
अध्याय ४ — दुर्योधनस्य असंधि-निश्चयः (Duryodhana’s Refusal of Reconciliation)
Upa-parva: Duryodhana–Gautama–Kṛpa Saṃvāda (Counsel on Saṃdhi vs. Suyuddha)
Saṃjaya reports that, after Gautama’s counsel, Duryodhana pauses in heated silence and then addresses Kṛpa. He acknowledges the advice as affectionate and beneficial in form, yet states it is psychologically and politically unacceptable. He argues that the Pāṇḍavas cannot trust him after the loss of their kingdom through dice, and that Kṛṣṇa, committed to Pārtha welfare and affronted by prior insult, would not endorse Duryodhana’s proposals. He enumerates enduring injuries: Draupadī’s public distress, Abhimanyu’s death, and the settled vows of Bhīma, the twins, Dhṛṣṭadyumna, and Śikhaṇḍin—making de-escalation infeasible. Duryodhana then advances a kṣatriya-ethical rationale: unstable worldly happiness, the pursuit of kīrti through battle, and the disrepute of dying at home. He frames battlefield death as a sanctioned path associated with heroic precedent and celestial reward, notes the ‘debt’ owed to fallen allies, and concludes that only a decisive engagement can answer his situation. The assembled kṣatriyas approve, regain morale, and the Kauravas relocate and ritually refresh near the Sarasvatī, preparing to continue operations.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को रणभूमि का भयावह दृश्य सुनाते हैं—महात्माओं के टूटे रथ, गिरे हुए अश्व, और हाथियों की लाशों से भरा वह युद्ध-स्थल, मानो रुद्र का क्रीड़ांगन हो। → कौरव-सेना के विमुख होने और मनोबल टूटने पर कृपाचार्य दुर्योधन के पास आते हैं; वे अर्जुन को ‘चार-दाँत वाले गजराज’ की तरह सेना में घुसते देखे जाने का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि ध्वजिनी का नेतृत्व नष्ट-सा हो गया है—ऐसी दशा में युद्ध का आग्रह आत्मघात है। → कृपाचार्य बृहस्पति-नीति का निर्णायक सूत्र रखते हैं—जब अपना बल घट रहा हो या सम हो, तब संधि खोजनी चाहिए; बढ़ते शत्रु से विग्रह नहीं, नीति यही है। वे दुर्योधन को स्पष्ट कहते हैं कि संधि ही क्षेम है, और यह उपदेश कायरता या प्राण-रक्षा के लोभ से नहीं, हित-बुद्धि से है। → कृपाचार्य यह भी जोड़ते हैं कि यदि श्रीकृष्ण युधिष्ठिर, अर्जुन और भीमसेन से जो कहेंगे, वे अवश्य मानेंगे—अर्थात संधि का द्वार अभी खुला है; दुर्योधन को समय रहते पहल करनी चाहिए। → दुर्योधन इस कठोर, हितकारी सलाह को स्वीकार करेगा या अपनी प्रतिज्ञा और अहंकार के वशीभूत होकर युद्ध को ही चुन लेगा—यही अनिश्चितता अगले प्रसंग की ओर धकेलती है।
Verse 1
नआऔका-<> 7 जल चतुथों5 ध्याय: कृपाचार्यका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना संजय उवाच पतितान् रथनीडांश्व रथांश्वापि महात्मनाम् रणे च निहतान् नागान् दृष्टवा पत्तींश्ष मारिष,संजय कहते हैं--माननीय नरेश! उस समय रणभूमिमें महामनस्वी वीरोंके रथ और उनकी बैठकें टूटी पड़ी थीं। सवारोंसहित हाथी और पैदल सैनिक मार डाले गये थे। वह युद्धस्थल रुद्रदेवकी क्रीडाभूमि श्मशानके समान अत्यन्त भयानक जान पड़ता था और वहाँ लाखों नरेशोंका नामोनिशान मिट गया था। यह सब देखकर जब आपके पुत्र दुर्योधनका मन शोकमें डूब गया और उसने युद्धसे मुँह मोड़ लिया, कुन्तीपुत्र अर्जुनका पराक्रम देखकर समस्त सेनाएँ जब भयसे अत्यन्त व्याकुल हो उठीं और भारी दु:खमें पड़कर चिन्तामग्न हो गयीं, उस समय मथे जाते हुए सैनिकोंका जोर-जोरसे आर्तनाद सुनकर तथा राजाओंके चिह्नस्वरूप ध्वज आदिको युद्धस्थलमें क्षत-विक्षत हुआ देखकर प्रौढ़ अवस्था और उत्तम स्वभावसे युक्त तेजस्वी कृपाचार्यके मनमें बड़ी दया आयी। भरतवंशी नरेश! वे बातचीत करनेमें अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने राजा दुर्योधनके निकट जाकर उसकी दीनता देखकर इस प्रकार कहा--
三阇耶说道:“大王啊,当时他在战场上看见大心之勇士们的战车与车台倾覆破碎,又看见象兵连同骑者、以及步卒尽皆战死;那处景象骇人,宛如火葬场,仿佛是鲁陀罗的游乐之地。目睹此等毁灭,你的儿子难敌(Duryodhana)心沉哀恸,转而厌战;而诸军因昆蒂之子阿周那的神威而惊惧震荡、忧惶不安之时,克利波(Kṛpa)——年高德厚、性情高贵、善于谋议——被怜悯所动,走近沮丧的难敌,开始对他说话。”
