
Ahiṃsā as Threefold Restraint (Mind–Speech–Action) and the Ethics of Consumption
Upa-parva: Āhiṃsā-anuśāsana (Instruction on Non-injury) — Bhīṣma’s discourse to Yudhiṣṭhira
Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira again questions Bhīṣma, asking why ahiṃsā is praised as dharma and how one escapes suffering when harm is committed by action, speech, or mind. Bhīṣma replies that ahiṃsā is articulated by brahmavādins as a structured discipline: it is not stable if any constituent is compromised, likened to an animal unable to stand on only three legs. He elevates ahiṃsā as preeminent among dharmas, using the elephant’s footprint metaphor to indicate that other ethical ‘tracks’ are encompassed by it. He then specifies the tri-kāraṇa (three causal channels) of moral implication—mind first, then speech, then bodily action—stressing that relinquishment must begin internally. The discourse turns to dietary restraint: faults reside in mind, speech, and taste, and ascetics avoid meat because craving and attachment arise from tasting. Bhīṣma outlines moral objections to meat-eating through affective analogy (treating it as akin to consuming one’s own child) and through a psychology of desire (rāga arising from repeated savoring), concluding by reaffirming ahiṃsā as a comprehensive dharmic synthesis.
Chapter Arc: युधिष्ठिर बृहस्पति से पूछते हैं—मनुष्य किस आचरण से उत्तम स्वर्ग पाते हैं और किन कर्मों से नरक तथा तिर्यग्योनियों में गिरते हैं; मृत्यु के बाद देह को काष्ठ-लोष्टवत् छोड़कर जीव किस पथ से जाता है? → बृहस्पति कर्म-फल की कठोर गणना खोलते हैं—परस्त्रीगमन, स्त्रीहत्या, भोजन-चोरी, वस्त्र-चोरी आदि पापों के अनुसार जीव क्रमशः भेड़िया, कुत्ता, सियार, गीध, व्याल, बक, मक्खी, मयूर आदि योनियों में जन्म लेता है; कुछ योनियों में अल्पकाल में ही हिंसा/बंधन से मृत्यु का चक्र चलता रहता है। → पाप-विशेष के लिए तिर्यग्योनियों की श्रृंखला और यम-विषय (नरक-भोग) का वर्णन चरम पर पहुँचता है—विशेषतः स्त्रीहत्या जैसे महापाप के लिए दीर्घ क्लेश और अनेक ‘संसार’ (बार-बार जन्म) भोगने की घोषणा, तथा मृग-मत्स्य जैसे जन्मों में शीघ्र वध/जाल-बंधन का भयावह चक्र। → बृहस्पति यह भी बताते हैं कि भोगे हुए पाप-फल के क्षय के बाद जीव पुनः मानुषत्व प्राप्त कर सकता है; इस प्रकार कर्म-न्याय का विधान—दण्ड, शोधन, और पुनरावर्तन—स्पष्ट होता है। → युधिष्ठिर का जिज्ञासा-क्षेत्र आगे बढ़ता है—अब वे ‘शरीर-निचय’ (देह की स्थिति/संरचना और उसके रहस्य) जानने की ओर प्रश्न उठाते हैं।
Verse 1
ऑपन-माज बक। अर एकादशाधिकशततमोड< ध्याय: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन युधिछिर उवाच पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । श्रोतुमिच्छामि मर्त्यानां संसारविधिमुत्तमम्,युधिष्ठिरने कहा--सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! अब मैं मनुष्योंकी संसारयात्राके निर्वाहकी उत्तम विधि सुनना चाहता हूँ
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে পিতামহ! মহাপ্ৰাজ্ঞ, সৰ্বশাস্ত্ৰবিশাৰদ! মই মর্ত্যমানৱৰ সংসাৰ-যাত্ৰা চলোৱাৰ উত্তম বিধি শুনিবলৈ ইচ্ছা কৰোঁ।
Verse 2
केन वृत्तेन राजेन्द्र वर्तमाना नरा भुवि | प्राप्तुवन्त्युत्तमं स्वर्ग कथं च नरक॑ नूप,राजेन्द्र! पृथ्वीपर रहनेवाले मनुष्य किस बर्तावसे उत्तम स्वर्गलोक पाते हैं? और नरेश्वर! कैसा बर्ताव करनेसे वे नरकमें पड़ते हैं?
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— হে ৰাজেন্দ্ৰ! পৃথিৱীত বাস কৰা মানুহে কোন আচৰণে সৰ্বোত্তম স্বৰ্গ লাভ কৰে? আৰু হে নৃপতি! কোন আচৰণে তেওঁলোকে নৰকত পতিত হয়?
Verse 3
मृतं शरीरमुत्सज्य काष्ठलोष्टसमं जना: । प्रयान्त्यमुं लोकमित: को वै ताननुगच्छति,लोग अपने मृत शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेके समान छोड़कर जब यहाँसे परलोककी राह लेते हैं, उस समय उनके पीछे कौन जाता है?
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— মানুহে মৃত দেহক কাঠৰ টুকুৰা বা মাটিৰ ঢেলাৰ দৰে ত্যাগ কৰি যেতিয়া ইয়াৰ পৰা পৰলোকলৈ যায়, তেতিয়া তেওঁলোকৰ পিছত সঁচাকৈ কোন যায়?
Verse 4
भीष्म उवाच अयमायाति भगवान् बृहस्पतिरुदारधी: । पृच्छैनं सुमहाभागमेतद् गुह्मूं सनातनम्,भीष्मजीने कहा--वत्स! ये उदारबुद्धि भगवान् बृहस्पतिजी यहाँ पधार रहे हैं। इन्हीं महाभागसे इस सनातन गूढ़ विषयको पूछो
ভীষ্মে ক’লে— বৎস! উদাৰবুদ্ধি ভগৱান বৃহস্পতি ইয়ালৈ আহি আছে। এই সনাতন গূঢ় বিষয়টো সেই মহাভাগ্যবানজনক সুধা।
Verse 5
नैतदन्येन शक््यं हि वक्तुं केनचिदद्य वै । वक्ता बृहस्पतिसमो न हान्यो विद्यते क्वचित्,आज दूसरा कोई इस विषयका प्रतिपादन नहीं कर सकता। बृहस्पतिजीके समान वक्ता दूसरा कोई कहीं भी नहीं है
ভীষ্মে ক’লে— আজি এই বিষয়টো অন্য কোনেও যথাৰ্থভাৱে ব্যাখ্যা কৰিব নোৱাৰে। বৃহস্পতিসমান বক্তা আন ক’তো নাই।
Verse 6
वैशम्पायन उवाच तयो: संवदतोरेवं पार्थगांगेययोस्तदा । आजगाम विशुद्धात्मा नाकपृष्ठाद् बृहस्पति:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर और गंगानन्दन भीष्म, इन दोनोंमें इस प्रकार बात हो ही रही थी कि विशुद्ध अन्तःकरणवाले बृहस्पतिजी स्वर्गलोकसे वहाँ आ पहुँचे
বৈশম্পায়নে ক’লে— জনমেজয়! কুন্তীপুত্ৰ যুধিষ্ঠিৰ আৰু গঙ্গানন্দন ভীষ্ম এইদৰে কথা পাতি থাকোঁতেই, বিশুদ্ধাত্মা বৃহস্পতি স্বৰ্গলোকৰ উচ্চ শিখৰৰ পৰা তাত আহি উপস্থিত হ’ল।
Verse 7
ततो राजा समुत्थाय धृतराष्ट्रपुरोगम: । पूजामनुपमां चक्रे सर्वे ते च सभासद:,उन्हें देखते ही राजा युधिष्छिर धृतराष्ट्रको आगे करके खड़े हो गये। फिर उन्होंने तथा उन सभी सभासदोंने बृहस्पतिजीकी अनुपम पूजा की
তেতিয়া ৰজা যুধিষ্ঠিৰে ধৃতৰাষ্ট্ৰক আগত ৰাখি উঠি থিয় হ’ল। তাৰ পিছত তেওঁ অতুলনীয়ভাৱে পূজা কৰিলে, আৰু সভাৰ সকলো সভাসদেও তেনেকৈয়ে কৰিলে—ধৰ্মানুগত ৰীতিত পূজ্য বৃহস্পতিকে সন্মান জনালে।
Verse 8
ततो धर्मसुतो राजा भगवन्तं बृहस्पतिम् । उपगम्य यथान्यायं प्रश्न॑ पप्रच्छ तत्त्वतः,तदनन्तर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने भगवान् बृहस्पतिजीके समीप जाकर यथोचित रीतिसे यह तात्विक प्रश्न उपस्थित किया
তাৰ পিছত ধৰ্মপুত্ৰ ৰজা যুধিষ্ঠিৰে যথোচিত বিধি মানি ভগৱান বৃহস্পতিৰ ওচৰলৈ গৈ, তত্ত্বসত্য জানিবলৈ ইচ্ছুক হৈ বিনয়পূৰ্বক প্ৰশ্ন উত্থাপন কৰিলে।
Verse 9
युधिछिर उवाच भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद | मर्त्यस्य क: सहायो वै पिता माता सुतो गुरु:
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—ভগৱন! আপুনি সৰ্বধৰ্মজ্ঞ আৰু সৰ্বশাস্ত্ৰবিশাৰদ। কওকচোন, মর্ত্যৰ সত্য সহায় কোন—পিতা, মাতা, পুত্ৰ নে গুৰু?
