत, वर्तमान और भविष्यको भी पलक मारते-मारते नष्ट कर सकता हूँ। ऐसा मेरा विश्वास है

“আপনার মনের দুঃখ দূর হোক; আমি সত্যই বলছি—শুনুন। বাসুদেবের সহায়তায়, আমি একটিমাত্র রথ নিয়েই শত্রুপক্ষকে সংহার করতে সক্ষম।”

Verse 11

सामरानपि लोकांस्त्रीन्‌ सर्वान्‌ स्थावरजड़मान्‌ | भूतं भव्यं भविष्यं च निमेषादिति मे मतिः:,'परंतु इससे आपके मनमें संताप नहीं होना चाहिये। आपका मनस्ताप तो दूर ही हो जाना चाहिये। मैं जो सत्य बात कहने जा रहा हूँ, उसपर ध्यान दीजिये। मैं भगवान्‌ श्रीकृष्णकी सहायतासे युक्त हुआ एकमात्र रथको लेकर ही देवताओंसहित तीनों लोकों, सम्पूर्ण चराचर प्राणियों तथा भूत, वर्तमान और भविष्यको भी पलक मारते-मारते नष्ट कर सकता हूँ। ऐसा मेरा विश्वास है

যুধিষ্ঠির বললেন—দেবতাসহ ত্রিলোক, সমস্ত স্থাবর-জঙ্গম প্রাণী, এবং অতীত-বর্তমান-ভবিষ্যৎ—এ সবই আমি নিমেষমাত্রে ধ্বংস করতে পারি; এটাই আমার দৃঢ় প্রত্যয়।

Verse 12

यत्‌ तद्‌ घोरं पशुपति: प्रादादस्त्रं महन्मम । कैराते दन्द्धयुद्धे तु तदिदं मयि वर्तते,“भगवान्‌ पशुपतिने किरातवेषणमें द्वन्धयुद्ध करते समय मुझे जो अपना भयंकर महास्त्र प्रदान किया था, वह मेरे पास मौजूद है

যুধিষ্ঠির বললেন—কিরাতবেশে আমার সঙ্গে দ্বন্দ্বযুদ্ধে অবতীর্ণ হয়ে ভগবান পশুপতি যে ভয়ংকর মহাস্ত্র আমাকে দান করেছিলেন, সেই অস্ত্র আজও আমার কাছে বর্তমান।

Verse 13

यद्‌ चुगान्ते पशुपति: सर्वभूतानि संहरन्‌ । प्रयुड्धक्ते पुरुषव्याघ्र तदिदं मयि वर्तते,'पुरुषसिंह! प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंका संहार करते समय भगवान्‌ पशुपति जिस अस्त्रका प्रयोग करते हैं, वही यह मेरे पास विद्यमान है

যুধিষ্ঠির বললেন—হে পুরুষসিংহ! যুগান্তে সকল প্রাণীকে লয়ে যাওয়ার সময় ভগবান পশুপতি যে অস্ত্র প্রয়োগ করেন, সেই অস্ত্রই আমার কাছে বর্তমান।

Verse 14

तन्न जानाति गाड़्ेयो न द्रोणो न च गौतम: । न च द्रोणसुतो राजन्‌ कुत एव तु सूतज:,“राजन! इसे न तो गंगानन्दन भीष्म जानते हैं, न द्रोणाचार्य जानते हैं, न कृपाचार्य जानते हैं और न द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको ही इसका पता है; फिर सूतपुत्र कर्ण तो इसे जान ही कैसे सकता है?”

যুধিষ্ঠির বললেন—রাজন! এ অস্ত্র গঙ্গানন্দন ভীষ্মও জানেন না, দ্রোণও জানেন না, গৌতম (কৃপ)ও জানেন না; দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামাও জানে না। তবে সূতপুত্র কর্ণ কীভাবে জানবে?

Verse 15

नतु युक्त रणे हन्तुं दिव्यैरस्त्रै: पृथगजनम्‌ । आर्जवेनैव युद्धेन विजेष्यामो वयं परान्‌,'परंतु युद्धमें साधारण जनोंको दिव्यास्त्रोंद्वारा मारना कदापि उचित नहीं है; अतः हमलोग सरलतापूर्ण युद्धके द्वारा ही शत्रुओंको जीतेंगे

যুধিষ্ঠির বললেন—যুদ্ধে সাধারণ লোককে দিব্যাস্ত্র দিয়ে বধ করা উচিত নয়। অতএব আমরা সরল ও ধর্মসম্মত যুদ্ধের দ্বারাই শত্রুদের জয় করব।

Verse 16

तथेमे पुरुषव्याघ्रा: सहायास्तत्र पार्थिव | सर्वे दिव्यास्त्रविद्वांस: सर्वे युद्धाभिकाड्क्षिण:,“राजन! ये सभी पुरुषसिंह जो हमारे सहायक हैं, दिव्यास्त्रोंका ज्ञान रखते हैं और सभी युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले हैं

হে রাজন! সেখানে যে এই ব্যাঘ্রসম পুরুষেরা আমাদের সহায়—তাঁরা সকলেই দিব্যাস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী এবং সকলেই যুদ্ধে প্রবৃত্ত হতে আকাঙ্ক্ষী।

Verse 17

वेदान्तावभूथस्नाता: सर्व एतेड5पराजिता: । निहन्यु: समरे सेनां देवानामपि पाण्डव,“इन सबने वेदाध्ययन समाप्त करके यज्ञान्त स्नान किया है। ये सभी कभी परास्त न होनेवाले वीर हैं। पाण्डुनन्दन! ये लोग समरभूमिमें देवताओंकी सेनाको भी नष्ट कर सकते हैं

