Adhyaya 1
Anushasana ParvaAdhyaya 183 Verses

Adhyaya 1

Śama-prāptiḥ — Gautamī–Lubdhaka–Pannaga–Mṛtyu–Kāla-saṃvāda (Restraint through the Analysis of Karma and Time)

Upa-parva: Śama–Karma–Kāla Saṃvāda (Didactic Episode on Restraint, Action, and Time)

Yudhiṣṭhira confesses that despite teachings on śama (restraint/peace), he cannot attain inner calm after witnessing Bhīṣma’s arrow-wounded body and recalling the loss of kings and kin. Bhīṣma challenges the assumption of simple personal culpability and introduces an ancient itihāsa: Gautamī finds her son dead from a serpent’s bite; a hunter captures the serpent and urges immediate execution. Gautamī refuses retaliatory killing, arguing that violence cannot restore the child and that ethical weight belongs to one’s own conduct. The serpent claims it acted under compulsion; Mṛtyu states it acts under Kāla; Kāla finally asserts that the operative cause is the child’s own karma, with all other agents functioning as instrumental conditions. Gautamī accepts the karmic explanation, releases the serpent, and the episode is offered to Yudhiṣṭhira as a therapeutic-ethical model: understand suffering within karma and time, relinquish obsessive blame, and cultivate śama. Vaiśaṃpāyana concludes that Yudhiṣṭhira’s agitation subsides and he continues his dharmic inquiry.

Chapter Arc: नारायण-वन्दना के साथ कथा का द्वार खुलता है; शरशय्या पर पड़े भीष्म के पास युधिष्ठिर शान्ति का उपाय पूछते हैं—पर अपने ही कृत्य-शोक से उबर नहीं पाते। → युधिष्ठिर का आत्म-धिक्कार तीव्र होता है: ‘आपने अनेक शान्तियाँ बताईं, पर मेरे लिए कौन-सी?’ भीष्म उनके भीतर उठते अपराधबोध को लक्ष्य कर कर्म-फल की कठोरता और शोक-निवारण का उपाख्यान आरम्भ करते हैं—गौतमी, अर्जुनक, काल, मृत्यु और सर्प का प्रसंग। → उपाख्यान में गौतमी का क्षमा-स्वर और सर्प का स्वीकार—‘मैंने क्रोध या कामना से नहीं, आदेश से डँसा’—कर्म, नियति और उत्तरदायित्व की गाँठ खोल देता है; शोक का केन्द्र व्यक्ति से हटकर धर्म-तत्त्व पर टिकता है। → भीष्म निष्कर्ष देते हैं: काल-मृत्यु-सर्प जैसे आए वैसे चले गए; अर्जुनक और गौतमी का शोक दूर हुआ। युधिष्ठिर को उपदेश: शोक न करो—सब प्राणी अपने-अपने कर्मानुसार लोक पाते हैं। → युधिष्ठिर का ज्वर उतरता है और वे धर्म-विचार से प्रेरित होकर आगे प्रश्न करते हैं—भीष्म के दीर्घ अनुशासन-उपदेश का क्रम आरम्भ होने को है।

Shlokas

Verse 1

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्‌ | देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्‌ ।।

নারায়ণকে প্রণাম করে, নরশ্রেষ্ঠ নর (অর্জুন)কে, দেবী সরস্বতীকে এবং ব্যাসকে নমস্কার জানিয়ে, তারপর ‘জয়’ (মহাভারত) পাঠ করা উচিত। যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! আপনি শম—অন্তঃশান্তি—এর সূক্ষ্ম স্বরূপ নানাভাবে ব্যাখ্যা করেছেন; তবু এমন উপদেশ শুনেও আমার হৃদয়ে শান্তি জাগে না।

Verse 2

अस्मिन्नर्थे बहुविधा शान्तिरुक्ता पितामह । स्वकृते का नु शान्ति: स्थाच्छमाद्‌ बहुविधादपि

পিতামহ! এই বিষয়ে আপনি শান্তির বহু উপায় বলেছেন; কিন্তু নিজেরই কৃত অপরাধের ফলে, শমের এত নানাবিধ উপায় থেকেও শান্তি কীভাবে লাভ হতে পারে?

Verse 3

शराचितशरीर हि तीव्रव्रणमुदीक्ष्य च । शर्म नोपलभे वीर दुष्कृतान्येव चिन्तयन्‌

বীরশ্রেষ্ঠ! তীরবিদ্ধ আপনার দেহ ও তার গভীর ক্ষত দেখে আমি বারবার নিজের দুষ্কর্মই স্মরণ করি; তাই এক মুহূর্তও শান্তি পাই না।

Verse 4

रुधिरेणावसिक्ताडुं प्रस्रवन्तं यथाचलम्‌ । त्वां दृष्टवा पुरुषव्याप्र सीदे वर्षास्विवाम्बुजम्‌

পুরুষব্যাঘ্র! আপনার দেহ রক্তে সিক্ত, আর পর্বতপ্রপাতের মতো রক্তধারা ঝরে পড়ছে। এই অবস্থায় আপনাকে দেখে আমি বর্ষাকালের পদ্মের মতোই ম্লান হয়ে যাই।

Verse 5

अतः कष्टतरं कि नु मत्कृते यत्‌ पितामह: । इमामवस्थां गमितः: प्रत्यमित्रै रणाजिरे,मेरे ही कारण समराड्डणमें शत्रुओंने जो पितामहको इस अवस्थामें पहुँचा दिया, इससे बढ़कर कष्टकी बात और क्या हो सकती है?

যুধিষ্ঠির বললেন—আমারই কারণে রণাঙ্গনে শত্রুরা পিতামহকে এই অবস্থায় এনে ফেলেছে; এর চেয়ে বড় দুঃখ আর কী হতে পারে?

Verse 6

तथा चान्ये नृपतय: सहपुत्रा: सबान्धवा: । मत्कृते निधन प्राप्ता: कि नु कष्टतरं ततः

এ ছাড়াও বহু রাজা আমারই কারণে পুত্র ও স্বজনসহ যুদ্ধে নিহত হয়েছেন; এর চেয়ে বড় শোক আর কী হতে পারে?

Verse 7

वयं हि धार्तराष्ट्रश्न कालमन्युवशंगता: । कृत्वेदं निन्दितं कर्म प्राप्स्याम: कां गतिं नूप ७ ।।

হে নরেশ! আমরা পাণ্ডব এবং ধৃতরাষ্ট্রের পুত্রেরা—সময় ও ক্রোধের বশে পড়ে এই নিন্দিত কর্ম করেছি; এখন কোন গতি আমাদের হবে?

