Adhyaya 67
Sabha ParvaAdhyaya 6756 Verses

Adhyaya 67

पुनर्द्यूत-समाह्वानम् (Renewed Summons to the Dice-Game and Exile Wager)

Upa-parva: Dyūta (Akṣa) Anuvṛtti — Renewed Dice-Wager and Exile-Stipulation Episode

Vaiśaṃpāyana reports that Prātikāmī approaches Yudhiṣṭhira with Dhṛtarāṣṭra’s instruction: the assembly is prepared and the dice are set; the king summons him to play again. Yudhiṣṭhira articulates a deterministic register—beings meet auspicious and inauspicious outcomes by ordinance (dhātu-niyoga)—and claims inability to refuse an elder’s summons to dice, even knowing it is ruinous. He returns with his brothers, distressing allies and well-wishers. The text emphasizes compulsion by fate and social pressure, as the warriors sit again for play “for the destruction of all,” pressed by daiva. Śakuni proposes a single, comprehensive stake: whichever side loses will undertake twelve years of forest dwelling in skins, followed by a thirteenth year living incognito; discovery during the thirteenth triggers a renewed twelve-year forest term. Restoration of sovereignty is promised upon successful completion. Assembly members criticize the failure of kin to restrain Yudhiṣṭhira, but he proceeds from shame and commitment to dharma-as-summons. The chapter closes with acceptance of the wager and Śakuni’s immediate pronouncement of Yudhiṣṭhira’s defeat, establishing exile as the outcome.

Chapter Arc: द्यूत-सभा में विजय के मद से दुर्योधन प्रातिकामी को आदेश देता है—‘द्रौपदी को यहाँ लाओ; पाण्डवों से भय नहीं।’ यह आदेश ही सभा को धर्म-संकट के द्वार पर ला खड़ा करता है। → प्रातिकामी द्रौपदी के पास जाकर राजाज्ञा सुनाता है। द्रौपदी प्रतिप्रश्न करती है—पहले यह निश्चित हो कि युधिष्ठिर ने स्वयं को पहले हारा या मुझे; पराधीन होकर क्या वह पत्नी को दाँव पर लगा सकता है? दूत यह प्रश्न सभा में सुनाता है; सभासद अधोमुख हो जाते हैं, कोई स्पष्ट उत्तर नहीं देता। दुर्योधन के पक्ष की हठ और सभा की मौन-भीरुता तनाव को तीव्र करती है। → द्रौपदी के न आने पर दुःशासन बलपूर्वक उसके केश पकड़कर—जो राजसूय के अवभृथ-स्नान के मंत्रपूत जल से अभिषिक्त थे—उसे सभा में घसीट लाता है। रजस्वला, अस्त-व्यस्त वस्त्रों में अपमानित द्रौपदी को देखकर भीम का क्रोध उफन पड़ता है; भीष्म धर्म के ‘सूक्ष्म’ होने का हवाला देकर निर्णय देने में असमर्थता प्रकट करते हैं। → अध्याय का निष्कर्ष किसी न्याय-निर्णय में नहीं, बल्कि ‘अनिर्णय’ में है—द्रौपदी का प्रश्न सभा के सामने खड़ा रह जाता है, और धर्म के स्तम्भ माने जाने वाले भीष्म जैसे वृद्ध भी स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाते। अपमान की घटना घट चुकी है; प्रतिकार की आग भीतर-भीतर सुलगती है। → सभा का मौन और भीम का उग्र संकल्प भविष्य के भयानक प्रतिशोध की भूमिका रचते हैं—क्या द्रौपदी के प्रश्न का उत्तर मिलेगा, या अधर्म की यह विजय आगे और गहरी होगी?

Shlokas

Verse 1

अफ्-४-क+ सप्तषष्टितमो< ध्याय: प्रातिकामीके बुलानेसे न आनेपर दुःशासनका सभामें द्रोपदीको केश पकड़कर घसीटकर लाना एवं सभासदोंसे द्रौपदीका प्रश्न वैशम्पायन उवाच धिगस्तु क्षत्तारमिति ब्रुवाणो दर्पेण मत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्र: । अवैक्षत प्रातिकामी सभाया- मुवाच चैनं परमार्यमध्ये,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन गर्वसे उन्मत्त हो रहा था। उसने “विदुरको धिक्कार है” ऐसा कहकर प्रातिकामीकी ओर देखा और सभामें बैठे हुए श्रेष्ठ पुरुषोंक बीच उससे कहा

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! ধৃতরাষ্ট্রের পুত্র দुर্যোধন দম্ভে উন্মত্ত হয়ে উঠেছিল। “ক্ষত্তা (বিদুর) ধিক্!” বলে সে প্রাতিকামিনের দিকে তাকাল এবং সভায় শ্রেষ্ঠ পুরুষদের মধ্যেই তাকে সম্বোধন করল।

Verse 2

दुर्योधन उवाच प्रातिकामिन्‌ द्रौपदीमानयस्व न ते भयं विद्यते पाण्डवेभ्य: | क्षत्ता हायं विवदत्येव भीतो न चास्माकं॑ वृद्धिकाम: सदैव,दुर्योधन बोला--प्रातिकामिन्‌! तुम द्रौपदीको यहाँ ले आओ। तुम्हें पाण्डवोंसे कोई भय नहीं है। ये विदुर तो डरपोक हैं, अतः सदा ऐसी ही बातें कहा करते हैं। ये कभी हमलोगोंकी वृद्धि नहीं चाहते

দুর্যোধন বলল—প্রাতিকামিন! দ্রৌপদীকে এখানে নিয়ে এসো। পাণ্ডবদের থেকে তোমার কোনো ভয় নেই। এই ক্ষত্তা বিদুর ভয়ে তর্ক জুড়ে দেয়; সে কখনও আমাদের সমৃদ্ধি চায় না।

Verse 3

वैशग्पायन उवाच एवमुक्त: प्रातिकामी स सूत: प्रायाच्छीघ्रं राजवचो निशम्य । प्रविश्य च श्वेव हि सिंहगोएछ्ठं समासदन्महिषीं पाण्डवानाम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करके वह सूत प्रातिकामी शीघ्र चला गया एवं जैसे कुत्ता सिंहकी माँदमें घुसे, उसी प्रकार उस राजभवनमें प्रवेश करके वह पाण्डवोंकी महारानीके पास गया

বৈশম্পায়ন বললেন—এ কথা শুনে সূত প্রাতিকামী রাজার আদেশ মাথায় তুলে তৎক্ষণাৎ রওনা হল। আর যেমন কুকুর সিংহের গুহায় ঢুকে পড়ে, তেমনই রাজপ্রাসাদে প্রবেশ করে পাণ্ডবদের মহারানীর কাছে উপস্থিত হল।

Verse 4

प्रातिकाम्युवाच युधिष्ठिरो द्यूतमदेन मत्तो दुर्योधनो द्रौपदि त्वामजैषीत्‌ । सा त्वं प्रपद्यस्व धृतराष्ट्रस्य वेश्म नयामि त्वां कर्मणे याज्ञसेनि,प्रातिकामी बोला--ट्रपदकुमारी! धर्मराज युधिष्ठिर जूएके मदसे उन्मत्त हो गये थे। उन्होंने सर्वस्व हारकर आपको दाँवपर लगा दिया। तब दुर्योधनने आपको जीत लिया। याज्ञसेनी! अब आप धुृतराष्ट्रके महलमें पधारें। मैं आपको वहाँ दासीका काम करवानेके लिये ले चलता हूँ

