
Adhyāya 152 — Bhīṣma’s Authorization for Yudhiṣṭhira’s Return to the Capital (नगरप्रवेशानुज्ञा)
Upa-parva: Anuśāsana (Return-to-Capital and Royal Consolation Episode)
Vaiśaṃpāyana narrates that Bhīṣma becomes silent, motionless like a painted figure, whereupon Vyāsa (Satyavatī’s son) reflects briefly and addresses the reclining Gāṅgeya. Vyāsa reports that King Yudhiṣṭhira, having regained composure, stands with all brothers, attendant kings, and the discerning Kṛṣṇa, and requests authorization to proceed to the city. Bhīṣma grants permission and speaks gently to Yudhiṣṭhira: he should enter the capital to relieve mental fever (mānasa-jvara), perform varied yajñas with ample food and properly arranged dakṣiṇā, and satisfy gods and ancestors while remaining devoted to kṣatra-dharma. He further instructs Yudhiṣṭhira to please all subjects, conciliate the prakṛtis, and honor friends and well-wishers with appropriate gifts, so that they may flourish around him like Brahmins around a fruitful tree at a sacred site. Bhīṣma sets a return appointment: Yudhiṣṭhira should come back when the sun’s southern course ends and uttarāyaṇa begins. Yudhiṣṭhira agrees, pays respects, and proceeds with his retinue—placing Dhṛtarāṣṭra and the devoted Gāndhārī at the fore, along with sages, brothers, and Keśava—entering the Kuru city (Nāgasāhvaya/Vāraṇasāhvaya).
Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर को उमा–महेश्वर-संवाद की कड़ी में ले जाते हैं—हिमवत्पुत्री पार्वती, तपोवन-निवासी और धर्मज्ञ, स्वयं महादेव से स्त्री-धर्म का मर्म पूछती हैं। → महेश्वर पार्वती की योग्यता (शम, दम, तप, धर्माचरण) की प्रशंसा कर प्रश्नोत्तर का अधिकार देते हैं; पार्वती स्त्री-स्वभाव, अनुकरण-धर्म, तीर्थ-सरिताओं के सम्मान और गृहस्थ-धर्म में नारी की स्थिति जैसे सूक्ष्म विषय उठाती हैं, जहाँ एक ही आचरण से पुण्य भी हो सकता है और लोक-निन्दा भी। → स्त्री-धर्म का निर्णायक सूत्र उभरता है—जिस नारी की स्पृहा काम-भोग-सुख-ऐश्वर्य में नहीं, बल्कि पति में केंद्रित है, वही ‘धर्मभागिनी’ है; साथ ही सभा-वाणी और बुद्धि के भेद का संकेत देकर बताया जाता है कि धर्म का निर्णय केवल वाक्चातुर्य से नहीं, अंतःकरण की निष्ठा से होता है। → उपदेश पूर्ण होने पर महादेव पार्वती का सत्कार कर अपने अनुचरों सहित लोकों को प्रस्थान करते हैं; भूतगण, गन्धर्व और अप्सराएँ प्रणाम कर यथास्थान लौटते हैं—संवाद का फल ‘स्त्री-धर्म’ की मर्यादा-रेखा के रूप में स्थापित होता है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२०९ श्लोक मिलाकर कुल १२७३ श्लोक हैं) ऑपन--माजल बछ। अकाल षट्चत्वारिंशदधिकशततमो<ध्याय: पार्वतीजीके द्वारा स्त्री-धर्मका वर्णन नारद उवाच एवमुक्त्वा महादेव: श्रोतुकाम: स्वयं प्रभु: । अनुकूलां प्रियां भार्या पारश्वस्थां समभाषत,नारदजी कहते हैं--ऐसा कहकर महादेवजी स्वयं भी पार्वतीजीके मुँहसे कुछ सुननेकी इच्छा करने लगे। अतएव स्वयं भगवान् शिवने पास ही बैठी हुई अपनी प्रिय एवं अनुकूल भार्या पार्वतीसे कहा
নাৰদে ক’লে—এইদৰে কৈ মহাদেৱ, স্বয়ং প্ৰভু হৈও, শুনিবলৈ আগ্ৰহী হ’ল। তেতিয়া তেওঁ কাষতে বহি থকা নিজৰ প্ৰিয় আৰু অনুকূল পত্নী পাৰ্বতীক সম্বোধন কৰিলে।
Verse 2
श्रीमहेश्वर उवाच परावरज्ञे धर्मज्ञे तपोवननिवासिनि । साध्वि सुभ्रु सुकेशान्ते हिमवत्पर्वतात्मजे
শ্ৰী মহেশ্বৰ ক’লে— হে পৰ-অপৰ তত্ত্বজ্ঞা, ধৰ্মজ্ঞা, তপোবনত নিবাসিনী! হে সাধ্বী, সুন্দৰ ভ্ৰূধাৰিণী, সুকেশিনী, হিমৱৎ পৰ্বতৰ আত্মজা!
Verse 3
दक्षे शमदमोपेते निर्ममे धर्मचारिणि । पृच्छामि त्वां वरारोहे पृष्टा वद ममेप्सितम्
হে দক্ষে, শম-দমে সমন্বিতা, নিৰ্মমা, ধৰ্মাচাৰিণী! হে বৰাৰোহে, মই তোমাক সোধোঁ; সোধা হ’লে মই যি জানিব খোজোঁ সেয়া কোৱা।
Verse 4
श्रीमहेश्वर बोले--तपोवनमें निवास करनेवाली देवि! तुम भूत और भविष्यको जाननेवाली, धर्मके तत्त्वको समझनेवाली और स्वयं भी धर्मका आचरण करनेवाली हो। सुन्दर केशों और भौंहोंवाली सती-साध्वी हिमवान्-कुमारी! तुम कार्यकुशल हो, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रहसे भी सम्पन्न हो। तुममें अहंता और ममताका सर्वथा अभाव है; अतः वरारोहे! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ। मेरे पूछनेपर तुम मुझे मेरे अभीष्ट विषयको बताओ ।। सावित्री ब्रह्मण:साध्वी कौशिकस्य शची सती । (लक्ष्मीविंष्णो: प्रिया भार्या धृतिर्भार्या यमस्य तु) मार्कण्डेयस्य धूमोर्णा ऋद्धिवैश्रवणस्य च,ब्रह्माजीकी पत्नी सावित्री साध्वी हैं। इन्द्रपत्नी शची भी सती हैं। विष्णुकी प्यारी पत्नी लक्ष्मी पतिव्रता हैं। इसी प्रकार यमकी भार्या धृति, मार्कण्डेयकी पत्नी धूमोर्णा, कुबेरकी स्त्री ऋद्धि, वरुणकी भार्या गौरी, सूर्यकी पत्नी सुवर्चला, चन्द्रमाकी साध्वी स्त्री रोहिणी, अग्निकी भार्या स्वाहा और कश्यपकी पत्नी अदिति--ये सब-की-सब पतितव्रता देवियाँ हैं। देवि! तुमने इन सबका सदा संग किया है और इन सबसे धर्मकी बात पूछी है