Verse 10
ज्ञातिसम्बन्धिवर्गक्ष मित्रवर्गस्तथैव च । मृतं शरीरमुत्सज्य काष्ठलोष्टसमं जना:
আত্মীয়-স্বজনৰ দল আৰু বন্ধু-বৰ্গও—দেহ মৰি গ’লে মানুহে তাক কাঠ বা মাটিৰ ঢেলাৰ দৰে জ্ঞান কৰি ত্যাগ কৰে।
Verse 11
गच्छन्त्यमुत्र लोक॑ वै क एनमनुगच्छति । युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! आप सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाता और सब शास्त्रोंके विद्वान हैं; अतः बताइये, पिता, माता, पुत्र, गुरु, सजातीय सम्बन्धी और मित्र आदिमेंसे मनुष्यका सच्चा सहायक कौन है? जब सब लोग अपने मरे हुए शरीरको काठ और ढेलेके समान त्यागकर चले जाते हैं, तब इस जीवके साथ परलोकमें कौन जाता है? ।। ब॒हस्पतिर्वाच एक: प्रसूयते राजन्नेक एव विनश्यति
যুধিষ্ঠিৰে সুধিলে—এই জীৱ পৰলোকলৈ গ’লে কোনে তাক অনুসৰণ কৰে? কিয়নো মানুহে মৃত দেহক কাঠ বা মাটিৰ ঢেলাৰ দৰে জ্ঞান কৰি ত্যাগ কৰে। বৃহস্পতিয়ে ক’লে—হে ৰাজন, মানুহ একাই জন্মে আৰু একাই বিনাশ পায়।
Verse 12
असहाय: पिता माता तथा भ्राता सुतो गुरु:
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— পিতা, মাতা, ভ্ৰাতা, পুত্ৰ আৰু গুৰু—সহায় নাথাকিলে পৰাধীন আৰু অসহায় হৈ দুখত পৰে।
Verse 13
ज्ञातिसम्बन्धिवर्गक्ष मित्रवर्गस्तथैव च । पिता, माता, भाई, पुत्र, गुरु, जाति, सम्बन्धी तथा मित्रवर्ग--ये कोई भी उसके सहायक नहीं होते ।। मृतं शरीरमुत्सज्य काष्ठलोष्टसमं जना:
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— জ্ঞাতি-সম্বন্ধীৰ দল বা মিত্ৰবৰ্গ—কোনোৱেই প্ৰকৃত সহায় নহয়। পিতা, মাতা, ভ্ৰাতা, পুত্ৰ, গুৰু, জাতি, সম্বন্ধী আৰু মিত্ৰ—নিৰ্ণায়ক ক্ষণত কোনোৱেই উদ্ধাৰ নকৰে। প্ৰাণ গ’লে লোকসকলে দেহক কাঠৰ টুকুৰা বা মাটিৰ ঢেলাৰ দৰে ত্যাগ কৰে।
Verse 14
मुहूर्तमिव रोदित्वा ततो यान्ति पराड्मुखा: । लोग उसके मरे हुए शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेकी तरह फेंककर दो घड़ी रोते हैं और फिर उसकी ओरसे मुँह फेरकर चल देते हैं |। १३ $ ।। तैस्तच्छरीरमुत्सृष्ट धर्म एकोडनुगच्छति
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— লোকসকলে যেন মুহূৰ্তমাত্ৰ কান্দি, তাৰ পাছত মুখ ঘূৰাই গুচি যায়। সেই দেহ ত্যাগ হ’লে মানুহক অনুসৰণ কৰে কেৱল ধৰ্মই।
Verse 15
तस्माद् धर्म: सहायश्न सेवितव्य: सदा नृभि: । वे कुटुम्बीजन तो उसके शरीरका परित्याग करके चले जाते हैं, किंतु एकमात्र धर्म ही उस जीवात्माका अनुसरण करता है; इसलिये धर्म ही सच्चा सहायक है। अतः मनुष्योंको सदा धर्मका ही सेवन करना चाहिये ।। प्राणी धर्मसमायुक्तो गच्छेत् स्वर्गगतिं पराम्
সেয়ে মানুহে সদায় ধৰ্মকেই আচৰণ কৰা উচিত; কিয়নো সত্য সহচৰ আৰু সহায় একমাত্র ধৰ্ম। কুটুম্বীয়ে দেহ ত্যাগ কৰি গুচি যায়, কিন্তু জীৱাত্মাক অনুসৰণ কৰে কেৱল ধৰ্মই; সেয়ে ধৰ্মেই প্ৰকৃত সহায়। ধৰ্মসমাযুক্ত প্ৰাণী পৰম স্বৰ্গগতিলৈ যায়।
Verse 16
तस्मान्न्यायागतैरर्थर्धर्म सेवेत पण्डित:
সেয়ে পণ্ডিত লোকে ন্যায়সঙ্গত আৰু বিধিসম্মত উপায়ে অৰ্জিত ধনেৰে ধৰ্মৰ সেবা আৰু প্ৰতিষ্ঠা কৰিব লাগে।
Verse 17
लोभान्मोहादनुक्रोशाद् भयाद् वाप्यबहुश्रुतः:
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—লোভৰ পৰা, মোহৰ পৰা, অযথা দয়াৰ পৰা, বা ভয়ৰ পৰাও—যি শাস্ত্ৰত সুশিক্ষিত নহয়, সি ভুল পথে গৈ অধৰ্ম আচৰণ কৰে।
Verse 18
धर्मश्चार्थश्॒ कामश्च त्रितयं जीविते फलम्
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—ধৰ্ম, অৰ্থ আৰু কাম—এই ত্ৰয়েই মানৱজীৱনৰ ফল।
Verse 19
युधिछिर उवाच श्रुतं भगवतो वाक्यं धर्मयुक्ते परं हितम्
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—মই ভগৱানৰ বাক্য শুনিছোঁ—সেয়া ধৰ্মযুক্ত আৰু পৰম হিতকৰ।
Verse 20
मृतं शरीरं हि नृणां सूक्ष्ममव्यक्ततां गतम्
কাৰণ মানুহ মৰিলে তাৰ দেহ সূক্ষ্ম হৈ অব্যক্ত অৱস্থালৈ গমন কৰে।
Verse 21
अचक्षुविंषयं प्राप्तं कं धर्मोडनुगच्छति । मनुष्यका स्थूल शरीर तो मरकर यहीं पड़ा रह जाता है और उसका सूक्ष्म शरीर अव्यक्तभावको प्राप्त हो जाता है--नेत्रोंकी पहुँचसे परे है। ऐसी दशामें धर्म किस प्रकार उसका अनुसरण करता है? ।। २० $ ।। ब॒हस्पतिरु्वाच पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिर्मनोडन्तक:
যুধিষ্ঠিৰে সুধিলে—যি চকুৰ বিষয়ৰ পৰা আঁতৰি গ’ল, তাৰ ধৰ্ম কাক অনুসৰণ কৰে? বৃহস্পতিয়ে ক’লে—পৃথিৱী, বায়ু, আকাশ, আপঃ (জল), জ্যোতি, মন আৰু অন্তক (মৃত্যু)…
Verse 22
प्राणिनामिह सर्वेषां साक्षिभूता निशानिशम्
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—এই জগতত সকলো প্ৰাণীৰ বাবে দিন-ৰাতি নিৰন্তৰ সাক্ষী হৈ থকা এক তত্ত্ব আছে।
Verse 23
त्वगस्थिमांसं शुक्रे च शोणितं च महामते
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে মহামতে! ছাল, অস্থি আৰু মাংস, লগতে শুক্ৰ আৰু ৰক্ত—এইবোৰ বিবেচনা কৰা।
Verse 24
ततो धर्मसमायुक्तः प्राप्तुते जीव एव हि,इसलिये धर्मयुक्त जीव ही परमगति प्राप्त करता है। फिर परलोकमें अपने कर्मोंका भोग समाप्त करके प्राणी जब दूसरा शरीर धारण करता है, उस समय उसके शरीरके पाँचों भूतोंमें स्थित अधिष्ठाता देवता उस जीवके शुभ और अशुभ कर्मोंको देखते हैं। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?
সেয়ে ধৰ্মসমন্বিত জীৱেই পৰম গতি লাভ কৰে। তাৰ পিছত পৰলোকত কৰ্মফলৰ ভোগ শেষ কৰি যেতিয়া প্ৰাণীয়ে আন দেহ ধাৰণ কৰে, তেতিয়া দেহৰ পঞ্চভূতত অধিষ্ঠিত অধিষ্ঠাতা দেৱতাসকলে সেই জীৱৰ শুভ আৰু অশুভ কৰ্ম লক্ষ্য কৰে। এতিয়া তুমি আৰু কি শুনিব বিচাৰা?
Verse 25
ततो<स्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम् | देवता: पञ्चभूतस्था: कि भूयः श्रोतुमिच्छसि,इसलिये धर्मयुक्त जीव ही परमगति प्राप्त करता है। फिर परलोकमें अपने कर्मोंका भोग समाप्त करके प्राणी जब दूसरा शरीर धारण करता है, उस समय उसके शरीरके पाँचों भूतोंमें स्थित अधिष्ठाता देवता उस जीवके शुभ और अशुभ कर्मोंको देखते हैं। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?
তেতিয়া তাৰ কৰ্ম—শুভ হওক বা অশুভ—পঞ্চভূতস্থ দেৱতাসকলে দেখে। এতিয়া তুমি আৰু কি শুনিব বিচাৰা?
Verse 26
ततो धर्मसमायुक्त: स जीव: सुखमेधते । इहलोके परे चैव कि भूय: कथयामि ते,तदनन्तर धर्मयुक्त वह जीव इहलोक और परलोकमें सुखका अनुभव करता है। अब तुम्हें और क्या बताऊँ?
তাৰ পিছত ধৰ্মসমন্বিত সেই জীৱ ইহলোক আৰু পৰলোক—দুয়োতে সুখে সমৃদ্ধ হয়। এতিয়া মই তোমাক আৰু কি ক’ম?
Verse 27
युधिछिर उवाच तद् दर्शितं भगवता यथा धर्मोडनुगच्छति । एतत् तु ज्ञातुमिच्छामि कथ्थ॑ रेत: प्रवर्तते,युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! धर्म जिस प्रकार जीवका अनुसरण करता है, वह तो आपने समझा दिया। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि इस शरीरमें वीर्यकी उत्पत्ति कैसे होती है?
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—ভগৱন! ধৰ্ম যিদৰে জীৱক অনুসৰণ কৰে, সেয়া আপুনি দেখুৱালে। এতিয়া মই জানিব বিচাৰোঁ—এই দেহত ৰেতঃ (বীৰ্য) কেনেকৈ উৎপন্ন হয়?
Verse 28
ब॒हस्पतिरुवाच अन्नमश्नन्ति यद् देवा: शरीरस्था नरेश्वर । पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिर्मनस्तथा,बृहस्पतिजीने कहा--शुद्धात्मन! नरेश्वर! राजेन्द्र! इस शरीरमें स्थित पृथ्वी, जल, अन्न, वायु, आकाश और मनके अधिष्ठाता देवता जो अन्न भक्षण करते हैं और उस अन्नसे मनसहित वे पाँचों भूत जब पूर्ण तृप्त होते हैं, तब महान् रेतस् (वीर्य) की उत्पत्ति होती है
বৃহস্পতিয়ে ক’লে—হে নৰেশ্বৰ! এই দেহত অৱস্থিত পৃথিৱী, জল, অন্ন, বায়ু, আকাশ, তেজ আৰু মনৰ অধিষ্ঠাতা দেৱতাসকলে ভোজিত অন্ন গ্ৰহণ কৰে। সেই অন্নৰ দ্বাৰা মনসহ অন্তঃস্থিত তত্ত্বসমূহ সম্পূৰ্ণ তৃপ্ত হ’লে, তেতিয়া মহৎ ৰেতঃ (বীৰ্য/জননশক্তি) উৎপন্ন হয়।
Verse 29
ततस्तृप्तेषु राजेन्द्र तेषु भूतेषु पडचसु । मन:पषष्ठेषु शुद्धात्मन् रेत: सम्पद्यते महत्,बृहस्पतिजीने कहा--शुद्धात्मन! नरेश्वर! राजेन्द्र! इस शरीरमें स्थित पृथ्वी, जल, अन्न, वायु, आकाश और मनके अधिष्ठाता देवता जो अन्न भक्षण करते हैं और उस अन्नसे मनसहित वे पाँचों भूत जब पूर्ण तृप्त होते हैं, तब महान् रेतस् (वीर्य) की उत्पत्ति होती है
বৃহস্পতিয়ে ক’লে—হে ৰাজেন্দ্ৰ, হে শুদ্ধাত্মা! মনক ষষ্ঠ ধৰি সেই পাঁচ ভূত সম্পূৰ্ণ তৃপ্ত হ’লে, তেতিয়া মহৎ ৰেতঃ (বীৰ্য/জননশক্তি) সিদ্ধ হয়।
Verse 30
ततो गर्भ: सम्भवति श्लेषात् स्त्रीपुंसयोर्नूप । एतत् ते सर्वमाख्यातं भूय: कि श्रोतुमिच्छसि,राजन! फिर स्त्री-पुरुषका संयोग होनेपर वही वीर्य गर्भका रूप धारण करता है। ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दी। अब और क्या सुनना चाहते हो?
বৃহস্পতিয়ে ক’লে—হে নৃপ! তাৰ পিছত স্ত্ৰী-পুৰুষৰ সংযোগত সেই ৰেতঃৰ পৰা গৰ্ভ সম্ভৱ হয়। এই সকলো মই তোমাক ক’লোঁ; এতিয়া আৰু কি শুনিব বিচাৰা?
Verse 31
युधिषछ्िर उवाच आखायात॑ मे भगवता गर्भ: संजायते यथा । यथा जातस्तु पुरुष: प्रपद्यति तदुच्यताम्,युधिष्ठिरने कहा--भगवन्! गर्भ जिस प्रकार उत्पन्न होता है, वह आपने बताया। अब यह बताइये कि उत्पन्न हुआ पुरुष पुन: किस प्रकार बन्धनमें पड़ता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—ভগৱন! গৰ্ভ কেনেকৈ উৎপন্ন হয়, সেয়া আপুনি মোক ক’লে। এতিয়া জন্ম লোৱা পুৰুষ পুনৰ কেনেকৈ বন্ধনত পৰে, সেয়া কওক।
Verse 32
ब॒हस्पतिर्वाच आसमज़मात्र: पुरुषस्तैर्भूतैरभि भूयते । विप्रयुक्तश्न तैर्भूते: पुनर्यात्यपरां गतिम्
বৃহস্পতি ক’লে—ৰাজন! যাৰ বিবেচনা সামান্যও বিচলিত হয়, সেই পুৰুষ ভূততত্ত্বসমূহৰ দ্বাৰা অভিভূত হয়। কিন্তু যেতিয়া সি সেই ভূতসমূহৰ পৰা বিচ্ছিন্ন/বিৰক্ত হয়, তেতিয়া সি পুনৰ উচ্চতৰ গতি লাভ কৰে।
Verse 33
बृहस्पतिजीने कहा--राजन्! जीव उस वीर्यमें प्रविष्ट होकर जब गर्भमें संनिहित होता है, तब वे पाँचों भूत शरीररूपमें परिणत हो उसे बाँध लेते हैं, फिर उन्हीं भूतोंसे विलग होनेपर वह दूसरी गतिको प्राप्त होता है ।। सर्वभूतसमायुक्तः प्राप्त जीव एव हि । ततो<स्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम् | देवता: पञ्चभूतस्था: कि भूयः श्रोतुमिच्छसि,शरीरमें सम्पूर्ण भूतोंसे युक्त हुआ वह जीव ही सुख या दु:ख पाता है। उस समय पाँचों भूतोंमें स्थित उनके अधिष्ठाता देवता जीवके शुभ या अशुभ कर्मको देखते हैं। अब और क्या सुनना चाहते हो?
বৃহস্পতি ক’লে—ৰাজন! জীৱ যেতিয়া বীৰ্যত প্ৰৱেশ কৰি গৰ্ভত স্থিত হয়, তেতিয়া পঞ্চ মহাভূত দেহৰূপে পৰিণত হৈ তাক বান্ধি পেলায়। আৰু যেতিয়া সি সেই ভূতসমূহৰ পৰা বিচ্ছিন্ন হয়, তেতিয়া সি অন্য গতি লাভ কৰে। সৰ্বভূতসমায়ুক্ত এই দেহধাৰী জীৱেই সুখ-দুঃখ ভোগ কৰে। তেতিয়া পঞ্চভূতত অধিষ্ঠিত দেবতাসকলে তাৰ কৰ্ম—শুভ নে অশুভ—দেখে। এতিয়া আৰু কি শুনিব খোজে?
Verse 34
युधिछिर उवाच त्वगस्थिमांसमुत्सृज्य तैश्न भूतैर्विवर्जित: । जीव: स भगवन् क्वस्थ: सुखदु:खे समश्लुते,युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! जीव त्वचा, अस्थि और मांसमय शरीरका त्याग करके जब पाँचों भूतोंके सम्बन्धसे पृथक हो जाता है, तब कहाँ रहकर वह सुख-दुःखका उपभोग करता है?
