Adhyaya 176
Udyoga ParvaAdhyaya 17644 Verses

Adhyaya 176

अम्बाया रामजामदग्न्यशरणगमनम् (Ambā Seeks Refuge with Rāma Jāmadagnya)

Upa-parva: Ambopākhyāna (Ambā Episode) — Bhārgava–Bhīṣma Context

Chapter 176 presents a structured counsel-and-petition sequence. Akṛtavraṇa asks Ambā to clarify which of two painful remedies she seeks: compelling Śālva to accept her through Rāma’s prompting, or having Bhīṣma confronted and defeated by Rāma. Ambā explains that Bhīṣma removed her without recognizing her prior intention toward Śālva; when she approached Śālva, he refused her, suspecting impropriety. She therefore identifies Bhīṣma as the causal root of her distress and requests corrective action, including the possibility of Bhīṣma’s defeat or destruction. The narration then shifts to Bhīṣma’s voice as time passes and Paraśurāma arrives with ascetic insignia and martial arms, is honored by Sṛñjaya, and is briefed on Ambā’s case. Ambā formally takes refuge, weeping and describing her suffering. Paraśurāma, moved by compassion, decides to send a dharmic message to Bhīṣma demanding compliance; if refused, he declares readiness to enforce his directive through martial power, while also noting Śālva as an alternative if Ambā’s intent changes. The chapter’s thematic center is adjudication: assigning responsibility, selecting a remedy, and invoking a supra-royal authority to resolve an injury produced by contested kṣātra norms.

Chapter Arc: वन-निर्जन में तपस्विनी अम्बा अपने भीतर के दो दुःखों—अपमान और अधूरे प्रतिशोध—को लेकर अकृतव्रण/होत्रवाहन के सामने अपना मार्ग पूछती है: किसे लक्ष्य बनाऊँ, किससे प्रतिकार करूँ? → अकृतव्रण उसे विकल्पों की कठोर गणना सुनाता है—यदि शाल्व को पति मानना है तो उसी से आग्रह कर; यदि भीष्म से प्रतिकार चाहती है तो परशुराम जैसे महाबली को साध; पर हर राह में लोक-लज्जा, राजधर्म और पुरुष-प्रतिष्ठा की दीवारें खड़ी हैं। अम्बा अपना सत्य खोलती है: भीष्म ने अनजाने में उसका हरण किया, पर अब उसका मन शाल्व में नहीं; और भीष्म उसके जीवन-विनाश का कारण बन चुका है। → अम्बा का प्रतिज्ञा-स्वर फूट पड़ता है—भीष्म के कारण जो दशा हुई, उसी क्षण से हृदय में एक ही संकल्प जल रहा है: ‘महाव्रती भीष्म का वध।’ वह परशुराम से विनती नहीं, आदेश-सा आग्रह करती है: जैसे इन्द्र ने वृत्र का वध किया, वैसे ही आप भीष्म को मारें। → परशुराम अम्बा की बात सुनकर अर्थ-निश्चय करते हैं—उसकी पीड़ा और लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है; प्रतिशोध का मार्ग अब ‘धर्म-आवरण’ में युद्ध की ओर मुड़ता है। अध्याय अम्बा की याचना/प्रतिज्ञा को स्थापित कर देता है, जिससे आगे की घटनाएँ अनिवार्य बनती हैं। → परशुराम क्या सचमुच भीष्म के विरुद्ध शस्त्र उठाएँगे—और गुरु-शिष्य/क्षत्रधर्म की यह गाँठ किस तरह खुलेगी?

Shlokas

Verse 1

अपन < बक। है २ >> सप्तसप्तत्याधिेकशततमो< ध्याय: अकृतव्रण और परशुरामजीकी अम्बासे बातचीत अकृतव्रण उवाच दुःखद्वयमिदं भद्गरे कतरस्य चिकीर्षसि । प्रतिकर्तव्यमबले तत्‌ त्वं वत्से वदस्व मे,अकृतब्रणने कहा--भट्रे! तुम्हें दुःख देनेवाले दो कारण (भीष्म और शाल्व) उपस्थित हैं। वत्से! तुम इन दोनोंमेंसे किससे बदला लेनेकी इच्छा रखती हो? यह मुझे बताओ

অকৃতব্রণ বললেন—ভদ্রে, তোমার দুঃখের দুই কারণ সামনে উপস্থিত। এদের মধ্যে কার বিরুদ্ধে প্রতিকার চাইছ? হে অসহায় বৎসে, আমাকে বলো—যাতে যথোচিত উত্তর দেওয়া যায়।

