Adhyaya 2
Shalya ParvaAdhyaya 285 Versesकौरव-पक्ष के लिए अपूरणीय क्षति और पतन का बोध; पाण्डव-पक्ष की बढ़त स्मृति-वृत्तांत में स्थिर हो चुकी है।

Adhyaya 2

धृतराष्ट्रविलापः — Dhṛtarāṣṭra’s Lament and Inquiry (Śalya-parva, Adhyāya 2)

Upa-parva: Dhṛtarāṣṭra-śoka-vilāpa (Lament of Dhṛtarāṣṭra) — contextual unit within Śalya-parva

Vaiśaṃpāyana reports that after the women are dismissed, Dhṛtarāṣṭra—overwhelmed by escalating grief—laments repeatedly, describing physical signs of distress and the psychological rupture caused by hearing of his sons’ deaths. He addresses Duryodhana as if present, articulating dependency, loss of protection, and the collapse of royal continuity. He then catalogues numerous allied kings and notable fighters who fought “for his sake” and were slain, using the refrain “kim anyad bhāgadheyataḥ” to interpret the devastation as destiny’s allotment. The king recalls Vidura’s earlier warning that Duryodhana’s wrongdoing would destroy the polity, acknowledging his own failure of discernment. Shifting from lament to structured inquiry, he questions Saṃjaya about battlefield command after Karṇa’s fall, the formation’s leadership, the protection of Śalya’s flanks, the death of Śalya and Duryodhana, the fate of the Pāñcālas and Draupadī’s sons, and which warriors survived. The chapter thus combines grief rhetoric, moral retrospection, and historiographic demand for an exact account.

Chapter Arc: स्त्रियों के विदा हो जाने पर अंधे धृतराष्ट्र धुएँ-सी भारी साँस छोड़ते, बार-बार हाथ झटकते हुए स्मृतियों के ज्वार में डूब जाते हैं और सूत संजय से युद्ध-वृत्तांत का कठोर सत्य फिर पूछ बैठते हैं। → धृतराष्ट्र एक-एक कर अपने पक्ष के नाश का कारण टटोलते हैं—क्यों इतने-इतने भूमिपाल साथ होकर भी उनके पुत्र ‘भूमौ प्राकृतः कणूपो यथा’ की तरह पड़े रहे; वे भगदत्त, जयद्रथ, कर्ण जैसे महावीरों के पतन को ‘किमन्यद् भागधेयतः’ कहकर भाग्य और अपराध के बीच झूलते हुए याद करते हैं। → विलाप का शिखर तब आता है जब धृतराष्ट्र स्वीकार करते हैं कि कर्ण भी सबके देखते-देखते किरीटधारी अर्जुन के हाथों मारा गया, और साथ ही विदुर-वाक्य की भविष्यवाणी उनके भीतर वज्र की तरह गूँजती है—‘दुर्योधनापराधेन प्रजेयं विनशिष्यति’। → धृतराष्ट्र अंततः अपने शोक को ‘भाग्य’ के आवरण में ढँकने का प्रयास करते हैं—इतने वीरों के बीच प्रयत्नपूर्वक लड़ते हुए भी पुत्रों का मारा जाना उन्हें नियति-प्रेरित प्रतीत होता है; संजय के प्रति उनकी जिज्ञासा अब केवल विवरण नहीं, आत्म-दंड बन जाती है। → धृतराष्ट्र आगे के युद्ध-वृत्तांत और शेष बचे योद्धाओं की दशा सुनने को व्याकुल रहते हैं—कौन बचेगा, कौन गिरेगा, और यह विनाश कहाँ थमेगा।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें धृतराष्ट्रका मोहविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ,शीसल्-ताआ5 >> हु भ्रिध्रर्राध्य द्वितीयो<्ध्याय: राजा धृतराष्ट्रका विलाप करना और संजयसे युद्धका वृत्तान्त पूछना वैशम्पायन उवाच विसृष्टास्वथ नारीषु धृतराष्ट्रो3म्बिकासुत: । विललाप महाराज दु:खाद्‌ू दुःखान्तरं गत: वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज! स्त्रियोंक बिदा हो जानेपर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र एक दुःखसे दूसरे दुःखमें पड़कर गरम-गरम उच्छवास लेते और बारंबार दोनों हाथ हिलाते हुए विलाप करने लगे और बड़ी देरतक चिन्तामग्न रहकर इस प्रकार बोले

