Mahabharata Adhyaya 72
Drona ParvaAdhyaya 72112 Versesरण-क्षेत्र में अर्जुन की ओर से भारी संहार और सामरिक सफलता; पर पाण्डव-पक्ष के मनोबल पर अभिमन्यु-वध का गहरा आघात, जिससे अगले चरण में प्रतिशोध-आधारित उग्रता बढ़ती है।

Adhyaya 72

धृष्टद्युम्नस्य द्रोणरथारोহণं सात्यकेः प्रतिरक्षणं च | Dhrishtadyumna Boards Droṇa’s Chariot; Sātyaki’s Counter-Protection

Upa-parva: Droṇa–Dhṛṣṭadyumna-saṃyoga (Strategic Engagement of Droṇa and Dhṛṣṭadyumna)

Saṃjaya reports that as the battle intensifies, the Pāṇḍavas press Kaurava forces that have become divided, while key leaders engage opposing champions (Bhīma checks Jalasandha; Yudhiṣṭhira confronts Kṛtavarman). The narrative then concentrates on Droṇa and Dhṛṣṭadyumna: both unleash dense volleys, producing severe battlefield disarray and vivid descriptions of debris, casualties, and scavenging animals—an archival portrayal of the war’s dehumanizing environment rather than celebratory spectacle. Dhṛṣṭadyumna, seeking a difficult objective, abandons the bow for sword-and-shield and penetrates Droṇa’s chariot space, disrupting the yoke and striking at the horses and fittings. Droṇa finds no opening at close quarters, then reasserts distance-control with precise archery, damaging Dhṛṣṭadyumna’s weapon, horses, and standards, and releases a lethal arrow. Sātyaki intervenes by severing the incoming missile and counter-wounding Droṇa, enabling Pāñcāla forces to extract Dhṛṣṭadyumna and re-stabilize their line. The chapter’s thematic lesson is the interplay of initiative, countermeasure, and protective alliance under conditions where dharma is strained by necessity and speed.

Chapter Arc: संशप्तकों के साथ घोर संग्राम के बाद, कपिध्वज अर्जुन दिव्यास्त्रों से शत्रु-व्रात का संहार कर शिबिर की ओर लौटता है—पर विजय-रथ पर बैठा हुआ भी उसका कंठ आँसुओं से भर उठता है, क्योंकि मन में एक अनकहा अनिष्ट काँप रहा है। → मार्ग में और शिबिर में संकेत मिलते जाते हैं कि आज का दिन केवल रण-जय का नहीं, किसी प्रिय के विनाश का भी है। अर्जुन का हृदय आशंकित है; वह गोविन्द से व्याकुल होकर कहता है कि स्वजनों को व्यग्र देखकर उसकी शंका दूर नहीं होती। तभी अभिमन्यु के विषय में प्रश्न उठता है—इन्द्र के पौत्र, सुकुमार, महाधनुर्धर, सदा प्रिय—वह युद्ध में कैसे मारा गया? → अभिमन्यु-वध का समाचार अर्जुन पर वज्र की तरह गिरता है। शोक तुरंत क्रोध में बदलता है; अधर्म के इस कृत्य पर धिक्कार उठता है। युयुत्सु कौरवों को ललकारकर कहता है कि जब अर्जुन पर वश न चला तो तुमने बालक को घेरकर मारा—यह धर्म नहीं। अर्जुन के भीतर प्रतिशोध की ज्वाला धधकती है और वह अधर्मियों को शीघ्र फल मिलने की घोषणा-सी करता है। → शिबिर में भाई, मित्र और सहायक—सब अर्जुन के शोक से दीन हो उठते हैं; उसे संभालने, धैर्य देने और युद्ध-नीति को फिर से बाँधने का प्रयत्न करते हैं। कृष्ण अर्जुन के साथ हैं—उसके आँसू, उसकी प्रतिज्ञा-गंधी वाणी और उसके भीतर उठते धर्म-क्रोध को दिशा देने के लिए। → अभिमन्यु-वध के प्रतिशोध हेतु अर्जुन का संकल्प अगले दिन के युद्ध को और भी प्रचण्ड बनाने वाला है—किस पर गिरेगा यह वज्र, और कौन-सा अधर्मी शीघ्र फल पाएगा?

Shlokas

Verse 1

अकाल (प्रतिज्ञापर्व) द्विसप्ततितमो< ध्याय: अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध (धृतराष्ट्र वाच अथ संशप्तकै: सार्ध युध्यमाने धनंजये । अभिमनयौ हते चापि बाले बलवतां वरे ।।

قال سنجايَا: لما انقضى ذلك اليوم الرهيب—الموسوم بإهلاك الأحياء—وغابت الشمس وحلّ وقت الشفق، انصرف مجرى الأحداث من سفكٍ مكشوف إلى حسابٍ كئيب يعقب انقضاء المعركة.

Verse 2

व्यपयातेषु वासाय सर्वेषु भरतर्षभ । हत्वा संशप्तकव्रातान्‌ दिव्यैरस्त्रै: कपिध्वज:

قال سَنْجَيا: «يا ثورَ آلِ بهاراتا! لمّا انقضى يومُ المقتلة وحانَت راحةُ المساء، وانصرفَت الجموعُ كلُّها نحوَ معسكراتها لتأوي، كان أرجونا—صاحبُ الرايةِ التي تحملُ القِرد—قد أبَادَ كتلةَ السَمْشَبْتَكَةِ المتراصّةَ بأسلحةٍ سماوية، ثم مضى إلى المعسكر جالسًا على عربته الظافرة.»

Verse 3

प्रायात्‌ स शिबिरं जिष्णुर्जैत्रमास्थाय तं रथम्‌ । गच्छन्नेव च गोविन्द साश्रुकण्ठो5भ्यभाषत

قال سَنْجَيا: «إن أرجونا، الظافر الذي لا يُقهَر، اعتلى تلك العربة الحاملة للنصر وانطلق نحو المعسكر. وبينما هو ماضٍ، وقد اختنق حلقُه بالدموع، خاطبَ غوفيندا.»

Verse 4

कि नु मे हृदयं त्रसस्‍्तं वाक्‌ च सज्जति केशव । स्पन्दन्ति चाप्यनिष्टानि गात्र॑ं सीदति चाप्युत

قال سَنْجَيا: «يا كيشَفا، لِمَ يرتجف قلبي وتتلعثم كلماتي؟ إن نُذُرَ السوء تخفق في أعضائي، وجسدي كذلك يهبط إلى الوهن.»

Verse 5

अनिष्ट चैव मे श्लिष्टं हृदयान्नापसर्पति । भुवि ये दिक्षु चात्युग्रा उत्पातास्त्रासयन्ति माम्‌

قال سَنْجَيا: «لقد التصق بقلبي نذيرُ كارثةٍ لا يبرح. إن الآياتِ المفزعةَ التي تظهر في الأرض وفي جميع الجهات تملؤني رعبًا.»

Verse 6

बहुप्रकारा दृश्यन्ते सर्व एवाघशंसिन: । अपि स्वस्ति भवेद्‌ राज्ञ: सामात्यस्य गुरोर्मम

قال سَنْجَيا: «تُرى نُذُرٌ شتّى، وكلُّها بلا استثناء تُنبئ بسوءٍ عظيم. فهل يبقى للملك، مع وزرائه—أخي الأكبر المُبجَّل يودهيشْتِهيرا—شيءٌ من السلامة؟»

Verse 7

वायुदेव उवाच व्यक्त शिवं तव भ्रातु: सामात्यस्य भविष्यति । मा शुच: किज्चिदेवान्यत्‌ तत्रानिष्टं भविष्यति

قال إله الريح: «إن خيرَ أخيك—مع وزرائه—سيكون بيِّنًا واقعًا. فلا تحزن لشيء؛ فبحسب هذا الشؤم، إنما وقع هناك شرٌّ آخر غيره».

Verse 8

संजय उवाच ततः संध्यामुपास्यैव वीरो वीरावसादने । कथयन्तौ रणे वृत्तं प्रयाता रथमास्थितौ

قال سنجيا: ثم إن البطلين، بعد أن أدّيا عبادة الشفق على وجهها في ساحة القتال التي تُسقط الأبطال، عادا فاعتليا العربة ومضيا قُدُمًا يتحدثان عمّا جرى في المعركة.