Verse 8

इदं तु धार्तराष्ट्रस्थ श्रेयो मन्ये जनाधिप । इमामवस्थां सम्प्राप्तं यदसौ त्वां न पश्यति

হে জনাধিপ! ধৃতরাষ্ট্রপুত্র দুর্যোধনের পক্ষে আমি এটাকেই মঙ্গল মনে করি—সে মৃত্যুবরণ করেছে, তাই আপনাকে এই অবস্থায় পড়ে থাকতে দেখছে না।

Verse 9

सो5हं तव हान्तकर: सुहृद्वधकरस्तथा । न शान्तिमधिगच्छामि पश्यंस्त्वां दुःखितं क्षितौ

আমিই আপনার প্রাণান্তকারী, আর আমিই অন্যান্য প্রিয় সুহৃদদেরও সংহারক। আপনাকে এই দুঃখময় অবস্থায় ভূমিতে শুয়ে থাকতে দেখে আমার শান্তি আসে না।

Verse 10

दुर्योधनो हि समरे सहसैन्य: सहानुज: । निहतः क्षत्रधर्मेडस्मिन्‌ दुरात्मा कुलपांसन:,दुरात्मा एवं कुलाड्ार दुर्योधन सेना और बन्धुओं सहित क्षत्रियधर्मके अनुसार होनेवाले इस युद्धमें मारा गया

কুলকলঙ্ক দুষ্টাত্মা দুর্যোধন এই সমরে ক্ষত্রধর্মানুসারে, সেনা ও অনুজদেরসহ নিহত হয়েছে।

Verse 11

न स पश्यति दुष्टात्मा त्वामद्य पतितं क्षितौ । अतः: श्रेयो मृतं मन्‍्ये नेह जीवितमात्मन:

সেই দুষ্টাত্মা আজ তোমাকে এভাবে ভূমিতে পতিত দেখে না; তাই আমার কাছে এখানে জীবন নয়, মৃত্যুই শ্রেয় বলে মনে হয়।

Verse 12

अहं हि समरे वीर गमित: शत्रुभि: क्षयम्‌ । अभविष्यं यदि पुरा सह भ्रातृभिरच्युत

হে বীর, মর্যাদায় অচল! যদি আমি ভ্রাতৃদেরসহ পূর্বেই শত্রুদের হাতে যুদ্ধে নিহত হতাম, তবে তোমাকে এভাবে শরবিদ্ধ ও অসহ্য দুঃখে কাতর দেখতে হতো না।

Verse 13

।। नूनं हि पापकर्माणो धात्रा सृष्टा: सम हे नृप

হে নৃপ, হে নরেশ্বর! নিশ্চয়ই বিধাতা আমাদের পাপকর্মী করেই সৃষ্টি করেছেন। রাজন, যদি আপনি আমার প্রিয় করতে চান, তবে এমন উপদেশ দিন যাতে পরলোকে গিয়েও আমি এই পাপ থেকে মুক্তি পাই।

Verse 14

अन्यस्मिन्नपि लोके वै यथा मुच्येम किल्बिषात्‌ | तथा प्रशाधि मां राजन्‌ मम चेदिच्छसि प्रियम्‌

হে রাজন, যদি আপনি আমার প্রিয় করতে চান, তবে এমনভাবে আমাকে উপদেশ দিন যাতে আমরা অন্য লোকেও পাপ থেকে মুক্ত হতে পারি।

Verse 15

भीष्म उवाच परतन्त्रं कथं हेतुमात्मानमनुपश्यसि । कर्मणां हि महाभाग सूक्ष्म होतदतीन्द्रियम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে মহাভাগ, তুমি তো সর্বদাই পরতন্ত্র—কাল, অদৃষ্ট ও ঈশ্বরের অধীন; তবে কীভাবে নিজেকেই শুভাশুভ কর্মের কারণ বলে মনে কর? কর্মের প্রকৃত কারণ অতি সূক্ষ্ম এবং ইন্দ্রিয়ের অতীত।

Verse 16

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । संवादं मृत्युगौतम्यो: काललुब्धकपन्नगै:,इस विषयमें विद्वान्‌ पुरुष गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं

ভীষ্ম বললেন—এ বিষয়েও জ্ঞানীরা এক প্রাচীন ইতিবৃত্তের দৃষ্টান্ত দেন—গৌতমী ও মৃত্যুর সংলাপ, যেখানে কাল, ব্যাধ (শিকারি) ও সর্পও অংশগ্রহণ করে। এই পুরাতন কাহিনি এখানে উদাহরণরূপে বলা হয়।

Verse 17

गौतमी नाम कौन्तेय स्थविरा शमसंयुता । सर्पेण दष्ट॑ स्वं पुत्रमपश्यद्गतचेतनम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে কৌন্তেয়, গৌতমী নামে এক বৃদ্ধা নারী ছিলেন, যিনি শম ও সংযমে সমৃদ্ধ। তিনি দেখলেন, তাঁর নিজের পুত্র সাপের দংশনে অচেতন হয়ে পড়ে আছে।

Verse 18

कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें गौतमी नामवाली एक बूढ़ी ब्राह्मणी थी, जो शान्तिके साधनमें संलग्न रहती थी। एक दिन उसने देखा, उसके इकलौते बेटेको साँपने डेस लिया और उसकी चेतनाशक्ति लुप्त हो गयी ।।

ভীষ্ম বললেন—হে কুন্তীনন্দন! প্রাচীন কালে গৌতমী নামে এক বৃদ্ধা ব্রাহ্মণী ছিলেন, যিনি শান্তি-সাধনায় নিবিষ্ট থাকতেন। একদিন তিনি দেখলেন, তাঁর একমাত্র পুত্রকে সাপ দংশন করেছে এবং সে জ্ঞানশূন্য হয়ে পড়েছে। তখন অর্জুনক নামে এক ব্যাধ ক্রোধে সেই সাপকে স্নায়ুর ফাঁসে বেঁধে গৌতমীর কাছে নিয়ে এল।

Verse 19

सचाब्रवीदयं ते स पुत्रहा पन्नगाधम: । ब्रृहि क्षिप्रं महाभागे वध्यतां केन हेतुना,लाकर उसने कहा--“महाभागे! यही वह नीच सर्प है, जिसने तुम्हारे पुत्रको मार डाला है। जल्दी बताओ, मैं किस तरह इसका वध करूँ?