প্রাতিকামী বলল—দ্রৌপদী! যুধিষ্ঠির পাশার উন্মাদনায় মত্ত হয়ে সর্বস্ব হারিয়ে তোমাকেও পণ রেখেছিল। তখন দুর্যোধন তোমাকে জয় করেছে। হে যাজ্ঞসেনী, এখন ধৃতরাষ্ট্রের প্রাসাদে আত্মসমর্পণ কর; আমি তোমাকে সেখানে দাসীকার্যে নিয়ে যাচ্ছি।

Verse 5

द्रौपहयुवाच कथं त्वेवं वदसि प्रातिकामिन्‌ को हि दीव्येद्‌ भार्यया राजपुत्र: । मूढो राजा द्यूतमदेन मत्तो हाभून्नान्यत्‌ कैतवमस्य किंचित्‌,द्रौोपदीने कहा--प्रातिकामिन! तू ऐसी बात कैसे कहता है? कौन राजकुमार अपनी पत्नीको दाँवपर रखकर जूआ खेलेगा? क्या राजा युधिष्ठिर जूएके नशेमें इतने पागल हो गये कि उनके पास जुआरियोंको देनेके लिये दूसरा कोई धन नहीं रह गया?

দ্রৌপদী বলল—প্রাতিকামিন! তুমি এমন কথা কীভাবে বলো? কোন রাজপুত্র নিজের স্ত্রীকে পণ রেখে পাশা খেলবে? রাজা যুধিষ্ঠির কি পাশার মদে এমনই মোহগ্রস্ত যে দেওয়ার মতো আর কিছুই অবশিষ্ট ছিল না? এ তো নিছক ছলনা।

Verse 6

प्रातिकाग्युवाच यदा नाभूत्‌ कैतवमन्यदस्य तदादेवीत्‌ पाण्डवोडजातशत्रु: । न्यस्ताः पूर्व भ्रातरस्तेन राज्ञा स्वयं चात्मा त्वमथो राजपुत्रि,प्रातिकामी बोला--राजकुमारी! जब जुआरियोंको देनेके लिये दूसरा कोई धन नहीं रह गया, तब अजातशत्रु पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर इस प्रकार जूआ खेलने लगे। पहले तो उन्होंने अपने भाइयोंको दाँवपर लगाया, उसके बाद अपनेको और अन्तमें आपको भी दाँवपर रख दिया

প্রাতিকামী বলল—রাজকুমারী! যখন আর কিছুই অবশিষ্ট ছিল না, তখন অজাতশত্রু পাণ্ডব যুধিষ্ঠির পণ ধরতে লাগলেন। প্রথমে তিনি ভাইদের, তারপর নিজেকে, আর শেষে তোমাকেও পণ রাখলেন।

Verse 7

द्रौपहुुवाच गच्छ त्वं कितवं गत्वा सभायां पृच्छ सूतज । कि नु पूर्व पराजैषीरात्मानमथवा नु माम्‌,द्रौोपदीने कहा--सूतपुत्र! तुम सभामें उन जुआरी महाराजके पास जाओ और जाकर यह पूछो कि “आप पहले अपनेको हारे थे या मुझे?”

দ্রৌপদী বললেন—“হে সূতপুত্র! সেই জুয়াড়ির কাছে যাও; সভায় গিয়ে তাকে জিজ্ঞাসা করো—‘তুমি আগে নিজেকে হারিয়েছিলে, না আমাকে?’”

Verse 8

एतज्ज्ञात्वा समागच्छ ततो मां नय सूतज । ज्ञात्वा चिकीर्षितमहं राज्ञो यास्यामि दुःखिता,सूतनन्दन! यह जानकर आओ। तब मुझे ले चलो। राजा क्‍या करना चाहते हैं? यह जानकर ही मैं दु:खिनी अबला उस सभामें चलूँगी

“এ কথা জেনে ফিরে এসো; তারপর আমাকে সেখানে নিয়ে চলো, হে সূতপুত্র। রাজা কী করতে চান তা জেনে তবেই আমি—দুঃখাকুল হয়ে—সেই সভায় যাব।”

Verse 9

वैशम्पायन उवाच सभां गत्वा स चोवाच द्रौपद्यास्तद्‌ वचस्तदा । युधिष्ठिरं नरेन्द्राणां मध्ये स्थितमिदं वच:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! प्रातिकामीने सभामें जाकर राजाओंके बीचमें बैठे हुए युधिष्ठिरसे द्रौधदीकी वह बात कह सुनायी। उसने कहा--'द्रौपदी आपसे पूछना चाहती है कि किस-किस वस्तुके स्वामी रहते हुए आप मुझे हारे हैं? आप पहले अपनेको हारे हैं या मुझे?”

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন সে সভায় গিয়ে রাজাদের মাঝে বসে থাকা যুধিষ্ঠিরকে দ্রৌপদীর সেই বার্তা জানাল।

Verse 10

कस्येशो न: पराजैषीरिति त्वामाह द्रौपदी । कि नु पूर्व पराजैषीरात्मानमथवापि माम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! प्रातिकामीने सभामें जाकर राजाओंके बीचमें बैठे हुए युधिष्ठिरसे द्रौधदीकी वह बात कह सुनायी। उसने कहा--'द्रौपदी आपसे पूछना चाहती है कि किस-किस वस्तुके स्वामी रहते हुए आप मुझे हारे हैं? आप पहले अपनेको हारे हैं या मुझे?”

“দ্রৌপদী আপনাকে বলছেন—‘কিসের অধিপতি থাকা অবস্থায় আপনি আমাকে হারালেন? বলুন, আপনি আগে নিজেকে হারিয়েছিলেন, না আমাকে?’”

Verse 11

युधिष्ठिरस्तु निश्चेता गतसत्त्व इवाभवत्‌ | नतं सूतं प्रत्युवाच वचन साध्वसाधु वा,राजन! उस समय युधिष्ठिर अचेत और निष्प्राण-से हो रहे थे, अतः उन्होंने प्रातिकामीको भला-बुरा कुछ भी उत्तर नहीं दिया

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন যুধিষ্ঠির যেন চেতনাহীন হয়ে পড়লেন, প্রাণশক্তি হারানো মানুষের মতো। মাথা নত করে দাঁড়ানো সূতকে তিনি কোনো উত্তর দিলেন না—না সদ্বাক্য, না কঠোর বাক্য।

Verse 12

दुर्योधन उवाच इहैवागत्य पाज्चाली प्रश्नमेनं प्रभाषताम्‌ | इहैव सर्वे शृण्वन्तु तस्याश्वैतस्थ यद्‌ वच:

দুর্যোধন বলল—“পাঞ্চালী এখানেই এসে এই প্রশ্নের উত্তর দিক। এই বিষয়েই সে যা বলবে, এখানে উপস্থিত সকলেই তা শুনুক।”

Verse 13

तब दुर्योधन बोला--सूतपुत्र! जाकर कह दो, द्रौपदी यहीं आकर अपने इस प्रश्नको पूछे। यहीं सब सभासद्‌ उसके प्रश्न और युधिष्ठिरके उत्तरको सुनें ।। वैशम्पायन उवाच स गत्वा राजभवन दुर्योधनवशानुग: । उवाच द्रौपदी सूत: प्रातिकामी व्यथान्वित:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! प्रातिकामी दुर्योधनके वशमें था, इसलिये वह राजभवनमें जाकर द्रौपदीसे व्यथित होकर बोला