毗舍波耶那说:诸妇人退下之后,安毗迦之子持国王沉沦于悲恸,从一重哀苦坠入另一重哀苦,遂放声哀号。那时他喘息如火,双手反复挥动,哭泣良久;又长久沉思,方才如此说道。

Verse 2

सथूममिव नि:श्वस्य करौ धुन्वन्‌ पुनः पुनः । विचिन्त्य च महाराज वचन चेदमब्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज! स्त्रियोंक बिदा हो जानेपर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र एक दुःखसे दूसरे दुःखमें पड़कर गरम-गरम उच्छवास लेते और बारंबार दोनों हाथ हिलाते हुए विलाप करने लगे और बड़ी देरतक चिन्तामग्न रहकर इस प्रकार बोले इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि धृतराष्ट्रविलापे द्वितीयोडध्याय:

毗舍波耶那说:“大王啊!诸女离去之后,安毗迦之子持国王一悲复一悲,吐出炽热的叹息,仿佛冒烟一般;又在哀恸中反复挥动双手。沉思良久之后,他便说出了这些话。”

Verse 3

धघतयाट्र उवाच अहो बत महददु:खं यदहं पाण्डवान्‌ रणे । क्षेमिणश्षाव्ययांश्वैव त्वत्त: सूत शुणोमि वै,धृतराष्ट्रने कहा--सूत! मेरे लिये महान्‌ दुःखकी बात है कि मैं तुम्हारे मुखसे रणभूमिमें पाण्डवोंको सकुशल और विनाशरहित सुन रहा हूँ

持国王说:“唉,苏多啊!这对我而言是莫大的痛苦:我从你口中听到,战场上的般度五子安然无恙,毫未折损。”

Verse 4

वज्रसारमयं नून॑ हृदयं सुदृढं मम । यच्छुत्वा निहतानू पुत्रान्‌ दीर्यते न सहस्रधा,निश्चय ही मेरा यह सुदृढ़ हृदय वज्रके सारतत्त्वका बना हुआ है; क्योंकि अपने पुत्रोंको मारा गया सुनकर भी इसके सहसोरं टुकड़े नहीं हो जाते हैं

持国王说:“我的心必是由金刚之精铸成,坚硬无比;因为即便听闻我的儿子们已被杀尽,它也不曾碎裂成千片。”

Verse 5

चिन्तयित्वा वयस्तेषां बालक्रीडां च संजय । हतान्‌ पुत्रानशेषेण दीर्यते मे भृूशं मन:,संजय! मैं उनकी अवस्था और बाल-क्रीड़ाका चिन्तन करके जब उन सबके मारे जानेकी बात सोचता हूँ, तब मेरा हृदय अत्यन्त विदीर्ण होने लगता है

“三阇耶啊!当我追忆他们稚嫩的年岁与童年的嬉戏,再想到我的儿子们无一幸免尽皆被杀,我的心便在滔天悲痛中被撕裂。”

Verse 6

अनेत्रत्वाद्‌ यदेतेषां न मे रूपनिदर्शनम्‌ । पुत्रस्नेहकृता प्रीतिर्नित्यमेतेषु धारिता,यद्यपि नेत्रहीन होनेके कारण मैंने उनका रूप कभी नहीं देखा था, तथापि इन सबके प्रति पुत्रस्नेह-जनित प्रेमका भाव सदा ही रखा है

持国王说:“因为我目盲,从未得见他们的形貌;然而出于父爱,我始终怀抱着对他们不变的深情。”