আর সে বলল—“হে মহাভাগে! এই সেই অধম সর্প, যে তোমার পুত্রকে হত্যা করেছে। শীঘ্র বলো—কোন কারণে এবং কীভাবে একে বধ করা হবে?”

Verse 20

अग्नौ प्रक्षिप्पतामेष च्छिद्यतां खण्डशो5पि वा । न हायं बालहा पापश्चिरं जीवितुमहति

ভীষ্ম বললেন—“একে আগুনে নিক্ষেপ করো, অথবা খণ্ড খণ্ড করে কেটে ফেলো। শিশুহন্তা এই পাপী দীর্ঘকাল বাঁচার যোগ্য নয়।”

Verse 21

“मैं इसे आगमें झोंक दूँ या इसके टुकड़े-टुकड़े कर डालूँ? बालककी हत्या करनेवाला यह पापी सर्प अब अधिक समयतक जीवित रहने योग्य नहीं है” ।।

ভীষ্ম বললেন—“আমি কি একে আগুনে নিক্ষেপ করব, না কি খণ্ড খণ্ড করে কেটে ফেলব? শিশুহন্তা এই পাপী সাপ আর বাঁচার যোগ্য নয়।” গৌতমী বললেন—“অর্জুনক, একে ছেড়ে দাও। তুমি এখনো বিবেচনাহীন; তোমার দ্বারা এ সাপকে বধ করা উচিত নয়। যা অবশ্যম্ভাবী, তা জেনেও উপেক্ষা করে কে নিজের ওপর পাপের ভার চাপাবে?”

Verse 22

प्लवन्ते धर्मलघवो लोके5म्भसि यथा प्लवा: | मज्जन्ति पापगुरव: शस्त्र स्कन्नमिवोदके

ভীষ্ম বললেন—“যারা ধর্মাচরণে নিজেকে হালকা রাখে—অর্থাৎ পাপের ভার বহন করে না—তারা জলের উপর ভাসমান নৌকার মতো সংসার-সমুদ্র পার হয়। কিন্তু যারা পাপে ভারী হয়, তারা জলে নিক্ষিপ্ত অস্ত্রের মতো নরক-সমুদ্রে ডুবে যায়।”

Verse 23

हत्वा चैनं नामृतः स्यादयं मे जीवत्यस्मिन्‌ को>त्ययःस्यादयं ते । अस्योत्सर्गे प्राणयुक्तस्य जन्तो- मृत्योलोंक॑ को नु गच्छेदनन्तम्‌

ভীষ্ম বললেন—“একে হত্যা করলেও আমার পুত্র জীবিত হবে না; আর এ সাপ বেঁচে থাকলে তোমারই বা কী ক্ষতি? এমন অবস্থায় প্রাণযুক্ত জীবের প্রাণ নাশ করে কে যমের অনন্ত লোক—মৃত্যুলোকে—গমন করবে?”

Verse 24

लुब्धक उवाच जानाम्यहं देवि गुणागुणज्ञे सर्वार्तियुक्ता गुरवो भवन्ति । स्वस्थस्यैते तूपदेशा भवन्ति तस्मात क्षुद्रें सर्पमेनं हनिष्ये

ব্যাধ বলল—“গুণ-দোষজ্ঞ দেবী! আমি জানি, বয়োজ্যেষ্ঠরা কোনো প্রাণীকে কষ্টে দেখলে করুণায় ব্যথিত হন। কিন্তু এ উপদেশ তো স্বস্তিতে থাকা মানুষের জন্য; দুঃখে পীড়িতের মনে এর জোর থাকে না। তাই আমি এই নীচ সাপটিকে অবশ্যই বধ করব।”

Verse 25

शमार्थिन: कालगतिं वदन्ति सद्यः शुचं त्वर्थविदस्त्यजन्ति । श्रेय:क्षयं शोचति नित्यमोहात्‌ तस्माच्छुचं मुज्च हते भुजड़े

শিকারি বলল—যারা শান্তি কামনা করে, তারা ঘটনাকে কালের গতি বলে জেনে সঙ্গে সঙ্গে শোক ত্যাগ করে। আর যারা অর্থবিদ, উদ্দেশ্যসাধনে দক্ষ, তারা শত্রুকে বিনাশ করে তৎক্ষণাৎ দুঃখ ঝেড়ে ফেলে। কিন্তু যারা নিত্য মোহে আবদ্ধ, কল্যাণ নষ্ট হলে তারা অবিরত বিলাপ করে। অতএব এই শত্রু-সাপ নিহত হয়েছে; তুমিও এখনই পুত্রশোক ত্যাগ করো।

Verse 26

गौतम्युवाच आर्तिनिवं विद्यते3स्मद्विधानां धर्मात्मान: सर्वदा सज्जना हि । नित्यायस्तो बालको<प्यस्य तस्मा- दीशे नाहं पन्नगस्य प्रमाथे

গৌতমী বললেন—হে আর্য! আমাদের মতো লোকদের কোনো ক্ষতিতেই প্রকৃত আর্তি জাগে না; কারণ ধর্মাত্মা সজ্জনরা সর্বদা ধর্মে স্থিত থাকে। এই শিশুটিও নির্ধারিত কালে মরবারই ছিল; তাই আমি এই সাপকে বিনাশ করতে সক্ষম নই, এবং তা ন্যায়সঙ্গত বলেও মনে করি না।

Verse 27

न ब्राह्मणानां कोपो$स्ति कुत: कोपाच्च यातनाम्‌ | मार्दवात्‌ क्षम्यतां साथो मुच्यतामेष पन्नग:

শিকারি বলল—ব্রাহ্মণদের ক্রোধ থাকে না; আর ক্রোধই যদি না থাকে, তবে ক্রোধবশে তারা কীভাবে অন্যকে কষ্ট দেবে? অতএব, সাধুজন, কোমলতার আশ্রয় নাও; এই সাপের অপরাধ ক্ষমা করো এবং তাকে মুক্ত করে দাও।

Verse 28

लुब्धक उवाच हत्वा लाभ: श्रेय एवाव्यय: स्या- ल्लभ्यो लाभ्य: स्याद्‌ बलिभ्य: प्रशस्त: । कालाल्लाभो यस्तु सत्यो भवेत श्रेयोलाभ: कुत्सिते5स्मिन्न ते स्‍्थात्‌

শিকারি বলল—দেবী! এই সাপকে মেরে ফেললে বহুজনের মঙ্গল হবে; সেটাই অক্ষয় লাভ, অম্লান কল্যাণ। বলবানদের থেকে বলপ্রয়োগে লাভ আদায় করাই প্রশংসিত শ্রেষ্ঠ লাভ। আর কালের দ্বারা যে লাভ আসে, সেটাই সত্য লাভ। এই নীচ সাপ বেঁচে থাকলে তোমার কোনো শ্রেয় হবে না।

Verse 29

गौतग्युवाच का नु प्राप्ति्गहा शत्रुं निहत्य का कामाप्ति: प्राप्य शत्रुं न मुक्त्वा । कस्मात्‌ सौम्याहं न क्षमे नो भुजड़े मोक्षार्थ वा कस्य हेतोर्न कुर्यामू

গৌতমী বললেন—হে আর্য! শত্রুকে ধরে এনে মেরে ফেললে কী লাভ? আর শত্রু হাতে পেয়েও তাকে মুক্ত না করলে কোন অভীষ্ট সিদ্ধ হয়? হে সৌম্য, আমি কেন এই সাপের অপরাধ ক্ষমা করব না? এবং কার জন্যই বা আমি তার মুক্তির জন্য চেষ্টা করব না?