Verse 9

ततः स्वशिबिरं प्राप्तौ हतानन्दं हतत्विषम्‌ । वासुदेवोर<्'्जुनश्वैव कृत्वा कर्म सुदुष्करम्‌

قال سنجيا: ثم إن فاسوديفا (كريشنا) وأرجونا، بعد أن أنجزا عملاً بالغ العسر، عادا حتى دَنَوَا من معسكرهما. وكان المعسكر آنذاك يبدو خاليًا من الفرح، منزوع البهاء الذي كان له من قبل.

Verse 10

ध्वस्ताकारं समालक्ष्य शिबिरं परवीरहा । बीभत्सुरब्रवीत्‌ कृष्णमस्वस्थहृदयस्तत:

قال سنجيا: لما رأى المعسكر كأنه قد تهدّم، اضطرب قلب أرجونا—قاتل أبطال الأعداء—في باطنه. وبقلبٍ مثقلٍ بالقلق، خاطب كريشنا على هذا النحو.

Verse 11

नदन्ति नाद्य तूर्याणि मड़ल्यानि जनार्दन | मिश्रा दुन्दुभिनिर्घोषै: शड्खाश्चाडम्बरै: सह

قال أرجونا: «يا جاناردانا! اليوم في هذا المعسكر لا تُسمَع الآلاتُ الميمونة. ولا يُسمَع نفيرُ الصدفة مختلطًا بدويِّ طبول الدندُبي ونداءات الأبواق، مع صخب الاحتفال.»

Verse 12

वीणा नैवाद्य वाद्यन्ते शम्पातालस्वनै: सह । मड़ल्यानि च गीतानि न गायन्ति पठन्ति च

قال سنجيا: «الآن لا تُعزَفُ قيثاراتُ الفِينا، ولا تُسمَعُ آلاتُ الفرح مجتمعةً بأصدائها الرنّانة. حتى الأناشيدُ المألوفةُ والتلاواتُ المعتادةُ لا تُغنّى ولا تُرتَّل.»

Verse 13

योधाश्चापि हि मां दृष्टवा निवर्तन्ते हधोमुखा:,“मेरे सैनिक मुझे देखकर नीचे मुख किये लौट जाते हैं। पहलेकी भाँति अभिवादन करके मुझसे युद्धका समाचार नहीं बता रहे हैं। माधव! क्या आज मेरे भाई सकुशल होंगे?”

قال سنجيا: «حتى المحاربون، إذا رأوني، انصرفوا بوجوهٍ مطرقة. ليس كما من قبل؛ فلا يحيّونني ولا يرفعون إليّ أخبار القتال. يا ماذافا—أترى إخوتي يكونون سالمين اليوم؟»

Verse 14

कर्माणि च यथापूर्व कृत्वा नाभिवदन्ति माम्‌ । अपि स्वस्ति भवेदद्य भ्रातृभ्यो मम माधव

قال سنجيا: «مع أنهم يؤدّون أعمالهم كما كانوا من قبل، فإنهم لا يحيّونني. فإذا رأوني رجع جنودي بوجوهٍ مطرقة، ولا يرفعون إليّ أخبار الحرب كما اعتادوا. يا ماذافا—أترى إخوتي يكونون سالمين اليوم؟»

Verse 15

न हि शुद्ध्यति मे भावो दृष्टवा स्वजनमाकुलम्‌ । अपि पाज्चालराजस्य विराटस्य च मानद

قال سنجيا: «لا يصفو خاطري ولا يهدأ حين أرى ذوي قرابتي مضطربين في الفتنة؛ ولا أجد سكينةً أيضًا حين أرى ملك البانچالا وفيراطا، يا واهبَ الشرف.»

Verse 16

न च मामद्य सौभद्र: प्रह्ष्टो ग्रातृभि: सह । रणादायान्तुमुचितं प्रत्युद्याति हसन्निव

قال سنجيا: «واليوم أيضًا، ابنُ سوبهادرا—الذي كان عادةً مبتهجًا ومعه إخوته—لا يخرج، كما يليق، لاستقبالي عند عودته من ساحة القتال، كأنه مقبلٌ مبتسمًا. فما السبب يا ترى؟»

Verse 17

संजय उवाच एवं संकथयन्तौ तौ प्रविष्टोी शिबिरं स्‍्वकम्‌ । ददृशाते भृशास्वस्थान्‌ पाण्डवान्‌ नष्टचेतस:

قال سَنْجَايَا: «أيها الملك! وبينما كان الاثنان يتحادثان على هذا النحو، دخلا معسكرهما، فرأيا الباندافا في اضطرابٍ شديد—عقولٌ مضطربة وعزائمُ منكسرة».

Verse 18

दृष्टवा क्षातृश्व पुत्रांक्ष विमना वानरध्वज: । अपश्यंश्वैव सौभद्रमिदं वचनमत्रवीत्‌

قال سَنْجَايَا: «فلما رأى الإخوةَ والأبناءَ على تلك الحال، اغتمّ أرجونا صاحبُ رايةِ القرد غمًّا شديدًا؛ وإذ لم يرَ سَوْبَهَدْرَا (أبهيمانيو) هناك، نطق بهذه الكلمات.»

Verse 19

मुखवर्णोडप्रसन्नो व: सर्वेषामेव लक्ष्यते । न चाभिमन्युं पश्यामि न च मां प्रतिनन्दथ

«إن لون الوجوه وملامحها عندكم جميعًا تبدو مضطربة كئيبة. ولا أرى أبهيمانيو هنا، ولا أنتم تخاطبونني بحرارة الترحيب.»

Verse 20

मया श्रुतश्न द्रोणेन चक्रव्यूहो विनिर्मित: । न च वस्तस्य भेत्तास्ति विना सौभद्रमर्भकम्‌

«لقد سمعتُ أن الآچاريا درونا قد دبّر تشكيلَ القتال الرهيب المسمّى تشاكرا-فيوها. ولم يكن فيكم من يقدر على اقتحام ذلك الصفّ إلا الفتى أبهيمانيو، ابن سوبهادرا.»

Verse 21

न चोपदिष्टस्तस्यासीन्मयानीकाद्‌ विनिर्गम: । कच्चिन्न बालो युष्माभि: परानीकं प्रवेशित:

«غير أنني لم أكن قد علّمته طريقة الخروج من ذلك التشكيل. فأخبروني—ألم تجعلوا ذلك الغلام يدخل في صفوف العدو؟»

Verse 22

भित्त्वानीकं महेष्वास: परेषां बहुशो युधि | कच्चिन्न निहत: संख्ये सौभद्र: परवीरहा

قال سنجيا: «بعد أن شقَّ صفوف العدو واخترق تشكيلهم القتالي مرارًا في خضمّ المعركة، أَقُتِلَ أخيرًا في أتون القتال ذلك الرامي الجبّار—أبهيمانيو ابن سوبهادرا، قاتل أبطال الأعداء؟»

Verse 23

लोहिताक्ष॑ महाबाहुं जात॑ सिंहमिवाद्रिषु । उपेन्द्रसदृशं ब्रूत कथमायोधने हत:

قال سنجيا: «أخبروني كيف قُتِلَ أبهيمانيو في المعركة—ذا العينين الحمراوين، عظيم الساعدين، باسلًا كأوبيندرا (فيشنو)، كأسدٍ وُلد بين الجبال. بأيّ طريقة لقي بطلٌ كهذا حتفه؟»

Verse 24

सुकुमारं महेष्वासं वासवस्यात्मजात्मजम्‌ | सदा मम प्रियं ब्रूत कथमायोधने हतः,“इन्द्रके पौत्र तथा मुझे सदा प्रिय लगनेवाले सुकुमार शरीर महाधनुर्धर अभिमन्युके विषयमें बताइये। वह युद्धमें कैसे मारा गया?

