अम्बाया रामजामदग्न्यशरणगमनम्
Ambā Seeks Refuge with Rāma Jāmadagnya
सृञ्जयस्य वच: श्रुत्वा तव चैव शुचिस्मिते । यदत्र ते भृशं कार्य तदद्यैव विचिन्त्यताम्,शुचिस्मिते! सृंजयवंशी राजा होत्रवाहनकी बात सुनकर और अपना विचार प्रकट करके जो कार्य तुम्हें अत्यन्त आवश्यक प्रतीत हो उसका आज ही विचार कर लो
sṛñjayasya vacaḥ śrutvā tava caiva śucismite | yad atra te bhṛśaṃ kārya tad adyaiva vicintyatām ||
হে শুচিস্মিতে! সৃঞ্জয়ের কথা এবং তোমার মত শুনে, এই অবস্থায় তোমার যা অত্যন্ত করণীয় বলে মনে হয়, তা আজই ভেবে স্থির করো।
अकृतव्रण उवाच