Adhyaya 56
Anushasana ParvaAdhyaya 5670 Verses

Adhyaya 56

अध्याय ५६ — च्यवन–कुशिकसंवादः (Cyavana–Kuśika Dialogue on Lineage, Conflict, and Transmission)

Upa-parva: Anuśāsana Parva — Genealogical-Etiological Discourse on Bhṛgu–Kuśika Relations (Cyavana Narrative Unit)

This chapter presents Bhīṣma’s report of Cyavana’s speech to King Kuśika. Cyavana states that he must disclose the reason he approached the king with intent to “cut off” (ucchettuṃ), then outlines a divinely conditioned sequence: Kṣatriyas are perpetually the ritual patrons for the Bhṛgus, yet a fated rupture will arise, leading Kṣatriyas to destroy the Bhṛgus, even extending violence to the unborn (a hyperbolic marker of total devastation under daiva-daṇḍa). From this crisis, Aurva will be born to restore the gotra, possessing a destructive “wrath-fire” capable of consuming the worlds; he later contains it by casting it into the ocean’s vaḍavā-vaktra (the mare-faced submarine fire motif). Aurva’s son Ṛcīka becomes the recipient of the complete dhanurveda, which is then transmitted to Jamadagni. Through marriage with a woman from Kuśika’s line (Gādhi’s daughter), Jamadagni fathers Rāma (Paraśurāma), described as Brahmin by status yet acting with Kṣatriya-dharma; the narrative also situates Viśvāmitra within Kuśika’s lineage, emphasizing tapas as transformative capital. Cyavana attributes the pivotal role-changes to “two women” and ancestral ordinance, predicting that in the third generation Kuśika’s line will attain Brahminhood and become related to the Bhṛgus. Bhīṣma concludes that events unfolded exactly as foretold, including the births of Rāma and Viśvāmitra.

Chapter Arc: युधिष्ठिर का प्रश्न—च्यवन मुनि के अन्तर्धान हो जाने पर राजा कुशिक और उनकी सौभाग्यशालिनी रानी ने क्या किया?—श्रोता को तुरंत ‘परीक्षा के बाद’ के परिणाम की ओर खींच लेता है। → भीष्म बताते हैं कि राजा नगर में दीन होकर लौटता है, किसी से कुछ नहीं बोलता और केवल मुनि की विचित्र लीला पर मन ही मन विचार करता रहता है। फिर भी राजा-रानी भूख-प्यास और श्रम से कर्शित होकर भी मुनि की आज्ञा मानते हैं—महार्ह शतपाक तैल से सेवा, भोजन लाना, और कठोर आदेशों का पालन। सेवा का भार बढ़ता जाता है, देह टूटती है, पर व्रत नहीं टूटता। → अत्यन्त श्रान्त होने पर भी वे कष्ट से रथ खींचते हैं; च्यवन (भृगुनन्दन) उनकी पीड़ा और निष्ठा को देखता है। फिर मुनिश्रेष्ठ करुणा-स्नेह से उनके घावों को ‘अमृतकल्प’ हाथों से स्पर्श कर शान्त करते हैं—यही क्षण परीक्षा का निर्णायक मोड़ बनता है: कठोरता के भीतर छिपी अनुग्रह-लीला प्रकट होती है। → नगर में लौटकर वे पूर्वाह्निक कर्म करते हैं, भोजन करते हैं और रात्रि विश्राम करते हैं। मुनि के वरदान से दोनों परस्पर ‘नवयौवन’ को देखते हैं—रोगरहित, देवतुल्य, श्रीसम्पन्न। च्यवन तपोबल से बहुविध रत्न-भूषित, मनोहर समृद्धि की सृष्टि करता है—ऐसी जो इन्द्रपुरी में भी दुर्लभ हो। → null

Shlokas

Verse 1

ऑपन-माज बछ। अ-आकऋातज त्रिपञज्चशत्तमो<् ध्याय: च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना युधिछिर उवाच तस्मिन्नन्तर्हिते विप्रे राजा किमकरोत्‌ तदा । भार्या चास्य महाभागा तनमे ब्रूहि पितामह

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! সেই ব্রাহ্মণ ঋষি অন্তর্হিত হলে রাজা তখন কী করলেন? আর তাঁর মহাভাগ্যা পত্নী কী করলেন? আমাকে বলুন।

Verse 2

युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! च्यवन मुनिके अन्तर्धान हो जानेपर राजा कुशिक और उनकी महान्‌ सौभाग्यशालिनी पत्नीने क्या किया? यह मुझे बताइये ।।

ভীষ্ম বললেন—রাজন! পত্নীসহ বহু খুঁজেও যখন সেই ঋষিকে দেখতে পেলেন না, তখন তিনি ক্লান্ত হয়ে ফিরে এলেন। লজ্জা ও আত্মগ্লানিতে তিনি যেন চেতনাহীন হয়ে পড়লেন।

Verse 3

स प्रविश्य पुरी दीनो नाभ्यभाषत किंचन । तदेव चिन्तयामास च्यवनस्य विचेष्टितम्‌,वे दीनभावसे पुरीमें प्रवेश करके किसीसे कुछ बोले नहीं। केवल च्यवन मुनिके चरित्रपर मन-ही-मन विचार करने लगे

