
Udyoga Parva, Adhyāya 148: Vāsudeva’s Report—Mobilization and the Nīti Sequence (Sāma–Bheda–Daṇḍa)
Upa-parva: Kuru-saṃsad Nīti–saṃvāda (Kṛṣṇa’s counsel and the court’s mobilization episode)
Vāsudeva recounts that despite direct counsel from Bhīṣma, Droṇa, Vidura, Gāndhārī, and Dhṛtarāṣṭra, Duryodhana remains unresponsive and escalates in anger. He issues repeated orders to hostile-minded kings to proceed to Kurukṣetra, and the rulers depart with their forces, appointing Bhīṣma as senāpati; the assembled strength is described as eleven akṣauhiṇīs, with Bhīṣma prominent at the fore. Vāsudeva then summarizes his diplomatic method as a graded policy: he first employed sāma to preserve fraternal unity and public welfare; when ignored, he used bheda by reorganizing and separating political alignments through speech and counsel, including warnings and reputational pressure directed at key figures. He returns again to a sāma-based offer aimed at preventing the fracture of the Kuru line, proposing a settlement that effectively reduces the Pāṇḍavas’ claims; Duryodhana does not relent, leading Vāsudeva to conclude that only daṇḍa remains and that war is now the condition for any transfer of sovereignty.
Chapter Arc: वायुदेव के कथन-ढंग में धृतराष्ट्र का स्वर उठता है—वे दुर्योधन को ‘पुत्रक’ कहकर पितृगौरव की दुहाई देते हैं और पहली बार स्पष्ट संकेत करते हैं कि अब भी विनाश टल सकता है। → धृतराष्ट्र वंश-परंपरा का दीर्घ उदाहरण-क्रम खोलते हैं—सोम से लेकर ययाति तक, और फिर ययाति के पुत्रों का प्रसंग: ज्येष्ठ होकर भी दर्प और अवज्ञा के कारण अधिकार छिनता है, आज्ञापालक पूरु को राज्य मिलता है। यह इतिहास दुर्योधन के वर्तमान हठ पर सीधा प्रहार बन जाता है। → धृतराष्ट्र का निर्णायक आदेश: ‘मोह छोड़कर’ पाण्डवों को राज्य का आधा भाग दे—वाहन, परिच्छद सहित—और शेष जीवन अपने अनुजों सहित शांति से जी। यह केवल सलाह नहीं, पिता का अंतिम-सा राजधर्म-आदेश है। → अध्याय धृतराष्ट्र के युक्तिसंगत, नीति-आधारित उपदेश पर ठहरता है—वंश-रक्षा, पिता-आज्ञा, और न्यायपूर्ण बँटवारे को युद्ध-निवारण का उपाय बताकर। → दुर्योधन इस आदेश को मानेगा या अपने बल-दर्प में वंश-विनाश का द्वार खोलेगा—यही अनुत्तरित प्रश्न अगले प्रसंग की ओर धकेलता है।
Verse 1
अत-#-#कात एकोनपज्चाशर्दाधिकशततमो< ध्याय: दुर्योधनके प्रति धृतराष्ट्रके युक्तिसंगत वचन--पाण्डवोंको आधा राज्य देनेके लिये आदेश वायुदेव उवाच एवमुक्ते तु गान्धार्या धृतराष्ट्रो जनेश्वर: । दुर्योधनमुवाचेदं राजमध्ये जनाधिप