Verse 7

बालभावमत्तिक्रम्य यौवनस्थांश्व तानहम्‌ मध्यप्राप्तांस्तथा श्र॒ुत्वा हृष्ट आसं तदानघ,निष्पाप संजय! जब मैं यह सुनता था कि मेरे बच्चे बाल्यावस्थाको लाँधकर युवावस्थामें प्रविष्ट हुए हैं और धीरे-धीरे मध्य अवस्थातक पहुँच गये हैं, तब हर्षसे फ़ूल उठता था

无罪的三阇耶啊!当我听闻我的儿子们已越过童年,进入青年之期,并渐渐抵达中年之时,我当时便欢喜得心花怒放。

Verse 8

तानद्य निहतान्‌ श्रुत्वा हतैश्वर्यानू हतौजस: । न लभेयं क्वचिच्छान्तिं पुत्राधिभिरभिप्लुत:,आज उन्हीं पुत्रोंको ऐश्वर्य और बलसे हीन एवं मारा गया सुनकर उनकी चिन्तासे व्यथित हो कहीं भी शान्ति नहीं पा रहा हूँ

听闻那些儿子今日已被杀戮——失却王权与气力——我为子之痛所淹没,处处都寻不到一丝安宁。

Verse 9

एह्ीहि पुत्र राजेन्द्र ममानाथस्य साम्प्रतम्‌ । त्वया हीनो महाबाहो कां नु यास्याम्यहं गतिम्‌,(इतना कहकर राजा धृतराष्ट्र इस प्रकार विलाप करने लगे--) बेटा! राजाधिराज! इस समय मुझ अनाथके पास आओ, आओ । महाबाहो! तुम्हारे बिना न जाने मैं किस दशाको पहुँच जाऊँगा?

持国王说道:“来吧,来吧,我的儿啊——万王之主——此刻到我身边来,我已无所依怙。大臂勇者啊,失了你,我究竟将沦落到何等境地?”

Verse 10

कथं त्वं पृथिवीपालांस्त्यक्त्वा तात समागतान्‌ | शेषे विनिहतो भूमौ प्राकृत: कुनूपो यथा,तात! तुम यहाँ पधारे हुए समस्त भूमिपालोंको छोड़कर किसी नीच और दुष्ट राजाके समान मारे जाकर पृथ्वीपर कैसे सो रहे हो?

持国王说道:“我儿啊,你怎会抛下此处云集的大地诸王,如今却被击倒,躺卧尘土之上,竟如一介卑贱凡夫?你怎会堕落至此?”

Verse 11

गतिर्भूत्वा महाराज ज्ञातीनां सुहृदां तथा । अन्धं वृद्ध च मां वीर विहाय क्व नु यास्यसि,वीर महाराज! तुम भाई-बन्धुओं और सुहृदोंके आश्रय होकर भी मुझ अंधे और बूढ़ेको छोड़कर कहाँ चले जा रहे हो?

持国王说道:“伟大的王啊,勇士啊!你曾为亲族与挚友作依怙与支柱;如今却要往何处去,竟把我这盲目衰老之人抛在身后?”

Verse 12

सा कृपा सा च ते प्रीति: क्व सा राजन्‌ सुमानिता । कथं विनिहतः पार्थ: संयुगेष्वपराजित:,राजन! तुम्हारी वह कृपा, वह प्रीति और दूसरोंको सम्मान देनेकी वह वृत्ति कहाँ चली गयी? तुम तो किसीसे परास्त होनेवाले नहीं थे; फिर कुन्तीके पुत्रोंके द्वारा युद्धमें कैसे मारे गये?

大王啊!你那慈悲、你那恩爱,以及那种善于尊重他人的高贵心性,如今都到哪里去了?你本非战阵中可被人击败之辈;为何竟在沙场上被昆蒂之子所杀——你这在诸战中从未败北的人?

Verse 13

को नु मामुत्थितं वीर तात तातेति वक्ष्यति । महाराजेति सततं लोकनाथेति चासकृत्‌,वीर! अब मेरे उठनेपर मुझे सदा तात, महाराज और लोकनाथ आदि बारंबार कहकर कौन पुकारेगा?

