
Adhyāya 57: Tapas–Dāna Phala (On the Fruits of Austerity and Giving)
Upa-parva: Dāna–Tapas Upadeśa (Merit of Austerity and Gifts)
Yudhiṣṭhira voices intense remorse and cognitive disorientation after hearing reflections on the war’s consequences, describing the earth as depleted of prosperous rulers and lamenting the deaths of innumerable men. He worries about the condition of noble women now deprived of husbands, sons, and male kin, and anticipates negative posthumous consequences for having participated in the killing of gurus, relatives, and allies. Seeking expiation, he asks for precise instruction on rigorous tapas. Vaiśaṃpāyana reports Bhīṣma’s measured reply: Bhīṣma frames a ‘secret and wondrous’ teaching on attainments in the afterlife, then enumerates a graded economy of merit. Tapas yields heaven, fame, longevity, enjoyments, knowledge, health, beauty, prosperity, and good fortune; other disciplines (silence, brahmacarya, ahiṃsā, teacher-service, regular śrāddha) produce specific results. The chapter then systematizes dāna: water, food, comfort, light, and items of daily life generate durable reputation and capacities; major gifts—especially cows with ritual embellishments, land, and a brahmadeya maiden—are portrayed as rescuing the donor from dark destinies, likened to a boat in an ocean. The unit closes with Yudhiṣṭhira’s approval and his communication of Bhīṣma’s counsel to the Pāṇḍavas and Draupadī, who assent.
Chapter Arc: महर्षि च्यवन के प्रभाव से राजा कुशिक और उनकी रानी को एक अलौकिक, आश्चर्यमय लोक-प्रासादों का दर्शन होता है—मानो गन्धर्वनगर पृथ्वी पर उतर आया हो। → कुशिक स्वर्णमय प्रासाद, मणिस्तम्भों की सहस्र-श्रेणियाँ, रूप्य-शिखर पर्वत, नलिनियाँ, शीत-उष्ण जल, विचित्र आसन-शयन और मधुर पक्षी-ध्वनियाँ देखता जाता है; विस्मय बढ़ता है और मन में प्रश्न उठता है—यह सब किसकी माया/तपः-शक्ति है और इसका प्रयोजन क्या है? → ‘यह महान आश्चर्य क्या है?’ सोचते हुए राजा को मणिमय खम्भों से युक्त सुवर्ण-विमान के भीतर दिव्य पर्यङ्क पर शयन करते भृगुनन्दन च्यवन का साक्षात् दर्शन होता है; वहीं से उपदेश का शिखर आता है—राजा ने इन्द्रियों और मन को जीतकर तप-आराधना सिद्ध की है, इसलिए मुनि अत्यन्त प्रसन्न हैं। → च्यवन राजा की निष्कलुषता और आराधना की प्रशंसा करते हैं—उसमें सूक्ष्मतम भी दोष नहीं—और वर/अनुग्रह देने की तत्परता प्रकट करते हैं; राजा-रानी का विस्मय श्रद्धा में रूपान्तरित होता है। → मुनि कहते हैं—‘मैं तुम पर प्रसन्न हूँ; वर ग्रहण करो’—पर अध्याय का अंत वर के चयन/फल-निर्णय की प्रतीक्षा में छोड़ देता है।