সে বিষণ্ণ মনে নগরে প্রবেশ করে কারও সঙ্গে একটি কথাও বলল না। সে কেবল ঋষি চ্যবনের আশ্চর্য আচরণ ও কীর্তির কথাই অন্তরে অন্তরে ভাবতে লাগল।

Verse 4

अथ शून्येन मनसा प्रविश्य स्वगृहं नृपः । ददर्श शयने तस्मिन्‌ शयानं भृगुनन्दनम्‌,राजाने सूने मनसे जब घरमें प्रवेश किया तब भृगुनन्दन महर्षि च्यवनको पुनः उसी शय्यापर सोते देखा

তারপর রাজা শূন্য ও নির্জীব মনে নিজের গৃহে প্রবেশ করে দেখল—সেই শয্যাতেই ভৃগুনন্দন (চ্যবন) নিদ্রায় শায়িত।

Verse 5

विस्मितौ तमृषिं दृष्टवा तदाश्चर्य विचिन्त्य च । दर्शनात्‌ तस्य तु तदा विश्रान्ती सम्बभूवतु:

সেই ঋষিকে দেখে তারা দুজনেই বিস্ময়ে অভিভূত হল। আশ্চর্য ঘটনাটি ভেবে তারা স্তম্ভিত হয়ে রইল; আর মুনির দর্শনমাত্রেই তাদের ক্লান্তি তৎক্ষণাৎ দূর হয়ে গেল।

Verse 6

यथास्थानं च तौ स्थित्वा भूयस्तं संववाहतु: । अथापरेण पाश्चेन सुष्वाप स महामुनि:

তখন তারা দুজনেই যথাস্থানে দাঁড়িয়ে আবার তাঁকে পাখা করতে লাগল। তারপর সেই মহামুনি পশ্চিম দিকে অন্য পাশ ফিরে শুয়ে নিদ্রা গেলেন।

Verse 7

वे फिर यथास्थान खड़े होकर मुनिके पैर दबाने लगे। अबकी बार वे महामुनि दूसरी करवटसे सोये थे ।।

তারা আবার যথাস্থানে দাঁড়িয়ে মুনির পা টিপে সেবা করতে লাগল; এবার সেই মহামুনি অন্য পাশ ফিরে শুয়েছিলেন। ঠিক ততক্ষণ পরেই সেই শক্তিমান চ্যবন মুনি আবার জেগে উঠলেন। রাজা ও রানি তাঁর ভয়ে শঙ্কিত ছিল, তাই তারা নিজেদের মধ্যে সামান্যও বিকার প্রকাশ করল না এবং আগের মতোই সেবা চালিয়ে গেল।

Verse 8

प्रतिबुद्धस्तु स मुनिस्तौ प्रोवाच विशाम्पते । तैलाभ्यंगो दीयतां मे स्नास्येडहमिति भारत

হে ভারত, প্রজানাথ! মুনি জাগ্রত হলে তিনি রাজা ও রাণীকে বললেন—“আমার দেহে তেল মর্দন করো; কারণ এখন আমি স্নান করব।”

Verse 9

तौ तथेति प्रतिश्रुत्य क्षुधितौ श्रमकर्शितौ । शतपाकेन तैलेन महार्हेणोपतस्थतु:

তাঁরা ‘তথাস্তु’ বলে সম্মতি জানিয়ে—যদিও ক্ষুধায় কাতর ও পরিশ্রমে ক্লান্ত—শতবার পাকানো অতি মূল্যবান তেল নিয়ে সেবায় উপস্থিত হলেন।

Verse 10

तत: सुखासीनमृषिं वाग्यतौ संववाहतु: । न च पर्याप्तमित्याह भार्गव: सुमहातपा:

তখন ঋষি স্বচ্ছন্দে বসে রইলেন, আর সেই দম্পতি বাক্‌সংযম করে নীরবে তাঁর দেহে তেল মর্দন করতে লাগলেন। কিন্তু মহাতপস্বী ভার্গব (চ্যবন) একবারও বললেন না—“যথেষ্ট, থামো।”

Verse 11

भृगुपुत्रने इतनेपर भी जब राजा और रानीके मनमें कोई विकार नहीं देखा, तब सहसा उठकर वे स्नानागारमें चले गये

ভৃগুপুত্র এভাবে বলার পরও রাজা ও রাণীর মনে কোনো বিকার না দেখে তিনি হঠাৎ উঠে স্নানাগারে চলে গেলেন।

Verse 12

क्लृप्तमेव तु तत्रासीत्‌ स्नानीयं पार्थिवोचितम्‌ । असत्कृत्य च तत्‌ सर्व तत्रैवान्‍न्तरधीयत

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সেখানে স্নানের জন্য রাজোচিত সামগ্রী আগেই সাজানো ছিল; কিন্তু সবই উপেক্ষা করে—একটুও ব্যবহার না করে—মুনি রাজার চোখের সামনেই সেখানেই অন্তর্ধান করলেন। তবু সেই দম্পতি তাঁর প্রতি দোষদৃষ্টি করলেন না।

