Adhyaya 22
Sabha ParvaAdhyaya 2236 Verses

Adhyaya 22

Jarāsandha-nipātana, rāja-mokṣa, and rājasūya-sāhāyya-prārthanā (Jarāsandha’s fall, liberation of kings, and request for support)

Upa-parva: Jārāsandha-vadha (Episode within Sabhā-parva: Liberation of captive kings and rājasūya enablement)

Vaiśaṃpāyana narrates a rapid sequence following the resolve to remove Jarāsandha as an obstacle to imperial rite. Bhīmasena addresses Kṛṣṇa with focused intent to end Jarāsandha’s threat; Kṛṣṇa, urging action, calls upon Bhīma to demonstrate his strength. Bhīma then overpowers Jarāsandha in a forceful display—lifting, whirling, and crushing him—creating a terrifying public tumult in Magadha. With Jarāsandha neutralized, the party exits by night, and Kṛṣṇa organizes departure using Jarāsandha’s chariot. Captive kings are freed; they honor Kṛṣṇa with gifts and formal praise, framing the act as dharma-restoration. Kṛṣṇa then articulates the political-ritual objective: Yudhiṣṭhira intends to perform the rājasūya, and the released rulers are asked to provide assistance. They consent. Jarāsandha’s son Sahadeva (of Magadha) approaches with humility and offerings; Kṛṣṇa grants assurance and installs him, emphasizing orderly succession. Kṛṣṇa returns to Indraprastha, reports success, and is honored by Yudhiṣṭhira and the Pāṇḍavas. The chapter closes with the consolidation of political confidence and the strengthening of the Pāṇḍavas’ standing in preparation for lawful kingship.

Chapter Arc: मगध-सम्राट जरासंध अपने दरबार में ब्राह्मणों के वचनों से उकसता है—‘मैं निरपराध हूँ, फिर मुझे शत्रु क्यों मानते हो?’—और अपने क्षत्रिय-स्वाभिमान को धर्म की भाषा में ढालकर चुनौती की भूमिका बाँधता है। → ब्राह्मण-प्रेषित वाणी उसे रण-धर्म की ओर धकेलती है: जो क्षत्रिय निरपराध पर आक्रमण करता है, वह धर्म-पीड़ा भोगता है; पर जो रण के बाद स्वर्ग का द्वार जानता है, वह युद्ध से कैसे हटे? इसी बीच कृष्ण-भीम-अर्जुन की योजना-छाया स्पष्ट होती जाती है—जरासंध को उसके ही नियमों में बाँधकर निर्णायक संघर्ष तक लाना। → ललकार स्पष्ट हो उठती है—‘मगधराज! हम तुम्हें युद्ध के लिए आह्वान करते हैं; स्थिर होकर युद्ध करो, या सब राजाओं को छोड़ दो, नहीं तो यमलोक को जाओ।’ जरासंध युद्ध-उपस्थित देखकर अपने सेनापति (कौशिक/चित्रसेन) को स्मरण करता है; उधर शौरि कृष्ण ‘अवध्य’ कहे जाने वाले जरासंध के वध हेतु ब्राह्मी आज्ञा को अग्र रखकर संकल्प करते हैं। → अध्याय का अंत तैयारी और संकल्प पर टिकता है: जरासंध अपने बल और प्रतिष्ठा के साथ युद्ध-व्यवस्था में प्रवृत्त होता है, और कृष्ण पक्ष भीतर-भीतर उस ‘अवध्यता’ को भेदने की नीति को दृढ़ करता है—यह संघर्ष केवल बाहुबल नहीं, धर्म-प्रतिज्ञा और नियति का भी है। → अगला क्षण निर्णायक है—क्या जरासंध अपनी शर्तों पर युद्ध चुनेगा, और क्या कृष्ण की ‘ब्राह्मी आज्ञा’ उसे वध-योग्य बनाने का मार्ग खोल देगी?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ५७ श्लोक हैं) ऑपन-मराज बक। डे द्ाविशोद्ध्याय: जरासंध और श्रीकृष्णका संवाद तथा जरासंधकी युद्धके लिये तैयारी एवं जरासंधका श्रीकृष्णके साथ वैर होनेके कारणका वर्णन जरासंध उवाच न स्मरामि कदा वैरं कृतं युष्माभिरित्युत । चिन्तयंश्व न पश्यामि भवतां प्रति वैकृतम्‌,जरासंध बोला--ब्राह्मणो! मुझे याद नहीं आता कि कब मैंने आपलोगोंके साथ वैर किया है? बहुत सोचनेपर भी मुझे आपके प्रति अपने द्वारा किया हुआ अपराध नहीं दिखायी देता

জরাসন্ধ বলল—হে ব্রাহ্মণ! আমি স্মরণ করতে পারি না যে কখনও তোমাদের সঙ্গে বৈর করেছি। গভীরভাবে চিন্তা করেও তোমাদের প্রতি আমার কোনো অপরাধ দেখতে পাই না।

Verse 2

वैकृते वासति कं मन्यध्वं मामनागसम्‌ | अरें वै ब्रूत हे विप्रा: सतां समय एष हि,विप्रगण! जब मुझसे अपराध ही नहीं हुआ है, तब मुझ निरपराधको आपलोग शत्रु कैसे मान रहे हैं? यह बताइये। क्या यही साधु पुरुषोंका बर्ताव है?

এই বিকৃত ও সংকটময় অবস্থায় আমি অবস্থান করলেও, নির্দোষ আমাকে তোমরা কেন শত্রু মনে করছ? হে ব্রাহ্মণগণ, স্পষ্ট করে বলো—এটাই কি সজ্জনদের স্বীকৃত আচরণ ও ধর্মসম্মত প্রতিজ্ঞা?