শ্ৰীমহেশ্বৰ ক’লে— হে তপোবনত নিবাসিনী দেৱী! তুমি ভূত আৰু ভৱিষ্যৎ জানো; ধৰ্মৰ তত্ত্ব বুজো আৰু নিজেও ধৰ্মাচৰণ কৰো। হে সুন্দৰ কেশ-ভ্ৰূধাৰিণী, সতী-সাধ্বী হিমৱান-কুমাৰী! তুমি কৰ্মত দক্ষ; ইন্দ্ৰিয়সংযম আৰু মনোনিগ্ৰহে সম্পন্ন; তোমাৰ ভিতৰত অহংকাৰ-মমতাৰ লেশো নাই। সেয়ে, হে বৰাৰোহে, মই তোমাক সোধোঁ— সোধা হ’লে মই যি জানিব খোজোঁ সেয়া কোৱা। ব্ৰহ্মাৰ পত্নী সাধ্বী সাবিত্ৰী; ইন্দ্ৰ (কৌশিক)ৰ পত্নী সতী শচী; বিষ্ণুৰ প্ৰিয় পত্নী পতিব্ৰতা লক্ষ্মী; যমৰ ভাৰ্যা ধৃতি; মাৰ্কণ্ডেয়ৰ পত্নী ধূমোৰ্ণা; বৈশ্ৰৱণ (কুবেৰ)ৰ পত্নী ঋদ্ধি; বৰুণৰ ভাৰ্যা গৌৰী; সূৰ্যৰ পত্নী সুবর্চলা; চন্দ্ৰৰ সাধ্বী পত্নী ৰোহিণী; বিভাৱসু (অগ্নি)ৰ ভাৰ্যা স্বাহা; আৰু কশ্যপৰ পত্নী অদিতি— এই সকলো দেৱীয়ে স্বামীক দেৱতা জ্ঞান কৰি পতিব্ৰতা। দেৱী! তুমি সদায় তেওঁলোকৰ সঙ্গ ৰাখিছা আৰু তেওঁলোকৰ পৰা ধৰ্মকথা সুধিছা।
Verse 5
वरुणस्य तथा गौरी सूर्यस्य च सुवर्चला । रोहिणी शशिन: साध्वी स्वाहा चैव विभावसो:,ब्रह्माजीकी पत्नी सावित्री साध्वी हैं। इन्द्रपत्नी शची भी सती हैं। विष्णुकी प्यारी पत्नी लक्ष्मी पतिव्रता हैं। इसी प्रकार यमकी भार्या धृति, मार्कण्डेयकी पत्नी धूमोर्णा, कुबेरकी स्त्री ऋद्धि, वरुणकी भार्या गौरी, सूर्यकी पत्नी सुवर्चला, चन्द्रमाकी साध्वी स्त्री रोहिणी, अग्निकी भार्या स्वाहा और कश्यपकी पत्नी अदिति--ये सब-की-सब पतितव्रता देवियाँ हैं। देवि! तुमने इन सबका सदा संग किया है और इन सबसे धर्मकी बात पूछी है
বৰুণৰ ভাৰ্যা গৌৰী; সূৰ্যৰ পত্নী সুবর্চলা। শশী (চন্দ্ৰ)ৰ সাধ্বী পত্নী ৰোহিণী; আৰু বিভাৱসু (অগ্নি)ৰ ভাৰ্যা স্বাহা।
Verse 6
अदिति: कश्यपस्याथ सर्वास्ता: पतिदेवता: । पृष्टाश्नोपासिताश्वैव तास्त्वया देवि नित्यश:,ब्रह्माजीकी पत्नी सावित्री साध्वी हैं। इन्द्रपत्नी शची भी सती हैं। विष्णुकी प्यारी पत्नी लक्ष्मी पतिव्रता हैं। इसी प्रकार यमकी भार्या धृति, मार्कण्डेयकी पत्नी धूमोर्णा, कुबेरकी स्त्री ऋद्धि, वरुणकी भार्या गौरी, सूर्यकी पत्नी सुवर्चला, चन्द्रमाकी साध्वी स्त्री रोहिणी, अग्निकी भार्या स्वाहा और कश्यपकी पत्नी अदिति--ये सब-की-सब पतितव्रता देवियाँ हैं। देवि! तुमने इन सबका सदा संग किया है और इन सबसे धर्मकी बात पूछी है
কশ্যপৰ পত্নী অদিতি; আৰু তেওঁলোক সকলোয়ে স্বামীক দেৱতা জ্ঞান কৰে। দেৱী! তুমি নিত্য তেওঁলোকক সুধিছা, তেওঁলোকৰ সেৱা-উপাসনা কৰি সন্মান দিছা, আৰু ধৰ্মবিষয়ে প্ৰশ্ন কৰিছা।
Verse 7
तेन त्वां परिपृच्छामि धर्मज्ञे धर्मवादिनि । स्त्रीधर्म श्रोतुमिच्छामि त्वयोदाह्ृतमादित:,अतः धर्मवादिनि धर्मज्ञे! मैं तुमसे स्त्रीधर्मके विषयमें प्रश्न करता हूँ और तुम्हारे मुखसे वर्णित नारीधर्म आद्योपान्त सुनना चाहता हूँ
সেয়ে, হে ধৰ্মজ্ঞে ধৰ্মবাদিনী! মই তোমাক স্ত্ৰীধৰ্ম বিষয়ে প্ৰশ্ন কৰিছোঁ। তোমাৰ মুখৰ পৰা আদিৰ পৰা অন্তলৈ নাৰীধৰ্ম সম্পূৰ্ণৰূপে শুনিবলৈ ইচ্ছা কৰোঁ।
Verse 8
सधर्मचारिणी मे त्वं समशीला समचव्रता । समानसारवीर्या च तपस्तीव्रं कृतं च ते,तुम मेरी सहधर्मिणी हो। तुम्हारा शील-स्वभाव तथा व्रत मेरे समान ही है। तुम्हारी सारभूत शक्ति भी मुझसे कम नहीं है। तुमने तीव्र तपस्या भी की है
তুমি মোৰ সহধৰ্মচাৰিণী; তোমাৰ শীল-স্বভাৱ আৰু ব্ৰত মোৰ সমান। তোমাৰ সাৰভূত শক্তি আৰু বীৰ্যও মোৰ তুল্য, আৰু তুমি তীব্ৰ তপস্যাও সম্পন্ন কৰিছা।
Verse 9
त्वया हुक्तो विशेषेण गुणवान् स भविष्यति । लोके चैव त्वया देवि प्रमाणत्वमुपैष्यति,अतः देवि! तुम्हारे द्वारा कहा गया स्त्रीधर्म विशेष गुणवान् होगा और लोकमें प्रमाणभूत माना जायगा
হে দেবী! তোমাৰ দ্বাৰা বিশেষভাৱে কোৱা এই স্ত্ৰীধৰ্ম গুণসমৃদ্ধ হ’ব, আৰু লোকসমাজত ই প্ৰমাণৰূপে স্বীকৃতি লাভ কৰিব।
Verse 10
स्त्रियश्वैव विशेषेण स्त्रीजनस्य गति: परा । गौर्या गच्छति सुश्रोणि लोकेष्वेषा गति: सदा
মহাদেৱে ক’লে—স্ত্ৰীসকলৰ, বিশেষকৈ স্ত্ৰীজনসমূহৰ, এক পৰম গতি আছে। হে সুশ্ৰোণি! গৌৰীক অনুসৰণ কৰি তেওঁলোকে লোকৰ পৰা লোকান্তৰলৈ গমন কৰে; এইয়েই তেওঁলোকৰ চিৰন্তন গতি।
Verse 11
विशेषतः स्त्रियाँ ही स्त्रियोंकी परम गति हैं। सुश्रोणि! संसारमें भूतलपर यह बात सदासे प्रचलित है ।। मम चार्ध शरीरस्य तव चार्धेन निर्मितम् | सुरकार्यकरी च त्वं लोकसंतानकारिणी,मेरा आधा शरीर तुम्हारे आधे शरीरसे निर्मित हुआ है। तुम देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाली तथा लोक-संततिका विस्तार करनेवाली हो
বিশেষকৈ স্ত্ৰীসকলৰ বাবে স্ত্ৰীসকলেই পৰম গতি বুলি স্মৃত। হে সুশ্ৰোণি! ভূতলত এই কথা চিৰকালৰ পৰা প্ৰচলিত। মোৰ দেহৰ অর্ধাংশ তোমাৰ অর্ধাংশেৰে নিৰ্মিত। তুমি দেৱকাৰ্য সিদ্ধ কৰোঁতা আৰু লোকসন্ততি বিস্তাৰ কৰোঁতা।
Verse 12
(प्रमदोक्तं तु यत् किंचित् तत् स्त्रीषु बहु मन्यते । न तथा मन्यते स्त्रीषु पुरुषोक्तमनिन्दिते ।।) अनिन्दिते! नारीकी कही हुई जो बात होती है, उसे ही स्त्रियोंमें अधिक महत्त्व दिया जाता है। पुरुषोंकी कही हुई बातको स्त्रियोंमें वैसा महत्त्व नहीं दिया जाता ।। तव सर्व: सुविदित: स्त्रीधर्म: शाश्वत: शुभे । तस्मादशेषतो ब्रूहि स्वधर्म विस्तरेण मे,शुभे! तुम्हें सम्पूर्ण सनातन स्त्रीधर्मका भलीभाँति ज्ञान है; अतः अपने धर्मका पूर्णरूपसे विस्तारपूर्वक मेरे आगे वर्णन करो
মহেশ্বৰ ক’লে—হে অনিন্দিতে! নাৰীৰ নিজৰ মুখে কোৱা যিকোনো কথা—প্ৰমাদত কোৱা হলেও—স্ত্ৰীসকলৰ মাজত বহুত গুৰুত্ব পায়; কিন্তু পুৰুষে কোৱা কথা স্ত্ৰীসকলৰ মাজত তেনেদৰে মূল্য নাপায়। হে শুভে! শাশ্বত আৰু কল্যাণকাৰী স্ত্ৰীধৰ্ম তুমি সম্পূৰ্ণৰূপে জানো; সেয়ে তোমাৰ স্বধৰ্ম মোক বিস্তাৰে, সম্পূৰ্ণকৈ কোৱা।
Verse 13
उमोवाच भगवन् सर्वभूतेश भूतभव्यभवोत्तम । त्वत्प्रभावादियं देव वाक् चैव प्रतिभाति मे
উমাই ক’লে—হে ভগৱান! সৰ্বভূতেশ্বৰ! ভূত, ভৱিষ্যৎ আৰু বৰ্তমানৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ! হে দেৱ, তোমাৰ প্ৰভাৱত মোৰ এই বাক্য স্পষ্টকৈ অন্তৰত উদ্ভাসিত হৈছে।
Verse 14
इमास्तु नद्यो देवेश सर्वतीर्थोदकैर्युता: । उपस्पर्शनहेतोस्त्वामुपयान्ति समीपत:
মহাদেৱ ক’লে—হে দেৱেশ! সকলো তীৰ্থৰ জলেৰে সমৃদ্ধ এই নদীবোৰ পবিত্ৰ স্পৰ্শ (উপস্পৰ্শন)ৰ বাবে তোমাৰ ওচৰলৈ আহিছে।
Verse 15
एताभि: सह सम्मन्त्र्य प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वश: । प्रभवन् यो5नहंवादी स वै पुरुष उच्यते
ইহঁতৰ সৈতে পৰামৰ্শ কৰি মই ক্ৰমে বৰ্ণনা কৰিম। যি ব্যক্তি সক্ষম আৰু প্ৰভাৱশালী হৈও ‘মই, মই’ বুলি অহংকাৰ নকৰে—অহংকাৰশূন্য থাকে—সেইজনকেই সত্যাৰ্থে পুৰুষ বোলা হয়।
Verse 16
उमाने कहा--भगवन्! सर्वभूतेश्वर! भूत, भविष्य और वर्तमानकालस्वरूप सर्वश्रेष्ठ महादेव! आपके प्रभावसे मेरी यह वाणी प्रतिभासम्पन्न हो रही है--अब मैं स्त्री-धर्मका वर्णन कर सकती हूँ। किंतु देवेश्वर! ये नदियाँ सम्पूर्ण तीर्थोके जलसे सम्पन्न हो आपके स्नान और आचमन आदिके लिये अथवा आपके चरणोंका स्पर्श करनेके लिये यहाँ आपके निकट आ रही हैं। मैं इन सबके साथ सलाह करके क्रमशः स्त्रीधर्मका वर्णन करूँगी। जो व्यक्ति समर्थ होकर भी अहंकारशून्य हो, वही पुरुष कहलाता है ।। स्त्री च भूतेश सततं स्त्रियमेवानुधावति । मया सम्मानिताश्रैव भविष्यन्ति सरिद्वरा:
উমাই ক’লে—হে ভগৱান! সৰ্বভূতেশ্বৰ! ভূত, ভৱিষ্যৎ আৰু বৰ্তমান-স্বরূপত শ্ৰেষ্ঠ মহাদেৱ! তোমাৰ প্ৰভাৱত মোৰ এই বাক্য প্ৰেৰণাৰে উজ্জ্বল আৰু স্পষ্ট হৈছে; এতিয়া মই স্ত্ৰীধৰ্ম বৰ্ণনা কৰিব পাৰোঁ। কিন্তু হে দেৱেশ্বৰ! সকলো তীৰ্থৰ জলেৰে সমৃদ্ধ এই শ্ৰেষ্ঠ নদীবোৰ তোমাৰ স্নান, আচমন আদি কাৰ্যৰ বাবে বা তোমাৰ চৰণস্পৰ্শৰ উদ্দেশ্যে তোমাৰ ওচৰলৈ আহিছে। মই ইহঁতৰ সৈতে পৰামৰ্শ কৰি ক্ৰমে স্ত্ৰীধৰ্ম বৰ্ণনা কৰিম। যি ব্যক্তি সক্ষম হৈও ‘মই, মই’ বুলি অহংকাৰ নকৰে—সেইজনকেই সত্যাৰ্থে পুৰুষ বোলা হয়। আৰু হে ভূতেশ! স্ত্ৰী সদায় স্ত্ৰীকেই অনুসৰণ কৰে; আৰু মোৰ দ্বাৰা সন্মানিত এই শ্ৰেষ্ঠ নদীবোৰ নিশ্চয়েই শুভপ্ৰবণ হ’ব।
Verse 17
भूतनाथ! स्त्री सदा स्त्रीका ही अनुसरण करती है। मेरे ऐसा करनेसे ये श्रेष्ठ सरिताएँ मेरे द्वारा सम्मानित होंगी ।। एषा सरस्वती पुण्या नदीनामुत्तमा नदी । प्रथमा सर्वसरितां नदी सागरगामिनी,(यमुना नर्मदां चैव कावेरीमथ निम्नगाम) ये नदियोंमें उत्तम पुण्यसलिला सरस्वती विराजमान हैं, जो समुद्रमें मिली हुई हैं। ये समस्त सरिताओंमें प्रथम (प्रधान) मानी जाती हैं। इनके सिवा विपाशा (व्यास), वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा (चनाव), इरावती (रावी), शतद्रू (शतलज), देविका, सिन्धु, कौशिकी (कोसी), गौतमी (गोदावरी), यमुना, नर्मदा तथा कावेरी नदी भी यहाँ विद्यमान हैं
শ্ৰী মহেশ্বৰে ক’লে—“হে ভূতনাথ! নাৰী সদায় নাৰীধৰ্মৰ পথেই অনুসৰণ কৰে। মই এইদৰে আচৰণ কৰিলে এই শ্ৰেষ্ঠ নদীবোৰ মোৰ দ্বাৰা সন্মানিত হ’ব। ইয়াত পুণ্য সৰস্বতী বিৰাজমান—নদীবোৰৰ মাজত উত্তম, সকলো সৰিতাৰ মাজত প্ৰথম, সাগৰগামিনী। ইয়াত যমুনা, নৰ্মদা আৰু কাবেৰীও আছে, আৰু সাগৰত মিলি যোৱা আন বহু নদীও ইয়াত উপস্থিত।”
Verse 18
विपाशा च वितस्ता च चन्द्रभागा इरावती । शतद्भूदेंविका सिन्धु: कौशिकी गौतमी तथा,(यमुना नर्मदां चैव कावेरीमथ निम्नगाम) ये नदियोंमें उत्तम पुण्यसलिला सरस्वती विराजमान हैं, जो समुद्रमें मिली हुई हैं। ये समस्त सरिताओंमें प्रथम (प्रधान) मानी जाती हैं। इनके सिवा विपाशा (व्यास), वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा (चनाव), इरावती (रावी), शतद्रू (शतलज), देविका, सिन्धु, कौशिकी (कोसी), गौतमी (गोदावरी), यमुना, नर्मदा तथा कावेरी नदी भी यहाँ विद्यमान हैं
শ্ৰী মহেশ্বৰে ক’লে—“বিপাশা, বিতস্তা, চন্দ্ৰভাগা, ইৰাৱতী, শতদ্ৰূ, দেৱিকা, সিন্ধু, কৌশিকী আৰু গৌতমী—আৰু যমুনা, নৰ্মদা, সাগৰগামিনী কাবেৰী—এই সকলো নদী ইয়াত উপস্থিত। নদীবোৰৰ মাজত উত্তম, পুণ্যজলধাৰিণী সৰস্বতী ইয়াত বিশেষ দীপ্তিত উজ্জ্বল; তেওঁক সাগৰসঙ্গমিনী বুলিও কীৰ্তিত কৰা হয়। এইসকলক সকলো সৰিতাৰ মাজত অগ্ৰগণ্য বুলি গণ্য কৰা হয়।”
Verse 19
तथा देवनदी चेयं सर्वतीर्थाभिसम्भूृता । गगनाद् गां गता देवी गड्जा सर्वसरिद्वरा,ये समस्त तीर्थोंसे सेवित तथा सम्पूर्ण सरिताओंमें श्रेष्ठ देवनदी गंगादेवी भी, जो आकाशसे पृथ्वीपर उतरी हैं, यहाँ विराजमान हैं
“একেদৰে এই দেৱনদী গঙ্গাও ইয়াত সন্নিহিত—সকলো তীৰ্থৰ সমাবেশস্থান বুলি পূজিত, সকলো নদীৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ, আৰু আকাশৰ পৰা পৃথিৱীত অৱতীৰ্ণ দেৱী।”
Verse 20
इत्युक्त्वा देवदेवस्य पत्नी धर्मभृतां वरा । स्मितपूर्वमथाभाष्य सर्वास्ता: सरितस्तथा,ऐसा कहकर देवाधिदेव महादेवजीकी पत्नी, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, धर्मवत्सला, देवमहिषी उमाने स्त्री-धर्मके ज्ञानमें निपुण गंगा आदि उन समस्त श्रेष्ठ सरिताओंको मन्द मुसकानके साथ सम्बोधित करके उनसे स्त्रीधर्मके विषयमें प्रश्न किया
এইদৰে কৈ দেৱদেৱ মহাদেৱৰ পত্নী, ধৰ্মনিষ্ঠসকলৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠা উমাই মৃদু হাঁহিৰে গঙ্গা আদি সকলো নদীক সম্বোধন কৰিলে।
Verse 21
अप्च्छद् देवमहिषी स्त्रीधर्म धर्मवत्सला । स्त्रीधर्मकुशलास्ता वै गड़ाद्या: सरितां वरा:,ऐसा कहकर देवाधिदेव महादेवजीकी पत्नी, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, धर्मवत्सला, देवमहिषी उमाने स्त्री-धर्मके ज्ञानमें निपुण गंगा आदि उन समस्त श्रेष्ठ सरिताओंको मन्द मुसकानके साथ सम्बोधित करके उनसे स्त्रीधर्मके विषयमें प्रश्न किया
ধৰ্মৱৎসলা দেৱমহিষী উমাই স্ত্ৰীধৰ্মৰ বিষয়ে প্ৰশ্ন কৰিলে; গঙ্গা আদি সেই শ্ৰেষ্ঠ নদীবোৰ স্ত্ৰীধৰ্মত নিপুণ আছিল।
Verse 22