বৈশম্পায়ন বললেন—দুর্যোধনের বশে পড়ে সূত প্রাতিকামী রাজভবনে গেল। সে ব্যথিতচিত্তে দ্রৌপদীকে বলল—সভায় এসে সেখানেই তোমার প্রশ্ন উত্থাপন করো, যাতে সকল সভাসদ তোমার প্রশ্ন ও যুধিষ্ঠিরের উত্তর—উভয়ই—শুনতে পারে।

Verse 14

प्रातिकाम्युवाच सभ्यास्त्वमी राजपुत्र्याह्दयन्ति मन्ये प्राप्त: संक्षय: कौरवाणाम्‌ । न वै समृद्धि पालयते लघीयान्‌ यस्त्वां सभां नेष्यति राजपुत्रि,प्रातिकामीने कहा--राजकुमारी! वे (दुर्योधन आदि) सभासद्‌ तुम्हें सभामें ही बुला रहे हैं। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है, अब कौरवोंके विनाशका समय आ गया है। जो (दुर्योधन) इतना गिर गया है कि तुम्हें सभामें बुलानेका साहस करता है, वह कभी अपने धन-वैभवकी रक्षा नहीं कर सकता

প্রাতিকামী বলল—“রাজকুমারী! সভাসদরা তোমাকে সভার মধ্যেই আনতে চাইছে। আমার মনে হয় কৌরবদের সর্বনাশের সময় এসে গেছে। যে এত অধঃপতিত যে তোমাকে সভায় টেনে আনতে সাহস করে, হে রাজকুমারী, সে কখনোই নিজের সমৃদ্ধি ও ঐশ্বর্য রক্ষা করতে পারবে না।”

Verse 15

द्रौपहुुवाच एवं नूनं व्यदधात्‌ संविधाता स्पर्शावुभौ स्पृशतो वृद्धबालौ । धर्म त्वेक॑ परम॑ प्राह लोके स न: शमं धास्यति गोप्यमान:,द्रौपदीने कहा--सूतपुत्र! निश्चय ही विधाताका ऐसा ही विधान है। बालक और वृद्ध सबको सुख-दु:ख प्राप्त होते हैं। जगतमें एकमात्र धर्मको ही श्रेष्ठ बतलाया जाता है। यदि हम उसका पालन करें तो वह हमारा कल्याण करेगा

দ্রৌপদী বলল—“সূতপুত্র! বিধাতা নিশ্চয়ই এমনই বিধান করেছেন—সুখ ও দুঃখ, উভয় স্পর্শই বৃদ্ধ ও বালক সকলকে স্পর্শ করে। কিন্তু এই জগতে ধর্মই পরম বলে ঘোষিত। আমরা যদি তাকে রক্ষা করে চলি, তবে সে-ই আমাদের শান্তি ও মঙ্গল দেবে।”

Verse 16

सो<यं धर्मो मात्यगात्‌ कौरवान्‌ वै सभ्यान्‌ गत्वा पृच्छ धर्म्य वचो मे । ते मां ब्रूयुर्निश्चितं तत्‌ करिष्ये धर्मात्मानो नीतिमन्तो वरिष्ठा:,मेरे इस धर्मका उल्लंघन न हो, इसलिये तुम सभामें बैठे हुए कुरुवंशियोंके पास जाकर मेरी यह धर्मानुकूल बात पूछो--“इस समय मुझे क्या करना चाहिये?” वे धर्मात्मा, नीतिज्ञ और श्रेष्ठ महापुरुष मुझे जैसी आज्ञा देंगे, मैं निश्चय ही वैसा करूँगी

“যাতে আমার ধর্মচ্যুতি না হয়, তুমি সভায় বসা কৌরবদের কাছে গিয়ে আমার এই ধর্মসম্মত প্রশ্নটি করো—‘এই মুহূর্তে আমার কী করা উচিত?’ ধর্মাত্মা, নীতিজ্ঞ ও শ্রেষ্ঠ পুরুষেরা যা স্থির করে আমাকে বলবেন, আমি নিশ্চয়ই তাই করব।”

Verse 17

श्रुत्वा सूतस्तद्वचो याज्ञसेन्या: सभां गत्वा प्राह वाक्‍्यं तदानीम्‌ | अधोमुखास्ते न च किंचिदूचु- निर्बिन्ध॑ त॑ धार्तराष्ट्रस्य बुद्ध्वा,द्रौपदीका यह कथन सुनकर सूत प्रातिकामीने पुनः सभामें जाकर द्रौपदीके प्रश्नको दुहराया; किंतु उस समय दुर्योधनके उस दुराग्रहको जानकर सभी नीचे मुँह किये बैठे रहे, कोई कुछ भी नहीं बोला

যাজ্ঞসেনী (দ্রৌপদী)-র কথা শুনে সূত প্রাতিকামী আবার সভায় গিয়ে তখনই তার প্রশ্নটি পুনরাবৃত্তি করল। কিন্তু ধার্তারাষ্ট্র (দুর্যোধন)-এর সেই একগুঁয়ে সংকল্প বুঝে সবাই মুখ নত করে বসে রইল; কেউ একটি কথাও বলল না।

Verse 18

वैशम्पायन उवाच युधिष्ठिरस्तु तच्छुत्वा दुर्योधनचिकीर्षितम्‌ । द्रौपद्या: सम्मतं दूतं प्राहिणोद्‌ भरतर्षभ,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दुर्योधन क्या करना चाहता है, यह सुनकर युधिष्ठिरने द्रौपदीके पास एक ऐसा दूत भेजा, जिसे वह पहचानती थी और उसीके द्वारा यह संदेश कहलाया, 'पांचालराजकुमारी! यद्यपि तुम रजस्वला और नीवीको नीचे रखकर एक ही वस्त्र धारण कर रही हो, तो भी उसी दशामें रोती हुई सभामें आकर अपने श्वशुरके सामने खड़ी हो जाओ

বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! দুর্যোধন কী করতে উদ্যত, তা শুনে যুধিষ্ঠির দ্রৌপদীর কাছে এমন এক দূত পাঠালেন, যে তার পরিচিত ও গ্রহণযোগ্য—যাতে তারই মাধ্যমে বার্তা পৌঁছায়।

Verse 19

एकवस्त्रा त्वधोनीवी रोदमाना रजस्वला । सभामागम्य पाज्चालि श्वशुरस्याग्रतो भव,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दुर्योधन क्या करना चाहता है, यह सुनकर युधिष्ठिरने द्रौपदीके पास एक ऐसा दूत भेजा, जिसे वह पहचानती थी और उसीके द्वारा यह संदेश कहलाया, 'पांचालराजकुमारी! यद्यपि तुम रजस्वला और नीवीको नीचे रखकर एक ही वस्त्र धारण कर रही हो, तो भी उसी दशामें रोती हुई सभामें आकर अपने श्वशुरके सामने खड़ी हो जाओ

“হে পাঞ্চালী! একবস্ত্রে, নীচের বস্ত্র ঢিলে করে, ঋতুমতী অবস্থায় কাঁদতে কাঁদতে সভায় এসো এবং তোমার শ্বশুরের সামনে দাঁড়াও।”

Verse 20

अथ त्वामागतां दृष्टवा राजपुत्रीं सभां तदा । सभ्या: सर्वे विनिन्देरन्‌ मनोभिर्धुतराष्ट्रजम्‌,“तुम-जैसी राजकुमारीको सभामें आयी देख सभी सभासद्‌ मन-ही-मन इस दुर्योधनकी निन्दा करेंगे”