قال سنجيا: «أخبروني عن ذلك الفتى الغضّ، الرامي العظيم—حفيد فاسافا (إندرا)—الذي كان عزيزًا عليّ دائمًا. كيف قُتِلَ في المعركة؟»

Verse 25

सुभद्राया: प्रियं पुत्र द्रौपद्या: केशवस्य च । अम्बायाश्ष प्रियं नित्यं कोडवधीत्‌ कालमोहित:

قال سنجيا: «مَن ذا الذي، وقد أضلّه سلطان الزمان (كالا)، قتل أبهيمانيو—الابن الحبيب لسوبهادرا، والمحبوب أيضًا لدى دروبادي وكيشافا (كريشنا)—الذي كانت أمه كونتي تدلّله على الدوام؟»

Verse 26

सदृशो वृष्णिवीरस्य केशवस्य महात्मन: । विक्रमश्रुतमाहात्म्यै: कथमायोधने हत:,*वृष्णिकुलके वीर महात्मा केशवके समान पराक्रमी, शास्त्रज्ष और महत्त्वशाली अभिमन्यु युद्धमें किस प्रकार मारा गया है?

قال سنجيا: «كيف قُتِلَ أبهيمانيو في القتال—وهو الذي كانت بسالته وذِكره وعظمته تضاهي بسالة بطل الفريشني، كيشافا (كريشنا) عظيم الروح؟»

Verse 27

वार्ष्णेयीदयितं शूरं मया सततलालितम्‌ । यदि पुत्र न पश्यामि यास्यामि यमसादनम्‌,“सुभद्राके प्राणप्यारे शूरवीर पुत्रको, जिसको मैंने सदा लाड़-प्यार किया है, यदि नहीं देखूँगा तो मैं भी यमलोक चला जाऊँगा

قال سانجيا: «إن لم أُبصر ذلك الابن البطل—حبيبَ فارشنيي (سوبهادرا)—الذي ما فتئتُ أُدلّله وأُربيه بالمحبة، فحينئذٍ، يا بُنيّ، سأمضي أنا أيضًا إلى دار ياما».

Verse 28

मृदुकुज्चितकेशान्तं बालं बालमृगेक्षणम्‌ | मत्तद्विरदविक्रान्ते शालपोतमिवोद्गतम्‌

قال سانجيا: «إن لم أرَ ابني—ذي أطراف الشعر الناعمة المتموّجة قليلًا؛ وهو بعدُ غلام، بعينين لامعتين قلقتين كعيني ظبيٍ صغير؛ وخطاه وبأسه كخطى فيلٍ هائج؛ ينهض كغصن شجرة السالا الغضّ—فإني أنا أيضًا سأمضي إلى دار ياما».

Verse 29

स्मिताभिभाषिणं शान्तं गुरुवाक्यकरं सदा | बाल्ये5प्यतुलकर्माणं प्रियवाक्यममत्सरम्‌

قال سانجيا: كان رقيق الطبع، يتكلم بابتسامة هادئة؛ ساكن النفس؛ مطيعًا دائمًا لكلام معلميه. حتى في طفولته كانت أفعاله لا تُجارى. وكان حديثه عذبًا، خاليًا من الحسد.

Verse 30

महोत्साहं महाबाहुं दीर्घधाजीवलोचनम्‌ । भक्तानुकम्पिनं दान्तं न च नीचानुसारिणम्‌

قال سانجيا: «كان عظيم العزم، شديد الساعد، طويل الراية، وعيناه مفعمتان بالحياة. رحيمًا بأهل الإخلاص، ضابطًا لنفسه، لا يرضى قط أن ينحطّ فيتبع سبل الأراذل».

Verse 31

कृतज्ञं ज्ञानसम्पन्नं कृतास्त्रमनिवर्तिनम्‌ | युद्धाभिनन्दिनं नित्यं द्विषतां भयवर्धनम्‌

قال سانجيا: كان وفيًّا للمعروف، حكيمًا، متقنًا لفنون السلاح، لا يعرف التراجع. يحيّي القتال على الدوام، ويزيد في قلوب أعدائه خوفًا لا ينقطع.

Verse 32

स्वेषां प्रियहिते युक्त पितृणां जयगृद्धिनम्‌ । न च पूर्व प्रह्तारिं संग्रामे नष्टसम्भ्रमम्‌

قال سنجيا: «كان مكرّسًا لتحصيل ما هو محبوب ونافع لجماعته، متعطّشًا للنصر إكرامًا لشيوخه؛ وفي ساحة القتال لم يكن مجردَ من يبتدر الضربة الأولى—بل كان يقاتل دون أن يفقد رباطة جأشه، لا تزعزعه الفوضى ولا يذهله الاضطراب».

Verse 33

रथेषु गण्यमानेषु गणितं त॑ं महारथम्‌

قال سنجيا: «حين كان يُحصى أصحاب المركبات ويُقوَّمون، عُدَّ بينهم ‘مَهاراثا’—أي من أعاظم فرسان العجلات الحربية.»

Verse 34

मयाध्यर्धगुणं संख्ये तरुणं बाहुशालिनम्‌ । प्रद्युम्नस्य प्रियं नित्यं केशवस्य ममैव च

قال سنجيا: «وفي المعركة كان هناك ذلك الفتى شديد الساعدين—الذي كنت أعدّه أغلى من نصف قدري أنا—وكان محبوبًا دائمًا لدى براديومنّا، ومحبوبًا لدى كيشافا (كريشنا) أيضًا، ومحبوبًا لديّ كذلك.»

Verse 35

यदि पुत्र न पश्यामि यास्यामि यमसादनम्‌ । '“रथियोंकी गणना होते समय जो महारथी गिना गया था, जिसे युद्धमें मेरी अपेक्षा ड्यौढ़ा समझा जाता था तथा अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाला जो तरुण वीर प्रद्यम्नको, श्रीकृष्णको और मुझे भी सदैव प्रिय था, उस पुत्रको यदि मैं नहीं देखूँगा तो यमराजके लोकमें चला जाऊँगा ।।

قال سنجيا: «إن لم أُبصر ابني فسأمضي إلى دار يَما (إله الموت).» تحمل هذه العبارة لوعةَ أبٍ في خضمّ الخراب الأخلاقي للحرب، حيث يطغى التعلّق بالولد على الاحتمال، فتبدو الموتُ أهونَ من حياةٍ تُستأنف من دونه.

Verse 36

तन्त्रीस्वनसुखं रम्यं पुंस्कोकिलसमध्वनिम्‌

قال سنجيا: «(كان) فاتنًا مُطربًا للأذن—حلوًا كرنّة وتر العود، ورنّانًا كنداء الوقواق الذكر.»

Verse 37

रूप॑ चाप्रतिमं तस्य त्रिदशैश्षापि दुर्लभम्‌

قال سانجيا: كانت هيئته لا تُضاهى—نادرة إلى حدٍّ أن الآلهة أنفسهم بالكاد يستطيعون نيل مثل هذا التجلي أو مشاهدته.

Verse 38

अपश्यतो हि वीरस्य का शान्तिहदयस्य मे । “उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। देवताओंके लिये भी वैसा रूप दुर्लभ है। यदि वीर अभिमन्युके उस रूपको नहीं देख पाता हूँ तो मेरे हृदयको क्या शान्ति मिलेगी? ।।

قال سانجيا: «إن لم أُبصر ذلك البطل، فأيُّ سكينةٍ يمكن أن ينالها قلبي؟»

Verse 39

सुकुमार: सदा वीरो महाहशयनोचित:

قال سانجيا: «على الرغم من رِقّة مظهره، فقد كان دومًا بطلًا—جديرًا بمنزلة المحارب العظيم على العربة (مها-راثا).»

