Adhyaya 50
Anushasana ParvaAdhyaya 5064 Verses

Adhyaya 50

Cyavana’s Water-Vow and the Ethics of Cohabitation (स्नेह-सम्वास-धर्मः)

Upa-parva: Dharma-anuśāsana (Exempla on affection, cohabitation, and compassion toward aquatic beings)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to define the nature of affection formed by seeing (darśana) and by living together (saṃvāsa), and to explain the auspicious status of cattle (gavāṃ mahābhāgyam). Bhīṣma answers by introducing an ancient account (purāvr̥tta) connected to King Nahuṣa and the sage Cyavana. Cyavana, a Bhārgava ascetic, undertakes a severe twelve-year water-dwelling vow between the Gaṅgā and Yamunā, subduing pride, anger, elation, and grief. The rivers and aquatic beings do not distress him; he becomes familiar and trusted among them. Later, fishermen arrive to cast extensive nets for fish; in the process, they inadvertently haul up Cyavana, encrusted with river growth and shells. The fishermen prostrate upon recognizing a Veda-knowing sage, while many fish are harmed by the dragging. Seeing the fish’s suffering, Cyavana is moved by compassion and declares he will not leave his aquatic co-inhabitants—he will accept death or sale along with the fish, refusing separation from those with whom he has shared residence. Terrified, the fishermen report the matter to Nahuṣa, setting up a royal adjudication of competing claims: livelihood versus non-harm and the obligations created by cohabitation.

Chapter Arc: युधिष्ठिर, पितामह भीष्म को ‘सर्वशास्त्रविधानज्ञ’ कहकर प्रणाम करता है और एक तीक्ष्ण संशय रखता है—पिता के धन में पुत्रों का दायभाग किस प्रकार निश्चित होता है, विशेषतः जब जन्म-वर्ण और मातृ-वर्ण भिन्न हों। → प्रश्न साधारण उत्तर से आगे बढ़कर वर्ण-संकर, अनुलोम-प्रतिलोम, और विभिन्न मातृ-गर्भों से उत्पन्न पुत्रों के अधिकार तक पहुँचता है; भीष्म स्मृति-नियमों के अनुसार हिस्सों की सीमा, पात्रता और अपात्रता का क्रमशः विधान करते हैं, जिससे न्याय और कठोरता का द्वंद्व उभरता है। → भीष्म निर्णायक रूप से दायभाग की मर्यादाएँ बताते हैं—विशेषकर शूद्रा से ब्राह्मण के पुत्र के लिए ‘अल्प’ और ‘दशमांश से अधिक नहीं’ जैसी सीमाएँ, तथा वर्ण-क्रम की असमानता (एक वर्ण का दूसरे के ‘सदृश’ न होना) को आधार बनाकर उत्तराधिकार का कठोर वर्गीकरण। → युधिष्ठिर के संशय का शास्त्रीय समाधान प्रस्तुत होता है: पिता के धन का विभाजन जन्म-स्थिति, मातृ-वर्ण, और स्वीकृत सामाजिक-धर्म-व्यवस्था के अनुसार होता है; अधिकार ‘समता’ पर नहीं, ‘विधि’ पर टिकता है। → भीष्म के विधान के बाद भी एक मौन प्रश्न शेष रहता है—क्या शास्त्र-सम्मत असमानता ही धर्म है, या धर्म का कोई उच्चतर मानदंड भी है?

Shlokas

Verse 1

अि-क्राछ सप्तचत्वारिशो< ध्याय: ब्राह्मण आदि वर्णोकी दायभाग-विधिका वर्णन युधिछिर उवाच सर्वशास्त्रविधानज्ञ राजधर्मविदुत्तम । अतीव संशयच्छेत्ता भवान्‌ वै प्रथित: क्षितौ

যুধিষ্ঠির বললেন—হে পিতামহ! আপনি সকল শাস্ত্রবিধানের জ্ঞানী এবং রাজধর্মবিদদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ। এই পৃথিবীতে আপনি সন্দেহচ্ছেদক হিসেবে প্রসিদ্ধ। আমার হৃদয়েও আরেকটি সন্দেহ উদিত হয়েছে; দয়া করে তার সমাধান করুন। হে রাজন! এই উদ্ভূত সন্দেহ বিষয়ে আমি আর কাউকে জিজ্ঞাসা করব না।

Verse 2

वक्षित्तु संशयो मे5स्ति तन्मे ब्रूहि पितामह । जाते5स्मिन्‌ संशये राजन्‌ नान्यं पृच्छेम कंचन

যুধিষ্ঠির বললেন—হে পিতামহ! আমার একটি সন্দেহ আছে, আমি তা প্রকাশ করতে চাই; আপনি আমাকে তার উত্তর বলুন। হে রাজন! এই সন্দেহ উদিত হওয়ার পর এ বিষয়ে আমি আর কাউকে জিজ্ঞাসা করব না।

Verse 3

यथा नरेण कर्ताव्यं धर्ममार्गनिवर्तिना । एतत्‌ सर्व महाबाहो भवान्‌ व्याख्यातुमरहति,महाबाहो! धर्ममार्गका अनुसरण करनेवाले मनुष्यका इस विषयमें जैसा कर्तव्य हो, इस सबकी आप स्पष्टरूपसे व्याख्या करें

মহাবাহো! ধর্মপথ অনুসরণকারী মানুষের এ বিষয়ে যেমন কর্তব্য, সে সমস্তই আপনি স্পষ্টভাবে ব্যাখ্যা করুন।

Verse 4

चतस्रो विहिता भार्या ब्राह्म॒णस्य पितामह । ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्या शूद्रा च रतिमिच्छत:

পিতামহ! ব্রাহ্মণের জন্য শাস্ত্রে চার প্রকার স্ত্রী বিধিত—ব্রাহ্মণী, ক্ষত্রিয়া, বৈশ্যা ও শূদ্রা; এদের মধ্যে শূদ্রা কেবল রতি-ইচ্ছুক কামী পুরুষের জন্য নির্দিষ্ট।

Verse 5

तत्र जातेषु पुत्रेषु सर्वासां कुरुसत्तम | आनुपूर्व्येण कस्तेषां पित्रयं दायादमर्हति,कुरुश्रेष्ठ! इन सबके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हुए हों, उनमेंसे कौन क्रमश: पैतृक धनको पानेका अधिकारी है?