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—ভগৱন! জীৱে ত্বক, অস্থি আৰু মাংসময় দেহ ত্যাগ কৰি পঞ্চ মহাভূতৰ সম্পৰ্কৰ পৰা বিচ্ছিন্ন হ’লে, সি ক’ত অৱস্থিত হৈ সুখ-দুঃখ ভোগ কৰে?
Verse 35
बुहस्पतिर्वाच जीव: कर्मसमायुक्तः शीघ्र॑ रेतस्त्वमागत: । स्त्रीणां पुष्पं समासाद्य सूते कालेन भारत,बृहस्पतिजीने कहा--भारत! जीव अपने कर्मोंसे प्रेरित होकर शीघ्र ही वीर्यभावको प्राप्त होता है और स्त्रीके रजमें प्रविष्ट होकर समयानुसार जन्म धारण करता है
বৃহস্পতি ক’লে—হে ভাৰত! জীৱ নিজৰ কৰ্মৰ দ্বাৰা প্ৰেৰিত হৈ শীঘ্ৰেই বীৰ্যভাবলৈ যায়; স্ত্ৰীৰ ৰজঃ প্ৰাপ্ত কৰি তাত প্ৰৱেশ কৰি কালানুসাৰে জন্ম ধাৰণ কৰে।
Verse 36
यमस्य पुरुषै: क्लेशं यमस्य पुरुषैर्वधम् दुःखं संसारचक्रं च नर: क्लेशं स विन्दति,(गर्भमें आनेके पहले सूक्ष्मशरीरमें स्थित होकर अपने दुष्कर्मोके कारण) वह यमदूतोंद्वारा नाना प्रकारके क्लेश पाता, उनके प्रहार सहता और दुःखमय संसारचक्रमें भाँति-भाँतिके कष्ट भोगता है
সি যমৰ পুৰুষসকলৰ দ্বাৰা ক্লেশ পায়, তেওঁলোকৰ প্ৰহাৰ আৰু দণ্ড সহে, আৰু দুখময় সংসাৰচক্ৰত ঘূৰি ঘূৰি কষ্টেই কষ্ট ভোগ কৰে।
Verse 37
इहलोके च स प्राणी जन्मप्रभृति पार्थिव । सुकृतं कर्म वै भुद्धक्ते धर्मस्य फलमाश्रित:
হে পাৰ্থিৱ! এই লোকতেই জীৱ জন্মৰ পৰা সুকৃত কৰ্মৰ ফল ভোগ কৰে; ধৰ্মফলৰ আশ্ৰয় লৈ সেই অনুসাৰে সুখ অনুভৱ কৰে।
Verse 38
यदि धर्म यथाशक्ति जन्मप्रभूति सेवते | ततः स पुरुषो भूत्वा सेवते नित्यदा सुखम्
যদি মানুহে জন্মৰ আৰম্ভণিৰ পৰা নিজৰ সামৰ্থ্য অনুসাৰে ধৰ্মৰ সেৱা আৰু আচৰণ কৰে, তেন্তে সি যথাৰ্থ পুৰুষ হৈ সদায় সুখ অনুভৱ কৰে।
Verse 39
पृथ्वीनाथ! यदि प्राणी इस लोकमें जन्मसे ही पुण्यकर्ममें लगा रहता है तो वह धर्मके फलका आश्रय लेकर उसके अनुसार सुख भोगता है। यदि अपनी शक्तिके अनुसार बाल्यकालसे ही धर्मका सेवन करता है तो वह मनुष्य होकर सदा सुखका अनुभव करता है ।। अथान्तरा तु धर्मस्याप्यधर्ममुपसेवते । सुखस्यानन्तरं दु:ःखं स जीवो5प्यधिगच्छति,किंतु धर्मके बीचमें यदि कभी-कभी वह अधर्मका भी आचरण कर बैठता है तो उसे सुखके बाद दुःख भी भोगना पड़ता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে পৃথ্বীনাথ! যদি জীৱ এই লোকত জন্মৰ পৰা পুণ্যকৰ্মত ৰত থাকে, তেন্তে ধৰ্মফলৰ আশ্ৰয় লৈ সেই অনুসাৰে সুখ ভোগ কৰে। যদি সি নিজৰ সামৰ্থ্য অনুসাৰে বাল্যকালৰ পৰা ধৰ্মৰ সেৱা কৰে, তেন্তে মানুহ হৈ সদায় সুখ অনুভৱ কৰে। কিন্তু ধৰ্মৰ মাজতে কেতিয়াবা অধৰ্মকো আশ্ৰয় কৰিলে, সুখৰ পিছত সেই জীৱে দুঃখো ভোগ কৰে।
Verse 40
अधर्मेण समायुक्तो यमस्य विषयं गत: । महद् दुःखं समासाद्य तिर्यग्योनौ प्रजायते,अधर्मपरायण मनुष्य यमलोकमें जाता है और वहाँ महान् दुःख भोगकर यहाँ पशु- पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—অধৰ্মেৰে যুক্ত মানুহ যমৰ অধীনভূমি (যমলোক)লৈ যায়। তাত মহাদুঃখ ভোগ কৰি সি ইয়াত পশু-পক্ষীৰ যোনিত জন্ম লয়।
Verse 41
कर्मणा येन येनेह यस्यां योनौ प्रजायते । जीवो मोहसमायुक्तस्तन्मे निगदत: शृणु,जीव मोहके वशीभूत होकर जिस-जिस कर्मका अनुष्ठान करनेसे जैसी-जैसी योनिमें जन्म धारण करता है, उसे बता रहा हूँ, सुनो
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—এই লোকত মোহে আচ্ছন্ন জীৱে যি যি কৰ্মৰ ফলত যেনে যেনে যোনিত জন্ম লয়, সেয়া মই বৰ্ণনা কৰোঁ; শুনা।
Verse 42
यदेतदुच्यते शास्त्रे सेतिहासे च च्छन्दसि । यमस्य विषयं घोर मर्त्यों लोक: प्रपद्यते
শাস্ত্ৰত, ইতিহাস-পরম্পৰাত আৰু বৈদিক ছন্দত যি কোৱা হৈছে—যমৰ সেই ভয়ংকৰ বিষয়-লোকলৈ—মৰ্ত্যলোক অনিবাৰ্যভাৱে প্ৰৱেশ কৰে।
Verse 43
शास्त्र, इतिहास और वेदमें जो यह बात बतायी गयी है कि मनुष्य इस लोकमें पाप करनेपर मृत्युके पश्चात् यमराजके भयंकर लोकमें जाता है, यह सत्य ही है ।। इह स्थानानि पुण्यानि देवतुल्यानि भूपते । तिर्यग्योन्यतिरिक्तानि गतिमन्ति च सर्वश:,भूपाल! इस यमलोकमें देवलोकके समान पुण्यमय स्थान भी हैं, जिनमें तिर्यक् (तथा कीट-पतंग आदि) योनिके प्राणियोंकों छोड़कर समस्त पुण्यात्मा जंगम जीव जाते हैं
শাস্ত্ৰ, ইতিহাস-পরম্পৰা আৰু বেদত যিদৰে কোৱা হৈছে—এই লোকত পাপ কৰা মানুহে মৃত্যুৰ পিছত যমৰ ভয়ংকৰ লোকলৈ যায়—ই সঁচাকৈয়ে সত্য। কিন্তু, হে ভূপতে, সেই যমলোকতেই দেৱলোকসম পুণ্যময় স্থানও আছে; তিৰ্যক্ (কীট-পতঙ্গ আদি) যোনি বাদ দি, সকলো পুণ্যবান চলমান জীৱে সেই গতি লাভ কৰে।
Verse 44
यमस्य भवने दिव्ये ब्रहलोकसमे गुणै: । कर्मभिनियतैर्बद्धो जन्तुर्दु:खान्युपाश्चुते,यमराजका भवन सौन्दर्य आदि गुणोंके कारण ब्रह्मलोकके समान दिव्य भी है। परंतु अपने नियत पापकर्मोसे बँधा हुआ जीव वहाँ भी नरकमें पड़कर दुःख भोगता है
যমৰ দিৱ্য ভৱন গুণে ব্রহ্মলোকসম; তথাপি নিজৰ নিয়ত কৰ্মে বাঁধ খোৱা জীৱে তাতো দুঃখ ভোগ কৰে।
Verse 45
येन येन तु भावेन कर्मणा पुरुषो गतिम् । प्रयाति परुषां घोरां तत्ते वक्ष्याम्यत: परम्,मनुष्य जिस-जिस भाव और जिस-जिस कर्मसे निष्ठुरतापूर्ण भयंकर गतिको प्राप्त होता है, अब उसीको बता रहा हूँ
মানুহে যি যি ভাব আৰু যি যি কৰ্মৰ দ্বাৰা কঠোৰ, ভয়ংকৰ গতি লাভ কৰে—সেই কথাই এতিয়া মই তোমাক আগলৈ ক’ম।
Verse 46
अधीत्य चतुरो वेदान् द्विजो मोहसमन्वित: । पतितात् प्रतिगृह्याथ खरयोनौ प्रजायते,जो द्विज चारों वेदोंका अध्ययन करनेके बाद भी मोहवश पतित मनुष्योंसे दान लेता है, उसका गदहेकी योनिमें जन्म होता है
চাৰি বেদ অধ্যয়ন কৰিও যি দ্বিজ মোহগ্ৰস্ত হৈ পতিত লোকৰ পৰা দান গ্ৰহণ কৰে, সি পিছত গাধাৰ যোনিত জন্ম লাভ কৰে।
Verse 47
खरो जीवति वर्षाणि दश पञठ्च च भारत | खरो मृतो बलीवर्द: सप्त वर्षाणि जीवति,भारत! गदहेकी योनिमें वह पंद्रह वर्षोतक जीवित रहता है। उसके बाद मरकर बैल होता है। उस योनिमें वह सात वर्षोतक जीवित रहता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে ভাৰত! গাধা পন্ধৰ বছৰ জীয়াই থাকে। সি মৰিলে পাছত বলদ-যোনিত জন্ম লয় আৰু সেই জন্মত সাত বছৰ জীয়াই থাকে।
Verse 48
बलीवर्दों मृतश्चापि जायते ब्रद्यराक्षस: । ब्रह्मरक्षश्ष मासांस्त्रींस्ततो जायति ब्राह्मण:,जब बैलका शरीर छूट जाता है, तब वह ब्रह्मराक्षस होता है। तीन मासतक ब्रह्मराक्षस रहनेके बाद फिर वह ब्राह्मणका जन्म पाता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—বলদ মৰিলে সি ব্ৰহ্মৰাক্ষস হৈ জন্ম লয়। তিন মাহ ব্ৰহ্মৰাক্ষস ৰূপে থাকি তাৰ পাছত সি পুনৰ ব্ৰাহ্মণ-যোনিত জন্ম পায়।
Verse 49
पतितं याजयित्वा तु कृमियोनौ प्रजायते । तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत,भारत! जो ब्राह्मण पतित पुरुषका यज्ञ कराता है, वह मरनेके बाद कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है और उस योनिमें पंद्रह वर्षोतक जीवित रहता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে ভাৰত! যি ব্ৰাহ্মণে পতিত পুৰুষক যজ্ঞ কৰায়, সি মৃত্যুৰ পাছত কৃমি-যোনিত জন্ম লয় আৰু তাত পন্ধৰ বছৰ জীয়াই থাকে।
Verse 50
कृमिभावाद् विमुक्तस्तु ततो जायति गर्दभ: । गर्दभ: पञ्च वर्षाणि पज्च वर्षाणि सूकर:
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—কৃমি-ভাৱৰ পৰা মুক্ত হ’লে সি গাধা হৈ জন্ম লয়। গাধা ৰূপে পাঁচ বছৰ থাকে, তাৰ পাছত পাঁচ বছৰ শূকৰ-যোনিত থাকে।
Verse 51
कुक्कुटः पञ्च वर्षाणि पज्च वर्षाणि जम्बुक: । थ्वा वर्षमेक॑ं भवति ततो जायति मानव:
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—কুকুৰা পাঁচ বছৰ জীয়াই থাকে, শিয়ালো পাঁচ বছৰ; কিন্তু মানুহৰ জীৱন অতি ক্ষণভঙ্গুৰ—যেন এক বছৰৰো কম সময় টিকি, তাৰ পাছত আগলৈ গতি কৰে।
Verse 52
कीड़ेकी योनिसे छूटनेपर वह गदहेका जन्म पाता है। पाँच वर्षतक गदहा रहकर पाँच वर्ष सूअर, पाँच वर्ष मुर्गा, पाँच वर्ष सियार और एक वर्ष कुत्ता होता है। उसके बाद वह मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है ।। उपाध्यायस्य यः पापं शिष्य: कुर्यादबुद्धिमान् । स जीव इह संसारांस्त्रीनाप्रोति न संशय:,जो मूर्ख शिष्य अपने अध्यापकका अपराध करता है, वह यहाँ निम्नांकित तीन योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है, इसमें संशय नहीं है। राजेन्द्र! पहले तो वह कुत्ता होता है, फिर राक्षस और गदहा होता है। उसके बाद मरकर प्रेतावस्थामें अनेक कष्ट भोगनेके पश्चात् ब्राह्मणका जन्म पाता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— যি মূঢ় শিষ্য আচার্যৰ বিৰুদ্ধে পাপময় অপৰাধ কৰে, সি এই সংসাৰত নিশ্চয়েই তিনিটা নীচ যোনি লাভ কৰে—ইয়াত সন্দেহ নাই। এনে দুষ্কৰ্মৰ ফলত জীৱ অধোগতিত পৰি নানা পশুযোনি আৰু ভয়ংকৰ অৱস্থাত ঘূৰি ফুৰে; আৰু কৰ্মফল ভোগ কৰাৰ পাছতেহে পুনৰ মানৱজন্ম লাভ কৰে। ইয়াৰ দ্বাৰা গুৰু–শিষ্য-বন্ধন ভংগৰ নৈতিক গুৰুত্ব আৰু কৰ্মফলৰ অনিবার্যতা প্ৰকাশ পায়।