Verse 2

यदि सौभपतिर्भद्रे नियोक्तव्यो मतस्तव । नियोक्ष्यति महात्मा स रामस्त्वद्धितकाम्यया,भद्रे! यदि तुम्हारा यह विचार हो कि सौभपति शाल्वराजको ही विवाहके लिये विवश करना चाहिये तो महात्मा परशुराम तुम्हारे हितकी इच्छासे शाल्वराजको अवश्य इस कार्यमें नियुक्त करेंगे

ভদ্রে! যদি তোমার মত এই হয় যে সৌভপতি শাল্বরাজকেই বিবাহের জন্য বাধ্য করা উচিত, তবে মহাত্মা রাম (পরশুরাম) তোমার মঙ্গলকামনায় শাল্বরাজকে অবশ্যই সেই কাজে নিয়োজিত করবেন।

Verse 3

अथापगेयं भीष्म त्वं रामेणेच्छसि धीमता । रणे विनिर्जिति द्रष्टं कुर्यात्‌ तदपि भार्गव:,अथवा यदि तुम गंगानन्दन भीष्मको बुद्धिमान्‌ परशुरामजीके द्वारा युद्धमें पराजित देखना चाहती हो तो वे महात्मा भार्गव यह भी कर सकते हैं

অথবা যদি তুমি প্রাজ্ঞ রাম (পরশুরাম)-এর হাতে গঙ্গানন্দন ভীষ্মকে রণে পরাজিত হতে দেখতে চাও, তবে মহাত্মা ভার্গব তা-ও করতে সক্ষম।

Verse 4

सृञ्जयस्य वच: श्रुत्वा तव चैव शुचिस्मिते । यदत्र ते भृशं कार्य तदद्यैव विचिन्त्यताम्‌,शुचिस्मिते! सृंजयवंशी राजा होत्रवाहनकी बात सुनकर और अपना विचार प्रकट करके जो कार्य तुम्हें अत्यन्त आवश्यक प्रतीत हो उसका आज ही विचार कर लो

হে শুচিস্মিতে! সৃঞ্জয়ের কথা এবং তোমার মত শুনে, এই অবস্থায় তোমার যা অত্যন্ত করণীয় বলে মনে হয়, তা আজই ভেবে স্থির করো।

Verse 5

अम्बोवाच अपनीतास्मि भीष्मेण भगवन्नविजानता । नाभिजानाति मे भीष्मो ब्रह्मन्‌ शाल्वगतं मन:,अम्बा बोली--भगवन्‌! भीष्म बिना जाने-बूझे मुझे हर लाये थे। ब्रह्मन्‌! उन्हें इस बातका पता नहीं था कि मेरा मन शाल्वमें अनुरक्त है

অম্বা বলল—ভগবন! ভীষ্ম অজান্তেই আমাকে হরণ করে এনেছিলেন। হে ব্রাহ্মণ! ভীষ্ম জানতেন না যে আমার মন শাল্বের প্রতি আসক্ত।

Verse 6

एतद्‌ विचार्य मनसा भवानेतद्‌ विनिश्चयम्‌ । विचिनोतु यथान्यायं विधान क्रियतां तथा,इस बातपर मन-ही-मन विचार करके आप ही कुछ निश्चय करें और जो न्यायसंगत प्रतीत हो, वही कार्य करें

এ বিষয়ে মনে মনে বিচার করে আপনি নিজেই দৃঢ় সিদ্ধান্ত নিন। যা ন্যায়সঙ্গত ও ধর্মসম্মত বলে প্রতীয়মান হয়, সেইভাবেই কার্য সম্পন্ন হোক।

Verse 7

भीष्मे वा कुरुशार्टूले शाल्वराजे5थवा पुन: । उभयोरेव वा ब्रह्मन्‌ युक्ते यत्‌ तत्‌ समाचर,ब्रह्मन! कुरुश्रेष्ठ भीष्मके साथ अथवा शाल्वराजके साथ अथवा दोनोंके ही साथ जो उचित बर्ताव हो, वह करें

হে ব্রাহ্মণ! কুরুদের ব্যাঘ্র ভীষ্মের সঙ্গে, অথবা শাল্বরাজার সঙ্গে, কিংবা উভয়ের সঙ্গেই—যা যেমন উপযুক্ত, তেমনই আচরণ করুন।