Verse 3

अथ धर्मोपघाताद्धि मन: समुपतप्यते । यो5नागसि प्रसजति क्षत्रियो हि न संशय:,किसीके धर्म (और अर्थ)-में बाधा डालनेसे अवश्य ही मनको बड़ा संताप होता है। जो धर्मज्ञ महारथी क्षत्रिय लोकमें धर्मके विपरीत आचरण करता हुआ किसी निरपराध व्यक्तिपर दूसरोंके धन और धर्मके नाशका दोष लगाता है, वह कष्टमयी गतिको प्राप्त होता है और अपनेको कल्याणसे भी वंचित कर लेता है; इसमें संशय नहीं है

অন্যের ধর্মে বাধা দিলে মন অবশ্যই দগ্ধ হয়। যে ক্ষত্রিয় অধর্মের পথে গিয়ে নির্দোষের ওপর আক্রমণ করে বা তাকে দোষারোপ করে, সে নিজের জন্য দুঃখই ডেকে আনে—এতে সন্দেহ নেই।

Verse 4

अतोडन्यथा चरँल्‍लोके धर्मज्ञ: सन्‌ महारथ: | वृजिनां गतिमाप्रोति श्रेयसो<5प्युपहन्ति च,किसीके धर्म (और अर्थ)-में बाधा डालनेसे अवश्य ही मनको बड़ा संताप होता है। जो धर्मज्ञ महारथी क्षत्रिय लोकमें धर्मके विपरीत आचरण करता हुआ किसी निरपराध व्यक्तिपर दूसरोंके धन और धर्मके नाशका दोष लगाता है, वह कष्टमयी गतिको प्राप्त होता है और अपनेको कल्याणसे भी वंचित कर लेता है; इसमें संशय नहीं है

অতএব যে ব্যক্তি ধর্মজ্ঞ হয়েও, মহারথী হয়েও, জগতে ধর্মবিরুদ্ধ আচরণ করে—অন্যের ধর্ম ও অর্থে বাধা দেয় এবং নির্দোষের ওপর পরের ধন ও পুণ্যনাশের দোষ চাপায়—সে পাপময়, যন্ত্রণাময় গতি লাভ করে এবং নিজের কল্যাণও বিনষ্ট করে; এতে সন্দেহ নেই।

Verse 5

त्रैलोक्ये क्षत्रधर्मो हि श्रेयान्‌ वै साधुचारिणाम्‌ | नान्यं धर्म प्रशंसन्ति ये च धर्मविदो जना:,सत्कर्म करनेवाले क्षत्रियोंके लिये तीनों लोकोंमें क्षत्रियधर्म ही श्रेष्ठ है। धर्मज्ञ पुरुष क्षत्रियके लिये अन्य धर्मकी प्रशंसा नहीं करते

তিন লোকেই সদাচারী ক্ষত্রিয়দের জন্য ক্ষত্রধর্মই শ্রেষ্ঠ। যারা ধর্ম জানে, তারা ক্ষত্রিয়ের জন্য অন্য কোনো ধর্মকে শ্রেষ্ঠ বলে প্রশংসা করে না।

Verse 6

तस्य मेडद्य स्थितस्येह स्वधर्मे नियतात्मन: । अनागसं प्रजानां च प्रमादादिव जल्पथ,मैं अपने मनको वशमें रखकर सदा स्वधर्म (क्षत्रियधर्म)-में स्थित रहता हूँ। प्रजाओंका भी कोई अपराध नहीं करता, ऐसी दशामें भी आपलोग प्रमादसे ही मुझे शत्रु या अपराधी बता रहे हैं

আজ আমি এখানে নিজের স্বধর্মে স্থিত, সংযতচিত্ত। প্রজাদের প্রতিও আমি কোনো অপরাধ করিনি। তবু তোমরা যেন অসাবধানতাবশত আমাকে শত্রু বা অপরাধী বলে কথা বলছ।

Verse 7

श्रीकृष्ण उवाच कुलकार्य महाबाहो कश्चिदेक: कुलोद्वह: । वहते यस्तन्नियोगाद्‌ वयम भ्युद्यतास्त्वयि,श्रीकृष्णने कहा--महाबाहो! समूचे कुलमें कोई एक ही पुरुष कुलका भार सँभालता है। उस कुलके सभी लोगोंकी रक्षा आदिका कार्य सम्पन्न करता है। जो वैसे महापुरुष हैं, उन्हींकी आज्ञासे हमलोग आज तुम्हें दण्ड देनेको उद्यत हुए हैं

শ্রীকৃষ্ণ বললেন— মহাবাহো! সমগ্র বংশে কখনও একজনই কুলধারক থাকেন, যিনি কুলের কর্তব্যভার বহন করেন এবং সকলের রক্ষা ও কল্যাণ সাধন করেন। সেই মহাপুরুষের আদেশেই আজ আমরা তোমাকে দণ্ড দিতে উদ্যত হয়েছি।

Verse 8

त्वया चोपह्नता राजन क्षत्रिया लोकवासिन:ः । तदागः क्रूरमुत्पाद्य मन्यसे किमनागसम्‌,राजन! तुमने भूलोकनिवासी क्षत्रियोंको कैद कर लिया है। ऐसे क्रूर अपराधका आयोजन करके भी तुम अपनेको निरपराध कैसे मानते हो?

হে রাজন! তুমি এই পৃথিবীতে বসবাসকারী ক্ষত্রিয়দের দমন করে বন্দী করেছ। এমন নিষ্ঠুর অপরাধ ঘটিয়ে তুমি কীভাবে নিজেকে নির্দোষ মনে করো?

Verse 9

राजा राज्ञ: कथं साधून्‌ हिंस्यान्नृपतिसत्तम । तद्‌ राज्ञ: संनिगृह्ा त्वं रुद्रायोपजिहीरषसि,नृपश्रेष्ठी एक राजा दूसरे श्रेष्ठ राजाओंकी हत्या कैसे कर सकता है? तुम राजाओंको कैद करके उन्हें रुद्रदेवताकी भेंट चढ़ाना चाहते हो?

শ্রীকৃষ্ণ বললেন— হে নৃপশ্রেষ্ঠ! এক রাজা কীভাবে অন্য সাধু ও শ্রেষ্ঠ রাজাদের ক্ষতি করতে পারে? অথচ তুমি রাজাদের ধরে বন্দী করে রুদ্রের উদ্দেশ্যে বলি দিতে চাও।

Verse 10

अस्मांस्तदेनो गच्छेद्धि कृत॑ बार्हद्रथ त्वया । वयं हि शक्ता धर्मस्य रक्षणे धर्मचारिण:,बृहद्रथकुमार! तुम्हारे द्वारा किया हुआ यह पाप हम सब लोगोंपर लागू होगा; क्योंकि हम धर्मकी रक्षा करनेमें समर्थ और धर्मका पालन करनेवाले हैं

হে বার্হদ্রথ-পুত্র! তোমার এই কর্মের পাপ আমাদের উপরও এসে পড়বে; কারণ আমরা ধর্ম রক্ষায় সক্ষম এবং ধর্মাচারী। তাই অধর্ম ঘটতে দেখে আমরা নীরব থাকতে পারি না।

Verse 11

मनुष्याणां समालम्भो न च दृष्ट: कदाचन । स कथं मानुषै्देवं यट्टमिच्छसि शंकरम्‌,किसी देवताकी पूजाके लिये मनुष्योंका वध कभी नहीं देखा गया। फिर तुम कल्याणकारी देवता भगवान्‌ शिवकी पूजा मनुष्योंकी हिंसाद्वारा कैसे करना चाहते हो?

