
तीर्थवंशोपदेशः (Tīrtha-vaṃśa Upadeśa: Instruction on the Fruits of Sacred Waters)
Upa-parva: Tīrtha-vaṃśa (Angiras–Gautama Dialogue on Sacred Waters)
The chapter opens with Yudhiṣṭhira requesting a principled account of why seeing and bathing at tīrthas is considered beneficial. Bhīṣma replies by transmitting a tradition spoken by Aṅgiras, introduced through a secondary frame: Gautama approaches Aṅgiras in a forest hermitage and asks about the dharmic uncertainty concerning tīrthas and the exact fruits of bathing, including post-mortem outcomes. Aṅgiras responds with an extensive enumerative map of sacred rivers, lakes, confluences, mountains, and āśramas (e.g., Candrabhāgā, Vitastā, Puṣkara, Prabhāsa, Naimiṣa, Gaṅgādvāra, Prayāga, Narmadā, Devadāruvana, Citrakūṭa), assigning distinct results: removal of pāpa, attainment of svarga or specific lokas, ritual-equivalent fruits (Aśvamedha/Vājapeya/Puruṣamedha analogues), beauty, fame, fearlessness, and extraordinary attainments (e.g., antardhāna). The discourse consistently conditions these outcomes on regulated conduct—fasting durations (one night to a month), purity (śuci), sense-control, truthfulness, non-violence, and conquest of desire/anger/greed. It also introduces a doctrinal bridge: mental visitation can substitute for physical travel to difficult sites. The chapter ends with a phalaśruti asserting that hearing/reciting this Aṅgiras-taught ‘rahasya’ yields purification, auspicious rebirth, and upward destiny, and it outlines qualified modes of transmission (to dvijas, sādhus, kin, or disciplined students).
Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से विनयपूर्वक पूछते हैं—श्राद्ध के समय देवकार्य और पितृकार्य में ऋषियों ने जिन-जिन कर्मों का विधान किया है, उसका क्रम और रहस्य क्या है? → भीष्म विधि को सूक्ष्म अनुशासन में बाँधते हैं—पूर्वाह्न में देवकार्य, अपराह्न में पितृकार्य; शौच-स्नान, आचार-शुद्धि, समय-पालन, पात्र-चयन और दान की ‘उपपत्ति’ (उचित कारण/विधि) पर जोर देते हैं। वे चेताते हैं कि कालहीन, अशुद्ध या उलटे क्रम से किया गया दान-भोजन राक्षस-भाग बन जाता है, और श्राद्ध का फल विकृत हो जाता है। → विधि-भंग के दुष्परिणामों का तीखा उद्घोष—अस्नात ब्राह्मण द्वारा देव/पितृकार्य ग्रहण करना अधर्म के तुल्य बताया जाता है; अनुचित पात्र (जैसे ऋणकर्ता, सूदखोर, प्राणि-विक्रयवृत्ति वाले) और परस्त्री-अपहर्ता/परस्त्री-दूती जैसे आचरणों को नरकगामी कहा जाता है। यहाँ श्राद्ध केवल कर्मकाण्ड नहीं, नैतिक शुद्धि की कसौटी बन जाता है। → भीष्म तीनों वर्णों के संस्कार-विधान (जातकर्म आदि) और मंत्र-व्यवस्था का संकेत देकर समग्र धर्म-रचना को स्थिर करते हैं; फिर देवकार्य-पितृकार्य और दानधर्म का सार बताते हैं—विधि, समय, पात्र और शुद्धि से किया गया कर्म परलोक-कल्याणकारी है, और करुणा-जितक्रोध-बहुपुत्र-शतायुषी सद्गुणी पुरुष स्वर्गगामी होते हैं। → अगले उपदेश के लिए भूमि तैयार होती है—‘राक्षस-भाग’ से बचने हेतु भोजन-दान की सूक्ष्म शर्तें और पात्र-अपात्र के और भी भेद आगे कैसे निर्धारित होंगे?
Verse 1
युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! देवता और ऋषियोंने श्राद्धके समय देवकार्य तथा पितृकार्यमें जिस-जिस कर्मका विधान किया है, उसका वर्णन मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! শ্রাদ্ধকালে দেবকার্য ও পিতৃকার্যে দেবতা ও ঋষিগণ যে যে কর্মের বিধান করেছেন, তার বিধিবদ্ধ বিবরণ আমি আপনার মুখ থেকে শুনতে চাই।
Verse 2
भीष्म उवाच दैवं पौर्वाह्निकं कुर्यादपराह्ने तु पैतृकम् मड़लाचारसम्पन्न: कृतशौच: प्रयत्नवान्
ভীষ্ম বললেন—রাজন! পূর্বাহ্নে দেবসম্বন্ধীয় কর্ম ও দান করা উচিত, আর অপরাহ্নে পিতৃসম্বন্ধীয় কর্ম ও দান। স্নানাদি দ্বারা শুচি হয়ে, মঙ্গলাচারে সম্পন্ন এবং যত্নবান হয়ে এ সব পালন করতে হবে।
Verse 3
मनुष्याणां तु मध्याल्ले प्रदद्यादुपपत्तिभि: । कालहीनं तु यद् दानं तं भागं रक्षसां विदु:
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! মানুষের উচিত মধ্যাহ্নকালে যথোচিত বিধি মেনে দান করা। কিন্তু অসময়ে প্রদত্ত দানকে রাক্ষসদের অংশ বলে গণ্য করা হয়।
Verse 4
लड़घितं चावलीढं च कलिपूर्व च यत् कृतम् रजस्वलाभिदृष्टं च तं भागं रक्षसां विदु:
ভীষ্ম বললেন—যে খাদ্য কেউ লঙ্ঘন করেছে, চেটে দেখেছে, কলহ-বিবাদের মধ্যে প্রস্তুত হয়েছে, অথবা ঋতুমতী নারীর দৃষ্টিতে পড়েছে—তাকে রাক্ষসদের অংশ বলে ধরা হয়।
Verse 5
अवषुष्ट च यद् भुक्तमव्रतेन च भारत । परामृष्टं शुना चैव तं भागं रक्षसां विदु:
ভীষ্ম বললেন—হে ভারতনন্দন! যে অন্ন সম্পর্কে লোকসমক্ষে ঘোষণা করা হয়েছে, যা ব্রতহীন ব্যক্তি খেয়েছে, অথবা যা কুকুর স্পর্শ করেছে—তাও রাক্ষসদের অংশ বলে ধরা হয়।
Verse 6
केशकीटावपतित क्षुत॑ श्वभिरवेक्षितम् रुदितं चावधूतं च त॑ भागं रक्षसां विदु:
ভীষ্ম বললেন—যে অন্নে চুল বা কীট পড়েছে, যা হাঁচির দ্বারা দূষিত হয়েছে, যার দিকে কুকুরেরা তাকিয়েছে, এবং যা কান্না করতে করতে বা অবজ্ঞাভরে দেওয়া হয়েছে—তাও রাক্ষসদের অংশ বলে ধরা হয়।
Verse 7
