पुनर्द्यूत-समाह्वानम्
Renewed Summons to the Dice-Game and Exile Wager
ततोअब्रवीत् तां प्रसभं निगृहा केशेषु कृष्णेषु तदा स कृष्णाम् | कृष्णं च जिष्णुं च हरिं नरं च त्राणाय विक्रोशति याज्ञसेनी,यह सुनकर दुःशासन उसके काले-काले केशोंको और जोरसे पकड़कर कुछ बकने लगा; इधर यज्ञसेनकुमारी कृष्णाने अपनी रक्षाके लिये सर्वपापहारी, सर्वविजयी, नरस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको पुकारने लगी
tato ’bravīt tāṃ prasabhaṃ nigṛhya keśeṣu kṛṣṇeṣu tadā sa kṛṣṇām | kṛṣṇaṃ ca jiṣṇuṃ ca hariṃ naraṃ ca trāṇāya vikrośati yājñasenī ||
এ কথা শুনে দুঃশাসন তার কালো কেশ আরও জোরে মুঠো করে ধরে কঠোর ভাষায় বলল। সেই মুহূর্তে যাজ্ঞসেনী কৃষ্ণা রক্ষার জন্য আর্তনাদ করল—কৃষ্ণকে, জিষ্ণু (অর্জুন)কে, হরিকে এবং নরকে—ধর্মের আশ্রয় ডেকে।
दुर्योधन उवाच