কুরুশ্রেষ্ঠ! ঐ সকল পত্নীর গর্ভে যে পুত্রগণ জন্মেছে, তাদের মধ্যে ক্রমানুসারে কে পৈতৃক ধনের অধিকারী হয়?

Verse 6

केन वा किं ततो हार्य पितृवित्तात्‌ पितामह । एतदिच्छामि कथितं विभागस्तेषु य: स्मृत:

পিতামহ! কোন নিয়মে, এবং পিতৃধন থেকে কোন পুত্রের কত অংশ গ্রহণীয়? তাদের জন্য স্মৃতিতে যে বিভাগ নির্ধারিত, তা আপনার মুখে শুনতে চাই।

Verse 7

भीष्म उवाच ब्राह्मण: क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातय: । एतेषु विहितो धर्मों ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर

ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! ব্রাহ্মণ, ক্ষত্রিয় ও বৈশ্য—এই তিন বর্ণই ‘দ্বিজাতি’ নামে পরিচিত; অতএব ধর্মানুসারে ব্রাহ্মণের বিবাহ এই তিনের মধ্যেই বিধিত।

Verse 8

वैषम्यादथवा लोभात्‌ कामाद्‌ वापि परंतप । ब्राह्मणस्य भवेच्छूद्रा न तु दृष्टान्तत: स्मृता

ভীষ্ম বললেন—হে পরন্তপ! পক্ষপাত, লোভ অথবা কামনার বশে কোনো শূদ্রা নারী ব্রাহ্মণের পত্নী হতে পারে; কিন্তু শাস্ত্রে এটিকে অনুমোদিত দৃষ্টান্ত বা বিধি বলে স্মরণ করা হয় না।

Verse 9

शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम्‌ । प्रायश्षित्तीयते चापि विधिदृष्टेन कर्मणा

ভীষ্ম বললেন—যদি কোনো ব্রাহ্মণ শূদ্রা নারীকে শয্যায় আরোপ করে (অর্থাৎ নিষিদ্ধ সঙ্গ করে), তবে সে অধোগতি প্রাপ্ত হয়; তবু বিধি-নির্দিষ্ট কর্ম দ্বারা প্রায়শ্চিত্ত করলে সে শুদ্ধও হতে পারে।

Verse 10

आपसट्यमानमृक्थं तु सम्प्रवक्ष्यामि भारत

ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! এখন আমি সেই উত্তরাধিকার-সম্পত্তির কথা বলব, যা মিথ্যার আশ্রয়ে অন্যায়ভাবে আত্মসাৎ করা হচ্ছে।

Verse 11

लक्षण्यं गोवृषो यान॑ यत्‌ प्रधानतमं भवेत्‌ । ब्राह्माण्यास्तद्धरेत्‌ पुत्र एकांशं वै पितुर्धनात्‌

ভীষ্ম বললেন—গাভী, বলদ বা যানবাহন প্রভৃতির মধ্যে যা সর্বাধিক প্রধান ও বিশিষ্ট দানবস্তু, পুত্র তা ব্রাহ্মণীকে দেওয়ার জন্য পৃথক করে রাখবে; পিতৃধনের মধ্যে সেটিই তার এক অংশ।

Verse 12

शेष तु दशधा कार्य ब्राह्मणस्वं युधिष्ठिर । तत्र तेनैव हर्तव्याक्ष॒त्वारों3शा: पितुर्धनात्‌

ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! অবশিষ্ট ধন ব্রাহ্মণদের সম্পত্তি বলে ধরে দশ ভাগে বিন্যস্ত করা হোক; এবং সেখান থেকে সেই একই ব্যক্তি পিতৃধনের চার অংশ গ্রহণ করবে।

Verse 13

भरतनन्दन! अब मैं ब्राह्मण आदि वर्णोकी कन्याओंके गर्भसे उत्पन्न होनेवाले पुत्रोंकी पैतृक धनका जो भाग प्राप्त होता है

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতনন্দন! এখন আমি ব্রাহ্মণ প্রভৃতি বর্ণের কন্যাদের গর্ভে জন্ম নেওয়া পুত্রদের পিতৃসম্পত্তিতে যে যে অংশ প্রাপ্য, তা বলছি। ব্রাহ্মণের ব্রাহ্মণী পত্নীর গর্ভে জন্মানো পুত্র প্রথমেই গৃহাদি, বলদ, বাহন এবং যা কিছু সর্বোত্তম দ্রব্য—অর্থাৎ পিতৃধনের প্রধান অংশ—নিজ অধিকারে গ্রহণ করবে। তারপর, হে যুধিষ্ঠির, অবশিষ্ট ধন দশ ভাগে বিভক্ত হবে; এবং সেই পিতৃধন থেকে ব্রাহ্মণীপুত্র পুনরায় চার ভাগ গ্রহণ করবে। ক্ষত্রিয়া নারীর গর্ভে জন্মানো পুত্রও নিঃসন্দেহে ব্রাহ্মণ; মাতার বিশেষ মর্যাদার কারণে সে তিন ভাগ গ্রহণের অধিকারী।

