पुनर्द्यूत-समाह्वानम्
Renewed Summons to the Dice-Game and Exile Wager
द्रौपहयुवाच कथं त्वेवं वदसि प्रातिकामिन् को हि दीव्येद् भार्यया राजपुत्र: । मूढो राजा द्यूतमदेन मत्तो हाभून्नान्यत् कैतवमस्य किंचित्,द्रौोपदीने कहा--प्रातिकामिन! तू ऐसी बात कैसे कहता है? कौन राजकुमार अपनी पत्नीको दाँवपर रखकर जूआ खेलेगा? क्या राजा युधिष्ठिर जूएके नशेमें इतने पागल हो गये कि उनके पास जुआरियोंको देनेके लिये दूसरा कोई धन नहीं रह गया?
drauapady uvāca kathaṃ tv evaṃ vadasi prātikāmin ko hi dīvyed bhāryayā rājaputraḥ | mūḍho rājā dyūtamadena matto hābhūn nānyat kaitavam asya kiṃcit ||
দ্রৌপদী বলল—প্রাতিকামিন! তুমি এমন কথা কীভাবে বলো? কোন রাজপুত্র নিজের স্ত্রীকে পণ রেখে পাশা খেলবে? রাজা যুধিষ্ঠির কি পাশার মদে এমনই মোহগ্রস্ত যে দেওয়ার মতো আর কিছুই অবশিষ্ট ছিল না? এ তো নিছক ছলনা।
वैशग्पायन उवाच