Verse 8

निवेदितं मया होतद्‌ दुःखमूलं यथातथम्‌ । विधान तत्र भगवन्‌ कर्तुमर्हसि युक्तित:,मैंने अपने दुःखके इस मूल कारणको यथार्थरूपसे निवेदन कर दिया। भगवन्‌| अब आप अपनी युक्तिसे ही इस विषयमें न्‍्यायोचित कार्य करें

আমি আমার দুঃখের মূল কারণটি যেমন আছে তেমনই সত্যভাবে নিবেদন করেছি। হে ভগবন, এখন যুক্তি-বিবেচনায় এখানে যা ন্যায়সঙ্গত ও যথোচিত, সেই সিদ্ধান্ত গ্রহণ করুন।

Verse 9

अकृतव्रण उवाच उपपन्नमिदं भद्रे यदेवं वरवर्णिनि । धर्म प्रति वचो ब्रूया: शृणु चेद॑ वचो मम,अकृतब्रण बोले--भट्रे! तुम जो इस प्रकार धर्मानुकूल बात कहती हो, यही तुम्हारे लिये उचित है। वरवर्णिनि! अब मेरी यह बात सुनो

অকৃতব্রণ বললেন—হে ভদ্রে, হে সুন্দরবর্ণা! তুমি যে এভাবে ধর্মানুগত কথা বলেছ, তা যথার্থই উপযুক্ত ও সঙ্গত। এখন আমার কথাও শোনো।

Verse 10

यदि त्वामापगेयो वै न नयेद्‌ गजसाह्दयम्‌ | शाल्वस्त्वां शिरसा भीरु गृह्नीयाद्‌ रामचोदित:,भीरु! यदि गंगानन्दन भीष्म तुम्हें हस्तिनापुर न ले जाते तो राजा शास्त्र परशुरामजीके कहनेपर तुम्हें आदरपूर्वक स्वीकार कर लेता

হে ভীরু! যদি গঙ্গানন্দন আপগেয় (ভীষ্ম) তোমাকে গজসাহ্বয় (হস্তিনাপুর) না নিয়ে যেতেন, তবে রাম (পরশুরাম)-এর প্রেরণায় শাল্বরাজ মাথা নত করে তোমাকে সম্মানের সঙ্গে গ্রহণ করতেন।

Verse 11

तेन त्वं निर्जिता भद्रे यस्मान्नीतासि भाविनि । संशय: शाल्वराजस्य तेन त्वयि सुमध्यमे,परंतु भद्रे! भीष्म तुम्हें जीतकर अपने साथ ले गये। भाविनि! सुमध्यमे! यही कारण है कि शाल्वराजके मनमें तुम्हारे प्रति संशय उत्पन्न हो गया है

হে ভদ্রে! ভীষ্ম তোমাকে পরাজিত করে সঙ্গে নিয়ে গিয়েছিলেন। হে ভবিষ্যৎ রাণী, হে সুমধ্যমে! সেই কারণেই শাল্বরাজার মনে তোমাকে নিয়ে সন্দেহ জেগেছে।

Verse 12

भीष्म: पुरुषमानी च जितकाशी तथैव च । तस्मात्‌ प्रतिक्रिया युक्ता भीष्मे कारयितुं तव,भीष्मको अपने पुरुषार्थका अभिमान है और वे इस समय अपनी विजयसे उललसित हो रहे हैं। अत: भीष्मसे ही बदला लेना तुम्हारे लिये उचित होगा

ভীষ্ম নিজের পৌরুষে গর্বিত, আর এখন তিনি বিজয়ে উল্লসিত। অতএব তোমার পক্ষে ভীষ্মের বিরুদ্ধেই প্রতিশোধ গ্রহণ করানোই যথোচিত।

Verse 13

अम्बोवाच ममाप्येष सदा ब्रह्मन्‌ हदि कामो$भिवर्तते । घातयेयं यदि रणे भीष्ममित्येव नित्यदा,अम्बा बोली--ब्रह्मन! मेरे मनमें भी सदा यह इच्छा बनी रहती है कि मैं युद्धमें भीष्मका वध करा दूँ। महाबाहो! आप भीष्मको या शाल्वराजको जिसे भी दोषी समझते हों, उसीको दण्ड दीजिये, जिसके कारण मैं अत्यन्त दुःखमें पड़ गयी हूँ

অম্বা বলল—হে ব্রাহ্মণ! আমার হৃদয়েও সর্বদা এই কামনা জাগে যে যুদ্ধে আমি ভীষ্মের বধ ঘটাব; এই সংকল্পেই আমি চিরকাল স্থির।