勇士啊!当我起身之时,如今还有谁会一遍又一遍呼唤我“父亲,父亲”,又不断称我为“伟大的君王”“万民之主”呢?

Verse 14

परिष्वज्य च मां कण्ठे स्नेहेन क्लिन्नलोचन: । अनुशाधीति कौरव्य तत्‌ साधु वद मे वच:,कुरुनन्दन! तुम पहले स्नेहसे नेत्रोंमें आँसू भरकर मेरे गलेसे लग जाते और कहते 'पिताजी! मुझे कर्तव्यका उपदेश दीजिये”, वही सुन्दर बात फिर मुझसे कहो

库鲁族的欢喜之子啊!从前你因深情而泪湿双眼,先环抱我的颈项,说道:“父亲,请教我当行之义务。”如今,库鲁的骄子啊,再对我说一遍那同样高贵的话语——那维护正法与正义的话语。

Verse 15

ननु नामाहमश्रौषं वचन तव पुत्रक । भूयसी मम पृथ्वीयं यथा पार्थस्य नो तथा,बेटा! मैंने तुम्हारे मुँठउले यह बात सुनी थी कि “मेरे अधिकारमें बहुत बड़ी पृथ्वी है। इतना विशाल भूभाग दुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके अधिकारमें कभी नहीं रहा

持国王说道:“我儿,我确曾听你说过这话:‘在我权下之地更为广大’,并且说:‘如此辽阔的国土,从未归于帕尔塔(即坚战,耶提施提罗)之手。’”

Verse 16

भगदत्त: कृप: शल्य आवन्त्यो5थ जयद्रथ: । भूरिश्रवा: सोमदत्तो महाराजश्न बाह्विक:

持国王说道:“婆伽达多、克利帕、沙利耶、阿槃提之王与阇耶陀罗他;又有布里湿罗婆斯、苏摩达多,以及那位大王婆诃利迦。”

Verse 17

अश्रवत्थामा च भोजश्न मागधश्न महाबल: । बृहद्धलश्न क्राथश्व शकुनिश्चापि सौबल:

持国王说道:“阿湿婆他摩、婆阇、勇力无比的摩揭陀、布里哈德婆罗、克罗他,以及苏婆罗之子沙昆尼——这些战士也都在阵中列队。”

Verse 18

म्लेच्छाक्ष शतसाहसत्रा: शकाश्न यवनै: सह । सुदक्षिणश्न काम्बोजस्त्रिगर्ताधिपतिस्तथा

持国王说道:“有数十万弥勒叉人;还有塞迦人与夜婆那人同来;又有南方的剑波阇人,以及三伽尔多之主。”

Verse 19

भीष्म: पितामहश्नैव भारद्वाजो5थ गौतम: । श्रुतायुश्चायुतायुश्च शतायुश्चापि वीर्यवान्‌

持国王说道:“毗湿摩——那位祖父;还有婆罗堕阇与瞿昙;以及舒鲁塔优、阿优塔优,并且勇武的舍塔优。”

Verse 20

जलसन्धो<थार्ष्यशृज्जी राक्षसश्वाप्पलायुध: । अलनम्बुषो महाबाहु: सुबाहुश्च महारथ:

持国王说道:“阇罗散陀;阿尔湿耶室陵耆;罗刹阿罗优陀亦在;臂力雄伟的阿兰难布沙;以及苏婆呼——大车战士——这些也都在战阵之中。”

Verse 21

एते चान्ये च बहवो राजानो राजसत्तम । मदर्थमुद्यता: सर्वे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च

“而这些人,连同许多别的国王,啊,诸王之最上者,都为我而起——甘愿舍弃性命与财宝。”