Verse 53
प्राक् श्वा भवति राजेन्द्र तत: क्रव्यात्तत: खर: । ततः प्रेत: परिक्लिष्ट: पश्चाज्जायति ब्राह्मण:,जो मूर्ख शिष्य अपने अध्यापकका अपराध करता है, वह यहाँ निम्नांकित तीन योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है, इसमें संशय नहीं है। राजेन्द्र! पहले तो वह कुत्ता होता है, फिर राक्षस और गदहा होता है। उसके बाद मरकर प्रेतावस्थामें अनेक कष्ट भोगनेके पश्चात् ब्राह्मणका जन्म पाता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— হে ৰাজেন্দ্ৰ! প্ৰথমে সি কুকুৰ হয়; তাৰপাছত মাংসভোজী ৰাক্ষস; তাৰপাছত গাধা। তাৰপাছত মৃত্যু বৰণ কৰি ক্লেশপীড়িত প্ৰেত হৈ বহু দুখ ভোগ কৰি, শেষত ব্ৰাহ্মণ যোনিত জন্ম লয়।
Verse 54
मनसापि गुरोर्भार्या यः शिष्यो याति पापकृत् । स उग्रान् प्रैति संसारानधर्मेणेह चेतसा,जो पापाचारी शिष्य गुरुपत्नीके साथ समागमका विचार भी मनमें लाता है, वह अपने मानसिक पापके कारण भयंकर योनियोंमें जन्म लेता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— যি শিষ্য পাপকৰ্মী হৈ মনতেও গুৰুৰ পত্নীৰ ফালে ধাৱিত হয়, সি এই অধৰ্মময় সংকল্পৰ ফলত ইহলোকতে ভয়ংকৰ সংসাৰচক্ৰত পতিত হয় আৰু ভীতিজনক যোনি লাভ কৰে।
Verse 55
श्वयोनौ तु स सम्भूतस्त्रीणि वर्षाणि जीवति । तत्रापि निधन प्राप्त: कृमियोनौ प्रजायते,पहले कुत्तेकी योनिमें जन्म लेकर वह तीन वर्षतक जीवन धारण करता है। उस योनिमें मृत्युको प्राप्त होकर वह कीड़ेकी योनिमें उत्पन्न होता है। कीटयोनिमें जन्म लेकर वह एक वर्षषक जीवित रहता है। फिर मरनेके बाद उसका ब्राह्मण-योनिमें जन्म होता है
সি কুকুৰযোনিত জন্ম লৈ তিন বছৰ জীয়াই থাকে। তাতেই মৃত্যু বৰণ কৰি পাছত কৃমিযোনিত জন্ম লয়।
Verse 56
कृमिभावमनुप्राप्तो वर्षमेक॑ तु जीवति । ततस्तु निधन प्राप्तो ब्रह्मययोनौ प्रजायते,पहले कुत्तेकी योनिमें जन्म लेकर वह तीन वर्षतक जीवन धारण करता है। उस योनिमें मृत्युको प्राप्त होकर वह कीड़ेकी योनिमें उत्पन्न होता है। कीटयोनिमें जन्म लेकर वह एक वर्षषक जीवित रहता है। फिर मरनेके बाद उसका ब्राह्मण-योनिमें जन्म होता है
কৃমিভাৱ প্ৰাপ্ত হৈ সি এক বছৰ জীয়াই থাকে। তাৰপাছত মৃত্যু বৰণ কৰি ব্ৰাহ্মণ যোনিত জন্ম লয়।
Verse 57
यदि पुत्रसमं शिष्य॑ गुरुहन्यादकारणे । आत्मन: कामकारेण सोऊपि हिंस्र: प्रजायते
যদি গুৰু নিজৰ খেয়াল আৰু কামনাৰ বশত, পুত্ৰসম শিষ্যক অকাৰণে হত্যা কৰে, তেন্তে সেই গুৰু নিজেও হিংস্ৰ হয়।
Verse 58
यदि गुरु अपने पुत्रके समान शिष्यको बिना कारणके ही मारता-पीटता है तो वह अपनी स्वेच्छा-चारिताके कारण हिंसक पशुकी योनिमें जन्म लेता है ।। पितरं मातरं चैव यस्तु पुत्रो5वमन्यते । सो<पि राजन मृतो जनन््तु: पूर्व जायेत गर्दभ:,राजन! जो पुत्र अपने माता-पिताका अनादर करता है, वह भी मरनेके बाद पहले गदहा नामक प्राणी होता
যদি গুৰু পুত্ৰসম শিষ্যক অকাৰণে মাৰে-ধৰে, তেন্তে স্বেচ্ছাচাৰৰ দোষত তেওঁ হিংস্ৰ পশুযোনিত পতিত হয়। আৰু হে ৰাজন, যি পুত্ৰ পিতা-মাতাক অবমাননা কৰে, সিও মৃত্যুৰ পিছত প্ৰথমে গাধা হৈ জন্মে।
Verse 59
गर्दभवत्वं तु सम्प्राप्प दश वर्षाणि जीवति । संवत्सरं तु कुम्भीरस्ततो जायेत मानव:,गदहेका शरीर पाकर वह दस वर्षोंतक जीवित रहता है। फिर एक सालतक घड़ियाल रहनेके बाद मानवयोनिमें उत्पन्न होता है
গাধা-ভাব লাভ কৰি সি দহ বছৰ জীয়াই থাকে। তাৰ পিছত এক বছৰ কুম্ভীৰ (ঘড়িয়াল) হৈ থাকে; তাৰ পাছত মানৱযোনিত জন্ম লয়।
Verse 60
पुत्रस्य मातापितरौ यस्य रुष्टात्रुभावपि । गुर्वपध्यानत: सो5पि मृतो जायति गर्दभ:,जिस पुत्रके ऊपर माता और पिता दोनों ही रष्ट होते हैं, वह गुरुजनोंके अनिष्टचिन्तनके कारण मृत्युके बाद गदहा होता है
যি পুত্ৰৰ ওপৰত পিতা-মাতা দুয়ো দৃঢ়ভাৱে ৰুষ্ট থাকে, গুৰুজনৰ অপধ্যান (অনিṣ্টচিন্তা)ৰ ফলত সি মৃত্যুৰ পিছত গাধা হৈ জন্মে।
Verse 61
खरो जीवति मासांस्तु दश श्वा च चतुर्दश । बिडाल: सप्तमासांस्तु ततो जायति मानव:,गदहेकी योनिमें वह दस मासतक जीवित रहता है। उसके बाद चौदह महीनोंतक कुत्ता और सात मासतक बिलाव होकर अनन््तमें वह मनुष्यकी योनिमें जन्म ग्रहण करता है
গাধা-যোনিত সি দহ মাহ থাকে; তাৰ পিছত চৌদ্দ মাহ কুকুৰ আৰু সাত মাহ বিড়াল হৈ থাকে; তাৰ পাছত মানৱযোনিত জন্ম লয়।
Verse 62
मातापितरावाक़ुश्य सारिक: सम्प्रजायते । ताडयित्वा तु तावेव जायते कच्छपो नृूप,माता-पिताकी निन््दा करके अथवा उन्हें गाली देकर मनुष्य दूसरे जन्ममें मैना होता है। नरेश्वर! जो माता-पिताको मारता है, वह कछुआ होता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—যি মানুহে মাক-দেউতাক নিন্দা কৰে বা কটু বাক্যৰে গালি দিয়ে, সি পৰজন্মত মাইনা পখী হয়। হে নৰেশ্বৰ! আৰু যি সেই মাক-দেউতাকেই প্ৰহাৰ কৰে, সি কচ্ছপ হয়।
Verse 63
कच्छपो दश वर्षाणि त्रीणि वर्षाणि शल्यक: । व्यालो भूत्वा च षण्मासांस्ततो जायति मानुष:,दस वर्षतक कछुआ रहनेके पश्चात् तीन वर्ष साही और छ: महीनेतक सर्प होता है। उसके अनन्तर वह मनुष्यकी योनिमें जन्म लेता है
দহ বছৰ কচ্ছপ, তিনি বছৰ শল্যক (মুল্লা-শূকৰ/শজাৰু), আৰু ছয় মাহ সাপ হৈ থাকি, তাৰ পিছত সি মানুহ যোনিত জন্ম লয়।
Verse 64
भर्तृपिण्डमुपाश्नन् यो राजद्विष्टानि सेवते । सो<5पि मोहसमापन्नो मृतो जायति वानर:,जो पुरुष राजाके टुकड़े खाकर पलता हुआ भी मोहवश उसके शत्रुओंकी सेवा करता है, वह मरनेके बाद वानर होता है
ৰাজাৰ দান-অন্ন খাই জীৱিকা চলাইও যি মোহবশত ৰাজদ্বেষীসকলৰ সেৱা কৰে, সি মৃত্যুৰ পিছত বানৰ হৈ জন্মায়।
Verse 65
वानरो दश वर्षाणि पज्च वर्षाणि मूषिक: । श्वाथ भूत्वा तु षण्मासांस्ततो जायति मानुष:
দহ বছৰ বানৰ, পাঁচ বছৰ মূষিক, আৰু ছয় মাহ কুকুৰ হৈ থাকি, তাৰ পিছত সি মানুহ যোনিত জন্ম লয়।
Verse 66
दस वर्षोतक वानर, पाँच वर्षोतक चूहा और छ: महीनोंतक कुत्ता होकर वह मनुष्यका जन्म पाता है ।। न्यासापहर्ता तु नरो यमस्य विषयं गतः । संसाराणां शतं गत्वा कृमियोनौ प्रजायते,दूसरोंकी धरोहर हड़प लेनेवाला मनुष्य यमलोकमें जाता और क्रमश: सौ योनियोंमें भ्रमण करके अन्तमें कीड़ा होता है
দহ বছৰ বানৰ, পাঁচ বছৰ চুহা আৰু ছয় মাহ কুকুৰ হৈ থাকি সি মানুহ জন্ম লাভ কৰে। কিন্তু যি মানুহে আনৰ সঁপা আমানত (ন्यास) আত্মসাৎ কৰে, সি যমৰ লোকলৈ যায়; শত জন্মত ভ্ৰমণ কৰি শেষত কৃমিযোনিত জন্মায়।
Verse 67
तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत | दुष्कृतस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानुष:,भारत! कीड़ेकी योनिमें वह पंद्रह वर्षोतकफ जीवित रहता है और अपने पापोंका क्षय करके अन्तमें मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है
হে ভাৰত! তাত সি পন্ধৰ বছৰ জীয়াই থাকে; নিজৰ দুষ্কৃত্যৰ অৱশিষ্ট ফল ক্ষয় কৰি শেষত পুনৰ মানৱ-যোনিত জন্ম লাভ কৰে।
Verse 68
असूयको नरश्नापि मृतो जायति शार्ज्गक: । विश्वासहर्ता तु नरो मीनो जायति दुर्मति:,दूसरोंके दोष ढूँढ़नेवाला मनुष्य हरिणकी योनिमें जन्म लेता है तथा जो अपनी खोटी बुद्धिके कारण किसीके साथ विश्वासघात करता है, वह मनुष्य मछली होता है
দোষ খুঁজি ফুৰা আৰু অসূয়াত ৰত মানুহ মৰি হৰিণ-যোনিত জন্ম পায়; আৰু কুবুদ্ধি হৈ যি আনৰ বিশ্বাস ভাঙে, সি মাছ হৈ জন্ম লয়।
Verse 69
भूत्वा मीनोडष्ट वर्षाणि मृतो जायति भारत । मृगस्तु चतुरो मासांस्ततश्छाग: प्रजायते,भारत! आठ वर्षोतक मछली रहकर मरनेके बाद वह चार मासतक मृग होता है। उसके बाद बकरेकी योनिमें जन्म लेता है
হে ভাৰত! আঠ বছৰ মাছ হৈ থাকি সি মৰে, তাৰ পাছত পুনৰ জন্ম লয়; চাৰি মাহ হৰিণ হৈ থাকে, তাৰ পাছত ছাগলীৰ যোনিত জন্ম পায়।
Verse 70
छागस्तु निधन प्राप्य पूर्णे संवत्सरे ततः । कीट: संजायते जन्तुस्ततो जायति मानुष:,बकरा पूरे एक वर्षपर मृत्युको प्राप्त होनेके पश्चात् कीड़ा होता है। उसके बाद उस जीवको मनुष्यका जन्म मिलता है
ছাগলী হৈ মৃত্যু পোৱাৰ পাছত, তাৰ পাছত এটা পূৰ্ণ বছৰ পাৰ হ’লে সেই জীৱ কীট হৈ জন্ম লয়; তাৰ পিছত মানৱ-যোনিত জন্ম লাভ কৰে।
Verse 71