Verse 30

लुब्धक उवाच अस्मादेकाद्‌ बहवो रक्षितव्या नैको बहुभ्यो गौतमि रक्षितव्य: । कृतागसं धर्मविदस्त्यजन्ति सरीसूृपं पापमिमं जहि त्वम्‌

শিকারি বলল—“হে গৌতমী, এই একটির বিনিময়ে বহু প্রাণ রক্ষা করা উচিত। যে এক প্রাণী বহুজনের জন্য বিপদ, তাকে বাঁচানো ন্যায়সঙ্গত নয়। ধর্মজ্ঞেরা অপরাধীকে ত্যাগ করেন; অতএব এই পাপী সরীসৃপ সাপটিকে বধ করো।”

Verse 31

गौतम्युवाच नास्मिन्‌ हते पन्नगे पुत्रको मे सम्प्राप्स्यते लुब्धक जीवित वै । गुणं चान्य॑ नास्य वधे प्रपश्ये तस्मात्‌ सर्प लुब्धक मुज्च जीवम्‌

গৌতমী বলল—“হে শিকারি, এই সাপটিকে মেরে ফেললেও আমার পুত্র প্রাণ ফিরে পাবে না। আর এর বধে অন্য কোনো লাভও আমি দেখি না। অতএব, হে শিকারি, সাপটিকে জীবিতই মুক্ত করে দাও।”

Verse 32

लुब्धक उवाच वृत्रं हत्वा देवराट्‌ श्रेष्ठभाग्‌ वै यज्ञ हत्वा भागमवाप चैव । शूली देवो देववृत्तं चर त्वं क्षिप्रं सर्प जहि मा भूत्‌ ते विशड्का

শিকারি বলল—“দেবী, বৃত্রকে বধ করে দেবরাজ ইন্দ্র শ্রেষ্ঠ অংশ ও মর্যাদা লাভ করেছিলেন; আর ত্রিশূলধারী রুদ্র দক্ষের যজ্ঞ ধ্বংস করে তাতেই নিজের অংশ গ্রহণ করেছিলেন। তুমিও দেবতাদের এই আচরণ অনুসরণ করো—শীঘ্রই এই সাপটিকে বধ করো; এ কাজে তোমার মনে কোনো সংশয় রেখো না।”

Verse 33

भीष्य उवाच असकृत्‌ प्रोच्यमानापि गौतमी भुजगं प्रति । लुब्धकेन महाभागा पापे नैवाकरोन्मतिम्‌,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! व्याधके बार-बार कहने और उकसानेपर भी महाभागा गौतमीने सर्पको मारनेका विचार नहीं किया

ভীষ্ম বললেন—“হে রাজন, শিকারি বারবার প্ররোচনা দিলেও মহাভাগা গৌতমী সেই পাপী সাপটিকে বধ করার সংকল্প করলেন না।”

Verse 34

ईषदुच्छवसमानस्तु कृच्छात्‌ संस्तभ्य पन्नग: । उत्ससर्ज गिरं मन्दां मानुषीं पाशपीडित:

ভীষ্ম বললেন—“সে সময় ফাঁসের যন্ত্রণায় পীড়িত সাপটি ক্ষীণ শ্বাস নিতে নিতে, বহু কষ্টে নিজেকে সামলে, মৃদু স্বরে মানুষের ভাষায় কথা বলল।”

Verse 35

सर्प उवाच को न्वर्जुनक दोषोअत्र विद्यते मम बालिश । अस्वतन्त्र हि मां मृत्युर्विवशं यदचूचुदत्‌

সাপ বলল—হে মূর্খ অর্জুনক! এতে আমার কী দোষ আছে? আমি তো স্বাধীনের নই। মৃত্যু আমাকে বাধ্য করে এই কর্মে প্রেরিত করেছে।

Verse 36

तस्यायं वचनाद्‌ू दष्टो न कोपेन न काम्यया । तस्य तत्किल्बिषं लुब्ध विद्यते यदि किल्बिषम्‌

তার কথামাত্রে আমি এই বালককে দংশন করেছি—না ক্রোধে, না কামনায়। হে ব্যাধ! যদি এতে কোনো অপরাধ থাকে, তা আমার নয়; তা মৃত্যুরই।

Verse 37

लुब्धक उवाच यद्यन्यवशगेनेदं कृतं ते पन्नगाशुभम्‌ । कारणं वै त्वमप्यत्र तस्मात्‌ त्वमपि किल्बिषी

ব্যাধ বলল—হে সাপ! যদিও তুমি অন্যের অধীনে থেকে এই পাপ করেছ, তবু তুমিও এতে কারণ; অতএব তুমিও অপরাধী।

Verse 38

मृत्पात्रस्य क्रियायां हि दण्डचक्रादयो यथा । कारणत्वे प्रकल्प्यन्ते तथा त्वमपि पन्नग

হে সাপ! যেমন মাটির পাত্র তৈরিতে দণ্ড, চাকা প্রভৃতি উপকরণকেও কারণ ধরা হয়, তেমনি এই বালকের বধে তুমিও কারণ।

Verse 39

किल्बिषी चापि मे वध्य: किल्बिषी चासि पन्नग । आत्मानं कारणं द्वात्र त्वमाख्यासि भुजड्रम

অপরাধী যে-ই হোক, সে আমার হাতে বধ্য; হে পন্নগ! তুমিও অপরাধী, কারণ তুমিই এখানে নিজেকে কারণ বলে স্বীকার করছ। অতএব, হে ভুজঙ্গ, তুমি নিজের বধের দায় নিজেরই উপর নিলে।