Verse 14

भीष्म वा शाल्वराजं वा यं वा दोषेण गच्छसि । प्रशाधि त॑ं महाबाहो यत्कृते5हं सुदुःखिता,अम्बा बोली--ब्रह्मन! मेरे मनमें भी सदा यह इच्छा बनी रहती है कि मैं युद्धमें भीष्मका वध करा दूँ। महाबाहो! आप भीष्मको या शाल्वराजको जिसे भी दोषी समझते हों, उसीको दण्ड दीजिये, जिसके कारण मैं अत्यन्त दुःखमें पड़ गयी हूँ

ভীষ্ম হোক বা শাল্বরাজ—যাকে তুমি দোষী মনে কর, হে মহাবাহো, তাকেই দণ্ড দাও; কারণ তারই জন্য আমি গভীর দুঃখে পতিত হয়েছি।

Verse 15

भीष्म उवाच एवं कथयतामेव तेषां स दिवसो गत: । रात्रिश्न भरतश्रेष्ठ सुखशीतोष्णमारुता,भीष्मजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार बातचीत करते हुए उन सब लोगोंका वह दिन बीत गया। सुखदायिनी सरदी, गरमी और हवासे युक्त रात भी समाप्त हो गयी

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! এভাবে কথোপকথন চলতেই তাদের সেই দিন কেটে গেল; আর সুখদায়িনী, শীত-উষ্ণে সম, মৃদু বাতাসে স্নিগ্ধ সেই রাত্রিও অতিবাহিত হলো।

Verse 16

ततो राम: प्रादुरासीत्‌ प्रज्वलन्निव तेजसा । शिष्यै: परिवृतो राजन्‌ जटाचीरधरो मुनि:,राजन! तदनन्तर अपने शिष्योंसे घिरे हुए जटावल्कलधारी मुनिवर परशुरामजी वहाँ प्रकट हुए। वे अपने तेजके कारण प्रज्वलित-से हो रहे थे

তখন, হে রাজন, নিজের তেজে দগ্ধ অগ্নির ন্যায় পরশুরাম আবির্ভূত হলেন। জটা ও বল্কলধারী সেই মুনিবর শিষ্যবেষ্টিত হয়ে সেখানে উপস্থিত হলেন।

Verse 17

धनुष्पाणिरदीनात्मा खड्गं बिश्रत्‌ परश्वधी । विरजा राजशार्दूल सृञ्जयं सो<भ्ययान्नपम्‌,नृपश्रेष्ठट उनके हृदयमें दीनताका नाम नहीं था। उन्होंने अपने हाथोंमें धनुष, खड्ग और फरसा ले रखे थे। उनके हृदयसे रजोगुण दूर हो गया था, वे राजा सूंजयके निकट आये

হে রাজশার্দূল, ধনুক হাতে, দীনতার স্পর্শহীন চিত্তে, খড়্গ ও পরশু ধারণ করে, রজোগুণমুক্ত সেই পরশুরাম রাজা সৃঞ্জয়ের নিকট অগ্রসর হলেন।

Verse 18

ततस्तं तापसा दृष्टवा स च राजा महातपा: । तस्थु: प्राउजजलयो राजन्‌ सा च कन्या तपस्विनी,राजन! उन्हें देखकर वे तपस्वी मुनि, महातपस्वी नरेश तथा वह तपस्विनी राजकन्या --ये सब-के-सब हाथ जोड़कर खड़े हो गये

হে রাজন, তাঁকে দেখে সেই তপস্বী মুনিগণ, মহাতপস্বী রাজা এবং তপস্যারত রাজকন্যা—সকলেই করজোড়ে দাঁড়িয়ে রইলেন।

Verse 19

पूजयामासुरव्यग्रा मधुपर्केण भार्गवम्‌ | अर्चितश्न यथान्यायं निषसाद सहैव तै:,फिर उन्होंने स्वस्थचित्त होकर मधुपर्कद्वारा भार्गव परशुरामजीका पूजन किया। विधिपूर्वक पूजित होनेपर वे उन्हींके साथ वहाँ बैठे

তারপর তারা অচঞ্চলচিত্তে মধুপর্ক অর্পণ করে ভার্গব পরশুরামকে পূজা করল। যথাবিধি অর্চিত হলে তিনি তাদের সঙ্গেই সেখানে আসন গ্রহণ করলেন।