Verse 14

वर्णे तृतीये जातस्तु वैश्यायां ब्राह्णादपि । द्विरंशस्तेन हर्तव्यो ब्राह्मणस्वाद्‌ युधिष्ठिर

ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! তৃতীয় বর্ণের নারী—বৈশ্যা—তার গর্ভে ব্রাহ্মণ পিতার যে পুত্র জন্মায়, তাকে ব্রাহ্মণের সম্পত্তি থেকে দ্বিগুণ অংশ দিতে হবে।

Verse 15

शूद्रायां ब्राह्म॒णाज्जातो नित्यादेयधन: स्मृतः । अल्पं चापि प्रदातव्यं शूद्रापुत्राय भारत

ভীষ্ম বললেন—শূদ্রা নারীর গর্ভে ব্রাহ্মণ থেকে জন্মানো পুত্রকে শাস্ত্রে ‘নিত্য-আদেয়-ধন’ বলে স্মরণ করা হয়। আর, হে ভারত, শূদ্রের পুত্রকে দান করলেও অল্পই দান করা উচিত।

Verse 16

भारत! ब्राह्मणसे शूद्रामें जो पुत्र उत्पन्न होता है, उसे तो धन न देनेका ही विधान है तो भी शूद्राके पुत्रको पैतृक धनका स्वल्पतम भाग--एक अंश दे देना चाहिये ।।

ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! ব্রাহ্মণ থেকে শূদ্রা নারীর গর্ভে যে পুত্র জন্মায়, তাকে সম্পত্তি না দেওয়াই বিধান; তবু শূদ্রের পুত্রকে পিতৃসম্পত্তির সর্বনিম্ন অংশ—এক ভাগ—দেওয়া উচিত। ধন দশ ভাগে বিভক্ত হলে এটাই ক্রম। কিন্তু সমবর্ণ নারীদের গর্ভে জন্মানো পুত্রদের ক্ষেত্রে সকলের জন্য সমান অংশ নির্ধারণ করতে হবে।

Verse 17

अब्राह्माणं तु मन्यन्ते शूद्रापुत्रमनैपुणात्‌ । त्रिषु वर्णेषु जातो हि ब्राह्मणाद्‌ ब्राह्मणो भवेत्‌

ভীষ্ম বললেন—শূদ্রা নারীর গর্ভে ব্রাহ্মণ থেকে জন্মানো পুত্রকে তারা ব্রাহ্মণ বলে মানে না; কারণ তার মধ্যে ব্রাহ্মণোচিত নৈপুণ্য ও শিষ্টতা দেখা যায় না। কিন্তু অন্য তিন বর্ণের নারীদের গর্ভে ব্রাহ্মণ দ্বারা যে পুত্র জন্মায়, সে ব্রাহ্মণই গণ্য হয়।

Verse 18

स्मृताश्न वर्णाक्षत्वार: पञचमो नाधिगम्यते । हरेच्च दशमं भागं शूद्रापुत्र: पितुर्धनात्‌,चार ही वर्ण बताये हैं, पाँचवाँ वर्ण नहीं मिलता। शूद्राका पुत्र ब्राह्मण पिताके धनसे उसका दसवाँ भाग ले सकता है

স্মৃতিতে চারটি বর্ণই স্বীকৃত; পঞ্চম বর্ণ গ্রহণীয় নয়। শূদ্রা নারীর গর্ভে ব্রাহ্মণ-পিতৃক পুত্র হলে, সে পিতৃধন থেকে দশমাংশ গ্রহণ করতে পারে।

Verse 19

तत्तु दत्त हरेत्‌ पित्रा नादत्तं हर्तुमहति । अवश्यं हि धन देयं शूद्रापुत्राय भारत

পিতা যা দান করেছেন, কেবল তাই সে গ্রহণ করবে; যা দান করা হয়নি, তা নেওয়ার অধিকার তার নেই। তবু, হে ভারত, শূদ্রা-পুত্রকে ধনের অংশ অবশ্যই দিতে হবে।

Verse 20

आनुृशंस्यं परो धर्म इति तस्मै प्रदीयते । यत्र तत्र समुत्पन्नं गुणायैवोपपद्यते,दया सबसे बड़ा धर्म है। यह समझकर ही उसे धनका भाग दिया जाता है। दया जहाँ भी उत्पन्न हो, वह गुणकारक ही होती है

‘করুণাই পরম ধর্ম’—এই বোধে তাকে অংশ দেওয়া হয়। করুণা যেখানে-সেখানে, যে অবস্থাতেই জন্মাক, তা অবশ্যম্ভাবীভাবে গুণ ও পুণ্যই সাধন করে।

Verse 21

यद्यप्येष सपुत्र: स्यादपुत्रो यदि वा भवेत्‌ । नाधिकं दशमादू दद्याच्छूद्रापुत्राय भारत,भारत! ब्राह्मणके अन्य वर्णकी स्त्रियोंसे पुत्र हों या न हों, वह शूद्राके पुत्रको दसवें भागसे अधिक धन न दे

হে ভারত! ব্রাহ্মণের পুত্র থাকুক বা না থাকুক, শূদ্রা-পুত্রকে দশমাংশের বেশি ধন দান করা উচিত নয়।

Verse 22

त्रैवार्षिकादू यदा भक्तादथिकं स्याद्‌ द्विजस्य तु | यजेत तेन द्रव्येण न वृथा साधयेद्‌ धनम्‌

