
मांसपरिवर्जन-प्रशंसा (Praise of Abstention from Meat) / Ethics of Ahiṃsā in Diet and Rite
Upa-parva: Ahiṃsā–Māṃsa-tyāga Anuśāsana (Discourse on Non-injury and Abstention from Meat)
Yudhiṣṭhira raises an apparent contradiction: Bhīṣma repeatedly extols ahiṃsā as supreme dharma, yet earlier ritual descriptions (notably śrāddha) may include meat; he asks what fault attaches to eating meat, what merit to abstaining, and how agency is distributed among killer, buyer, and consumer. Bhīṣma responds by classifying meat-eating as ethically problematic due to the necessary injury behind it, praising abstention as conducive to longevity, health, strength, memory, fearlessness, social trust, and auspicious rebirth. He cites authoritative voices (Manu, Nārada, Bṛhaspati) and compares abstention to major sacrificial merit, framing it as a high vow that grants ‘abhaya’ (non-fear) to beings. The chapter articulates a supply-chain model of culpability—those who procure, authorize, sell, prepare, or consume are all implicated—and warns against ‘vṛthā-māṃsa’ (meat not sanctioned by proper rite). It also introduces a calibrated exception: where meat is ritually consecrated and textually regulated (prokṣita/abhyukṣita; havis in ancestral procedures), the fault is described as reduced compared to unsanctioned consumption. The discourse concludes by recommending abstention—especially during specified seasonal periods (e.g., kaumuda/śārada observances)—and by presenting abstention as an exemplary dharma aligned with ahiṃsā, social welfare, and higher worlds.
Chapter Arc: युधिष्ठिर का प्रश्न धर्म की जड़ पर चोट करता है—जो मनुष्य अधर्मवश पापकर्म कर बैठता है, वह फिर शुभगति कैसे पाए? क्या कोई ऐसा उपाय है जो पाप के भार को हल्का कर दे? → बृहस्पति उत्तर देते हैं कि पाप का मूल केवल कर्म नहीं, विकृत मनोवृत्ति भी है—अधर्मवश किया गया कर्म मन को उलटा कर नरकगति की ओर ढकेलता है। तब वे शुद्धि का मार्ग खोलते हैं: न्याय से उपार्जित अन्न का दान, विशेषतः स्वाध्याय-निरत द्विजों को, प्रसन्न अंतःकरण से। → अन्नदान की ‘विशेष महिमा’ का निर्णायक प्रतिपादन—वर्णानुसार न्यायोपार्जित अन्न का दान पाप-क्षय का सशक्त साधन है: वैश्य खेती से उपार्जित अन्न में राजभाग देकर शेष का दान करे तो पाप से छूटता है; शूद्र कठोर परिश्रम से कमाकर द्विजों को अन्न दे तो पाप से मुक्त होता है; और हर अवस्था में न्याय से कमाया अन्न पात्र में नित्य देना ‘परमा गति’ कहा गया। → बृहस्पति समग्र फल बताकर निष्कर्ष देते हैं—अन्नदान सब धर्मों और दानों का मूल है; यह लोक-परलोक दोनों में कल्याणकारी है और पाप-प्रायश्चित्त का श्रेष्ठ उपाय है, बशर्ते उपार्जन न्यायपूर्ण हो और दान श्रद्धा-प्रसन्नता से हो।
Verse 1
ऑपन-माज (_) अऑपि-्छऋाय द्ादर्शाधिकशततमो< ध्याय: पापसे छूटनेके उपाय तथा अन्नदानकी विशेष महिमा युधिछ्िर उवाच अधर्मस्य गतिर्त्रह्मयम् कथिता मे त्वयानघ । धर्मस्य तु गतिं श्रोतुमिच्छामि वदतां वर
قال يودهيشثيرا: «أيها البرهمن، لقد بيّنتَ لي مسار الأدهارما (adharma) وعاقبتها. أيها الطاهر—يا خيرَ المتكلمين—إني أرغب الآن أن أسمع مسار الدهارما (dharma) أيضًا.»
Verse 2
कृत्वा कर्माणि पापानि कथं यान्ति शुभां गतिम् । कर्मणा च कृतेनेह केन यान्ति शुभां गतिम्,मनुष्य पाप कर्म करके कैसे शुभगतिको प्राप्त होते हैं तथा किस कर्मके अनुष्ठानसे उन्हें उत्तम गति प्राप्त होती है?