निरोड्कारेण यद् भुक्तं सशस्त्रेण च भारत । दुरात्मना च यद् भुक्तं तं भागं रक्षसां विदु:
ভীষ্ম বললেন—হে ভারতনন্দন! যে অন্নে আগে এমন ব্যক্তি ভোজন করেছে যার অধিকার বা অনুমতি নেই, অথবা যা অস্ত্রধারী কিংবা দুষ্টচিত্ত ব্যক্তি ভোগ করেছে—তাকে রাক্ষসদের অংশ বলে জানা যায়।
Verse 8
परोच्छिष्टं च यद् भुक्तं परिभुक्त च यद् भवेत् । दैवे पित्रये च सततं त॑ भागं रक्षसां विदु:
ভীষ্ম বললেন—যে অন্ন অন্যের উচ্ছিষ্ট হয়ে গেছে, বা যেখান থেকে কেউ খেয়ে নিয়েছে, এবং দেবতা ও পিতৃগণের নির্দিষ্ট অংশ অর্পণ না করেই যা নিজে ভোগ করা হয়—দৈবকর্ম ও পিতৃকর্মে সেই অন্ন সর্বদা রাক্ষসদের ভাগ বলে গণ্য হয়।
Verse 9
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यच्छाद्ध॑ परिविष्यते । त्रिभिर्वर्णैर्नरश्रेष्ठ तं भागं रक्षसां विदु:
ভীষ্ম বললেন—হে নরশ্রেষ্ঠ! শ্রাদ্ধে যে অন্ন বৈদিক মন্ত্রবিহীন ও বিধিবিধানহীনভাবে পরিবেশন করা হয়, তিন বর্ণের লোকেরা তাকে রাক্ষসদের ভাগ বলে জানে।
Verse 10
आज्याहुतिं विना चैव यत्किंचित् परिविष्यते । दुराचारैश्व यद् भुक्त तं भागं रक्षसां विदु:
ভীষ্ম বললেন—ঘৃতাহুতি না দিয়ে যা কিছু পরিবেশন করা হয়, এবং যা দুরাচারীদের দ্বারা ভক্ষিত হয়—সে অংশকে রাক্ষসদের ভাগ বলে জেনো।
Verse 11
अत ऊर्ध्व विसर्गस्य परीक्षां ब्राह्मणे शूणु
ভীষ্ম বললেন—এখন থেকে দান ও ভোজনের উদ্দেশ্যে ব্রাহ্মণের পরীক্ষা কীভাবে করতে হয়, তা শোনো। হে রাজন! যে ব্রাহ্মণ আচরণ থেকে পতিত, যে জড়বুদ্ধি, অথবা যে উন্মত্ত—তারা দেবকার্য বা পিতৃকার্যে নিমন্ত্রণযোগ্য নয়।
Verse 12
यावन्त: पतिता विप्रा जडोन्मत्तास्तथैव च । दैवे वाप्यथ पित्रये वा राजन् ना्हन्ति केतनम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! যত ব্রাহ্মণ আচরণ থেকে পতিত, জড়বুদ্ধি কিংবা উন্মত্ত—তারা দেবকার্য হোক বা পিতৃকার্য, কোনো ক্ষেত্রেই নিমন্ত্রণযোগ্য নয়।
Verse 13
श्वित्री क्लीबश्व कुछ्ठी च तथा यक्ष्महतश्न यः । अपस्मारी च यश्चान्धो राजन् नाहन्ति केतनम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! যাদের শ্বেতদাগ (শ্বিত্রী), নপুংসকতা, কুষ্ঠ, রাজযক্ষ্মা, অপস্মার (মৃগী) বা অন্ধত্ব আছে—তাদের শ্রাদ্ধকর্মে নিমন্ত্রণযোগ্য গণ্য করা হয় না।
Verse 14
चिकित्सका देवलका वृथा नियमधारिण: । सोमविक्रयिणश्वैव राजन् नाहन्ति केतनम्,नरेश्वर! चिकित्सक या वैद्य, देवालयके पुजारी, पाखण्डी और सोमरस बेचनेवाले ब्राह्मण निमन्त्रण देने योग्य नहीं हैं
ভীষ্ম বললেন—হে নরেশ্বর! চিকিৎসক (বৈদ্য), দেবালয়-আশ্রিত পুরোহিত, বৃথা নিয়মধারী ভণ্ড তপস্বী, এবং সোমরস বিক্রেতা—এরা নিমন্ত্রণযোগ্য নয়।
Verse 15
गायना नर्तकाश्नैव प्लवका वादकास्तथा । कथका योधकाश्चैव राजन् नाहहन्ति केतनम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! গায়ক, নর্তক, কসরতকারী, বাদ্যকার, কথক (কথাবাচক) এবং যোদ্ধা-প্রশিক্ষক/মল্ল—এরা নিমন্ত্রণযোগ্য নয়।
Verse 16
राजन! जो गाते-बजाते, नाचते, खेल-कूदकर तमाशा दिखाते, व्यर्थकी बातें बनाते और पहलवानी करते हैं, वे भी निमन्त्रण पानेके अधिकारी नहीं हैं ।।
ভীষ্ম বললেন—হে নরেশ্বর! যারা শূদ্রদের জন্য যজ্ঞ করায়, যারা তাদের শিক্ষা দেয়, এবং যারা তাদের শিষ্য হয়ে তাদের কাছ থেকে শিক্ষা গ্রহণ করে—তারা শ্রাদ্ধাদি কর্মে নিমন্ত্রণযোগ্য নয়।
Verse 17
अनुयोक्ता च यो विप्रो अनुयुक्तश्चन भारत । नाहतस्तावघपि श्राद्ध ब्रहद्मविक्रयिणौ हि तो
ভীষ্ম বললেন—হে ভারতনন্দন! যে ব্রাহ্মণ পারিশ্রমিক নিয়ে পড়ায় এবং যে পারিশ্রমিক দিয়ে পড়ে—উভয়েই ব্রহ্মবিদ্যা (বেদবিদ্যা)-র বিক্রেতা; অতএব নির্দোষ হলেও তারা শ্রাদ্ধে অন্তর্ভুক্তির যোগ্য নয়।
Verse 18
अग्रणीर्य: कृत: पूर्व वर्णावरपरिग्रह: । ब्राह्मण: सर्वविद्योडपि राजन् नाहति केतनम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! যে ব্রাহ্মণ পূর্বে সমাজের অগ্রণী ছিল, কিন্তু পরে বর্ণ-ব্যবস্থার বিরুদ্ধভাবে (শূদ্র-স্ত্রী প্রভৃতির সঙ্গে) অনুচিত বিবাহ করে, সে সর্ববিদ্যায় পারদর্শী হলেও শ্রাদ্ধে নিমন্ত্রণযোগ্য নয়।
Verse 19
अनग्नयश्न ये विप्रा मृतनिर्यातकाश्न ये । स्तेनाश्न पतिताश्चैव राजन नाहन्ति केतनम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! যে ব্রাহ্মণরা অগ্নিহোত্র পালন করে না, যারা মৃতদেহ বহন করে জীবিকা নির্বাহ করে, যারা চৌর্যবৃত্তিতে আহার করে, এবং যারা পাপের ফলে পতিত হয়েছে—তারা শ্রাদ্ধে নিমন্ত্রণযোগ্য নয়।
Verse 20
अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपूर्वाश्न भारत । पत्रिकापूर्वपुत्राश्न श्राद्धे नाहन्ति केतनम्
ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! যেসব ব্রাহ্মণ পূর্বপরিচিত নয়, যারা দলবদ্ধ হয়ে নিজেদের নেতা বলে জাহির করে, এবং যারা পুত্রিকা-ধর্ম অনুসারে বিবাহিত কন্যার গর্ভে জন্ম নিয়ে মাতামহের গৃহে বাস করে (পুত্রিকা-পুত্র)—তারা শ্রাদ্ধে নিমন্ত্রণযোগ্য নয়।
Verse 21
ऋणकर्ता च यो राजन यश्न वार्धुषिको नर: । प्राणिविक्रयवृत्तिश्व राजन नाहन्ति केतनम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! যে ব্যক্তি ঋণগ্রস্ত হয়, যে সুদখোরি করে জীবিকা চালায়, এবং যে জীবজন্তুর ক্রয়-বিক্রয়কে পেশা করে—এমন লোকেরা, হে রাজন, সুনাম (কেতন) লাভ করে না।
Verse 22
राजन! जो ब्राह्मण रुपया-पैसा बढ़ानेके लिये लोगोंको ब्याजपर ऋण देता हो अथवा जो सस्ता अन्न खरीदकर उसे मँहगे भावपर बेचता और उसका मुनाफा खाता हो अथवा प्राणियोंके क्रय-विक्रयसे जीविका चलाता हो, ऐसे ब्राह्मण श्राद्धमें बुलाने योग्य नहीं हैं ।।