धान्यान् यवांस्तिलान् माषान् कुलत्थान् सर्षपांश्वणान् । कलापानथ मुद्गांश्व गोधूमानतसींस्तथा,महाराज! जो पुरुष लज्जाका परित्याग करके अज्ञान और मोहके वशीभूत होकर धान, जौ, तिल, उड़द, कुलथी, सरसों, चना, मटर, मूँग, गेहूँ और तीसी तथा दूसरे-दूसरे अनाजोंकी चोरी करता है, वह मरनेके बाद पहले चूहा होता है
মহাৰাজ! যি পুৰুষ লাজ ত্যাগ কৰি, অজ্ঞান আৰু মোহৰ বশত ধান, যৱ, তিল, মাষ, কুলত্থ, সৰ্ষপ, চণা, কলায়, মুদ্গ, গোধূম আৰু অতসী আদি শস্য চুৰি কৰে, সি মৃত্যুৰ পাছত প্ৰথমে ইঁদুৰ হয়।
Verse 72
सस्यस्यान्यस्य हर्ता च मोहाज्जन्तुरचेतन: । स जायते महाराज मूषिको निरपत्रप:,महाराज! जो पुरुष लज्जाका परित्याग करके अज्ञान और मोहके वशीभूत होकर धान, जौ, तिल, उड़द, कुलथी, सरसों, चना, मटर, मूँग, गेहूँ और तीसी तथा दूसरे-दूसरे अनाजोंकी चोरी करता है, वह मरनेके बाद पहले चूहा होता है
মহাৰাজ! যি পুৰুষে লাজ ত্যাগ কৰি অজ্ঞান আৰু মোহৰ বশত ধান, যৱ, তিল, উৰদ, কুলথ, সৰিষা, বুট, মটৰ, মুগ, গম, তিসি আদি নানা শস্য চুৰি কৰে, সি মৃত্যুৰ পাছত প্ৰথমে ইঁদুৰ ৰূপে জন্ম লয়—স্বভাৱতে নিৰ্লজ্জ।
Verse 73
ततः प्रेत्य महाराज मृतो जायति सूकर: । सूकरो जातमात्रस्तु रोगेण प्रियते नूप,राजन! फिर वह चूहा मृत्युके पश्चात् सूअर होता है। नरेश्वर! वह सूअर जन्म लेते ही रोगसे मर जाता है
ৰাজন! তাৰ পাছত সেই ইঁদুৰ মৃত্যুৰ পাছত গাহৰি ৰূপে জন্ম লয়। নৰেশ্বৰ! সেই গাহৰি জন্মমাত্ৰেই ৰোগত মৰি যায়।
Verse 74
श्वा ततो जायते मूढ: कर्मणा तेन पार्थिव । भूत्वा श्वा पज्च वर्षाणि ततो जायति मानव:,पृथ्वीनाथ! फिर उसी कर्मसे वह मूढ़ जीव कुत्ता होता है और पाँच वर्षतक कुत्ता रहकर अन्तमें मनुष्यका जन्म पाता है
পৃথ্বীনাথ! তাৰ পাছত সেই একে কৰ্মৰ ফলতে সেই মোহগ্ৰস্ত জীৱ কুকুৰ ৰূপে জন্ম লয়। পাঁচ বছৰ কুকুৰ হৈ থাকি শেষত পুনৰ মানুহৰ জন্ম পায়।
Verse 75
परदाराभिमर्श तु कृत्वा जायति वै वृकः । श्वा शृुगालस्ततो गृध्रो व्याल: कड़को बकस्तथा,परस्त्रीगमनका पाप करके मनुष्य क्रमशः भेड़िया, कुत्ता, सियार, गीध, साँप, कंक और बगुला होता है
পৰস্ত্ৰীগমনৰ পাপ কৰি মানুহে ক্ৰমে নেকুৰা, কুকুৰ, শিয়াল, শকুন, সাপ, কঙ্ক-পক্ষী আৰু বক ৰূপে জন্ম লয়।
Verse 76
भ्रातुर्भार्या तु पापात्मा यो धर्षयति मोहित: । पुंस्कोकिलत्वमाप्नोति सोडपि संवत्सरं नूप ७६ ।। नरेश्वरर जो पापात्मा मोहवश भाईकी स्त्रीके साथ बलात्कार करता है, वह एक वर्षतक कोयलकी योनिमें पड़ा रहता है
নৰেশ্বৰ! যি পাপাত্মা মোহবশে ভায়েকৰ স্ত্ৰীৰ ওপৰত বলপ্ৰয়োগ কৰে, সি পুৰুষ কোকিল ৰূপে জন্ম লয় আৰু এক বছৰ সেই অৱস্থাত থাকে।
Verse 77
सखिभार्या गुरोर्भार्या राजभार्या तथैव च । प्रधर्षयित्वा कामाय मृतो जायति सूकर:,जो कामनाकी पूर्तिके लिये मित्र, गुरु और राजाकी स्त्रीका सतीत्व भंग करता है, वह मरनेके बाद सूअर होता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—যি কামবশত বন্ধুৰ পত্নী, গুৰুৰ পত্নী বা ৰজাৰ পত্নীৰ সতীত্ব ভংগ কৰে, সি মৃত্যুৰ পিছত শূকৰ ৰূপে জন্ম লয়।
Verse 78
सूकर: पज्च वर्षाणि दश वर्षाणि श्वाविध: । बिडाल: पज्च वर्षाणि दश वर्षाणि कुक्कुट:,पाँच वर्षमक सूअर रहकर दस वर्ष भेड़िया, पाँच वर्ष बिलाव, दस वर्ष मुर्गा, तीन महीने चींटी और एक महीने कीड़ेकी योनिमें रहता है। इन सभी योनियोंमें चक्कर लगानेके बाद वह पुनः कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है
সি পাঁচ বছৰ শূকৰ, দহ বছৰ শ্বাবিধ (সজাৰু), পাঁচ বছৰ বিড়াল আৰু দহ বছৰ কুকুৰা (মোৰগ) হৈ থাকে।
Verse 79
पिपीलिकस्तु मासांस्त्रीन् कीट: स्यान्मासमेव तु । एतानासाद्य संसारान् कृमियोनौ प्रजायते,पाँच वर्षमक सूअर रहकर दस वर्ष भेड़िया, पाँच वर्ष बिलाव, दस वर्ष मुर्गा, तीन महीने चींटी और एक महीने कीड़ेकी योनिमें रहता है। इन सभी योनियोंमें चक्कर लगानेके बाद वह पुनः कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है
তাৰ পাছত সি তিন মাহ পিঁপৰা আৰু এক মাহ কীট হয়। এই সকলো জন্মচক্ৰ পাৰ হৈ সি পুনৰ কীটযোনিতেই জন্ম লয়।
Verse 80
तत्र जीवति मासांस्तु कृमियोनौ चतुर्दश । ततो<वधर्मक्षयं कृत्वा पुनर्जायति मानव:,उस कीट-योनिमें वह चौदह महीनोंतक जीवन धारण करता है। तदनन्तर पापक्षय करके वह पुनः मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है
সেই কীটযোনিত সি চৌদ মাহ জীয়াই থাকে। তাৰ পাছত অধৰ্মৰ ক্ষয় সাধন কৰি সি পুনৰ মানৱযোনিত জন্ম লয়।
Verse 81
उपस्थिते विवाहे तु यज्ञे दानेडपि वा विभो | मोहात् करोति यो विघ्नं॑ स मृतो जायते कृमि:,प्रभो! जो विवाह, यज्ञ अथवा दानका अवसर आनेपर मोहवश उसमें विघ्न डालता है, वह भी मरनेके बाद कीड़ा ही होता है
হে বিভো! বিবাহ, যজ্ঞ বা দানৰ সময় উপস্থিত হ’লে যি মোহবশত তাত বিঘ্ন ঘটায়, সি মৃত্যুৰ পিছত কীট হৈ জন্ম লয়।
Verse 82
कृमिर्जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत | अधर्मस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानव:,भारत! वह कीट पंद्रह वर्षोतक जीवित रहता है। फिर पापोंका क्षय करके वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে ভাৰত! এটা কৃমি দহ আৰু পাঁচ, অৰ্থাৎ পন্ধৰ বছৰ জীয়াই থাকে। তাৰ পাছত অধৰ্মকৰ্মৰ অৱশিষ্ট ক্ষয় কৰি সি পুনৰ মানৱযোনিত জন্ম লাভ কৰে।
Verse 83
पूर्व दत्त्वा तु यः कन्यां द्वितीये दातुमिच्छति । सो<पि राजन् मृतो जन्तुः कृमियोनौ प्रजायते,राजन्! जो पहले एक व्यक्तिको कन्यादान करके फिर दूसरेको उसी कन्याका दान करना चाहता है, वह भी मरनेके बाद कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে ৰাজন! যি জনে আগতে কন্যাদান কৰি পাছত সেই একে কন্যাক দ্বিতীয় জনক দিবলৈ ইচ্ছা কৰে, সিও মৃত্যুৰ পাছত কৃমিযোনিত জন্ম লাভ কৰে।
Verse 84
तत्र जीवति वर्षाणि त्रयोदश युधिष्ठिर । अधर्मसंक्षये युक्तस्ततो जायति मानव:,युधिष्ठिर! उस योनिमें वह तेरह वर्षोतक जीवन धारण करता है। तदनन्तर पापक्षयके पश्चात् वह पुनः मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—সেই যোনিত সি তেৰ বছৰ জীয়াই থাকে। তাৰ পাছত অধৰ্মৰ ক্ষয় হ’লে সি পুনৰ মানৱযোনিত জন্ম লাভ কৰে।
Verse 85
देवकार्यमकृत्वा तु पितृकार्यमथापि वा । अनिर्वाप्य समश्नन् वै मृतो जायति वायस:,जो देवकार्य अथवा पितृकार्य न करके बलि-वैश्वदेव किये बिना ही अन्न ग्रहण करता है, वह मरनेके बाद कौएकी योनिमें जन्म लेता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—যি জনে দেবকাৰ্য বা পিতৃকাৰ্য নকৰি, বলি-वैশ্বদেৱ আদি নিবেদন নকৰাকৈ অন্ন ভোজন কৰে, সি মৃত্যুৰ পাছত কাকযোনিত জন্ম লাভ কৰে।
Verse 86
वायस: शतवर्षाणि ततो जायति कुक्कुट: । जायते व्यालकश्चापि मासं तस्मात् तु मानुष:,सौ वर्षोतक कौएके शरीरमें रहकर वह मुर्गा होता है। उसके बाद एक मासतक सर्प रहता है। तत्पश्चात् मनुष्यका जन्म पाता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—সি এশ বছৰ কাকযোনিত থাকে; তাৰ পাছত মুৰ্গী/কুকুৰা হয়। তাৰ পিছত এক মাহ সৰ্পযোনিতো থাকে; তাৰ পাছত পুনৰ মানৱজন্ম লাভ কৰে।
Verse 87
ज्येष्ठं पितृसमं चापि भ्रातरं यो5वमन्यते । सो5पि मृत्युमुपागम्य क्रौज्चयोनौ प्रजायते,बड़ा भाई पिताके समान आदरणीय है, जो उसका अपमान करता है, उसे मृत्युके बाद क्रौंच पक्षीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है
জ্যেষ্ঠ ভ্ৰাতা পিতাৰ সমান পূজনীয়। যিয়ে তেওঁক অপমান কৰে, সি মৃত্যুৰ পিছত ক্ৰৌঞ্চ পক্ষীৰ যোনিত জন্ম লয়।
Verse 88
क्रौज्चो जीवति वर्ष तु ततो जायति चीरक: । ततो निधनमापन्नो मानुषत्वमुपाश्षुते,क्रौंच होकर वह एक वर्षतक जीवित रहता है। उसके बाद चीरक जातिका पक्षी होता है और फिर मरनेके बाद मनुष्य-योनिमें जन्म पाता है
ক্ৰৌঞ্চ হৈ সি এক বছৰ জীয়াই থাকে; তাৰ পিছত চীৰক জাতিৰ পক্ষী হয়। তাৰ পাছত পুনৰ মৃত্যু পালে সি মানৱ অৱস্থাত জন্ম লয়।
Verse 89
वृषलो ब्राह्मणीं गत्वा कृमियोनौ प्रजायते । ततः सम्प्राप्प निधनं जायते सूकर: पुनः:,शूद्र-जातिका पुरुष ब्राह्मणजातिकी स्त्रीके साथ समागम करके देहत्यागके पश्चात् पहले कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है। फिर मरनेके बाद सूअर होता है
শূদ্ৰজাত পুৰুষে ব্ৰাহ্মণী নাৰীৰ সৈতে গমন কৰিলে, দেহত্যাগৰ পিছত প্ৰথমে কৃমিযোনিত জন্ম লয়; তাৰ পাছত মৰি শূকৰ হয়।
Verse 90
सूकरो जातमात्रस्तु रोगेण प्रियते नूप । श्वा ततो जायते मूढ: कर्मणा तेन पार्थिव,नरेश्वर! सूअरकी योनिमें जन्म लेते ही वह रोगसे मर जाता है। पृथ्वीनाथ! तत्पश्चात् वह मूढ़ जीव उसी पाप-कर्मके कारण कुत्ता होता है