उमोवाच (हे पुण्या: सरित: श्रेष्ठा: सर्वपापविनाशिका: । ज्ञानविज्ञानसम्पन्ना: शृणुध्वं वचनं मम ।।) अयं भगवता प्रोक्ता: प्रश्न: स्त्रीधर्मसंश्रित: । तं तु सम्मन्त्र्य युष्माभिवरक्तुमिच्छामि शंकरम्,उमा बोलीं--हे समस्त पापोंका विनाश करनेवाली, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न पुण्यसलिला श्रेष्ठ नदियो! मेरी बात सुनो। भगवान् शिवने यह स्ट्रीधर्मसम्बन्धी प्रश्न उपस्थित किया है। उसके विषयमें मैं तुमलोगोंसे सलाह लेकर ही भगवान् शंकरसे कुछ कहना चाहती हूँ
উমা ক’লে—হে পুণ্যসলিলা শ্ৰেষ্ঠ নদীসকল, সৰ্বপাপবিনাশিনী, জ্ঞান-বিজ্ঞানসম্পন্না! মোৰ বাক্য শুনা। ভগৱান শিৱে স্ত্ৰীধৰ্ম-সম্পৰ্কীয় এই প্ৰশ্ন উত্থাপন কৰিছে। তোমালোকৰ সৈতে পৰামৰ্শ কৰি তেতিয়াহে মই শংকৰক এই বিষয়ে ক’বলৈ ইচ্ছা কৰোঁ।
Verse 23
न चैकसाध्यं पश्यामि विज्ञानं भुवि कस्यचित् | दिवि वा सागरगमास्तेन वो मानयाम्यहम्
পৃথিৱীত হওক বা স্বৰ্গতো, কেৱল এটা উপায়ে—অন্যৰ সহায় নোলোৱাকৈ—সিদ্ধ হোৱা এনে কোনো জ্ঞান মই দেখা নাপাওঁ। সেয়েহে, সংসাৰ-সাগৰ পাৰ কৰোৱা দুষ্কৰ পথ গ্ৰহণ কৰা তোমালোক সকলোকে মই সন্মান কৰোঁ।
Verse 24
समुद्रगामिनी सरिताओ! पृथ्वीपर या स्वर्गमें मैं किसीका भी ऐसा कोई विज्ञान नहीं देखती, जिसे उसने अकेले ही--दूसरोंका सहयोग लिये बिना ही सिद्ध कर लिया हो, इसीलिये मैं आपलोगोंसे सादर सलाह लेती हूँ ।। एवं सर्वाः सरिच्छेष्ठा: पृष्टा: पुण्यतमा: शिवा: । ततो देवनदी गड़्ा नियुक्ता प्रतिपूज्य च,इस प्रकार उमाने जब समस्त कल्याणस्वरूपा परम पुण्यमयी श्रेष्ठ सरिताओंके समक्ष यह प्रश्न उपस्थित किया, तब उन्होंने इसका उत्तर देनेके लिये देवनदी गंगाको सम्मानपूर्वक नियुक्त किया
হে সমুদ্ৰগামিনী নদীসকল! পৃথিৱীত হওক বা স্বৰ্গতো, অন্যৰ সহায় নোলোৱাকৈ কোনোবাই একাই সিদ্ধ কৰা এনে জ্ঞান মই দেখা নাপাওঁ। সেয়েহে মই তোমালোকৰ পৰা সশ্ৰদ্ধ পৰামৰ্শ বিচাৰোঁ। এইদৰে উমাই যেতিয়া সকলো মঙ্গলস্বৰূপ, পৰম পুণ্যময় শ্ৰেষ্ঠ নদীসকলৰ আগত এই প্ৰশ্ন উত্থাপন কৰিলে, তেতিয়া তেওঁলোকে উত্তৰ দিবলৈ দেবনদী গংগাক সন্মানসহ নিযুক্ত কৰিলে।
Verse 25
बद्दीभिवद्धिभि: स्फीता स्त्रीधर्मज्ञा शुचिस्मिता । शैलराजसूुतां देवीं पुण्या पापभयापहा,पवित्र मुसकानवाली गंगाजी अनेक बुद्धियोंसे बढ़ी-चढ़ी, स्त्री-धर्मको जाननेवाली, पाप-भयको दूर करनेवाली, पुण्यमयी, बुद्धि और विनयसे सम्पन्न, सर्वधर्मविशारद तथा प्रचुर बुद्धिसे संयुक्त थीं। उन्होंने गिरिराजकुमारी उमादेवीसे मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा
তেতিয়া গংগা—প্ৰচুৰ বুদ্ধি আৰু পক্ব বিবেচনাৰে সমৃদ্ধ, স্ত্ৰীধৰ্মজ্ঞানী, পুণ্যময়ী আৰু পাপজন্য ভয় নিবারিণী—শুদ্ধ মৃদু হাঁহি লৈ পৰ্বতৰাজৰ কন্যা দেবী উমাৰ ফালে ঘূৰি ধীৰে ক’লে।
Verse 26
बुद्ध्या विनयसम्पन्ना सर्वधर्मविशारदा । सस्मितं बहुबुद्धयाढद्या गज़ा वचनमब्रवीत्,पवित्र मुसकानवाली गंगाजी अनेक बुद्धियोंसे बढ़ी-चढ़ी, स्त्री-धर्मको जाननेवाली, पाप-भयको दूर करनेवाली, पुण्यमयी, बुद्धि और विनयसे सम्पन्न, सर्वधर्मविशारद तथा प्रचुर बुद्धिसे संयुक्त थीं। उन्होंने गिरिराजकुमारी उमादेवीसे मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा
বুদ্ধি আৰু বিনয়ে সম্পন্না, সৰ্বধৰ্মত বিশাৰদা, প্ৰচুৰ প্ৰজ্ঞাৰে যুত পবিত্ৰ গংগাই মৃদু হাঁহি লৈ কথা ক’লে। শান্ত, ভয়হৰ আৰু ধৰ্মসন্মত উপদেশ দিবলৈ তেওঁ শুভভাবে গিৰিৰাজকন্যা উমাক সম্বোধন কৰিলে।
Verse 27
गजड़ोवाच धन्यास्म्यनुगृहीतास्मि देवि धर्मपरायणे । या त्वं सर्वजगन्मान्या नदीं मानयसे5नघे,गंगाजीने कहा--देवि! धर्मपरायणे! अनघे! मैं धन्य हूँ। मुझपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह है; क्योंकि आप सम्पूर्ण जगत्की सम्माननीया होनेपर भी एक तुच्छ नदीको मान्यता प्रदान कर रही हैं
গজড়ে ক’লে—হে দেবী, ধৰ্মপৰায়ণা, অনঘে! মই ধন্য; মোৰ ওপৰত আপোনাৰ মহা অনুগ্ৰহ হৈছে। কিয়নো আপুনি সমগ্ৰ জগতত পূজিতা হৈও এটা তুচ্ছ নদীকো সন্মান দিছে।
Verse 28
प्रभवन् पृच्छते यो हि सम्मानयति वा पुन: । नूनं जनमदुष्टात्मा पण्डिताख्यां स गच्छति
মহেশ্বৰে ক’লে—যি ব্যক্তি সক্ষম বা প্ৰতিষ্ঠিত হৈও বিনয়ে প্ৰশ্ন কৰে, বা পুনৰ অন্যক সন্মান কৰে—সেয়া নিশ্চয় দুষ্টচিত্ত নহয়; সি পণ্ডিতৰ খ্যাতি আৰু মৰ্যাদা লাভ কৰে।
Verse 29
जो सब प्रकारसे समर्थ होकर भी दूसरोंसे पूछता तथा उन्हें सम्मान देता है और जिसके मनमें कभी दुष्टता नहीं आती, वह मनुष्य निस्संदेह पण्डित कहलाता है ।। ज्ञानविज्ञानसम्पन्नानूहापोहविशारदान् । प्रवक्तून् पृच्छते योडन्यान् स वै नापदमृच्छति,जो मनुष्य ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न और ऊहापोहमें कुशल दूसरे-दूसरे वक्ताओंसे अपना संदेह पूछता है, वह आपत्तिमें नहीं पड़ता है। विशेष बुद्धिमान् पुरुष सभामें और तरहकी बात करता है और अहंकारी मनुष्य और ही तरहकी दुर्बलतायुक्त बातें करता है
মহেশ্বৰে ক’লে—যি মানুহ সকলো দিশে সক্ষম হৈও আনক সোধে, তেওঁলোকক সন্মান কৰে আৰু যাৰ মনত কেতিয়াও দুষ্টতা জাগে নাহে—সেইজন নিঃসন্দেহে পণ্ডিত বুলি কোৱা হয়। যি জ্ঞান-বিজ্ঞানসম্পন্ন, বিচাৰ-বিবেচনাত নিপুণ, বিভিন্ন বক্তাৰ ওচৰত নিজৰ সংশয় সোধি দূৰ কৰে—সেয়া বিপদত নপৰে। সভাত বিবেকী পুৰুষ প্ৰসঙ্গোচিত মিত বাক্য কয়; কিন্তু অহংকাৰী দুৰ্বল আৰু অস্থিৰ কথা কয়।
Verse 30
अन्यथा बहुबुद्धयाढ्यो वाक््यं वदति संसदि । अन्यथैव हाहंवादी दुर्बलं वदते वच:,जो मनुष्य ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न और ऊहापोहमें कुशल दूसरे-दूसरे वक्ताओंसे अपना संदेह पूछता है, वह आपत्तिमें नहीं पड़ता है। विशेष बुद्धिमान् पुरुष सभामें और तरहकी बात करता है और अहंकारी मनुष्य और ही तरहकी दुर्बलतायुक्त बातें करता है