قال يودهيشثيرا: «إذا ارتكب الناس أعمالًا آثمة، فكيف يبلغون مصيرًا محمودًا؟ وفي هذا العالم، بأيّ نوعٍ من العمل—إذا أُقيم وأُنجز—يبلغون مصيرًا مباركًا؟»
Verse 3
ब॒हस्पतिर्वाच कृत्वा पापानि कर्माणि अधर्मवशमागत: । मनसा विपरीतेन निरयं प्रतिपद्यते
قال بْرِهَسْبَتِي: «إذا ارتكب المرء أعمالًا آثمة ووقع تحت سلطان الأدهرما (اللا-دارما)، انصرف ذهنه إلى طريقٍ مناقضٍ للدارما؛ ولذلك يهوي إلى الجحيم».
Verse 4
मोहादधर्म यः कृत्वा पुन: समनुतप्यते । मन:समाधिसंयुक्तो न स सेवेत दुष्कृतम्
قال يودهيشثيرا: «إنْ ارتكب المرء، بدافع الوهم، فعلًا غيرَ بارّ ثم أحسّ بعد ذلك بندمٍ صادق، واقترن ذهنه بالثبات واستحضار القلب، فلا ينبغي له أن يواصل الاسترسال في الإثم».
Verse 5
परंतु जो अज्ञानवश अधर्म बन जानेपर पुनः उसके लिये पश्चात्ताप करता है, उसे चाहिये कि मनको वशमें रखकर वह फिर कभी पापका सेवन न करे ।।
قال يودهيشثيرا: «ولكن إنْ سقط المرء، بسبب الجهل، في سلوكٍ غيرِ بارّ ثم ندم عليه بعد ذلك، فعليه أن يُخضع ذهنه وألا يعود قطّ إلى معاقرة الخطيئة. فكلما ازداد الذهنُ تقبيحًا لفعله الشرير، ازداد الجسد—بل الإنسان نفسه—تحررًا من القيود التي صنعها ذلك اللا-برّ.»
Verse 6
यदि व्याहरते राजन् विप्राणां धर्मवादिनाम् | ततोअधर्मकृतात् क्षिप्रमपवादात् प्रमुच्यते
قال يودهيشثيرا: «أيها الملك، إذا جاهر الرجل الآثم بخطيئته أمام البراهمة الناطقين بالدارما، تحرر سريعًا من اللوم والعار اللذين ينشآن عن ذلك الفعل غير البارّ.»
Verse 7
यथा यथा नर: सम्यगधर्ममनुभाषते । समाहितेन मनसा विमुच्येत तथा तथा । भुजंग इव निर्मोकात् पूर्वमुक्ताज्जरान्वितात्
قال يودهيشثيرا: «بقدر ما ينطق المرء بالدارما نطقًا صحيحًا—وهو ذو ذهنٍ ثابتٍ مجموع—بذلك القدر يتحرر. وكما تنفلت الحيّة من جلدها المطروح، البالي مع الزمن، كذلك يرخّي المرء القيود التي تلتصق به.»
Verse 8
दत्त्वा विप्रस्थ दानानि विविधानि समाहित: । मन:समाधिसंयुक्त: सुगतिं प्रतिपद्यते,मनुष्य एकाग्रचित्त होकर सावधान हो ब्राह्मणको यदि नाना प्रकारके दान करे तो वह उत्तम गतिको पाता है
قال يودهيشثيرا: «مَن قدّم إلى براهمنٍ عطايا شتّى، وهو جامعُ القلب ثابتُ الانتباه—موصولٌ بتركيزٍ باطني—نالَ سُغَتِي، أي المصيرَ الأسمى والغايةَ الفضلى.»
Verse 9
प्रदानानि तु वक्ष्यामि यानि दत्त्वा युधिष्ठिर । नर: कृत्वाप्यकार्याणि ततो धर्मेण युज्यते
«سأصف الآن، يا يودهيشثيرا، أعمالَ العطاء التي إذا أُدّيت—فإن المرءَ، وإن كان قد ارتكب ما لا ينبغي ارتكابه—عاد بعد ذلك ليلتحم بالدارما من جديد.»