Verse 40

सर्प उवाच सर्व एते हास्ववशा दण्डचक्रादयो यथा । तथाहमपि तस्मान्मे नैष दोषो मतस्तव

সাপ বলল—ব্যাধ! যেমন মাটির ঘট গড়তে দণ্ড, চক্র প্রভৃতি সব উপকরণ অন্যের অধীন থাকে, তেমনই আমিও মৃত্যুর অধীন। অতএব তুমি যে দোষ আমার উপর আরোপ করছ, তা আমার মতে যথার্থ নয়।

Verse 41

अथवा मततमेतत्ते ते5प्यन्योन्यप्रयोजका: । कार्यकारणसंदेहो भवत्यन्योन्यचोदनात्‌

অথবা যদি তোমার এই মত হয় যে দণ্ড-চক্র প্রভৃতিও পরস্পরকে প্রেরণা দেয় এবং তাই কারণ বলে গণ্য—তবে এমন পারস্পরিক প্রেরণা মানলে কার্য-কারণের নির্ণয়েই সন্দেহ জন্মায়।

Verse 42

एवं सति न दोषो मे नास्मि वध्यो न किल्बिषी । किल्विषं समवाये स्यान्मन्यसे यदि किल्बिषम्‌

এমন হলে আমার কোনো দোষ নেই; আমি না বধ্য, না পাপী। আর যদি তুমি একে পাপ বলেই মানো, তবে সে পাপ সকল সহকারী কারণের সমষ্টির উপরই বর্তাবে।

Verse 43

लुब्धक उवाच कारणं यदि न स्याद्‌ वै न कर्ता स्यास्त्वमप्युत । विनाशकारणं त्वं च तस्माद्‌ वध्योडसि मे मतः

ব্যাধ বলল—সাপ! ধরো তুমি না অপরাধের কারণ, না কর্তা; তবু এই বালকের বিনাশ তোমার দ্বারাই ঘটেছে। অতএব আমার মতে তুমি বধ্য।

Verse 44

असत्यपि कृते कार्य नेह पन्नग लिप्यते । तस्मान्नात्रैव हेतु: स्याद्‌ वध्य: कि बहु भाषसे

ব্যাধ বলল—হে পন্নগ! প্রয়োজনীয় কাজ সাধনে অসত্যের আশ্রয় নেওয়া হলেও এখানে সাপ কলুষিত হয় না। অতএব এ বিষয়ে তাকে বধ করার কোনো কারণ নেই; তুমি এত দীর্ঘ তর্ক কেন করছ?

Verse 45

सर्प! तेरे मतके अनुसार यदि दुष्टतापूर्ण कार्य करके भी कर्ता उस दोषसे लिप्त नहीं होता है

সাপ বলল—“ফল না থাকলে ক্রিয়াকে ক্রিয়া বলা যায় না, কারণ উপস্থিত থাকলেও। অতএব এই বিষয়ে আমরা (আমি ও মৃত্যু) উভয়েই কারণ বলে মনে হলেও, বিশেষ দোষ পড়ে সেই প্রেরকের ওপর, যে কর্মকে চালায় ও নির্দেশ দেয়। তুমি যদি এই শিশুর মৃত্যুর প্রকৃত কারণ আমাকে মনে করো, তবে তা তোমার ভ্রান্তি; বিচার করলে দেখা যায়, প্রেরক—মৃত্যুই—প্রাণিনাশে অপরাধী, কারণ ধ্বংসের প্রবাহ সে-ই চালায়।”

Verse 46

यद्य॒हं कारणत्वेन मतो लुब्धक तत्त्वतः । अन्य: प्रयोगे स्यादत्र किल्बिषी जन्तुनाशने

সাপ বলল—“হে ব্যাধ! তুমি যদি সত্যিই আমাকে কারণ বলে মানো, তবে যথার্থ বিচার করো: এই প্রাণিহত্যায় অপরাধী অন্যজন—যে কর্মকে প্রেরণা দেয়। যাকে চালানো হয় সেই কর্তা না থাকলে কোনো ক্রিয়া ঘটে না; তাই আমরা দুজন কারণ বলে গণ্য হলেও, দোষ বিশেষ করে প্রেরকের ওপরই পড়ে। এই শিশুর মৃত্যুর প্রকৃত কারণ আমাকে ভাবা তোমার মোহ; প্রেরক তো মৃত্যুই, আর সে-ই প্রাণিনাশক।”

Verse 47

लुब्धक उवाच वध्यस्त्वं मम दुर्बुद्धे बालघाती नृशंसकृत्‌ । भाषसे किं बहु पुनर्वध्य: सन्‌ पन्नगाधम

ব্যাধ বলল—“হে দুর্বুদ্ধি নীচ সাপ! তুমি শিশু-হন্তা, নিষ্ঠুর কর্মকারী; তাই আমার হাতে বধের যোগ্য। মৃত্যুদণ্ডের যোগ্য হয়েও তুমি নিজেকে নির্দোষ প্রমাণ করতে বারবার এত কথা কেন বলছ, হে অধম সর্প?”

Verse 48

सर्प उवाच यथा हवींषि जुद्दाना मखे वै लुब्धकर्त्विज: । न फल प्राप्रुवन्त्यत्र फलयोगे तथा हाहम्‌

সাপ বলল—“হে ব্যাধ! যেমন লোভী ঋত্বিজেরা যজ্ঞে অগ্নিতে আহুতি দেয়, কিন্তু সেই যজ্ঞের ফল তারা পায় না; তেমনি এই পাপের ফল—অর্থাৎ দণ্ড—ভোগে আমাকে অংশী করা উচিত নয়। মৃত্যুকর্মের প্রকৃত কর্তা তো মৃত্যুই।”

Verse 49

भीष्म उवाच तथा ब्रुवति तस्मिंस्तु पन्नगे मृत्युचोदिते । आजगाम ततो मृत्यु: पन्नगं चाब्रवीदिदम्‌

ভীষ্ম বললেন—“রাজন! মৃত্যুর প্রেরণায় যে সাপটি শিশুটিকে দংশন করেছিল, সে যখন এভাবে বারবার নিজেকে নির্দোষ বলে মৃত্যুর ওপর দোষ চাপাতে লাগল, তখন মৃত্যু-দেবতা সেখানে এসে সাপটিকে এইভাবে বললেন।”

Verse 50

मृत्युरुवाच प्रचोदितो5हं कालेन पन्नग त्वामचूचुदम्‌ । विनाशहेतुर्नास्य त्वमहं न प्राणिन: शिशो:

মৃত্যু বলল—হে সর্প! কালের প্রেরণায় আমি তোমাকে দংশন করতে প্ররোচিত করেছি। অতএব এই শিশুজীবের বিনাশে না তুমি প্রকৃত কারণ, না আমি।

Verse 51

यथा वायुर्जलधरान्‌ विकर्षति ततस्तत: । तद्धज्जलदवत्‌ सर्प कालस्याहं वशानुग:,सर्प! जैसे हवा बादलोंको इधर-उधर उड़ा ले जाती है, उन बादलोंकी ही भाँति मैं भी कालके वशमें हूँ

ভীষ্ম বললেন—হে সর্প! যেমন বায়ু মেঘকে এদিকে-ওদিকে টেনে নিয়ে যায়, তেমনি আমিও সেই মেঘের মতো কালের অধীন হয়ে বহমান।

Verse 52

साच्विका राजसाश्षैव तामसा ये च केचन । भावा: कालात्मका: सर्वे प्रवर्तन्ते ह जन्तुषु,सात्विक, राजस और तामस जितने भी भाव हैं, वे सब कालात्मक हैं और कालकी ही प्रेरणासे प्राणियोंको प्राप्त होते हैं

ভীষ্ম বললেন—সাত্ত্বিক, রাজস, তামস—এবং আরও যে কোনো ভাব—সবই কালের স্বরূপ; কালের প্রেরণাতেই সেগুলি জীবের মধ্যে প্রবৃত্ত হয়।

Verse 53

जड़मा: स्थावराश्नैव दिवि वा यदि वा भुवि | सर्वे कालात्मका: सर्प कालात्मकमिदं जगत्‌,सर्प! पृथ्वी अथवा स्वर्गलोकमें जितने भी स्थावर-जड़म पदार्थ हैं, वे सभी कालके अधीन हैं। यह सारा जगत्‌ ही कालस्वरूप है

ভীষ্ম বললেন—হে সর্প! স্বর্গে হোক বা পৃথিবীতে, যত জড় ও স্থাবর পদার্থ আছে, সবই কালের অধীন। এই সমগ্র জগৎই কালের স্বরূপ।

Verse 54

प्रवृत्तयश्च लोके5स्मिंस्तथैव च निवृत्तय: । तासां विकृतयो याश्व्‌ सर्व कालात्मकं स्मृतम्‌,इस लोकमें जितने प्रकारकी प्रवृत्ति-निवृत्ति तथा उनकी विकृतियाँ (फल) हैं, ये सब कालके ही स्वरूप हैं

ভীষ্ম বললেন—এই জগতে যত প্রবৃত্তি ও নিবৃত্তি আছে, এবং সেগুলি থেকে যে যে বিকার বা ফল জন্মায়—সবই কালেরই প্রকাশ বলে মানা হয়।

Verse 55

आदित्यश्रन्द्रमा विष्णुरापो वायु: शतक्रतुः । अग्नि:खं पृथिवी मित्र: पर्जन्यो वसवो5दिति:

ভীষ্ম বললেন—সূর্য, চন্দ্র, বিষ্ণু, জল, বায়ু, শতক্রতু (ইন্দ্র), অগ্নি, আকাশ, পৃথিবী, মিত্র, পর্জন্য (বৃষ্টি-দেব), বসুগণ ও অদিতি—এদেরই জগতে ব্যাপ্ত দিব্য শক্তি বলে জানতে হবে।

Verse 56

सरित: सागराश्षैव भावाभावौ च पन्नग । सर्वे कालेन सृज्यन्ते द्वियन्ते च पुन: पुन:

ভীষ্ম বললেন—হে পন্নগ! নদী ও সাগর, আর অস্তিত্ব ও অনস্তিত্ব—সবই কালের দ্বারা সৃষ্ট হয়, আর বারবার কালের দ্বারাই ক্ষয়প্রাপ্ত হয়।

Verse 57

पन्नग! सूर्य, चन्द्रमा, जल, वायु, इन्द्र, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, मित्र, पर्जन्य, वसु, अदिति, नदी, समुद्र तथा भाव और अभाव--ये सभी कालके द्वारा ही रचे जाते हैं और काल ही इनका संहार कर देता है ।।

হে পন্নগ! সূর্য, চন্দ্র, জল, বায়ু, ইন্দ্র, অগ্নি, আকাশ, পৃথিবী, মিত্র, পর্জন্য, বসুগণ, অদিতি, নদী, সমুদ্র এবং ভাব-অভাব—এ সবই কালের দ্বারা সৃষ্ট, আর কালই এদের বিনাশ করে। এ কথা জেনেও, হে সাপ! তুমি আমাকে দোষী কীভাবে মনে কর? আর যদি এমন অবস্থাতেও আমার ওপর দোষ আরোপ করা যায়, তবে তুমিও দোষীই হও।

Verse 58

सर्प! यह सब जानकर भी तुम मुझे कैसे दोषी मानते हो? और यदि ऐसी स्थितिमें भी मुझपर दोषारोपण हो सकता है, तब तो तू भी दोषी ही है ।।

হে সাপ! এ সব জেনেও তুমি আমাকে কীভাবে দোষী মনে কর? আর যদি এমন অবস্থাতেও আমার ওপর দোষ আরোপ করা যায়, তবে তুমিও দোষী। সাপ বলল—হে মৃত্যু! আমি তোমাকে না নির্দোষ বলি, না দোষী। আমি শুধু এতটুকুই বলি—এই বালককে দংশন করতে তুমি-ই আমাকে প্ররোচিত করেছিলে।

Verse 59

यदि काले तु दोषो<स्ति यदि तत्रापि नेष्यते । दोषो नैव परीक्ष्यो मे न ह्ृत्राधिकृता वयम्‌

যদি কালের মধ্যে দোষ থাকে, কিংবা সেখানেও দোষ মানা না হয়—তবু তাই হোক। কারও দোষ বিচার করা আমার কাজ নয়; এখানে বিচার করার অধিকারও আমার নেই।

Verse 60

निर्मोक्षस्त्वस्य दोषस्य मया कार्या यथा तथा । मृत्योरपि न दोष: स्यादिति मे<त्र प्रयोजनम्‌

সাপ বলল— আমার ওপর যে দোষ আরোপ করা হয়েছে, তা যেভাবেই হোক আমাকে দূর করতেই হবে। আমার কথার উদ্দেশ্য এই নয় যে মৃত্যুকেও দোষী প্রমাণ করা।

Verse 61

भीष्म उवाच सर्पो3थार्जुनकं प्राह श्रुतं ते मृत्युभाषितम्‌ । नानागसं मां पाशेन संतापयितुमरहसि