Verse 22

“नृपश्रेष्ठल भगदत्त, कृपाचार्य, शल्य, अवन्तीके राजकुमार, जयद्रथ, भूरिश्रवा, सोमदत्त, महाराज बाह्लिक, अश्व॒त्थामा, कृतवर्मा, महाबली मगधनरेश बृहद्वल, क्राथ, सुबलपुत्र शकुनि, लाखों म्लेच्छ, यवन एवं शक, काम्बोजराज सुदक्षिण, त्रिगर्तराज सुशर्मा, पितामह भीष्म, भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य, गौतमगोत्रीय कृपाचार्य, श्रुतायु, अयुतायु, पराक्रमी शतायु, जलसन्ध, ऋष्यशंगपुत्र राक्षत अलायुध, महाबाहु अलम्बुष और महारथी सुबाहु--ये तथा और भी बहुत-से नरेश मेरे लिये प्राणों और धनका मोह छोड़कर सब-के- सब युद्धके लिये उद्यत हैं ।। तेषां मध्ये स्थितो युद्धे भ्रातृभि: परिवारित: । योधयिष्याम्यहं पार्थान्‌ पज्चालांश्वैव सर्वश:,“इन सबके बीचमें रहकर भाइयोंसे घिरा हुआ मैं रणभूमिमें पाण्डवों और पांचालोंके साथ युद्ध करूँगा

持国王说道:“诸王之中最为杰出者——婆伽达多、克利波、沙利耶、阿槃提之王子、阇耶陀罗他、部利湿罗婆娑、苏摩达多、巴诃利迦王、阿湿婆他摩、克利多伐摩、强盛的摩揭陀君主布里诃陀婆罗、克罗他、苏婆罗之子沙昆尼;又有无数的弥勒叉、夜婆那与释迦;迦摩波阇之王苏达克希那;三伽尔多之王苏舍尔摩;祖父毗湿摩;婆罗堕阇之子德罗那;出自瞿昙族系的克利波;尸噜多阿瑜、阿瑜多阿瑜与英勇的舍多阿瑜;阇罗散陀;利湿耶室陵伽之子、罗刹阿罗耶瑜陀;臂力雄强的阿蓝布沙;以及大车战士苏婆呼——这些人以及更多的诸侯,为了我,尽弃对性命与财宝的贪恋,皆已整装待战。 我立于他们之中,身旁为诸弟所环,在战场上将以一切方式与般度之子及旁遮罗人交锋。”

Verse 23

चेदींश्व नृपशार्दूल द्रौपदेयांश्व॒ संयुगे । सात्यकिं कुन्तिभोजं च राक्षसं च घटोत्कचम्‌,'राजसिंह! मैं युद्धस्थलमें चेदियों, द्रौपदीकुमारों, सात्यकि, कुन्तिभोज तथा राक्षस घटोत्कचका भी सामना करूँगा

持国王说道:“噫,诸王之虎!在战场上,我也将迎战车提人、德劳帕蒂之子们、萨底耶吉、昆提婆阇,以及罗刹迦托特迦遮。”

Verse 24

एको5प्येषां महाराज समर्थ: संनिवारणे । समरे पाण्डवेयानां संक्रुद्धो ह्भिधावताम्‌

持国王说道:“大王啊,他们之中纵使仅一人,也足以在战斗中遏止般度族的勇士——尤其当他怒火炽盛,而他们直冲而来之时。”

Verse 25

अथवा सर्व एवैते पाण्डवस्यानुयायिभि:

又或者,这些人全都是般度族的追随者与拥护者——以效忠之心立于他身后者。

Verse 26

कर्ण एको मया सार्ध निहनिष्यति पाण्डवान्‌

持国王自信地宣言:“迦尔那独自一人,与我并肩作战,便能歼灭般度诸子。”

Verse 27

यश्न तेषां प्रणेता वै वासुदेवोी महाबल:

对他们而言,真正的统领乃是婆苏提婆(Vāsudeva)——力大无穷者——其指引决定他们的行止。此言昭示:战争中的力量不唯在筋骨之勇,更在正当的领导与明辨的谋略。

Verse 28

तस्याथ वदतः सूत बहुशो मम संनिधौ

于是,苏多(Sūta)啊,当他开口之时,就在我面前,那些话被一遍又一遍地重申——为使在迫近的危局中应当铭记并付诸行事之事,不致遗忘。

Verse 29

शक्तितो हानुपश्यामि निहतान्‌ पाण्डवान्‌ रणे । सूत! मेरे निकट दुर्योधन जब इस तरहकी बहुत-सी बातें कहने लगा तो मैं यह समझ बैठा कि “हमारी शक्तिसे समस्त पाण्डव रणभूमिमें मारे जायँगे” || २८ $ ।। तेषां मध्ये स्थिता यत्र हन्यन्ते मम पुत्रका:

持国王说道:“我预见,凭我们手中的力量,般度五子将倒毙于战场。苏多啊,当都利约陀那近我身旁,说出许多此类言辞时,我竟以为:‘凭我方之力,般度五子必尽数死于沙场。’然而,正是在他们之中,我的儿子们却正在被击倒。”

Verse 30

भीष्मश्न निहतो यत्र लोकनाथ: प्रतापवान्‌,निहतः पाण्डवै: संख्ये किमन्यद्‌ भागधेयत: । जैसे सिंह सियारसे लड़कर मारा जाय, उसी प्रकार जहाँ लोकरक्षक प्रतापी वीर भीष्म शिखण्डीसे भिड़कर वधको प्राप्त हुए, जहाँ सम्पूर्ण शस्त्रास्त्रोंकी विद्याके पारंगत विद्वान्‌ ब्राह्मण द्रोणाचार्य पाण्डवोंद्वारा युद्धस्थलमें मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है?

持国王说道:“就在那场战争中,毗湿摩——护世之雄、威力无双——亦被诛杀;诸多大将也在阵中为般度五子所击倒。除此之外,还能有什么原因,不是命数吗?当连这样的守护者与兵法宗师都陨落时,人力与谋略仿佛都被命运的分配所压倒。”

Verse 31

शिखण्डिनं समासाद्य मृगेन्द्र इव जम्बुकम्‌ । द्रोणश्न ब्राह्मणो यत्र सर्वशस्त्रास्त्रपारग:

持国王说道:“逼近尸建陀(Śikhaṇḍin),如狮王迫向豺狼;彼处站着德罗纳(Droṇa)——婆罗门——于一切兵器与飞矢之术皆臻圆满。”

Verse 32

कर्णश्र निहत: संख्ये दिव्यास्त्रज्ञो महाबल:,जहाँ दिव्यास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाला महाबली कर्ण युद्धमें मारा गया, जहाँ समरांगणमें भूरिश्रवा, सोमदत्त तथा महाराज बाह्लिकका संहार हो गया, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण बताया जा सकता है?

持国王说道:当迦尔纳——力大无比、精通天授神兵之术者——在战阵中被诛;当在同一片战场上,布利湿罗婆、苏摩达多与巴诃利迦王亦尽皆覆灭——除此命数之外,还能说出什么缘由?

Verse 33

भूरिश्रवा हतो यत्र सोमदत्तश्न संयुगे । बाह्विकश्न महाराज: किमन्यद्‌ भागधेयत:,जहाँ दिव्यास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाला महाबली कर्ण युद्धमें मारा गया, जहाँ समरांगणमें भूरिश्रवा, सोमदत्त तथा महाराज बाह्लिकका संहार हो गया, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण बताया जा सकता है?

在那处,迦尔纳——雄力绝伦、通晓天授神兵者——战死沙场;在那同一战地,布利湿罗婆、苏摩达多与巴诃利迦王亦被歼灭——大王啊,除却命数之外,还能断言什么原因?

Verse 34

भगदत्तो हतो यत्र गजयुद्धविशारद: । जयद्रथश्न निहत: किमन्यद्‌ भागधेयत:,जहाँ गजयुद्धविशारद राजा भगदत्त मारे गये और सिंधुराज जयद्रथका वध हो गया, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है?

在那处,精于象战而名闻遐迩的婆伽达多被杀;在那处,信度之王阇耶陀罗他亦被诛——除此命数之外,还能有什么缘由?

Verse 35

सुदक्षिणो हतो यत्र जलसन्धश्न पौरव: । श्रुतायुश्नायुतायुश्न॒ किमन्‍्यद्‌ भागधेयत:,जहाँ काम्बोजराज सुदक्षिण, पौरव, जलसन्ध, श्रुतायु और अयुतायु मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कारण हो सकता है?