বায়ুদেব বললেন—গান্ধারী এভাবে বলার পর, জনেশ্বর রাজা ধৃতরাষ্ট্র রাজাদের সভামাঝে দুর্যোধনকে এই কথা বললেন—“হে জনাধিপ…”
Verse 2
दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि पुत्रक । तथा तत् कुरु भद्रें ते यद्यस्ति पितृगौरवम्
বৎস দুর্যোধন! আমি যা বলতে যাচ্ছি তা মনোযোগ দিয়ে বোঝ ও শোন। তোমার মঙ্গল হোক। যদি পিতার প্রতি তোমার অন্তরে সামান্যও গৌরব ও শ্রদ্ধা থাকে, তবে আমি যেমন নির্দেশ দিই তেমনই কর।
Verse 3
सोम: प्रजापति: पूर्व कुरूणां वंशवर्धन: । सोमाद् बभूव षष्ठो5यं ययातिर्नहुषात्मज:,“सबसे पहले प्रजापति सोम हुए, जो कौरववंशकी वृद्धिके आदि कारण हैं। सोमसे छठी पीढ़ीमें नहुषपुत्र ययातिका जन्म हुआ
আদিতে প্রজাপতি সোম ছিলেন—কুরুবংশের বৃদ্ধি ও বিকাশের মূল উৎস। সোম থেকে ষষ্ঠ প্রজন্মে নহুষের পুত্র যযাতি জন্মগ্রহণ করেন।
Verse 4
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि पञठ्च राजर्षिसत्तमा: । तेषां यदुर्महातेजा ज्येष्ठ: समभवत् प्रभु:
তাঁর পাঁচ পুত্র জন্মাল—সকলেই শ্রেষ্ঠ রাজর্ষি। তাঁদের মধ্যে মহাতেজস্বী যদু জ্যেষ্ঠ হলেন এবং শক্তিমান অধিপতি রূপে প্রতিষ্ঠিত হলেন।
Verse 5
पूरुर्यवीयांश्व॒ ततो यो5स्माकं वंशवर्धन: । शर्मिष्ठया सम्प्रसूतो दुहित्रा वृषपर्वण:
তারপর সর্বকনিষ্ঠ পূরু—যিনি আমাদের বংশের বৃদ্ধি সাধন করেছিলেন। তিনি বৃষপর্বার কন্যা শর্মিষ্ঠার গর্ভে জন্মেছিলেন।
Verse 6
यदुश्च भरतश्रेष्ठ देवयान्या: सुतो5भवत् । दौहित्रस्तात शुक्रस्य काव्यस्यामिततेजस:,“भरतश्रेष्ठ! यदु देवयानीके पुत्र थे। तात! वे अमित तेजस्वी शुक्राचार्यके दौहित्र लगते थे
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যদু দেবযানীর পুত্র ছিলেন। প্রিয় বৎস, তিনি অমিততেজস্বী কাব্য নামে খ্যাত শুক্রাচার্যের দৌহিত্র ছিলেন।
Verse 7
यादवानां कुलकरो बलवान् वीर्यसम्मत: । अवमेने स तु क्षत्रं दर्पपूर्ण: सुमन्दधी:
বায়ু বললেন—তিনি যাদববংশের প্রতিষ্ঠাতা, মহাবলশালী এবং বীর্যে স্বীকৃত ছিলেন। কিন্তু বুদ্ধিতে মন্দ ও দম্ভে স্ফীত হয়ে তিনি সমগ্র ক্ষত্রিয়বর্গকে অবমাননা করেছিলেন।
Verse 8
न चातिष्ठत् पितुः शास्त्रे बलदर्पविमोहित:ः । अवमेने च पितरं 40 क्षाप्पपराजित:
নিজ শক্তির দম্ভে মোহিত হয়ে সে পিতার শাসন মানত না। যে অন্যদের কাছে অপরাজেয় ছিল, সে-ই নিজের পিতাকেও তুচ্ছ জ্ঞান করতে লাগল।
Verse 9
पृथिव्यां चतुरन्तायां यदुरेवाभवद् बली । वशे कृत्वा स नृपतीन् न्यवसन्नागसाह्ये
চার সমুদ্রবেষ্টিত এই পৃথিবীতে যদুই সর্বাধিক বলবান ছিল। রাজাদের বশে এনে সে নাগসাহ্যে (হস্তিনাপুরে) বাস করত।
Verse 10