Verse 2
आयोधन चातिघोरें रुद्रस्याक्रीड संनिभम् । अप्रख्यातिं गतानां तु राज्ञां शतसहस्रश:,संजय कहते हैं--माननीय नरेश! उस समय रणभूमिमें महामनस्वी वीरोंके रथ और उनकी बैठकें टूटी पड़ी थीं। सवारोंसहित हाथी और पैदल सैनिक मार डाले गये थे। वह युद्धस्थल रुद्रदेवकी क्रीडाभूमि श्मशानके समान अत्यन्त भयानक जान पड़ता था और वहाँ लाखों नरेशोंका नामोनिशान मिट गया था। यह सब देखकर जब आपके पुत्र दुर्योधनका मन शोकमें डूब गया और उसने युद्धसे मुँह मोड़ लिया, कुन्तीपुत्र अर्जुनका पराक्रम देखकर समस्त सेनाएँ जब भयसे अत्यन्त व्याकुल हो उठीं और भारी दु:खमें पड़कर चिन्तामग्न हो गयीं, उस समय मथे जाते हुए सैनिकोंका जोर-जोरसे आर्तनाद सुनकर तथा राजाओंके चिह्नस्वरूप ध्वज आदिको युद्धस्थलमें क्षत-विक्षत हुआ देखकर प्रौढ़ अवस्था और उत्तम स्वभावसे युक्त तेजस्वी कृपाचार्यके मनमें बड़ी दया आयी। भरतवंशी नरेश! वे बातचीत करनेमें अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने राजा दुर्योधनके निकट जाकर उसकी दीनता देखकर इस प्रकार कहा--
三阇耶说道:“大王啊,那战场已变得极其可怖,宛如鲁陀罗(湿婆)在其凶猛相中的游乐之地。其间,成百上千的诸王尽归湮没——名声与踪迹都在战争的残毁中被抹去。”
Verse 3
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वमें कौरवसेनाका पलायनविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ,विमुखे तव पुत्रे तु शोकोपहतचेतसि । भृशोदिग्नेषु सैन्येषु दृष्टवा पार्थस्य विक्रमम् संजय कहते हैं--माननीय नरेश! उस समय रणभूमिमें महामनस्वी वीरोंके रथ और उनकी बैठकें टूटी पड़ी थीं। सवारोंसहित हाथी और पैदल सैनिक मार डाले गये थे। वह युद्धस्थल रुद्रदेवकी क्रीडाभूमि श्मशानके समान अत्यन्त भयानक जान पड़ता था और वहाँ लाखों नरेशोंका नामोनिशान मिट गया था। यह सब देखकर जब आपके पुत्र दुर्योधनका मन शोकमें डूब गया और उसने युद्धसे मुँह मोड़ लिया, कुन्तीपुत्र अर्जुनका पराक्रम देखकर समस्त सेनाएँ जब भयसे अत्यन्त व्याकुल हो उठीं और भारी दु:खमें पड़कर चिन्तामग्न हो गयीं, उस समय मथे जाते हुए सैनिकोंका जोर-जोरसे आर्तनाद सुनकर तथा राजाओंके चिह्नस्वरूप ध्वज आदिको युद्धस्थलमें क्षत-विक्षत हुआ देखकर प्रौढ़ अवस्था और उत्तम स्वभावसे युक्त तेजस्वी कृपाचार्यके मनमें बड़ी दया आयी। भरतवंशी नरेश! वे बातचीत करनेमें अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने राजा दुर्योधनके निकट जाकर उसकी दीनता देखकर इस प्रकार कहा--
三阇耶说道:“当你的儿子背离战斗,心神为悲痛所压;当诸军目睹帕尔塔(阿周那)的威势而因恐惧剧烈动摇之时,战场局势便转向绝望与紊乱——为劝诫那受震撼的君王、并在大祸之中重思职责之道铺陈了前奏。”
Verse 4
ध्यायमानेषु सैन्येषु दुःखं प्राप्तेषु भारत । बलानां मथ्यमानानां श्रुत्वा निनदमुत्तमम्,संजय कहते हैं--माननीय नरेश! उस समय रणभूमिमें महामनस्वी वीरोंके रथ और उनकी बैठकें टूटी पड़ी थीं। सवारोंसहित हाथी और पैदल सैनिक मार डाले गये थे। वह युद्धस्थल रुद्रदेवकी क्रीडाभूमि श्मशानके समान अत्यन्त भयानक जान पड़ता था और वहाँ लाखों नरेशोंका नामोनिशान मिट गया था। यह सब देखकर जब आपके पुत्र दुर्योधनका मन शोकमें डूब गया और उसने युद्धसे मुँह मोड़ लिया, कुन्तीपुत्र अर्जुनका पराक्रम देखकर समस्त सेनाएँ जब भयसे अत्यन्त व्याकुल हो उठीं और भारी दु:खमें पड़कर चिन्तामग्न हो गयीं, उस समय मथे जाते हुए सैनिकोंका जोर-जोरसे आर्तनाद सुनकर तथा राजाओंके चिह्नस्वरूप ध्वज आदिको युद्धस्थलमें क्षत-विक्षत हुआ देखकर प्रौढ़ अवस्था और उत्तम स्वभावसे युक्त तेजस्वी कृपाचार्यके मनमें बड़ी दया आयी। भरतवंशी नरेश! वे बातचीत करनेमें अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने राजा दुर्योधनके निकट जाकर उसकी दीनता देखकर इस प्रकार कहा-- इति श्रीमहा भारते शल्यपर्वणि कृपवाक्ये चतुर्थो5ध्याय:
三阇耶说道:“婆罗多啊(持国王),当诸军沉入忧惧的思虑而陷于苦难;当众力在战阵的挤压中被搅动、被碾碎;当那汹涌混乱之中腾起震天的喧嚣与哀号——”
Verse 5