যখন কোনো দ্বিজের কাছে তিন বছরের ভরণপোষণের চেয়ে বেশি সম্পদ-অন্ন সঞ্চিত হয়, তখন সে সেই দ্ৰব্য দিয়ে যজ্ঞ করুক; বৃথা ধন সঞ্চয় না করুক।

Verse 23

त्रिसहस्रपरो दाय: स्त्रियै देयो धनस्य वै | भर्त्रां तच्च धन दत्तं यथाहई भोक्तुमरहति,सत्रीको तीन हजारसे अधिक लागतका धन नहीं देना चाहिये। पतिके देनेपर ही उस धनको वह यथोचित रूपसे उपभोगमें ला सकती है

ভীষ্ম বললেন—স্ত্রীর জন্য পরিবার-ধন থেকে নির্ধারিত দান তিন হাজারের অধিক হওয়া উচিত নয়। আর স্বামী যে ধন তাকে প্রদান করেন, সে ধন সে শাস্ত্রসম্মত রীতি ও প্রয়োজন অনুসারে যথোচিতভাবে ভোগ ও ব্যবহার করার অধিকারিণী।

Verse 24

स्‍त्रीणां तु पतिदायाद्यमुपभोगफल स्मृतम्‌ | नापहारं स्त्रिय: कुर्यु: पतिवित्तात्‌ कथंचन

ভীষ্ম বললেন—স্ত্রীদের ক্ষেত্রে স্বামীর সম্পত্তি থেকে যে অংশ তাদের প্রাপ্য, তার ফল প্রধানত ভোগ ও ব্যবহার বলেই স্মৃতিতে বলা হয়েছে। অতএব স্বামীর ধন থেকে তাদের প্রাপ্য কোনোভাবেই কেড়ে নেওয়া উচিত নয়। আর যে ধন ‘স্ত্রীধন’ রূপে দেওয়া হয়েছে, তা পুত্রাদি উত্তরাধিকারীরা কখনো গ্রহণ করবে না।

Verse 25

स्त्रियास्तु यद्‌ भवेत्‌ वित्तं पित्रा दत्तं युधिष्ठिर । ब्राह्मण्यास्तद्धरेत्‌ कन्या यथा पुत्रस्तथा हि सा

ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! কোনো নারীর পিতৃদত্ত যে ধন থাকে, সে যদি ব্রাহ্মণী হয় তবে তার কন্যা সেই ধন গ্রহণ করতে পারে; কারণ এ বিষয়ে কন্যাও পুত্রের সমান গণ্য।

Verse 26

सा हि पुत्रसमा राजन्‌ विहिता कुरुनन्दन । एवमेव समुद्दिष्टो धर्मो वै भरतर्षभ । एवं धर्ममनुस्मृत्य न वृथा साधयेद्‌ धनम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, হে কুরুনন্দন! শাস্ত্রবিধানে কন্যা পুত্রসমা। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! এইভাবেই ধনবিভাগের ধর্ম নির্দেশিত হয়েছে। এই ধর্ম স্মরণ করে মানুষ যেন ধন সঞ্চয় ও উপার্জন বৃথা না করে; যজ্ঞ-যাগাদি পবিত্র ক্রিয়ার দ্বারা তাকে ফলবান করুক।

Verse 27

युधिछिर उवाच शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातो यद्यदेयधन: स्मृत: । केन प्रतिविशेषेण दशमो<प्यस्य दीयते

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! যদি ব্রাহ্মণ থেকে শূদ্রা নারীতে জন্মানো পুত্রকে ধন দেওয়ার অযোগ্য বলা হয়ে থাকে, তবে কোন বিশেষ কারণে তাকে পৈতৃক ধনের দশমাংশও দেওয়া হয়?

Verse 28

ब्राह्मण्यां ब्राह्मणाज्जातो ब्राह्मण: स्यान्न संशय: । क्षत्रियायां तथैव स्याद्‌ वैश्यायामपि चैव हि

যুধিষ্ঠির বললেন— ব্রাহ্মণী নারীর গর্ভে ব্রাহ্মণ পিতার ঔরসে জন্মানো পুত্র নিঃসন্দেহে ব্রাহ্মণ। তদ্রূপ ক্ষত্রিয়া বা বৈশ্যা নারীর গর্ভে জন্মালেও সে ব্রাহ্মণ বলেই গণ্য হয়।

Verse 29

कस्मात्‌ तु विषमं भागं भजेरन्‌ नृपसत्तम | यदा सर्वे त्रयो वर्णास्त्वियोक्ता ब्राह्मणा इति

যুধিষ্ঠির বললেন— হে নৃপশ্রেষ্ঠ! যখন আপনি বলেছেন যে ব্রাহ্মণ প্রভৃতি তিন বর্ণের নারীদের গর্ভে জন্মানো পুত্রেরা ব্রাহ্মণই, তবে তারা কেন পৈতৃক ধনে অসম অংশ গ্রহণ করবে? কেন সমান ভাগ পাবে না?