ভীষ্ম বললেন— যুধিষ্ঠির! তারপর সাপটি অর্জুনককে বলল— “তুমি তো মৃত্যুর কথা শুনলে, তাই না? এখন নির্দোষ আমাকে ফাঁসে বেঁধে কষ্ট দেওয়া তোমার পক্ষে শোভন নয়।”

Verse 62

लुब्धक उवाच मृत्यो: श्रुतं मे वचनं तव चैव भुजड़म । नैव तावददोषत्वं भवति त्वयि पन्नग

ব্যাধ বলল— হে পন্নগ! আমি মৃত্যুর কথাও শুনেছি, তোমার কথাও শুনেছি, হে ভুজঙ্গ; তবু এতেই তোমার নির্দোষতা প্রমাণিত হয় না।

Verse 63

मृत्युस्त्वं चैव हेतुर्हि बालस्यास्य विनाशने । उभयं कारणं मन्ये न कारणमकारणम्‌

এই বালকের বিনাশে তুমি এবং মৃত্যু— উভয়েই কারণ; অতএব আমি দুজনকেই দায়ী মনে করি, এক জনকে দোষী আর অন্য জনকে নির্দোষ বলে মানি না।

Verse 64

धिड़मृत्युं च दुरात्मानं क्रूरं दु:खकरं सताम्‌ | त्वां चैवाहं वधिष्यामि पापं पापस्य कारणम्‌

সজ্জনদের দুঃখদাতা সেই নিষ্ঠুর, দুষ্টাত্মা মৃত্যুকে ধিক্! আর তুই তো এই পাপের কারণই বটে। অতএব, হে পাপাত্মা, আমি নিশ্চয়ই তোকে বধ করব।

Verse 65

मृत्युरुवाच विवशौ कालवशगावावां निर्दिष्टकारिणौ । नावां दोषेण गन्तव्यौ यदि सम्यक्‌ प्रपश्यसि

মৃত্যু বলল—আমরা দু’জনই অসহায়, কালের অধীন; যেভাবে নির্দেশ দেওয়া হয়, সেভাবেই কাজ করি। তুমি যদি স্পষ্টভাবে দেখো, তবে আমাদের দোষ দেবে না—যেন এ আমাদের অপরাধ।

Verse 66

मृत्युने कहा--व्याध! हम दोनों कालके अधीन होनेके कारण विवश हैं। हम तो केवल उसके आदेशका पालनमात्र करते हैं। यदि तुम अच्छी तरह विचार करोगे तो हमलोगोंपर दोषारोपण नहीं करोगे ।।

ব্যাধ বলল—হে মৃত্যু, হে সর্প! তোমরা দু’জনই যদি কালের অধীন হও, তবে আমি জানতে চাই—পরোপকারী জনের প্রতি আমার মনে কেন আনন্দ জাগে, আর অনিষ্টকারী তোমাদের দু’জনের প্রতি কেন ক্রোধ ওঠে? যদি সবই কালের বিধানে বাঁধা, তবে প্রশংসা-নিন্দা, প্রীতি-বিদ্বেষ মনকে কেন গ্রাস করে?

Verse 67

मृत्युरुवाच या काचिदेव चेष्टा स्यात्‌ सर्वा कालप्रचोदिता । पूर्वमेवैतदुक्त हि मया लुब्धक कालत:

মৃত্যু বলল—হে ব্যাধ! জগতে যে কোনো চেষ্টাই হোক, সবই কালের প্রেরণায় ঘটে। এ কথা আমি আগেই তোমাকে বলেছি—সবই কালের দ্বারা চালিত।

Verse 68

तस्मादुभौ कालवशावावां निर्दिष्टकारिणौ । नावां दोषेण गन्तव्यौ त्वया लुब्धक कहिचित्‌,अतः व्याध! हम दोनोंको कालके अधीन और कालके ही आदेशका पालक समझकर तुम्हें कभी हमारे ऊपर दोषारोपण नहीं करना चाहिये

অতএব, হে ব্যাধ! আমাদের দু’জনকে কালের অধীন এবং তারই নির্দেশ পালনকারী জেনে কখনো আমাদের দোষ দিও না।

Verse 69

भीष्म उवाच अथोपगम्य कालस्तु तस्मिन्‌ धर्मार्थसंशये । अब्रवीत्‌ पन्नगं मृत्युं लुब्धं चार्जुनकं तथा

ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! তারপর ধর্ম ও অর্থ বিষয়ে সংশয় দেখা দিলে কাল স্বয়ং সেখানে উপস্থিত হল এবং সে সর্প, মৃত্যু, লুব্ধক ও অর্জুনক ব্যাধকে এইভাবে বলল।

Verse 70

काल उवाच न हाहं नाप्ययं मृत्युर्नायं लुब्धक पन्नग: । किल्बिषी जन्तुमरणे न वयं हि प्रयोजका:

কাল বললেন—হে ব্যাধ! না আমি, না এই মৃত্যু, আর না এই সাপ—এই প্রাণীর মৃত্যুর জন্য দোষী। আমরা কারও মৃত্যুর প্রেরক বা কার্যকারণ নই; তার নিজের কর্ম এবং ধর্ম-নিয়মের পরিপাকে ফলই এখানে কারণ।

Verse 71

अकरोद्‌ यदयं कर्म तन्नोडर्जुनक चोदकम्‌ | विनाशहेतुर्नान्यो5स्य वध्यते5यं स्वकर्मणा

কাল বললেন—হে অর্জুনক! এ যে কর্ম করেছে, সেই কর্মই এর পরিণামকে চালিত করেছে। এর বিনাশের অন্য কোনো কারণ নেই; এই জীব নিজের কর্মেই মৃত্যুর মুখে পতিত হয়।

Verse 72

यदनेन कृतं कर्म तेनायं निधनं गतः । विनाशहेतु: कर्मास्य सर्वे कर्मवशा वयम्‌,इस बालकने जो कर्म किया है, उसीसे यह मृत्युको प्राप्त हुआ है। इसका कर्म ही इसके विनाशका कारण है। हम सब लोग कर्मके ही अधीन हैं

কাল বললেন—এ যে কর্ম করেছে, সেই কর্মের দ্বারাই এ মৃত্যু লাভ করেছে। এর বিনাশের কারণ তারই কর্ম; আমরা সকলেই কর্মের অধীন।