কোনো দেবতার পূজার জন্য মানুষের বধ কখনও দেখা যায়নি। তবে তুমি কীভাবে কল্যাণময় দেব শংকরকে মানবহিংসার দ্বারা পূজা করতে চাও?

Verse 12

सवर्णो हि सवर्णानां पशुसंज्ञां करिष्यसि । को<न्य एवं यथा हि त्वं जरासंध वृथामति:,जरासंध! तुम्हारी बुद्धि मारी गयी है, तुम भी उसी वर्णके हो, जिस वर्णके वे राजालोग हैं। क्या तुम अपने ही वर्णके लोगोंको पशुनाम देकर उनकी हत्या करोगे? तुम्हारे-जैसा क्रूर दूसरा कौन है?

জরাসন্ধ! তোমার বুদ্ধি নষ্ট হয়েছে। তুমি তো তাদেরই বর্ণের, যে বর্ণের তারা রাজারা। তবে কি নিজেরই বর্ণের লোকদের ‘পশু’ বলে নাম দিয়ে হত্যা করবে? তোমার মতো নিষ্ঠুর আর কে আছে?

Verse 13

यस्यां यस्यामवस्थायां यद्‌ यत्‌ कर्म करोति यः । तस्यां तस्यामवस्थायां तत्‌ फलं समवाप्नुयात्‌,जो जिस-जिस अवस्थामें जो-जो कर्म करता है, वह उसी-उसी अवस्थामें उसके फलको प्राप्त करता है

যে যে অবস্থায় যে যে কর্ম করে, সে সেই সেই অবস্থাতেই তার ফল লাভ করে।

Verse 14

ते त्वां ज्ञातिक्षयकरं वयमार्तानुसारिण: । ज्ञातिवद्धिनिमित्तार्थ विनिहन्तुमिहागता:,तुम अपने ही जाति-भाइयोंके हत्यारे हो और हमलोग संकटमें पड़े हुए दीन- दुःखियोंकी रक्षा करनेवाले हैं; अतः सजातीय बन्धुओंकी वृद्धिके उद्देश्यसे हम तुम्हारा वध करनेके लिये यहाँ आये हैं

তুমি নিজেরই জাতিভাইদের সংহারক; আর আমরা বিপন্ন দীন-দুঃখীদের পাশে দাঁড়াই। তাই স্বজাতীয় বংশধরদের কল্যাণ ও বৃদ্ধি সাধনের উদ্দেশ্যে আমরা এখানে তোমাকে বধ করতে এসেছি।

Verse 15

नास्ति लोके पुमानन्य: क्षत्रियेष्विति चैव तत्‌ मन्यसे स च ते राजन्‌ सुमहान्‌ बुद्धिविप्लव:,राजन! तुम जो यह मान बैठे हो कि इस जगतके क्षत्रियोंमें मेरे समान दूसरा कोई नहीं है, यह तुम्हारी बुद्धिका बहुत बड़ा भ्रम है

হে রাজন! তুমি যদি মনে করে বসে থাকো যে এই জগতের ক্ষত্রিয়দের মধ্যে আমার সমান আর কেউ নেই—তবে তা তোমার বুদ্ধির মহাভ্রান্তি।

Verse 16

को हि जानन्नभिजनमात्मवान्‌ क्षत्रियो नृप । नाविशेत्‌ स्वर्गमतुलं रणानन्तरमव्ययम्‌,नरेश्वरर कौन ऐसा स्वाभिमानी क्षत्रिय होगा जो अपने अभिजनको (जातीय बन्धुओंकी रक्षा परम धर्म है, इस बातको) जानते हुए भी युद्ध करके अनुपम एवं अक्षय स्वर्गलोकमें जाना नहीं चाहेगा?

হে নরেশ্বর! ‘অভিজনের রক্ষা পরম ধর্ম’—এ কথা জেনেও কোন আত্মাভিমানী ক্ষত্রিয় আছে, যে যুদ্ধ করে অতুল ও অক্ষয় স্বর্গলোকে প্রবেশ করতে চাইবে না?

Verse 17

स्वर्ग होव समास्थाय रणयज्ञेषु दीक्षिता: । जयन्ति क्षत्रिया लोकांस्तद्‌ विद्धि मनुजर्षभ,नरश्रेष्ठ! स्वर्गप्राप्तिका ही उद्देश्य रखकर रणयज्ञकी दीक्षा लेनेवाले क्षत्रिय अपने अभीष्ट लोकोंपर विजय पाते हैं, यह बात तुम्हें भलीभाँति जाननी चाहिये

স্বর্গকে লক্ষ্য করে যারা রণযজ্ঞে দীক্ষিত ক্ষত্রিয়, তারা নিজেদের অভীষ্ট লোকসমূহ জয় করে। এ কথা ভালো করে জেনে রাখো—হে মনুষ্যশ্রেষ্ঠ, হে নরশ্রেষ্ঠ।

Verse 18

स्वर्गयोनिर्महद्‌ ब्रह्म स्वर्गयोनिर्महद्‌ यश: । स्वर्गयोनिस्तपो युद्धे मृत्यु: सो5व्यभिचारवान्‌,वेदाध्ययन स्वर्गप्राप्तिका कारण है, परोपकाररूप महान्‌ यश भी स्वर्गका हेतु है, तपस्याको भी स्वर्गलोकका साधन बताया गया है; परंतु क्षत्रियके लिये इन तीनोंकी अपेक्षा युद्धमें मृत्युका वरण करना ही स्वर्गप्राप्तिका अमोघ साधन है

মহৎ ব্রহ্ম (বেদাধ্যয়ন) স্বর্গের উৎস; পরোপকারে অর্জিত মহৎ যশও স্বর্গের কারণ; তপস্যাও স্বর্গলোকে পৌঁছবার উপায় বলা হয়েছে। কিন্তু ক্ষত্রিয়ের পক্ষে—এই তিনটিরও ঊর্ধ্বে—ধর্ম থেকে বিচ্যুত না হয়ে যুদ্ধে মৃত্যুবরণ করাই স্বর্গপ্রাপ্তির অচ্যুত সাধন।

Verse 19

एष हौन्द्रो वैजयन्तो गुणैर्नित्यं समाहित: । येनासुरान्‌ पराजित्य जगत्‌ पाति शतक्रतु:,क्षत्रियका यह युद्धमें मरण इन्द्रका वैजयन्त नामक प्रासाद (राजमहल) है। यह सदा सभी गुणोंसे परिपूर्ण है। इसी युद्धके द्वारा शतक्रतु इन्द्र असुरोंको परास्त करके सम्पूर्ण जगतकी रक्षा करते हैं