अभिन्ञानं नरेन्द्राणां विक्षतं प्रेक्ष्य संयुगे । कृपाविष्ट: कृपो राजन् वयःशीलसमन्वित:,संजय कहते हैं--माननीय नरेश! उस समय रणभूमिमें महामनस्वी वीरोंके रथ और उनकी बैठकें टूटी पड़ी थीं। सवारोंसहित हाथी और पैदल सैनिक मार डाले गये थे। वह युद्धस्थल रुद्रदेवकी क्रीडाभूमि श्मशानके समान अत्यन्त भयानक जान पड़ता था और वहाँ लाखों नरेशोंका नामोनिशान मिट गया था। यह सब देखकर जब आपके पुत्र दुर्योधनका मन शोकमें डूब गया और उसने युद्धसे मुँह मोड़ लिया, कुन्तीपुत्र अर्जुनका पराक्रम देखकर समस्त सेनाएँ जब भयसे अत्यन्त व्याकुल हो उठीं और भारी दु:खमें पड़कर चिन्तामग्न हो गयीं, उस समय मथे जाते हुए सैनिकोंका जोर-जोरसे आर्तनाद सुनकर तथा राजाओंके चिह्नस्वरूप ध्वज आदिको युद्धस्थलमें क्षत-विक्षत हुआ देखकर प्रौढ़ अवस्था और उत्तम स्वभावसे युक्त तेजस्वी कृपाचार्यके मनमें बड़ी दया आयी। भरतवंशी नरेश! वे बातचीत करनेमें अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने राजा दुर्योधनके निकट जाकर उसकी दीनता देखकर इस प्रकार कहा--
三阇耶说道:“大王啊,战阵之中,王者的徽记——旌旗与王权的标识——在兵刃交击间被撕裂粉碎;具备成熟年岁与高贵品行的克利帕(Kṛpa)因此为悲悯所动。君王象征的倾覆与战士的苦痛唤起他的人心,预示着将有劝言,用以扶正那被哀伤与恐惧摇撼的意志。”
Verse 6
अब्रवीत् तत्र तेजस्वी सोडभिसृत्य जनाधिपम् । दुर्योधनं मन्युवशाद् वाक््यं वाक्यविशारद:,संजय कहते हैं--माननीय नरेश! उस समय रणभूमिमें महामनस्वी वीरोंके रथ और उनकी बैठकें टूटी पड़ी थीं। सवारोंसहित हाथी और पैदल सैनिक मार डाले गये थे। वह युद्धस्थल रुद्रदेवकी क्रीडाभूमि श्मशानके समान अत्यन्त भयानक जान पड़ता था और वहाँ लाखों नरेशोंका नामोनिशान मिट गया था। यह सब देखकर जब आपके पुत्र दुर्योधनका मन शोकमें डूब गया और उसने युद्धसे मुँह मोड़ लिया, कुन्तीपुत्र अर्जुनका पराक्रम देखकर समस्त सेनाएँ जब भयसे अत्यन्त व्याकुल हो उठीं और भारी दु:खमें पड़कर चिन्तामग्न हो गयीं, उस समय मथे जाते हुए सैनिकोंका जोर-जोरसे आर्तनाद सुनकर तथा राजाओंके चिह्नस्वरूप ध्वज आदिको युद्धस्थलमें क्षत-विक्षत हुआ देखकर प्रौढ़ अवस्था और उत्तम स्वभावसे युक्त तेजस्वी कृपाचार्यके मनमें बड़ी दया आयी। भरतवंशी नरेश! वे बातचीत करनेमें अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने राजा दुर्योधनके निकट जाकर उसकी दीनता देखकर इस प्रकार कहा--
三阇耶说道:“于是那位光辉之人——善于辞令者——走近人中之主、都利约陀那王;因对事势逆转而愤激,便以相称之言对他陈说。在战场倾覆与军心绝望的伦理阴影下,这一趋近昭示长者欲扶定动摇的君主,使其由哀恸与崩溃转向决断与其所理解的职责之道。”
Verse 7
दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव । श्रुत्वा कुरु महाराज यदि ते रोचतेडनघ,“कुरुवंशी महाराज दुर्योधन! मैं इस समय तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। अनघ! मेरी बात सुनकर यदि तुम्हें रुचे तो उसके अनुसार कार्य करो
三阇耶说道:“杜尤陀那啊,俱卢族的王子,明白此言——请专心聆听我将要告诉你的话。听罢之后,伟大的君王啊,若你心中称意,无瑕者啊,便依此而行。”
Verse 8
न युद्धधर्माच्छेयान् वै पन्था राजेन्द्र विद्यते यं समाश्रित्य युद्धयन्ते क्षत्रिया: क्षत्रियर्षभ,राजेन्द्र! क्षत्रियशिरोमणे! युद्धधर्मसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है, जिसका आश्रय लेकर क्षत्रिय लोग युद्धमें तत्पर रहते हैं
三阇耶说道:“诸王之最啊,确无比战斗之法(战士之法,kṣatriya-dharma)更为有益的道路。正依此法度,刹帝利中的雄牛啊,武士之族遂投身于战斗。”
Verse 9
पुत्रो भ्राता पिता चैव स्वस्रनीयो मातुलस्तथा । सम्बन्धिबान्धवाश्रैव योद्धया वै क्षत्रजीविना,'क्षत्रियधर्मसे जीवन-निर्वाह करनेवाले पुरुषके लिये पुत्र, भ्राता, पिता, भानजा, मामा, सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धव--इन सबके साथ युद्ध करना कर्तव्य है
三阇耶说道:“对于以刹帝利之业为生、以武士之责维系生计的人而言,纵使对阵至亲亦属本分:儿子、兄弟、父亲、外甥(姊妹之子)、舅父,以及其他亲族与同宗。于严酷的刹帝利法(kṣatriya-dharma)之中,一旦战争成为既定之途,私情并不能免除战斗的义务。”
Verse 10
वधे चैव परो धर्मस्तथाधर्म: पलायने । ते सम घोरां समापन्ना जीविकां जीवितार्थिन:,'युद्धमें शत्रुकोी मारना या उसके हाथसे मारा जाना दोनों ही उत्तम धर्म है और युद्धसे भागनेपर महान् पाप होता है। सभी क्षत्रिय जीवन-निर्वाहकी इच्छा रखते हुए उसी घोर जीविकाका आश्रय लेते हैं
“在战场上,或杀敌,或为敌所杀——二者皆为至上之法;而临阵逃遁,则为大不法、大罪。凡刹帝利,既求存命又求生计,皆依凭此等可怖的营生之道。”
Verse 11
'ऐसी दशामें मैं यहाँ तुम्हारे लिये कुछ हितकी बात बताऊँगा। अनघ! पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, महारथी कर्ण, जयद्रथ तथा तुम्हारे सभी भाई मारे जा चुके हैं। तुम्हारा पुत्र लक्ष्मण भी जीवित नहीं है। अब दूसरा कौन बच गया है, जिसका हमलोग आश्रय ग्रहण करें
三阇耶说道:“在这般绝境之中,我将为你的利益说几句话。无瑕者啊!祖父毗湿摩、师长德罗那、伟大的车战勇士迦尔那、阇耶陀罗他,以及你所有的兄弟,都已被杀。你的儿子拉克什玛那也不在人世了。如今还剩下谁,能让我们依为归依?”