হে নৰেশ্বৰ! শূকৰযোনিত জন্ম লওঁতেই সি ৰোগত মৰি যায়। হে পৃথিৱীনাথ! সেই পাপকর্মৰ ফলত পাছত সেই মোহগ্ৰস্ত জীৱ কুকুৰ হয়।
Verse 91
श्वा भूत्वा कृतकर्मासौ जायते मानुषस्तत: । तत्रापत्यं समुत्पाद्य मृतो जायति मूषिक:,कुत्ता होनेपर पापकर्मका भोग समाप्त करके वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है। मनुष्ययोनिमें भी वह एक ही संतान पैदा करके मर जाता है और शेष पापका फल भोगनेके लिये चूहा होता है
কুকুৰ হৈ সি কৃতকৰ্মৰ ফল ভোগ কৰি পাছত মানৱযোনিত জন্ম লয়। তাতো একেটা সন্তান উৎপন্ন কৰি মৰি যায় আৰু অৱশিষ্ট পাপফল ভোগ কৰিবলৈ ইঁদুৰ হয়।
Verse 92
कृतघ्नस्तु मृतो राजन् यमस्य विषयं गत: । यमस्य पुरुषै: क्रुद्धैर्वधं प्राप्नोति दारुणम्,राजन! कृतघ्न मनुष्य मरनेके बाद यमराजके लोकमें जाता है। वहाँ क्रोधमें भरे हुए यमदूत उसके ऊपर बड़ी निर्दयताके साथ प्रहार करते हैं
হে ৰাজন, কৃতঘ্ন মানুহ মৃত্যুৰ পিছত যমৰ অধিকাৰভূমিলৈ যায়। তাত ক্ৰোধেৰে উন্মত্ত যমদূতসকলে তাক দাৰুণ আৰু ভয়ংকৰ দণ্ড দিয়ে।
Verse 93
दण्डं समुद्गरं शूलमग्निकुम्भं च दारुणम् । असिपत्रवनं घोरवालुकं कूटशाल्मलीम्
দণ্ড, মুদ্গৰ, শূল আৰু দাৰুণ অগ্নিকুম্ভ; লগতে অসিপত্ৰবন, ভয়ংকৰ তপ্ত বালুকা আৰু কণ্টকময় কূট-শাল্মলী।
Verse 94
एताश्षान्याश्च बद्धी क्ष यमस्य विषयं गत: । यातनाः: प्राप्य तत्रोग्रास्ततो वध्यति भारत
এইদৰে আৰু আন বহু উপায়ে বান্ধি তাক যমৰ অধিকাৰভূমিলৈ লৈ যোৱা হয়। তাত উগ্ৰ যাতনা ভোগ কৰি, হে ভাৰত, শেষত তাক বধ কৰা হয়।
Verse 95
भारत! वह दण्ड, मुद्गर और शूलकी चोट खाकर दारुण अग्निकुम्भ (कुम्भीपाक), असिपत्रवन, तपी हुई भयंकर बालू, काँटोंसे भरी हुई शाल्मली आदि नरकोंमें कष्ट भोगता है। यमलोकमें पहुँचकर इन ऊपर बताये हुए तथा और भी बहुत-से नरकोंकी भयंकर यातनाएँ भोगकर वह वहाँ यमदूतोंद्वारा पीटा जाता है ।। ततो हतः कृतध्नः स तत्रोग्रैर्भरतर्षभ । संसारचक्रमासाद्य कृमियोनौ प्रजायते,भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार निर्दयी यमदूतोंसे पीड़ित हुआ कृतघ्न पुरुष पुनः संसारचक्रमें आता और कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है
তাৰ পিছত, হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ, তাত উগ্ৰ যমদূতসকলৰ প্ৰহাৰে নিহত সেই কৃতঘ্ন পুনৰ সংসাৰচক্ৰলৈ ঘূৰি আহে আৰু কৃমিযোনিত জন্ম লয়।
Verse 96
कृमिर्भवति वर्षाणि दश पठ्च च भारत । ततो गर्भ समासाद्य तत्रैव प्रियते शिशु:,भारत! पंद्रह वर्षोतक वह कीड़ेकी योनिमें रहता है। फिर गर्भमें आकर वहीं गर्भस्थ शिशुकी दशामें ही मर जाता है
হে ভাৰত, সি দহ আৰু পাঁচ—মুঠ পন্ধৰ বছৰ কৃমি হৈ থাকে। তাৰ পিছত গৰ্ভত প্ৰৱেশ কৰি তাতেই গৰ্ভস্থ শিশুৰ অৱস্থাত মৃত্যু বরণ কৰে।
Verse 97
ततो गर्भशतैर्जन्तुर्बहुभि: सम्प्रपद्यते । संसारांश्व बहून् गत्वा ततस्तिर्यक्षु जायते,इस तरह कई सौ बार वह जीव गर्भकी यन्त्रणा भोगता है। तदनन्तर बहुत बार जन्म लेनेके पश्चात् वह तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होता है
তাৰ পাছত সেই জীৱ শত শত গৰ্ভত প্ৰৱেশ কৰি বাৰে বাৰে গৰ্ভযন্ত্ৰণা ভোগ কৰে। বহু সংসাৰচক্ৰত ঘূৰি আৰু পুনঃপুনঃ জন্ম লৈ অৱশেষত সি তিৰ্যক্-যোনিত (অমানৱ জাতিত) জন্ম লাভ কৰে।
Verse 98
ततो दुःखमनुप्राप्य बहु वर्षमणानिह । अपुनर्भवसंयुक्तस्तत: कूर्म: प्रजायते,इन योनियोंमें बहुत वर्षोतक दुःख भोगनेके पश्चात् वह फिर मनुष्ययोनिमें न आकर दीर्घकालके लिये कछुआ हो जाता है
তাৰ পাছত সেই যোনিসমূহত বহু বছৰ দুখ ভোগ কৰি সি পুনৰ মানুহ-অৱস্থা নাপায়; অপুনৰ্ভৱ (পুনৰ জন্ম নোহোৱা) লাভ নকৰি দীঘলীয়া সময়ৰ বাবে কূৰ্ম (কচ্ছপ) ৰূপে জন্ম লয়।
Verse 99
दधि हृत्वा बकश्नापि प्लवो मत्स्यानसंस्कृतान् | चोरयित्वा तु दुर्बुद्धिर्मधु दंश: प्रजायते,दुर्बुद्धि मनुष्य दहीकी चोरी करके बगला होता है, कच्ची मछलियोंकी चोरी करके वह कारण्डव नामक जलपक्षी होता है और मधुका अपहरण करके वह डाँस (मच्छर) की योनिमें जन्म लेता है
দধি (দই) চুৰি কৰিলে দুর্বুদ্ধি মানুহ বক (বগলী) হৈ জন্ম লয়; কাঁচা মাছ চুৰি কৰিলে সি প্লৱ (কাৰণ্ডৱ) নামৰ জলপক্ষী হয়; আৰু মধু চুৰি কৰিলে সি দংশ (মহ) ৰূপে জন্ম লাভ কৰে।
Verse 100
फल वा मूलकं हृत्वा अपूपं वा पिपीलिका: । चोरयित्वा च निष्पावं जायते हलगोलक:,फल, मूल अथवा पूएकी चोरी करनेपर मनुष्यको चींटीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। निष्पाव (मटर या उड़द) की चोरी करनेवाला हलगोलक नामवाला कीड़ा होता है
ফল, মূলক (মূলা) বা অপূপ (পিঠা/পুয়া) চুৰি কৰিলে মানুহ পিপীলিকা—পিঁপড়া—ৰূপে জন্ম লয়। আৰু নিষ্পাৱ (এবিধ ডাল/বীন) চুৰি কৰিলে সি হলগোলক নামৰ কীট হৈ জন্ম লাভ কৰে।
Verse 101
पायसं चोरयित्वा तु तित्तिरित्वमवाप्तुते हृत्वा पिष्टमयं पूपं कुम्भोलूक: प्रजायते,खीरकी चोरी करनेवाला तीतरकी योनिमें जन्म लेता है। आटेका पूआ चुराकर मनुष्य मरनेके बाद उल्लू होता है
পায়স (খীৰ) চুৰি কৰিলে সি তিত্তিৰি (তিতৰ) ৰূপে জন্ম লয়। আৰু পিষ্টময় পূপ (আটাৰ পিঠা/পুয়া) চুৰি কৰিলে মৃত্যুৰ পাছত সি কুম্ভোলূক (উলু) হৈ জন্ম লাভ কৰে।
Verse 102
अयो हत्वा तु दुर्बद्धिवायसो जायते नर: । कांस्य हृत्वा तु दुर्बुद्धिहारितो जायते नर:,लोहेकी चोरी करनेवाला मूर्ख मानव कौवा होता है। काँसकी चोरी करके खोटी बुद्धिवाला मनुष्य हारीत नामक पक्षी होता है
লোহা চুৰি কৰা বিকৃত বুদ্ধিৰ মানুহ কাক হৈ জন্ম লয়। আৰু কাঁস্য (বেল-মেটেল) চুৰি কৰা বিকৃত বুদ্ধিৰ মানুহ ‘হাৰিত’ নামৰ পাখি হৈ জন্ম লয়।
Verse 103
राजतं भाजनं हृत्वा कपोत: सम्प्रजायते । हृत्वा तु काज्चनं भाण्डं कृमियोनौ प्रजायते,चाँदीका बर्तन चुरानेवाला कबूतर होता है और सुवर्णमय भाण्डकी चोरी करके मनुष्यको कीड़ेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है
ৰূপাৰ পাত্ৰ চুৰি কৰা মানুহ কবুতৰ হৈ জন্ম লয়; আৰু সোণৰ পাত্ৰ চুৰি কৰা মানুহ কৃমিৰ যোনিত জন্ম লয়।
Verse 104
पत्रोर्ण चोरयित्वा तु कृकलत्वं निगच्छति । कौशिक तु ततो हृत्वा नरो जायति वर्तकः,ऊनी वस्त्र चुरानेवाला कृकल (गिरगिट) की योनिमें जन्म लेता है। कौशेय (रेशमी) वस्त्रकी चोरी करनेपर मनुष्य बत्तक होता है
উদ্ভিদ-তন্তু আৰু উণৰ বস্ত্ৰ চুৰি কৰা মানুহ কৃকল (গিৰগিটি) অৱস্থালৈ যায়। কিন্তু কৌশেয় (ৰেচম) বস্ত্ৰ চুৰি কৰা মানুহ হাঁহ (বাতক) হৈ জন্ম লয়।
Verse 105
अंशुकं चोरयित्वा तु शुकी जायति मानव: । चोरयित्वा दुकूलं तु मृतो हंस: प्रजायते,अंशुक (महीन कपड़े) की चोरी करके मनुष्य तोतेका जन्म पाता है तथा दुकूल (उत्तरीय वस्त्र) की चोरी करके मृत्युको प्राप्त हुआ मानव हंसकी योनिमें जन्म लेता है
অংশুক (সূক্ষ্ম বস্ত্ৰ) চুৰি কৰা মানুহ টিয়া হৈ জন্ম লয়। আৰু দুকূল (উত্তৰীয়) চুৰি কৰি যি মৰে, সি হাঁহ (হংস) হৈ জন্ম লয়।
Verse 106
क्रौज्च: कार्पासिकं हृत्वा मृतो जायति मानव: । चोरयित्वा नर: पट्ट त्वाविकं चैव भारत
কাৰ্পাসিক (সুতিৰ) বস্ত্ৰ চুৰি কৰি যি মানুহ মৰে, সি ক্রৌঞ্চ পাখি হৈ জন্ম লয়। আৰু হে ভাৰত, যি মানুহ পট্ট (ৰেচম) আৰু আৱিক (উণ) বস্ত্ৰ চুৰি কৰে, সিও তেনেদৰেই অধম জন্ম লাভ কৰে।
Verse 107
वर्णान् हत्वा तु पुरुषो मृतो जायति बर्लिण:
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— যি পুৰুষে বৰ্ণসমূহক হত্যা কৰে, সি মৃত্যুৰ পাছত ‘বর্লিণ’ ৰূপে পুনর্জন্ম লাভ কৰে।
Verse 108
वर्णकादींस्तथा गन्धांश्नोरयित्वेह मानव:,राजन! जो मनुष्य लोभके वशीभूत होकर वर्णक (अनुलेपन) आदि तथा चन्दनकी चोरी करता है, वह छछूँदर होता है। उस योनिमें वह पंद्रह वर्षतक जीवित रहता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— হে ৰাজন! যি মানুহ লোভৰ বশ হৈ বৰ্ণক (অনুলেপন) আদি সুগন্ধি লেপ আৰু চন্দন চুৰি কৰে, সি ছছুঁদৰ (মস্ক-ইঁদুৰ)ৰ গৰ্ভত পতিত হয়; সেই জন্মত সি পন্ধৰ বছৰ জীয়াই থাকে।
Verse 109
छुच्छुन्दरित्वमाप्रोति राजल्लाॉभपरायण: । तत्र जीवति वर्षाणि ततो दश च पठच च,राजन! जो मनुष्य लोभके वशीभूत होकर वर्णक (अनुलेपन) आदि तथा चन्दनकी चोरी करता है, वह छछूँदर होता है। उस योनिमें वह पंद्रह वर्षतक जीवित रहता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— হে ৰাজন! লোভপৰায়ণ মানুহে ছছুঁদৰত্বৰ অৱস্থা লাভ কৰে; সেই যোনিত সি পন্ধৰ বছৰ জীয়াই থাকে।
Verse 110
अधर्मस्य क्षयं गत्वा ततो जायति मानुष: । चोरयित्वा पयश्चापि बलाका सम्प्रजायते,फिर अधर्मका क्षय हो जानेपर वह मनुष्यका जन्म पाता है। दूध चुरानेवाली स्त्री बगुली होती है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— অধৰ্মৰ ফল ক্ষয় হ’লে সি পাছত পুনৰ মানৱজন্ম লাভ কৰে। আৰু গাখীৰ চুৰি কৰিলেও অপৰাধী ‘বলাকা’ (বগলী/সাৰস) ৰূপে জন্মায়।