Verse 20

ततः पूर्वव्यतीतानि कथयन्तौ सम तावुभौ । आसातां जामदग्न्यश्न सृञ्जयश्चैव भारत,भारत! तत्पश्चात्‌ परशुरामजी और सूंजय (होत्रवाहन) दोनों मित्र पहलेकी बीती बातें कहते हुए एक जगह बैठ गये

হে ভারত, তারপর জামদগ্ন্য পরশুরাম ও সৃঞ্জয়—এই দুই বন্ধু—সমভাবে পূর্বেকার ঘটনাবলি স্মরণ করে এক স্থানে পাশাপাশি বসলেন।

Verse 21

तथा कथान्ते राजर्षिभिगुश्रेष्ठ महाबलम्‌ । उवाच मधुरं काले रामं वचनमर्थवत्‌,बातचीतके अन्तमें राजर्षि होत्रवाहनने महाबली भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीसे मधुर वाणीमें उस समय यह अर्थयुक्त वचन कहा--

এইভাবে কথোপকথনের শেষে রাজর্ষি হোত্রবাহন ভৃগুশ্রেষ্ঠ মহাবলী রাম (পরশুরাম)-কে যথোচিত কালে মধুর স্বরে অর্থগম্ভীর বাক্য বললেন।

Verse 22

रामेयं मम दौहित्री काशिराजसुता प्रभो । अस्या: शृणु यथातत्त्वं कार्य कार्यविशारद,“कार्यसाधनकुशल प्रभो! परशुराम! यह मेरी पुत्रीकी पुत्री काशिराजकी कन्या है। इसका कुछ कार्य है, उसे आप इसीके मुँहसे ठीक-ठीक सुन लें”

হে প্রভু পরশুরাম, কার্যসাধনে নিপুণ! এ আমার দৌহিত্রী—কাশীরাজার কন্যা। এর একটি কাজ আছে; এর মুখ থেকেই যথাযথ সত্যরূপে শুনুন।

Verse 23

परम कथ्यतां चेति तां राम: प्रत्यभाषत । ततः: साभ्यगमद्‌ रामं ज्वलन्तमिव पावकम्‌,“बहुत अच्छा, कहो बेटी' इस प्रकार उस कन्याको जब परशुरामजीने प्रेरित किया; तब वह प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी परशुरामजीके पास आयी और उनके कल्याणकारी चरणोंको सिरसे प्रणाम करके कमलदलके समान सुशोभित होनेवाले दोनों हाथोंसे उनका स्पर्श करती हुई सामने खड़ी हो गयी

“তবে যা সর্বাধিক জরুরি, তাই বলো”—এভাবে রাম (পরশুরাম) তাকে উত্তর দিলেন। তখন সেই কন্যা প্রজ্বলিত অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান রামের নিকট অগ্রসর হল।

Verse 24

ततो5भिवाद्य चरणौ रामस्य शिरसा शुभौ | स्पृष्टवा पद्मदलाभाभ्यां पाणिभ्यामग्रत: स्थिता,“बहुत अच्छा, कहो बेटी' इस प्रकार उस कन्याको जब परशुरामजीने प्रेरित किया; तब वह प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी परशुरामजीके पास आयी और उनके कल्याणकारी चरणोंको सिरसे प्रणाम करके कमलदलके समान सुशोभित होनेवाले दोनों हाथोंसे उनका स्पर्श करती हुई सामने खड़ी हो गयी

তখন সে রাম (পরশুরাম)-এর শুভ চরণযুগলে মস্তক নত করে প্রণাম করল, পদ্মপত্রসম কোমল উভয় হাতে তা স্পর্শ করল এবং তাঁর সম্মুখে দাঁড়াল।

Verse 25

रुरोद सा शोकवती बाष्पव्याकुललोचना । प्रपेदे शरणं चैव शरण्यं भूगुनन्दनम्‌,उसके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वह शोकसे आतुर होकर रोने लगी और सबको शरण देनेवाले भूगुनन्दन परशुरामजीकी शरणमें गयी

শোকে ব্যাকুল হয়ে সে কেঁদে উঠল; অশ্রুতে তার চোখ আচ্ছন্ন হল। তখন সে আশ্রয়দাতা ভৃগুনন্দন পরশুরামের শরণ নিল।

Verse 26

राम उवाच यथा त्वं सृञ्जयस्यास्य तथा मे त्वं नृपात्मजे । ब्रूहि यत्‌ ते मनोदुःखं करिष्ये वचनं तव,परशुरामजी बोले--राजकुमारी! जैसे तू इन संजयकी दौहित्री है, उसी प्रकार मेरी भी है। तेरे मनमें जो दुःख है, उसे बता। मैं तेरे कथनानुसार सब कार्य करूँगा