এটাই ইন্দ্রের ‘বৈজয়ন্ত’—সদা গুণে সমাহিত ও শুভলক্ষণে সমৃদ্ধ। এরই দ্বারা শতক্রতু ইন্দ্র অসুরদের পরাজিত করে সমগ্র জগতের রক্ষা করেন।

Verse 20

स्वर्गमार्गाय कस्य स्याद्‌ विग्रहो वै यथा तव । मागधेरविंपुलै: सैन्यैर्बाहुल्यबलदर्पित:,हमारे साथ जो तुम्हारा युद्ध होनेवाला है, वह तुम्हारे लिये जैसा स्वर्गलोककी प्राप्तिका साधक हो सकता है, वैसा युद्ध और किसको सुलभ है? मेरे पास बहुत बड़ी सेना एवं शक्ति है, इस घमंडमें आकर मगधदेशकी अगणित सेनाओंद्वारा तुम दूसरोंका अपमान न करो। राजन! प्रत्येक मनुष्यमें बल एवं पराक्रम होता है। महाराज! किसीमें तुम्हारे समान तेज है तो किसीमें तुमसे अधिक भी है

আমাদের সঙ্গে যে যুদ্ধ তোমার আসন্ন, তা যেমন তোমার জন্য স্বর্গপথের সহজ সাধন হতে পারে, তেমন যুদ্ধ আর কার ভাগ্যে জোটে? কিন্তু মগধের বিপুল সেনা ও শক্তির প্রাচুর্যে গর্বিত হয়ে অন্যদের তুচ্ছ কোরো না, অপমান কোরো না। হে রাজন, প্রত্যেক মানুষেরই কিছু না কিছু বল ও বীর্য আছে; কারও তেজ তোমার সমান, আর কারও তেজ তোমার থেকেও অধিক।

Verse 21

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत जरासंधवधपर्वमें श्रीकृष्णजरासंधरसंवादविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,हमारे साथ जो तुम्हारा युद्ध होनेवाला है, वह तुम्हारे लिये जैसा स्वर्गलोककी प्राप्तिका साधक हो सकता है, वैसा युद्ध और किसको सुलभ है? मेरे पास बहुत बड़ी सेना एवं शक्ति है, इस घमंडमें आकर मगधदेशकी अगणित सेनाओंद्वारा तुम दूसरोंका अपमान न करो। राजन! प्रत्येक मनुष्यमें बल एवं पराक्रम होता है। महाराज! किसीमें तुम्हारे समान तेज है तो किसीमें तुमसे अधिक भी है

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত জরাসন্ধবধপর্বে শ্রীকৃষ্ণ-জরাসন্ধ সংলাপবিষয়ক একবিংশ অধ্যায় সমাপ্ত হল। “আমাদের সঙ্গে যে যুদ্ধ তোমার আসন্ন, তা যেমন তোমার জন্য স্বর্গপথের সহজ সাধন হতে পারে, তেমন যুদ্ধ আর কার ভাগ্যে জোটে? কিন্তু মগধের বিপুল সেনা ও বলের দম্ভে অন্যদের তুচ্ছ কোরো না, অপমান কোরো না। হে রাজন, প্রত্যেক মানুষেরই কিছু না কিছু বল ও বীর্য আছে; কারও তেজ তোমার সমান, আর কারও তেজ তোমার থেকেও অধিক।”