तं पिता परमक्रुद्धों ययातिर्नहुषात्मज: । शशाप पुत्र गान्धारे राज्याच्चापि व्यरोपयत्,'गान्धारीपुत्र! यदुके पिता नहुषनन्दन ययातिने अत्यन्त कुपित होकर यदुको शाप दे दिया और उन्हें राज्यसे भी उतार दिया
তখন নহুষপুত্র যযাতি, পিতা, পরম ক্রুদ্ধ হয়ে গন্ধারে নিজের পুত্রকে শাপ দিলেন এবং রাজ্য থেকেও তাকে অপসারিত করলেন।
Verse 11
ये चैनमन्ववर्तन्त भ्रातरो बलदर्पिता: । शशाप तानभिक्रुद्धो ययातिस्तनयानथ,“अपने बलका घमंड रखनेवाले जिन-जिन भाइयोंने यदुका अनुसरण किया, ययातिने कुपित होकर अपने उन पुत्रोंको भी शाप दे दिया
আর যে যে ভাই নিজের শক্তির দম্ভে মত্ত হয়ে যদুর অনুসরণ করেছিল, ক্রুদ্ধ যযাতি তাদেরও—নিজ পুত্রদের—শাপ দিলেন।
Verse 12
यवीयांसं तत: पूरं पुत्र स््ववशवर्तिनम् । राज्ये निवेशयामास विधेयं नृपसत्तम:
তখন নৃপশ্রেষ্ঠ তাঁর বশ্য, আজ্ঞাপালক কনিষ্ঠ পুত্র পুরুকে রাজসিংহাসনে প্রতিষ্ঠা করলেন।
Verse 13
“तदनन्तर अपने अधीन रहनेवाले आज्ञापालक छोटे पुत्र पूरुको नृपश्रेष्ठ ययातिने राज्यपर बिठाया ।।
এরপর নৃপশ্রেষ্ঠ যযাতি তাঁর অধীনস্থ, আজ্ঞাপালক কনিষ্ঠ পুত্র পুরুকে রাজ্যে অধিষ্ঠিত করলেন। এভাবেই স্থির হলো—জ্যেষ্ঠ পুত্রও যদি অহংকারে উন্মত্ত হয়, তবে রাজ্য লাভ করে না; আর কনিষ্ঠ পুত্রও বয়োজ্যেষ্ঠদের সেবায় রাজ্য লাভের যোগ্য হয়।
Verse 14
तथैव सर्वधर्मज्ञ: पितुर्मम पितामह: । प्रतीप: पृथिवीपालस्त्रिषु लोकेषु विश्रुत:,“इसी प्रकार मेरे पिताके पितामह राजा प्रतीप सब धर्मोके ज्ञाता एवं तीनों लोकोंमें विख्यात थे
তদ্রূপ আমার পিতার পিতামহ রাজা প্রতীপ সর্বধর্মজ্ঞ ছিলেন; পৃথিবীর পালনকর্তা হিসেবে তিনি ত্রিলোকে প্রসিদ্ধ ছিলেন।
Verse 15
तस्य पार्थिवसिंहस्य राज्यं धर्मेण शासत: । त्रयः प्रजज्ञिरे पुत्रा देवकल्पा यशस्विन:,“धर्मपूर्वक राज्यका शासन करते हुए नृपप्रवर प्रतीपके तीन पुत्र उत्पन्न हुए, जो देवताओंके समान तेजस्वी और यशस्वी थे
ধর্মানুসারে রাজ্য শাসনকারী সেই নৃপসিংহ প্রতীপের তিন পুত্র জন্মাল—যশস্বী ও দীপ্তিমান, দেবসম।
Verse 16
देवापिरभवच्छेष्ठो बाह्लीकस्तदनन्तरम् । तृतीय: शान्तनुस्तात धृतिमान् मे पितामह:
হে তাত! সেই তিনজনের মধ্যে দেবাপিই ছিলেন শ্রেষ্ঠ। তাঁর পরে রাজপুত্র বাহ্লীক; আর তৃতীয় ছিলেন আমার ধৈর্যশীল পিতামহ শান্তনু।
Verse 17
देवापिस्तु महातेजास्त्वग्दोषी राजसत्तम: । धार्मिक: सत्यवादी च पितु: शुश्रूषणे रत:
বায়ু বললেন—দেবাপি মহাতেজস্বী ও রাজাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ছিলেন, কিন্তু তিনি চর্মরোগে আক্রান্ত ছিলেন। তবু তিনি ধর্মপরায়ণ, সত্যবাদী এবং পিতৃসেবায় নিবিষ্ট ছিলেন—দেহ রোগে ভারাক্রান্ত হলেও নৈতিক মহিমা ও পিতৃভক্তির দীপ্তি যে ম্লান হয় না, তা তিনি প্রমাণ করলেন।
Verse 18