Verse 13

यदा तौ निर्विकारौ तु लक्षयामास भार्गव: । तत उत्थाय सहसा स्नानशालां विवेश ह

যখন ভার্গব মুনি দেখলেন যে রাজদম্পতি সম্পূর্ণ নির্বিকার, তখন তিনি হঠাৎ উঠে স্নানগৃহে প্রবেশ করলেন। আর রাজা দেখতেই দেখতেই সেই মুনি পুনরায় অন্তর্ধান করলেন। স্নানের জন্য রাজোচিত সমস্ত সামগ্রী পূর্বেই প্রস্তুত ছিল, কিন্তু তিনি তার কিছুই গ্রহণ করলেন না; তবু, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, সেই স্বামী-স্ত্রী তাঁর প্রতি দোষদৃষ্টি করলেন না।

Verse 14

अथ स्नात: सः भगवान्‌ सिंहासनगतः: प्रभु: । दर्शयामास कुशिकं सभार्य कुरुनन्दन,कुरुनन्दन! तदनन्तर शक्तिशाली भगवान्‌ च्यवन मुनि पत्नीसहित राजा कुशिकको स्नान करके सिंहासनपर बैठे दिखायी दिये

তারপর স্নান সেরে সেই শক্তিমান ভগবান্ প্রভু সিংহাসনে আরোহণ করে, হে কুরু-নন্দন, পত্নীসহ রাজা কুশিককে দর্শন দিলেন।

Verse 15

संहृष्टवदनो राजा सभार्य: कुशिको मुनिम्‌ । सिद्धमन्नमिति प्रह्लो निर्विकारो न्‍न्यवेदयत्‌

তাঁকে দেখামাত্র পত্নীসহ রাজা কুশিকের মুখ আনন্দে উজ্জ্বল হয়ে উঠল। তিনি স্থিরচিত্তে মুনির কাছে গিয়ে বিনীতভাবে নিবেদন করলেন—“ভোজন প্রস্তুত।”

Verse 16

आनीयतामिति मुनिस्तं चोवाच नराधिपम्‌ । स राजा समुपाजद्ठे तदन्नं सह भार्यया,तब मुनिने राजासे कहा--'ले आओ।” आज्ञा पाकर पत्नीसहित नरेशने मुनिके सामने भोजन-सामग्री प्रस्तुत की

তখন মুনি নরাধিপকে বললেন—“আনা হোক।” আদেশ পেয়ে রাজা পত্নীসহ এগিয়ে এসে সেই ভোজনসামগ্রী মুনির সম্মুখে উপস্থিত করলেন।

Verse 17

मांसप्रकारान्‌ विविधान्‌ शाकानि विविधानि च । वेसवारविकारांश्व पानकानि लघूनि च

নানাবিধ মাংস-প্রস্তুতি, নানা রকম শাক, বিচিত্র রান্না ও উপাদেয় পদ, আর হালকা পানীয়—শাপের ভয়ে রাজা এসব বহু কিছু আনিয়ে মুনির সামনে সাজিয়ে দিলেন।

Verse 18

रसालापूपकांश्रित्रानू मोदकानथ खाण्डवान्‌ | रसान्‌ नानाप्रकारांश्व वन्यं च मुनिभोजनम्‌

ভীষ্ম বললেন—অভিশাপের ভয়ে রাজা বহু রকম সুস্বাদু দ্রব্য আনিয়ে সাজিয়ে দিলেন—মধুর পানীয় ও শরবত, পিঠে-পায়েসজাতীয় মিষ্টান্ন, নানাবিধ মোদক, খাণ্ডের মিষ্টি ও নানা রস; আবার ঋষিদের উপযোগী বনজ আহার—বন্য কন্দ-মূল ও বিচিত্র ফল—এবং রাজভোগ্য বহু ব্যঞ্জন, গৃহস্থ ও বনবাসীদের উপযুক্ত খাদ্যও।

Verse 19

फलानि च विचित्राणि राजभोज्यानि भूरिश: । बदरेड्गुदकाश्मर्यभललातकफलानि च

ভীষ্ম বললেন—সেখানে বিচিত্র ফলও ছিল বহু, আর রাজভোগ্য বহু উপাদেয় দ্রব্যও—বরই, ইঙ্গুদ, কাশ্মর্য ফল এবং ভল্লাতক ফলও।

Verse 20

गृहस्थानां च यद्‌ भोज्यं यच्चापि वनवासिनाम्‌ | सर्वमाहारयामास राजा शापभयात्‌ ततः

ভীষ্ম বললেন—তখন অভিশাপের ভয়ে রাজা গৃহস্থদের উপযোগী যা খাদ্য এবং বনবাসীদের উপযুক্ত যা আহার—সবই আনিয়ে উপস্থিত করলেন।

Verse 21

अथ सर्वमुपन्यस्तमग्रतश्ल्यवनस्य तत्‌ । ततः सर्व समानीय तच्च शय्यासनं मुनि:

ভীষ্ম বললেন—তখন যা কিছু সাজানো ছিল, তা সবই মুনি চ্যবনের সম্মুখে রাখা হল। এরপর মুনি সব একত্র করলেন, এবং সেই শয্যা ও আসনটিও নিজের কাছে নিলেন।

Verse 22

वस्त्रै: शुभेरवच्छाद्य भोजनोपस्करै: सह । सर्वमादीपयामास च्यवनो भृगुनन्दन:

ভীষ্ম বললেন—তারপর সুন্দর বস্ত্রে ঢেকে, ভোজন-সামগ্রী ও উপকরণসহ, ভৃগুনন্দন চ্যবন সেই সবকিছুকেই আগুনে জ্বালিয়ে দিলেন।

Verse 23

न च तौ चक्रतुः क्रोधं॑ दम्पती सुमहामती । तयो: सम्प्रेक्षतोरेव पुनरन्तर्हितो5भवत्‌,परंतु उन परम बुद्धिमान्‌ दम्पतिने उनपर क्रोध नहीं प्रकट किया। उन दोनोंके देखते- ही-देखते वे मुनि फिर अन्तर्धान हो गये

পরম প্রজ্ঞাবান সেই দম্পতি তাঁদের প্রতি ক্রোধ প্রকাশ করলেন না। দু’জনের চোখের সামনেই সেই মুনি পুনরায় অন্তর্ধান করলেন।

Verse 24

तथैव च स राजर्षिस्तस्थौ तां रजनीं तदा । सभार्यों वाग्यत: श्रीमानू न च कोपं समाविशत्‌

তেমনি সেই শ্রীমান রাজর্ষি পত্নীসহ সেখানে সারারাত বাক্‌সংযম করে দাঁড়িয়ে রইলেন; তবু তাঁর মনে ক্রোধের সঞ্চার হল না।

Verse 25

नित्यसंस्कृतमन्नं तु विविधं राजवेश्मनि । शयनानि च मुख्यानि परिषेकाश्व पुष्कला:

রাজপ্রাসাদে প্রতিদিন নানাবিধ সুপক্ব আহার পরিবেশিত হত। উৎকৃষ্ট শয্যা পাতা থাকত, আর স্নান ও পরিষেকের জন্য প্রচুর উপকরণ প্রস্তুত থাকত।

Verse 26

वस्त्र च विविधाकारमभवत्‌ समुपार्जितम्‌ | न शशाक ततो द्रष्टमन्तरं च्यवनस्तदा

বহু রূপ ও প্রকারের বস্ত্রও সংগ্রহ করে সেবায় নিবেদন করা হল। তখন চ্যবন মুনি সেই সব পরিচর্যায় কোনো ত্রুটি দেখতে পেলেন না।

Verse 27

पुनरेव च विप्रर्षि: प्रोवाच कुशिकं नूपम्‌ | सभार्यों मां रथेनाशु वह यत्र ब्रवीम्यहम्‌

তখন বিপ্রর্ষি আবার রাজা কুশিককে বললেন—“পত্নীসহ রথে জুতে যাও, আর আমি যেখানে বলি সেখানে আমাকে দ্রুত নিয়ে চলো।”

Verse 28

तथेति च प्राह नृपो निर्विशडुकस्तपोधनम्‌ । क्रीडारथो<स्तु भगवन्नुत सांग्रामिको रथ:

তখন সংশয়মুক্ত রাজা তপোধনকে বললেন—“তথাস্তु, ভগবন্! বলুন, ক্রীড়ারথ প্রস্তুত হবে, না কি যুদ্ধোপযোগী রথ?”

Verse 29

इत्युक्त: स मुनी राज्ञा तेन हृष्टेन तद्गबच: । च्यवन: प्रत्युवाचेदं हृष्ट: परपुरंजयम्‌

আনন্দে উচ্ছ্বসিত রাজার এমন প্রশ্নে মুনি চ্যবন পরম প্রসন্ন হলেন এবং শত্রুনগরজয়ী সেই নৃপতিকে বললেন—

Verse 30

सज्जीकुरु रथं क्षिप्रं यस्ते सांग्रामिको मतः । सायुथध: सपताकश्न शक्तीकनकयष्टिमान्‌

“রাজন! যে রথকে তুমি যুদ্ধোপযোগী মনে কর, সেই রথই শীঘ্র প্রস্তুত করো। তা অস্ত্রশস্ত্রে সজ্জিত হোক, পতাকা থাকুক, শক্তি ও স্বর্ণদণ্ডও থাকুক।”

Verse 31

किड्किणीस्वननिर्घोषो युक्तस्तोरणकल्पनै: । जाम्बूनदनिबद्ध श्व परमेषुशतान्वित:

“তার কিঙ্কিণীর মধুর ধ্বনি দূরদূরান্তে প্রতিধ্বনিত হোক। তা তোরণসদৃশ অলংকরণে সজ্জিত হোক, জাম্বূনদ স্বর্ণে বাঁধা থাকুক এবং উৎকৃষ্ট শত শত বাণে পরিপূর্ণ হোক।”

Verse 32

ततः स तं तथेत्युक्त्वा कल्पयित्वा महारथम्‌ | भार्या वामे धुरि तदा चात्मानं दक्षिणे तथा

তখন রাজা “তথাস্তু” বলে গিয়ে এক মহারথ প্রস্তুত করে আনলেন। পরে তিনি জোয়ালের বাম পাশে ভার বহনের জন্য রাণীকে বসালেন এবং নিজে ডান পাশে অবস্থান নিলেন।

Verse 33

त्रिदण्डं वज़सूच्यग्रं प्रतोद॑ तत्र चादधत्‌ | सर्वमेतत्‌ तथा दत्त्वा नृपो वाक्यमथाब्रवीत्‌