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! যে ব্রাহ্মণ ধনবৃদ্ধির জন্য সুদে ঋণ দেয়, অথবা সস্তায় শস্য কিনে চড়া দামে বিক্রি করে লাভ ভোগ করে, কিংবা জীবজন্তুর ক্রয়-বিক্রয়ে জীবিকা চালায়—তারা শ্রাদ্ধে নিমন্ত্রণযোগ্য নয়। আর হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যারা নারীর উপার্জনে চলে, যারা বারাঙ্গনার সঙ্গে সংশ্লিষ্ট (স্বামী/রক্ষক), এবং যারা গায়ত্রী-জপ ও সন্ধ্যা-বন্দনা ত্যাগ করেছে—তারাও শ্রাদ্ধে সম্মানসহ আসনে বসার যোগ্য নয়।
Verse 23
श्राद्धे दैवे च निर्दिष्टो ब्राह्मणो भरतर्षभ । दातुः प्रतिग्रहीतुश्न शृणुष्वानुग्रह पुन:
ভীষ্ম বললেন—হে ভারতশ্রেষ্ঠ! দেবযজ্ঞ ও শ্রাদ্ধকর্মে যেসব ব্রাহ্মণ বর্জনীয়, তাদের কথা পূর্বেই নির্দিষ্ট হয়েছে। এখন আবার শোনো—করুণাময় অনুগ্রহবশে—দানকারী ও গ্রহণকারীদের সেই গুণলক্ষণ বলছি, যাদের ক্ষেত্রে সাধারণ নিষেধ থাকলেও বিশেষ গুণের কারণে শ্রাদ্ধে গ্রহণযোগ্যতা স্বীকৃত হয়।
Verse 24
चीर्णव्रता गुणैर्युक्ता भवेयुर्येडपि कर्षका: । सावित्रीज्ञा: क्रियावन्तस्ते राजन् केतनक्षमा:
হে রাজন! যে ব্রাহ্মণরা ব্রতাচরণে স্থির, সদ্গুণে সমৃদ্ধ, বিধিনিষ্ঠ এবং সাবিত্রী (গায়ত্রী)-মন্ত্রের জ্ঞাতা—তারা জীবিকায় কৃষক হলেও শ্রাদ্ধে নিমন্ত্রণযোগ্য।
Verse 25
क्षात्रधर्मिणमप्याजी केतयेत् कुलजं द्विजम् । न त्वेव वणिजं तात श्राद्धे च परिकल्पयेत्
হে তাত! যে কুলীন ব্রাহ্মণ যুদ্ধে ক্ষাত্রধর্ম পালন করে, তাকেও শ্রাদ্ধে নিমন্ত্রণ করা উচিত; কিন্তু যে বাণিজ্য করে, তাকে শ্রাদ্ধে কখনোই অন্তর্ভুক্ত করা উচিত নয়।
Verse 26
अन्निहोत्री च यो विप्रो ग्रामवासी च यो भवेत् | अस्तेनश्वातिथिज्ञश्न स राजन् केतनक्षम:
হে রাজন! যে ব্রাহ্মণ অগ্নিহোত্র পালন করে, নিজ গ্রামে বাস করে, চুরি করে না এবং অতিথিসেবায় পারদর্শী—সে শ্রাদ্ধে নিমন্ত্রণযোগ্য।
Verse 27
सावित्रीं जपते यस्तु त्रिकालं भरतर्षभ । भिक्षावृत्ति: कियावांश्व स राजन् केतनक्षम:
হে ভারতশ্রেষ্ঠ নৃপতি! যে ব্যক্তি তিন সময়ে সাবিত্রী (গায়ত্রী) জপ করে, ভিক্ষায় জীবিকা নির্বাহ করে এবং বিধিনিষ্ঠ—সে শ্রাদ্ধে নিমন্ত্রণ পাওয়ার যোগ্য।
Verse 28
उदितास्तमितो यश्व तथैवास्तमितोदित: । अहिंस्नश्वाल्पदोषश्न स राजन् केतनक्षम:
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! যে ব্রাহ্মণ কখনও উন্নত, কখনও অবনত, আবার উন্নত হয়—তবু কোনো প্রাণীর হিংসা করে না, সে সামান্য দোষযুক্ত হলেও শ্রাদ্ধে নিমন্ত্রণযোগ্য।
Verse 29
अकल्कको हातर्कश्न ब्राह्मणो भरतर्षभ । संसर्गे भैक्ष्यवृत्तिश्न स राजन् केतनक्षम:
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যে ব্রাহ্মণ দম্ভহীন, বৃথা তর্ক-বিতর্কে লিপ্ত নয়, এবং গৃহে গৃহে ভিক্ষা করে জীবিকা নির্বাহ করে—সঙ্গের যোগ্য—সে, হে রাজন, নিমন্ত্রণের অধিকারী।
Verse 30
अव्रती कितव: स्तेन: प्राणिविक्रयिको वणिक् । पश्चाच्च पीतवान् सोमं स राजन् केतनक्षम:
হে রাজন! যে ব্যক্তি ব্রতহীন, ধূর্ত জুয়াড়ি, চোর, প্রাণী ক্রয়-বিক্রয়কারী এবং বণিকবৃত্তিতে জীবিকা নির্বাহকারী—তবু পরে বিধিপূর্বক যজ্ঞ করে তাতে সোমপান করেছে—সেও নিমন্ত্রণের অধিকারী।
Verse 31
अर्जयित्वा धन पूर्व दारुणैरपि कर्मभि: । भवेत् सर्वातिथि: पश्चात् स राजन् केतनक्षम:
হে রাজন! যে ব্যক্তি প্রথমে কঠোর কর্মের দ্বারাও ধন উপার্জন করে, আর পরে সর্বপ্রকারে অতিথিদের সেবায় নিবেদিত হয়—সে শ্রাদ্ধে আহ্বানযোগ্য।
Verse 32
ब्रह्मविक्रयनिर्दिष्ट स्त्रिया यच्चार्जितं धनम् । अदेयं पितृविप्रेभ्यो यच्च क्लैब्यादुपार्जितम्
যে ধন বেদ (ব্রহ্ম) বিক্রি করে অর্জিত, অথবা স্ত্রীর উপার্জনে প্রাপ্ত, কিংবা কাপুরুষতা/দীনতা প্রদর্শন করে (ক্লৈব্য থেকে) সংগৃহীত—সে ধন পিতৃকার্যে শ্রাদ্ধে ব্রাহ্মণদের দানযোগ্য নয়।
Verse 33
क्रियमाणे5पवर्गे च यो द्विजो भरतर्षभ । न व्याहरति यद्युक्त तस्याधर्मो गवानृतम्
ভীষ্ম বললেন— হে ভরতশ্রেষ্ঠ! মোক্ষপ্রদ পবিত্র ক্রিয়া সম্পন্ন হতে থাকলে যে দ্বিজ বিধিসংগত ও যথোচিত বাক্য উচ্চারণ করে না, তার সেই অবহেলা অধর্ম হয়ে দাঁড়ায়—গোর বিষয়ে মিথ্যা বলার মতো গুরুতর পাপ।
Verse 34
भरतश्रेष्ठ! जो ब्राह्मण श्राद्धकी समाप्ति होनेपर “अस्तु स्वधा” आदि तत्कालोचित वचनोंका प्रयोग नहीं करता है, उसे गायकी झूठी शपथ खानेका पाप लगता है ।।
ভীষ্ম বললেন— হে ভরতশ্রেষ্ঠ! শ্রাদ্ধের সমাপ্তিতে যে ব্রাহ্মণ ‘অস্তু স্বধা’ প্রভৃতি যথাসময়ে উচ্চারণীয় বাক্য উচ্চারণ করে না, সে গোর বিষয়ে মিথ্যা শপথের সমান পাপ লাভ করে। হে যুধিষ্ঠির! যে দিন সুপাত্র ব্রাহ্মণ, দই ও ঘি, অমাবস্যা তিথি এবং অরণ্যজাত কন্দ-মূল ও ফলের শাঁস একত্রে প্রাপ্ত হয়—সেই দিনই শ্রাদ্ধের শ্রেষ্ঠ কাল।
Verse 35
(मुहूर्तानां त्रय॑ पूर्वमह्नः प्रातरिति स्मृतम् । जपथध्यानादिभिस्तस्मिन् विप्रैः कार्य शुभव्रतम् ।।
ভীষ্ম বললেন— দিনের প্রথম তিন মুহূর্তকে ‘প্রাতঃকাল’ বলা হয়। সেই সময় ব্রাহ্মণদের জপ-ধ্যান প্রভৃতি দ্বারা নিজেদের কল্যাণকর ব্রতাচরণ করা উচিত। তার পরের তিন মুহূর্ত ‘সঙ্গব’, এবং তার পরের তিন মুহূর্ত ‘মধ্যাহ্ন’। সঙ্গব কালে লৌকিক কাজকর্ম করা উচিত, আর মধ্যাহ্নে স্নান ও সন্ধ্যাবন্দন বিধেয়। মধ্যাহ্নের পরের তিন মুহূর্ত ‘অপরাহ্ন’—দিনের চতুর্থ ভাগ, পিতৃকার্যের উপযোগী। তার পরের তিন মুহূর্ত ‘সায়াহ্ন’, যাকে পণ্ডিতেরা দিন ও রাত্রির সন্ধিক্ষণ বলেন। ব্রাহ্মণের গৃহে শ্রাদ্ধ সমাপ্তিতে ‘স্বধা’ উচ্চারণে পিতৃগণ প্রসন্ন হন; আর ক্ষত্রিয়ের গৃহে সমাপ্তিতে বলা উচিত—‘পিতরঃ প্রীয়ন্তাম্’ (পিতৃগণ তৃপ্ত হোন)।