মহেশ্বৰে ক’লে—বহু-বুদ্ধিত সমৃদ্ধ পুৰুষে সভাত এক ধৰণে—বিবেকপূৰ্ণ আৰু প্ৰসঙ্গোচিত—কথা কয়; কিন্তু ‘মই-মই’ কৰা অহংকাৰী অন্য ধৰণে দুৰ্বল আৰু অবিশ্বাস্য বাক্য কয়। যি জ্ঞান-বিজ্ঞানসম্পন্ন, বিচাৰ-বিবেচনাত নিপুণ হৈ বিভিন্ন বক্তাৰ ওচৰত নিজৰ সংশয় সোধে, সেয়া সংকটত নপৰে।
Verse 31
दिव्यज्ञाने दिवि श्रेष्ठे दिव्यपुण्यै: सहोत्थिते । त्वमेवा्हसि नो देवि स्त्रीधर्माननुभाषितुम्
মহেশ্বৰে ক’লে—হে দেবী! দিব্য জ্ঞানত প্ৰতিষ্ঠিত, স্বৰ্গত শ্ৰেষ্ঠ আৰু দিব্য পুণ্যৰ সৈতে উদ্ভূত নাৰীধৰ্মসমূহ আমাক ব্যাখ্যা কৰিবলৈ সত্যই একমাত্র আপুনিয়েই সম্পূৰ্ণ যোগ্য।
Verse 32
देवि! तुम दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न और देवलोकमें सर्वश्रेष्ठ हो। दिव्य पुण्योंके साथ तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है। तुम्हीं हम सब लोगोंको स्त्री-धर्मका उपदेश देनेके योग्य हो ।। ततः सा<<राधिता देवी गड्या बहुभिगुणै: । प्राह सर्वमशेषेण स्त्रीधर्म सुरसुन्दरी,तदनन्तर गंगाजीके द्वारा अनेक गुणोंका बखान करके पूजित होनेपर देवसुन्दरी देवी उमाने सम्पूर्ण स्त्री-धर्मका पूर्णतः: वर्णन किया
মহেশ্বৰে ক’লে—“দেৱি! তুমি দিব্য জ্ঞানৰে সম্পন্না আৰু দেৱলোকত শ্ৰেষ্ঠা। দিব্য পুণ্যৰ সৈতে তোমাৰ প্ৰাদুৰ্ভাৱ ঘটিছে। আমাৰ সকলোকে স্ত্ৰী-ধৰ্মৰ উপদেশ দিবলৈ যোগ্য একমাত্র তুমিয়েই।” তেতিয়া গঙ্গাই বহু গুণৰ প্ৰশংসাৰে দেৱসুন্দৰী দেৱী উমাক আৰাধনা কৰিলে; আৰু উমাই একো নাছাড়ি স্ত্ৰী-ধৰ্মৰ সম্পূৰ্ণ উপদেশ বৰ্ণনা কৰিলে।
Verse 33
उमोवाच स्त्रीधर्मो मां प्रति यथा प्रतिभाति यथाविधि । तमहं कीर्तयिष्यामि तथैव प्रश्निता भव,उमा बोलीं--स्त्री-धर्मका स्वरूप मेरी बुद्धिमें जैसा प्रतीत होता है, उसे मैं विधिपूर्वक बताऊँगी। तुम विनय और उत्सुकतासे युक्त होकर इसे सुनो
উমাই ক’লে—“স্ত্ৰী-ধৰ্ম মোৰ বোধত যিদৰে আৰু যথাবিধি যিদৰে প্ৰতিভাত হয়, মই তেনেদৰেই তাক বিধিপূৰ্বক বৰ্ণনা কৰিম। সেয়ে বিনয় আৰু জানিবৰ আগ্ৰহ লৈ প্ৰশ্ন কৰা, আৰু তেনেদৰেই শুনা।”
Verse 34
स्त्रीधर्म: पूर्व एवायं विवाहे बन्धुभि: कृत: । सहधर्मचरी भर्तुर्भवत्यग्निसमीपत:,विवाहके समय कन्याके भाई-बन्धु पहले ही उसे स्त्री-धर्मका उपदेश कर देते हैं। जब कि वह अग्निके समीप अपने पतिकी सहधर्मिणी बनती है
মহেশ্বৰে ক’লে—“স্ত্ৰীৰ এই ধৰ্ম বিবাহৰ সময়তে তাইৰ বংশীয়ে আগতেই স্থিৰ কৰি দিয়ে। কিয়নো পবিত্ৰ অগ্নিৰ সান্নিধ্যতেই তাই স্বামীৰ সহধৰ্মচাৰিণী হয়—ধৰ্মপথত তেওঁৰ সহযাত্রী।”
Verse 35
सुस्वभावा सुवचना सुवृत्ता सुखदर्शना । अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तु: सा धर्मचारिणी,जिसके स्वभाव, बात-चीत और आचरण उत्तम हों, जिसको देखनेसे पतिको सुख मिलता हो, जो अपने पतिके सिवा दूसरे किसी पुरुषमें मन नहीं लगाती हो और स्वामीके समक्ष सदा प्रसन्नमुखी रहती हो, वह स्त्री धर्माचरण करनेवाली मानी गयी है। जो साध्वी स्त्री अपने स्वामीको सदा देवतुल्य समझती है, वही धर्मपरायणा और वही धर्मके फलकी भागिनी होती है
মহেশ্বৰে ক’লে—যাৰ স্বভাৱ শুভ, বাক্য মধুৰ, আচৰণ সৎ; যাক দেখিলে স্বামীৰ মন আনন্দিত হয়; যাৰ মন স্বামী ব্যতীত অন্য কোনো পুৰুষলৈ নাযায়; আৰু যি স্বামীৰ সন্মুখত সদায় প্ৰসন্নমুখী—সেই নাৰীকেই ধৰ্মাচাৰিণী বুলি গণ্য কৰা হয়।
Verse 36
सा भवेद् धर्मपरमा सा भवेद् धर्मभागिनी । देववत् सततं साध्वी या भर्तरें प्रपश्यति,जिसके स्वभाव, बात-चीत और आचरण उत्तम हों, जिसको देखनेसे पतिको सुख मिलता हो, जो अपने पतिके सिवा दूसरे किसी पुरुषमें मन नहीं लगाती हो और स्वामीके समक्ष सदा प्रसन्नमुखी रहती हो, वह स्त्री धर्माचरण करनेवाली मानी गयी है। जो साध्वी स्त्री अपने स्वामीको सदा देवतुल्य समझती है, वही धर्मपरायणा और वही धर्मके फलकी भागिनी होती है
যি সাধ্বী নাৰী স্বামীক সদায় দেৱতুল্য বুলি দেখে, সেই নাৰীয়েই ধৰ্মত পৰম নিষ্ঠাৱান আৰু ধৰ্মফলৰ ভাগিনী হয়।
Verse 37
शुश्रूषां परिचारं च देववद् या करोति च । नान्यभावा हाविमना: सुव्रता सुखदर्शना
শ্ৰী মহেশ্বৰে ক’লে—যি নাৰী দেৱতাৰ দৰে স্বামীৰ শুশ্ৰূষা আৰু পৰিচৰ্যা কৰে, যাৰ মন অন্যত্ৰ নাযায়, যি অচঞ্চল সংকল্পে স্থিত—সেই নাৰী সুব্ৰতা, দৰ্শনত সুখদ, গৃহধৰ্মৰ ভক্তিনীতি ধাৰণ কৰা বুলি কোৱা হয়।
Verse 38
पुत्रवक्त्रमिवाभी क्षणं भर्तुर्वदनमी क्षते । या साध्वी नियताहारा सा भवेद् धर्मचारिणी
মহেশ্বৰে ক’লে—যি নাৰী পুত্ৰৰ মুখৰ দৰে স্নেহেৰে স্বামীৰ মুখলৈ বাৰে বাৰে চায়, যি ঈৰ্ষ্যা আৰু সন্দেহমুক্ত; আৰু যি সাধ্বী, নিয়মশীলা, নিয়ত আহাৰিণী—সেই নাৰীহে সত্যই ধৰ্মচাৰিণী হয়।
Verse 39
जो पतिकी देवताके समान सेवा और परिचर्या करती हैं, पतिके सिवा दूसरे किसीसे हार्दिक प्रेम नहीं करती, कभी नाराज नहीं होती तथा उत्तम व्रतका पालन करती है, जिसका दर्शन पतिको सुखद जान पड़ता है, जो पुत्रके मुखकी भाँति स्वामीके मुखकी ओर सदा निहारती रहती है तथा जो साध्वी एवं नियमित आहारका सेवन करनेवाली है, वह स्त्री धर्मचारिणी कही गयी है ।। श्रुत्वा दम्पतिधर्म वै सहधर्म कृतं शुभम् । या भवेद् धर्मपरमा नारी भर्तसमव्रता,“पति और पत्नीको एक साथ रहकर धर्माचरण करना चाहिये।” इस मंगलमय दाम्पत्य धर्मको सुनकर जो स्त्री धर्मपरायण हो जाती है, वह पतिके समान व्रतका पालन करनेवाली (पतिव्रता) है
মহেশ্বৰে ঘোষণা কৰিলে—যি নাৰী দেৱতাৰ দৰে স্বামীৰ সেৱা আৰু পৰিচৰ্যা কৰে, স্বামী ব্যতীত আন কাৰো প্ৰতি হৃদয়ৰ প্ৰেম নেদিয়ে, কেতিয়াও ক্ৰোধত নপৰে, উত্তম ব্ৰত পালন কৰে; যাৰ দৰ্শন স্বামীৰ বাবে সুখদ; যি পুত্ৰৰ মুখৰ দৰে স্নেহেৰে প্ৰভুৰ মুখলৈ সদায় চায়; আৰু যি সাধ্বী আৰু নিয়ত আহাৰিণী—সেই নাৰী ‘ধৰ্মচাৰিণী’ বুলি কোৱা হয়। “স্বামী-স্ত্ৰীয়ে একেলগে থাকি সহধৰ্ম আচৰণ কৰিব লাগে”—এই মঙ্গলময় দাম্পত্যধৰ্ম শুনি যি নাৰী ধৰ্মপৰায়ণা হয় আৰু স্বামীৰ সৈতে সমব্ৰত ব্ৰত পালন কৰে, তাই ‘পতিব্ৰতা’ বুলি প্ৰসিদ্ধ।