সেই রথে তিনি তিন দণ্ডযুক্ত, বজ্র-সূচির ন্যায় তীক্ষ্ণ অগ্রভাগবিশিষ্ট এক প্রতোদ (চাবুক)ও স্থাপন করলেন। এ সকল সামগ্রী যথাবিধি অর্পণ করে রাজা তখন বাক্য উচ্চারণ করলেন।

Verse 34

भगवन्‌ क्‍्व रथो यातु ब्रवीतु भूगुनन्दन | यत्र वक्ष्यसि विप्रर्षे तत्र यास्यति ते रथ:,“भगवन्‌! भृगुनन्दन! बताइये, यह रथ कहाँ जाय? ब्रह्मर्ष] आप जहाँ कहेंगे, वहीं आपका रथ चलेगा”

“ভগবন্! ভৃগুনন্দন! বলুন, এই রথ কোথায় যাবে? হে ব্রহ্মর্ষি, আপনি যেখানে নির্দেশ দেবেন, সেখানেই আপনার রথ যাবে।”

Verse 35

एवमुक्तस्तु भगवान्‌ प्रत्युवाचाथ तं॑ नृपम्‌ इत:ः प्रभूति यातव्यं पदक पदक शनै:

রাজা এভাবে বললে ভগবান (চ্যবন) মুনি তাকে উত্তর দিলেন—“এখন থেকে অতি ধীরে, পদে পদে এগোবে।”

Verse 36

श्रमो मम यथा न स्यात्‌ तथा मच्छन्दचारिणौ । सुसुखं चैव वोढव्यो जन: सर्वश्ष॒ पश्यतु

“এমনভাবে চলো যেন আমার ক্লান্তি না হয়; তোমরা দু’জন আমার ইচ্ছানুসারেই চলবে। আমাকে পরম স্বাচ্ছন্দ্যে বহন করবে, আর সর্বত্রের লোক যেন তা দেখে।”

Verse 37

नोत्सार्या: पथिका: केचित्‌ तेभ्यो दास्‍्ये वसु हाहम्‌ । ब्राह्मणेभ्यश्न ये कामानर्थयिष्यन्ति मां पथि

“পথ থেকে কোনো পথিককে সরানো উচিত নয়; আমি তাদের ধন দেব। আর পথে যে ব্রাহ্মণরা আমার কাছে যা-যা প্রার্থনা করবে, আমি তাদের সেই-সেই বস্তুই দান করব।”

Verse 38

सर्वान्‌ दास्‍्याम्यशेषेण धन रत्नानि चैव हि । क्रियतां निखिलेनैतन्मा विचारय पार्थिव

আমি সকলকে তাদের প্রাপ্য অনুসারে ধন ও রত্ন একেবারে অবশিষ্ট না রেখে বিতরণ করব। অতএব এ সকল বিষয়ে সম্পূর্ণ ব্যবস্থা করো। হে রাজন, এ নিয়ে মনে কোনো সংশয় বা দ্বিধা রেখো না।

Verse 39

तस्य तद्‌ वचन श्रुत्वा राजा भृत्यांस्तथाब्रवीत्‌ | यद्‌ यद्‌ ब्रूयान्मुनिस्तत्तत्‌ सर्व देयमशड्कितै:

মুনির সেই বাক্য শুনে রাজা তাঁর পরিচারকদের বললেন—“এই ঋষি যা-যা চাইবেন, যা-ই হোক, কোনো সন্দেহ বা দ্বিধা না রেখে সবই তাঁকে দেবে।”

Verse 40

ततो रत्नान्यनेकानि स्त्रियो युग्यमजाविकम्‌ | कृताकृतं च कनकं गजेन्द्राश्चनाचलोपमा:

তখন রাজার আদেশ অনুসারে নানাবিধ রত্ন, নারী, জোয়াল-জোড়া বাহন ও টানার পশু, ছাগল-ভেড়া, গড়া ও অগড়া স্বর্ণ, আর পর্বতসম গজরাজ—এসবই মুনির পশ্চাতে চলল; রাজ্যের মন্ত্রীরাও সেই দানসামগ্রীর সঙ্গে ছিলেন।

Verse 41

अन्वगच्छन्त तमृषिं राजामात्याश्चव सर्वश: । हाहाभूतं च तत्‌ सर्वमासीन्नगरमार्तवत्‌

রাজার মন্ত্রীরা সর্বতোভাবে সেই ঋষির পশ্চাতে চললেন। আর তখন সমগ্র নগরী শোকে আর্ত হয়ে ‘হায় হায়’ ধ্বনিতে মুখরিত হয়ে উঠল।

Verse 42

तौ तीक्ष्णाग्रेण सहसा प्रतोदेन प्रतोदितौ । पृष्ठे विद्धौ कटे चैव निर्विकारी तमूहतु:

এমন সময় মুনি হঠাৎ তীক্ষ্ণাগ্র অঙ্কুশ-চাবুক দিয়ে তাদের তাড়ালেন; তাদের পিঠ ও কোমর বিদ্ধ হলো, তবু তারা নির্বিকার চিত্তে সেই ভার টেনে চলল।