Verse 12
जयद्रथे च निहते तव भ्रातृषु चानघ । लक्ष्मणे तव पुत्रे च किं शेषं पर्युपास्महे,'ऐसी दशामें मैं यहाँ तुम्हारे लिये कुछ हितकी बात बताऊँगा। अनघ! पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, महारथी कर्ण, जयद्रथ तथा तुम्हारे सभी भाई मारे जा चुके हैं। तुम्हारा पुत्र लक्ष्मण भी जीवित नहीं है। अब दूसरा कौन बच गया है, जिसका हमलोग आश्रय ग्रहण करें
三阇耶说道:“当阇耶陀罗已被诛杀,你的诸位兄弟也都倒下,哦无瑕者——而你的儿子罗叉摩那亦已不在人世——我们还剩下什么可依凭?如今我们还能向谁求取庇护?”
Verse 13
तदत्र प्रतिवक्ष्यामि किंचिदेव हितं वच: । हते भीष्मे च द्रोणे च कर्णे चैव महारथे,येषु भारं समासाद्य राज्ये मतिमकुर्महि । ते संत्यज्य तनूर्याता: शूरा ब्रह्म॒ुविदां गतिम् “जिनपर युद्धका भार रखकर हम राज्य पानेकी आशा करते थे, वे शूरवीर तो शरीर छोड़कर ब्रह्म॒वेत्ताओंकी गतिको प्राप्त हो गये
三阇耶说道:“我在此将以寥寥数语,答复对你有益之言。毗湿摩已被杀,德罗纳已被杀,迦尔纳亦然——那位大车战士。我们把战争的重担托付于他们,心念系于凭他们夺取王国——那些英雄舍弃其身,已往知梵者(Brahman)的归宿而去。”
Verse 14
वयं त्विह विना भूता गुणवद्धिर्महारथै: । कृपणं वर्तयिष्याम पातयित्वा नृपान् बहून्ू,“इस समय हमलोग यहाँ भीष्म आदि गुणवान् महारथियोंके सहयोगसे वंचित हो गये हैं और बहुत-से नरेशोंको मरवाकर दयनीय स्थितिमें आ गये हैं
三阇耶说道:“如今我们在此,已失却那些具德的大车战士——毗湿摩等人的扶持。使许多国王陨落之后,我们只能在凄惨的境地中继续苟存。”
Verse 15
सर्वैरथ च जीवद्धिरबीभत्सुरपराजित: । कृष्णनेत्रो महाबाहुर्देवेरपि दुरासद:,“जब सब लोग जीवित थे, तब भी अर्जुन किसीके द्वारा पराजित नहीं हुए। श्रीकृष्ण- जैसे नेताके रहते हुए महाबाहु अर्जुन देवताओं के लिये भी दुर्जय हैं
三阇耶说道:“即便当众勇士尚在之时,阿毗毗阇苏(阿周那)也从未为任何人所败。以奎师那为向导与统帅,那位臂力无双的阿周那坚不可撼——纵使诸天亦难以攻克。”
Verse 16
इन्द्रकार्मुकतुल्या भमिन्द्रकेतुमिवोच्छितम् । वानरं केतुमासाद्य संचचाल महाचमू:,“उनका वानरध्वज इन्द्रधनुषके तुल्य बहुरंगा और इन्द्रध्वजके समान अत्यन्त ऊँचा है। उसके पास पहुँचकर हमारी विशाल सेना भयसे विचलित हो उठती है
三阇耶说道:“他的猴旗如因陀罗之虹般五彩斑斓,又如因陀罗之幢般高耸入云,凌空而立。我们的大军一旦逼近那徽记,便为恐惧所撼,军心动摇。”
Verse 17
सिंहनादाच्च भीमस्य पाञज्चजन्यस्वनेन च । गाण्डीवस्य च निर्घोषात् सम्मुहान्ते मनांसि न:,'भीमसेनके सिंहनाद, पांचजन्य शंखकी ध्वनि और गाण्डीव धनुषकी टंकारसे हमारा दिल दहल उठता है
三阇耶说道:“听到毗摩如狮子般的咆哮,听到般遮阇尼耶法螺的轰鸣,又听到甘狄婆神弓震雷般的弦响,我们的心神顿时迷乱。”在这场战争的正法氛围中,这些声音并非徒然喧噪,而是正义决意的奔涌,足以动摇敌方的信心。
Verse 18
चरन्तीव महाविद्युन्मुष्णन्ती नयनप्रभाम् । अलातमिव चाविद्धं गाण्डीवं समदृश्यत,“जैसे चमकती हुई महाविद्युत् नेत्रोंकी प्रभाको छीनती-सी दिखायी देती है तथा जैसे अलातचक्र घूमता देखा जाता है, उसी प्रकार अर्जुनके हाथमें गाण्डीव धनुष भी दृष्टिगोचर होता है
三阇耶说道:阿周那手中的甘狄婆弓,宛如一道巨大的闪电,仿佛夺走了人眼的光辉;又如燃火之杖被挥旋成环,人们看见它在疾速中回转飞舞——这是战场上不可抗拒的武威之象。
Verse 19
जाम्बूनदविचित्रं च धूयमानं महद् धनु: । दृश्यते दिक्षु सर्वासु विद्युदभ्रधनेष्विव,'अर्जुनके हाथमें डोलता हुआ उनका सुवर्णजटित महान् धनुष सम्पूर्ण दिशाओंमें वैसा ही दिखायी देता है, जैसे मेघोंकी घटामें बिजली
三阇耶说道:“那张大弓以阎浮那陀金精美镶饰,挥舞时摇曳生姿,四方皆可见——如浓云堆叠之中电光乍现。”
Verse 20
श्वेताक्ष॒ वेगसम्पन्ना: शशिकाशसमप्रभा: । पिबन्त इव चाकाशं रथे युक्तास्तु वाजिन:,“उनके रथमें जुते हुए घोड़े श्वेत वर्णवाले, वेगशशाली तथा चन्द्रमा और कासके समान उज्ज्वल कान्तिसे सुशोभित हैं। वे ऐसी तीव्र गतिसे चलते हैं, मानो आकाशको पी जायूँगे
三阇耶说道:套在战车上的骏马目色皎白,迅疾无比,光辉如明月与淡白的迦舍花。它们奔突向前之快,仿佛要把整片天空都饮尽——使战场景象更显紧迫,也更令人敬畏武力之威。
Verse 21