在那处,甘婆阇的苏达克希那、波罗婆族的阇罗三陀,以及勇士室噜多由与阿由多由皆被杀——除此命数之外,还能有什么缘由?

Verse 36

महाबलस्तथा पाण्ड्य: सर्वशस्त्रभृतां वर: । निहत: पाण्डवै: संख्ये किमन्यद्‌ भागधेयत:,जहाँ सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाबली पाण्ड्यनरेश युद्धमें पाण्डवोंके हाथसे मारे गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्‍या कारण है?

般荼耶之王——雄力绝伦,诸持兵者之最——在鏖战之中为般度五子所杀。除此命数之外,还能有什么缘由?

Verse 37

बृहद्धलो हतो यत्र मागधश्न महाबल: । उग्रायुधश्न विक्रान्त: प्रतिमानं धनुष्मताम्‌,जहाँ बृहद्वल, महाबली मगधनरेश, धनुर्धरोंके आदर्श एवं पराक्रमी उग्रायुध, अवन्तीके राजकुमार, त्रिगर्तनरेश सुशर्मा तथा सम्पूर्ण संशप्तक योद्धा मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है?

持国王说道:“在那处,布里哈达陀罗被杀,摩揭陀那位大力之王亦告陨落;在那处,乌格罗优陀——勇猛无比、堪为弓手楷模——也被击倒,连同三伽尔多之主苏舍尔摩以及整支誓死作战的三萨普塔迦战士尽皆覆灭——除此命运之外,还能有什么原因?”

Verse 38

आवलन्त्यो निहतो यत्र त्रैगर्तक्ष जनाधिप: । संशप्तकाश्न निहता: किमन्यद्‌ भागधेयत:ः,जहाँ बृहद्वल, महाबली मगधनरेश, धनुर्धरोंके आदर्श एवं पराक्रमी उग्रायुध, अवन्तीके राजकुमार, त्रिगर्तनरेश सुशर्मा तथा सम्पूर्ण संशप्तक योद्धा मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है?

在那处,阿瓦兰提亚被杀;在那处,三伽尔多之主倒下;在那处,三萨普塔迦战士亦尽被诛灭——除却天命,还能有什么缘由?

Verse 39

अलम्बुषो महाशूरो राक्षसश्वाप्यलायुध: । आर्ष्यशूड्ग्शवि निहत: किमन्यद्‌ भागधेयत:,जहाँ शूरवीर अलम्बुष और ऋष्यशुंगपुत्र राक्षस अलायुध मारे गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कारण बताया जा सकता है?

“大勇士阿兰布沙,以及罗刹阿赖优陀——阿尔希耶施林伽之子——也都被杀了。除却命数,还能说出什么别的原因?”

Verse 40

नारायणा हता यत्र गोपाला युद्धदुर्मदा: । म्लेच्छाश्व बहुसाहस्रा: किमन्यद्‌ भागधेयत:,जहाँ नारायण नामवाले रणदुर्मद ग्वाले और कई हजार म्लेच्छ योद्धा मौतके घाट उतार दिये गये, वहाँ भाग्यके सिवा और कया कहा जा सकता है?

在那处,名为“那罗延那”的战狂牧牛人被杀;在那处,数千名弥勒叉骑兵亦被击落——除此命运所分配的份额外,还能说什么?

Verse 41

शकुनि: सौबलो यत्र कैतव्यश्व॒ महाबल: । निहत: सबलो वीर: किमन्यद्‌ भागधेयत:,जहाँ सुबलपुत्र महाबली शकुनि और उस जुआरीका पुत्र वीर उलूक दोनों ही सेनासहित मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है?

持国王说道:“当苏婆罗之子、力大无比的沙昆尼,以及那赌徒之子、勇士乌卢迦,连同他们的军队一并被杀——除却天命,还能有什么原因?”