Verse 1
ऑपनआक्रात बछ। सं: चतु:पञ्चाशत्तमो5 ध्याय: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना भीष्म उवाच ततः स राजा रात्र्यन्ते प्रतिबुद्धो महामना: । कृतपूर्वालह्निकः प्रायात् सभार्यस्तद् वन॑ प्रति
ভীষ্ম বললেন—তারপর রাত্রির শেষে সেই মহামনা রাজা জাগ্রত হলেন। পূর্বাহ্নের নিত্যকর্ম সম্পন্ন করে তিনি রাণীসহ সেই বনাশ্রমের দিকে যাত্রা করলেন।
Verse 2
ततो ददर्श नृपति: प्रासादं सर्वकाउ्चनम् । मणिस्तम्भसहस्राढ्यं गन्धर्वनगरोपमम्
সেখানে পৌঁছে নৃপতি এক প্রাসাদ দেখলেন, যা সম্পূর্ণ স্বর্ণময়। মণিখচিত সহস্র স্তম্ভে সমৃদ্ধ সেই প্রাসাদ শোভায় গন্ধর্বনগরের ন্যায় প্রতীয়মান হল।
Verse 3
तत्र दिव्यानभिप्रायान् ददर्श कुशिकस्तदा । पर्वतान् रूप्यसानूंश्व नलिनीश्व सपड़कजा:
সেখানে তখন কুশিক দেখলেন দিব্য ভাবসম্পন্ন বিস্ময়কর দৃশ্য—রূপালি ঢাল-ওয়ালা পর্বত, আর পদ্ম-নীলকমলে ভরা সরোবর; যেন সেই স্থান শুভ ও উচ্চতর লক্ষ্যের দিকে মনকে টেনে নেয়।
Verse 4
चित्रशालाक्ष विविधास्तोरणानि च भारत । शाद्वलोपचितां भूमिं तथा काञ्चनकुट्टिमाम्
ভীষ্ম বললেন—হে ভারত, সেখানে নানাবিধ সুসজ্জিত চিত্রশালা ও তোরণ ছিল; ভূমি কোথাও সবুজ তৃণে আচ্ছাদিত, কোথাও স্বর্ণমণ্ডিত পাকা মেঝেতে পাতা।
Verse 5
भारत! उस समय राजा कुशिकने वहाँ शिल्पियोंके अभिप्रायके अनुसार निर्मित और भी बहुत-से दिव्य पदार्थ देखे। कहीं चाँदीके शिखरोंसे सुशोभित पर्वत, कहीं कमलोंसे भरे सरोवर, कहीं भाँति-भाँतिकी चित्रशालाएँ तथा तोरण शोभा पा रहे थे। भूमिपर कहीं सोनेसे मढ़ा हुआ पक्का फर्श और कहीं हरी-हरी घासकी बहार थी ।।
ভীষ্ম বললেন—হে ভারত, তখন রাজা কুশিক সেখানে শিল্পীদের অভিপ্রায় অনুযায়ী নির্মিত বহু দিব্য বস্তু দেখলেন। কোথাও রূপালি শিখরে শোভিত পর্বত, কোথাও পদ্মে ভরা সরোবর; কোথাও নানা রকম চিত্রশালা ও দীপ্তিমান তোরণ। ভূমি কোথাও স্বর্ণমণ্ডিত দৃঢ় মেঝে, কোথাও সবুজ ঘাসের শোভা। আমগাছে মুকুল, আর কেতক, উদ্দালক, অশোক-কুন্দ এবং প্রস্ফুটিত অতিমুক্তক—সব মিলিয়ে স্থানটি সমৃদ্ধি ও মঙ্গলের সুশৃঙ্খল দর্শন হয়ে উঠেছিল।
Verse 6
चम्पकांस्तिलकान् भव्यान् पनसान् वज्जुलानपि । पुष्पितान् कर्णिकारांश्व तत्र तत्र ददर्श ह
ভীষ্ম বললেন—তিনি সেখানে-সেখানে প্রস্ফুটিত চম্পক, তিলক, পনস (কাঁঠাল), বঞ্জুল এবং ফুলে ভরা কর্ণিকার বৃক্ষ দেখলেন।
Verse 7
श्यामान् वारणपुष्पांश्व तथाष्टपदिका लता: । तत्र तत्र परिक्लृप्ता ददर्श स महीपति:,राजाने विभिन्न स्थानोंमें निर्मित श्याम तमाल, वारणपुष्प तथा अष्टपदिका लताओंका दर्शन किया