Verse 40
देववत् सततं साध्वी भर्तारमनुपश्यति । दम्पत्योरेष वै धर्म: सहधर्मकृत: शुभ:
মহেশ্বৰে ক’লে—সাধ্বী নাৰী দেৱতাৰ দৰে সদায় স্বামীৰ প্ৰতি দৃষ্টি আৰু পৰিচৰ্যা ৰাখে। এইয়েই স্বামী-স্ত্ৰীৰ ধৰ্ম—একেলগে সম্পাদিত সহধৰ্ম—মঙ্গলময়।
Verse 41
साध्वी स्त्री सदा अपने पतिको देवताके समान समझती है। पति और पत्नीका यह सहधर्म (साथ-साथ रहकर धर्माचरण करना) रूप धर्म परम मंगलमय है ।। शुश्रूषां परिचारं च देवतुल्यं प्रकुर्वती । वश्या भावेन सुमना: सुव्रता सुखदर्शना । अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तु: सा धर्मचारिणी,जो अपने हृदयके अनुरागके कारण स्वामीके अधीन रहती है, अपने चित्तको प्रसन्न रखती है, देवताके समान पतिकी सेवा और परिचर्या करती है, उत्तम व्रतका आश्रय लेती है ओर पतिके लिये सुखदायक सुन्दर वेष धारण किये रहती है, जिसका चित्त पतिके सिवा और किसीकी ओर नहीं जाता, पतिके समक्ष प्रसन्नचदन रहनेवाली वह स्त्री धर्मचारिणी मानी गयी है। जो स्वामीके कठोर वचन कहने या दोषपूर्ण दृष्टिसे देखनेपर भी प्रसन्नतासे मुसकराती रहती है, वही स्त्री पतिव्रता है
শ্ৰী মহেশ্বৰে ক’লে—সাধ্বী নাৰী সদায় স্বামীক দেৱতাৰ সমান জ্ঞান কৰে; স্বামী-স্ত্ৰীৰ এই সহধৰ্মৰূপ ধৰ্ম পৰম মঙ্গলময়। যি নাৰী হৃদয়ৰ অনুৰাগেৰে স্বামীৰ অধীন হৈ মন প্ৰসন্ন ৰাখে, দেৱতুল্য স্বামীৰ শুশ্ৰূষা আৰু পৰিচৰ্যা কৰে, উত্তম ব্ৰত আশ্ৰয় কৰে, স্বামীৰ সুখৰ বাবে মনোৰম সাজ-পোছাক ধাৰণ কৰে, যাৰ চিত্ত স্বামী ব্যতীত অন্যত্ৰ নাযায়, আৰু স্বামীৰ সন্মুখত সুমুখে থাকে—তাই ‘ধৰ্মচাৰিণী’ বুলি মান্য। আৰু স্বামী কঠোৰ বাক্য ক’লেও বা দোষদৃষ্টিৰে চাইলেও যি শান্তভাৱে হাঁহি থাকিব পাৰে—সেইয়েই সত্য ‘পতিব্ৰতা’।
Verse 42
परुषाण्यपि चोक्ता या दृष्टा दृष्टेन चक्षुषा । सुप्रसन्नमुखी भर्तुर्या नारी सा पतिव्रता,जो अपने हृदयके अनुरागके कारण स्वामीके अधीन रहती है, अपने चित्तको प्रसन्न रखती है, देवताके समान पतिकी सेवा और परिचर्या करती है, उत्तम व्रतका आश्रय लेती है ओर पतिके लिये सुखदायक सुन्दर वेष धारण किये रहती है, जिसका चित्त पतिके सिवा और किसीकी ओर नहीं जाता, पतिके समक्ष प्रसन्नचदन रहनेवाली वह स्त्री धर्मचारिणी मानी गयी है। जो स्वामीके कठोर वचन कहने या दोषपूर्ण दृष्टिसे देखनेपर भी प्रसन्नतासे मुसकराती रहती है, वही स्त्री पतिव्रता है
মহাদেৱে ক’লে—স্বামী কঠোৰ বাক্য ক’লেও, বা দোষ-দৃষ্টিৰে চাইলেও, যি নাৰী স্বামীৰ সন্মুখত শান্ত, প্ৰসন্ন আৰু স্থিৰ মুখভাৱ ৰাখে, কৃপা আৰু সদ্ভাৱত অচল থাকে—সেই নাৰী পতিব্ৰতা বুলি জনা যায়। ই কেৱল বাহ্যিক সহনশীলতা নহয়; গৃহস্থধৰ্মত সেৱা, সদিচ্ছা আৰু স্থৈৰ্যৰ শৃঙ্খলিত নৈতিক ভংগী।
Verse 43
न चन्द्रसूर्यों न तरुं पुंनाम्ना या निरीक्षते । भर्त॒वर्ज वरारोहा सा भवेद् धर्मचारिणी
শ্ৰী মহেশ্বৰে ক’লে—স্বামীক বাদ দি চন্দ্ৰ, সূৰ্য বা পুৰুষ-নামে জনা কোনো গছলৈও যি উচ্ছকুলীয়া নাৰী দৃষ্টি নকৰে, সেয়ে ধৰ্মচাৰিণী হয়।
Verse 44
दरिद्रं व्याधितं दीनमध्वना परिकर्शितम् | पतिं पुत्रमिवोषपास्ते सा नारी धर्मभागिनी
মহেশ্বৰে ক’লে—স্বামী দৰিদ্ৰ, ৰোগাক্ৰান্ত, দীন বা পথৰ কষ্টত ক্ষীণ হ’লেও, যি নাৰী তেওঁক পুত্ৰৰ দৰে সেৱা কৰে, সেয়ে ধৰ্মভাগিনী।
Verse 45
जो सुन्दरी नारी पतिके सिवा पुरुष नामधारी चन्द्रमा, सूर्य और किसी वृक्षकी ओर भी दृष्टि नहीं डालती, वही पातिव्रतधर्मका पालन करनेवाली है। जो नारी अपने दरिद्र, रोगी, दीन अथवा रास्तेकी थकावटसे खिन्न हुए पतिकी पुत्रके समान सेवा करती है, वह धर्मफलकी भागिनी होती है ।। या नारी प्रयता दक्षा या नारी पुत्रिणी भवेत् पतिप्रिया पतिप्राणा सा नारी धर्मभागिनी,जो स्त्री अपने हृदयको शुद्ध रखती, गृहकार्य करनेमें कुशल और पुत्रवती होती, पतिसे प्रेम करती और पतिको ही अपने प्राण समझती है, वही धर्मफल पानेकी अधिकारिणी होती है। जो सदा प्रसन्नचित्तसे पतिकी सेवा-शुश्रूषामें लगी रहती है, पतिके ऊपर पूर्ण विश्वास रखती और उसके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करती है, वही नारी धर्मके श्रेष्ठ फलकी भागिनी होती है
শ্ৰী মহেশ্বৰে ক’লে—স্বামীক বাদ দি চন্দ্ৰ, সূৰ্য বা পুৰুষ-নামে জনা কোনো গছলৈও যি সুন্দৰী নাৰী দৃষ্টি নকৰে, সেয়ে পতিব্ৰত-ধৰ্ম পালন কৰে। যি নাৰী দৰিদ্ৰ, ৰোগাক্ৰান্ত, দীন বা পথকষ্টত ক্লান্ত স্বামীক পুত্ৰৰ দৰে সেৱা কৰে, সেয়ে ধৰ্মফলৰ ভাগিনী হয়। যি নাৰী সংযমী, দক্ষ, সন্তানৱতী, স্বামীপ্ৰিয়া আৰু স্বামীকেই প্ৰাণ বুলি মানে—সেয়ে ধৰ্মভাগিনী। যাৰ হৃদয় শুদ্ধ, যি গৃহকাৰ্যত কুশলী, যি সদা প্ৰসন্নচিত্তে সেৱা-শুশ্ৰূষাত ৰত থাকে, স্বামীৰ ওপৰত পূৰ্ণ বিশ্বাস ৰাখে আৰু বিনয়ে আচৰণ কৰে—সেই নাৰী ধৰ্মৰ শ্ৰেষ্ঠ ফল লাভ কৰে।
Verse 46
शुश्रूषां परिचर्या च करोत्यविमना: सदा । सुप्रतीता विनीता च सा नारी धर्मभागिनी,जो स्त्री अपने हृदयको शुद्ध रखती, गृहकार्य करनेमें कुशल और पुत्रवती होती, पतिसे प्रेम करती और पतिको ही अपने प्राण समझती है, वही धर्मफल पानेकी अधिकारिणी होती है। जो सदा प्रसन्नचित्तसे पतिकी सेवा-शुश्रूषामें लगी रहती है, पतिके ऊपर पूर्ण विश्वास रखती और उसके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करती है, वही नारी धर्मके श्रेष्ठ फलकी भागिनी होती है
মহেশ্বৰে ক’লে—যি নাৰী মন অশান্ত নকৰাকৈ সদা সেৱা-শুশ্ৰূষা আৰু পৰিচৰ্যা কৰে, পূৰ্ণ বিশ্বাসী আৰু বিনয়ী হয়—সেয়ে ধৰ্মভাগিনী হয়।
Verse 47