রাম বললেন—রাজকন্যে! যেমন তুমি এই সৃঞ্জয়ের দৌহিত্রী, তেমনি তুমি আমারও। তোমার মনের যে দুঃখ, তা বলো; তোমার কথামতোই আমি কার্য করব।

Verse 27

अम्बोवाच भगवउ्शरणं त्वाद्य प्रपन्नास्मि महाव्रतम्‌ । शोकपड्कार्णवान्मग्नां घोरादुद्धर मां विभो,अम्बा बोली--भगवन्‌! आप महान्‌ व्रतधारी हैं। आज मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। प्रभो! इस भयंकर शोकसागरमें डूबनेसे मुझे बचाइये

অম্বা বলল—ভগবন্! আপনি মহাব্রতধারী। আজ আমি আপনার শরণ নিয়েছি। প্রভো! এই ভয়ংকর শোকসাগরে ডুবে যাচ্ছি—আমাকে উদ্ধার করুন।

Verse 28

भीष्म उवाच तस्याश्च दृष्टवा रूपं च वपुश्चाभिनवं पुन: । सौकुमार्य परं चैव रामश्रिन्तापरो&$भवत्‌,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! उसके सुन्दर रूप, नूतन (तरुण) शरीर तथा अत्यन्त सुकुमारताको देखकर परशुरामजी चिन्तामें पड़ गये कि न जाने यह क्या कहेगी? उसके प्रति दयाभावसे परिपूर्ण हो भूगुकुलभूषण परशुराम बहुत देरतक उसीके विषयमें चिन्ता करते रहे

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! তার সৌন্দর্য, নবযৌবন-ভরা দেহ ও অতিশয় কোমলতা দেখে রাম (পরশুরাম) চিন্তায় পড়লেন।

Verse 29

किमियं वक्ष्यतीत्येवं विममर्श भगूद्वह: । इति दध्यौ चिरं राम: कृपयाभिपरिप्लुत:,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! उसके सुन्दर रूप, नूतन (तरुण) शरीर तथा अत्यन्त सुकुमारताको देखकर परशुरामजी चिन्तामें पड़ गये कि न जाने यह क्या कहेगी? उसके प्रति दयाभावसे परिपूर्ण हो भूगुकुलभूषण परशुराम बहुत देरतक उसीके विषयमें चिन्ता करते रहे

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! ‘এ কী বলবে?’—এই ভেবে ভৃগুবংশশ্রেষ্ঠ রাম (পরশুরাম) করুণায় আপ্লুত হয়ে দীর্ঘক্ষণ ধ্যান করলেন।

Verse 30

कथ्यतामिति सा भूयो रामेणोक्ता शुचिस्मिता । सर्वमेव यथातत्त्वं कथयामास भार्गवे,तदनन्तर परशुरामजीके पुनः यह कहनेपर कि तुम अपनी बात कहो, पवित्र मुसकानवाली अम्बाने उनसे अपना सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया

তারপর রাম (পরশুরাম) আবার ‘বলো’ বললে, পবিত্র হাস্যযুক্ত অম্বা ভৃগুবংশীয়ের কাছে যা ঘটেছিল সবই যথাযথভাবে বর্ণনা করল।

Verse 31

तच्छुत्वा जामदग्न्यस्तु राजपुत्रया वचस्तदा । उवाच तां वरारोहां निश्षित्यार्थविनिश्चयम्‌,राजकुमारी अम्बाका यह कथन सुनकर जमदग्निनन्दन परशुरामने क्‍या करना है, इसका निश्चय करके उस सुन्दर अंगोंवाली राजकुमारीसे कहा

রাজকন্যার সেই কথা শুনে জামদগ্ন্য পরশুরাম কী করা উচিত তা দৃঢ়ভাবে স্থির করলেন; সিদ্ধান্তে স্থিত হয়ে তিনি সেই সুশ্রী, মহীয়সী রাজকন্যাকে বললেন।

Verse 32

राम उवाच प्रेषयिष्यामि भीष्माय कुरुश्रेष्ठाय भाविनि । करिष्यति वचो महां श्रुत्वा च स नराधिप:,परशुरामजी बोले--भाविनि! मैं तुझे कुरुश्रेष्ठ भीष्मके पास भेजूँगा। नरपति भीष्म सुनते ही मेरी आज्ञाका पालन करेगा