ভীষ্ম বললেন—রাজা সেখানে-সেখানে সুশৃঙ্খলভাবে রোপিত শ্যাম তামাল, বারণপুষ্প এবং অষ্টপদিকা লতাও দেখলেন।
Verse 8
रम्यान् पद्मोत्यलधरान् सर्वर्तुकुसुमांस्तथा । विमानप्रतिमांश्वापि प्रासादान् शैलसंनिभान्
কোথাও পদ্ম-উৎপলে ভরা মনোরম সরোবর শোভা পেত; কোথাও পর্বতসম উচ্চ প্রাসাদ দেখা যেত, যা বিমানের ন্যায় নির্মিত। সেখানে সর্ব ঋতুর পুষ্প প্রস্ফুটিত ছিল।
Verse 9
शीतलानि च तोयानि क्वचिदुष्णानि भारत । आसनानि विचित्राणि शयनप्रवराणि च,भरतनन्दन! कहीं शीतल जल थे तो कहीं उष्ण, उन महलोंमें विचित्र आसन और उत्तमोत्तम शय्याएँ बिछी हुई थीं
হে ভারতনন্দন! কোথাও শীতল জল, কোথাও উষ্ণ জল ছিল; আর সেই ভব্য গৃহগুলিতে বিচিত্র আসন ও শ্রেষ্ঠ শয্যা সাজানো ছিল।
Verse 10
पर्यड्कान् रत्नसौवर्णान् परारघ्यास्तरणावृतान् | भक्ष्यं भोज्यमनन्तं च तत्र तत्रोपकल्पितम्
সোনার নির্মিত রত্নখচিত শয্যাগুলির উপর অতি মূল্যবান আচ্ছাদন পাতা ছিল; আর নানা স্থানে অসংখ্য প্রকার ভক্ষ্য ও ভোজ্য দ্রব্য সাজিয়ে রাখা ছিল।
Verse 11
वाणीवादान् शुकांश्वैव सारिकान् भृंगराजकान् | कोकिलान् शतपपत्रांक्ष सकोयष्टिककुक्कुभान्
রাজা চারিদিকে মনোহর দৃশ্য দেখলেন—মানুষের মতো বাক্য উচ্চারণকারী টিয়া ও শালিক, ভৃঙ্গরাজ, কোকিল, শতপত্র, কোয়ষ্টি ও কুক্কুভ প্রভৃতি; সকলেই আনন্দিত হয়ে সর্বত্র বিচরণ করছিল।
Verse 12
मयूरान् कुक्कुटांश्चापि दात्यूहानू जीवजीवकान् । चकोरान् वानरान् हंसान् सारसां श्रक्रसाह्नयान्
ময়ূর ও মোরগ, দাত্যূহ ও জীবজীবক, চকোর, বানর, হাঁস, সারস এবং শক্রসাহ্নয় নামে পরিচিত পাখিরাও (সেখানে ছিল)।
Verse 13
क्वचिदप्सरसां संघान् गन्धर्वाणां च पार्थिव
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, পৃথিবীনাথ! কোথাও অপ্সরাদের দল আনন্দে ক্রীড়া করছিল; কোথাও গন্ধর্বদের গোষ্ঠী প্রিয়তমাদের আলিঙ্গন-পাশে আবদ্ধের মতো ছিল। রাজা তাদের সকলকে দেখলেন—কখনও দেখতে পেলেন, আবার কখনও পেলেন না।
Verse 14
कान्ताभिरपरांस्तत्र परिष्वक्तान् ददर्श ह | न ददर्श च तान् भूयो ददर्श च पुनर्नुप:
সেখানে রাজা আরও অনেককে তাদের প্রিয়াদের আলিঙ্গনে আবদ্ধ অবস্থায় দেখলেন। আবার তিনি তাদের দেখতে পেলেন না; তারপর পুনরায় একবার দেখলেন।
Verse 15
गीतध्वनिं सुमधुरं तथैवाध्यापनध्वनिम् । हंसान् सुमधुरांश्चापि तत्र शुश्राव पार्थिव:
সেখানে রাজা কখনও গানের অতিমধুর ধ্বনি শুনলেন, কখনও বেদের স্বাধ্যায়ের গম্ভীর ধ্বনি, আর কখনও রাজহাঁসদের মনোরম ডাক শুনলেন।
Verse 16
त॑ दृष्टवात्यद्भुतं राजा मनसाचिन्तयत् तदा । स्वप्लोडयं चित्तविभ्रंश उताहो सत्यमेव तु
সে অতিশয় আশ্চর্য দৃশ্য দেখে রাজা মনে মনে ভাবলেন—“আহা! এ কি স্বপ্ন, না কি আমার চিত্ত বিভ্রান্ত হয়েছে, নাকি এ সবই সত্য?”