Verse 36
अपवर्गे तु वैश्यस्य श्राद्धकर्मणि भारत । अक्षय्यमभिधातव्यं स्वस्ति शूद्रस्य भारत
ভীষ্ম বললেন— হে ভারত! বৈশ্যের শ্রাদ্ধকর্ম সমাপ্তিতে ‘অক্ষয়্যম্’—‘দান অক্ষয় হোক’—এ কথা বলা উচিত; আর হে ভারত! শূদ্রের শ্রাদ্ধ সমাপ্তিতে ‘স্বস্তি’—‘কল্যাণ হোক’—উচ্চারণ করা বিধেয়।
Verse 37
पुण्याहवाचनं दैवं ब्राह्मणस्य विधीयते । एतदेव निरोड्कार क्षत्रियस्य विधीयते
ভীষ্ম বললেন— ব্রাহ্মণের জন্য দেবকর্ম ‘পুণ্যাহবাচন’—মঙ্গল আহ্বান ও আশীর্বচন—রূপে বিধেয়; আর ক্ষত্রিয়ের ক্ষেত্রে এই একই উদ্দেশ্য ‘নিরোড্কার’ দ্বারাই সম্পন্ন হয়।
Verse 38
इसी तरह जब ब्राह्मणके यहाँ देवकार्य होता हो, तब उसमें *कारसहित पुण्याहवाचनका विधान है (अर्थात् 'पुण्याहं भवन्तो ब्रुवन्तु--आपलोग पुण्याहवाचन करें' ऐसा यजमानके कहनेपर ब्राह्मणोंको “३० पुण्याहम् ३» पुण्याहम्” इस प्रकार कहना चाहिये)। यही वाक्य क्षत्रियके यहाँ बिना *कारके उच्चारण करना चाहिये ।।
ভীষ্ম বললেন—এইরূপে যখন ব্রাহ্মণের গৃহে দেবকার্য অনুষ্ঠিত হয়, তখন বিধিমতে ‘পুণ্যাহবাচন’ *কারসহ উচ্চারিত হয়। যজমান “পুণ্যাহং ভবন্তো ব্রুবন্তু—আপনারা পুণ্যাহবাচন করুন” বললে ব্রাহ্মণেরা “পুণ্যাহম্, পুণ্যাহম্” বলে উত্তর দেবেন। ক্ষত্রিয়ের গৃহে সেই একই সূত্র *কার ব্যতীত উচ্চারণীয়। বৈশ্যের দেবকর্মে “প্রীয়ন্তাং দেবতাঃ”—এই বাক্য উচ্চারণ করতে হয়। এখন ক্রমানুসারে তিন বর্ণের কর্মানুষ্ঠানের বিধিসম্মত প্রণালী শোনো।
Verse 39
जातकर्मादिका: सर्वास्त्रिषु वर्णेषु भारत । ब्र्मक्षत्रे हि मन्त्रोक्ता वैश्यस्य च युधिष्ठिर
ভীষ্ম বললেন—হে ভারতবংশীয় যুধিষ্ঠির! তিন দ্বিজবর্ণে জাতকর্ম প্রভৃতি সকল সংস্কার বিধিবদ্ধ। ব্রাহ্মণ, ক্ষত্রিয় ও বৈশ্য—এই তিনেরই সংস্কার বেদমন্ত্রোচ্চারণসহ বিধিপূর্বক সম্পন্ন করা উচিত।
Verse 40
विप्रस्थ रशना मौज्जी मौर्वी राजन्यगामिनी । बाल्वजी होव वैश्यस्य धर्म एष युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! उपनयनके समय ब्राह्मणको मूँजकी, क्षत्रियको प्रत्यज्जाकी और वैश्यको शणकी मेखला धारण करनी चाहिये। यही धर्म है
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! উপনয়নের সময় ব্রাহ্মণের মেখলা মুঞ্জঘাসের, ক্ষত্রিয়ের মৌর্বী (ধনুর্জ্যা-তন্তু) এবং বৈশ্যের শণ/পাটতন্তুর হওয়া উচিত। এটাই ধর্মের স্থির বিধান।
Verse 41
(पालाशो द्विजदण्ड: स्यादश्वत्थ: क्षत्रियस्य तु । औदुम्बरश्न वैश्यस्य धर्म एष युधिष्ठिर ।।
ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণের দণ্ড পলাশকাঠের, ক্ষত্রিয়ের অশ্বত্থ (পিপল) কাঠের এবং বৈশ্যের উদুম্বর (গোলর) কাঠের হওয়া উচিত। হে যুধিষ্ঠির, এটাই ধর্মের স্থির বিধান। এখন দানদাতা ও দানগ্রহীতার ধর্ম-অধর্ম শোনো। ব্রাহ্মণের মিথ্যাভাষণে যে পাপ ‘পাতক’ বলে ঘোষিত, তা ক্ষত্রিয়ের ক্ষেত্রে চতুর্গুণ এবং বৈশ্যের ক্ষেত্রে অষ্টগুণ বলে গণ্য।
Verse 42
नान्यत्र ब्राह्मणोश्रीयात् पूर्व विप्रेण केतित: । यवीयान् पशुहिंसायां तुल्यधर्मो भवेत् स हि
ভীষ্ম বললেন—যদি কোনো ব্রাহ্মণকে পূর্বেই অন্য এক ব্রাহ্মণ শ্রাদ্ধের জন্য নিমন্ত্রণ করে রাখেন, তবে নিমন্ত্রিত ব্রাহ্মণ অন্যত্র গিয়ে ভোজন করবে না। যদি সে তা করে, তবে তাকে মর্যাদায় হ্রাসপ্রাপ্ত বলে গণ্য করা হয় এবং তার দোষ পশুহিংসার সমান বলে ধরা হয়।
Verse 43
तथा राजन्यवैश्याभ्यां यद्यश्नरीयात्तु केतित: । यवीयान् पशुहिंसायां भागार्ध समवाप्लुयात्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! ক্ষত্রিয় বা বৈশ্য যদি পূর্বেই বিধিপূর্বক নিমন্ত্রণ করে থাকে, আর সেই ব্যক্তি তা উপেক্ষা করে অন্যত্র গিয়ে ভোজন করে, তবে সে নিন্দিত গণ্য হয় এবং সেই ভোজনে পশুহিংসাজনিত পাপের অর্ধাংশ তার ভাগে পড়ে।
Verse 44
दैवं वाप्यथवा पित्र्यं योडश्रीयाद ब्राह्मणादिषु । अस्नातो ब्राह्मणो राजंस्तस्याधर्मो गवानृतम्
হে রাজন! যে ব্রাহ্মণ ব্রাহ্মণাদি (ত্রিবর্ণের) গৃহে দেবযজ্ঞ বা পিতৃকার্য (শ্রাদ্ধ)-এ স্নান না করেই ভোজন করে, সেই অস্নাত ব্রাহ্মণের অধর্ম গোর উপর মিথ্যা শপথের সমান বলে স্মৃত।
Verse 45
आशीौचो ब्राह्मणो राजन् यो+श्रीयाद् ब्राह्मणादिषु । ज्ञानपूर्वमथो लोभात् तस्याधर्मो गवानृतम्
হে রাজন! যে ব্রাহ্মণ নিজ গৃহে অশৌচ অবস্থায় থেকেও লোভে জেনে-বুঝে অন্য ব্রাহ্মণাদি গৃহে শ্রাদ্ধের অন্ন গ্রহণ করে, তার অধর্মও গোর উপর মিথ্যা শপথের সমান বলে স্মৃত।
Verse 46
अर्थनान्येन यो लिप्सेत् कर्मार्थ चैव भारत । आमन्त्रयति राजेन्द्र तस्याधर्मोडनृतं स्मृतम्
ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! যে ব্যক্তি অন্য কোনো উদ্দেশ্যের অজুহাতে ধন কামনা করে, অথবা ‘অমুক কর্ম (যজ্ঞাদি) করার জন্য আমাকে অর্থ দাও’ বলে দাতাকে নিজের দিকে টেনে আনে, তার জন্য এ আচরণ অধর্ম ও মিথ্যা বলে স্মৃত।
Verse 47
अवेददब्रतचारित्रास्त्रिभिवरर्णर्युधिष्ठिर । मन्त्रवत्परिविष्यन्ते त्स्याधमों गवानृतम्
হে যুধিষ্ঠির! ব্রাহ্মণ, ক্ষত্রিয় ও বৈশ্য—এই তিন বর্ণের লোকেরা—যদি বেদব্রত ও শিষ্টাচার না মানা ব্রাহ্মণদের শ্রাদ্ধে মন্ত্রোচ্চারণসহ অন্ন পরিবেশন করে, তবে তাদেরও অধর্ম গোর উপর মিথ্যা শপথের সমান বলে স্মৃত।
Verse 48