তারপর সেই সময় তোমাকে—রাজকন্যাকে—সভায় আসতে দেখে, সভাসদেরা সবাই মনে মনে ধৃতরাষ্ট্রপুত্রকে নিন্দা করবে।

Verse 21

स गत्वा त्वरितं दूत: कृष्णाया भवन नृप । न्यवेदयन्मतं धीमान्‌ धर्मराजस्य निश्चितम्‌,राजन! वह बुद्धिमान्‌ दूत तुरंत द्रौपदीके भवनमें गया। वहाँ उसने धर्मराजका निश्चित मत उसे बता दिया

হে রাজন! সেই বুদ্ধিমান দূত দ্রুত কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)-র ভবনে গিয়ে ধর্মরাজের স্থির সিদ্ধান্ত তার কাছে নিবেদন করল।

Verse 22

पाण्डवाश्व महात्मानो दीना दुःखसमन्विता: । सत्येनातिपरीताड्डा नोदीक्षन्ते सम किंचन,इधर महात्मा पाण्डव सत्यके बन्धनसे बँधकर अत्यन्त दीन और दुःखमग्न हो गये। उन्हें कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था

বৈশম্পায়ন বললেন— সত্যের বন্ধনে দৃঢ়ভাবে আবদ্ধ মহাত্মা পাণ্ডবরা কঠোর বাধ্যবাধকতায় পীড়িত হয়ে সম্পূর্ণ হতাশ ও শোকাকুল হয়ে পড়লেন। সেই অবস্থায় তারা কোনো উপায় বা করণীয় কিছুই নির্ণয় করতে পারলেন না।

Verse 23

ततस्त्वेषां मुखमालोक्य राजा दुर्योधन: सूतमुवाच ह्ृष्ट: । इहैवैतामानय प्रातिकामिन्‌ प्रत्यक्षमस्या: कुरवो ब्रुवन्तु,उनके दीन मुँहकी ओर देखकर राजा दुर्योधन अत्यन्त प्रसन्न हो सूतसे बोला --'प्रातिकामिन्‌! तुम द्रौपदीको यहीं ले आओ। उसके सामने ही धर्मात्मा कौरव उसके प्रश्नोंका उत्तर देंगे”

তারপর তাদের বিষণ্ণ মুখ দেখে রাজা দুর্যোধন আনন্দিত হয়ে সূতকে বলল— “প্রাতিকামিন! দ্রৌপদীকে এখানেই নিয়ে এসো। তার সামনেই কুরুবৃদ্ধেরা তার প্রশ্নের উত্তর দিক।”

Verse 24

ततः: सूतस्तस्य वशानुगामी भीतश्च कोपाद्‌ द्रपदात्मजाया: । विहाय मान पुनरेव सभ्या- नुवाच कृष्णां किमहं ब्रवीमि

বৈশম্পায়ন বললেন— তখন প্রভুর আদেশে বাধ্য সেই সূত দ্রুপদকন্যার ক্রোধে ভীত হয়ে অহং ত্যাগ করে আবার সভাসদদের উদ্দেশে বলল, এবং কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)-কে বলল— “আমি কী বলব?”

Verse 25

तदनन्तर दुर्योधनके वशमें रहनेवाले प्रातिकामीने द्रौपदीके क्रोधसे डरते हुए अपने मान-सम्मानकी परवा न करके पुनः सभासदोंसे पूछा-- मैं द्रौपदीको क्या उत्तर दूँ?” ।। दुर्योधन उवाच दुःशासनैष मम सूतपुत्रो वृकोदरादुद्धिजतेडल्पचेता: । स्वयं प्रगृह्मानय याज्ञसेनीं कि ते करिष्यन्त्यवशा: सपत्ना:,दुर्योधन बोला--दुःशासन! यह मेरा सेवक सूतपुत्र प्रातिकामी बड़ा मूर्ख है। इसे भीमसेनका डर लगा हुआ है। तुम स्वयं द्रौपदीको यहाँ पकड़ लाओ। हमारे शत्रु पाण्डव इस समय हमलोगोंके वशगमें हैं। वे तुम्हारा क्या कर लेंगे

দুর্যোধন বলল— “দুঃশাসন! আমার এই সেবক সূতপুত্র প্রাতিকামিন অল্পবুদ্ধি; ভৃকোদর (ভীম)-কে সে ভয় পায়। তুমি নিজেই যাজ্ঞসেনীকে ধরে এখানে নিয়ে এসো। এখন যে পাণ্ডবরা অসহায় হয়ে আমাদের বশে, তারা তোমার কীই বা করতে পারবে?”

Verse 26

ततः समुत्थाय स राजपुत्र: श्र॒त्वा भ्रातु: शासन रक्तदृष्टि: । प्रविश्य तद्‌ वेश्म महारथाना- मित्यब्रवीद्‌ द्रौपदी राजपुत्रीम्‌,भाईका यह आदेश सुनकर राजकुमार दुःशासन उठ खड़ा हुआ और लाल आँख किये वहाँसे चल दिया। महारथी पाण्डवोंके महलमें प्रवेश करके उसने राजकुमारी द्रौपदीसे इस प्रकार कहा--

তখন ভ্রাতার আদেশ শুনে রাজপুত্র দুঃশাসন ক্রোধে রক্তচক্ষু হয়ে উঠে দাঁড়াল। সেখান থেকে গিয়ে মহারথী পাণ্ডবদের নিবাসে প্রবেশ করে সে রাজকুমারী দ্রৌপদীকে এইভাবে বলল—

Verse 27

एह्रोहि पाञज्चालि जितासि कृष्णे दुर्योधनं पश्य विमुक्तलज्जा | कुरून्‌ भजस्वायतपतन्रनेत्रे धर्मेण लब्धासि सभां परैहि,'पांचालि! आओ, आओ, तुम जूएमें जीती जा चुकी हो। कृष्णे! अब लज्जा छोड़कर दुर्योधनकी ओर देखो। कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली द्रौपदी! हमने धर्मके अनुसार तुम्हें प्राप्त किया है, अतः तुम कौरवोंकी सेवा करो। अभी राजसभामें चली चलो”

দুর্যোধন বলল—“এসো, এসো পাঞ্চালী! পাশাখেলায় তুমি জিত হয়ে গেছ, হে কৃষ্ণে। লজ্জা ত্যাগ করে দুর্যোধনের দিকে চাও। পদ্মপত্রসম বিস্তৃত নয়নবতী! ধর্মের নাম করে আমরা তোমাকে লাভ করেছি; অতএব কুরুবংশের সেবা করো। রাজসভায় এসো।”

Verse 28

ततः समुत्थाय सुदुर्मना: सा विवर्णमामृज्य मुखं करेण । आर्ता प्रदुद्राव यतः स्त्रियस्ता वृद्धस्य राज्ञ: कुरुपुड्रवस्थ,यह सुनकर द्रौपदीका हृदय अत्यन्त दु:खित होने लगा। उसने अपने मलिन मुखको हाथसे पोंछा। फिर उठकर वह आर्त अबला उसी ओर भागी, जहाँ बूढ़े महाराज धृतराष्ट्रकी स्त्रियाँ बैठी हुई थीं

তখন সে গভীর শোকে অভিভূত হয়ে উঠে দাঁড়াল। হাত দিয়ে নিজের বিবর্ণ মুখ মুছে, আর্ত নারীটি ছুটে গেল সেই দিকে, যেখানে কুরুপ্রবর বৃদ্ধ রাজা ধৃতরাষ্ট্রের পত্নীরা বসে ছিলেন।