Verse 17
अहो सह शरीरेण प्राप्तो5स्मि परमां गतिम् । उत्तरान् वा कुरून् पुण्यानथवाप्यमरावतीम्,“अहो! क्या मैं इसी शरीरसे परम गतिको प्राप्त हो गया हूँ अथवा पुण्यमय उत्तरकुरु या अमरावतीपुरीमें-आ पहुँचा हूँ
“আহা! তবে কি এই দেহ নিয়েই আমি পরম গতি লাভ করেছি? না কি আমি পুণ্যময় উত্তরকুরু দেশে এসে পৌঁছেছি—অথবা দেবলোকের অমরাবতী নগরীতে?”
Verse 18
किंचेदं महदाश्चर्य सम्पश्यामीत्यचिन्तयत् । एवं संचिन्तयन्नेव ददर्श मुनिपुंगवम्
ভীষ্ম বললেন—“আমি যে মহা বিস্ময় দেখছি, এ কী?”—এই ভেবে তিনি বারবার চিন্তা করতে লাগলেন। এমনভাবে ভাবতে ভাবতেই রাজার দৃষ্টি পড়ল তপস্বীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ এক মুনিপুঙ্গবের উপর।
Verse 19
तस्मिन् विमाने सौवर्णे मणिस्तम्भसमाकुले । महाहें शयने दिव्ये शयानं भूगुनन्दनम्
ভীষ্ম বললেন—মণিখচিত স্তম্ভে পরিপূর্ণ সেই স্বর্ণবিমানে আমি ভৃগুবংশের গৌরবকে এক মহৎ দিব্য শয্যায় শায়িত দেখলাম।
Verse 20
मणिमय खम्भोंसे युक्त सुवर्णमय विमानके भीतर बहुमूल्य दिव्य पर्यकपर वे भृगुनन्दन च्यवन लेटे हुए थे ।।
মণিখচিত স্তম্ভে ভর করা সেই স্বর্ণবিমানের ভিতরে অমূল্য দিব্য পালঙ্কে ভৃগুনন্দন চ্যবন শায়িত ছিলেন। তাঁকে দেখামাত্র নরেন্দ্র কুশিক রাণীসহ আনন্দে এগিয়ে গেলেন; কিন্তু সেই ক্ষণেই মহর্ষি চ্যবন এবং সেই শয্যাও অদৃশ্য হয়ে গেল।
Verse 21
ततोडन्यस्मिन् वनोद्देशे पुनरेव ददर्श तम् | कौश्यां बृस्यां समासीनं जपमानं महाव्रतम्
তারপর বনের অন্য এক প্রদেশে রাজা তাঁকে আবার দেখলেন। তখন মহাব্রতধারী সেই মহর্ষি কুশাসনে বসে মন্ত্রজপে নিমগ্ন ছিলেন।
Verse 22
एवं योगबलाद् विप्रो मोहयामास पार्थिवम् । क्षणेन तद् वनं॑ चैव ते चैवाप्सरसां गणा:
এইভাবে যোগবলের দ্বারা সেই ব্রাহ্মর্ষি রাজাকে মোহগ্রস্ত করলেন। এক নিমেষে সেই বন এবং অপ্সরাদের সেই দল—সবই দৃষ্টির আড়ালে মিলিয়ে গেল।
Verse 23
गन्धर्वा: पादपाश्रैव सर्वमन्तरधीयत । नि:शब्दम भवच्चापि गंगाकूलं॑ पुनर्न॒ूप
ভীষ্ম বললেন—গন্ধর্বরা এবং বৃক্ষসমূহও মুহূর্তে সকলেই দৃষ্টির আড়ালে লীন হয়ে গেল। আর হে নরেশ্বর, গঙ্গাতীর পুনরায় সম্পূর্ণ নীরব হয়ে উঠল।
Verse 24
कुशवल्मीकभूयिष्ठं बभूव च यथा पुरा । ततः स राजा कुशिक: सभार्यस्तेन कर्मणा
স্থানটি পূর্বের মতোই আবার কুশঘাস ও ঢিবি-পিঁপড়ের বাসা (বাঁবি) দিয়ে ঘন হয়ে উঠল। তখন সেই কর্মের আশ্চর্য প্রভাব দেখে রাজা কুশিক রাণীসহ মহাবিস্ময়ে অভিভূত হলেন।