Verse 30

भीष्म उवाच दारा इत्युच्यते लोके नाम्नैकेन परंतप । प्रोक्तेन चैव नाम्नायं विशेष: सुमहान्‌ भवेत्‌

ভীষ্ম বললেন— হে পরন্তপ রাজন! লোকব্যবহারে সকল স্ত্রীলোককে এক নামেই ‘দারা’ বলা হয়; কিন্তু এই নাম-প্রয়োগ থেকেই (তাদের সন্তানদের মধ্যে) এক মহৎ ভেদ স্বীকৃত হয়ে যায়।

Verse 31

तिस््र: कृत्वा पुरो भार्या: पश्चाद्‌ विन्देत ब्राह्मणीम्‌ ।। सा ज्येष्ठा सा च पूज्या स्यात्‌ सा च भार्या गरीयसी

ভীষ্ম বললেন— প্রথমে তিন স্ত্রী গ্রহণ করে পরে ব্রাহ্মণীকে বিবাহ করা উচিত। সে-ই জ্যেষ্ঠা, সে-ই পূজ্যা, এবং স্ত্রীদের মধ্যে সে-ই সর্বাধিক গৌরবশালিনী।

Verse 32

ब्राह्मण पहले अन्य तीनों वर्णोकी स्त्रियोंको ब्याह लानेके पश्चात्‌ भी यदि ब्राह्मणकन्यासे विवाह करे तो वही अन्य स्त्रियोंकी अपेक्षा ज्येष्ठ, अधिक आदर-सत्कारके योग्य तथा विशेष गौरवकी अधिकारिणी होगी ।।

ভীষ্ম বললেন— ব্রাহ্মণ যদি প্রথমে অন্য তিন বর্ণের স্ত্রীদের বিবাহ করে, পরে ব্রাহ্মণ-কন্যাকে বিবাহ করে, তবে সেই ব্রাহ্মণীই জ্যেষ্ঠা গণ্য হবে; সে-ই অধিক পূজ্যা এবং বিশেষ গৌরবের অধিকারিণী। স্বামীর স্নান করানো, সাজসজ্জার উপকরণ প্রস্তুত করা, দাঁত পরিষ্কারের জন্য দাতন-মঞ্জন দেওয়া, চোখে অঞ্জন লাগানো, নিত্য হোম-আরাধনার জন্য হব্য এবং পিতৃকার্যের জন্য কব্য-সামগ্রী সংগ্রহ করা, এবং গৃহে যে অন্য ধর্মসম্মত কর্ম হয় তাতে সহায়তা করা—এ সবই ব্রাহ্মণ-গৃহে ব্রাহ্মণীর কর্তব্য। তিনি উপস্থিত থাকলে অন্য বর্ণের স্ত্রীর এ কর্ম করার অধিকার নেই।

Verse 33

न तस्यां जातु तिष्ठन्त्यामन्या तत्‌ कर्तुमहति । ब्राह्मणी त्वेव कुर्याद्‌ वा ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर

ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! ব্রাহ্মণী (স্ত্রী) উপস্থিত থাকলে অন্য কোনো নারীর সে কর্তব্য পালনের অধিকার নেই। ব্রাহ্মণ স্বামীর জন্য শাস্ত্রবিধি অনুযায়ী সেবা—স্নান করানো, শৃঙ্গার-সামগ্রী প্রদান, দন্তধাবনের জন্য দাতুন-মঞ্জন দেওয়া, নয়নে অঞ্জন লাগানো, নিত্য হোম-পূজায় হব্য-কব্যের উপকরণ জোগাড় করা এবং গৃহের অন্যান্য ধর্মকর্মে সহায়তা—এসব ব্রাহ্মণীকেই করতে হয়।

Verse 34

अन्न पानं च माल्यं च वासांस्याभरणानि च । ब्राह्मण्यैतानि देयानि भर्तु: सा हि गरीयसी

ভীষ্ম বললেন—অন্ন-পান, মালা, বস্ত্র ও অলংকার—এসবই স্বামীর কাছে ব্রাহ্মণীই নিবেদন করবে; কারণ এই কর্তব্যে সে-ই সকল নারীর মধ্যে অধিক সম্মানযোগ্য।

Verse 35

मनुनाभिद्िितं शास्त्र यच्चापि कुरुनन्दन । तत्राप्येष महाराज दृष्टो धर्म: सनातन:,महाराज कुरुनन्दन! मनुने भी जिस धर्मशास्त्रका प्रतिपादन किया है, उसमें भी यही सनातन धर्म देखा गया है

ভীষ্ম বললেন—হে কুরু-নন্দন মহারাজ! মনুপ্রণীত শাস্ত্রেও এই একই সনাতন ধর্মই দেখা যায়।

Verse 36

अथ चेदन्यथा कुर्याद्‌ यदि कामाद्‌ युधिष्ठिर । यथा ब्राह्मण चाण्डाल: पूर्वदृष्टस्तथैव स:

ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! যদি কোনো ব্রাহ্মণ কামবশত শাস্ত্রবিধির বিপরীতে আচরণ করে, তবে সে পূর্বে বর্ণিত ‘ব্রাহ্মণ-চাণ্ডাল’-এরই সমান গণ্য হয়।

Verse 37

ब्राह्मण्या: सदृश: पुत्र: क्षत्रियायाश्व यो भवेत्‌ राजन्‌ विशेषो यस्त्वत्र वर्णयोरुभयोरपि,राजन! ब्राह्मणके समान ही जो क्षत्रियाका पुत्र होगा, उसमें भी उभयवर्णसम्बन्धी अन्तर तो रहेगा ही

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! ক্ষত্রিয়া নারীর গর্ভে জন্ম নেওয়া পুত্র গুণে ব্রাহ্মণের সদৃশ হলেও, এখানে উভয় বর্ণ-সম্পর্কিত এক বিশেষ ভেদ অবশ্যম্ভাবীভাবে থাকে।

Verse 38

न तु जात्या समा लोके ब्राह्याण्या: क्षत्रिया भवेत्‌ ब्राह्माण्या: प्रथम: पुत्रो भूयान्‌ स्थाद्‌ राजसत्तम

ভীষ্ম বললেন—হে রাজশ্রেষ্ঠ! এই জগতে জন্ম-মর্যাদায় ক্ষত্রিয়া ব্রাহ্মণীর সমান নয়। ব্রাহ্মণীর জ্যেষ্ঠপুত্রকেই অধিক শ্রেষ্ঠ বলে গণ্য করা উচিত।