Verse 29

ततो जवेनाभिससार रोषाद्‌ दुःशासनस्तामभिगर्जमान: । दीर्घेषु नीलेष्वथ चोर्मिमत्सु जग्राह केशेषु नरेन्द्रपत्नीम्‌

তখন ক্রোধে উন্মত্ত হয়ে দু্ঃশাসন গর্জন করতে করতে দ্রুত ছুটে এল। সে রাজপত্নীকে তার দীর্ঘ, কালো, ঢেউখেলানো কেশ ধরে টেনে ধরল।

Verse 30

तब दुःशासन भी रोषसे गर्जता हुआ बड़े वेगसे उसके पीछे दौड़ा। उसने महाराज युधिष्ठिरकी पत्नी द्रौपदीके लम्बे, नीले और लहराते हुए केशोंको पकड़ लिया ।। ये राजसूयावभूथे जलेन महाक्रतौ मन्त्रपूतेन सिक्ता: । ते पाण्डवानां परिभूय वीर्य बलात्‌ प्रमृष्टा धृतराष्ट्रजेन

তখন ক্রোধে গর্জন করতে করতে দু্ঃশাসন প্রবল বেগে তার পিছু নিল এবং যুধিষ্ঠির-পত্নী দ্রৌপদীর দীর্ঘ, কালো-নীল, ঢেউখেলানো কেশ ধরে ফেলল। রাজসূয় মহাযজ্ঞের অবভৃথ-স্নানে মন্ত্রপূত জলে যে কেশ সিঞ্চিত হয়েছিল, পাণ্ডবদের বীর্য অপমানিত হওয়ার পর ধৃতরাষ্ট্রপুত্রের বলপ্রয়োগে সেই কেশই কলুষিত হল।

Verse 31

जो केश राजसूय महायज्ञके अवभृथस्नानमें मन्त्रपूत जलसे सींचे गये थे, उन्हींको दुःशासनने पाण्डवोंके पराक्रमकी अवहेलना करके बलपूर्वक पकड़ लिया ।। स तां पराकृष्य सभासमीप- मानीय कृष्णामतिदीर्घकेशीम्‌ । दुःशासनो नाथवतीमना थव- च्चकर्ष वायु: कदलीमिवार्ताम्‌

দুঃশাসন অতিদীর্ঘকেশী কৃষ্ণা দ্রৌপদীকে টেনে-হিঁচড়ে সভার নিকটে নিয়ে এল। স্বামী থাকা সত্ত্বেও তাকে অনাথের মতো টানতে লাগল—যেমন বায়ু আঘাতপ্রাপ্ত কলাগাছকে উপড়ে টেনে নিয়ে যায়।

Verse 32

लंबे-लंबे केशोंवाली वह द्रौपदी यद्यपि सनाथा थी, तो भी दुःशासन उस बेचारी आर्त अबलाको अनाथकी भाँति घसीटता हुआ सभाके समीप ले आया और जैसे वायु केलेके वृक्षको झकझोरकर झुका देता है, उसी प्रकार वह द्रौपदीको बलपूर्वक खींचने लगा ।। सा कृष्यमाणा नमिताड़्यष्टि: शनैरुवाचाथ रजस्वलास्मि । एकं च वासो मम मन्दबुद्धे सभां नेतुं नाहसि मामनार्य,दुःशासनके खींचनेसे द्रौपदीका शरीर झुक गया। उसने धीरेसे कहा--'ओ मन्दबुद्धि दुष्टात्मा दुःशासन! मैं रजस्वला हूँ तथा मेरे शरीरपर एक ही वस्त्र है। इस दशामें मुझे सभामें ले जाना अनुचित है”

টেনে নিয়ে যাওয়া হচ্ছিল বলে দ্রৌপদীর কোমল দেহ নুয়ে পড়ল। তখন সে ধীরে বলল—“হে মন্দবুদ্ধি, অনার্য! আমি রজঃস্বলা, আর আমার গায়ে একটিমাত্র বসন। এই অবস্থায় আমাকে সভায় নিয়ে যাওয়া তোমার উচিত নয়।”

Verse 33

ततोअब्रवीत्‌ तां प्रसभं निगृहा केशेषु कृष्णेषु तदा स कृष्णाम्‌ | कृष्णं च जिष्णुं च हरिं नरं च त्राणाय विक्रोशति याज्ञसेनी,यह सुनकर दुःशासन उसके काले-काले केशोंको और जोरसे पकड़कर कुछ बकने लगा; इधर यज्ञसेनकुमारी कृष्णाने अपनी रक्षाके लिये सर्वपापहारी, सर्वविजयी, नरस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्णको पुकारने लगी

এ কথা শুনে দুঃশাসন তার কালো কেশ আরও জোরে মুঠো করে ধরে কঠোর ভাষায় বলল। সেই মুহূর্তে যাজ্ঞসেনী কৃষ্ণা রক্ষার জন্য আর্তনাদ করল—কৃষ্ণকে, জিষ্ণু (অর্জুন)কে, হরিকে এবং নরকে—ধর্মের আশ্রয় ডেকে।

Verse 34

दुशासन उवाच रजस्वला वा भव याज्ञसेनि एकाम्बरा वाप्यथवा विवस्त्रा । द्यूते जिता चासि कृतासि दासी दासीषु वासश्न॒ यथोपजोषम्‌,दुःशासन बोला--द्रौपदी! तू रजस्वला, एकवस्त्रा अथवा नंगी ही क्‍यों न हो, हमने तुझे जूएमें जीता है; अतः तू हमारी दासी हो चुकी है, इसलिये अब तुझे हमारी इच्छाके अनुसार दासियोंमें रहना पड़ेगा

দুঃশাসন বলল—“যাজ্ঞসেনী! তুমি রজঃস্বলা হও, একবস্ত্রা হও কিংবা বিবস্ত্রাই হও; তুমি পাশায় জিত হয়েছ এবং দাসী করা হয়েছ। অতএব দাসীদের মধ্যে আমার ইচ্ছামতোই তোমাকে থাকতে হবে।”

Verse 35

वैशम्पायन उवाच प्रकीर्णकेशी पतितार्धवस्त्रा दुःशासनेन व्यवधूयमाना । ह्लवीमत्यमर्षेण च दहमाना शनैरिदं वाक्यमुवाच कृष्णा,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! उस समय द्रौपदीके केश बिखर गये थे। दुःशासनके झकझोरनेसे उसका आधा वस्त्र भी खिसककर गिर गया था। वह लाजसे गड़ी जाती थी और भीतर-ही-भीतर क्रोधसे दग्ध हो रही थी। उसी दशामें वह धीरेसे इस प्रकार बोली

বৈশম্পায়ন বললেন—“হে জনমেজয়! তখন দ্রৌপদীর কেশ এলোমেলো হয়ে গিয়েছিল; দুঃশাসনের ঝাঁকুনিতে তার বসনের অর্ধেক সরে পড়েছিল। লজ্জায় সে অবনত, আর অন্তরে তীব্র ক্রোধে দগ্ধ হচ্ছিল। সেই অবস্থায় কৃষ্ণা ধীরে এই কথা বলল।”

Verse 36

द्रौपहुुवाच इमे सभायामुपनीतशास्त्रा: क्रियावन्त: सर्व एवेन्द्रकल्पा: । गुरुस्थाना गुरवश्वैव सर्वे तेषामग्रे नोत्सहे स्थातुमेवम्‌,द्रौपदीने कहा--अरे दुष्ट! ये सभामें शास्त्रोंके विद्वान, कर्मठ और इन्द्रके समान तेजस्वी मेरे पिताके समान सभी गुरुजन बैठे हुए हैं। मैं उनके सामने इस रूपमें खड़ी होना नहीं चाहती