युधिछिर उवाच पित्र्यं वाप्यथवा दैवं दीयते यत् पितामह । एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं दत्त केषु महाफलम्
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! পিতৃকার্যে (শ্রাদ্ধে) অথবা দেবযজ্ঞে যে দান দেওয়া হয়, তা কোন কোন পাত্রকে দিলে সর্বাধিক ফল লাভ হয়? আমি তা জানতে চাই।
Verse 49
भीष्म उवाच येषां दारा: प्रतीक्षन्ते सुवृष्टिमिव कर्षका: । उच्छेषपरिशेषं हि तान् भोजय युधिष्ठिर
ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! যেমন কৃষক সুভৃষ্টি অপেক্ষা করে, তেমনি যাদের ঘরে স্ত্রীলোকেরা স্বামীর খাওয়ার পর অবশিষ্ট অন্নের অপেক্ষায় থাকে—অর্থাৎ যাদের কাছে দিনের রান্না ছাড়া আর কোনো সঞ্চয় নেই—সেই দরিদ্র ব্রাহ্মণদের তুমি অবশ্যই ভোজন করাও।
Verse 50
चारित्रनिरता राजन् ये कृशा: कृशवृत्तय: । अर्थिनश्लोपगच्छन्ति तेषु दत्त महाफलम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! যারা সদাচারে নিবিষ্ট, যাদের জীবিকার উপায় নষ্ট হয়ে গেছে এবং অন্নাভাবে যারা অত্যন্ত কৃশ হয়ে পড়েছে—এমন লোকেরা যখন যাচক হয়ে দাতার কাছে আসে, তখন তাদের দেওয়া দান মহাফল প্রদান করে।
Verse 51
तद्धभक्तास्तद्गृहा राजंस्तद्धलास्तदपाश्रया: । अर्थिनश्व भवन्त्यर्थे तेषु दत्त महाफलम्
ভীষ্ম বললেন—হে নরেশ্বর! যারা সেই ধর্মেরই ভক্ত, যাদের গৃহ ধর্মে প্রতিষ্ঠিত, যাদের শক্তি ধর্ম এবং যাদের আশ্রয় ধর্ম—তারা যখন প্রয়োজনে যাচক হয়, তখন তাদের দেওয়া দান মহাফল প্রদান করে।
Verse 52
तस्करेभ्य: परेभ्यो वा ये भयार्ता युधिष्ठिर । अर्थिनो भोक्तुमिच्छन्ति तेषु दत्त महाफलम्
ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! চোর বা শত্রুর ভয়ে আতঙ্কিত হয়ে যারা যাচক হয়ে আসে এবং কেবল আহারই চায়, তাদের দেওয়া দান মহাফল প্রদান করে।
Verse 53
अकल्ककस्य विप्रस्य रौक्ष्यात् करकृतात्मन: । वटवो यस्य भिक्षन्ति तेभ्यो दत्त महाफलम्
ভীষ্ম বললেন—যে নিষ্কপট ব্রাহ্মণ চরম দারিদ্র্যে কঠোর হয়ে গেছে, আর যার হাতে সামান্য অন্ন এলেই তার ক্ষুধার্ত সন্তানরা সঙ্গে সঙ্গে “আমাকে দাও, আমাকে দাও” বলে ভিক্ষা চায়—সেই ব্রাহ্মণ ও সেই সন্তানদেরকে দান করলে মহৎ ফল লাভ হয়।
Verse 54
हृतस्वा ह्तदाराश्ष ये विप्रा देशसम्प्लवे । अर्थार्थमभिगच्छन्ति तेभ्यो दत्त महाफलम्
ভীষ্ম বললেন—দেশে বিপর্যয় ও অরাজকতার সময় যেসব ব্রাহ্মণের ধন লুণ্ঠিত হয়েছে এবং যাদের স্ত্রীদের অপহরণ করা হয়েছে, তারা যদি জীবিকার জন্য অর্থ প্রার্থনা করতে আসে—তাদেরকে দান করলে মহৎ ফল লাভ হয়।
Verse 55
व्रतिनो नियमस्थाश्न ये विप्रा: श्रुतसम्मता: । तत्समाप्त्यर्थमिच्छन्ति तेभ्यो दत्त महाफलम्
ভীষ্ম বললেন—যেসব ব্রাহ্মণ ব্রত ও নিয়মে স্থিত থেকে শ্রুতি-শাস্ত্রসম্মত পথে চলেন এবং ব্রতসমাপ্তির জন্য অর্থ চান—তাদেরকে দান করলে মহৎ ফল লাভ হয়।
Verse 56
अत्युक्रान्ताश्व धर्मेषु पाषण्डसमयेषु च । कृशप्राणा: कृशधनास्तेभ्यो दत्त महाफलम्
ভীষ্ম বললেন—যারা পাষণ্ডীদের মতধর্ম থেকে দূরে থাকে, যাদের ধনের অভাব এবং অন্নের অভাবে যারা দুর্বল হয়ে পড়েছে—তাদেরকে দান করলে মহৎ ফল লাভ হয়।
Verse 57
(व्रतानां पारणार्थाय गुर्वर्थे यज्ञदक्षिणाम् । निवेशार्थ च विद्वांसस्तेषां दत्त महाफलम् ।।
ভীষ্ম বললেন—যে বিদ্বানরা ব্রতসমাপন, গুরুদক্ষিণা, যজ্ঞদক্ষিণা এবং গৃহস্থ-প্রতিষ্ঠা (বিবাহাদি) জন্য অর্থ চান—তাদেরকে দান করলে মহৎ ফল হয়। তদ্রূপ, পিতা-মাতার রক্ষা, স্ত্রী-সন্তানের পালন, অথবা মহারোগ থেকে মুক্তির জন্য যারা অর্থ চান—তাদেরকে দান করাও মহাফলদায়ক। আর যে বালক ও নারীরা উপায়হীন হয়ে কেবল সুপাচ্য আহার প্রার্থনা করে, তাদেরকে আহার দানকারী স্বর্গ লাভ করে, নরকে পতিত হয় না। এবং প্রভাবশালী দস্যুরা যাদের সর্বস্ব কেড়ে নিয়েছে—সেই নির্দোষ লোকেরা যদি অন্নের আকাঙ্ক্ষা করে, তাদেরকে অন্নদান করাও মহৎ ফল দেয়।
Verse 58
तपस्विनस्तपोनिष्ठास्तेषां भैक्षचराश्न ये । अर्थिन: किज्चिदिच्छन्ति तेषु दत्त महाफलम्
যাঁরা তপস্বী, তপস্যায় দৃঢ়, এবং তপস্বীদের কল্যাণার্থেই ভিক্ষাবৃত্তি অবলম্বন করেন—এমন যোগ্য প্রার্থীরা যদি সামান্যও চান, তাঁদেরকে দান করলে তা মহাফলদায়ক হয়।
Verse 59
महाफलविधिदनि श्रुतस्ते भरतर्षभ । निरयं येन गच्छन्ति स्वर्ग चैव हि तत् शूणु
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! মহাফলদায়ক দানের বিধান তুমি আমার কাছ থেকে শুনেছ। এখন যে কর্মে মানুষ নরকে যায় এবং যে কর্মে স্বর্গেও যায়—তা শোনো।
Verse 60
गुर्वर्थमभयार्थ वा वर्जयित्वा युधिष्ठिर । येडनृतं कथयन्ति सम ते वै निरयगामिन:
হে যুধিষ্ঠির! গুরুর কল্যাণার্থে বা অন্যকে ভয়মুক্ত করতে যে অসত্য বলা হয়, তা ব্যতীত অন্য ক্ষেত্রে যারা মিথ্যা বলে—তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 61
परदाराभिहर्तार: परदाराभिमर्शिन: । परदारप्रयोक्तारस्ते वै निरयगामिन:
যারা পরস্ত্রীকে অপহরণ করে, যারা পরস্ত্রীকে লাঞ্ছিত করে তার সতীত্ব নষ্ট করে, এবং যারা দূত হয়ে পরস্ত্রীকে পরপুরুষের সঙ্গে অবৈধ মিলনে প্ররোচিত করে—তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 62
ये परस्वापहर्तार: परस्वानां च नाशका: । सूचकाश्न परेषां ये ते वै निरयगामिन:,जो दूसरोंके धनको हड़पनेवाले और नष्ट करनेवाले हैं तथा दूसरोंकी चुगली खानेवाले हैं, उन्हें निश्षय ही नरकमें गिरना पड़ता है
যারা অন্যের ধন চুরি করে, যারা অন্যের সম্পদ নষ্ট করে, এবং যারা অন্যের বিরুদ্ধে গুপ্তচর/নিন্দাকারী সূচক হয়ে ওঠে—তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 63