Verse 39

यथा न सदृशी जात_ु ब्राह्म॒ण्या: क्षत्रिया भवेत्‌

ভীষ্ম বললেন—যেমন ক্ষত্রিয়া কখনও ব্রাহ্মণীর সত্যিকার সমান হতে পারে না।

Verse 40

श्रीक्ष राज्यं च कोशकश्ष क्षत्रियाणां युधिषछ्ठिर

ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! শাস্ত্রে লক্ষ্মী, রাজ্য ও রাজকোষ—এ সবই ক্ষত্রিয়ের কর্তব্য-অধিকাররূপে বিধিত। স্বধর্ম অনুসারে ক্ষত্রিয় সমুদ্রপর্যন্ত পৃথিবীর অধিপত্য ও বিপুল সম্পদ লাভ করতে পারে। হে নরেশ্বর! রাজা—যিনি ক্ষত্রিয়—দণ্ডধারী; ক্ষত্রিয় ব্যতীত অন্য কারও দ্বারা প্রকৃত রক্ষা-কার্য সম্পন্ন হয় না।

Verse 41

विहितं दृश्यते राजन्‌ सागरान्तां च मेदिनीम्‌ | क्षत्रियो हि स्वधर्मेण श्रियं प्राप्रोति भूयसीम्‌ । राजा दण्डधरो राजन रक्षा नान्यत्र क्षत्रियात्‌

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! শাস্ত্রে সমুদ্রপর্যন্ত পৃথিবীর অধিকার ক্ষত্রিয়ের জন্য বিধিত বলে দেখা যায়। ক্ষত্রিয় স্বধর্মে স্থিত থেকে মহৎ শ্রী-সমৃদ্ধি লাভ করে। হে রাজন! রাজা দণ্ডধারী; ক্ষত্রিয় ব্যতীত অন্য কোথাও থেকে রক্ষা সম্ভব নয়—হে যুধিষ্ঠির!

Verse 42

ब्राह्मणा हि महाभागा देवानामपि देवता: । तेषु राजन्‌ प्रवर्तेत पूजया विधिपूर्वकम्‌,राजन! महाभाग! ब्राह्मण देवताओंके भी देवता हैं; अतः उनका विधिपूर्वक पूजन- आदर-सत्कार करते हुए ही उनके साथ बर्ताव करे

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, মহাভাগ! ব্রাহ্মণরা দেবতাদেরও দেবতা। অতএব, হে রাজা, তাদের প্রতি বিধিপূর্বক পূজা-সম্মানসহ আচরণ করো; শ্রদ্ধায় সেবা ও আদর করো।

Verse 43

प्रणीतमृषिभिर्ज्ञात्वा धर्म शाश्वतमव्ययम्‌ । लुप्यमान स्वधर्मेण क्षत्रियो होष रक्षति,ऋषियोंद्वारा प्रतिपादित अविनाशी सनातन धर्मको लुप्त होता जानकर क्षत्रिय अपने धर्मके अनुसार उसकी रक्षा करता है

ভীষ্ম বললেন—ঋষিদের দ্বারা প্রতিষ্ঠিত শাশ্বত, অব্যয় ধর্মকে জেনে এবং তা লুপ্ত হতে দেখলে, ক্ষত্রিয় নিজ স্বধর্ম অনুসারে তার রক্ষা করে, হে রাজন।

Verse 44

दस्युभि्दियमाणं च धन दारांश्व॒ सर्वश: । सर्वेषामेव वर्णानां त्राता भवति पार्थिव:,डाकुओंद्वारा लूटे जाते हुए सभी वर्णोके धन और स्त्रियोंका राजा ही रक्षक होता है

ভীষ্ম বললেন—যখন দস্যুরা সর্বপ্রকারে ধন ও নারীদের হরণ করে নিয়ে যায়, তখন সকল বর্ণের রক্ষক রাজাই হন।

Verse 45

भूयान्‌ स्यात्‌ क्षत्रियापुत्रो वैश्यापुत्रान्न संशय: । भूयस्तेनापि हर्तव्यं पितृवित्ताद्‌ युधिष्ठिर

ভীষ্ম বললেন—ক্ষত্রিয়ের পুত্র বৈশ্যের পুত্রের চেয়ে শ্রেষ্ঠ—এতে সন্দেহ নেই। অতএব, হে যুধিষ্ঠির, অবশিষ্ট পিতৃধন থেকে তারও অধিক অংশ প্রাপ্য।

Verse 46

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके प्रसंगमें स्त्रीकी प्रशंभानामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

যুধিষ্ঠির বললেন—হে রাজন, হে পিতামহ! আপনি ব্রাহ্মণের ধন-বিভাগের বিধি যথাযথভাবে বলেছেন। তবে অন্যান্য বর্ণের ধন-বণ্টনের নিয়ম কী হবে?