Verse 40

शयानं समुपासन्ति यं पुरा परमस्त्रिय:

قال سانجيا: «ذاك الذي كانت في الأزمنة الخالية أكرمُ النساء يَقُمْنَ على خدمته بإجلال، حتى وهو مضطجعٌ في راحته—»

Verse 41

यः पुरा बोध्यते सुप्त: सूतमागधवन्दिभि:

قال سانجيا: «ذاك الذي كان في سالف الأيام يُوقَظ من نومه على أيدي السائقين، والسُّوتا، ومغنّي المديح في البلاط—الماغَدها والڤاندين—»

Verse 42

बोधयन्त्यद्य त॑ नूनं श्वापदा विकृतैः स्वनै: । “जिसे पहले सो जानेपर सूत, मागध और बन्दीजन जगाया करते थे, उसी अभिमन्युको आज निश्चय ही हिंसक जन्तु अपने भयंकर शब्दोंद्वारा जगाते होंगे ।।

قال سنجيا: «لا ريب أنّ الوحوش اليوم توقظه بأصواتها الغليظة المشوَّهة—هو الذي كان إذا نام من قبل أيقظه الرواة والمنشدون ومغنّو البلاط.»

Verse 43

हा पुत्रकावितृप्तस्य सतत पुत्रदर्शने

قال سنجيا: «وا أسفاه! مع أنه لا يشبع قطّ من رؤية ابنه، فإنه يظلّ على الدوام متعلّقًا برؤيته.»

Verse 44

सा च संयमनी नूनं सदा सुकृतिनां गति:

قال سنجيا: «وتلك السَّمْيَمَانِي حقًّا هي، على الدوام، المصير المرسوم لأهل الفضل.»

Verse 45

स्वभाभि भासिता रम्या त्वयात्यर्थ विराजते । “निश्चय ही वह संयमनी पुरी सदा पुण्यवानोंका आश्रय है; जो आज अपनी प्रभासे प्रकाशित और मनोहारिणी होती हुई भी तुम्हारे द्वारा अत्यन्त उद्भधासित हो उठी होगी ।।

قال سنجيا: «تلك المدينة البهيّة، وإن كانت متلألئةً بضيائها الذاتي، فإنها تزداد إشراقًا بك. حقًّا إن سَمْيَمَانِي ملجأٌ دائمٌ لأهل البرّ؛ ومع أنها بطبعها مضيئةٌ فاتنة، فإنها اليوم ستتوهّج بلمعانٍ استثنائيّ بحضورك.»

Verse 46

एवं विलप्य बहुधा भिन्नपोतो वणिग्‌ यथा

قال سنجيا: وبعد أن ناح بوجوهٍ شتّى—كتاجرٍ تحطّمت سفينته—أطلق صوت الحزن المولود من خرابٍ مباغت، كمن يرى كلَّ سندٍ وكلَّ رجاءٍ قد انكسر في قلب النازلة.

Verse 47

कच्चित्स कदन कृत्वा परेषां कुरुनन्दन

قال سانجيا: «يا بهجة آل كورو، أحقًّا أحدثَ في صفوف العدوّ مذبحةً عظيمة؟»

Verse 48

स नून॑ बहुभियत्तिर्युध्यमानो नरर्षभै:

قال سانجيا: «لا ريبَ أنه، وهو يجاهد في ساحة القتال، يقاتل الآن كثيرًا من الأبطال، ثيرانًا بين الرجال.»

Verse 49

पीड्यमान: शरैस्ती&णै: कर्णद्रोणकृपादिभि:

قال سانجيا: لقد كان يُعذَّب عذابًا شديدًا بسهامٍ حادّة أطلقها كارنا ودرونا وكريبا وسائرُ فرسان الصفّ الأول.

Verse 50

नानालिज्ैः सुधौताग्रैर्मम पुत्रो5ल्पचेतन: । इह मे स्यात्‌ परित्राणं पितेति स पुनः पुन:

قال سانجيا: «كان ابني، قليلَ التمييز، يصرخ مرارًا وتكرارًا: “يا أبتِ، ليكن لي هنا حِمىً وحماية!”»—وذلك والسلاحُ ذو الرؤوس الكثيرة، المصقولُ الحادّ، يُوجَّه إليه.

Verse 51

इत्येवं विलपन्‌ मन्ये नृशंसैर्भुवि पातित: । “जब कर्ण

قال سانجيا: «وهكذا، وهو ينوح مرارًا وتكرارًا، أظنّ أن أولئك القوم القساة صرعوه إلى الأرض. حين عذّب كارنا ودرونا وكريبا وغيرهم ابني بأنواعٍ شتّى من السهام الحادّة ذات الرؤوس اللامعة، وحين بدأت قواه الواعية تخبو، كان أبهيمانيو يصرخ مرارًا: لو كان أبي هنا لنجت حياتي. وفي تلك الحال بعينها—فيما أعتقد—أسقطه الأعداءُ الغلاظ على وجه الأرض.»

Verse 52

वज्सारमयं नूनं हृदयं सुदृढे मम

قال سنجيا: «لا بدّ أن قلبي مصنوعٌ من جوهرٍ صلدٍ كالألماس—قد اشتدّ تصلّبه—إذ ما زلت أطيق احتمال هذه الوقائع المروّعة في الحرب وأرويها.»

Verse 53

कथं बाले महेष्वासा नृशंसा मर्मभेदिन:

قال سنجيا: «كيف لهؤلاء الرماة العظام—وقد تجردوا من الرحمة وضربوا المقاتل—أن يفعلوا ذلك بطفلٍ صغير؟»

Verse 54

स्वस्रीये वासुदेवस्य मम पुत्रेडक्षिपन्‌ शरान्‌ उन क्रूरकर्मा महान्‌ धनुर्धरोंने श्रीकृष्णके भानजे और मेरे बालक पुत्रपर मर्मभेदी बाणोंका प्रहार कैसे किया? ।।

قال سنجيا: «ذاك الذي، بروحٍ لا تنكسر ولا تُذلّ، كان يتقدّم دائماً للقائي ويحيّيني باحترام…»

Verse 55

नूनं स पातितः शेते धरण्यां रुधिरोक्षित:

قال سنجيا: «لا ريب أنه قد صُرِع، وهو الآن ملقى على الأرض، مغمورًا بالدم—صورةٌ لليقين الكالح في الحرب، حيث يلتقي البأس والقدر في جسدٍ ساقط، ويغدو الثقل الأخلاقي للعنف جليًّا لا لبس فيه.»

Verse 56

सुभद्रामनुशोचामि या पुत्रमपलायिनम्‌

قال سنجيا: «إني أرثي لسوبهادرا—تلك التي لم يفرّ ابنها.»

Verse 57

सुभद्रा वक्ष्यते कि मामभिमन्युमपश्यती

قال سانجيا: «ماذا ستقول لي سوبهادرا حين لا ترى أبهيمانيو؟»

Verse 58

वज्सारमयं नूनं हृदयं यन्न यास्यति

قال سانجيا: «لا ريب أن القلب مصنوع من جوهرٍ كالألماس؛ إذ لا ينكسر ولا يزول حتى تحت حزنٍ ساحق كهذا.»

Verse 59

दृप्तानां धार्तराष्ट्राणां सिंहनादो मया श्रुतः

قال سانجيا: «سمعتُ زئيرًا كزئير الأسد من أبناء دِهرتاراشترا المتكبرين.»

Verse 60

अशवनुवन्तो बीभत्सुं बाल॑ हत्वा महारथा:

قال سانجيا: «بعد أن قتلوا الفتى بيبهاتسو، صاح أولئك الفرسان العظام على العربات يطلبون خيولهم.»

Verse 61

कि मोदध्वमधर्मज्ञा: पाण्डवं दृश्यतां बलम्‌ | 'युयुत्सु कह रहा था, धर्मको न जाननेवाले महारथी कौरवो! अर्जुनपर जब तुम्हारा वश न चला, तब तुम एक बालककी हत्या करके क्‍यों आनन्द मना रहे हो? कल पाण्डवोंका बल देखना ।।

قال سانجيا: «لِمَ تفرحون، يا من تجهلون الدارما؟ فلتُرَ قوةُ الباندافا. وفي ساحة القتال، ماذا عساكم تفعلون مما لا يُغضِب كيشافا وأرجونا؟»

Verse 62

आगमिष्यति व: क्षिप्रं फलं पापस्य कर्मण:

قال سانجيا: «سريعًا سيحلّ بكم ثمرُ هذا الفعل الآثم».

Verse 63

इति तान्‌ परिभाषन वै वैश्यापुत्रो महामति:

قال سانجيا: وبعد أن خاطبهم على هذا النحو، مضى ابنُ الفيشيا الحكيمُ يتكلم—وكانت كلماته ردًّا لاذعًا في أجواء الحرب المشحونة بميزان الدارما.