उह्ममानांश्व॒ कृष्णेन वायुनेव बलाहका: । जाम्बूनदविचित्राज्ा वहन्ते चार्जुनं रणे,'जैसे वायुकी प्रेरणासे बादल उड़ते फिरते हैं, वैसे ही भगवान् श्रीकृष्णद्वारा हाँके जाते हुए घोड़े, जो सुनहरे साजोंसे सजे होनेके कारण अंगोंमें विचित्र शोभा धारण करते हैं, रणभूमिमें अर्जुनकी सवारी ढोते हैं
三阇耶说道:正如风驱云行,阿周那的战马——在黑天(克里希那)的催策下——也席卷战场而过。它们披戴闪耀的金饰鞍具,驮载阿周那投入鏖战,即便在战争的暴烈之中,仍显出夺目的华彩。
Verse 22
तावकं तद् बलं राजन्नर्जुनो<स्त्रविशारद: । गहन शिशिरापाये ददाहाग्निरिवोल्बण:,“राजन! अर्जुन अस्त्रविद्यामें कुशल हैं, उन्होंने तुम्हारी सेनाको उसी प्रकार भस्म किया है, जैसे भयंकर आग ग्रीष्म-ऋतुमें बहुत बड़े जंगलको जला डालती है
三阇耶说道:“大王啊,阿周那——精通诸般兵器者——已吞没了您的军队,焚烧殆尽,犹如冬尽之时的烈火点燃密林,势不可遏。”
Verse 23
गाहमानमनीकानि महेन्द्रसदृशप्रभम् | धनंजयमपश्याम चतुर्दष्टमिव द्विपम्,“देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी अर्जुनको हम चार दाँतवाले गजराजके समान अपनी सेनामें प्रवेश करते देखते हैं
三阇耶说道:“我们看见檀那阇耶(阿周那)光辉如摩诃因陀罗(因陀罗),冲入诸军阵列,宛如一头四牙巨象闯入军中。”
Verse 24
विक्षोभयन्तं सेनां ते त्रासयन्तं च पार्थिवान् | धनंजयमपश्याम नलिनीमिव कुठ्जरम्,“जैसे मतवाला हाथी तालाबमें घुसकर उसे मथ डालता है, उसी प्रकार हमने अर्जुनको तुम्हारी सेनाको मथते और राजाओंको भयभीत करते देखा है
三阇耶说道:“我们看见檀那阇耶(阿周那)搅乱您的军队,使诸王惊惧;如同发情的巨象闯入莲池,猛力翻搅,水面尽乱。”
Verse 25
त्रासयन्तं तथा योधान् धनुर्घोषेण पाण्डवम् । भूय एनमपश्याम सिंहं मृगगणानिव,'जैसे सिंह मृगोंके झुंडको भयभीत कर देता है, उसी प्रकार पाण्डुकुमार अर्जुन अपने धनुषकी टंकारसे तुम्हारे समस्त योद्धाओंको बारंबार भयभीत करते दिखायी दिये हैं
三阇耶说道:“我们一次又一次看见那位般度之子(阿周那)以弓弦雷鸣般的轰响震慑诸战士,正如雄狮令鹿群惊惶。”
Verse 26
सर्वलोकमहेष्वासौ वृषभौ सर्वधन्विनाम् । आमुक्तकवचौ कृष्णौ लोकमध्ये विचेरतु:,“अपने अंगोंमें कवच धारण किये श्रीकृष्ण और अर्जुन, जो सम्पूर्ण विश्वके महाधनुर्धर और सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ हैं, योद्धाओंके समूहमें निर्भय विचरते हैं
三阇耶说道:“奎师那与阿周那——那两位至上的英雄,诸弓手中的雄牛,名震诸界的大弓手——甲胄系于肢体,在军阵之中无畏往来。”
Verse 27
अद्य सप्तदशाहानि वर्तमानस्यथ भारत । संग्रामस्थातिघोरस्य वध्यतां चाभितो युधि,“भारत! परस्पर मार-काट मचाते हुए दोनों ओरसे योद्धाओंके इस अत्यन्त भयंकर संग्रामको आरम्भ हुए आज सत्रह दिन हो गये
三阇耶说道:“噢,婆罗多(持国王)啊,今日已是这场极其可怖的大战开战以来的第十七日——在战斗中四面八方,勇士们在相互屠戮之中不断被杀。”
Verse 28
वायुनेव विधूतानि तव सैन्यानि सर्वतः । शरदम्भोदजालानि व्यशीर्यन्त समनन््तत:,'जैसे हवा शरद्-ऋतुके बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनकी मारसे तुम्हारी सेनाएँ सब ओर तितर-बितर हो गयी हैं
三阇耶说道:“正如秋风撕裂并吹散层层云团,你的军队在战场上遭击溃,也被打散,向四方溃散而去。”
Verse 29
तां नावमिव पर्यस्तां वातधूतां महार्णवे । तव सेनां महाराज सव्यसाची व्यकम्पयत्,“महाराज! जैसे महासागरमें हवाके थपेड़े खाकर नाव डगमगाने लगती है, उसी प्रकार सव्यसाची अर्जुनने तुम्हारी सेनाको कँपा डाला है
三阇耶说道:“大王啊,正如大海中的一叶舟,遭狂风猛吹而颠簸摇晃;阿周那——萨维亚萨奇,那能以双手运弓的神射——也如此震撼了你的军阵。”
Verse 30
क्व नु ते सूतपुत्रो5 भूत् क्व नु द्रोण: सहानुग: । अहं क्व च क्व चात्मा ते हार्दिक्यश्व तथा क्व नु,“उस दिन जयद्रथको अर्जुनके बाणोंका निशाना बनते देखकर भी तुम्हारा कर्ण कहाँ चला गया था? अपने अनुयायियोंके साथ आचार्य द्रोण कहाँ थे? मैं कहाँ था? तुम कहाँ थे? कृतवर्मा कहाँ चले गये थे और भाइयोंसहित तुम्हारा भ्राता दुःशासन भी कहाँ था?