Verse 25
विस्मयं परम॑ प्राप्तस्तद् दृष्टया महदद्भुतम् । ततः प्रोवाच कुशिको भार्या हर्षसमन्वित:
সেই মহৎ ও আশ্চর্য দৃশ্য দেখে কুশিক পরম বিস্ময়ে অভিভূত হলেন। তারপর আনন্দে পরিপূর্ণ হয়ে রাজা কুশিক তাঁর পত্নীকে বললেন।
Verse 26
पश्य भद्ठे यथा भावाश्षित्रा दृष्टा: सुदुर्लभा: । प्रसादाद् भगुमुख्यस्य किमन्यत्र तपोबलात्
হে ভদ্রে, দেখো—কী বিচিত্র ও অতি দুর্লভ প্রকাশ আমরা প্রত্যক্ষ দেখেছি। ভৃগুকুলশ্রেষ্ঠের প্রসাদ ব্যতীত—তপোবল ছাড়া—এমন দর্শন আর কোথা থেকে আসতে পারে?
Verse 27
“कल्याणी! देखो, हमने भूगुकुलतिलक च्यवन मुनिकी कृपासे कैसे-कैसे अद्भुत और परम दुर्लभ पदार्थ देखे हैं। भला, तपोबलसे बढ़कर और कौन-सा बल है? ।।
কল্যাণী! ভৃগুকুল-তিলক চ্যবন মুনির কৃপায় আমরা কত অদ্ভুত ও পরম দুর্লভ বিষয় প্রত্যক্ষ দেখেছি। তপোবলের চেয়ে বড় বল আর কী আছে? যা মন কেবল কামনা-রূপে কল্পনা করতে পারে, তপস্যায় তা সশরীরে লাভ হয়। ত্রিলোকের রাজত্বের চেয়েও তপই শ্রেষ্ঠ।
Verse 28
तपसा हि सुतप्तेन शक््यो मोक्षस्तपोबलात् । अहो प्रभावो ब्रह्मार्षेक्ष्यवनस्य महात्मन:,“अच्छी तरह तपस्या करनेपर उसकी शक्तिसे मोक्षतक मिल सकता है। इन ब्रह्मर्षि महात्मा च्यवनका प्रभाव अद्भुत है
ভীষ্ম বললেন— যথার্থভাবে ও তীব্রভাবে সম্পন্ন তপস্যার তপোবলে মোক্ষও লাভ করা যায়। আহা! মহাত্মা ব্রহ্মর্ষি চ্যবনের আধ্যাত্মিক প্রভাব কত আশ্চর্য।
Verse 29
इच्छयैष तपोवीर्यादन्यॉललोकान् सृजेदपि । ब्राह्मणा एव जायेरन् पुण्यवाग्बुद्धिकर्मण:
ভীষ্ম বললেন— তপস্যাজাত শক্তির বলে তিনি কেবল ইচ্ছামাত্রেই অন্য লোকসমূহ সৃষ্টি করতে পারেন; আর সেই লোকগুলিতে কেবল ব্রাহ্মণরাই জন্ম নেবে— যাদের বাক্য, বুদ্ধি ও কর্ম পুণ্য ও পবিত্র।
Verse 30
'ये इच्छा करते ही अपनी तपस्याकी शक्तिसे दूसरे लोकोंकी सृष्टि कर सकते हैं। इस पृथ्वीपर ब्राह्मण ही पवित्रवाक्, पवित्रबुद्धि और पवित्र कर्मवाले होते हैं ।।
ভীষ্ম বললেন— যারা কেবল সংকল্প করামাত্রই তপোবলের দ্বারা অন্য লোকও সৃষ্টি করতে পারেন, তাঁরা এমনই মহাত্মা। এই পৃথিবীতে পবিত্র বাক্য, পবিত্র বুদ্ধি ও পবিত্র কর্মে চিহ্নিত তো ব্রাহ্মণরাই। মহর্ষি চ্যবন ব্যতীত এখানে আর কে এমন মহৎ কর্ম সাধন করতে পারে? মানুষের পক্ষে রাজ্যলাভ সহজ হতে পারে, কিন্তু সত্য ব্রাহ্মণ্য এই জগতে অতি দুর্লভ।
Verse 31