पौरजानपदानां च सम्मतः साधुसत्कृत: | सर्वेषां बालवृद्धानां देवापिहदयंगम:
বায়ু বললেন—নগরবাসী ও গ্রাম্য জনসাধারণের কাছে দেবাপি সর্বসম্মতভাবে সম্মানিত ছিলেন, এবং সাধুজনেরা তাঁকে বিশেষ মর্যাদা দিতেন। শিশু থেকে বৃদ্ধ—সকলের হৃদয়ে তিনি স্থান করে নিয়েছিলেন।
Verse 19
वदान्य: सत्यसंधश्च सर्वभूतहिते रत: । वर्तमान: पितु: शास्त्रे ब्राह्मणानां तथैव च,*वे उदार, सत्यप्रतिज्ञ और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले थे। पिता तथा ब्राह्मणोंके आदेशके अनुसार चलते थे
বায়ু বললেন—তিনি দানশীল, সত্যপ্রতিজ্ঞ এবং সকল প্রাণীর কল্যাণে নিবিষ্ট ছিলেন। তিনি পিতার নির্দেশ অনুযায়ী এবং তদ্রূপ ব্রাহ্মণদের শাস্ত্রবিধান মেনে চলতেন।
Verse 20
बाह्लीकस्य प्रियो भ्राता शान्तनोश्व॒ महात्मन: । सौक्षात्रं च परं तेषां सहितानां महात्मनाम्
বায়ু বললেন—মহাত্মা শান্তনুর প্রিয় ভ্রাতা ছিলেন বাহ্লীক; আর একচিত্তে মিলিত সেই মহামনাদের মধ্যে সৌক্ষাত্রের বন্ধনও সর্বাগ্রে গণ্য ছিল। ঐ মহৎ ভ্রাতৃসমাজে আদর্শ ভ্রাতৃস্নেহ, পারস্পরিক সম্মান ও অটল ঐক্য বিরাজ করত।
Verse 21
अथ कालस्य पयययि वृद्धो नृपतिसत्तम: । सम्भारानभिषेकार्थ कारयामास शास्त्रत:ः,“तदनन्तर कुछ काल बीतनेपर बूढ़े नृपश्रेष्ठ प्रतीपने शास्त्रीय विधिके अनुसार राज्याभिषेकके लिये सामग्रियोंका संग्रह कराया
তারপর কালের প্রবাহে, বয়োবৃদ্ধ রাজশ্রেষ্ঠ প্রতীপ শাস্ত্রবিধি অনুসারে রাজ্যাভিষেকের জন্য প্রয়োজনীয় সামগ্রী সংগ্রহ করালেন। এতে বোঝা যায়—রাজত্ব কেবল দখল বা ঘোষণা নয়; বিধিসম্মত আচার ও ধর্মসম্মত পরম্পরায় প্রতিষ্ঠিত হয়।
Verse 22
कारयामास सर्वाणि मड़लार्थानि वै विभु: । त॑ब्राह्मणाश्च वृद्धाक्ष पौरजानपदै: सह
পরাক্রান্ত বিভু রাজ্যের জন্য প্রয়োজনীয় সমস্ত আয়োজন করালেন। তারপর, হে বৃদ্ধাক্ষ, ব্রাহ্মণরাও নগরবাসী ও জনপদবাসীদের সঙ্গে (অগ্রসর হলেন/অংশ নিলেন)।
Verse 23
स तच्छुत्वा तु नूपतिरभिषेकनिवारणम् | अश्रुकण्ठो5भवद् राजा पर्यशोचत चात्मजम्,“किंतु राज्याभिषेक रोकनेकी बात सुनकर राजा प्रतीपका गला भर आया और वे अपने पुत्रके लिये शोक करने लगे
অভিষেক রোধ করা হবে—এ কথা শুনে রাজার কণ্ঠ অশ্রুতে রুদ্ধ হয়ে গেল; তিনি শোকে আচ্ছন্ন হয়ে পুত্রের জন্য বিলাপ করতে লাগলেন।
Verse 24
एवं वदान्यो धर्मज्ञ: सत्यसंधश्न सो5भवत् । प्रिय: प्रजानामपि संस्त्वग्दोषेण प्रदूषित:
এইভাবে তিনি দানশীল, ধর্মজ্ঞ, সত্যসংকল্প এবং প্রজাদের প্রিয় ছিলেন; তবু ত্বকের রোগদোষে তাঁকে কলুষিত বলে গণ্য করা হল।
Verse 25
हीनाड़ पृथिवीपालं नाभिनन्दन्ति देवता: । इति कृत्वा नृपश्रेष्ठ प्रत्यषेधन् द्विजर्षभा:
‘যে রাজা কোনো অঙ্গে হীন, দেবতারা তাকে অভিনন্দন করেন না’—এই নীতি মেনে, হে নৃপশ্রেষ্ঠ, দ্বিজর্ষভেরা প্রতীপ রাজার জন্য দেবাপির অভিষেক করতে অস্বীকার করলেন।