রাম (পরশুরাম) বললেন—হে ভদ্রে, আমি তোমাকে কুরুশ্রেষ্ঠ ভীষ্মের কাছে পাঠাব। সেই মহারাজ আমার বাক্য শুনলেই তা পালন করবেন।

Verse 33

न चेत्‌ करिष्यति वचो मयोक्तं जाह्नवीसुत: । थक्ष्याम्यहं रणे भद्रे सामात्यं शस्त्रतेजसा,भद्रे! यदि गंगानन्दन भीष्म मेरी बात नहीं मानेगा तो मैं युद्धमें अस्त्र-शस्त्रोंके तेजसे मन्त्रियोंसहित उसे भस्म कर डालूँगा

হে ভদ্রে! যদি জাহ্নবী-সুত ভীষ্ম আমার কথামতো না করেন, তবে যুদ্ধে অস্ত্রশস্ত্রের প্রজ্বলিত তেজে আমি তাঁকে তাঁর মন্ত্রী-সহ ভস্ম করে দেব।

Verse 34

अथवा ते मतिस्तत्र राजपुत्रि न वर्तते । यावच्छाल्वपतिं वीर॑ योजयाम्यत्र कर्मणि,अथवा राजकुमारी! यदि वहाँ जानेका तेरा विचार न हो तो मैं वीर शाल्वराजको ही पहले इस कार्यमें नियुक्त करूँ: (उसके साथ तेरा ब्याह करा दूँ)

অথবা, হে রাজকন্যা! যদি সেখানে যাওয়ার বিষয়ে তোমার মন স্থির না থাকে, তবে আমি বীর শাল্বরাজকেই প্রথমে এই কার্যে নিয়োজিত করব—অর্থাৎ তোমার বিবাহ তাঁর সঙ্গেই স্থির করব।

Verse 35

अम्बोवाच विसर्जिताहं भीष्मेण श्रुत्वैव भूगुनन्दन । शाल्वराजगतं भावं मम पूर्व मनीषितम्‌,अम्बा बोली--भृगुनन्दन! शाल्वराजमें मेरा अनुराग है और मैं पहलेसे ही उन्हें पाना चाहती हूँ। यह सुनते ही भीष्मने मुझे विदा कर दिया था

অম্বা বলল—হে ভৃগুনন্দন! আমার হৃদয় শাল্বরাজার প্রতি নিবদ্ধ; পূর্ব থেকেই তাঁকেই বরণ করতে আমি মনস্থ করেছিলাম। এ কথা শুনেই ভীষ্ম আমাকে মুক্ত করে দিয়েছিলেন।

Verse 36

सौभराजमुपेत्याहमवोचं दुर्वचं वच: । नच मां प्रत्यगृह्लात्‌ स चारित््यपरिशड्कितः,तब सौभराजके पास जाकर मैंने उनसे ऐसी बातें कहीं जिन्हें अपने मुँहसे कहना स्त्रीजातिके लिये अत्यन्त दुष्कर होता है; परंतु मेरे चरित्रपर संदेह हो जानेके कारण उसने मुझे स्वीकार नहीं किया

তখন আমি সৌভরাজের কাছে গিয়ে এমন কঠোর কথা বলেছিলাম, যা নারীর পক্ষে মুখে উচ্চারণ করাও অত্যন্ত দুঃসাধ্য; কিন্তু আমার চরিত্রে সন্দেহ করে সে আমাকে গ্রহণ করল না।

Verse 37

एतत्‌ सर्व विनिश्चित्य स्वबुद्धया भगुनन्दन । यदत्रौपयिकं कार्य तच्चिन्तयितुमरहसि,भुगुनन्दन! इन सब बातोंपर बुद्धिपूर्वक विचार करके जो उचित प्रतीत हो, उसी कार्यकी ओर आप ध्यान दें

ভৃগুনন্দন! এই সমস্ত বিষয় নিজের বুদ্ধিতে স্থির করে বিচার করে, এখানে যা উপযুক্ত ও কল্যাণকর মনে হয়, সেই কর্মই চিন্তা করো।

Verse 38

मम तु व्यसनस्यास्य भीष्मो मूलं महाव्रत: । येनाहं वशमानीता समुत्क्षिप्प बलात्‌ तदा,मेरी इस विपत्तिका मूल कारण महान्‌ व्रतधारी भीष्म है, जिसने उस समय बलपूर्वक मुझे उठाकर रथपर रख लिया और इस प्रकार मुझे वशमें करके वह हस्तिनापुर ले आया