ब्राह्माण्यस्य प्रभावाद्धि रथे युक्तौ स्वधुर्यवत् । इत्येवं चिन्तयान: स विदितश्न्यवनस्य वै
‘ব্রাহ্মণ্য-প্রভাবেই মহর্ষি আমাদের দু’জনকে যেন নিজের বাহনের মতো রথে জুড়ে দিয়েছিলেন’— এভাবে রাজা চিন্তা করতেই মহর্ষি চ্যবনের কাছে তার আগমনের সংবাদ পৌঁছে গেল।
Verse 32
सम्प्रेक्ष्योवाच नृपतिं क्षिप्रमागम्यतामिति । इत्युक्त: सहभार्यस्तु सो5भ्यगच्छन्महामुनिम्
দেখে মহর্ষি রাজাকে বললেন— “শীঘ্র এখানে এসো।” এ কথা শুনে রাজা পত্নীসহ সেই মহামুনির নিকট গেলেন।
Verse 33
शिरसा वन्दनीयं तमवन्दत च पार्थिव: । उन्होंने राजाकी ओर देखकर कहा--'भूपाल! शीघ्र यहाँ आओ।” उनके इस प्रकार आदेश देनेपर पत्नीसहित राजा उनके पास गये तथा उन वन्दनीय महामुनिको उन्होंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया ।।
ভীষ্ম বললেন—রাজা মস্তক নত করে সেই বন্দনীয় মহামুনিকে প্রণাম করলেন। তারপর মুনি আশীর্বাদ প্রদান করে নরাধিপকে সম্বোধন করে বললেন—ধর্ম রক্ষার জন্য রাজশক্তিও বিনয়ের সঙ্গে, তপস্যা ও জ্ঞানের প্রতি শ্রদ্ধা রেখে প্রয়োগ করা উচিত।
Verse 34
ततः प्रकृतिमापन्नो भार्गवो नूपते नृपम्
তারপর ভার্গব স্বাভাবিক অবস্থায় ফিরে এসে রাজাকে সম্বোধন করে বললেন।
Verse 35
राजन् सम्यग् जितानीह पञड्च पज्च स्वयं त्वया
হে রাজন, এখানে তুমি নিজ প্রচেষ্টায় পাঁচ এবং পাঁচকে যথার্থভাবে জয় করেছ।
Verse 36
सम्यगाराधित: पुत्र त्वया प्रवदतां वर
বৎস, তুমি যথাযথভাবে আরাধনা করেছ; অতএব দানযোগ্য বরগুলির মধ্যে শ্রেষ্ঠ বরটি প্রার্থনা করো।
Verse 37
अनुजानीहि मां राजन् गमिष्यामि यथागतम्
হে রাজন, আমাকে অনুমতি দিন; আমি যেমন এসেছিলাম তেমনই ফিরে যাব।
Verse 38
0 &.* 7 एप कतचजत णः हपफ तक ज्ज्ल्च्य कण का यक्ुम्त्ाप ग ः 2० [! 7472 5५2 ५ ॥#/ ८ कुशिक उवाच अग्निमध्ये गतेनेव भगवन् संनिधौ मया
কুশিক বললেন— ভগবান, আপনার সান্নিধ্যে আমার মনে হয় যেন আমি অগ্নিমধ্যেই প্রবেশ করেছি।
Verse 39
वर्तितं भूगुशार्दूल यन्न दग्धो5स्मि तद् बहु । एष एव वरो मुख्य: प्राप्तो मे भूगुनन्दन
কুশিক বললেন— হে ভৃগুশার্দূল, এই পরীক্ষার মধ্য দিয়ে গিয়েও আমি দগ্ধ হইনি— এটাই আমার জন্য মহা বর। হে ভৃগুনন্দন, এই-ই আমার প্রাপ্ত শ্রেষ্ঠ আশীর্বাদ।
Verse 40
कुशिक बोले--भगवन्! भृगुश्रेष्ठी मैं आपके निकट उसी प्रकार रहा हूँ, जैसे कोई प्रज्वलित अग्निके बीचमें खड़ा हो। उस अवस्थामें रहकर भी मैं जलकर भस्म नहीं हुआ, यही मेरे लिये बहुत बड़ी बात है। भृगुनन्दन! यही मैंने महान् वर प्राप्त कर लिया ।।