Verse 10
युधिष्ठिर! अब मैं उन उत्कृष्ट दानोंका वर्णन करूँगा, जिन्हें देकर मनुष्य यदि उससे न करने योग्य कर्म बन जाय॑ँ तो भी धर्मके फलसे संयुक्त होता है ।।
«يا يودهيشثيرا، سأصف الآن تلك العطايا الرفيعة: فبإيتائها يرتبط المرء بثمرات الدارما، وإن سقط بعد ذلك في أفعالٍ لا ينبغي فعلها. وبين جميع العطايا يُعلَن أن عطية الطعام هي الأفضل؛ لذلك فمَن يبتغي الدارما بصدقٍ فليبدأ بإطعام الناس، بنيةٍ مستقيمةٍ لا التواء فيها.»
Verse 11
प्राणा हुन्न॑ मनुष्याणां तस्माज्जन्तुश्व॒ जायते । अन्ने प्रतिेष्ठितो लोकस्तस्मादन्न॑ प्रशस्थते
«إن الطعام هو حقًّا نَفَسُ الحياة للناس؛ ومنه تولد الكائنات. وعلى الطعام يقوم العالم ويستقرّ؛ لذلك يُحمد الطعام ويُثنى عليه بوصفه الأجدر.»
Verse 12
अन्न मनुष्योंका प्राण है, अन्नसे ही प्राणीका जन्म होता है, अन्नके ही आधारपर सारा संसार टिका हुआ है। इसलिये अन्न सबसे उत्तम माना गया है ।।
يُعلن يودهيشثيرا أن الطعام هو حياة البشر نفسها: فمن الطعام تولد الكائنات، وعلى الطعام يستند العالم بأسره. لذلك يُعَدّ الطعام أسمى العطايا. فالآلهة، والريشيون، والأسلاف، والبشر جميعًا يثنون على الطعام؛ إذ بصدقة الطعام بلغ الملك رانتيديفا السماء—دليلًا على أن إسناد الآخرين بالقوت من أرفع صور الدارما.
Verse 13
न्यायलब्धं प्रदातव्यं द्विजातिभ्योन्नमुत्तमम् स्वाध्यायं समुपेते भ्य: प्रह्ष्टेनान्तरात्मना
قال يودهيشثيرا: ينبغي للمرء أن يتصدّق—من مالٍ اكتُسب بوسائل عادلة—بأطيب الطعام للـ«ثنائيّي الميلاد» (دڤيجا)، ولا سيما للمنصرفين إلى السڤادهيايا، أي الدراسة المقدّسة وتلاوة النصوص. وليكن العطاء بقلبٍ مسرور في باطنه، طوعًا وبإجلال. إن الصدقة لا تصير دارمية حقًّا إلا إذا طَهُر مصدرها (كسبٌ مستقيم) وطَهُرت نيتها (عطاءٌ بفرحٍ واحترام)، وكانت عونًا لمن يلازمون العلم والانضباط الروحي.
Verse 14
यस्य ह्ाान्नमुपाश्नन्ति ब्राह्मणानां शतं दश । हृष्टेन मनसा दत्तं न स तिर्यग्गतिर्भवेत्,जिस पुरुषके प्रसन्न चित्तसे दिये हुए अन्नको एक हजार ब्राह्मण खा लेते हैं, वह पशु- पक्षीकी योनिमें नहीं जन्म लेता
قال يودهيشثيرا: «إذا قدّم رجلٌ صدقة الطعام بقلبٍ فرِح، واشترك في أكلها ولو مئةٌ وعشرةٌ من البراهمة، فإنه لا يسقط إلى ولادةٍ في هيئة حيوانٍ أو طائر. فالعطاء بطيب النفس يثمر ثوابًا يحمي صاحبه من الهبوط إلى الأرحام الدنيئة».
Verse 15
ब्राह्मणानां सहस्राणि दश भोज्य नरर्षभ | नरो<थधर्मात् प्रमुच्येत योगेष्वभिरत: सदा
قال يودهيشثيرا: «يا ثورَ الرجال، إن أطعم امرؤٌ عشرةَ آلافٍ من البراهمة، وبقي دائمًا مواظبًا على رياضات اليوغا، تحرّر—بواسطة الدارما—من قيود الإثم».