Verse 111
यस्तु चोरयते तैलं नरो मोहसमन्वित: । सो<पि राजन् मृतो जन्तुस्तैलपायी प्रजायते,राजन! जो मनुष्य मोहयुक्त होकर तेल चुराता है, वह मरनेपर तेलपायी नामक कीड़ा होता है इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि संसारचक्रं नाम एकादशाधिकशततमो<ध्याय:
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— হে ৰাজন! যি মানুহ মোহত আচ্ছন্ন হৈ তেল চুৰি কৰে, সি মৃত্যুৰ পাছত ‘তৈলপায়ী’ নামৰ তেল-পানকাৰী কৃমি ৰূপে জন্মায়।
Verse 112
अश्त्र॑ पुरुषं हत्वा सशस्त्र: पुरुषाधम: । अर्थार्थी यदि वा वैरी स मृतो जायते खर:
যি অস্ত্ৰধাৰী হৈ নিৰস্ত্ৰ মানুহক হত্যা কৰে, সি মানুহৰ মাজত অধম। ধনৰ লোভত হওক বা বৈৰভাবত—মৃত্যুৰ পাছত সি গাধাৰ যোনিত জন্ম লয়।
Verse 113
एकस्तरति दुर्गाणि गच्छत्येकस्तु दुर्गतिम् । बृहस्पतिजीने कहा--राजन्! प्राणी अकेला ही जन्म लेता, अकेला ही मरता, अकेला ही दुःखसे पार होता तथा अकेला ही दुर्गति भोगता है,जो नीच मनुष्य धनके लोभसे अथवा शत्रुताके कारण हथियार लेकर निहत्थे पुरुषको मार डालता है, वह अपनी मृत्युके बाद गदहेकी योनिमें जन्म पाता है ।। खरो जीवति वर्षे द्वे ततः शस्त्रेण वध्यते । स मृतो मृगयोनौ तु नित्योद्धिग्नोडभिजायते गदहा होकर वह दो वर्षोतक जीवित रहता है। फिर शस्त्रसे उसका वध होता है। इस प्रकार मरकर वह मृगकी योनिमें जन्म लेता और हिंसकोंके भयसे सदा उद्विग्न रहता है
মানুহে একাই দুৰ্গম পথ পাৰ হয়, আৰু একাই দুৰ্গতিত পৰে। প্ৰাণী একাই জন্ম লয়, একাই মৰে; একাই দুখ তৰে, একাই বিপদ ভোগে। সেয়ে যি নীচ মানুহ ধনৰ লোভত বা বৈৰভাবত অস্ত্ৰ তুলি নিৰস্ত্ৰ মানুহক হত্যা কৰে, সি মৃত্যুৰ পাছত গাধাৰ যোনিত জন্ম লয়। গাধা হৈ দুবছৰ জীয়াই থাকে, তাৰ পাছত অস্ত্ৰেৰে নিহত হয়; এইদৰে মৰি সি মৃগ-যোনিত জন্ম লয় আৰু ব্যাধ-শিকাৰীৰ ভয়ত সদায় উদ্বিগ্ন থাকে।
Verse 114
मृगो वध्यति शस्त्रेण गते संवत्सरे तु सः । हतो मृगस्ततो मीन: सो5पि जालेन बध्यते,मृग होकर वह सालभरमें ही शस्त्रद्वारा मारा जाता है। मरनेपर मत्स्य होता है, फिर वह भी जालसे बँधता है
এবছৰ পাৰ হ’লে মৃগ অস্ত্ৰেৰে নিহত হয়। সেই মৃগ মৰি মাছ হয়; সিও জালত ধৰা পৰে।
Verse 115
मासे चतुर्थे सम्प्राप्ते श्वापद: सम्प्रजायते । श्वापदो दश वर्षाणि द्वीपी वर्षाणि पजच च,वह किसी प्रकार जालसे छूटा हुआ भी चौथे महीनेमें मृत्युको प्राप्त हो हिंसक जन्तु भेड़िया आदि होता है। उस योनिमें दस वर्षोतक रहकर वह पाँच वर्षोतक व्याप्र या चीतेकी योनिमें पड़ा रहता है
চতুৰ্থ মাহ আহিলে সি শ্বাপদ (নেকড়ে আদি হিংস্ৰ জন্তু) হৈ জন্ম লয়। শ্বাপদ-যোনিত দহ বছৰ থাকে; তাৰ পাছত পাঁচ বছৰ দ্বীপী (বাঘ/চিতাবাঘ আদি) হয়।
Verse 116
ततस्तु निधन प्राप्त: कालपर्यायचोदित: । अधर्मस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानुष:,तदनन्तर पापका क्षय होनेपर कालकी प्रेरणासे मृत्युको प्राप्त हो वह पुनः मनुष्य होता है
তাৰ পাছত কালচক্ৰৰ প্ৰেৰণাত সি মৃত্যুক প্ৰাপ্ত হয়। অধৰ্মৰ অৱশিষ্ট ক্ষয় হ’লে সি পুনৰ মানৱ-যোনিত জন্ম লয়।
Verse 117
स्त्रियं हत्वा तु दुर्बद्धिर्यमस्य विषयं गत: । बहून् क्लेशान् समासाद्य संसारांश्चैव विंशतिम्,जो खोटी बुद्धिवाला पुरुष स्त्रीकी हत्या कर डालता है, वह यमराजके लोकमें जाकर नाना प्रकारके क्लेश भोगनेके पश्चात् बीस बार दुःखद योनियोंमें जन्म लेता है
যি বিকৃতবুদ্ধিৰ পুৰুষে নাৰীক হত্যা কৰে, সি যমৰ লোকলৈ যায়। তাত নানাবিধ ক্লেশ ভোগ কৰি, পাছত দুখময় যোনিত বিশবাৰ জন্ম লয়।
Verse 118
ततः पश्चान्महाराज कृमियोनौ प्रजायते । कृमिर्विशतिवर्षाणि भूत्वा जायति मानुष:,महाराज! तदनन्तर वह कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है और बीस वर्षोंतक कीट-योनिमें रहकर अन्तमें मनुष्य होता है
মহারাজ! তাৰ পাছত সি কৃমিযোনিত জন্ম লয়। বিশ বছৰ কৃমি হৈ থাকি, শেষত পুনৰ মানুহ হিচাপে জন্ম গ্ৰহণ কৰে।
Verse 119
भोजन चोरयित्वा तु मक्षिका जायते नर: । मक्षिकासंघवशगो बहून् मासान् भवत्युत
যি মানুহে আহাৰ চুৰ কৰে, সি মাছি হৈ জন্ম লয়। মাছিৰ জাকৰ বশৱৰ্তী হৈ বহু মাহ সেই অৱস্থাত থাকে।
Verse 120
धान्यं॑ हृत्वा तु पुरुषो लोमश: सम्प्रजायते
যি পুৰুষে ধান্য চুৰ কৰে, সি লোমশ দেহধাৰী হৈ জন্ম লয়।
Verse 121
तथा पिण्याकसम्मसिश्रमशन चोरयेन्नर: । स जायते बश्रुसमो दारुणो मूषिको नर:
একেদৰে, যি মানুহে পিণ্যাক (তেল নিঃসৰণৰ পাছত ৰোৱা খলী) মিশ্ৰিত আহাৰ চুৰ কৰে, সি খয়ৰীয়া বৰ্ণৰ, নিষ্ঠুৰ স্বভাৱৰ ইঁদুৰ হৈ জন্ম লয়।
Verse 122
दशन् वै मानुषान्नित्यं पापात्मा स विशाम्पते । धान्यकी चोरी करनेवाले मनुष्यके शरीरमें दूसरे जन्ममें बहुत-से रोएँ पैदा होते हैं। प्रजानाथ! जो मानव तिलके चूर्णसे मिश्रित भोजनकी चोरी करता है, वह नेवलेके समान आकारवाला भयानक चूहा होता है तथा वह पापी सदा मनुष्योंको काटा करता है ।। घृतं हृत्वा तु दुर्बद्धि काकमदगु: प्रजायते,जो दुर्बुद्धि मनुष्य घी चुराता है, वह काकमदगु (सींगवाला जल-पक्षी) होता है। जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य मत्स्य और मांसकी चोरी करता है, वह कौवा होता है। नमककी चोरी करनेसे मनुष्यको चिरिकाक-योनिमें जन्म लेना पड़ता है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— হে প্ৰজানাথ! সেই পাপাত্মা যি যি যোনিত জন্ম লয়, তাত নিত্য মানুহক কামুৰি থাকে। যি ধান্য চুৰি কৰে, তাৰ দেহত পৰজন্মত বহু ৰোম জন্মে। আৰু যি তিল-চূৰ্ণ মিহলি আহাৰ চুৰি কৰে, সি নেউলৰ দৰে আকাৰবিশিষ্ট ভয়ংকৰ ইঁদুৰ হয়; সেই পাপী সদায় মানুহক কামুৰি থাকে।
Verse 123
मत्स्यमांसमथो हृत्वा काको जायति दुर्मति: । लवणं चोरयित्वा तु चिरिकाक: प्रजायते,जो दुर्बुद्धि मनुष्य घी चुराता है, वह काकमदगु (सींगवाला जल-पक्षी) होता है। जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य मत्स्य और मांसकी चोरी करता है, वह कौवा होता है। नमककी चोरी करनेसे मनुष्यको चिरिकाक-योनिमें जन्म लेना पड़ता है
দুৰ্বুদ্ধি মানুহে মাছ আৰু মাংস চুৰি কৰিলে সি কাক হৈ জন্ম লয়। আৰু লৱণ চুৰি কৰিলে সি ‘চিৰিকাক’ নামৰ এক বিশেষ পক্ষী-যোনিত জন্ম লয়।
Verse 124
विश्वासेन तु निक्षिप्तं यो विनिहल्लोति मानव: । स गतायुर्नरस्तात मत्स्ययोनौ प्रजायते,तात! जो मानव विश्वासपूर्वक रखी हुई दूसरेकी धरोहरको हड़प लेता है, वह गतायु होनेपर मत्स्यकी योनिमें जन्म लेता है
হে প্ৰিয়! যি মানুহে বিশ্বাসেৰে নিজৰ ওচৰত থোৱা আনৰ আমানত আত্মসাৎ কৰে, সি আয়ু শেষ হ’লে মাছৰ যোনিত জন্ম লয়।
Verse 125
मत्स्ययोनिमनुप्राप्य मृतो जायति मानुष: । मानुषत्वमनुप्राप्य क्षीणायुरुपपद्यते,मत्स्ययोनिमें जन्म लेनेके बाद जब मरता है, तब पुनः मनुष्यका जन्म पाता है। मानव- योनिमें आकर उसकी आयु बहुत कम होती है
মাছৰ যোনিত প্ৰৱেশ কৰি তাত মৰাৰ পাছত, সি পুনৰ মানুহ হৈ জন্ম লয়। কিন্তু মানৱজন্ম লাভ কৰিলেও তাৰ আয়ু ক্ষীণ হয়।
Verse 126
पापानि तु नरा: कृत्वा तिर्यग् जायन्ति भारत । न चात्मन: प्रमाणं ते धर्म जानन्ति किंचन,भारत! पाप करके मनुष्य पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेते हैं। वहाँ उन्हें अपने उद्धार करनेवाले धर्मका कुछ भी ज्ञान नहीं रहता
হে ভাৰত! পাপকৰ্ম কৰি মানুহ তিৰ্যক্-যোনিত—পশু-পক্ষীৰ মাজত—জন্ম লয়। তাত তেওঁলোকৰ নিজৰ কল্যাণৰ বাবে কোনো নিশ্চিত বোধ নাথাকে; ধৰ্ম সম্পৰ্কে তেওঁলোকে একো নাজানে।
Verse 127
ये पापानि नराः कृत्वा निरस्यन्ति व्रतैः सदा । सुखदुःखसमायुक्ता व्यथितास्ते भवन्त्युत,जो पापाचारी पुरुष लोभ और मोहके वशीभूत हो पाप करके उसे व्रत आदिके द्वारा दूर करनेका प्रयत्न करते हैं, वे सदा सुख-दुःख भोगते हुए व्यथित रहते हैं। उन्हें कहीं रहनेको ठौर नहीं मिलता तथा वे म्लेच्छ होकर सदा मारे-मारे फिरते हैं। इसमें संशय नहीं है
যিসকল মানুহে পাপ কৰি পুনৰ ব্ৰত-উপবাস আদি আচৰণেৰে তাক সদায় আঁতৰাবলৈ চেষ্টা কৰে, তেওঁলোক সুখ-দুখৰ দোলাতেই বাঁধ খাই থাকে আৰু অন্তৰে ক্লিষ্ট হয়। সত্য সংশোধন নোহোৱাকৈ কেৱল প্ৰায়শ্চিত্তে পাপৰ মূল উচ্ছেদ নহয়।
Verse 128