Verse 26
ततः प्रव्यथिताड्रोडसौ पुत्रशोकसमन्वितः । निवारितं नृपं दृष्टवा देवापि: संश्रितो वनम्,“इससे राजाको बड़ा कष्ट हुआ। वे पुत्रके लिये शोकमग्न हो गये। राजाको रोका गया देखकर देवापि वनमें चले गये
তখন রাজা অন্তর পর্যন্ত ব্যথিত হয়ে পুত্রশোকে আচ্ছন্ন হলেন। রাজাকে নিবৃত্ত করা হয়েছে দেখে দেবাপি বনে গিয়ে আশ্রয় নিলেন।
Verse 27
बाह्लीको मातुलकुल त्यक्त्वा राज्यं समाश्रित: | पितृश्रातृन् परित्यज्य प्राप्तवान् परमर्द्धिमत्,“बाह्लीक परम समृद्धिशाली राज्य तथा पिता और भाइयोंको छोड़कर मामाके घर चले गये
বায়ু বললেন—“বাহ্লীক মাতুলকুল ত্যাগ করে এক রাজ্যে আশ্রয় নিল; এবং পিতা ও ভ্রাতাদের পরিত্যাগ করে সে পরম সমৃদ্ধি লাভ করল।”
Verse 28
बाह्लीकेन त्वनुज्ञात: शान्तनुलोकविश्रुत: । पितर्युपरते राजन् राजा राज्यमकारयत्,“राजन! तदनन्तर पिताकी मृत्यु होनेके पश्चात् बान्नीककी आज्ञा लेकर लोकविख्यात राजा शान्तनुने राज्यका शासन किया
হে রাজন! পিতার প্রয়াণের পরে, বাহ্লীকের অনুমতি নিয়ে লোকবিখ্যাত রাজা শান্তনু রাজসিংহাসনে অধিষ্ঠিত হয়ে রাজ্য শাসন করলেন।
Verse 29
तथैवाहं मतिमता परिचिन्त्येह पाण्डुना । ज्येष्ठ: प्रभश्रंशितो राज्याद्धीनाड़ इति भारत
হে ভারত! তেমনি আমিও অঙ্গহীন ছিলাম; তাই জ্যেষ্ঠ হয়েও, বুদ্ধিমান পাণ্ডু প্রজাদের সঙ্গে ভালোভাবে বিচার করে আমাকে রাজ্য থেকে বঞ্চিত করলেন।
Verse 30
पाए्डस्तु राज्यं सम्प्राप्तः कनीयानपि सन् नृपः । विनाशे तस्य पुत्राणामिदं राज्यमरिंदम
কনিষ্ঠ হয়েও পাণ্ডু রাজ্য লাভ করেছিলেন এবং নৃপতি হয়ে উত্তমভাবে রাজ্য শাসন করেছিলেন। হে অরিন্দম দুর্যোধন! পাণ্ডুর মৃত্যুর পরে এই রাজ্য তাঁর পুত্রদেরই।
Verse 31
मय्यभागिनि राज्याय कथं त्वं राज्यमिच्छसि । अराजपुत्रो हास्वामी परस्वं हर्तुमिच्छसि
বায়ু বললেন—“যখন আমি নিজেই রাজ্যের অংশীদার ছিলাম না, তখন তুমি কীভাবে রাজ্য চাইছ? যে রাজার পুত্র নয়, সে সেই রাজ্যের অধিকারী হতে পারে না। তুমি পরের সম্পদ হরণ করতে চাইছ।”
Verse 32
युधिष्टिरो राजपुत्रो महात्मा न्यायागतं राज्यमिदं च तस्य । स कौरवस्यास्य कुलस्य भर्ता प्रशासिता चैव महानुभाव:
বায়ু বললেন— মহাত্মা রাজপুত্র যুধিষ্ঠিরই ন্যায়ত এই রাজ্যের অধিকারী; এই রাজ্য তাঁরই। তিনি এই কুরুবংশের ধারক-রক্ষক, এবং শাসন-প্রশাসনের কর্তা—মহান্ প্রতাপ ও মর্যাদাসম্পন্ন।
Verse 33
स सत्यसंध: स तथाप्रमत्त: शास्त्रे स्थितो बन्धुजनस्य साधु: । प्रिय: प्रजानां सुह्ददानुकम्पी जितेन्द्रिय:ः साधुजनस्य भर्ता
বায়ু বললেন— তিনি সত্যপ্রতিজ্ঞ এবং অপ্রমত্ত। শাস্ত্রবিধিতে স্থিত থেকে আত্মীয়স্বজনের প্রতি সদ্ভাব রাখেন। প্রজারা তাঁকে অত্যন্ত প্রিয় মনে করে; তিনি সুহৃদদের প্রতি করুণাশীল, ইন্দ্রিয়জয়ী এবং সজ্জনদের পালনকর্তা।