Verse 64

अपायाच्छस्त्रमुत्सूज्य कोपदुःखसमन्वित: । *राजा धृतराष्ट्रकी वैश्यजातीय पत्नीका परम बुद्धिमान्‌ पुत्र युयुत्सु कोप और दुःखसे युक्त हो कौरवोंसे उपर्युक्त बातें कहकर शस्त्र त्यागककर चला आया है' ।।

قال سانجيا: «يويُتسو—الابن بالغ الذكاء للملك دْهريتاراشترا من زوجته ذات الأصل الفيشيا—وقد غمره الغضب والحزن، قال تلك الكلمات للكوروڤا ثم ألقى سلاحه وانسحب وابتعد. فلماذا، يا كريشنا، لم تُخبرني بهذا في خضمّ المعركة؟»

Verse 65

अधाक्षं तानहं क्रूरांस्तदा सर्वान्‌ महारथान्‌ | “श्रीकृष्ण! आपने रणक्षेत्रमें ही यह बात मुझसे क्यों नहीं बता दी? मैं उसी समय उन समस्त क़ूर महारथियोंको जलाकर भस्म कर डालता” || ६४ $ || संजय उवाच पुत्रशोकार्दितं पार्थ ध्यायन्तं साश्रुलोचनम्‌

قال سانجيا: أيها الملك، لما رأى بارثا (أرجونا) ممزقًا بحزنٍ على ابنه—غارقًا في التفكير فيه وعيناه تفيضان بالدمع—أمسكه شري كريشنا وثبّته. كان أرجونا غائصًا في لوعةٍ عميقة وُلدت من فراق ولده، تحرقه مرارة الأسى؛ فخاطبه الربّ مخاطبة الصديق، يحثّه ألا يضطرب هكذا.

Verse 66

निगृहा वासुदेवस्तं पुत्राधिभिरभिप्लुतम्‌ । मैवमित्यब्रवीत्‌ कृष्णस्तीव्रशोकसमन्वितम्‌

قال سانجيا: لما رأى أرجونا غارقًا في حزنٍ على ابنه—وقد فاضت نفسه بالأسى وانهمرت دموعه—أمسكه فاسوديفا كريشنا وثبّته. كان أرجونا غائصًا في لوعة الفراق، تحرقه مرارة النحيب الشديد؛ فقال كريشنا ليكفّه: «يا صديقي، لا تضطرب هكذا».

Verse 67

सर्वेषामेष वै पन्था: शूराणामनिवर्तिनाम्‌ । क्षत्रियाणां विशेषेण येषां युद्धेन जीविका

قال سنجيا: «إن هذا حقًّا هو السبيل لكل الشجعان الذين لا يرتدّون على أعقابهم—ولا سيما للكشاتريا، الذين تقوم معيشتهم ومقامهم على الحرب. فالمضيّ في هذا الطريق لهم أمر لا مفرّ منه».

Verse 68

एषा वै युध्यमानानां शूराणामनिवर्तिनाम्‌ । विहिता सर्वशास्त्रज्जैगतिर्मतिमतां वर

قال سنجيا: «هذه حقًّا هي المصير المرسوم للمحاربين الأبطال الذين يثبتون في القتال ولا يتراجعون قط. لقد قرّر جميع العارفين بالشاسترا (śāstra) أن هذا هو السبيل القويم—يا خير الحكماء».

Verse 69

ध्र॒ुवं हि युद्धे मरणं शूराणामनिवर्तिनाम्‌ । गत: पुण्यकृतां लोकानभिमन्युर्न संशय:

قال سنجيا: «إن الموت في المعركة حقًّا محتوم على الأبطال الذين لا يتراجعون. لقد مضى أبهيمانيو إلى العوالم التي ينالها صانعو البرّ—ولا شكّ في ذلك».

Verse 70

एतच्च सर्ववीराणां काड्क्षितं भरतर्षभ | संग्रामेडभिमुखो मृत्यु प्राप्तुयादिति मानद

قال سنجيا: «يا ثور آل بهاراتا، يا مانح الشرف، هذا ما يتوق إليه كل المحاربين الحقّ: أن يلقى المرء الموت في المعركة وهو مواجهٌ للعدو—قتالًا صريحًا، متقدّمًا إلى الأمام دون أن يُري ظهره».

Verse 71

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक इकह त्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

وهكذا تنتهي الفصول الحادي والسبعون، المتعلّق بحكاية الأمراء الستة عشر، ضمن قسم مقتل أبهيمانيو في درونا بارفا من «شري مهابهاراتا». فبعد أن صرع في ساحة الحرب أمراء أقوياء—أبطالًا حقًّا—لاقى أبهيمانيو، وجهًا لوجه في ميدان القتال، الموت الذي يتمنّاه المحاربون أنفسهم: نهاية مباشرة باسلة في المعمعة.

Verse 72

मा शुचः पुरुषव्याप्र पूर्वरेष सनातन: । धर्मकृद्धि: कृतो धर्म: क्षत्रियाणां रणे क्षय:,'पुरुषसिंह! शोक न करो। प्राचीन धर्मशास्त्रकारोंने संग्राममें वध होना क्षत्रियोंका सनातनधर्म नियत किया है इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि अर्जुनकोपे द्विसप्ततितमो<ध्याय: ।।

قال سانجيا: «لا تحزن، يا نمرَ الرجال. فهذا حكمٌ قديمٌ أبديٌّ سنَّه واضعو الدَّرما: إن موتَ الكشاتريا في ساحة القتال هو واجبُهم المعيَّن.»

Verse 73

इमे ते भ्रातर: सर्वे दीना भरतसत्तम । त्वयि शोकसमादविष्टे नृपाश्व सुह्दस्तव,“भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे शोकाकुल हो जानेसे ये तुम्हारे सभी भाई, नरेशगण तथा सुहृद्‌ दीन हो रहे हैं

قال سانجيا: «يا خيرَ آلِ بهاراتا، حين تستولي عليك الكآبةُ، يَغدو إخوتُك جميعًا، والملوكُ، وأهلُ وُدِّك منكسري النفوس. إن حزنَك يسري في دائرة القرابة والحلفاء، فيُوهِن عزمَهم ويُثقِل القضيةَ المشتركة.»

Verse 74

एतांश्व वचसा साम्ना समाश्वासय मानद । विदितं वेदितव्यं ते न शोक॑ कर्तुमहसि

قال سانجيا: «أيها الكريم، طمئن هؤلاء جميعًا بكلمات هادئة مُصالِحة. ما ينبغي أن يُعرَف قد عرفتَه؛ فلا تَسْلِمْ نفسَك للحزن.»

Verse 75

एवमाश्वासित: पार्थ: कृष्णेनादभुतकर्मणा । ततोअब्रवीत्‌ तदा भ्रातृन्‌ सर्वान्‌ पार्थ: सगद्गदान्‌

قال سانجيا: «وهكذا، لما طمأن كريشنا—صاحب الأفعال العجيبة—بارثا، التفت أرجونا (بارثا) فخاطب جميع إخوته. كان صوته مخنوقًا بالعاطفة، غير أن ثباتًا جديدًا نهض فيه بفضل مشورة كريشنا وسط الشدّة الأخلاقية للحرب.»

Verse 76

स दीर्घबाहु: पृथ्वंसो दीर्घधजीवलोचन: । अभिमन्युर्यथावृत्त: श्रोतुमिच्छाम्यहं तथा

قال سانجيا: «أودّ أن أسمع، كاملًا وكما وقع تمامًا، كيف قاتل أبهيمانيو—عريضَ المنكبين، طويلَ الذراعين، لوتسيَّ العينين—في المعركة.»

Verse 77

सनागस्यन्दनहयान द्रक्ष्यध्वं निहतान्‌ मया । संग्रामे सानुबन्धांस्तान्‌ मम पुत्रस्य वैरिण:

قال سانجيا: «غدًا سترون أعداء ابني—مع فيلتهم وعرباتهم وخيولهم، ومع أتباعهم وذوي قرباهم—صرعى مطروحين في ساحة القتال بيدي.»