Verse 43

वेपमानौ निराहारौ पञ्चाशद्रात्रकर्षितौ । कथंचिदूहतुर्वीरी दम्पती तं रथोत्तमम्‌

পঞ্চাশ রাত্রি অনাহারে তারা অত্যন্ত ক্ষীণ হয়ে পড়েছিল, অঙ্গপ্রত্যঙ্গ কাঁপছিল; তবু সেই বীর দম্পতি কোনোভাবে সাহস সঞ্চয় করে সেই উৎকৃষ্ট রথের ভার বহন করছিল।

Verse 44

बहुशो भृशविद्धौ तौ स्रवन्तौ च क्षतोद्धवम्‌ । ददृशाते महाराज पुष्पिताविव किंशुकौ

মহারাজ! তারা দুজনেই বারবার আঘাতে ভীষণভাবে আহত হয়েছিল; ক্ষত থেকে রক্ত ঝরছিল। রক্তে সিক্ত হয়ে তারা যেন পূর্ণ প্রস্ফুটিত পলাশের মতো দেখাচ্ছিল।

Verse 45

तौ दृष्टवा पौरवर्गस्तु भूशं शोकसमाकुल: । अभिशापभयत्रस्तो न च किंचिदुवाच ह

তাদের এই করুণ দশা দেখে নগরবাসীরা গভীর শোকে আচ্ছন্ন হয়ে পড়ল; কিন্তু ঋষির অভিশাপের ভয়ে কেউ কিছু বলার সাহস পেল না।

Verse 46

उन्ड्शश्नाब्रुवन्‌ सर्वे पश्यध्वं तपसो बलम्‌ | क्रुद्धा अपि मुनिश्रेष्ठ॑ वीक्षितुं नेह शकनुम:

তখন সবাই আলাদা আলাদা দাঁড়িয়ে পরস্পর বলতে লাগল—“দেখো, তপস্যার শক্তি কত প্রবল! আমরা ক্রোধে জ্বলছি, তবু এখানে শ্রেষ্ঠ মুনির দিকে চোখ তুলে তাকাতেও পারছি না।”

Verse 47

अहो भगवतो वीर्य महर्षेर्भावितात्मन: । राज्ञश्नापि सभार्यस्य धैर्य पश्यत यादृशम्‌

“আহা! তপস্যায় সিদ্ধচিত্ত ভগবান মহর্ষির তেজ কত আশ্চর্য! আর রাজা-রানির ধৈর্যও কত অনন্য—নিজ চোখে দেখো।”

Verse 48

श्रान्तावपि हि कृच्छेण रथमेनं समूहतु: । न चैतयोविंकारं वै ददर्श भूगुनन्दन:,'ये इतने थके होनेपर भी कष्ट उठाकर इस रथको खींचे जा रहे हैं। भूगुनन्दन च्यवन अभीतक इनमें कोई विकार नहीं देख सके हैं"

যদিও তারা দু’জনেই ক্লান্ত ছিল, তবু মহাকষ্টে সেই রথ টেনে নিয়ে চলল। কিন্তু ভৃগুনন্দন (চ্যবন) তাদের মধ্যে কোনো বিকার বা অস্থিরতার লক্ষণই দেখলেন না।

Verse 49

भीष्म उवाच ततः स निर्विकारीौ तु दृष्टवा भगुकुलोद्वह: । वसु विश्राणयामास यथा वैश्रवणस्तथा

তখন ভৃগুকুলের শ্রেষ্ঠ পুরুষ, রাজা-রানিকে নির্বিকার দেখে, বৈশ্রবণ (কুবের)-এর মতো তাদের উপর ধন বর্ষণ করতে লাগলেন।

Verse 50

तत्रापि राजा प्रीतात्मा यथादिष्टमथाकरोत्‌ । ततो<स्य भगवान्‌ प्रीतो बभूव मुनिसत्तम:

সেখানেও রাজা আনন্দচিত্তে যেমন আদেশ পেয়েছিলেন তেমনই করলেন। ফলে মুনিশ্রেষ্ঠ ভগবান (চ্যবন) তাঁর প্রতি অত্যন্ত প্রসন্ন হলেন।

Verse 51

अवतीर्य रथश्रेष्ठाद्‌ दम्पती तौ मुमोच ह । विमोच्य चैतौ विधिवत्‌ ततो वाक्यमुवाच ह

তখন তিনি শ্রেষ্ঠ রথ থেকে নেমে সেই দম্পতিকে ভারবহন-সেবার বন্ধন থেকে মুক্ত করলেন। বিধিপূর্বক মুক্ত করে তারপর তাদের সঙ্গে যথোচিত বাক্য বললেন।

Verse 52

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपववके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ

তারপর ভৃগুবংশীয় চ্যবন স্নিগ্ধ, গম্ভীর ও অত্যন্ত প্রসন্ন কণ্ঠে বললেন—“হে ভারত! আমি তোমাদের দু’জনকে শ্রেষ্ঠ বর দিতে চাই; বলো, কী দেব?”