Verse 34
क्षमा तितिक्षा दम आर्जवं च सत्यव्रतत्वं श्रुतमप्रमाद: । भूतानुकम्पा हानुशासनं च युधिष्टिरे राजगुणा: समस्ता:
বায়ুদেব বললেন— ক্ষমা, সহিষ্ণুতা, ইন্দ্রিয়সংযম, সরলতা, সত্যব্রত, শাস্ত্রশ্রবণ/জ্ঞান, অপ্রমত্ততা, সকল প্রাণীর প্রতি করুণা এবং গুরুজনের শাসনে থাকা—হে যুধিষ্ঠির, এই সমস্ত রাজোচিত গুণ তোমার মধ্যে একত্র বিদ্যমান।
Verse 35
अराजपुत्रस्त्वमनार्यवृत्तो लुब्ध: सदा बन्धुषु पापबुद्धि: । क्रमागतं राज्यमिदं परेषां हर्तु कथं शक्ष्यसि दुर्विनीत
বায়ু বললেন— তুমি রাজপুত্র নও; তোমার আচরণ অনার্যের মতো। তুমি লোভী, আর নিজেরই আত্মীয়দের প্রতি সর্বদা পাপবুদ্ধি পোষণ কর। হে দুর্বিনীত, এই বংশানুক্রমিক রাজ্য অন্যের—তুমি কীভাবে তা কেড়ে নিতে পারবে?
Verse 36
प्रयच्छ राज्यार्धमपेतमोह: सवाहनं त्वं सपरिच्छदं च । ततो5वशेषं तव जीवितस्य सहानुजस्यैव भवेन्नरेन्द्र
হে নরেন্দ্র, মোহ ত্যাগ করে বাহন ও সমুদয় সামগ্রীসহ অর্ধেক রাজ্য পাণ্ডবদের দাও। তবেই তোমার অনুজদের সঙ্গে তোমার জীবনের অবশিষ্ট অংশ রক্ষা পাবে।
Verse 149
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्यक थने एकोनपञ्चाशदधिकशततमो< ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে ধৃতরাষ্ট্রের বাক্যকথনবিষয়ক একশো ঊনপঞ্চাশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 226
सर्वे निवारयामासुर्देवापेरभिषेचनम् । उन्होंने देवापिके मंगलके लिये सभी आवश्यक कृत्य सम्पन्न कराये; परंतु उस समय सब ब्राह्मणों तथा वृद्ध पुरुषोंने नगर और जनपदके लोगोंके साथ आकर देवापिका राज्याभिषेक रोक दिया
তখন সকলেই একযোগে উঠে দেবাপির রাজ্যাভিষেক রোধ করল। দেবাপির মঙ্গলার্থে প্রয়োজনীয় সকল শুভকর্ম সম্পন্ন হয়েছিল; কিন্তু সেই সময় ব্রাহ্মণগণ ও বৃদ্ধ পুরুষেরা নগর ও জনপদের লোকদের সঙ্গে এসে রাজ্যাভিষেক থামিয়ে দিল।
The dilemma is whether continued conciliation is ethically responsible when it enables injustice, versus acknowledging coercive sanction (daṇḍa) as the remaining means to address a hardened refusal of settlement.
Policy should be graduated and accountable: attempt reconciliation first, shift to strategic realignment when persuasion fails, and recognize that coercive measures become operative only after non-violent instruments are exhausted.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as political-ethical reportage within the court narrative, emphasizing causality, responsibility, and the consequences of rejecting counsel.