কুশিক বললেন— ভগবান, ভৃগুশ্রেষ্ঠ, আমি আপনার নিকটে এমনই ছিলাম যেন জ্বলন্ত অগ্নির মধ্যে দাঁড়িয়ে আছি। তবু আমি দগ্ধ হয়ে ভস্ম হইনি— এটাই আমার কাছে মহা বিস্ময়। হে ভৃগুনন্দন, এটাই আমি মহাবর লাভ করেছি। হে ব্রাহ্মণ, আপনি আমার প্রতি প্রসন্ন হয়েছেন এবং আমার বংশকে বিনাশ থেকে রক্ষা করেছেন— এটাই আমার প্রতি আপনার মহা অনুগ্রহ। হে নিষ্পাপ ব্রহ্মর্ষি, এতেই আমার জীবনের উদ্দেশ্য সিদ্ধ হল।
Verse 41
एतदू् राज्यफलं चैव तपसश्न॒ फलं मम । यदि त्वं प्रीतिमान् विप्र मयि वै भूगुनन्दन
কুশিক বললেন— হে বিপ্র, হে ভৃগুনন্দন, যদি আপনি সত্যিই আমার প্রতি প্রসন্ন হন, তবে এটাই আমার রাজ্যলাভের ফল এবং এটাই আমার তপস্যার ফল।
Verse 42
अस्ति मे संशय: कश्चित् तन्मे व्याख्यातुमहसि
কুশিক বললেন— আমার একটি সংশয় আছে; আপনি তা আমাকে ব্যাখ্যা করুন।
Verse 53
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে চ্যবন ও কুশিকের সংলাপ-বিষয়ক তিপ্পান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 54
भृगुनन्दन! यही मेरे राज्यका और यही मेरी तपस्याका भी फल है। विप्रवर! यदि आपका मुझपर प्रेम हो तो मेरे मनमें एक संदेह है, उसका समाधान करनेकी कृपा करें ।।
ভৃগুনন্দন! এটাই আমার রাজ্যধর্মের ফল, আর এটাই আমার তপস্যারও ফল। হে বিপ্রশ্রেষ্ঠ! যদি আমার প্রতি আপনার স্নেহ থাকে, তবে আমার মনে একটি সংশয় আছে—অনুগ্রহ করে তার সমাধান করুন। ইতি শ্রীমহাভারতে অনুশাসনপর্বণি দানধর্মপর্বণি চ্যবনকুশিকসংবাদে চতুঃপঞ্চাশত্তমোऽধ্যায়ঃ।
Verse 123
समन््ततः प्रमुदितान् ददर्श सुमनोहरान् । राजाने देखा
রাজা চারিদিকে পরম প্রমুদিত ও মনোহর দৃশ্য দেখলেন। মানুষের মতো ভাষায় কথা বলা টিয়া ও শালিকারা কলরব করছিল। ভৃঙ্গরাজ, কোকিল, শতপত্র, কোয়ষ্টি, কুক্কুভ, ময়ূর, মোরগ, দাত্যূহ, জীবজীবক, চকোর, বানর, হাঁস, সারস ও চক্রবাক প্রভৃতি মনোরম পশু-পাখি সর্বত্র আনন্দে বিচরণ করছিল।
Verse 336
निषीदेत्यब्रवीद् धीमान् सान्त्वयन् पुरुषर्षभ: । तब उन पुरुषप्रवर बुद्धिमान् मुनिने राजाको आशीर्वाद देकर सान्त्वना प्रदान करते हुए कहा--'“आओ बैठो”'
তখন সেই পুরুষশ্রেষ্ঠ রাজাকে সান্ত্বনা দিয়ে জ্ঞানী মুনি আশীর্বাদ করলেন এবং মৃদুভাষায় বললেন—“এসো, বসো।”
Verse 346
उवाच श्लक्ष्णया वाचा तर्पयन्निव भारत | भरतवंशी नरेश! तदनन्तर स्वस्थ होकर भृगुपुत्र च्यवन मुनि अपनी स्निग्ध मुधर वाणीद्वारा राजाको तृप्त करते हुए-से बोले--