Verse 53

सुकुमारौ च तौ विद्धौ कराभ्यां मुनिसत्तम: । पस्पर्शामृतकल्पाभ्यां स्नेहाद्‌ भरतसत्तम

ভীষ্ম বললেন— মুনিশ্রেষ্ঠ সেই দুই কোমলজনকে আহত দেখে, স্নেহবশ অমৃতসম শান্তিদায়ক দুই হাতে তাদের পিঠে মৃদু করে হাত বুলিয়ে দিলেন, হে ভরতশ্রেষ্ঠ।

Verse 54

अथाब्रवीन्नूपो वाक्‍्यं श्रमो नास्त्यावयोरिह । विश्रान्तौ च प्रभावात्‌ ते ऊचतुस्तौ तु भार्गवम्‌

ভীষ্ম বললেন— তখন রাজা নূপ ভৃগুবংশীয় চ্যবনকে বললেন— ‘এখানে আমাদের দুজনেরই কোনো ক্লান্তি নেই; আপনার প্রভাবে আমরা সম্পূর্ণ বিশ্রাম ও স্বস্তি অনুভব করছি।’ তারা এ কথা বললে ভগবান চ্যবন পুনরায় আনন্দে পরিপূর্ণ হয়ে বললেন— ‘আমি আগে যা বলেছি তা বৃথা হবে না; তা অবশ্যই সম্পূর্ণ হবে।’

Verse 55

अथ तौ भगवान्‌ प्राह प्रहृष्टश््यवनस्तदा । न वृथा व्यादह्ठतं पूर्व यन्मया तद्‌ भविष्यति

তখন ভগবান চ্যবন আনন্দিত হয়ে বললেন— ‘আমি আগে যা বলেছি তা বৃথা নয়; তাই-ই অবশ্যই ঘটবে।’

Verse 56

रमणीय: समुद्देशो गंगातीरमिदं शुभम्‌ | किंचित्कालं व्रतपरो निवत्स्यामीह पार्थिव,'पृथ्वीनाथ! यह गंगाका सुन्दर तट बड़ा ही रमणीय स्थान है। मैं कुछ कालतक व्रतपरायण होकर यहीं रहूँगा

হে পার্থিব! গঙ্গার এই শুভ তীর অতি মনোরম। আমি কিছু কাল ব্রতপরায়ণ হয়ে এখানেই বাস করব।

Verse 57

गम्यतां स्वपुरं पुत्र विश्रान्त: पुनरेष्यसि । इहस्थं मां सभार्यस्त्वं द्रष्टासि श्वो नराधिप

বৎস! তুমি এখন নিজের নগরে যাও; বিশ্রাম নিয়ে আবার ফিরে এসো। হে নরাধিপ! আগামীকাল তুমি পত্নীসহ আমাকে এখানেই দেখবে।

Verse 58

न च मन्युस्त्वया कार्य: श्रेयस्ते समुपस्थितम्‌ । यत्‌ काडक्षितं हादिस्थं ते तत्‌ सर्व हि भविष्यति

ভীষ্ম বললেন—তোমার মনে শোক বা ক্রোধের স্থান দিও না। এখন তোমার কল্যাণের সময় উপস্থিত। হৃদয়ে যে-যে কামনা তুমি ধারণ করেছ, তা সবই নিশ্চয় পূর্ণ হবে।

Verse 59

इत्येवमुक्त: कुशिक: प्रह्ृष्टेनान्तरात्मना | प्रोवाच मुनिशार्दूलमिदं वचनमर्थवत्‌

ভীষ্ম বললেন—এভাবে বলা হলে রাজা কুশিক অন্তরে পরম আনন্দে ভরে সেই মুনিশ্রেষ্ঠকে অর্থপূর্ণ বাক্য বললেন—“ভগবন্, মহাভাগ! আপনি আমাদের পবিত্র করেছেন। আমাদের মনে শোক বা ক্রোধের লেশমাত্র নেই। আমরা উভয়েই পুনরায় যৌবন লাভ করেছি, আর আমাদের দেহ সুন্দর ও বলবান হয়েছে।”

Verse 60

न मे मन्युर्महाभाग पूतौ स्वो भगवंस्त्वया । संवृतौ यौवनस्थौ स्वो वपुष्मन्ती बलान्वितौ

“মহাভাগ! আমার মধ্যে ক্রোধ নেই। ভগবন্, আপনার দ্বারা আমরা পবিত্র হয়েছি। আমরা উভয়েই আবার যৌবনে প্রতিষ্ঠিত; আমাদের দেহ দীপ্তিমান ও বলসম্পন্ন হয়েছে।”

Verse 61

प्रतोदेन व्रणा ये मे सभार्यस्य त्वया कृता: । तान्‌ न पश्यामि गात्रेषु स्वस्थो5स्मि सह भार्यया

“আপনি আমার স্ত্রীর সঙ্গে থাকা অবস্থায় চাবুক দিয়ে যে ক্ষত করেছিলেন, সেগুলি এখন আর আমার অঙ্গে দেখি না। আমি স্ত্রীর সঙ্গে সম্পূর্ণ সুস্থ।”

Verse 62

इमां च देवीं पश्यामि वपुषाप्सरसोपमाम्‌ | श्रिया परमया युक्तां यथा दृष्टा पुरा मया

“আর আমি এই দেবীসমা মহিলাকে অপ্সরার মতো মনোহর, পরম কান্তি ও শ্রীতে ভূষিতা দেখছি—যেমন তাঁকে আমি পূর্বে দেখেছিলাম, তেমনই তিনি হয়েছেন।”