Verse 16
भैक्ष्येणान्नं समाहृत्य विप्रो वेदपुरस्कृत: । स्वाध्यायनिरते विप्रे दत््तेह सुखमेधते,वेदज्ञ ब्राह्मण भिक्षासे अन्न लाकर यदि स्वाध्याय-परायण विप्रको दान देता है तो इस लोकमें सुखी होता है
قال يودهيشثيرا: «إذا كان براهميٌّ يجعل الڤيدا في المقدّمة هاديًا له، فيجمع طعامه بالاستعطاء، ثم يهب ذلك الطعام لبراهميٍّ آخر مواظبٍ على دراسة الڤيدا، فإنه يزدهر سعادةً في هذا العالم».
Verse 17
(भैक्ष्येणापि समाहृत्य दद्यादन्नं द्विजेषु वै । सुवर्णदानात् पापानि नश्यन्ति सुबहून्यपि ।।
قال يودهيشثيرا: «حتى إن جمع المرء طعامه بالاستعطاء، فعليه أن يهب الطعام للثنائيّي الميلاد؛ وبإهداء الذهب تُمحى أيضًا خطايا كثيرة. وبالتبرع بأرضٍ تُقيم المعاش يُعتَق المرء حتى من الجُرم العظيم؛ وبترتيل البورانات يتحرر البراهمي من الآثام. وبجَپِ الغاياتري مئةَ ألف مرة، وبإشباع ألف بقرة، وبإفهام معنى الڤيدا على وجهه الصحيح لبراهمةٍ أطهار، بل وبأعمالٍ كالتخلي التام، يبرأ الثنائيّ الميلاد من الخطيئة. غير أن أعلى الدارما هو إكرام الضيف لكل أحد؛ لذلك ذُكر الطعام على أنه العطية العظمى. وأما الكشاتريا الذي لا يعتدي على مال البراهمة، ويحمي رعيته بالعدل، ثم يقدّم لبراهمةٍ عارفين بالڤيدا طعامًا ناله ببأسه—بقلبٍ طاهرٍ وعقلٍ مجموع—يا ابنَ پانڈو البارّ، فإنه يُفني خطاياه السالفة بقوة تلك الصدقة من الطعام.»
Verse 18
द्विजेभ्यो वेदवृद्धेभ्य: प्रयतः सुसमाहित: । तेनापोहति धर्मात्मन् दुष्कृतं कर्म पाण्डव
قال يودهيشثيرا: «يا ذا البرّ، يا ابن باندو! إنّ الرجل المنضبط، الجامع لقلبه، إذا قدّم طعامًا اكتسبه بقوة ذراعيه إلى البراهمة العلماء، الشيوخ الراسخين في معرفة الفيدا، فإنّه بذلك يمحو أعماله السيئة. فالعطاء القائم على العدل وحماية الرعية لا على السلب والنهب يصير وسيلةً للتطهير الخُلقي.»
Verse 19
षड्भागपरिशुद्धं च कृषेर्भागमुपार्जितम् । वैश्यो ददद् द्विजातिभ्य: पापेभ्य: परिमुच्यते
قال يودهيشثيرا: «الفيشيا الذي يكتسب رزقه بالزراعة، يؤدّي أولًا حقّ الملك وهو السدس، ثمّ من الباقي يتصدّق بحبٍّ طاهر—مكتسَبٍ على وجهٍ مشروع—للـ“ثنائيّي الميلاد”، فيتحرّر من الآثام. فالبيت يَعرض الضريبة العادلة والصدقة النقيّة اقتصادًا قائمًا على الدارما يطهّر حياة ربّ الأسرة.»
Verse 20
अवाप्य प्राणसंदेहं कार्कश्येन समार्जितम् । अन्न दत्त्वा द्विजातिभ्य: शूद्र: पापात् प्रमुच्यते
قال يودهيشثيرا: «حتى إن كان قد كسبه بخشونة الكدّ، وقد تعلّقَت حياته بالخطر، فإذا أعطى الشودرَ ذلك الطعام صدقةً للـ“ثنائيّي الميلاد” تحرّر من الخطيئة. يبرز هذا البيت قوّة السخاء المُضحّي في التطهير، وثِقَلَ المعنى الأخلاقي للعطاء من رزقٍ شُقَّ عليه.»