三阇耶说道:“那么,你那车夫之子迦尔纳在何处?德罗纳与其随从在何处?我在何处,你自己又在何处?哈尔迪迦(克利多跋摩)又在何处?”
Verse 31
दुःशासनश्र ते भ्राता भ्रातृभि: सहित: क्व नु । बाणगोचरसम्प्राप्त॑ प्रेक्ष्य चैव जयद्रथम्,“उस दिन जयद्रथको अर्जुनके बाणोंका निशाना बनते देखकर भी तुम्हारा कर्ण कहाँ चला गया था? अपने अनुयायियोंके साथ आचार्य द्रोण कहाँ थे? मैं कहाँ था? तुम कहाँ थे? कृतवर्मा कहाँ चले गये थे और भाइयोंसहित तुम्हारा भ्राता दुःशासन भी कहाँ था?
三阇耶说道:“那么,你的兄弟杜沙萨那与诸兄弟同在,又在何处?眼看阇耶陀罗已落入阿周那箭矢的射程之内,他们却在何处?”
Verse 32
सम्बन्धिनस्ते भ्रातृश्च सहायान् मातुलांस्तथा | सर्वान् विक्रम्प मिषतो लोकमाक्रम्य मूर्थनि,“राजन! तुम्हारे सम्बन्धी, भाई, सहायक और मामा सब-के-सब देख रहे थे तो भी अर्जुनने उन सबको अपने पराक्रमद्वारा परास्त करके सब लोगोंके मस्तकपर पैर रखकर जयद्रथको मार डाला। अब और कौन बचा है जिसका हम भरोसा करें? यहाँ कौन ऐसा पुरुष है जो पाण्डुपुत्र अर्जुनपर विजय पायेगा?
三阇耶说道:“大王啊!纵然陛下的亲族——兄弟、盟友与外舅——尽皆在旁目睹,阿周那仍以神勇压倒众人;他踏众人之首而进,斩杀了阇耶陀罗。如今我们还能倚仗谁?此间又有何人能战胜般度之子阿周那?”
Verse 33
जयद्रथो हतो राजन् कि नु शेषमुपास्महे | को हीह स पुमानस्ति यो विजेष्यति पाण्डवम्,“राजन! तुम्हारे सम्बन्धी, भाई, सहायक और मामा सब-के-सब देख रहे थे तो भी अर्जुनने उन सबको अपने पराक्रमद्वारा परास्त करके सब लोगोंके मस्तकपर पैर रखकर जयद्रथको मार डाला। अब और कौन बचा है जिसका हम भरोसा करें? यहाँ कौन ऐसा पुरुष है जो पाण्डुपुत्र अर्जुनपर विजय पायेगा?
三阇耶说道:“大王啊,阇耶陀罗已被诛杀。那么我们还能依靠谁——还剩下什么可倚?此间究竟有谁、有哪一个男子,能战胜般度族的勇士(阿周那)?”
