पुनर्द्यूत-समाह्वानम्
Renewed Summons to the Dice-Game and Exile Wager
अफ्-४-क+ सप्तषष्टितमो< ध्याय: प्रातिकामीके बुलानेसे न आनेपर दुःशासनका सभामें द्रोपदीको केश पकड़कर घसीटकर लाना एवं सभासदोंसे द्रौपदीका प्रश्न वैशम्पायन उवाच धिगस्तु क्षत्तारमिति ब्रुवाणो दर्पेण मत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्र: । अवैक्षत प्रातिकामी सभाया- मुवाच चैनं परमार्यमध्ये,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन गर्वसे उन्मत्त हो रहा था। उसने “विदुरको धिक्कार है” ऐसा कहकर प्रातिकामीकी ओर देखा और सभामें बैठे हुए श्रेष्ठ पुरुषोंक बीच उससे कहा
Vaiśampāyana uvāca | dhig astu kṣattāram iti bruvāṇo darpeṇa matto dhṛtarāṣṭrasya putraḥ | avaikṣata prātikāmīṁ sabhāyām uvāca cainaṁ paramāryamadhye ||
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! ধৃতরাষ্ট্রের পুত্র দुर্যোধন দম্ভে উন্মত্ত হয়ে উঠেছিল। “ক্ষত্তা (বিদুর) ধিক্!” বলে সে প্রাতিকামিনের দিকে তাকাল এবং সভায় শ্রেষ্ঠ পুরুষদের মধ্যেই তাকে সম্বোধন করল।
वैशम्पायन उवाच