এঁরা সকলেই বেদাধ্যয়ন সম্পূর্ণ করে যজ্ঞান্তের অবভৃথ-স্নান সম্পন্ন করেছেন। এঁরা সকলেই অপরাজিত বীর। হে পাণ্ডব! সমরে এঁরা দেবতাদের সেনাকেও বিনাশ করতে সক্ষম।

Verse 18

शिखण्डी युयुधानश्च धृष्टय्ुम्नश्व पार्षत: । भीमसेनो यमौ चोभौ युधामन्यूत्तमौजसौ

শিখণ্ডী, যুযুধান (সাত্যকি), পার্ষতপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন, ভীমসেন, উভয় যমজ (নকুল-সহদেব), এবং যুধামন্যু ও উত্তমৌজস—এঁরাই আমাদের যোদ্ধাদের মধ্যে অগ্রগণ্য।

Verse 19

शड्खश्नैव महाबाहुहैंडिम्बश्च महाबल:,“महाबाहु शंख, महाबली घटोत्कच, महान्‌ बल और पराक्रमसे सम्पन्न घटोत्कचपुत्र अंजनपर्वा तथा संग्रामकुशल महाबाहु सात्यकि-ये सभी आपके सहायक हैं

মহাবাহু শঙ্খ এবং মহাবলী হিডিম্ব—এঁরাও (আমাদের) সহায়।

Verse 20

पुत्रो5स्याञ्जनपर्वा तु महाबलपराक्रम: । शैनेयश्व महाबाहु:ः सहायो रणकोविद:,“महाबाहु शंख, महाबली घटोत्कच, महान्‌ बल और पराक्रमसे सम्पन्न घटोत्कचपुत्र अंजनपर्वा तथा संग्रामकुशल महाबाहु सात्यकि-ये सभी आपके सहायक हैं

তার পুত্র অঞ্জনপৰ্বা মহাবল ও পরাক্রমে সমৃদ্ধ; আর শৈনেয় (সাত্যকি)ও মহাবাহু, রণকৌশলে পারদর্শী সহায়।

Verse 21

अभिमन्युश्वच बलवान्‌ द्रौपद्या: पठच चात्मजा: । स्वयं चापि समर्थोडसि त्रैलोक्योत्सादनेडपि च,“बलवान्‌ अभिमन्यु और द्रौपदीके पाँचों पुत्र तो आपके साथ हैं ही। आप स्वयं भी तीनों लोकोंका संहार करनेमें समर्थ हैं

যুধিষ্ঠির বললেন—অভিমন্যুও পরাক্রমশালী, আর দ্রৌপদীর পাঁচ পুত্রও তোমার সঙ্গেই আছে। তুমিও নিজে তিন লোকেরও বিনাশ সাধনে সক্ষম।

Verse 22

क्रोधाद्‌ यं पुरुषं पश्येस्तथा शक्रसमद्युते । सक्षिप्रं न भवेद्‌ व्यक्तमिति त्वां वेशझि कौरव,/इन्द्रके समान तेजस्वी कुरुनन्दन! आप क्रोधपूर्वक जिस पुरुषको देख लें वह शीघ्र ही नष्ट हो जायगा। आपके इस प्रभावको मैं जानता हूँ”

যুধিষ্ঠির বললেন—হে কৌরব, শক্রসম দীপ্তিমান! ক্রোধে তুমি যাকে দৃষ্টিপাত কর, সে বেশিক্ষণ স্থিত থাকে না; অচিরেই বিনষ্ট হয়। হে কুরু-নন্দন, তোমার প্রভাব আমি জানি—তোমার তেজ ইন্দ্রসম।

Verse 186

विराटद्रुपदौ चोभौ भीष्मद्रोणसमौ युधि । 'शिखण्डी, सात्यकि, ट्रुपदकुमार, धृष्टद्युम्न, भीमसेन, दोनों भाई नकुल-सहदेव, युधामन्यु, उत्तमौजा तथा राजा विराट और ट्रुपद भी युद्धमें भीष्म और द्रोणाचार्यकी समानता करनेवाले हैं

যুধিষ্ঠির বললেন—বিরাট ও দ্রুপদ—উভয়েই যুদ্ধে ভীষ্ম ও দ্রোণের সমান। তদ্রূপ শিখণ্ডী, সাত্যকি, দ্রুপদপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন, ভীমসেন, দুই ভ্রাতা নকুল-সহদেব, যুধামন্যু ও উত্তমৌজা—এরা সকলেই রণক্ষেত্রে ভীষ্ম ও দ্রোণের সমকক্ষ।

Verse 193

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें भीष्म आदिके द्वारा अपनी शक्तिका वर्णनविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত অম্বোপাখ্যানপর্বে ভীষ্ম প্রভৃতির স্বশক্তিবর্ণন বিষয়ক একশ তিরানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 194

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि अर्जुनवाक्ये चतुर्नवत्यधिकशततमो<ध्याय:

ইতি শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বে অম্বোপাখ্যানপর্বের অন্তর্গত ‘অর্জুনবাক্য’ প্রসঙ্গে একশ চুরানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

The chapter frames a dilemma between public duty and personal vows: Bhīṣma’s battlefield responsibility conflicts with his vrata not to strike a woman or one whose identity is rooted in a female birth-history, even if that person stands as an adversary.

Agreements and vows generate real constraints in human affairs; ethical identity in the epic is shaped not only by power but by pledged conduct, reputation, and the long causal chain of prior actions.

No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-function is explanatory—establishing narrative causality for later events and illustrating how oath-bound ethics can determine strategic outcomes.