Verse 22

यावदेतदसम्बुद्धं तावदेव भवेत्‌ तव | विषह्ममेतदस्माकमतो राजन्‌ ब्रवीमि ते,भूपाल! जबतक तुम इस बातको नहीं जानते थे, तभीतक तुम्हारा घमंड बढ़ रहा था। अब तुम्हारा यह अभिमान हमलोगोंके लिये असह्य हो उठा है, इसलिये मैं तुम्हें यह सलाह देता हूँ (जनमेजय उवाच किमर्थ वैरिणावास्तामुभौ तौ कृष्णमागधौ । कथं च निर्जित: संख्ये जरासंधेन माधव: ।। जनमेजयने पूछा--मुने! भगवान्‌ श्रीकृष्ण और मगधराज जरासंध दोनों एक-दूसरेके शत्रु क्यों हो गये थे? तथा जरासंधने यदुकुलतिलक श्रीकृष्णको युद्धमें कैसे परास्त किया?। कश्न कंसो मागधस्य यस्य हेतो: स वैरवान्‌ । एतदाचक्ष्व मे सर्व वैशम्पायन तत्त्वतः ।। कंस मगधराज जरासंधका कौन था, जिसके लिये उसने भगवानसे वैर ठान लिया। वैशम्पायनजी! ये सब बातें मुझे यथार्थरूपसे बताइये। वैशम्पायन उवाच यादवानामन्ववाये वसुदेवो महामति: । उदपद्यत वार्ष्णेयो हाुग्रसेनस्य मन्त्र भूत्‌ ।। वैशम्पायनजीने कहा--राजन्‌! यदुकुलमें परम बुद्धिमान्‌ वसुदेव उत्पन्न हुए, जो वृष्णिवंशके राजकुमार तथा राजा उग्रसेनके विश्वसनीय मन्त्री थे। उग्रसेनस्य कंसस्तु बभूव बलवान्‌ सुतः । ज्येष्ठो बहूनां कौरव्य सर्वशस्त्रविशारद: ।। उमग्रसेनका पुत्र बलवान्‌ कंस हुआ, जो उनके अनेक पुत्रोंमें सबसे बड़ा था। कुरुनन्दन! कंसने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंकी विद्यामें निपुणता प्राप्त की थी। जरासंधस्य दुहिता तस्य भार्यातिविश्रुता । राज्यशुल्केन दत्ता सा जरासंधेन धीमता ।। जरासंधकी पुत्री उसकी सुप्रसिद्ध पत्नी थी, जिसे बुद्धिमान्‌ जरासंधने इस शर्तके साथ दिया था कि इसके पतिको तत्काल राजाके पदपर अभिषिक्त किया जाय। तदर्थमुग्रसेनस्य मथुरायां सुतस्तदा । अभिषिक्तस्तदामात्यै: स वै तीव्रपराक्रम: ।। इस शुल्ककी पूर्तिके लिये उग्रसेनके उस दुःसह पराक्रमी पुत्रको मन्त्रियोंने मथुराके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। ऐश्वर्यबलमत्तस्तु स तदा बलमोहित: । निगृहा पितरं भुद्धक्ते तद्‌ राज्यं मन्त्रिभि: सह ।। तब ऐश्वर्यके बलसे उनन्‍्मत्त और शारीरिक शक्तिसे मोहित हो कंस अपने पिताको कैद करके मन्त्रियोंके साथ उनका राज्य भोगने लगा। वसुदेवस्य तत्‌ कृत्यं न शूणोति स मन्दधी: । स तेन सह तदू राज्यं धर्मत: पर्यपालयत्‌ ।। मन्दबुद्धि कंस वसुदेवजीके कर्तव्य-विषयक उपदेशको नहीं सुनता था, तो भी उसके साथ रहकर वसुदेवजी मथुराके राज्यका धर्मपूर्वक पालन करने लगे। प्रीतिमान्‌ स तु दैत्येन्द्रो वसुदेवस्य देवकीम्‌ । उवाह भार्या स तदा दुहिता देवकस्य या ।। दैत्यराज कंसने अत्यन्त प्रसन्न होकर वसुदेवजीके साथ देवकीका ब्याह कर दिया, जो उग्रसेनके भाई देवककी पुत्री थी। तस्यामुद्वाह्ममानायां रथेन जनमेजय । उपारुरोह वार्ष्णेयं कंसो भूमिपतिस्तदा ।। जनमेजय! जब रथपर बैठकर देवकी विदा होने लगी, तब राजा कंस भी उसे पहुँचानेके लिये वृष्णिवंश-विभूषण वसुदेवजीके पास उस रथपर जा बैठा। ततोडन्‍्तरिक्षे वागासीद्‌ देवदूतस्य कस्यचित्‌ । वसुदेवश्च शुश्राव तां वाचं पार्थिवश्च स: ।। इसी समय आकाशमें किसी देवदूतकी वाणी स्पष्ट सुनायी देने लगी। वसुदेवजीने तो उसे सुना ही, राजा कंसने भी सुना। यामेतां वहमानो<द्य कंसोद्वहसि देवकीम्‌ । अस्या यश्चाष्टमो गर्भ: स ते मृत्युर्भविष्यति ।। देवदूत कह रहा था--“कंस! आज तू जिस देवकीको रथपर बिठाकर लिये जा रहा है, उसका आठवाँ गर्भ तेरी मृत्युका कारण होगा”। सो<वतीर्य ततो राजा खड्गमुद्धृत्य निर्मलम्‌ । इयेष तस्या मूर्धानं छेत्तुं परमदुर्मति: ।। यह आकाशवाणी सुनते ही अत्यन्त खोटी बुद्धिवाले राजा कंसने म्यानसे चमचमाती हुई तलवार खींच ली और देवकीका सिर काट लेनेका विचार किया। स सान्त्वयंस्तदा कंसं हसन्‌ क्रोधवशानुगम्‌ । राजन्ननुनयामास वसुदेवो महामति: ।। राजन्‌! उस समय परम बुद्धिमान वसुदेवजी हँसते हुए क्रोधके वशीभूत हुए कंसको सान्त्वना दे उसकी अनुनय-विनय करने लगे। अहिंस्यां प्रमदामाहु: सर्वधर्मेषु पार्थिव । अकस्मादबलां नारीं हन्तासीमामनागसीम्‌ ।। 'पृथ्वीपते! प्रायः सभी धर्मोमें नारीको अवध्य बताया गया है। क्या तुम इस निर्बल एवं निरपराध नारीको सहसा मार डालोगे?' यच्च ते5त्र भयं राजन्‌ शक्‍्यते बाधितुं त्वया । इयं च शक्‍्या पालयितुं समयश्वैव रक्षितुम्‌ ।। “राजन! इससे जो तुम्हें भय प्राप्त होनेवाला है, उसका तो तुम निवारण कर सकते हो। तुम्हें इसकी रक्षा करनी चाहिये और मुझे इसकी प्राणरक्षाके लिये जो शर्त निश्चित हो, उसका पालन करना चाहिये। अस्यास्त्वमष्टमं गर्भ जातमात्र महीपते । विध्वंसय तदा प्राप्तमेवं परिद्वतं भवेत्‌ ।। “राजन! इसके आठवें गर्भको तुम पैदा होते ही नष्ट कर देना। इस प्रकार तुमपर आयी हुई विपत्ति टल सकती है'। एवं स राजा कथितो वसुदेवेन भारत । तस्य तद्‌ वचन चक्रे शूरसेनाधिपस्तदा ।। ततस्तस्यां सम्बभूवु: कुमारा: सूर्यवर्चस: । जाताज्जातांस्तु तान्‌ सर्वाञ्जघान मधुरेश्वर: ।। भरतनन्दन! वसुदेवजीके ऐसा कहनेपर शूरसेन-देशके राजा कंसने उनकी बात मान ली। तदनन्तर देवकीके गर्भसे सूर्यके समान तेजस्वी अनेक कुमार क्रमशः उत्पन्न हुए। मथुरानरेश कंसने जन्म लेते ही उन सबको मार डालता