Verse 21
औरसेन बलेनान्नमर्जयित्वाविहिंसक: । यः प्रयच्छति विप्रेभ्यो न स दुर्गाणि पश्यति,जो किसी प्राणीकी हिंसा न करके अपनी छातीके बलसे पैदा किया हुआ अन्न विप्रोंको दान करता है, वह कभी संकटका अनुभव नहीं करता
قال يودهيشثيرا: «من غير أن يؤذي كائنًا حيًّا، يكتسب طعامه بقوة جسده، ثمّ يتصدّق به على البراهمة؛ فمثل هذا لا يرى الشدائد ولا يلقى الكروب.»
Verse 22
न्यायेनैवाप्तमन्नं तु नरो हर्षसमन्वित: । द्विजेभ्यो वेदवृद्धेभ्यो दत्त्वा पापात् प्रमुच्यते
قال يودهيشثيرا: «من نال طعامه بالحقّ، ثمّ أعطاه بفرحٍ صدقةً للـ“ثنائيّي الميلاد”—من البراهمة الراسخين في معرفة الفيدا—تحرّر من قيود الإثم. يبيّن هذا البيت أنّ الصدقة لا تؤتي أثرها الأخلاقي إلا إذا استقام طريق الكسب واستقام معه قلب العطاء على الدارما.»
Verse 23
अन्नमूर्जस्करं लोके दत्त्वोर्जस्वी भवेन्नर: । सतां पन्थानमावृत्य सर्वपापै: प्रमुच्यते
قال يودهيشثيرا: «في هذا العالم، الطعام هو الذي يُنشئ القوة ويزيدها. لذلك، من تصدّق بالطعام صار قويًّا مفعمًا بالنشاط؛ ومن احتمى بطريق الأخيار تحرّر من جميع الآثام».
Verse 24
दानवदूभि: कृत: पन्था येन यान्ति मनीषिण: । ते हि प्राणस्य दातारस्तेभ्यो धर्म: सनातन:
«الطريق الذي شقّه أهل العطاء هو بعينه الطريق الذي يسلكه الحكماء. فإن مُعطي الطعام هم في الحقيقة مُعطو الحياة؛ وبهم يزدهر الدَّرما الأزلي.»
Verse 25
सर्वावस्थ॑ मनुष्येण न्यायेनान्नमुपार्जितम् । कार्य पात्रागतं नित्यमन्नं हि परमा गति:
قال يودهيشثيرا: «في كل حال من أحوال الحياة، ينبغي للمرء أن يكتسب الطعام بوسائل مستقيمة، وأن يقدّمه دائمًا لمن يستحقه. فإن الطعام حقًّا هو أعظم سندٍ وملجأٍ للكائنات الحيّة.»
Verse 26
अन्नस्य हि प्रदानेन नरो रौद्रं न सेवते । तस्मादन्नं प्रदातव्यमन्यायपरिवर्जितम्,अन्न-दान करनेसे मनुष्यको कभी नरककी भयंकर यातना नहीं भोगनी पड़ती; अतः न्यायोपार्जित अन्नका ही सदा दान करना चाहिये
قال يودهيشثيرا: «بإعطاء الطعام لا يقع المرء في الحال الرهيبة من العذاب. لذلك ينبغي أن يُتصدَّق بالطعام—طعامٍ منزَّهٍ عن الظلم، أي مُكتسَبٍ بوسائل مستقيمة.»
Verse 27
यतेद् ब्राह्मणपूर्व हि भोक्तुमन्नं गृही सदा । अवन्ध्यं दिवसं कुर्यादन्नदानेन मानव:
قال يودهيشثيرا: «ينبغي لربّ البيت أن يجتهد دائمًا ألا يأكل حتى يُطعم أولًا برهمنًا. وبصدقة الطعام يجعل كل يوم مثمرًا غير ضائع.»