দ্রৌপদী বলল—“এই সভায় শাস্ত্রজ্ঞ, কর্মনিষ্ঠ, ইন্দ্রসম তেজস্বী—পিতৃতুল্য—সব গুরুজন বসে আছেন। তাঁদের সামনে এই অবস্থায় দাঁড়াতে আমার সাহস হয় না।”

Verse 37

नृशंसकर्म स्त्वमनार्यवृत्त मा मा विवस्त्रां कुरु मा विकर्षी: । न मर्षयेयुस्तव राजपुत्रा: सेन्द्राक्ष देवा यदि ते सहाया:,क्रूरकर्मा दुराचारी दुःशासन! तू इस प्रकार मुझे न खींच, न खींच, मुझे वस्त्रहीन मत कर। इन्द्र आदि देवता भी तेरी सहायताके लिये आ जाय, तो भी मेरे पति राजकुमार पाण्डव तेरे इस अत्याचारको सहन नहीं कर सकेंगे

হে নিষ্ঠুরকর্মা, অনার্যাচারী দুঃশাসন! আমাকে টেনে নিও না, নিও না; আমাকে বিবস্ত্র করো না। ইন্দ্রসহ দেবতারা যদি তোমার সহায় হয়েও আসে, তবু আমার স্বামী—রাজপুত্র পাণ্ডবরা—তোমার এই অপমান সহ্য করতে পারবে না।

Verse 38

धर्मे स्थितो धर्मसुतो महात्मा धर्मश्न सूक्ष्मो निपुणोपलक्ष्य: । वाचापि भर्तु: परमाणुमात्र- मिच्छामि दोष॑ न गुणान्‌ विसृज्य,धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिर धर्ममें ही स्थित हैं। धर्मका स्वरूप बड़ा सूक्ष्म है। सूक्ष्म बुद्धिवाले धर्मपालनमें निपुण महापुरुष ही उसे समझ सकते हैं। मैं अपने पतिके गुणोंको छोड़कर वाणीद्वारा उनके परमाणुतुल्य छोटे-से-छोटे दोषको भी कहना नहीं चाहती

ধর্মপুত্র মহাত্মা যুধিষ্ঠির ধর্মেই প্রতিষ্ঠিত। ধর্মের স্বরূপ অতি সূক্ষ্ম; সূক্ষ্মবুদ্ধি ও ধর্মাচরণে নিপুণ মহাপুরুষরাই তাকে চিনতে পারেন। আমি আমার স্বামীর গুণ ত্যাগ করে বাক্যে তাঁর পরমাণুসম ক্ষুদ্রতম দোষও উচ্চারণ করতে চাই না।

Verse 39

इदं त्वकार्य कुरुवीरमध्ये रजस्वलां यत्‌ परिकर्षसे माम्‌ । न चापि वक्षित्‌ कुरुतेअत्र कुत्सां ध्रुवं तवेदं मतमभ्युपेता:,अरे! तू इन कौरववीरोंके बीचमें जो मुझ रजस्वला स्त्रीको खींचकर लिये जा रहा है, यह अत्यन्त पापपूर्ण कृत्य है। मैं देखती हूँ यहाँ कोई भी मनुष्य तेरे इस कुकर्मकी निन्दा नहीं कर रहा है। निश्चय ही ये सब लोग तेरे मतमें हो गये

আরে! কুরুবীরদের মাঝখানে আমাকে—ঋতুমতী নারীকে—টেনে নিয়ে যাওয়া চরম অধর্ম। আর আমি দেখছি, এখানে কেউই তোমার এই কুকর্মের নিন্দা করছে না। নিশ্চয়ই এরা সকলেই তোমার মতের সঙ্গে একমত হয়ে গেছে।

Verse 40

धिगस्तु नष्ट: खलु भारतानां धर्मस्तथा क्षत्रविदां च वृत्तम्‌ | यत्र हातीतां कुरुधर्मवेलां प्रेक्षन्ति सर्वे कुरव: सभायाम्‌,अहो! धिककार है! भरतवंशके नरेशोंका धर्म निश्चय ही नष्ट हो गया तथा क्षत्रियधर्मके जाननेवाले इन महापुरुषोंका सदाचार भी लुप्त हो गया; क्योंकि यहाँ कौरवोंकी धर्ममर्यादाका उल्लंघन हो रहा है, तो भी सभामें बैठे हुए सभी कुरुवंशी चुपचाप देख रहे हैं

ধিক্! ভারতবংশীয় নৃপতিদের ধর্ম নিশ্চয়ই নষ্ট হয়েছে, আর ক্ষত্রিয়ধর্ম-জ্ঞ মহাপুরুষদের সদাচারও লুপ্ত হয়েছে; কারণ এখানে কৌরবদের ধর্মসীমা লঙ্ঘিত হচ্ছে, তবু সভায় বসে সকল কুরু নীরবে দেখছে।

Verse 41

द्रोणस्य भीष्मस्य च नास्ति सत्त्व॑ क्षत्तुस्तथैवास्य महात्मनोडपि । राज्ञस्तथा हीममधर्ममुग्रं न लक्षयन्ते कुरुवृद्धमुख्या:,जान पढ़ता है द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, महात्मा विदुर तथा राजा धृतराष्ट्रमें अब कोई शक्ति नहीं रह गयी है; तभी तो ये कुरुवंशके, बड़े-बूढ़े महापुरुष राजा दुर्योधनके इस भयानक पापाचारकी ओर दृष्टिपात नहीं कर रहे हैं

মনে হয় দ্রোণাচার্য ও পিতামহ ভীষ্মের আর শক্তি নেই; সেই মহাত্মা ক্ষত্তৃ (বিদুর) এবং রাজা ধৃতরাষ্ট্রেরও তেমনই অবস্থা। তাই কুরুদের প্রধান বৃদ্ধগণ এই ভয়ংকর, শীতল-শিহরণ জাগানো উগ্র অধর্মের দিকে দৃষ্টি দিচ্ছেন না।

Verse 42

(इमं प्रश्नमिमे ब्रूत सर्व एव सभासद: । जितां वाप्यजितां वा मां मन्यध्वे सर्वभूमिपा: ।।) मेरे इस प्रश्चका सभी सभासद्‌ उत्तर दें। राजाओ! आपलोग क्या समझते हैं? धर्मके अनुसार मैं जीती गयी हूँ या नहीं? वैशम्पायन उवाच तथा ब्रुवन्ती करुणं सुमध्यमा भर्तन्‌ कटाक्ष: कुपितानपश्यत्‌ | सा पाण्डवान्‌ कोपपरीतदेहान्‌ संदीपयामास कटाक्षपातै:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! इस प्रकार करुण स्वरमें विलाप करती सुमध्यमा द्रौपदीने क्रोधमें भरे हुए अपने पतियोंकी ओर तिरछी दृष्टिसे देखा। पाण्डवोंके अंग-अंगमें क्रोधकी अग्नि व्याप्त हो गयी थी। द्रौपदीने अपने कटाक्षद्वारा देखकर उनकी क्रोधाग्निको और भी उद्दीप्त कर दिया