था। अथ तस्यां समभवद्‌ बलदेवस्तु सप्तम: । याम्यया मायया तं तु यमो राजा विशाम्पते ।। देवक्या गर्भमतुलं रोहिण्या जठरेउक्षिपत्‌ | आकृष्य कर्षणात्‌ सम्यक्‌ संकर्षण इति स्मृत: ।। बलश्रेष्ठतया तस्य बलदेव इति स्मृतः । तदनन्तर देवकीके उदरमें सातवें गर्भके रूपमें बलदेवका आगमन हुआ। राजन! यमराजने यमसम्बन्धिनी मायाके द्वारा उस अनुपम गर्भको देवकीके उदरसे निकालकर रोहिणीकी कुक्षिमें स्थापित कर दिया। आकर्षण होनेके कारण उस बालकका नाम संकर्षण हुआ। बलमें प्रधान होनेसे उसका नाम बलदेव हुआ। पुनस्तस्यां समभवदष्टमो मधुसूदन: । तस्य गर्भस्य रक्षां तु चक्रे सो5भ्यधिकं नृपः ।। तत्पश्चात्‌ देवकीके उदरमें आठवें गर्भके रूपमें साक्षात्‌ भगवान्‌ मधुसूदनका आविर्भाव हुआ। राजा कंसने बड़े यत्नसे उस गर्भकी रक्षा की। ततः काले रक्षणार्थ वसुदेवस्य सात्वत: ।। उग्र: प्रयुक्त: कंसेन सचिव: क्रूरकर्मकृत्‌ । विमूक्रेषु प्रभावेन बालस्योत्तीर्य तत्र वै ।। उपागम्य स घोषे तु जगाम स महाद्युति: । जातमात्र वासुदेवमथाकृष्य पिता ततः ।। उपजद्ठे परिक्रीतां सुतां गोपस्य कस्यचित्‌ | तदनन्तर प्रसवकाल आनेपर सात्वतवंशी वसुदेवपर कड़ी नजर रखनेके लिये कंसने उग्र स्वभाववाले अपने क्रूरकर्मा मन्त्रीको नियुक्त किया। परंतु बालस्वरूप श्रीकृष्णके प्रभावसे रक्षकोंके निद्रासे मोहित हो जानेपर वहाँसे उठकर महातेजस्वी वसुदेवजी बालकके साथ व्रजमें चले गये। नवजात वासुदेवको मथुरासे हटाकर पिता वसुदेवने उसके बदलेमें किसी गोपकी पुत्रीको लाकर कंसको भेंट कर दिया। मुमुक्षमाणस्तं शब्द देवदूतस्य पार्थिव: ।। जघान कंसस्तां कन्यां प्रहसन्ती जगाम सा । आर्येति वाशती शब्दं तस्मादार्येति कीर्तिता ।। देवदूतके कहे हुए पूर्वोक्त शब्दका स्मरण करके उसके भयसे छूटनेकी इच्छा रखनेवाले कंसने उस कन्याको भी पृथ्वीपर दे मारा। परंतु वह कन्या उसके हाथसे छूटकर हँसती और आर्य शब्दका उच्चारण करती हुई वहाँसे चली गयी। इसीलिये उसका नाम “'आर्या' हुआ। एवं त॑ वज्चयित्वा च राजानं स महामति: । वासुदेवं महात्मानं वर्धधामास गोकुले ।। परम बुद्धिमान्‌ वसुदेवने इस प्रकार राजा कंसको चकमा देकर गोकुलमें अपने महात्मा पुत्र वासुदेवका पालन कराया। वासुदेवो5पि गोपेषु ववृधे5ब्जमिवाम्भसि । अज्ञायमान: कंसेन गूढो5ग्निरिव दारुषु ।। वासुदेव भी पानीमें कमलकी भाँति गोपोंमें रहकर बड़े हुए। काठमें छिपी हुई अग्निकी भाँति वे अज्ञातभावसे वहाँ रहने लगे। कंसको उनका पता न चला। विप्रचक्रेथ तान्‌ सर्वान्‌ वल्‍्लवान्‌ मधुरेश्वर: । वर्धमानो महाबाहुस्तेजोबलसमन्वित: ।। मथुरानरेश कंस उन सब गोपोंको बहुत सताया करता था। इधर महाबाहु श्रीकृष्ण बड़े होकर तेज और बलसे सम्पन्न हो गये। ततस्ते क्लिश्यमानास्तु पुण्डरीकाक्षमच्युतम्‌ भयेन कामादपरे गणश: पर्यवारयन्‌ ।। राजाके सताये हुए गोपगण भय तथा कामनासे झुंड-के-झुंड एकत्र हो कमलनयन भगवान्‌ श्रीकृष्णको घेरकर संगठित होने लगे। सतु लब्ध्वा बल॑ राजन्नुग्रसेनस्य सम्मत: । वसुदेवात्मज: सर्वैर्श्नातृभि: सहित॑ं पुनः ।। निर्जित्य युधि भोजेन्द्रं हत्वा कंसं महाबल: । अभ्यषिज्चत्‌ ततो राज्य उग्रसेनं विशाम्पते ।। राजन्‌! इस प्रकार बलका संग्रह करके महाबली वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने उग्रसेनकी सम्मतिके अनुसार समस्त भाइयोंसहित भोजराज कंसको मारकर पुनः उम्रसेनको ही मथुराके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। ततः श्रुत्वा जरासंधो माधवेन हत॑ युधि । शूरसेनाधिपं चक्रे कंसपुत्रं तदा नृपः ।। राजन! जरासंधने जब यह सुना कि श्रीकृष्णने कंसको युद्धमें मार डाला है, तब उसने कंसके पुत्रको शूरसेनदेशका राजा बनाया। स सैन्यं महतुत्थाप्य वासुदेवं प्रसह च । अभ्यषिज्चत्‌ सुतं तत्र सुताया जनमेजय ।। जनमेजय! उसने बड़ी भारी सेना लेकर आक्रमण किया और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको हराकर अपनी पुत्रीके पुत्रको वहाँ राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। उग्रसेनं च वृष्णीश्ष महाबलसमन्वित: । स तत्र विप्रकुरुते जरासंध: प्रतापवान्‌ ।। एतद्‌ू वैरं कौरवेय जरासंधस्य माधवे । जनमेजय! प्रतापी जरासंध महान्‌ बल और सैनिकशक्तिसे सम्पन्न था। वह उग्रसेन तथा वृष्णिवंशको सदा क्लेश पहुँचाया करता था। कुरुनन्दन! जरासंध और श्रीकृष्णके वैरका यही वृत्तान्त है। आशासितार्थ राजेन्द्र संरुरोध विनिर्जितान्‌ । पार्थिवैस्तैर्न॒पतिभिय्यक्ष्यमाण: समृद्धिमान्‌ ।। देवश्रेष्ठ महादेवं कृत्तिवासं त्रियम्बकम्‌ । एतत्‌ सर्व यथा वृत्तं कथितं भरतर्षभ ।। यथा तु स हतो राजा भीमसेनेन तच्छूणु ।) राजेन्द्र! समृद्धिशाली जरासंध कृत्तिवासा और त््यम्बक नामोंसे प्रसिद्ध देवश्रेष्ठ महादेवजीको भूमण्डलके राजाओंकी बलि देकर उनका यजन करना चाहता था और इसी मनोवांछित प्रयोजनकी सिद्धिके लिये उसने अपने जीते हुए समस्त राजाओंको कैदमें डाल रखा था। भरतश्रेष्ठ! यह सब वृत्तान्त तुम्हें यथावत्‌ बताया गया। अब जिस प्रकार भीमसेनने राजा जरासंधका वध किया, वह प्रसंग सुनो। इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि जरासंधयुद्धोद्योगे द्वाविंशो5ध्याय:

যতক্ষণ তুমি এ বিষয়টি বুঝতে পারোনি, ততক্ষণ তোমার গর্বই বাড়তে থেকেছে। এখন সেই অহংকার আমাদের পক্ষে অসহ্য হয়ে উঠেছে; অতএব, হে রাজন—হে ভূ-পাল—আমি তোমাকে ন্যায়সম্মত উপদেশ দিচ্ছি।

Verse 23

मावमंस्था: परान्‌ राजन्नस्ति वीर्य नरे नरे । सम॑ तेजस्त्वया चैव विशिष्ट वा नरेश्वर,जहि त्वं सदृशेष्वेव मान॑ दर्प च मागध । मा गम: ससुतामात्य: सबलश्न यमक्षयम्‌ मगधराज! तुम अपने समान वीरोंके साथ अभिमान और घमंड करना छोड़ दो। इस घमंडको रखकर अपने पुत्र, मन्त्री और सेनाके साथ यमलोकमें जानेकी तैयारी न करो

হে রাজন, অন্যদের তুচ্ছ কোরো না; প্রত্যেক মানুষের মধ্যেই বীর্য আছে। তোমার তেজও তেমনই—কিংবা আরও বিশিষ্ট, হে নরেশ্বর। অতএব, হে মাগধ, তোমার সমকক্ষদের প্রতি মান ও দম্ভ ত্যাগ করো। এমন অহংকার আঁকড়ে ধরে পুত্র, মন্ত্রী ও সৈন্যসহ যমলোকের পথে যেও না।

Verse 24

दम्भोद्धव: कार्तवीर्य उत्तरश्न बृहद्रथ: । श्रेयसो हवमन्येह विनेशु: सबला नृूपा:,दम्भोद्धव, कार्तवीर्य अर्जुन, उत्तर तथा बृहद्रथ--ये सभी नरेश अपनेसे बड़ोंका अपमान करके अपनी सेनासहित नष्ट हो गये

দম্ভোদ্ধব, কার্তবীর্য (অর্জুন), উত্তর ও বৃহদ্রথ—এরা সকলেই নিজেদের চেয়ে শ্রেষ্ঠদের অবমাননা করে সৈন্যসহ বিনষ্ট হয়েছে।

Verse 25

युयुक्षमाणास्त्वत्तो हि न वयं ब्राह्माणा ध्रुवम्‌ । शौरिरस्मि हृषीकेशो नृवीरी पाण्डवाविमौ । अनयोर्मातुलेयं च कृष्णं मां विद्धि ते रिपुम्‌,तुमसे युद्धकी इच्छा रखनेवाले हमलोग अवश्य ही ब्राह्मण नहीं हैं। मैं वसुदेवपुत्र हृषीकेश हूँ और ये दोनों पाण्डुपुत्र वीरवर भीमसेन और अर्जुन हैं। मैं इन दोनोंके मामाका पुत्र और तुम्हारा प्रसिद्ध शत्रु श्रीकृष्ण हूँ। मुझे अच्छी तरह पहचान लो

তোমার সঙ্গে যুদ্ধের অভিপ্রায় নিয়ে আমরা এসেছি; অতএব আমরা নিশ্চয়ই ব্রাহ্মণ নই। আমি শৌরি হৃষীকেশ; আর এরা দু’জন পাণ্ডব-বীর। এদের মাতুলপুত্র এবং তোমার প্রসিদ্ধ শত্রু—আমি কৃষ্ণ; আমাকে ভালো করে চিনে নাও।

Verse 26

त्वामाह्नयामहे राजन्‌ स्थिरो युध्यस्व मागध । मुज्च वा नृपतीन्‌ सर्वान्‌ गच्छ वा त्वं यमक्षयम्‌,मगधनरेश! हम तुम्हें युद्धके लिये ललकारते हैं। तुम डटकर युद्ध करो। तुम या तो समस्त राजाओंको छोड़ दो अथवा यमलोककी राह लो

হে মাগধরাজ, আমরা তোমাকে যুদ্ধে আহ্বান করছি। স্থির হয়ে যুদ্ধ করো। হয় এই সকল রাজাকে মুক্ত করো, নয়তো যমলোকের পথে যাও।

Verse 27

जरासंध उवाच नाजितान्‌ वै नरपतीनहमाददि कांश्वन । अजित: पर्यवस्थाता को<त्र यो न मया जित:,जरासंधने कहा--श्रीकृष्ण! मैं युद्धमें जीते बिना किन्हीं राजाओंको कैद करके यहाँ नहीं लाता हूँ। यहाँ कौन ऐसा शत्रु राजा है, जो दूसरोंसे अजेय होनेपर भी मेरेद्वारा जीत न लिया गया हो?

জরাসন্ধ বলল—শ্রীকৃষ্ণ! যুদ্ধে জয় না করে আমি কোনো রাজাকে বন্দি করে এখানে আনি না। এখানে এমন কোন শত্রু রাজা আছে, যে অন্যদের কাছে অজেয় হয়েও আমার দ্বারা জিত হয়নি?

Verse 28

क्षत्रियस्यैतदेवाहुर्धम्य कृष्णोपजीवनम्‌ । विक्रम्प वशमानीय कामतो यत्‌ समाचरेत्‌,श्रीकृष्ण! क्षत्रियके लिये तो यह धर्मानुकूल जीविका बतायी गयी है कि वह पराक्रम करके शत्रुको अपने वशमें लाकर फिर उसके साथ मनमाना बर्ताव करे

জরাসন্ধ বলল—শ্রীকৃষ্ণ! ক্ষত্রিয়ের জন্য একেই ধর্মসম্মত জীবিকা বলা হয়েছে—বীরত্ব প্রদর্শন করে শত্রুকে বশে এনে, তারপর ইচ্ছামতো তার সঙ্গে আচরণ করা।

Verse 29

देवतार्थमुपाहृत्य राज्ञ: कृष्ण कथं भयात्‌ । अहमगद्य विमुच्येयं क्षात्रं व्रतमनुस्मरन्‌,श्रीकृष्ण! मैं क्षत्रियके व्रतकों सदा याद रखता हुआ देवताको बलि देनेके लिये उपहारके रूपमें लाये हुए इन राजाओंको आज तुम्हारे भयसे कैसे छोड़ सकता हूँ?

জরাসন্ধ বলল—শ্রীকৃষ্ণ! দেবতাদের উদ্দেশ্যে বলি-উপহাররূপে আনা এই রাজাদের, ক্ষত্রিয়-ব্রত স্মরণ করে, আজ তোমার ভয়ে আমি কীভাবে মুক্ত করে দিই?