Verse 28
भोजयित्वा दशशतं नरो वेदविदां नृप । न्यायविद्धर्मविदुषामितिहासविदां तथा
قال يودهيشثيرا: «أيها الملك، إنّ الرجل الذي يُطعم ألفًا من البراهمة—ممن أحكموا الفيدا، وبرعوا في النيايا (الاستدلال والعدل)، وتفقّهوا في الدارما، وعرفوا التواريخ الموروثة والسنن المقدّسة—لا يهوي في الجحيم الرهيب، ولا يعود أسيرًا لدورة التقلّب في الدنيا. في هذه الحياة تُقضى مقاصده، وبعد الموت ينعم بالسعادة في العالم الآخر.»
Verse 29
न याति नरकं घोरें संसारांश्व न सेवते । सर्वकामसमायुक्तः प्रेत्य चाप्यश्नुते सुखम्
قال يودهيشثيرا: «أيها الملك، من يُطعم ألفًا من البراهمة العارفين بالفيدا وبالنيايا وبالدارما وبالتواريخ الموروثة، لا يذهب إلى الجحيم الرهيب، ولا يظل مقيّدًا بدورة التقلّب في الدنيا. في هذه الحياة تُستوفى رغباته، وبعد الموت ينعم بالسعادة في العالم الآخر».
Verse 30
एवं खलु समायुक्तो रमते विगतज्वरः । रूपवान् कीर्तिमांश्वैव धनवांश्वोपपद्यते,इस प्रकार अन्न-दानमें संलग्न हुआ पुरुष निश्चिन्त हो सुखका अनुभव करता है और रूपवान, कीर्तिमान् तथा धनवान होता है
قال يودهيشثيرا: «حقًّا، من انخرط على هذا الوجه القويم (في رياضة العطاء، ولا سيما عطاء الطعام) عاش مسرورًا، منزّهًا عن القلق والكدر؛ ويؤول كذلك إلى نيل الحُسن، وحسن الذكر، والغنى».
Verse 31
एतत् ते सर्वमाख्यातमन्नदानफलं महत् । मूलमेतत् तु धर्माणां प्रदानानां च भारत,भारत! अन्न-दान सब प्रकारके धर्मों और दानोंका मूल है। इस प्रकार मैंने तुम्हें यह अन्नदानका सारा महान् फल बताया है
«لقد أخبرتك الآن على التمام بالثمرة العظيمة التي تنشأ من عطاء الطعام. يا بهاراتا، إنّ هذا هو حقًّا أصلُ جميع صور الدارما وكلِّ صنوف الصدقة: فهبةُ الطعام هي الأساس الذي تقوم عليه الحياةُ القويمةُ والسخاء.»
Verse 111
इस प्रकार श्रीमह्ा भारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्र नामक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ
وهكذا، في «الشري مهابهاراتا»، ضمن «أنوشاسانا بارفا»—وخاصةً في قسم «دانا-دارما بارفا» (دارما العطاء)—يُختَتم الفصل الحادي عشر بعد المئة، المعنون «سَمْسارا-تشاكرا» («عجلة الوجود الدنيوي»).
Verse 112
इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि संसारचक्रे दादशाधिकशततमो<ध्याय:
وهكذا تنتهي الفصلُ الثاني بعد المئة، المعنون «عجلة السَّمْسارا»، في قسم دَانا-دهرما (شريعة العطاء) من «أنوشاسانا بارفا» ضمن المهابهارتا المقدّسة. ويؤطّر هذا الخاتمُ (الكولوفون) التعاليمَ بوصفها جزءًا من إرشاد بهيشما الأخلاقي في الصدقة وحسن السلوك، مؤكّدًا الطبيعة الدائرية للوجود الدنيوي التي يسعى الدهرما إلى تجاوزها.
The dilemma is the perceived conflict between the maxim ‘ahiṃsā paramo dharmaḥ’ and ritual/śrāddha precedents that can involve meat—prompting the question of when, if ever, consumption can be ethically consistent with dharma.
Ahiṃsā is treated as a primary ethical standard, and abstention from meat is praised as a high vow that protects beings; moral responsibility is distributed across all enabling roles, not only the direct act of killing.
Yes: the chapter repeatedly attributes tangible and transcendent outcomes to abstention—health, longevity, reputation, fearlessness, auspicious rebirth, and higher worlds—presenting meat-abstinence as comparable in merit to major ritual accomplishments.
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