Verse 78

कथं च व: कृतास्त्राणां सर्वेषां शस्त्रपाणिनाम्‌ । सौभद्रो निधनं गच्छेद्‌ वज्जिणापि समागत:

«وأنتم جميعًا أهلُ خبرةٍ بفنون السلاح، والسلاحُ في أيديكم؛ فكيف يمضي أبهيمانيو، ابن سوبهادرا—وهو القادر حتى على مقاتلة إندرا حامل الفَجْرَة (Vajra)—إلى الهلاك أمام أعينكم؟»

Verse 79

यद्येवमहमज्ञास्यमशक्तान्‌ रक्षणे मम । पुत्रस्य पाण्डुपञ्चालान्‌ मया गुप्तो भवेत्‌ तत:,“यदि मैं ऐसा जानता कि पाण्डव और पांचाल मेरे पुत्रकी रक्षा करनेमें असमर्थ हैं तो मैं स्वयं उसकी रक्षा करता

قال سانجيا: «لو أنني علمتُ أن الباندافا والبانتشالا عاجزون عن حماية ابني، لَمنذ تلك اللحظة لكنتُ أنا نفسي قد جعلته في حراستي.»

Verse 80

कथं च वो रथस्थानां शरवर्षाणि मुज्चताम्‌ । नीतो>भिमन्युर्निधनं कदर्थीकृत्य व: परैः,“आपलोग रथपर बैठे हुए बाणोंकी वर्षा कर रहे थे तो भी शत्रुओंने आपकी अवहेलना करके कैसे अभिमन्युको मार डाला?

قال سانجيا: «وأنتم ثابتون على عرباتكم تمطرون السهام مطرًا، كيف تجرّأ العدو على ازدرائكم، ثم بعد أن أهان أبهيمانيو ساقه إلى الموت؟»

Verse 81

अहो व: पौरुषं नास्ति न च वो<5स्ति पराक्रम: । यत्राभिमन्यु: समरे पश्यतां वो निपातित:

قال سانجيا: «وا أسفاه! لا رجولةَ فيكم ولا بأسَ حقيقيًّا؛ إذ على ساحة القتال، وأنتم تنظرون، ضُرِب أبهيمانيو فسقط صريعًا.»

Verse 82

आत्मानमेव गर्हैयं यदहं वै सुदुर्बलान्‌ । युष्मानाज्ञाय निर्यातों भीरूनकृतनिश्चयान्‌

قال سانجيا: «لن ألوم إلا نفسي؛ فمع أني كنت أعلم أنكم في غاية الضعف—جبناء تفتقرون إلى العزم الراسخ—فإني مضيتُ إلى موضعٍ آخر، وتركْتُ أبهيمانيو يعتمد عليكم».

Verse 83

आहोस्विद्‌ भूषणार्थाय वर्म शस्त्रायुधानि व: । वाचस्तु वक्तुं संसत्सु मम पुत्रमरक्षताम्‌

قال سانجيا: «أكانت دروعكم وأسلحتكم للزينة فحسب؟ فإن كلماتكم—وفصاحتكم في المجالس—لم تحمِ ابني».

Verse 84

“अथवा आपलोगोंके ये कवच और अस्त्र-शस्त्र क्या शरीरका आभूषण बनानेके लिये हैं? मेरे पुत्रकी रक्षा न करके वीरोंकी सभामें केवल बातें बनानेके लिये हैं?” ।।

قال سانجيا: «أم إن دروعكم وسلاحكم إنما هي لتزيين الأجساد؟ أهي لمجرد نسج الخطب في مجلس الأبطال بدلًا من حماية ابني؟» ثم لما قال ذلك نهض أرجونا (بيبهاتسو)، آخذاً قوسه وسيفاً بديعاً؛ وفي تلك اللحظة لم يجرؤ أحد أن يرفع عينيه لينظر إليه.

Verse 85

तमन्तकमिव क्रुद्ध॑ निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः । पुत्रशोकाभिसंतप्तमश्रुपूर्णमुखं तदा

قال سانجيا: في ذلك الحين كان ملتهبًا بالغضب كأنما أنتاكا (الموت) نفسه، يزفر أنفاسًا عميقة مرة بعد مرة. وقد عذّبه حزنُه على ابنه، فامتلأ وجه أرجونا بالدموع—حزنٌ وسخطٌ يمتزجان في قلب المعركة.

Verse 86

न भाषितुं शक्नुवन्ति द्रष्ट॑ वा सुहृदो &र्जुनम्‌ । अन्यत्र वासुदेवाद्वा ज्येष्ठाद्वा पाण्डुनन्दनात्‌

قال سانجيا: إن محبّي أرجونا وذوي وُدّه لم يقدروا أن ينطقوا بكلمة إليه، ولا أن يجترئوا على النظر إليه—إلا فاسوديفا (شري كريشنا) وابن باندو الأكبر (يودهيشتيرا).

Verse 87

सर्वास्ववस्थासु हितावर्जुनस्य मनोनुगौ । बहुमानात्‌ प्रियत्वाच्च तावेनं वक्तुमर्हत:

قال سانجايا: في كل حالٍ كان هذان الاثنان—شري كريشنا والملك يودهيشتيرا—مخلصين لخير أرجونا، يسيران على وفق ما يوافق قلبه. ولِعِظَم ما يكنّانه له من توقيرٍ ومودّة، كانا وحدهما في تلك اللحظة أهلًا لأن يكلّماه ويُسديَا إليه النصح.

Verse 88

ततस्तं पुत्रशोकेन भूशं पीडितमानसम्‌ | राजीवलोचनं क्रुद्धं राजा वचनमत्रवीत्‌,तदनन्तर मन-ही-मन पुत्रशोकसे अत्यन्त पीड़ित हुए क्रोधभरे कमलनयन अर्जुनसे राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा--

قال سانجايا: ثم خاطب الملك يودهيشتيرا أرجونا—ذا العينين كزهرة اللوتس، المتأجّج غضبًا—وقد كان قلبه مثقلًا أشدّ الثقل بحزنٍ على ابنه.

Verse 123

स्तुतियुक्तानि रम्याणि ममानीकेषु बन्दिन: । “ढाक और करतारकी ध्वनिके साथ आज वीणा भी नहीं बज रही है। मेरी सेनाओंमें वन्दीजन न तो मंगलगीत गा रहे हैं और न स्तुतियुक्त मनोहर श्लोकोंका ही पाठ करते हैं

قال سانجايا: «في صفوفي لم يعد المنشدون يترنّمون بأبياتٍ عذبةٍ مفعمةٍ بالمديح. لقد سكتت الأناشيد المباركة وتلاوات الاحتفاء التي كانت ترفع المعنويات وتعلن الشرف—وذلك نذير سوءٍ بأن روح الجيش تتصدّع تحت وطأة تقلبات الحرب.»

Verse 326

यदि पुत्र न पश्यामि यास्यामि यमसादनम्‌ । “जिसके केशप्रान्त कोमल और घुँघराले थे

قال سانجايا: «إن لم أُبصر ابني فسأمضي إلى دار يَما—مملكة الموت.» وفي مراثيه يستحضر الأب صفات الابن: أطراف شعرٍ لينةٍ مجعّدة، وعينان خفيفتان كعيني ظبيٍ صغير؛ وبأسٌ كبأس فيلٍ هائج، وقامةٌ سامقة كغصن شجرة شالا الفتية؛ يتكلم مبتسمًا، وقلبه ساكن، مطيعٌ لأوامر الشيوخ والمعلمين؛ لا نظير لبسالته منذ الصغر؛ عذبُ القول، لا يحمل حسدًا ولا بغضاء؛ مفعمٌ بالحماسة، عظيمُ الساعدين، واسعُ العينين جميلهما كزهرتي لوتسٍ متفتحتين؛ رحيمٌ بأهل العبادة، ضابطٌ لحواسه، لا يصاحب الأراذل؛ شكورٌ، عليمٌ، متقنٌ لفنون السلاح؛ لا يولي ظهره للقتال، يحيّي ساحة الحرب ويزيد رعب الأعداء؛ محبوبٌ عند ذويه، ساعٍ في نفعهم، متطلعٌ إلى ظفر سلالة أبيه؛ لا يجزع في المعركة ولا يبتدئ العدو بالضربة. فإن لم أرَ ابني الفتى أبهيمانيو، فسأسلك أنا أيضًا طريق يمالوكا.