Verse 30

सैन्यं सैन्येन व्यूढेन एक एकेन वा पुनः । द्वाभ्यां त्रिभिरवा योत्स्येडहं युगपत्‌ पृथगेव वा,तुम्हारी सेना मेरी व्यूहरचनायुक्त सेनाके साथ लड़ ले अथवा तुममेंसे कोई एक मुझ अकेलेके साथ युद्ध करे अथवा मैं अकेला ही तुममेंसे दो या तीनोंके साथ बारी-बारीसे या एक ही साथ युद्ध कर सकता हूँ

তোমাদের সেনা আমার ব্যূহবদ্ধ সেনার সঙ্গে যুদ্ধ করুক; অথবা তোমাদের মধ্যে যে কেউ একা আমার সঙ্গে লড়ুক। আমি একাই তোমাদের দু’জন বা তিনজনের সঙ্গেও—পালাক্রমে কিংবা একসঙ্গে—যুদ্ধ করতে প্রস্তুত।

Verse 31

वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा जरासंध: सहदेवाभिषेचनम्‌ । आज्ञापयत्‌ तदा राजा युयुत्सुर्भीमकर्मभि:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर भयानक कर्म करनेवाले उन तीनों वीरोंके साथ युद्धकी इच्छा रखकर राजा जरासंधने अपने पुत्र सहदेवके राज्याभिषेककी आज्ञा दे दी

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এ কথা বলে, সেই ভয়ংকর কর্মে প্রবৃত্ত রাজা জরাসন্ধ তিন বীরের সঙ্গে যুদ্ধ করতে উদ্যত হয়ে তখনই নিজের পুত্র সহদেবের রাজ্যাভিষেকের আদেশ দিল।

Verse 32

स तु सेनापतिं राजा सस्मार भरतर्षभ | कौशिक चित्रसेनं च तस्मिन्‌ युद्ध उपस्थिते,भरतश्रेष्ठ] तदनन्तर मगधनरेशने वह युद्ध उपस्थित होनेपर अपने सेनापति कौशिक और चित्रसेनका स्मरण किया (जो उस समय जीवित नहीं थे)

যুদ্ধ উপস্থিত হতেই, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, রাজা তাঁর সেনাপতি এবং কৌশিক ও চিত্রসেনকেও স্মরণ করলেন।

Verse 33

ययोस्ते नामनी राजन्‌ हंसेति डिम्भकेति च । पूर्व संकथितं पुम्भिनलोके लोकसत्कृते,राजन! ये वे ही थे, जिनके नाम पहले तुमसे हंस और डिम्भक बताये हैं। मनुष्यलोकके सभी पुरुष उनके प्रति बड़े आदरका भाव रखते थे

হে রাজন, যাঁদের নাম ‘হংস’ ও ‘ডিম্ভক’—তাঁদের কথা তোমাকে আগেই বলা হয়েছে; মনুষ্যলোকে সকলেই তাঁদের বিশেষ সম্মান করত।

Verse 34

तं॑ तु राजन विभु: शौरी राजानं बलिनां वरम्‌ | स्मृत्वा पुरुषशार्दूल: शार्टूल्समविक्रमम्‌,जनमेजय! मनस्वी पुरुषोंमें सर्वश्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी, वसुदेवपुत्र एवं बलरामके छोटे भाई भगवान्‌ मधुसूदनने दिव्य दृष्टिसे स्मरण करके यह जान लिया था कि सिंहके समान पराक्रमी, बलवानोंमें श्रेष्ठ और भयानक पुरुषार्थ प्रकट करनेवाला यह राजा जरासंध युद्धमें दूसरे वीरका भाग (वध्य) नियत किया गया है। यदुवंशियोंमेंसे किसीके हाथसे उसकी मृत्यु नहीं हो सकती, अतः ब्रह्माजीके आदेशकी रक्षा करनेके लिये उन्होंने स्वयं उसे मारनेकी इच्छा नहीं की

হে জনমেজয়! সর্বশক্তিমান শৌরি (শ্রীকৃষ্ণ), পুরুষদের মধ্যে ব্যাঘ্রসদৃশ, বলবানদের শ্রেষ্ঠ ও ব্যাঘ্রতুল্য পরাক্রমশালী সেই রাজার কথা স্মরণ করলেন।

Verse 35

सत्यसंधो जरासंधं भुवि भीमपराक्रमम्‌ । भागमन्यस्य निर्दिष्टमवध्यं मधुभिम्मुधे,जनमेजय! मनस्वी पुरुषोंमें सर्वश्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी, वसुदेवपुत्र एवं बलरामके छोटे भाई भगवान्‌ मधुसूदनने दिव्य दृष्टिसे स्मरण करके यह जान लिया था कि सिंहके समान पराक्रमी, बलवानोंमें श्रेष्ठ और भयानक पुरुषार्थ प्रकट करनेवाला यह राजा जरासंध युद्धमें दूसरे वीरका भाग (वध्य) नियत किया गया है। यदुवंशियोंमेंसे किसीके हाथसे उसकी मृत्यु नहीं हो सकती, अतः ब्रह्माजीके आदेशकी रक्षा करनेके लिये उन्होंने स्वयं उसे मारनेकी इच्छा नहीं की

হে জনমেজয়! সত্যসঙ্কল্প মধুসূদন দিব্যদৃষ্টিতে জানলেন যে পৃথিবীতে ভীমসদৃশ পরাক্রমী জরাসন্ধ অন্য এক বীরের ‘ভাগ’—অর্থাৎ বধ্য—রূপে নির্দিষ্ট; অতএব তিনি মধুসূদনের দ্বারা অবধ্য।

Verse 36

नात्मना55त्मवतां मुख्य इयेष मधुसूदन: । ब्राह्मीमाज्ञां पुरस्कृत्य हन्तुं हलधरानुज:,जनमेजय! मनस्वी पुरुषोंमें सर्वश्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी, वसुदेवपुत्र एवं बलरामके छोटे भाई भगवान्‌ मधुसूदनने दिव्य दृष्टिसे स्मरण करके यह जान लिया था कि सिंहके समान पराक्रमी, बलवानोंमें श्रेष्ठ और भयानक पुरुषार्थ प्रकट करनेवाला यह राजा जरासंध युद्धमें दूसरे वीरका भाग (वध्य) नियत किया गया है। यदुवंशियोंमेंसे किसीके हाथसे उसकी मृत्यु नहीं हो सकती, अतः ब्रह्माजीके आदेशकी रक्षा करनेके लिये उन्होंने स्वयं उसे मारनेकी इच्छा नहीं की

হে জনমেজয়! আত্মসংযমীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, হলধর (বলরাম)-এর অনুজ মধুসূদন ব্রহ্মার আজ্ঞাকে অগ্রে রেখে তাঁকে নিজের হাতে বধ করতে ইচ্ছা করলেন না।

Frequently Asked Questions

How to remove a coercive power obstructing lawful sovereignty while still preserving social order afterward—resolved by pairing decisive action with liberation, public reassurance, and legitimate succession.

Effective leadership integrates capability (śakti) with responsibility (dharma): the narrative emphasizes not only victory but also protection of detainees, restoration of governance, and alliance-building for a sanctioned ritual aim.

No formal phalaśruti is stated; the meta-significance is implied through narrative validation—public praise, consent of liberated kings, and the stabilization of Magadha—marking the act as dharma-restorative within the epic’s political theology.