আমার এই দুর্দশার মূল কারণ মহাব্রতধারী ভীষ্ম; সেই সময় সে বলপূর্বক আমাকে তুলে নিজের বশে এনে হস্তিনাপুরে নিয়ে গিয়েছিল।

Verse 39

भीष्मं जहि महाबाहो यत्कृते दृःखमीदृशम्‌ । प्राप्ताहं भगुशार्दूल चराम्यप्रियमुत्तमम्‌,महाबाहु भृगुसिंह! आप भीष्मको ही मार डालिये, जिसके कारण मुझे ऐसा दुःख प्राप्त हुआ है और मैं इस प्रकार विवश होकर अत्यन्त अप्रिय आचरणमें प्रवृत्त हुई हूँ

মহাবাহু, ভৃগুশার্দূল! ভীষ্মকে বধ করো; তারই কারণে আমি এমন দুঃখে পতিত হয়েছি, আর বাধ্য হয়ে আমি অত্যন্ত অপ্রিয় আচরণে প্রবৃত্ত হয়েছি।

Verse 40

स हि लुब्धश्न नीचश्व जितकाशी च भार्गव | तस्मात्‌ प्रतिक्रिया कर्तु युक्ता तस्मै त्वयानघ,निष्पाप भार्गव! भीष्म लोभी, नीच और विजयोल्लाससे परिपूर्ण है; अतः आपको उसीसे बदला लेना उचित है

নিষ্পাপ ভার্গব! ভীষ্ম লোভী, নীচ, আর জয়ের উন্মাদনায় মত্ত; তাই তার বিরুদ্ধে প্রতিক্রিয়া গ্রহণ করাই তোমার পক্ষে যথোচিত।

Verse 41

एष मे क्रियमाणाया भारतेन तदा विभो । अभवद्धृदि संकल्पो घातयेयं महाव्रतम्‌,प्रभो! भरतवंशी भीष्मने जबसे मुझे इस दशामें डाल दिया है, तबसे मेरे हृदयमें यही संकल्प उठता है कि मैं उस महान्‌ व्रतधारीका वध करा दूँ

হে প্রভু! ভরতবংশীয় ভীষ্ম যখন থেকে আমাকে এই অবস্থায় ফেলেছে, তখন থেকেই আমার হৃদয়ে এই সংকল্প জেগেছে—আমি সেই মহাব্রতধারীকে নিহত করাব।

Verse 42

तस्मात्‌ काम॑ ममाद्येमं राम सम्पादयानघ । जहि भीष्म महाबाहो यथा वृत्र पुरंदर:

অতএব, হে নিষ্পাপ রাম! আজ আমার এই কামনা পূর্ণ করুন। হে মহাবাহু! পুরন্দর ইন্দ্র যেমন বৃত্রকে বধ করেছিলেন, তেমনি আপনিও ভীষ্মকে বধ করুন।

Verse 176

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें अग्बा- होत्रवाहनसंवादविषयक एक सौ छिह्वत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত অম্বোপাখ্যানপর্বে অম্বা-হোত্রবাহন সংলাপবিষয়ক একশো ছিয়াত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 177

निष्पाप महाबाहु राम! आज आप मेरी इसी कामनाको पूर्ण कीजिये। जैसे इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया था, उसी प्रकार आप भी भीष्मको मार डालिये ।। इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि रामाम्बासंवादे सप्तसप्तत्यधिकशततमो<्ध्याय:

অম্বা বলল—হে নিষ্পাপ, মহাবাহু রাম! আজ আমার এই এক কামনা পূর্ণ করুন। ইন্দ্র যেমন বৃত্রাসুরকে বধ করেছিলেন, তেমনি আপনিও ভীষ্মকে বধ করুন। ইতি শ্রীমহাভারতে উদ্যোগপর্বণি অম্বোপাখ্যানপর্বণি রামাম্বাসংবাদে সপ্তসপ্তত্যধিকশততমোধ্যায়ঃ।

Frequently Asked Questions

Whether corrective justice should be pursued by compelling a socially valid marriage outcome (Śālva’s acceptance) or by targeting the initiating agent (Bhīṣma) as accountable for the chain of harm—balancing custom, consent, and reputational constraints.

Injury created under public norms still demands reasoned adjudication: responsibility must be traced to causes, remedies must be proportionate, and authority is invoked not merely for power but to restore a defensible moral order.

No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the chapter functions primarily as narrative-ethical documentation, emphasizing procedural dharma (petition, deliberation, and enforcement) rather than promising recitational merit.