“এই সভার সকল সভাসদ আমার এই প্রশ্নের উত্তর দিন। হে পৃথিবীপাল রাজাগণ, ধর্ম অনুসারে তোমরা কী বিচার কর—আমি কি জিত হয়েছি, না কি জিত হইনি?” বৈশম্পায়ন বললেন—এভাবে করুণ কণ্ঠে বলতে বলতে সুমধ্যমা দ্রৌপদী স্বামীদের দিকে তির্যক দৃষ্টি নিক্ষেপ করল এবং তাদের ক্রোধে দগ্ধ হতে দেখল। পাণ্ডবদের দেহ ইতিমধ্যেই রোষে আচ্ছন্ন ছিল; তার তীক্ষ্ণ কাটাক্ষ সেই আগুনকে আরও উসকে দিল।

Verse 43

ह्ृतेन राज्येन तथा धनेन रत्नैश्व मुख्यर्न तथा बभूव । यथा त्रपाकोपसमीरितेन कृष्णाकटाक्षेण बभूव दुःखम्‌,राज्य, धन तथा मुख्य-मुख्य रत्नोंको हार जानेपर भी पाण्डवोंको उतना दु:ख नहीं हुआ था, जितना कि द्रौपदीके लज्जा एवं क्रोधयुक्त कटाक्षपातसे हुआ था

বৈশম্পায়ন বললেন—রাজ্য, ধন এবং শ্রেষ্ঠ রত্ন হারিয়েও পাণ্ডবদের যে দুঃখ হয়নি, দ্রৌপদীর সেই দৃষ্টি—লজ্জায় ভারী ও ক্রোধে উদ্দীপ্ত—তাদের ততটাই গভীর বেদনা দিল।

Verse 44

दुःशासनश्लापि समीक्ष्य कृष्णा- मवेक्षमाणां कृपणान्‌ पतींस्तान्‌ । आधूय वेगेन विसंज्ञकल्पा मुवाच दासीति हसन्‌ सशब्दम्‌,द्रौपदीको अपने दीन पतियोंकी ओर देखती देख दुःशासन उसे बड़े वेगसे झकझोरकर जोर-जोरसे हँसते हुए 'दासी” कहकर पुकारने लगा। उस समय द्रौपदी मूर्च्छित-सी हो रही थी

বৈশম্পায়ন বললেন—দ্রৌপদীকে তার দীন স্বামীদের দিকে তাকিয়ে থাকতে দেখে দুঃশাসন তাকে প্রবল বেগে ঝাঁকিয়ে দিল। সে যেন অচেতনপ্রায়; তখন সে উচ্চস্বরে হেসে চিৎকার করে বলল—“দাসী!”

Verse 45

कर्णस्तु तद्वाक्यमतीव हृष्ट: सम्पूजयामास हसन्‌ सशब्दम्‌ | गान्धारराज: सुबलस्य पुत्र- स्तथैव दुःशासनमभ्यनन्दत्‌,कर्णको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने खिलखिलाकर हँसते हुए दुःशासनके उस कथनकी बड़ी सराहना की। सुबलपुत्र गान्धारराज शकुनिने भी दुःशासनका अभिनन्दन किया

বৈশম্পায়ন বললেন—সে কথায় কর্ণ অত্যন্ত আনন্দিত হল; উচ্চস্বরে হেসে সে তার প্রশংসা করল। তদ্রূপ সুবলপুত্র গন্ধাররাজ শকুনিও দুঃশাসনকে সমর্থন জানাল।

Verse 46

सभ्यास्तु ये तत्र बभूवुरन्ये ताभ्यामृते धार्तराष्ट्रेण चैव । तेषामभूद्‌ दुःखमतीव कृष्णां दृष्टवा सभायां परिकृष्यमाणाम्‌,उस समय वहाँ जितने सभासद्‌ उपस्थित थे, उनमेंसे कर्ण, शकुनि और दुर्योधनको छोड़कर अन्य सब लोगोंको सभामें इस प्रकार घसीटी जाती हुई द्रौपदीकी दुर्दशा देखकर बड़ा दुःख हुआ

বৈশম্পায়ন বললেন—সেখানে উপস্থিত অন্য সকল সভাসদদের—ওই দু’জন ও ধৃতরাষ্ট্র ব্যতীত—সভামধ্যে টেনে-হিঁচড়ে নিয়ে যাওয়া কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)কে দেখে গভীর দুঃখ আচ্ছন্ন করল।

Verse 47

भीष्म उवाच न धर्मसौक्ष्म्यात्‌ सुभगे विवेक्तु शवनोमि ते प्रश्नमिम॑ यथावत्‌ । अस्वाम्यशक्त: पणितुं परस्वं स्त्रियाश्व भर्तुर्वशतां समीक्ष्य,उस समय भीष्मने कहा--सौभाग्यशालिनी बहू! धर्मका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण मैं तुम्हारे इस प्रश्नचका ठीक-ठीक विवेचन नहीं कर सकता। जो स्वामी नहीं है वह पराये धनको दाँवपर नहीं लगा सकता, परंतु स्त्रीको सदा अपने स्वामीके अधीन देखा जाता है, अतः: इन सब बातोंपर विचार करनेसे मुझसे कुछ कहते नहीं बनता

ভীষ্ম বললেন—সুভাগিনী, ধর্মের প্রকৃতি অত্যন্ত সূক্ষ্ম; তাই তোমার এই প্রশ্নের যথাযথ ও সম্পূর্ণ বিচার আমি করতে পারছি না। যে প্রকৃত স্বামী নয়, সে পরের সম্পত্তি পণ রাখতে অধিকারী নয়; কিন্তু প্রথামতে স্ত্রীকে স্বামীর অধীন বলেই ধরা হয়। এই পরস্পরবিরোধী নীতিগুলি বিবেচনা করে আমি কোনো নিশ্চিত সিদ্ধান্ত দিতে অক্ষম।

Verse 48

त्यजेत सर्वा पृथिवीं समृद्धां युधिष्ठटिरो धर्ममथो न जह्यात्‌ उक्त जितो5स्मीति च पाण्डवेन तस्मान्न शक्‍्नोमि विवेक्तुमेतत्‌,मेरा विश्वास है कि धर्मराज युधिष्ठिर धन-समृद्धिसे भरी हुई इस सारी पृथ्वीको त्याग सकते हैं, किंतु धर्मको नहीं छोड़ सकते। इन पाण्डुनन्दनने स्वयं कहा है कि मैं अपनेको हार गया; अतः मैं इस प्रश्नका विवेचन नहीं कर सकता

ভীষ্ম বললেন—ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির এই সমৃদ্ধ সমগ্র পৃথিবীও ত্যাগ করতে পারেন, কিন্তু ধর্ম ত্যাগ করবেন না। আর এই পাণ্ডুপুত্র নিজেই বলেছেন—“আমি জিতেছি/পরাজিত হয়েছি।” অতএব এ বিষয়ে আমি বিচার করতে পারছি না।

Verse 49

द्यूतेडद्धितीय: शकुनिनरिषु कुन्तीसुतस्तेन निसृष्टकाम: । न मन्यते तां निकृतिं युधिष्ठिर- स्तस्मान्न ते प्रश्नमिमं ब्रवीमि,यह शकुनि मनुष्योंमें द्यूतविद्याका अद्वितीय जानकार है। इसीने कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको प्रेरित करके उनके मनमें तुम्हें दाँवपर रखनेकी इच्छा उत्पन्न की है, परंतु युधिष्ठिर इसे शकुनिका छल नहीं मानते; इसीलिये मैं तुम्हारे इस प्रश्नका विवेचन नहीं कर पाता हूँ

ভীষ্ম বললেন—মানুষদের মধ্যে পাশাখেলায় শকুনি অতুলনীয়। সেই-ই কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠিরকে প্ররোচিত করে তোমাকে পণ রাখার বাসনা জাগিয়েছে। তবু যুধিষ্ঠির এটিকে শকুনির প্রতারণা বলে মানেন না; তাই তোমার প্রশ্নের যথাযথ ব্যাখ্যা আমি করতে পারছি না।

Verse 50

द्रौपहुवाच आहूय राजा कुशलैरनार्य॑- दुष्टात्मभिनैकृतिकेः सभायाम्‌ । द्यूतप्रियैनातिकृतप्रयत्न: कस्मादयं नाम निसृष्टकाम:,द्रौोपदीने कहा--जूआ खेलनेमें निपुण, अनार्य, दुष्टात्मा, कपटी तथा चद्यूतप्रेमी धूर्तोने राजा युधिष्ठिरको सभामें बुलाकर जूएका खेल आरम्भ कर दिया। इन्हें जूआ खेलनेका अधिक अभ्यास नहीं है। फिर इनके मनमें जूएकी इच्छा क्‍यों उत्पन्न की गयी?