Verse 47

भीष्म उवाच क्षत्रियस्यापि भायें द्वे विहिते कुरुनन्दन । तृतीया च भवेच्छूद्रा न तु दृष्टान्तत: स्मृता

ভীষ্ম বললেন—হে কুরু-নন্দন! ক্ষত্রিয়ের জন্যও শাস্ত্রে দুই বর্ণের দুই স্ত্রী বিধিবদ্ধ। তৃতীয় স্ত্রী শূদ্রাও হতে পারে; কিন্তু শাস্ত্রে তা আদর্শ দৃষ্টান্তরূপে স্মৃত নয়।

Verse 48

एष एव क्रमो हि स्यात्‌ क्षत्रियाणां युधिष्ठिर अष्टधा तु भवेत्‌ कार्य क्षत्रियस्वं जनाधिप,राजा युधिष्ठिर! क्षत्रियोंके लिये भी बँटवारेका यही क्रम है। क्षत्रियके धनको आठ भागोंमें विभक्त करना चाहिये

ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির, ক্ষত্রিয়দের ক্ষেত্রেও এই-ই বিধি-ক্রম। হে জনাধিপ, ক্ষত্রিয়ের ধন আট ভাগে বিভক্ত করা উচিত।

Verse 49

क्षत्रियाया हरेत्‌ पुत्रश्नतुरोंडशान्‌ पितुर्धनात्‌ । युद्धावहारिकं यच्च पितु: स्थात्‌ स हरेत्‌ तु तत्‌

ভীষ্ম বললেন—ক্ষত্রিয়ের পুত্র পিতৃধন থেকে চার ভাগ গ্রহণ করবে; আর পিতার যে যুদ্ধোপকরণ ও সমর-সামগ্রী আছে, সেগুলিও সে-ই গ্রহণ করবে।

Verse 50

वैश्यापुत्रस्तु भागांस्त्रीन्‌ शूद्रापुत्रस्तथाष्टमम्‌ । सो<पि दत्तं हरेत्‌ पित्रा नादत्तं हर्तुमहति

ভীষ্ম বললেন—বৈশ্যা নারীর পুত্র তিন ভাগ পাবে, আর শূদ্রা নারীর পুত্র পাবে অষ্টম ভাগ। তাও পিতা যা দান করেন তাই গ্রহণ করবে; যা দান করা হয়নি, তা নেওয়ার অধিকার তার নেই।

Verse 51

एकैव हि भवेद्‌ भार्या वैश्यस्य कुरुनन्दन । द्वितीया तु भवेत्‌ शूद्रा न तु दृष्टान्ततः स्मृता

ভীষ্ম বললেন—হে কুরু-নন্দন, বৈশ্যের জন্য বিধিসম্মত স্ত্রী একটিই—বৈশ্য বর্ণের। দ্বিতীয়া স্ত্রী শূদ্রা হতে পারে বটে, কিন্তু শাস্ত্রে তা আদর্শ দৃষ্টান্তরূপে স্মৃত নয়।

Verse 52

वैश्यस्य वर्तमानस्य वैश्यायां भरतर्षभ । शूद्रायां चापि कौन्तेय तयोविनियम: स्मृत:

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ, হে কৌন্তেয়, গৃহস্থাশ্রমে অবস্থানকারী বৈশ্যের যদি বৈশ্যা ও শূদ্রা—উভয়ের গর্ভে পুত্র জন্মে, তবে তাদের জন্যও ধন-বণ্টনের সেই-ই বিধান স্মৃত।

Verse 53

पज्चधा तु भवेत्‌ कार्य वैश्यस्वं भरतर्षभ । तयोरपत्ये वक्ष्यामि विभागं च जनाधिप

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! বৈশ্যের কর্তব্য ও কার্য পাঁচ ভাগে বিভক্ত করে স্থির করা উচিত। আর হে রাজন, তাদের সন্তানদের বিষয়েও যথাযথ বিভাগ ও বণ্টন আমি বলছি।

Verse 54

भरतभूषण नरेश! वैश्यके धनको पाँच भागोंमें विभक्त करना चाहिये। फिर वैश्या और शूद्राके पुत्रोमें उस धनका विभाजन कैसे करना चाहिये, यह बताता हूँ ।।

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতনন্দন! বৈশ্য পিতার ধন থেকে বৈশ্যা-জাত পুত্র চার ভাগ গ্রহণ করবে; আর হে ভারত, শূদ্রা-জাত পুত্রের জন্য পঞ্চম ভাগ স্মৃতিতে নির্দিষ্ট।

Verse 55

सो5पि दत्तं हरेत्‌ पित्रा नादत्तं हर्तुमरहति । त्रिभिर्वर्ण: सदा जात: शूद्रोडदेयधनो भवेत्‌

ভীষ্ম বললেন—সেও পিতার প্রদত্তই গ্রহণ করতে পারে; যা দেওয়া হয়নি, তা গ্রহণ করার অধিকার তার নেই। তিন উচ্চ বর্ণের সংকর থেকে জন্ম শূদ্রকে সাধারণত এমনই ধরা হয় যে তাকে ধন দেওয়া বা অর্পণ করা উচিত নয়।

Verse 56

शूद्रस्य स्थात्‌ सवर्णव भार्या नान्या कथंचन । समभागाश्र पुत्रा: स्युर्यदि पुत्रशतं भवेत्‌

ভীষ্ম বললেন—শূদ্রের স্ত্রী অবশ্যই তারই বর্ণের হবে; অন্য কোনোভাবে নয়। আর তার পুত্রেরা, তারা শতজন হলেও, পৈতৃক ধনে সমান ভাগের অধিকারী।

Verse 57

जातानां समवर्णाया: पुत्राणामविशेषत: । सर्वेषामेव वर्णानां समभागो धनात्‌ स्मृत:,समस्त वर्णोके सभी पुत्रोंका, जो समान वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुए हैं, सामान्यतः: पैतृक धनमें समान भाग माना गया है

ভীষ্ম বললেন—সমবর্ণা স্ত্রীর গর্ভে জন্ম পুত্রদের ক্ষেত্রে কোনো ভেদ না করে পৈতৃক ধনে সমান ভাগ স্মৃতিতে স্বীকৃত; এবং এই বিধান সব বর্ণের জন্যই প্রযোজ্য বলে স্মরণ করা হয়।

Verse 58

ज्येष्ठस्य भागो ज्येष्ठ: स्थादेकांशो यः प्रधानत: । एष दायविदधि: पार्थ पूर्वमुक्त: स्वयम्भुवा