प्रपाणां च सभानां च संक्रमाणां च भारत | अगाराणां च भेत्तारो नरा निरयगामिन:,भरतनन्दन! जो पौंसलों, सभाओं, पुलों और किसीके घरोंको नष्ट करनेवाले हैं, वे मनुष्य निश्चय ही नरकमें पड़ते हैं
ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! যারা জনসাধারণের পানশালা, সভাগৃহ, সেতু ও ঘাট-সংক্রমণ নষ্ট করে এবং পরের গৃহে ভেঙে প্রবেশ করে তা ধ্বংস করে, তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 64
अनाथां प्रमदां बालां वृद्धां भीतां तपस्विनीम् । वज्चयन्ति नरा ये च ते वै निरयगामिन:,जो लोग अनाथ, बूढ़ी, तरुणी, बालिका, भयभीत और तपस्विनी स्त्रियोंको धोखेमें डालते हैं, वे निश्चय ही नरकगामी होते हैं
যারা অনাথা, বৃদ্ধা, তরুণী, বালিকা, ভীত ও তপস্বিনী নারীদের প্রতারণা করে, তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 65
वृत्तिच्छेदं गृहच्छेदं दारच्छेदं च भारत । मित्रच्छेदं तथा55शायास्ते वै निरयगामिन:
হে ভারত! যারা অন্যের জীবিকা ছিন্ন করে, গৃহ উজাড় করে, স্বামী-স্ত্রীর বিচ্ছেদ ঘটায়, বন্ধুদের মধ্যে বিভেদ সৃষ্টি করে এবং কারও আশা ভেঙে দেয়—তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 66
सूचका: सेतुभेत्तार: परवृत््युपजीवका: । अकृच्ञाश्च मित्राणां ते वै निरयगामिन:
ভীষ্ম বললেন—যারা গুপ্তচর-চুগলখোর, যারা ধর্ম-সমাজের রক্ষাকবচস্বরূপ সীমা ভেঙে দেয়, যারা পরের জীবিকায় বেঁচে থাকে এবং যারা বন্ধুদের উপকার ভুলে অকৃতজ্ঞ হয়—তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 67
पाषण्डा दूषकाश्चैव समयानां च दूषका: । ये प्रत्यवसिता श्चैव ते वै निरयगामिन:
ভীষ্ম বললেন—যারা পাষণ্ডী, নিন্দুক, ধর্মীয় আচার-অনুষ্ঠান ও বিধানকে কলুষিত করে, এবং যারা একবার সন্ন্যাস গ্রহণ করে আবার গৃহস্থাশ্রমে ফিরে আসে—তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 68
विषमव्यवहाराश्नव विषमाश्रैव वृद्धिषु । लाभेषु विषमाश्चैव ते वै निरयगामिन:
ভীষ্ম বললেন—যাদের আচরণ সকলের প্রতি সমান নয়, আর লাভ ও বৃদ্ধির বিষয়ে যারা পক্ষপাত করে—ন্যায়ভাবে বণ্টন করে না—তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 69
दूतसंव्यवहाराश्व निष्परीक्षाश्व मानवा: । प्राणिहिंसाप्रवृत्ता श्व ते वै निरयगामिन:
ভীষ্ম বললেন—যারা বিচার-বিবেচনা করতে অক্ষম হয়েও দূতের কাজ করে, এবং যারা সদা প্রাণিহিংসায় প্রবৃত্ত থাকে, তারা নিশ্চিতই নরকে পতিত হয়।
Verse 70
कृताशं कृतनिर्देशं कृतभक्तं कृतश्रमम् । भेदैयें व्यपकर्षन्ति ते वै निरयगामिन:
ভীষ্ম বললেন—যারা মজুরিতে রাখা পরিশ্রমী ভৃত্যকে পারিশ্রমিক দেওয়ার আশা দেখিয়ে, দেওয়ার সময়ও স্থির করে, তারপর ভেদনীতি দিয়ে সময়ের আগেই তাকে প্রভুর গৃহ থেকে তাড়িয়ে দেয়—তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 71
पर्यश्षन्ति च ये दारानग्निभृत्यातिथींस्तथा । उत्सन्नपितृदेवेज्यास्ते वै निरयगामिन:
ভীষ্ম বললেন—যারা পিতৃ ও দেবতার যজন-পূজন ত্যাগ করে, অগ্নিতে আহুতি না দিয়ে, অতিথি, ভৃত্যজন এবং স্ত্রী-সন্তানসহ আশ্রিতদের অন্ন না দিয়ে নিজে ভোজন করে—তারা নিঃসন্দেহে নরকগামী।
Verse 72
वेदविक्रयिणश्रैव वेदानां चैव दूषका: । वेदानां लेखकाश्रैव ते वै निरयगामिन:,जो वेद बेचते हैं, वेदोंकी निन्दा करते हैं और विक्रयके लिये ही वेदोंके मन्त्र लिखते हैं, वे भी निश्चय ही नरकगामी होते हैं
ভীষ্ম বললেন—যারা বেদ বিক্রি করে, যারা বেদের নিন্দা বা বিকৃতি ঘটায়, এবং যারা কেবল বাণিজ্যের জন্য বেদমন্ত্র লিখে—তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 73
चातुराश्रम्यबाह्ाश्र श्रुतिबाह्माश्व ये नरा: । विकर्मभिक्ष जीवन्ति ते वै निरयगामिन:
ভীষ্ম বললেন—যে সকল মানুষ চতুরাশ্রমের শাসন ও বেদের কর্তৃত্বের বাইরে থাকে এবং শাস্ত্রবিরুদ্ধ কর্ম বা ভিক্ষাবৃত্তি দ্বারা জীবিকা নির্বাহ করে, তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 74
केशविक्रयिका राजन् विषविक्रयिकाश्न ये । क्षीरविक्रयिकाश्वैव ते वै निरयगामिन:,राजन! जो (ब्राह्मण) केश, विष और दूध बेचते हैं, वे भी नरकमें ही जाते हैं
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, যারা চুল বিক্রি করে, যারা বিষ বিক্রি করে, এবং যারা দুধ বিক্রি করে—তারা সকলেই নরকগামী।
Verse 75
ब्राह्मणानां गवां चैव कन्यानां च युधिष्ठिर । येडन्तरं यान्ति कार्येषु ते वै निरयगामिन:,युधिष्ठिर! जो बाह्मण, गौ तथा कन्याओंके लिये हितकर कार्यमें विघ्न डालते हैं, वे भी अवश्य ही नरकगामी होते हैं
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির, যারা ব্রাহ্মণ, গাভী ও কন্যাদের কল্যাণসাধনে বাধা সৃষ্টি করে, তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 76
शस्त्रविक्रयिकाश्वैव कर्तारश्न युधिष्ठिर । शल्यानां धनुषां चैव ते वै निरयगामिन:,राजा युधिष्लिर! जो (ब्राह्मण) हथियार बेचते और धनुष-बाण आदि शणस्त्रोंको बनाते हैं, वे नरकगामी होते हैं
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির, যারা অস্ত্র বিক্রি করে এবং যারা তীর-ধনুক প্রভৃতি অস্ত্র নির্মাণ করে, তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 77
शिलाभि: शड्कुभियववपि श्रवश्रैर्वा भरतर्षभ । ये मार्गमनुरुन्धन्ति ते वै निरयगामिन:,भरतश्रेष्ठ) जो पत्थर रखकर, काँटे बिछाकर और गड्ढे खोदकर रास्ता रोकते हैं, वे भी नरकमें ही गिरते हैं
ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ, যারা পাথর ফেলে, খুঁটি বা কাঁটা পেতে, কিংবা গর্ত খুঁড়ে পথ রোধ করে, তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 78
उपाध्यायांश्व भृत्यांश्व भक्ताश्न॑ भरतर्षभ । ये त्यजन्त्यविकारांस्त्रींस्ते वै निरयगामिन:
ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যারা নির্দোষ আচার্য, দাস-পরিচারক ও ভক্ত আশ্রিতদের ত্যাগ করে, তারা নিশ্চিতই নরকগামী হয়।
Verse 79
अप्राप्तदमकाश्रैव नासानां वेधकाश्ष ये । बन्धकाश्व पशूनां ये ते वै निरयगामिन:,जो काबूमें न आनेवाले पशुओंका दमन करते, नाथते अथवा कटपरेमें बंद करते हैं, वे नरकगामी होते हैं
ভীষ্ম বললেন—যারা বশে না-আসা পশুকে জোর করে দমন করে, নাক ছিদ্র/আঘাত করে, কিংবা বেঁধে আবদ্ধ রাখে, তারা নরকগামী বলে কথিত।
Verse 80
अगोप्तारश्न॒ राजानो बलिषड्भागतस्करा: । समर्थाक्षाप्पदातारस्ते वै निरयगामिन:
ভীষ্ম বললেন—যে রাজারা প্রজাকে রক্ষা করে না, অথচ কর হিসেবে প্রজার আয়ের ষষ্ঠাংশ চোরের মতো কেড়ে নেয়, এবং যারা সামর্থ্য থাকা সত্ত্বেও দান করে না—তারা নিশ্চিতই নরকগামী।
Verse 81
(संश्रुत्य चाप्रदातारो दरिद्राणां विनिन्दका: । श्रोत्रियाणां विनीतानां दरिद्राणां विशेषत: ।।
যারা দান দেওয়ার প্রতিশ্রুতি দিয়ে দেয় না, দরিদ্রদের—বিশেষত বিনয়ী দরিদ্র শ্রোত্রিয়দের—এবং ক্ষমাশীলদের নিন্দা করে, তারা নিশ্চিতই নরকগামী। আর যারা কাজ সেরে গেলে দীর্ঘকাল সহবাস করা ক্ষমাশীল, ইন্দ্রিয়জয়ী, প্রাজ্ঞজনদের ত্যাগ করে, তারাও নরকে পতিত হয়।
Verse 82
बालानामथ वृद्धानां दासानां चैव ये नरा: । अदत्त्वा भक्षयन्त्यग्रे ते वै निरयगामिन:,जो बालकों, बूढ़ों और सेवकोंको दिये बिना ही पहले स्वयं भोजन कर लेते हैं, वे भी निःसंदेह नरकगामी होते हैं
যারা শিশু, বৃদ্ধ ও দাস-পরিচারকদের না দিয়ে আগে নিজে ভোজন করে, তারা নিঃসন্দেহে নরকগামী।
Verse 83
एते पूर्व विनिर्दिष्टा: प्रोक्ता निरयगामिन: । भागिन: स्वर्गलोकस्य वक्ष्यामि भरतर्षभ
ভীষ্ম বললেন—এরা পূর্বেই নরকগামী বলে নির্দিষ্ট হয়েছে। এখন, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, স্বর্গলোকের অংশীদার যাঁরা, তাঁদের কথা বলছি—শোনো।
Verse 84
सर्वेष्वेव तु कार्येषु दैवपूर्वेषु भारत । हन्ति पुत्रान् पशून् कृत्स्नान् ब्राह्मणातिक्रम: कृत:
হে ভারত! যে সকল কর্মে প্রথমে দেবপূজা সম্পন্ন হয়, সেসব কর্মে যদি ব্রাহ্মণের অবমাননা করা হয়, তবে সেই ব্রাহ্মণ-অতিক্রম অবমাননাকারীর সমস্ত পুত্র ও পশুধনকে বিনাশ করে।
Verse 85
दानेन तपसा चैव सत्येन च युधिष्ठिर । ये धर्ममनुवर्तन्ते ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो दान, तपस्या और सत्यके द्वारा धर्मका अनुष्ठान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! দান, তপস্যা ও সত্যের দ্বারা যারা ধর্মের অনুসরণ করে, সেই মানুষরা স্বর্গগামী হয়।
Verse 86
शुश्रूषाभिस्तपोभिश्व विद्यामादाय भारत । ये प्रतिग्रहनि:स्नेहास्ते नरा: स्वर्गगामिन:,भारत! जो गुरुशुश्रूषा और तपस्यापूर्वक वेदाध्ययन करके प्रतिग्रहमें आसक्त नहीं होते, वे लोग स्वर्गगामी होते हैं
ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! যারা গুরুশুশ্রূষা ও তপস্যার সঙ্গে বিদ্যা (বেদাধ্যয়ন) অর্জন করে এবং প্রতিগ্রহে (দান গ্রহণে) আসক্ত নয়, তারা স্বর্গগামী হয়।
Verse 87
भयात्पापात्तथा बाधादू दारिद्रयाद् व्याधिधर्षणात् । यत्कृते प्रतिमुच्यन्ते ते नरा: स्वर्गगामिन:
ভীষ্ম বললেন—যাঁদের প্রচেষ্টায় মানুষ ভয়, পাপ, বাধা, দারিদ্র্য এবং রোগজনিত যন্ত্রণা থেকে মুক্তি পায়, সেই লোকেরা স্বর্গগামী হয়।
Verse 88
क्षमावन्तश्न धीराश्च धर्मकार्येषु चोत्थिता: | मड़ुलाचारसम्पन्ना: पुरुषा: स्वर्गगामिन:,जो क्षमावान्, धीर, धर्मकार्यके लिये उद्यत रहनेवाले और मांगलिक आचारसे सम्पन्न हैं, वे पुरुष भी स्वर्गगामी होते हैं
ভীষ্ম বললেন—যে পুরুষেরা ক্ষমাশীল, ধীর, ধর্মকার্যে সদা উদ্যত এবং মঙ্গলময় ও শৃঙ্খলিত আচারে সমৃদ্ধ, তারা এই গুণবলেই স্বর্গপথ লাভ করে।
Verse 89
निवृत्ता मधुमांसे भ्य: परदारेभ्य एव च | निवत्ताश्चैव मद्येभ्यस्ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो मद, मांस, मदिरा और परस्त्रीसे दूर रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं
ভীষ্ম বললেন—যারা মধু ও মাংস থেকে বিরত থাকে, পরস্ত্রী থেকে সংযত থাকে, এবং মদ্যপানসহ নেশাদ্রব্য থেকেও দূরে থাকে—তারা স্বর্গগামী হয়।
Verse 90
आश्रमाणां च कर्तार: कुलानां चैव भारत । देशानां नगराणां च ते नरा: स्वर्गगामिन:,भारत! जो आश्रम, कुल, देश और नगरके निर्माता तथा संरक्षक हैं, वे पुरुष स्वर्गमें जाते हैं
ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! যারা আশ্রম, কুল, দেশ ও নগরের প্রতিষ্ঠাতা এবং রক্ষক, তারা স্বর্গগামী হয়।
Verse 91
वस्त्राभरणदातारो भक्तपानान्नदास्तथा । कुट॒म्बानां च दातार: पुरुषा: स्वर्गगामिन:
ভীষ্ম বললেন—যারা বস্ত্র ও অলংকার দান করে, ভোজন, পানীয় ও অন্ন প্রদান করে, এবং অন্যের গৃহস্থালির পালন-পোষণ ও বৃদ্ধিতে সহায় হয়—তারা স্বর্গলোক লাভ করে।
Verse 92
सर्वहिंसानिवृत्ताश्न॒ नरा: सर्वसहाश्च ये । सर्वल्याश्रयभूताश्न ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो सब प्रकारकी हिंसाओंसे अलग रहते हैं, सब कुछ सहते हैं और सबको आश्रय देते रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं
ভীষ্ম বললেন—যারা সকল প্রকার হিংসা থেকে বিরত থাকে, সর্বদা সহিষ্ণু থাকে, এবং সকল প্রাণীর আশ্রয় হয়ে ওঠে—তারা স্বর্গগামী হয়।
Verse 93
मातरं पितरं चैव शुश्रूषन्ति जितेन्द्रिया: । | 4 058 सस्नेहास्ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो होकर माता-पिताकी सेवा करते हैं तथा भाइयोंपर स्नेह रखते हैं, वे लोग स्वर्गलोकमें जाते हैं
যাঁরা ইন্দ্রিয়সংযমী হয়ে মাতা-পিতার সেবা করেন এবং ভ্রাতৃদের প্রতি স্নেহবান থাকেন, সেই নরগণ স্বর্গলোক লাভ করেন।
Verse 94
आढ्याक्ष बलवन्तक्ष यौवनस्थाश्ष भारत । ये वै जितेन्द्रिया धीरास्ते नरा: स्वर्गगामिन:,भारत! जो धनी, बलवान् और नौजवान होकर भी अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखते हैं, वे धीर पुरुष स्वर्गगामी होते हैं
হে ভারত! যাঁরা ধনী, বলবান ও যৌবনসম্পন্ন হয়েও ইন্দ্রিয়সংযমী ও ধীর—সেই নরগণ স্বর্গগামী হন।
Verse 95
अपराधिषु सस्नेहा मृदवो मृदुवत्सला: । आराधनसुखाश्षापि पुरुषा: स्वर्गगामिन:
যাঁরা অপরাধীদের প্রতিও স্নেহবান, যাঁদের স্বভাব কোমল, যাঁরা কোমলস্বভাব লোকদের স্নেহ করেন এবং অন্যের সেবা-সম্মানেই আনন্দ পান—তাঁরা স্বর্গগামী হন।
Verse 96
सहस्रपरिवेष्टारस्तथैव च सहस्रदा: । त्रातारक्ष सहस्त्राणां ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो मनुष्य सहस्रों मनुष्योंको भोजन परोसते, सहस्रोंको दान देते तथा सहस्रोंकी रक्षा करते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं
যাঁরা সহস্রবার সহস্রজনকে অন্ন পরিবেশন করেন, সহস্রজনকে দান দেন এবং সহস্রজনকে রক্ষা ও উদ্ধার করেন—তাঁরা স্বর্গগামী হন।
Verse 97
सुवर्णस्य च दातारो गवां च भरतर्षभ | यानानां वाहनानां च ते नरा: स्वर्गगामिन:,भरतश्रेष्ठ! जो सुवर्ण, गौ, पालकी और सवारीका दान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যাঁরা স্বর্ণ, গাভী এবং যান-বাহন (পালকি ও অশ্বাদি) দান করেন, তাঁরা স্বর্গলোক লাভ করেন।
Verse 98
वैवाहिकानां द्रव्याणां प्रेष्याणां च युधिष्ठिर । दातारो वाससां चैव ते नरा: स्वर्गगामिन:,युधिष्ठिर! जो वैवाहिक द्रव्य, दास-दासी तथा वस्त्र दान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं
হে যুধিষ্ঠির! যারা বিবাহ-সম্পর্কিত দ্রব্য, দাস-দাসী এবং বস্ত্র দান করে, সেই মানুষরা স্বর্গগামী হয়।
Verse 99
विहारावसथोद्यानकूपारामसभाप्रपा: । वप्राणां चैव कर्तारस्ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो दूसरोंके लिये आश्रम, गृह, उद्यान, कुआँ, बागीचा, धर्मशाला, पौंसला तथा चहारदीवारी बनवाते हैं, वे लोग स्वर्गलोकमें जाते हैं
যারা অন্যের কল্যাণের জন্য বিহারস্থান, আশ্রয়গৃহ, উদ্যান, কূপ, আরাম/উপবন, সভাগৃহ, প্রপা (পানীয়জল-স্থল) এবং প্রাচীর/বেষ্টনী নির্মাণ করে, তারা স্বর্গলোকে গমন করে।
Verse 100
निवेशनानां क्षेत्राणां वसतीनां च भारत । दातार: प्रार्थितानां च ते नरा: स्वर्गगामिन:,भरतनन्दन! जो याचकोंकी याचनाके अनुसार घर, खेत और गाँव प्रदान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं
হে ভারত! যারা প্রার্থিত হলে যাচকদের চাহিদা অনুযায়ী গৃহ, ক্ষেত্র এবং বাসস্থান/গ্রাম দান করে, তারা স্বর্গগামী হয়।
Verse 101
रसानां चाथ बीजानां धान्यानां च युधिष्छिर । स्वयमुत्पाद्य दातार: पुरुषा: स्वर्गगामिन:,युधिष्ठिर! जो स्वयं ही पैदा करके रस, बीज और अन्नका दान करते हैं, वे पुरुष स्वर्गगामी होते हैं
হে যুধিষ্ঠির! যারা নিজে উৎপন্ন করে রস, বীজ এবং ধান্য/অন্ন দান করে, সেই পুরুষেরা স্বর্গগামী হয়।
Verse 102
यस्मिंस्तस्मिन् कुले जाता बहुपुत्रा: शतायुष: । सानुक्रोशा जितक्रोधा: पुरुषा: स्वर्गगामिन:
যে কোনো কুলে জন্ম নিয়ে যারা বহু পুত্র ও শতায়ু লাভ করে, করুণাশীল থাকে এবং ক্রোধ জয় করে—সেই পুরুষেরা স্বর্গলোকে গমন করে।
Verse 103
एतदुक्तममुत्रार्थ दैवं पित्रयं च भारत । दानधर्म च दानस्य यत् पूर्वमृषिभि: कृतम्
হে ভারত! আমি তোমাকে পরলোক-কল্যাণকারী দেবকার্য ও পিতৃকার্যের বিবরণ দিলাম; এবং প্রাচীন ঋষিগণ যে দানধর্ম ও দানের মহিমা স্থির করেছেন, তাও ব্যাখ্যা করলাম।
Verse 106
ये भागा रक्षसां प्राप्तास्त उक्ता भरतर्षभ | घीकी आहुति दिये बिना ही जो कुछ परोसा जाता है तथा जिसमेंसे पहले कुछ दुराचारी मनुष्योंको भोजन करा दिया गया हो
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! ঘৃতাহুতি না দিয়ে যা কিছু পরিবেশন করা হয়, এবং যে অন্নে আগে কিছু দুরাচারী লোককে ভোজন করানো হয়েছে—তাই রাক্ষসদের ভাগ বলে গণ্য। এখানে রাক্ষসদের প্রাপ্য অন্নাংশের বিবরণ দেওয়া হল।
The inquiry seeks a precise account of tīrtha efficacy—why seeing and bathing at sacred places is meritorious and what specific results (including afterlife outcomes) arise from such observances.
Merit is presented as conditional: tīrtha-bathing is repeatedly paired with regulated vows—fasting, purity, sense-control, truthfulness, non-violence, and conquest of desire/anger/greed—so the ethical discipline is treated as constitutive of the result.
Yes. It characterizes the teaching as a purifying ‘rahasya’ and states that hearing/reciting it yields purification and auspicious destiny; it also specifies controlled transmission to qualified recipients (dvijas, sādhus, kin, friends, or disciplined students).