Verse 73

कर्मदायादवॉल्लोक: कर्मसम्बन्धलक्षण: । कर्माणि चोदयन्तीह यथान्योन्यं तथा वयम्‌

কাল বললেন—এই জগতে কর্মই মানুষের উত্তরাধিকারী; পুত্র-পৌত্রের মতোই তা তাকে অনুসরণ করে। সুখ-দুঃখের সম্পর্কের চিহ্নও কর্মই। এখানে কর্ম যেমন পরস্পরকে প্রেরণা দেয়, তেমনি আমরাও কর্মের দ্বারাই চালিত হই।

Verse 74

यथा मृत्पिण्डत: कर्ता कुरुते यद्‌ यदिच्छति । एवमात्मकृतं कर्म मानव: प्रतिपद्यते

যেমন কুমোর মাটির ঢেলা থেকে যেমন পাত্র ইচ্ছা করে তেমনই গড়ে তোলে, তেমনি মানুষ নিজেরই কৃত কর্ম অনুসারে ফল ভোগ করে।

Verse 75

यथा च्छायातपौ नित्यं सुसम्बद्धौ निरन्तरम्‌ । तथा कर्म च कर्ता च सम्बद्धावात्मकर्मभि:

যেমন রোদ ও ছায়া চিরকাল অবিচ্ছিন্নভাবে পরস্পরের সঙ্গে যুক্ত থাকে, তেমনই কর্ম ও কর্তা নিজ নিজ কর্মানুসারে অটুট বন্ধনে আবদ্ধ থাকে।

Verse 76

एवं नाहं न वै मृत्युने सर्पो न तथा भवान्‌ । नचेयं ब्राह्मणी वृद्धा शिशुरेवात्र कारणम्‌

এইভাবে বিচার করলে—না আমি, না মৃত্যু, না সাপ, না তুমি (ব্যাধ), আর না এই বৃদ্ধা ব্রাহ্মণী—কেউই এ বালকের মৃত্যুর প্রকৃত কারণ নয়; এখানে এই শিশুই নিজের কর্মবলে নিজের মৃত্যুর কারণ হয়েছে।

Verse 77

तस्मिंस्तथा ब्रुवाणे तु ब्राह्मणी गौतमी नृप । स्वकर्मप्रत्ययाँललोकान्‌ मत्वार्जुनकमब्रवीत्‌

হে রাজন, তিনি এভাবে বলছিলেন তখন ব্রাহ্মণী গৌতমী—প্রাণীরা নিজ নিজ কর্মের নিশ্চিত ফল অনুসারে নিজ নিজ লোক লাভ করে—এ কথা মনে করে অর্জুনককে সম্বোধন করলেন।

Verse 78

नरेश्वरर कालके इस प्रकार कहनेपर गौतमी ब्राह्मणीको यह निश्चय हो गया कि मनुष्यको अपने कर्मोंके अनुसार ही फल मिलता है। फिर वह अर्जुनकसे बोली ।।

গৌতমী বললেন—হে ব্যাধ! এখানে না কাল, না সাপ, না মৃত্যু—কেউই কারণ নয়। এই শিশুই নিজের কর্মের প্রেরণায় কালের দ্বারা বিনাশপ্রাপ্ত হয়েছে।

Verse 79

मया च तत्‌ कृतं कर्म येनायं मे मृत: सुतः । यातु कालस्तथा मृत्युर्मुज्चार्जुनक पन्नगम्‌

অর্জুনক! আমিও এমন কর্ম করেছিলাম, যার ফলে আমার পুত্র মারা গিয়েছিল। অতএব কাল ও মৃত্যু নিজ নিজ স্থানে ফিরে যাক; আর তুমি এই সাপটিকে মুক্ত করে দাও।

Verse 80

भीष्म उवाच ततो यथागतं जम्मुर्मुत्यु: कालो5थ पन्नग: । अभूद्‌ विशोकोअर्जुनको विशोका चैव गौतमी

ভীষ্ম বললেন—তারপর মৃত্যু, কাল এবং সর্প যেমন এসেছিল তেমনই ফিরে গেল। অর্জুনকের শোক দূর হল, আর গৌতমীরও শোক নাশ হল।

Verse 81

भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर काल, मृत्यु और सर्प जैसे आये थे वैसे ही चले गये; और अर्जुनक तथा गौतमी ब्राह्मणीका भी शोक दूर हो गया ।।

ভীষ্ম বললেন—রাজন! তারপর কাল, মৃত্যু ও সর্প যেমন এসেছিল তেমনই চলে গেল; আর অর্জুনক ও ব্রাহ্মণী গৌতমীর শোকও দূর হল। এ কথা শুনে শান্ত হও, হে নৃপ; শোকে ডুবে থেকো না। সকলেই নিজ নিজ কর্মফলের বন্ধনে নির্ধারিত লোকেই গমন করে।

Verse 82

नरेश्वर! इस उपाख्यानको सुनकर तुम शान्ति धारण करो, शोकमें न पड़ो। सब मनुष्य अपने-अपने कर्मोके अनुसार प्राप्त होनेवाले लोकोंमें ही जाते हैं ।।

হে নরেশ্বর! এই উপাখ্যান শুনে তুমি শান্তি ধারণ করো, শোকে পতিত হয়ো না। সকল মানুষ নিজ নিজ কর্ম অনুসারে যে লোক প্রাপ্য, সেই লোকেই গমন করে। এ কাজ না তুমি করেছ, না দুর্যোধন; জেনে রেখো, এ কালেরই কৃত, যার দ্বারা পৃথিবীর রাজারা নিহত হয়েছে।

Verse 83

वैशम्पायन उवाच इत्येतद्‌ वचन श्रुत्व बभूव विगतज्वर: । युधिष्ठिरो महातेजा: पप्रच्छेद॑ च धर्मवित्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! ভীষ্মের এই বাক্য শুনে মহাতেজস্বী ধর্মজ্ঞ যুধিষ্ঠিরের অন্তরের জ্বর দূর হল; তারপর তিনি আবার প্রশ্ন করলেন।

Frequently Asked Questions

Whether retaliatory punishment of an immediate agent (the serpent) is ethically justified when the harm is irreversible, and when deeper causality may lie in karma and time rather than in a single proximate actor.

Cultivate śama by distinguishing instrumental conditions from ultimate moral causality: outcomes unfold through karma within kāla, so grief and blame should be processed through ethical discernment, restraint, and non-vengeance.

A brief narrative meta-effect functions as the closure: after hearing Bhīṣma’s exemplum, Yudhiṣṭhira becomes ‘vigatajvara’ (freed from feverish agitation) and proceeds with further dharma-questions, indicating the intended calming and instructional result rather than a formal phalaśruti.