Verse 34
तस्य चास्त्राणि दिव्यानि विविधानि महात्मन: । गाण्डीवस्य च निर्घोषो धैर्याणि हरते हि न:,“महात्मा अर्जुनके पास नाना प्रकारके दिव्यास्त्र हैं। उनके गाण्डीव धनुषका गम्भीर घोष हमारा धैर्य छीन लेता है
三阇耶说道:“那位大心之阿周那拥有种种天授神兵;而他那张甘狄婆弓所发出的深沉雷鸣之响,确实夺走了我们的胆气。”
Verse 35
नष्टचन्द्रा यथा रात्रि: सेनेयं हतनायका । नागभग्नद्रुमा शुष्का नदीवाकुलतां गता,'जैसे चन्द्रमाके उदित न होनेपर रात्रि अन्धकारमयी दिखायी देती है, उसी प्रकार हमारी यह सेना सेनापतिके मारे जानेसे श्रीहीन हो रही है। हाथीने जिसके किनारेके वृक्षोंको तोड़ डाला हो, उस सूखी नदीके समान यह व्याकुल हो उठी है
三阇耶说道:“正如失月之夜显得幽暗,我军亦然——统帅既亡,光彩与信心尽失。又如一条干涸的河流,岸边树木被象群折断,遂陷于惶乱与散乱。”
Verse 36
ध्वजिन्यां हतनेत्रायां यथेष्टे श्वेतवाहन: । चरिष्यति महाबाहु: कक्षेष्वग्निरिव ज्वलन्,“हमारी इस विशाल वाहिनीका नेता नष्ट हो गया है। ऐसी दशामें घास-फ़ूसके ढेरमें प्रजवलित होनेवाली आगके समान श्वेत घोड़ोंवाले महाबाहु अर्जुन इस सेनाके भीतर इच्छानुसार विचरेंगे
三阇耶说道:“在我军这支旗阵之中,既已失其统领,那位白马驾车的大臂阿周那,必将随心所欲穿行其间,炽然如火在枯草堆中燃起。”
Verse 37
सात्यकेश्वैव यो वेगो भीमसेनस्य चो भयो: । दारयेच्च गिरीन् सर्वान् शोषयेच्चैव सागरान्,“उधर सात्यकि और भीमसेन दोनों वीरोंका जो वेग है, वह सारे पर्वतोंको विदीर्ण कर सकता है। समुद्रोंको भी सुखा सकता है
三阇耶说道:萨底耶迦与毗摩塞那二人的冲势与威力,强大到足以劈裂群山,甚至令大海干涸。在这场战争的法义框架中,这是对其武勇之气的极度颂扬——力量若系于正法之旨,便能一锤定音;但也提醒听者,若不加节制,强力同样足以造成可怖的毁灭。
Verse 38
उवाच वाक्य यद् भीम: सभामध्ये विशाम्पते । कृतं तत् सफल तेन भूयश्नैव करिष्यति,'प्रजानाथ! द्यूतसभामें भीमसेनने जो बात कही थी, उसे उन्होंने सत्य कर दिखाया और जो शेष है, उसे भी वे अवश्य ही पूर्ण करेंगे
三阇耶说道:噢,万民之主啊,毗摩当年在王廷大会之中所说的话,他已以行动使之成真;而尚未完成的部分,他也必定会一一办到。叙事由此凸显誓言之词的道德力量:在战争的熔炉里,毗摩在掷骰殿中的誓言并非徒然怒语,而是为恢复正义而追行的约束性承诺,以负责任的行动回应所受的羞辱。
Verse 39
प्रमुखस्थे तदा कर्णे बल॑ पाण्डवरक्षितम् | दुरासदं तदा गुप्तं व्यूढं गाण्डीवधन्चना,“जब कर्णके साथ युद्ध चल रहा था, उस समय कर्ण सामने ही था तो भी पाण्डवोंद्वारा रक्षित सेना उसके लिये दुर्जय हो गयी; क्योंकि गाण्डीवधारी अर्जुन व्यूहरचनापूर्वक उसकी रक्षा कर रहे थे
当时与迦尔那交战正酣;纵然迦尔那就在阵前,受般度五子护持的军势对他而言也变得难以攻破——因为持甘狄婆神弓的阿周那以严整的战阵(vyūha)布置守护着他们。
Verse 40
युष्माभिस्तानि चीर्णानि यान्यसाधूनि साधुषु । अकारणकृतान्येव तेषां व: फलमागतम्,'पाण्डव साधुपुरुष हैं तो भी तुमलोगोंने अकारण ही उनके साथ जो बहुत-से अनुचित बर्ताव किये हैं, उन्हींका यह फल तुम्हें मिला है
三阇耶说道:你们对正直之人所行的非义之举——毫无正当缘由而为——如今已作为不可避免的果报回到你们身上。般度五子本是有德之士,你们无端加诸其上的不当行径,已成熟为你们此刻所承受的结局。
Verse 41
आत्मनोडर्थे त्वया लोको यत्नतः सर्व आहृत: । स ते संशायितस्तात आत्मा वै भरतर्षभ,“भरतश्रेष्ठ! तुमने अपनी रक्षाके लिये ही प्रयत्नपूर्वक सारे जगत्के लोगोंको एकत्र किया था, किंतु तुम्हारा ही जीवन संशयमें पड़ गया है
三阇耶说道:“噢,婆罗多族中的雄牛啊,为了自身的安稳,你曾竭力从四方召集众人;然而如今,亲爱的,你自己的性命反倒陷入了未卜之境。”
Verse 42
रक्ष दुर्योधनात्मानमात्मा सर्वस्य भाजनम् | भिन्ने हि भाजने तात दिशो गच्छति तद्गतम्,“दुर्योधन! अब तुम अपने शरीरकी रक्षा करो; क्योंकि आत्मा (शरीर) ही समस्त सुखोंका भाजन है। जैसे पात्रके फ़ूट जानेपर उसमें रखा हुआ जल चारों ओर बह जाता है, उसी प्रकार शरीरके नष्ट होनेसे उसपर अवलम्बित सुखोंका भी अन्त हो जाता है
三阇耶说道:“护持你自身吧,杜罗约陀那;因为具身之我——此身——乃一切享乐之器。器皿一旦破裂,其中所盛便四散流失;同样,身体毁灭时,依身而起的诸般乐受也随之终尽。”
Verse 43
हीयमानेन वै सन्धि: पर्येष्टव्य:ः समेन वा । विग्रहो वर्धमानेन मतिरेषा बृहस्पते:,“बृहस्पतिकी यह नीति है कि जब अपना बल कम या बराबर जान पड़े तो शत्रुके साथ संधि कर लेनी चाहिये। लड़ाई तो उसी वक्त छेड़नी चाहिये, जब अपनी शक्ति शत्रुसे बढ़ी- चढ़ी हो
三阇耶说道:“人们说,这是布里哈斯帕提的箴言:当自身之力衰减——甚至仅与敌相当——便应寻求盟约;而当势力日增之时,才当选择公开交战。”
Verse 44