হে ভারতবংশীয় নৃপতি! তারপর স্থিরচিত্ত হয়ে ভৃগুপুত্র মুনি চ্যবন স্নিগ্ধ, মসৃণ ও মধুর বাক্যে—যেন তৃপ্তি দান করছেন—রাজাকে সম্বোধন করে বললেন।
Verse 353
मनः:षष्ठानीन्द्रियाणि कृच्छान्मुक्तोडसि तेन वै । “राजन! तुमने पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों और छठे मनको अच्छी तरह जीत लिया है। इसीलिये तुम महान् संकटसे मुक्त हुए हो
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, তুমি পাঁচ ইন্দ্রিয় ও ষষ্ঠ মনকে সম্পূর্ণরূপে জয় করেছ; তাই তুমি মহা সংকট থেকে মুক্ত হয়েছ।
Verse 363
नहि ते वृजिनं किंचित् सुसूक्ष्ममपि विद्यते । “वक्ताओंमें श्रेष्ठ पुत्र! तुमने भलीभाँति मेरी आराधना की है। तुम्हारे द्वारा कोई छोटे- से-छोटा या सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अपराध भी नहीं हुआ है
ভীষ্ম বললেন—পুত্র, তোমার মধ্যে সামান্যতমও অন্যায় নেই—অতি সূক্ষ্মও নয়। তুমি যথাযথভাবে আমার সেবা ও সম্মান করেছ; তাই ক্ষুদ্রতম অপরাধ থেকেও তুমি মুক্ত।
Verse 3736
प्रीतो5स्मि तव राजेन्द्र वरश्न प्रतिगृह्मताम् । “राजन! अब मुझे विदा दो। मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाऊँगा। राजेन्द्र! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ; अतः तुम कोई वर माँगो”
ভীষ্ম বললেন—হে রাজেন্দ্র, আমি তোমার উপর প্রসন্ন; অতএব এক বর গ্রহণ করো। এখন আমাকে বিদায় দাও; আমি যেমন এসেছিলাম, তেমনই ফিরে যাব।
Yudhiṣṭhira confronts the ethical aftermath of kin-slaying and guru-slaying in a civil war: how to understand culpability, the suffering of survivors (especially bereaved women), and the prospect of adverse karmic destinies.
Expiation and restoration are operationalized through disciplined practices: tapas and targeted dāna are presented as structured means to generate merit, cultivate virtues, and re-anchor social order after collapse.
Yes in functional form: the chapter repeatedly attaches explicit ‘phala’ (fruits) to practices—asserting predictable outcomes in this world and posthumously (e.g., heaven, reputation, rescue from dark destinies), thereby positioning the teaching as an efficacy-mapped ethical manual.