न कामेषु न भोगेषु नैश्वर्ये न सुखे तथा । स्पृहा यस्या यथा पत्यौ सा नारी धर्मभागिनी,जिसके हृदयमें पतिके लिये जैसी चाह होती है, वैसी काम, भोग और सुखके लिये भी नहीं होती। वह स्त्री पातिव्रतरर्मकी भागिनी होती है
শ্ৰী মহেশ্বৰে ক’লে—যি নাৰীৰ আকাঙ্ক্ষা স্বামীৰ প্ৰতিই স্থিৰ থাকে, আৰু কাম, ভোগ, ঐশ্বৰ্য বা সুখৰ প্ৰতি তেনে লালসা নাথাকে, সেই নাৰী ধৰ্মৰ সত্য ভাগিনী—পতিব্ৰতা ধৰ্মেৰে ধৰ্ম-সহচৰী।
Verse 48
कल्योत्थानरतिर्नित्यं गहशुश्रूषणे रता । सुसम्मृष्टक्षया चैव गोशकृत्कृतलेपना,जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठनेमें रुचि रखती है, घरोंके काम-काजमें योग देती है, घरको झाड़-बुहारकर साफ रखती है और गोबरसे लीप-पोतकर पवित्र बनाये रखती है, जो पतिके साथ रहकर प्रतिदिन अग्निहोत्र करती है, देवताओंको पुष्प और बलि अर्पण करती है तथा देवता, अतिथि और पोष्यवर्गको भोजनसे तृप्त करके न्याय और विधिके अनुसार शेष अन्नका स्वयं भोजन करती है तथा घरके लोगोंको हृष्ट-पुष्ट एवं संतुष्ट रखती है, ऐसी ही नारी सती-धर्मके फलसे युक्त होती है
যি নাৰী নিত্যে যথাসময়ে পুৱাতে উঠাত আনন্দ পায়, গৃহশুশ্ৰূষা আৰু গৃহকাৰ্যত ৰত থাকে, ঘৰ ভালদৰে ঝাড়ু দি পৰিষ্কাৰ ৰাখে আৰু গোবৰ-লেপনে পবিত্ৰ কৰে—সেই নাৰী গৃহধৰ্মৰ শৃঙ্খলাত স্থিত হৈ সতী-ধৰ্মৰ ফল লাভ কৰে।
Verse 49
अग्निकार्यपरा नित्यं सदा पुष्पबलिप्रदा । देवतातिथि भृत्यानां निर्वाप्प पतिना सह,जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठनेमें रुचि रखती है, घरोंके काम-काजमें योग देती है, घरको झाड़-बुहारकर साफ रखती है और गोबरसे लीप-पोतकर पवित्र बनाये रखती है, जो पतिके साथ रहकर प्रतिदिन अग्निहोत्र करती है, देवताओंको पुष्प और बलि अर्पण करती है तथा देवता, अतिथि और पोष्यवर्गको भोजनसे तृप्त करके न्याय और विधिके अनुसार शेष अन्नका स्वयं भोजन करती है तथा घरके लोगोंको हृष्ट-पुष्ट एवं संतुष्ट रखती है, ऐसी ही नारी सती-धर्मके फलसे युक्त होती है
যি নাৰী নিত্যে অগ্নিকাৰ্যত পৰায়ণ থাকে, সদা পুষ্প আৰু বলি অৰ্পণ কৰে, আৰু স্বামীৰ সৈতে দেৱতা, অতিথি আৰু আশ্ৰিতসকলক তেওঁলোকৰ অংশ দি তৃপ্ত কৰে—সেই নাৰী ধৰ্মযুত গৃহব্যৱস্থাৰ প্ৰতিমূৰ্তি; সতী-ধৰ্মফলে পুণ্যৱতী হয়।
Verse 50
शेषान्नमुपभुञ्जाना यथान्यायं यथाविधि । तुष्टपुष्टजना नित्यं नारी धर्मेण युज्यते,जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठनेमें रुचि रखती है, घरोंके काम-काजमें योग देती है, घरको झाड़-बुहारकर साफ रखती है और गोबरसे लीप-पोतकर पवित्र बनाये रखती है, जो पतिके साथ रहकर प्रतिदिन अग्निहोत्र करती है, देवताओंको पुष्प और बलि अर्पण करती है तथा देवता, अतिथि और पोष्यवर्गको भोजनसे तृप्त करके न्याय और विधिके अनुसार शेष अन्नका स्वयं भोजन करती है तथा घरके लोगोंको हृष्ट-पुष्ट एवं संतुष्ट रखती है, ऐसी ही नारी सती-धर्मके फलसे युक्त होती है
যি নাৰী ন্যায় আৰু বিধি অনুসাৰে সকলোকে তৃপ্ত কৰি শেষত অৱশিষ্ট অন্নহে গ্ৰহণ কৰে, আৰু ঘৰৰ লোকসকলক নিত্যে সন্তুষ্ট আৰু সুপুষ্ট ৰাখে—সেই নাৰী ধৰ্মেৰে যুক্ত বুলি গণ্য হয়।
Verse 51
श्वश्रूश्वशुरयो: पादौ जोषयन्ती गुणान्विता । मातापितृपरा नित्यं या नारी सा तपोधना,जो उत्तम गुणोंसे युक्त होकर सदा सास-ससुरके चरणोंकी सेवामें संलग्न रहती है तथा माता-पिताके प्रति भी सदा उत्तम भक्तिभाव रखती है, वह स्त्री तपस्यारूपी धनसे सम्पन्न मानी गयी है। जो नारी ब्राह्मणों, दुर्बलों, अनाथों, दीनों, अन्धों और कृपणों (कंगालों) का अन्नके द्वारा भरण-पोषण करती है, वह पातिव्रतधर्मके पालनका फल पाती है
যি নাৰী সদ্গুণেৰে যুক্ত হৈ শাহু-শ্বশুৰৰ চৰণসেৱাত নিত্যে ৰত থাকে আৰু নিজৰ মাতা-পিতাৰ প্ৰতিও সদায় পৰায়ণ থাকে—সেই নাৰী তপস্যা-ৰূপ ধনে সমৃদ্ধ বুলি গণ্য হয়।
Verse 52
ब्राह्मणान् दुर्बलानाथान् दीनान्धकृपणांस्तथा । बिभर्त्यन्नेन या नारी सा पतिव्रतभागिनी,जो उत्तम गुणोंसे युक्त होकर सदा सास-ससुरके चरणोंकी सेवामें संलग्न रहती है तथा माता-पिताके प्रति भी सदा उत्तम भक्तिभाव रखती है, वह स्त्री तपस्यारूपी धनसे सम्पन्न मानी गयी है। जो नारी ब्राह्मणों, दुर्बलों, अनाथों, दीनों, अन्धों और कृपणों (कंगालों) का अन्नके द्वारा भरण-पोषण करती है, वह पातिव्रतधर्मके पालनका फल पाती है
যি নাৰী অন্ন দান কৰি ব্ৰাহ্মণ, দুৰ্বল, অনাথ, দীন, অন্ধ আৰু কৃপণ-দৰিদ্ৰসকলক পোহপাল দিয়ে, সেয়েই পতিব্ৰতা-ধৰ্মৰ পুণ্যত অংশীদাৰ। উত্তম গুণেৰে ভূষিতা হৈ যি সদায় শাহু-শ্বশুৰৰ চৰণসেৱাত নিবিষ্ট থাকে আৰু মাতৃ-পিতৃৰ প্ৰতিো নিত্য শ্ৰেষ্ঠ ভক্তিভাৱ ৰাখে, তাক তপস্যাৰূপ ধনেৰে সমৃদ্ধ বুলি গণ্য কৰা হয়; আৰু যি অন্নদানেৰে অসহায়ক ধাৰে, সেয়ে পতিব্ৰত-ধৰ্মৰ ফল লাভ কৰে।
Verse 53
व्रतं चरति या नित्यं दुश्चवरं लघुसत्त्वया । पतिचित्ता पतिहिता सा पतिव्रतभागिनी
যি নাৰী কোমল শক্তিৰে হলেও নিত্য দুঃসাধ্য ব্ৰত পালন কৰে, যাৰ চিত্ত স্বামীত স্থিৰ আৰু যি সদায় স্বামীৰ হিতত নিয়োজিত—সেয়েই পতিব্ৰতা-ধৰ্মৰ অংশীদাৰ।
Verse 54
जो प्रतिदिन शीघ्रतापूर्वक मर्यादाका बोध करानेवाली बुद्धिके द्वारा दुष्कर व्रतका आचरण करती है, पतिमें ही मन लगाती है और निरन्तर पतिके हित-साधनमें लगी रहती है, उसे पतिव्रत- धर्मके पालनका सुख प्राप्त होता है ।। पुण्यमेतत् तपश्चैतत् स्वर्गश्षैष सनातन: । या नारी भर्त॒परमा भवेद् भर्त॒व्रता सती,जो साध्वी नारी पतिव्रत-धर्मका पालन करती हुई पतिकी सेवामें लगी रहती है, उसका यह कार्य महान् पुण्य, बड़ी भारी तपस्या और सनातन स्वर्गका साधन है
ই মহাপুণ্য কৰ্ম; ইয়ে তপস্যাই, আৰু ইয়ে সনাতন স্বৰ্গৰ উপায়। যি সতী নাৰী স্বামীকেই পৰম জ্ঞান কৰি ভৰ্তৃব্ৰতত অচঞ্চল থাকে, নিত্য স্বামীৰ হিতসাধন আৰু সেবাত নিবিষ্ট থাকে—সেয়ে নিঃসন্দেহে পতিব্ৰতা-ধৰ্ম পালনজনিত সুখ লাভ কৰে।