Verse 353

अपश्यतस्तद्वदनं का शान्तिहदयस्य मे । “जिसकी नासिका, ललाटपटप्रान्त, नेत्र, भौंह तथा ओषछ्ठ--ये सभी परम सुन्दर थे, अभिमन्युके उस मुखको न देखनेपर मेरे हृदयमें क्या शान्ति होगी?

قال سانجايا: «إن لم أُبصر ذلك الوجه، فأيّ سكينةٍ تبقى لقلبي؟ أنفُه، وحاشيةُ جبهته، وعيناه، وحاجباه، وشفتاه—كلّها في غاية الجمال—فإن لم أرَ وجه أبهيمانيو ذاك، فكيف يهدأ فؤادي؟»

Verse 366

अशृण्वतः स्वनं तस्य का शान्ति्दयस्य मे । “अभिमन्युका स्वर वीणाकी ध्वनिके समान सुखद, मनोहर तथा कोयलकी काकलीके तुल्य मधुर था। उसे न सुननेपर मेरे हृदयको क्या शान्ति मिलेगी?

قال سَنْجَايَا: «إن لم أسمع صوته، فأيُّ سكينةٍ يجدها قلبي؟ كان صوتُ أبهِيمانيو عذبًا مُطربًا، كرنّةِ الـڤينا، وحلوًا كنداءِ الوقواق؛ فإذا حُرِمتُ سماعه، فكيف يطمئنّ فؤادي؟»

Verse 383

नाद्याहं यदि पश्यामि का शान्तिहदयस्य मे । “प्रणाम करनेमें कुशल और पितृवर्गकी आज्ञाका पालन करनेमें तत्पर अभिमन्युको यदि आज मैं नहीं देखता हूँ तो मेरे हृदयको कया शान्ति मिलेगी?

قال سَنْجَايَا: «إن لم أره اليوم، فأيُّ سكينةٍ تكون لقلبي؟ إن لم أُبصر أبهِيمانيو—المُحسنَ للانحناء والتحية، الساعي إلى امتثال أوامر الشيوخ وأهل الأب—فكيف يهدأ فؤادي؟»

Verse 393

भूमावनाथवच्छेते नूनं नाथवतां वर: । “जो सदा बहुमूल्य शय्यापर सोनेके योग्य और सुकुमार था, वह सनाथशिरोमणि वीर अभिमन्यु आज निश्चय ही अनाथकी भाँति पृथ्वीपर सो रहा है

قال سَنْجَايَا: «لا ريبَ أنّ أبهِيمانيو—ذلك الفارس الرقيق الذي كان يليق به أن ينام على فراشٍ نفيس—قد بات اليوم مطروحًا على الأرض كمن لا وليَّ له ولا حامٍ.»

Verse 403

तमद्य विप्रविद्धाड़मुपासन्त्यशिवा: शिवा: । “आजसे पहले सोते समय परम सुन्दरी स्त्रियाँ जिसकी उपासना करती थीं

قال سَنْجَايَا: «اليوم، حوله—وجسده ممزّقٌ مُثخَنٌ بالسلاح مطروحٌ على الأرض—ستجتمع بناتُ آوى ذواتُ العُواء المشؤوم؛ هو الذي كانت، قبل هذا اليوم، نساءٌ غايةٌ في الحسن واليُمن يَقُمْنَ على خدمته بتبجيل.»

Verse 426

नूनमद्य रजोध्वस्तं रणरेणु: करिष्यति । “उसका वह सुन्दर मुख सदा छत्रकी छायामें रहने योग्य था; परंतु आज युद्धभूमिमें उड़ती हुई धूल उसे आच्छादित कर देगी

قال سَنْجَايَا: «لا ريبَ أنّ غبارَ المعركة سيغشّيه اليوم ويُدنّسه. ذلك الوجه الجميل، الذي كان يليق به أن يبقى دائمًا تحت ظلّ المظلّة الملكية، سيُحجَب الآن بغبار ساحة القتال الدائر.»

Verse 436

भाग्यहीनस्य कालेन यथा मे नीयसे बलात्‌ । हा पुत्र! मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ। निरन्तर तुम्हें देखते रहनेपर भी मुझे तृप्ति नहीं होती थी, तो भी काल आज बलपूर्वक तुम्हें मुझसे छीनकर लिये जा रहा है

قال سانجيا: «وا حسرتاه يا بُنَيّ! كيف يسوقك القدر والزمن عني قسرًا، كأنني محرومٌ من كل حظ. حتى حين كنت أراك بلا انقطاع لم يكن قلبي يشبع؛ ومع ذلك فإن الزمن اليوم، بقوة لا تُقاوَم، ينتزعك مني ويحملك بعيدًا.»

Verse 453

शतक्रतुर्धनेशश्व प्राप्तमर्चन्त्यभीरुकम्‌ । “अवश्य ही आज वैवस्वत यम, वरुण, इन्द्र और कुबेर वहाँ तुम-जैसे निर्भय वीरको अपने प्रिय अतिथिके रूपमें पाकर तुम्हारा बड़ा आदर-सत्कार करते होंगे”

قال سانجيا: «لا ريب أنّ يَما ابنَ فيفَسْوَت، وفارونا، وإندرا، وكوبيرا—وقد نالوا في عالمهم بطلًا لا يهاب مثلك ضيفًا حبيبًا—لا بدّ أنهم يكرمونك ويستقبلونك بأعظم توقير.»

Verse 463

दुःखेन महता<5<विष्टो युधिष्ठिरमपृच्छत । इस प्रकार बारंबार विलाप करके टूटे हुए जहाजवाले व्यापारीकी भाँति महान्‌ दुःखसे व्याप्त हो अर्जुनने युधिष्ठिरसे इस प्रकार पूछा--

قال سانجيا: وقد غمره حزنٌ عظيم، سأل يودهيشتيرا. وكالتاجر الذي تحطّمت سفينته، أخذ ينوح مرة بعد مرة؛ ثم إن أرجونا، وقد أكلته الكآبة، خاطب يودهيشتيرا على هذا النحو.

Verse 473

स्वर्गतो$भिमुख: संख्ये युध्यमानो नरभै: | “कुरुनन्दन! क्‍या उन श्रेष्ठ वीरोंके साथ युद्ध करता हुआ अभिमन्यु रणभूमिमें शत्रुओंका संहार करके सम्मुख मारा जाकर स्वर्गलोकमें गया है?

قال سانجيا: «يا فخرَ الكورو! أكان أبهيمانيو، وقد جعل السماء غايته المحتومة، يقاتل في لُجّة المعركة أولئك الأبطال كالثيران، فيُعمل القتل في أعدائه في الميدان، ثم—وقد ضُرب وهو ما يزال يواجههم—نال عالم السماء؟»

Verse 483

असहाय: सहायार्थी मामनुध्यातवान्‌ ध्रुवम्‌ | “अवश्य ही बहुत-से श्रेष्ठ एवं सावधानीके साथ प्रयत्नपूर्वक युद्ध करनेवाले योद्धाओंके साथ अकेले लड़ते हुए अभिमन्युने सहायताकी इच्छासे मेरा बारंबार स्मरण किया होगा

قال سانجيا: «وقد تُرك بلا سندٍ يتّكئ عليه، متشوّفًا إلى العون، فلا بدّ أن أبهيمانيو كان يذكرني مرارًا وتكرارًا. إذ كان يقاتل وحيدًا أمام كثير من المحاربين الأفذاذ الذين يقاتلون بحذرٍ وباجتهاد، فمن الطبيعي أن يستحضرني رجاءَ النجدة.»