असंवासा: प्रजायन्ते म्लेच्छाश्वापि न संशय: । नरा: पापसमाचारा लोभमोहसमन्विता:,जो पापाचारी पुरुष लोभ और मोहके वशीभूत हो पाप करके उसे व्रत आदिके द्वारा दूर करनेका प्रयत्न करते हैं, वे सदा सुख-दुःख भोगते हुए व्यथित रहते हैं। उन्हें कहीं रहनेको ठौर नहीं मिलता तथा वे म्लेच्छ होकर सदा मारे-मारे फिरते हैं। इसमें संशय नहीं है
লোভ-মোহে আচ্ছন্ন পাপাচাৰী মানুহৰ পৰা এনে লোক জন্মে যাৰ স্থিৰ বাসস্থান আৰু যোগ্য সামাজিক আশ্ৰয় নাথাকে; তেওঁলোক ম্লেচ্ছভাবলৈও পতিত হয়—ইয়াত সন্দেহ নাই।
Verse 129
वर्जयन्ति च पापानि जन्मप्रभूति ये नरा: । अरोगा रूपवन्तस्ते धनिनश्व भवन्त्युत,जो मनुष्य जन्मसे ही पापका परित्याग कर देते हैं, वे नीरोग, रूपवान् और धनी होते हैं
যিসকল মানুহে জন্মৰ পৰাই পাপ ত্যাগ কৰে, তেওঁলোক ৰোগমুক্ত, ৰূপৱান আৰু ধনীও হয়।
Verse 130
स्त्रियो5प्येतेन कल्पेन कृत्वा पापमवाप्रुयु: । एतेषामेव जनन््तूनां भार्यात्वमुपयान्ति ता:,स्त्रियाँ भी यदि पूर्वोक्त पापकर्म करती हैं तो पापकी भागिनी होती हैं और वे उन पापभोगी प्राणियोंकी ही पत्नी होती हैं
এই একে ধৰণে নাৰীয়েও যদি তেনে পাপকর্ম কৰে, তেন্তে তেওঁলোক সেই পাপৰ অংশীদাৰ হয়; আৰু যিসকল জীৱে সেই কৰ্মফল ভোগ কৰিব লাগে, তেওঁলোকৰেই পত্নী হয়।
Verse 131
परस्वहरणे दोषा: सर्व एव प्रकीर्तिता: । एतद्धि लेशमात्रेण कथितं ते मयानघ,निष्पाप नरेश! पराये धनका अपहरण करनेसे जो दोष होते हैं, वे सब बताये गये। यहाँ मेरे द्वारा संक्षेपसे ही इस विषयका दिग्दर्शन कराया गया है
পৰধন হৰণৰ পৰা যিসকল দোষ জন্মে, সেয়া সকলো কোৱা হৈছে। হে নিষ্পাপ ৰাজন! এই বিষয়টো মই তোমাক কেৱল সংক্ষিপ্তভাৱে—মাত্ৰ ইঙ্গিতৰূপে—জানালোঁ।
Verse 132
अपरस्मिन् कथायोगे भूय: श्रोष्यसि भारत । एतन्मया महाराज ब्रह्मणो वदत: पुरा,भरतनन्दन! अब दूसरी बार बातचीतके प्रसंगमें फिर कभी इस विषयको सुनना। महाराज! पूर्वकालमें ब्रह्माजी देवर्षियोंके बीच यह प्रसंग सुना रहे थे। वहाँ उन्हींके मुँहसे मैंने ये सारी बातें सुनी थीं और तुम्हारे पूछनेपर उन्हीं सब बातोंका मैंने भी यथार्थरूपसे वर्णन किया है। राजन्! यह सुनकर तुम सदा धर्ममें मन लगाओ
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে ভাৰত! আন এক কথোপকথনৰ প্ৰসঙ্গত তুমি এই কথা পুনৰ শুনিবা। মহাৰাজ! প্ৰাচীন কালত ব্ৰহ্মাই নিজে ক’বলৈ ধৰোঁতে, মই এই বিষয়সমূহ তেওঁৰ মুখৰ পৰা শুনিছিলোঁ। তুমি সুধাৰ বাবে, মই যিদৰে শুনিছিলোঁ তিদৰে সত্যৰূপে তোমাক বৰ্ণনা কৰিলোঁ। ৰাজন, এই কথা শুনি তুমি সদায় ধৰ্মত মন স্থিৰ কৰা।
Verse 133
सुरषषीरणां श्रुतं मध्ये पृष्टभश्नापि यथातथम् । मयापि तच्च कार्त्स्न्येन यथावदनुवर्णितम् । एतच्छुत्वा महाराज धर्मे कुरुमनः सदा,भरतनन्दन! अब दूसरी बार बातचीतके प्रसंगमें फिर कभी इस विषयको सुनना। महाराज! पूर्वकालमें ब्रह्माजी देवर्षियोंके बीच यह प्रसंग सुना रहे थे। वहाँ उन्हींके मुँहसे मैंने ये सारी बातें सुनी थीं और तुम्हारे पूछनेपर उन्हीं सब बातोंका मैंने भी यथार्थरूपसे वर्णन किया है। राजन्! यह सुनकर तुम सदा धर्ममें मन लगाओ
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—দেৱর্ষিসকলৰ মাজতে মই এই বৃত্তান্ত যিদৰে আছিল তিদৰে শুনিছিলোঁ; আৰু তুমি যিদৰে সুধিলা তিদৰে মই উত্তৰ দিলোঁ। সেই সমগ্ৰ বিষয়টো মই সম্পূৰ্ণকৈ আৰু যথাযথ ক্ৰমে বৰ্ণনা কৰিলোঁ। মহাৰাজ, ভৰতনন্দন! এই কথা শুনি তুমি সদায় ধৰ্মত মন স্থিৰ কৰা।
Verse 153
तथैवाधर्मसंयुक्तो नरकं॑ चोपपद्यते । धर्मयुक्त प्राणी ही उत्तम स्वर्गमें जाता है और अधर्मपरायण जीव नरकमें पड़ता है
তদ্ৰূপে অধৰ্মে যুক্ত প্ৰাণী নৰকলৈ গমন কৰে।
Verse 163
धर्म एको मनुष्याणां सहाय: पारलौकिक: । इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि न्यायसे प्राप्त हुए धनके द्वारा धर्मका अनुष्ठान करे। एकमात्र धर्म ही परलोकमें मनुष्योंका सहायक है
পৰলোকত মানুহৰ একমাত্ৰ সহায় ধৰ্মই।
Verse 176
नर: करोत्यकार्याणि परार्थे लोभमोहितः । जो बहुश्रुत नहीं है, वही मनुष्य लोभ और मोहके वशीभूत हो दूसरेके लिये लोभ, मोह, दया अथवा भयसे न करने योग्य पापकर्म कर बैठता है
লোভে মোহিত মানুহে পৰৰ হিতৰ নামতো নকৰিবলগীয়া কৰ্ম কৰি পেলায়।
Verse 183
एतत् त्रयमवाप्तव्यमधर्मपरिवर्जितम् | धर्म, अर्थ और काम--ये तीन जीवनके फल हैं, अतः मनुष्यको अधर्मके त्यागपूर्वक इन तीनोंको उपलब्ध करना चाहिये
এই তিনিও লাভ কৰিবলগীয়া, কিন্তু অধৰ্মৰ আশ্ৰয় নলৈ। ধৰ্ম, অৰ্থ আৰু কাম—এই তিনিই মানৱজীৱনৰ ফল; সেয়ে অধৰ্ম ত্যাগ কৰি তেনেহে এই তিনিও লাভ কৰা উচিত।
Verse 216
बुद्धिरात्मा च सहिता धर्म पश्यन्ति नित्यदा | बृहस्पतिजीने कहा--धर्मराज! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, यम, बुद्धि और आत्मा--ये सब सदा एक साथ मनुष्यके धर्मपर दृष्टि रखते हैं
বুদ্ধি আৰু আত্মা একেলগে যুক্ত হৈ সদায় মানুহৰ ধৰ্মক চায়। আৰু উপদেশত বৃহস্পতিয়ে ধৰ্মৰাজক ক’লে—পৃথিৱী, জল, অগ্নি, বায়ু, আকাশ, মন, যম, বুদ্ধি আৰু আত্মা—এই সকলোয়ে সদায় একেলগে মানুহৰ ধৰ্মাচৰণৰ ওপৰত দৃষ্টি ৰাখে।
Verse 226
एतैश्व सह धर्मोडपि तं जीवमनुगच्छति । दिन और रात भी इस जगतके सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मोंके साक्षी हैं। इन सबके साथ धर्म भी जीवका अनुसरण करता है
এই সকলোৰ সৈতে ধৰ্মও সেই জীৱক অনুসৰণ কৰে। দিন আৰু ৰাতি এই জগতৰ সকলো প্ৰাণীৰ কৰ্মৰ সাক্ষী; আৰু এই সাক্ষীসকলৰ সৈতে ধৰ্মও জীৱৰ পিছু পিছু চলে।
Verse 233
शरीर वर्जयन्त्येते जीवितेन विवर्जितम् | महामते! त्वचा, अस्थि, मांस, शुक्र और शोणित--ये सब धातु निष्प्राण शरीरका परित्याग कर देते हैं अर्थात् ये उस शरीरधारी जीवात्माका साथ छोड़ देते हैं, एक धर्म ही उसके साथ जाता है
জীৱন বিদায় ল’লে এই সকলোয়ে দেহ ত্যাগ কৰে। মহামতি! ত্বক, অস্থি, মাংস, শুক্ৰ আৰু শোণিত—এই সকলো ধাতুৱে প্ৰাণহীন দেহক পৰিত্যাগ কৰে; অৰ্থাৎ দেহধাৰী জীৱাত্মাক এৰি যায়। কেৱল ধৰ্মহে তাৰ সৈতে যায়।
Verse 1063
क्षौमं च वस्त्रमादाय शशो जन्तु: प्रजायते । सूती वस्त्रकी चोरी करके मरा हुआ मनुष्य क्रौंच पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है। भारत! पाटम्बर, भेड़के ऊनका बना हुआ तथा क्षौम (रेशमी) वस्त्र चुरानेवाला मनुष्य खरगोश नामक जन्तु होता है
ক্ষৌম বস্ত্ৰ চুৰি কৰা মানুহ মৰি শশ (খৰগোশ) যোনিত জন্ম লয়। আৰু যি পাটাম্বৰ, ভেড়াৰ উণৰ বস্ত্ৰ আৰু ক্ষৌম বস্ত্ৰ অপহৰণ কৰে, সিও শশত্ব লাভ কৰে।
Verse 1073
हत्वा रक्तानि वस्त्राणि जायते जीवजीवक: । अनेक प्रकारके रंगोंकी चोरी करके मृत्युको प्राप्त हुआ पुरुष मोर होता है। लाल कपड़े चुरानेवाला मनुष्य चकोरकी योनिमें जन्म लेता है
যি লাল বস্ত্ৰ নষ্ট কৰে বা চুৰি কৰে, সি জীৱজীৱক পখী হৈ জন্ম লয়। নানা প্ৰকাৰ ৰং চুৰি কৰা পুৰুষ মৃত্যু পাছত ময়ূৰ হয়। লাল কাপোৰ চুৰি কৰা মানুহ চকোৰ পখীৰ যোনিত জন্ম পায়।
Verse 1196
ततः पापक्षयं कृत्वा मानुषत्वमवाप्तुते । भोजनकी चोरी करके मनुष्य मक्खी होता है और कई महीनोंतक मक्खियोंके समुदायके अधीन रहता है। तत्पश्चात् पापोंका भोग समाप्त करके वह पुनः मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है
তাৰপিছত পাপক্ষয় কৰি সি পুনৰ মানৱত্ব লাভ কৰে। আহাৰ চুৰি কৰা মানুহ মাছি হয় আৰু বহু মাহ মাছিৰ জাকৰ অধীনত থাকে; তাৰপিছত পাপভোগ শেষ হ’লে সি পুনৰ মানৱযোনিত জন্ম লয়।
Verse 1936
शरीरनिचयं ज्ञातुं बुद्धिस्तु मम जायते । युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! आपके मुँहसे मैंने धर्मयुक्त परम हितकर बात सुनी। अब शरीरकी स्थिति जाननेके लिये मेरा विचार हो रहा है
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—ভগৱন্! আপোনাৰ মুখৰ পৰা মই ধৰ্মযুক্ত, পৰম হিতকৰ বাক্য শুনিলোঁ। এতিয়া দেহৰ অৱস্থা আৰু স্বভাৱ জানিবলৈ মোৰ মনত জিজ্ঞাসা উদয় হৈছে।
Yudhiṣṭhira asks how a person can be freed from suffering when harm occurs not only through physical acts but also through speech and mental intention—expanding dharma from external behavior to internal causality.
Ahiṃsā is a complete discipline requiring prior mental renunciation, regulated speech, and controlled action; ethical purity is treated as cumulative and fragile, failing if any channel is neglected.
No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; instead, the chapter frames practical consequence through the logic of suffering and release (duḥkha–pramokṣa), implying soteriological benefit through comprehensive restraint.