কুন্তীনন্দন! জ্যেষ্ঠ পুত্রের অংশও জ্যেষ্ঠই গণ্য; প্রধানত সে এক অংশ অধিক পায়। পিতৃধন-বিভাগের এই বিধান প্রাচীনকালে স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মা নির্দেশ করেছিলেন।

Verse 59

समवर्णासु जातानां विशेषो<स्त्यपरो नृप । विवाहवैशिष्ट्यकृत: पूर्वपूर्वो विशिष्यते

নরেশ্বর! সমান বর্ণের স্ত্রীদের গর্ভে জন্মানো পুত্রদের মধ্যেও আরেকটি ভেদ আছে। বিবাহের বিশেষ মর্যাদার কারণে তাদের মধ্যেও ক্রম স্থাপিত হয়—প্রথম বিবাহের স্ত্রীর পুত্র শ্রেষ্ঠ, পরবর্তী বিবাহের স্ত্রীর পুত্র কনিষ্ঠ গণ্য।

Verse 60

हरेज्ज्येष्ठ: प्रधानांशमेकं तुल्यासु तेष्वपि | मध्यमो मध्यमं चैव कनीयांस्तु कनीयसम्‌

সমান মর্যাদার স্ত্রীদের গর্ভে জন্মানো পুত্রদের মধ্যেও জ্যেষ্ঠ পুত্র এক প্রধান (জ্যেষ্ঠ) অংশ গ্রহণ করুক; মধ্যম পুত্র মধ্যম অংশ, আর কনিষ্ঠ পুত্র কনিষ্ঠ অংশ গ্রহণ করুক।

Verse 61

एवं जातिषु सर्वासु सवर्ण: श्रेष्ठतां गत: । महर्षिरपि चैतद्‌ वै मारीच: काश्यपोडब्रवीत्‌

এইভাবে সকল জাতিতেই সমবর্ণা স্ত্রীর গর্ভে জন্মানো পুত্রই শ্রেষ্ঠ গণ্য। মরীচিপুত্র মহর্ষি কাশ্যপও এই নীতিই ঘোষণা করেছিলেন।

Verse 96

तत्र जातेष्वपत्येषु द्विगुणं स्यथाद्‌ युधिष्ठिर । शूद्रजातिकी स्त्रीको अपनी शय्यापर सुलाकर ब्राह्मण अधोगतिको प्राप्त होता है। साथ ही शास्त्रीय विधिके अनुसार वह प्रायश्चित्तका भागी होता है। युधिष्ठिर! शूद्राके गर्भसे संतान उत्पन्न करनेपर ब्राह्मणको दूना पाप लगता है और उसे दूने प्रायश्चित्तका भागी होना पड़ता है

যুধিষ্ঠির! শূদ্রজাতীয় নারীর সঙ্গে শয্যাসঙ্গ করলে ব্রাহ্মণ অধোগতি লাভ করে এবং শাস্ত্রবিধি অনুসারে প্রায়শ্চিত্তের অধিকারী হয়। শূদ্রের গর্ভে সন্তান উৎপন্ন করলে ব্রাহ্মণের পাপ দ্বিগুণ গণ্য হয় এবং প্রায়শ্চিত্তও দ্বিগুণ করতে হয়।

Verse 383

भूयो भूयो<5पि संहार्य: पितृवित्ताद्‌ युधिष्ठिर । क्षत्रियकन्या संसारमें अपनी जातिद्दारा ब्राह्मण-कन्याके बराबर नहीं हो सकती। नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार ब्राह्मणीका पुत्र क्षत्रियाके पुत्रसे प्रथम एवं ज्येष्ठ होगा। युधिष्ठिर! इसलिये पिताके धनमेंसे ब्राह्मणीके पुत्रको अधिक-अधिक भाग देना चाहिये

ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির, পিতৃধনের বণ্টনের সময় এই কথা বারবার মনে রাখতে হবে। লোকাচারে ক্ষত্রিয়কন্যা জন্মগত কারণে ব্রাহ্মণকন্যার সমান গণ্য হয় না। তদ্রূপ, রাজশ্রেষ্ঠ, ব্রাহ্মণী-জাত পুত্রকে ক্ষত্রিয়া-জাত পুত্রের তুলনায় পূর্বতন ও জ্যেষ্ঠ বলে মানা হয়। অতএব, যুধিষ্ঠির, পিতৃসম্পত্তি থেকে ব্রাহ্মণীর পুত্রকে অধিক অংশ দেওয়া উচিত।

Verse 396

क्षत्रियायास्तथा वैश्या न जातु सदृशी भवेत्‌ । जैसे क्षत्रिया कभी ब्राह्मणीके समान नहीं हो सकती वैसे ही वैश्या भी कभी क्षत्रियाके तुल्य नहीं हो सकती

যেমন ক্ষত্রিয়া কখনও ব্রাহ্মণীর সমান হতে পারে না, তেমনই বৈশ্যাও কখনও ক্ষত্রিয়ার তুল্য হতে পারে না।

Frequently Asked Questions

A livelihood-driven act (net fishing) unintentionally harms many fish and ensnares an ascetic; the dilemma is how to weigh economic activity against non-harm and the duties created by long shared residence with vulnerable beings.

Ethical responsibility is relational and cumulative: sustained proximity (saṃvāsa) generates protective obligations, and compassion can require limiting one’s gain when it produces avoidable suffering to co-inhabitants.

No explicit phalaśruti appears in the provided verses; the chapter functions as a didactic exemplum whose significance lies in framing later adjudication and in illustrating dharma through precedent rather than promised ritual merit.