Verse 513

सुभद्रायां च सम्भूतो न चैवं वक्तुमहति । अथवा वह मेरा पुत्र, श्रीकृष्णका भानजा था, सुभद्राकी कोखसे उत्पन्न हुआ था; इसलिये ऐसी दीनतापूर्ण बात नहीं कह सकता था

قال سنجيا: «لأنه وُلد من سوبهادرا، لم يكن ممن يقدر أن ينطق بكلامٍ ذليلٍ مُهينٍ للنفس على هذا النحو. بل إنه—إذ كان ابني، وابن أخت كريشنا، ومنبثقًا من رحم سوبهادرا—ما كان ليُطلق كلماتٍ بمثل هذا الانكسار».

Verse 523

अपश्यतो दीर्घबाहुं रक्ताक्ष॑ यन्न दीर्यते । “निश्चय ही मेरा यह हृदय अत्यन्त सुदृढ़ एवं वज़्सारका बना हुआ है, तभी तो लाल नेत्रोंवाले महाबाहु अभिमन्युको न देखनेपर भी यह फट नहीं जाता है

قال سنجيا: «لا ريب أن قلبي قد صار شديد الصلابة—قاسيًا كالألماس—فلذلك لا ينفطر، مع أني لا أرى أبهيمانيو، ذلك البطل طويل الذراعين ذي العينين الحمراوين كالدّم. إن ثِقَل ما جرى في هذا الميدان كان ينبغي أن يحطّمني لمجرد غيابه عن بصري، ومع ذلك فقلبي ما يزال يصمد».

Verse 543

उपायान्तं रिपून्‌ हत्वा सोड्द्य मां कि न पश्यति । “जब मैं शत्रुओंको मारकर शिविरको लौटता था

قال سنجيا: «حين كنت أقتل الأعداء وأعود إلى المعسكر، كان هو الذي يتقدّم كل يوم بقلبٍ فرِح ليحيّيني—فلماذا لا ينظر إليّ ذلك أبهيمانيو اليوم؟»

Verse 553

शोभयन्‌ _मेदिनीं गात्रैरादित्य इव पातित: । “निश्चय ही शत्रुओंने उसे मार गिराया है और वह खूनसे लथपथ होकर धरतीपर पड़ा सो रहा है एवं आकाशसे नीचे गिराये हुए सूर्यकी भाँति वह अपने अंगोंसे इस भूमिकी शोभा बढ़ा रहा है

قال سنجيا: «إنه ملقىً ساقطًا كالشمس التي أُسقطت من السماء، يزيّن الأرض بأعضائه. لا شك أن الأعداء قد صرعوه؛ مغمورًا بالدم، يرقد على التراب كأنه نائم.»

Verse 563

रणे विनिहतं श्रुत्वा शोकार्ता वै विनड्क्ष्यति । “मुझे बारंबार सुभद्राके लिये शोक हो रहा है, जो युद्धसे मुँह न मोड़नेवाले अपने वीर पुत्रको रणभूमिमें मारा गया सुनकर शोकसे आतुर हो प्राण त्याग देगी

قال سنجيا: «إنني أتحسّر مرارًا على سوبهادرا. فإذا سمعت أن ابنها البطل—الذي لم يدر ظهره للقتال قط—قد قُتل في ساحة الحرب، فسوف تغمرها الأحزان، وتذبل لا محالة، وربما ألقت بنفسها إلى الموت.»

Verse 573

द्रौपदी चैव दुःखातें ते च वक्ष्यामि कि नन्‍्वहम्‌ । अभिमन्युको न देखकर सुभद्रा मुझे क्या कहेगी? द्रौपदी भी मुझसे किस प्रकार वार्तालाप करेगी? इन दोनों दुःखकातर देवियोंको मैं क्या जवाब दूँगा?

قال سنجيا: «فماذا عساي أن أقول لتينك الملكتين، دروبدي وسوبهادرا، حين يطغى عليهما الحزن؟ إن لم يُرَ أبهيمانيو، فماذا ستقول لي سوبهادرا؟ وكيف ستطيق دروبدي أن تخاطبني؟ أيُّ جوابٍ أستطيع أن أقدّمه لهاتين السيدتين النبيلتين وقد صُرِعتا بالأسى؟»

Verse 583

सहस्रधा वधू दृष्टवा रुदतीं शोककर्शिताम्‌ | “निश्चय ही मेरा हृदय वज़्सारका बना हुआ है, जो शोकसे कातर हुई बहू उत्तराको रोती देखकर सहखसों टुकड़ोंमें विदीर्ण नहीं हो जाता?

قال سنجيا: «لا ريب أن قلبي قد صار صلبًا كالألماس؛ إذ إنني حين أرى العروس الفتية أوتّارا، منهكةً بالحزن وباكيةً، لا ينشطر قلبي إلى ألف قطعة.»

Verse 613

सिंहवन्नदथ प्रीता: शोककाल उपस्थिते । 'रणक्षेत्रमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका अपराध करके तुम्हारे लिये शोकका अवसर उपस्थित है, ऐसे समयमें तुमलोग प्रसन्न होकर सिंहनाद कैसे कर रहे हो?

قال سنجيا: «تزأرون كالأُسود فرحًا، مع أن زمن الحزن قد حضر. لقد ارتكبتم في ساحة القتال إساءةً إلى شري كريشنا وأرجونا، فجلبتم على أنفسكم مناسبةً للأسى—فكيف، في مثل هذا الوقت، تبتهجون وتطلقون زئيرًا كأسد؟»

Verse 623

अधर्मो हि कृतस्तीव्र: कथं स्यादफलश्रिरम्‌ । “तुम्हारे पापकर्मका फल तुम्हें शीघ्र ही प्राप्त होगा। तुमलोगोंने घोर पाप किया है। उसका फल मिलनेमें अधिक विलम्ब कैसे हो सकता है?

قال سنجيا: «لقد ارتُكِبَ أدهارما فادحٌ حقًّا—فكيف يمكن أن يبقى بلا عاقبة؟ إن ثمرة فعلتكم الآثمة ستأتيكم سريعًا؛ فقد اقترفتم شرًّا عظيمًا، فكيف يتأخر جزاؤه؟»

Verse 1536

सर्वेषां चैव योधानां सामग्रयं स्यान्ममाच्युत । “आज इन स्वजनोंको व्याकुल देखकर मेरे हृदयकी आशंका नहीं दूर होती है। दूसरोंको मान देनेवाले अच्युत श्रीकृष्ण! राजा द्रुपद

قال سنجيا: «يا أتشيوتا، ليت جموع محاربينا تبقى كاملةً سالمة. إنني إذ أرى هؤلاء الأقارب في اضطراب، لا يزول القلق من قلبي. يا كريشنا، يا من يكرم الآخرين، أَيَكون الملك دروبادا، وفيراطا، وسائر محاربيّ جميعًا بخيرٍ وسلام؟»

Verse 5936

युयुत्सुश्नापि कृष्णेन श्रुतो वीरानुपालभन्‌ | “मैंने घमंडमें भरे हुए धृतराष्ट्रपुत्रोंका सिंहनाद सुना है और श्रीकृष्णने यह भी सुना है कि युयुत्सु उन कौरववीरोंको इस प्रकार उपालम्भ दे रहा था

قال سنجيا: لقد سمع كريشنا أيضًا يويُتسو وهو يوبّخ المحاربين. فبعد أن سمع زئير أبناء دريتاراشترا، المتضخّمين بالكِبر، سمع كذلك يويُتسو وهو يقرّع أولئك الأبطال من الكورافا. وتكشف هذه اللحظة عن صدعٍ أخلاقي داخل معسكر الكورافا: صوتُ الضمير يتحدّى الغرور جهارًا، وسط اندفاعٍ يقود إلى الهلاك.

Frequently Asked Questions

The chapter stages a dharma-sankat between decisive action and ethical restraint: whether high-risk, high-impact tactics against a principal commander are justified when they intensify collateral chaos and accelerate irreversible suffering in a deteriorating moral environment.

Capability must be matched with discernment: valor alone is insufficient without support structures, timing, and proportional action; in complex systems, protection of allies and containment of escalation can be more dharmically sustainable than solitary pursuit of victory.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as narrative evidence within Saṃjaya’s reportage, contributing to the epic’s cumulative reflection on how action under pressure generates enduring moral and political residue.

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