Verse 63

तव प्रसादसंवृत्तमिदं सर्व महामुने । नैतच्चित्र॑ तु भगवंस्त्वयि सत्यपराक्रम

মহামুনি! আপনার কৃপাপ্রসাদেই এ সব সম্পন্ন হয়েছে। ভগবন্, আপনি সত্যপরাক্রমী; সত্যনিষ্ঠ তপস্বীদের মধ্যে এমন শক্তি থাকা মোটেই আশ্চর্য নয়।

Verse 64

इत्युक्त: प्रत्युवाचैनं कुशिकं च्यवनस्तदा । आगच्छेथा: सभार्यश्ष त्वमिहेति नराधिप,उनके ऐसा कहनेपर मुनिवर च्यवन पुनः राजा कुशिकसे बोले--“नरेश्वर! तुम पुनः अपनी पत्नीके साथ कल यहाँ आना”

এ কথা শুনে মুনিবর চ্যবন কুশিক নরাধিপকে আবার বললেন—“হে নরেশ্বর! তুমি আগামীকালও পত্নীসহ এখানে এসো।”

Verse 65

इत्युक्त: समनुज्ञातो राजर्षिरभिवाद्य तम्‌ । प्रययौ वपुषा युक्तो नगरं देवराजवत्‌

এভাবে সম্বোধিত হয়ে অনুমতি পেয়ে রাজর্ষি কুশিক তাঁকে প্রণাম করে বিদায় নিলেন এবং দেবরাজের ন্যায় দীপ্তিময় দেহ নিয়ে নিজের নগরের দিকে যাত্রা করলেন।

Verse 66

तत एनमुपाजग्मुरमात्या: सपुरोहिता: । बलस्था गणिकायुक्ता: सर्वा: प्रकृतयस्तथा,तदनन्तर उनके पीछे-पीछे मन्त्री, पुरोहित, सेनापति, नर्तकियाँ तथा समस्त प्रजावर्गके लोग चले

তারপর তাঁর পেছনে পেছনে এলেন মন্ত্রীরা, পুরোহিতসহ রাজপুরোহিত, সেনাপতি, গণিকা-সহ পরিচারকবর্গ এবং নানা শ্রেণির সমগ্র প্রজাগণ।

Verse 67

तैर्वृतः कुशिको राजा श्रिया परमया ज्वलन्‌ । प्रविवेश पुर हृष्ट: पूज्यमानो5थ बन्दिभि:

তাদের দ্বারা পরিবৃত্ত রাজা কুশিক পরম শ্রীতে দীপ্ত হয়ে আনন্দভরে নগরে প্রবেশ করলেন; আর বন্দিজনেরা তাঁর গুণগান করে তাঁকে সম্মান জানাচ্ছিল।

Verse 68

ततः प्रविश्य नगर कृत्वा पौर्वाह्निकी: क्रिया: । भुक्त्वा सभारयों रजनीमुवास स महाद्युति:

তারপর নগরে প্রবেশ করে তিনি যথাবিধি পূর্বাহ্নের নিত্যকর্ম সম্পন্ন করলেন। পরে পত্নীসহ আহার করে সেই মহাতেজস্বী রাজা প্রাসাদে রাত্রি যাপন করলেন।

Verse 69

ततस्तु तौ नवमभिवीक्ष्य यौवन परस्परं विगतरुजाविवामरौ । ननन्दतु: शयनगतौ वपुर्धरी श्रिया युतौ द्विजवरदत्तया तदा

তখন স্বামী-স্ত্রী উভয়ে পরস্পরের মধ্যে নবযৌবনের উদয় দেখে, রোগশোকহীন দেবতাদের ন্যায় প্রতীয়মান হলেন। শয্যায় শুয়ে শুয়েই তাঁরা পরম আনন্দে মগ্ন হলেন। দ্বিজশ্রেষ্ঠ চ্যবনের দত্ত শ্রী-শোভায় ভূষিত নবদেহ ধারণ করে সেই দম্পতি হর্ষে পরিপূর্ণ হলেন।

Verse 70

अथाप्यृषिर्भुगुकुलकीर्तिवर्धन- स्तपोधनो वनमभिराममृद्धिमत्‌ । मनीषया बहुविधरत्नभूषितं ससर्ज यन्न पुरि शतक्रतोरपि

এদিকে ভৃগুকুলের কীর্তি-বর্ধনকারী, তপোধনে সমৃদ্ধ মহর্ষি চ্যবন নিজের সংকল্পবলেই এক সমৃদ্ধ ও নয়নাভিরাম বন সৃষ্টি করলেন, যা নানাবিধ রত্নে অলংকৃত। এমন মনোহর কানন তো শতক্রতু ইন্দ্রের পুরীতেও ছিল না।

Frequently Asked Questions

The chapter stages a tension between inherited social duty and catastrophic outcomes: ritual interdependence (Bhṛgu priests and Kṣatriya patrons) is affirmed, yet a divinely conditioned rupture leads to extreme violence, forcing the narrative to ask how dharma persists when social roles and obligations collapse under providential pressure.

Destructive power—whether social (conflict) or cosmic (Aurva’s wrath-fire)—must be disciplined and relocated into an ordered framework; likewise, knowledge and status are shown as transmissible and transformable through tapas, marriage, and lawful succession rather than fixed by a single generation.

Yes: Bhīṣma closes with an explicit verification that events occurred “as spoken by the sage,” functioning as an internal authentication device that frames the genealogy and role-transitions as authoritative history within the epic’s instructional archive.