দ্রৌপদী বললেন—সভায় জুয়ায় পারদর্শী, অনার্য, দুষ্টচিত্ত, প্রতারক ও জুয়া-প্রেমী ধূর্তেরা রাজা যুধিষ্ঠিরকে ডেকে পাশাখেলা শুরু করাল। তাঁর জুয়ায় দীর্ঘ অভ্যাস নেই; তবে কেন তাঁর অন্তরে এই খেলাবাসনা মুক্ত করে দেওয়া হল?

Verse 51

अशुद्धभावैरनिकृतिप्रवृत्तै- रबुध्यमान: कुरुपाण्डवाग्रय: । सम्भूय सर्वैश्व॒ जितो5पि यस्मात्‌ पश्चादयं कैतवमभ्युपेत:,जिनके हृदयकी भावना शुद्ध नहीं है, जो सदा छल और कपटमें लगे रहते हैं, उन समस्त दुरात्माओंने मिलकर इन भोले-भाले कुरु-पाण्डव-शिरोमणि महाराज युधिष्ठिरको पहले जूएमें जीत लिया है, तत्पश्चात्‌ ये मुझे दाँवपर लगानेके लिये विवश किये गये हैं

ভীষ্ম বললেন—অশুদ্ধ অভিপ্রায়ে, প্রতারণায় প্রবৃত্ত সেই সকল লোক একত্র হয়ে সরলচিত্ত কুরু-পাণ্ডবশ্রেষ্ঠ রাজা যুধিষ্ঠিরকে প্রথমে পাশাখেলায় জয় করল। তারপর পরে আবার এই প্রতারণাই গ্রহণ করা হল—যে তোমাকে পণ রাখা হল।

Verse 52

तिष्ठन्ति चेमे कुरव: सभाया- मीशा: सुतानां च तथा स्नुषाणाम्‌ | समीक्ष्य सर्वे मम चापि वाक्‍्यं विब्रूत मे प्रश्रमिमं यथावत्‌,ये कुरुवंशी महापुरुष जो सभामें बैठे हुए हैं, सभी पुत्रों और पुत्रवधुओंके स्वामी हैं (सभीके घरमें पुत्र और पुत्रवधुएँ हैं), अतः ये सब लोग मेरे कथनपर अच्छी तरह विचार करके इस प्रश्नका ठीक-ठीक विवेचन करें

ভীষ্ম বললেন—এই সভায় কুরুবংশীয় মহাপুরুষেরা উপস্থিত আছেন; তাঁরা তাঁদের পুত্রদের এবং পুত্রবধূদেরও অধিকারী। অতএব তোমরা সকলেই আমার বাক্য সুপরীক্ষা করে এই প্রশ্নটির যথাযথ ও ক্রমানুসারে বিচার করে আমাকে উত্তর দাও।

Verse 53

(न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा नते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम्‌ नासौ धर्मों यत्र न सत्यमस्ति न तत्‌ सत्यं यच्छलेनानुविद्धम्‌ ।।) वह सभा नहीं है जहाँ वृद्ध पुरुष न हों, वे वृद्ध नहीं हैं जो धर्मकी बात न बतावें, वह धर्म नहीं है जिसमें सत्य न हो और वह सत्य नहीं है जो छलसे युक्त हो। वैशम्पायन उवाच तथा ब्रुवन्तीं करुणं रुदन्ती- मवेक्षमाणां कृपणान्‌ पतींस्तान्‌ । दुःशासन: परुषाण्यप्रियाणि वाक्यान्युवाचामधुराणि चैव,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार द्रौपदी करुणस्वरमें बोलकर रोती हुई अपने दीन पतियोंकी ओर देखने लगी। उस समय दुःशासनने उसके प्रति कितने ही अप्रिय कठोर एवं कटुवचन कहे

“যে সভায় বৃদ্ধেরা নেই, তা সভা নয়; আর যারা ধর্মের কথা বলেন না, তারা প্রকৃত বৃদ্ধ নন। যেখানে সত্য নেই, তা ধর্ম নয়; আর যে সত্য ছলনায় কলুষিত, তা সত্য নয়।” বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! দ্রৌপদী এভাবে করুণ স্বরে বলতে বলতে কাঁদছিল এবং নিজের দীন স্বামীদের দিকে তাকিয়ে ছিল। তখন দুঃশাসন তার প্রতি বহু অপ্রিয়, কঠোর ও তিক্ত বাক্য উচ্চারণ করল।

Verse 54

तां कृष्यमाणां च रजस्वलां च स्रस्तोत्तरीयामतदर्हमाणाम्‌ । वृकोदर: प्रेक्ष्य युधिष्ठिरं च चकार कोपं परमार्तरूप:,कृष्णा रजस्वलावस्थामें घसीटी जा रही थी, उसके सिरका कपड़ा सरक गया था, वह इस तिरस्कारके योग्य कदापि नहीं थी। उसकी यह दुरवस्था देखकर भीमसेनको बड़ी पीड़ा हुई। वे युधिष्ठिरकी ओर देखकर अत्यन्त कुपित हो उठे

বৈশম্পায়ন বললেন—ঋতুমতী অবস্থায় টেনে নিয়ে যাওয়া, যার উত্তরীয় সরে গিয়েছিল, এবং যে এমন অপমানের একেবারেই অযোগ্য—সেই কৃষ্ণাকে দেখে বৃকোদর (ভীম) গভীর ব্যথায় আচ্ছন্ন হলেন। যুধিষ্ঠিরের দিকে তাকিয়ে তিনি অন্তরাহত হয়ে প্রচণ্ড ক্রোধে জ্বলে উঠলেন।

Verse 66

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत झ्टूतपर्वमें विदुरवाक्यविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত দ্যূতপর্বে বিদুরবাক্য-বিষয়ক ছেষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 67

इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि द्रौपदीप्रश्ने सप्तषष्टितमो5ध्याय:

ইতি শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের দ্যূতপর্বে দ্রৌপদী-প্রশ্নবিষয়ক সাতষট্টিতম অধ্যায়।

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira must choose between refusing a harmful, manipulated contest (preventing predictable ruin) and fulfilling what he treats as obligatory compliance with a royal/elder summons and public procedure.

The chapter illustrates how dharma can be distorted when reduced to mere form (summons, wager, etiquette) without prudential discernment, and how social pressures can masquerade as moral necessity.

No explicit phalaśruti appears here; the meta-commentary is implicit through narrator framing and the sabhā’s reaction, positioning the episode as a case study in institutional failure and constrained agency.