Verse 55
पतिर्ि देवो नारीणां पतिर्बन्धु: पतिर्गति: । पत्या समा गतिर्नास्ति दैवतं वा यथा पति:,पति ही नारियोंका देवता, पति ही बन्धु-बान्धव और पति ही उनकी गति है। नारीके लिये पतिके समान न दूसरा कोई सहारा है और न दूसरा कोई देवता
নাৰীৰ বাবে স্বামীেই দেৱতা, স্বামীেই বন্ধুও ৰক্ষক, স্বামীেই গতি। স্বামীৰ সমান আন কোনো আশ্ৰয় নাই, স্বামীৰ তুল্য আন কোনো দেৱতাও নাই।
Verse 56
पतिप्रसाद: स्वर्गो वा तुल्यो नार्या न वा भवेत् । अहं स्वर्ग न हीच्छेयं त्वय्यप्रीते महेश्वरे,एक ओर पतिकी प्रसन्नता और दूसरी ओर स्वर्ग--ये दोनों नारीकी दृष्टिमें समान हो सकते हैं या नहीं, इसमें संदेह है। मेरे प्राणनाथ महेश्वर! मैं तो आपको अप्रसन्न रखकर स्वर्गको नहीं चाहती
স্বামীৰ প্ৰসন্নতা আৰু স্বৰ্গ—নাৰীৰ দৃষ্টিত এই দুয়োটা সঁচাকৈ সমান নে নহয়, তাতেই সন্দেহ আছে। হে মহেশ্বৰ, মোৰ প্ৰাণনাথ! আপোনাক অপ্রসন্ন কৰি মই স্বৰ্গো নাখোজোঁ।
Verse 57
यद्यकार्यमधर्म वा यदि वा प्राणनाशनम् । पतिर्ब्रूयाद् दरिद्रो वा व्याधितो वा कथंचन,पति दरिद्र हो जाय, किसी रोगसे घिर जाय, आपत्तिमें फँस जाय, शत्रुओंके बीचमें पड़ जाय अथवा ब्राह्मणके शापसे कष्ट पा रहा हो, उस अवस्थामें वह न करनेयोग्य कार्य, अधर्म अथवा प्राणत्यागकी भी आज्ञा दे दे, तो उसे आपत्तिकालका धर्म समझकर नि:शंकभावसे तुरंत पूरा करना चाहिये
স্বামী যদি দৰিদ্ৰ হয়, কোনো ব্যাধিত আক্ৰান্ত হয়, আপদত পৰে, শত্ৰুমাজত আবদ্ধ হয়, অথবা ব্ৰাহ্মণৰ শাপত ক্লিষ্ট হয়—এনে অৱস্থাত তেওঁ যদি অকর্তব্য, অধৰ্ম, বা প্ৰাণনাশলৈকে লৈ যোৱা আদেশো দিয়ে, তেন্তে তাক আপদ্ধৰ্ম বুলি ধৰি নিঃসন্দেহে তৎক্ষণাৎ পালন কৰা উচিত।
Verse 58
आपन्नो रिपुसंस्थो वा ब्रह्मशापार्दितो5पि वा । आपद्धर्माननुप्रेक्ष्य तत्कार्यममविशड्कया,पति दरिद्र हो जाय, किसी रोगसे घिर जाय, आपत्तिमें फँस जाय, शत्रुओंके बीचमें पड़ जाय अथवा ब्राह्मणके शापसे कष्ट पा रहा हो, उस अवस्थामें वह न करनेयोग्य कार्य, अधर्म अथवा प्राणत्यागकी भी आज्ञा दे दे, तो उसे आपत्तिकालका धर्म समझकर नि:शंकभावसे तुरंत पूरा करना चाहिये
যদি কোনো ব্যক্তি আপদত পৰে—শত্ৰুমাজত আবদ্ধ হওক বা ব্ৰাহ্মণৰ শাপত পীড়িত হওক—তেনে হলে আপদ্ধৰ্ম বিবেচনা কৰি যি কৰণীয়, তাক নিঃসন্দেহে সম্পন্ন কৰা উচিত।
Verse 59
एष देव मया प्रोक्तः स्त्रीधर्मो वचनात् तव । या त्वेवंभाविनी नारी सा पतिव्रतभागिनी,देव! आपकी आज्ञासे मैंने यह स्त्रीधर्मका वर्णन किया है। जो नारी ऊपर बताये अनुसार अपना जीवन बनाती है, वह पातिव्रत-धर्मके फलकी भागिनी होती है
হে দেৱ! আপোনাৰ আজ্ঞা অনুসৰি মই এই স্ত্ৰীধৰ্ম বৰ্ণনা কৰিলোঁ। যি নাৰী এইদৰে জীৱন গঢ়ে, সি পতিব্ৰতা-ব্ৰতৰ ফলৰ ভাগিনী হয়।
Verse 60
भीष्म उवाच इत्युक्त: स तु देवेश: प्रतिपूज्य गिरे: सुताम् । लोकान् विसर्जयामास सर्वैरनुचरैर्वृतान्,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! पार्वतीजीके द्वारा इस प्रकार नारीधर्मका वर्णन सुनकर देवाधिदेव महादेवजीने गिरिराजकुमारीका बड़ा आदर किया और वहाँ समस्त अनुचरोंके साथ आये हुए लोगोंको जानेकी आज्ञा दी। तब समस्त भूतगण, सरिताएँ गन्धर्व और अप्सराएँ भगवान् शंकरको सिरसे प्रणाम करके अपने-अपने स्थानको चली गयीं
ভীষ্মে ক’লে—যুধিষ্ঠিৰ! এইদৰে কোৱা হ’লে দেৱেশ মহাদেৱে গিৰিৰাজকন্যা পাৰ্বতীক যথোচিত সন্মান কৰিলে আৰু সকলো অনুচৰসহ সমবেত উপস্থিতসকলক বিদায় দিলে। তাৰ পাছত ভূতগণ, নদীগণ, গন্ধৰ্ব আৰু অপ্সৰাগণে ভগৱান শংকৰক শিৰ নত কৰি প্ৰণাম কৰি নিজ নিজ ধামলৈ গ’ল।
Verse 61
ततो ययुर्भूतगणा: सरितश्न॒ यथागतम् | गन्धर्वाप्सरसश्वैव प्रणम्य शिरसा भवम्,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! पार्वतीजीके द्वारा इस प्रकार नारीधर्मका वर्णन सुनकर देवाधिदेव महादेवजीने गिरिराजकुमारीका बड़ा आदर किया और वहाँ समस्त अनुचरोंके साथ आये हुए लोगोंको जानेकी आज्ञा दी। तब समस्त भूतगण, सरिताएँ गन्धर्व और अप्सराएँ भगवान् शंकरको सिरसे प्रणाम करके अपने-अपने स्थानको चली गयीं
তাৰ পাছত ভূতগণ আৰু নদীগণ যিদৰে আহিছিল তেনেদৰে উভতি গ’ল। গন্ধৰ্ব আৰু অপ্সৰাগণেও ভৱ (শিৱ)ক শিৰ নত কৰি প্ৰণাম কৰি নিজ নিজ ধামলৈ গ’ল।
Verse 146
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे स्त्रीधर्मक थने षट्चत्वारिंशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमा-महेश्वरसंवादके प्रसड़में सत्रीधर्मका वर्णणविषयक एक सौ छियालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ অন্তৰ্গত দানধৰ্মপৰ্বত উমা-মহেশ্বৰ সংবাদৰ প্ৰসঙ্গত স্ত্ৰীধৰ্ম বৰ্ণনাকাৰী একশ ছিয়াল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।
How a ruler should respond to post-conflict psychological distress: Bhīṣma redirects Yudhiṣṭhira from inward grief toward outwardly accountable action—ritual duty, public welfare, and respectful alliance-management—without abandoning kṣatra-dharma.
Legitimacy is rebuilt through disciplined public duties: perform yajñas with proper dakṣiṇā, honor gods and ancestors, pacify the prakṛtis, and sustain social bonds through appropriate gifts and recognition of allies and counselors.
Rather than an explicit phalaśruti, the chapter embeds outcome-language: relief of “mānasa-jvara” (mental fever) and the flourishing of friends and subjects around the king, indicating the practical ‘fruit’ of dharmic administration.