ते वयं पाण्डुपुत्रेभ्यो हीना सम बलशक्तित: । तदत्र पाण्डवै: सार्ध सन्धिं मन्ये क्षमं प्रभो,“हमलोग बल और शक्तिमें पाण्डवोंसे हीन हो गये हैं। अतः प्रभो! इस अवस्थामें पाण्डवोंके साथ संधि कर लेना ही उचित समझता हूँ
三阇耶说道:“我们在力量与势能上都已不如般度之子。故而,主上啊,在此情势之下,我以为与般度五子缔结盟约方为得宜。”
Verse 45
न जानीते हि य: श्रेय: श्रेयसश्चावमन्यते । सक्षिप्रं भ्रश्यते राज्यान्न च श्रेयोडनुविन्दते,“जो राजा अपनी भलाईकी बात नहीं समझता और श्रेष्ठ पुरुषोंका अपमान करता है, वह शीघ्र ही राज्यसे भ्रष्ट हो जाता है। उसे कभी कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती
三阇耶说道:“那国王既不明白何者真正导向自身福祉,又轻蔑体现崇高善德之贤者,便会迅速失落其国;而他也永不能获得长久的安泰。”
Verse 46
प्रणिपत्य हि राजानं राज्यं यदि लभेमहि । श्रेय: स्यान्न तु मौढ्येन राजन् गन्तु: पराभवम्,“राजन! यदि राजा युधिष्ठिरके सामने नतमस्तक होकर हम अपना राज्य प्राप्त कर लें तो यही श्रेयस्कर होगा। मूर्खतावश पराजय स्वीकार करनेवालेका कभी भला नहीं हो सकता
三阇耶说道:“大王啊,若我们向那位国王(坚战,Yudhiṣṭhira)俯首称臣便能收复国土,那才是更明智、更有利的道路;而若因愚昧而继续进军,走向明知必至的败亡——其中绝无善果。”
Verse 47
वैचित्रवीर्यवचनात् कृपाशीलो युधिष्ठिर: । विनियुज्जीत राज्ये त्वां गोविन्दवचनेन च,'युधिष्ठिर दयालु हैं। वे राजा धृतराष्ट्र और भगवान् श्रीकृष्णके कहनेसे तुम्हें राज्यपर प्रतिष्ठित कर सकते हैं
三阇耶说道:“依毗奇多罗毗梨耶后裔持国王(Dhṛtarāṣṭra)之言,慈悲的坚战(Yudhiṣṭhira)——又在瞿文达(Govinda,奎师那)劝导之下——能够立你登上王位。”
Verse 48
यद् ब्रूयाद्धि हृषीकेशो राजानमपराजितम् । अर्जुनं भीमसेनं च सर्वे कुर्युरसंशयम्
三阇耶说道:“无论赫利湿凯沙(Hṛṣīkeśa,奎师那)对那位不可征服的国王说什么,也无论对阿周那与毗摩塞那说什么——众人必定照办,毫无疑虑。”
Verse 49
“भगवान् श्रीकृष्ण किसीसे पराजित न होनेवाले राजा युधिष्ठिर, अर्जुन और भीमसेनसे जो कुछ भी कहेंगे, वे सब लोग उसे नि:संदेह स्वीकार कर लेंगे ।। नातिक्रमिष्यते कृष्णो वचनं कौरवस्य तु । धृतराष्ट्रस्य मन्ये5हं नापि कृष्णस्य पाण्डव:,“कुरुराज धृतराष्ट्रकी बात श्रीकृष्ण नहीं टालेंगे और श्रीकृष्णकी आज्ञाका उल्लंघन युधिष्ठिर नहीं कर सकेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है
三阇耶说道:“无论至圣奎师那对坚战王——其志不可屈——以及对阿周那与毗摩塞那说什么,他们都会毫不怀疑地接受。我以为,奎师那不会违拗俱卢之主持国王(Dhṛtarāṣṭra)之言;同样,般度之子(坚战)也不能逾越奎师那的命令。”
Verse 50
एतत् क्षेममहं मन्ये न च पार्थश्च विग्रहम् । नत्वां ब्रवीमि कार्पण्यान्न प्राणपरिरक्षणात्
三阇耶说道:“我以为此策更为安稳、也更为善利;我也不认为帕尔塔(阿周那)应当卷入争端。我对你说这些,并非出于怯懦软弱,也并非为了保全我自己的性命。”
Verse 51
पथ्यं राजन् ब्रवीमि त्वां तत्परासु: स्मरिष्यसि । “राजन! मैं इस संधिको ही तुम्हारे लिये कल्याणकारी मानता हूँ। पाण्डवोंके साथ किये जानेवाले युद्धको नहीं। मैं कायरता या प्राण-रक्षाकी भावनासे यह सब नहीं कहता हूँ। तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ। तुम मरणासन्न अवस्थामें मेरी यह बात याद करोगे || ५० न! इति वृद्धों विलप्यैतत् कृप: शारद्वतो वच: । दीर्घमुष्णं च नि:श्वस्य शुशोच च मुमोह च,शरद्वानके पुत्र वृद्ध कृपाचार्य इस प्रकार विलाप करके गरम-गरम लंबी साँस खींचते हुए शोक और मोहके वशीभूत हो गये
三阇耶说道:“大王啊,我对你所言皆为适宜、确为你之利益;当你命悬一线之时,你必会忆起此言。” 如此哀叹之后,年迈的克利波(Kṛpa,沙拉德瓦特之子)答道:“不。” 随即他长长地、灼热地叹息,沉入悲恸与迷惘之中。
Whether a ruler should pursue reconciliation for collective welfare when advised by elders, or continue a destructive course because trust has collapsed and prior harms make ethical and political restoration appear unattainable.
The chapter illustrates how unresolved wrongdoing and public injury can harden positions beyond pragmatic repair, and how role-based ethics (kṣatra-dharma) may be invoked to prioritize honor and reputation over compromise.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-significance lies in its function as a late-war justification discourse that clarifies character motivation and the ethical vocabulary used to rationalize continued conflict.