Verse 42

एते चान्ये च बहव: कृतास्त्रा युद्धदुर्मदा: । राजानो राजतपूुत्रा श्न शूरा: परिघबाहव:

持国王说道:“此外还有许多别的人——诸王与王子——皆精习兵器之术,沉醉于战阵之傲,皆为勇士,其臂如铁杵。”

Verse 43

यत्र शूरा महेष्वासा: कृतास्त्रा युद्धदुर्मदा:,निहता: समरे सर्वे किमन्यद्‌ भागधेयत: । सूत संजय! जहाँ समरभूमिमें नाना देशोंसे आये हुए देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी बहुत-से शूरवीर महाथनुर्धर, अस्त्रवेत्ता एवं युद्धदुर्मद क्षत्रिय सारे-के-सारे मार डाले गये, वहाँ भाग्यके अतिरिक्त दूसरा क्या कारण हो सकता है?

持国王说道:“在那战场之上,诸英雄——强弓善射、精通兵器、沉醉于战争傲气者——尽皆被杀;除却命运本身,还能有什么缘由?”

Verse 44

बहवो निहता: सूत महेन्द्रसमविक्रमा: । नानादेशसमावृत्ता: क्षत्रिया यत्र संजय

持国王说道:“噢,苏多啊,三阇耶啊,那里已有许多刹帝利——勇力堪比因陀罗——被杀;他们是从诸多国土汇聚而来的战士。”

Verse 45

पुत्राश्न॒ मे विनिहता: पौत्राश्नैव महाबला:

持国王说道:“我的儿子们已被杀,我的孙子们亦然——皆是大力之人。”

Verse 46

वयस्या भ्रातरश्वैव किमन्यद्‌ भागधेयत: । हाय! मेरे महाबली पुत्र, पौत्र, मित्र और भाई-बन्धु सभी मार डाले गये, इसे दुर्भाग्यके सिवा और क्या कहूँ? ।। भागधेयसमायुक्तो ध्रुवमुत्पद्यते नर:

持国王说道:“朋友与兄弟——除此之外还能称作什么,不就是命数吗?唉!我那强大的儿子、孙子、朋友与宗亲尽皆被杀。我还能如何称呼此事,若非纯然的不幸?人既被自身所分得的命运所系缚,必定会走到这样的结局。”

Verse 47

अहं वियुक्तस्तैर्भाग्ये: पुत्रैश्नैवेह संजय,कथमसद्य भविष्यामि वृद्ध: शत्रुवशं गत: । संजय! मैं उन शुभकारक भाग्योंसे वंचित हूँ और पुत्रोंसे भी हीन हूँ। आज इस वृद्धावस्थामें शत्रुके वशमें पड़कर न जाने मेरी कैसी दशा होगी?

持国王说道:“善哉,三阇耶!我在此已失却一切吉祥福运,也同样失去了诸子。如今我年迈衰朽,又落入仇敌掌控之下,我将沦为怎样凄惨的境地?”

Verse 48

।। नान्यदत्र परं मन्ये वनवासादूृते प्रभो

“主上,此事之中,我不见有高于入林流居之道;此乃此间至上之途,守护正法,避免更大的过失。”

Verse 49

सो<हं वनं गमिष्यामि निर्बन्धुर्ज्ञातिसंक्षये । न हि मेडन्यद्‌ भवेच्छेयो वनाभ्युपगमादृते

“因此我将入林而去——亲族尽灭,我已无所依傍。于我而言,退隐森林之外别无更善之途;除归依林居之生,我不见任何真实之福。”

Verse 50

इमामवस्थां प्राप्तस्य लूनपक्षस्य संजय । सामर्थ्यशाली संजय! मेरे लिये वनवासके सिवा और कोई कार्य श्रेष्ठ नहीं जान पड़ता। अब कुट॒म्बीजनोंका विनाश हो जानेपर बन्धु-बान्धवोंसे रहित हो मैं वनमें ही चला जाऊँगा। संजय! पंख कटे हुए पक्षीकी भाँति इस अवस्थाको पहुँचे हुए मेरे लिये वनवास स्वीकार करनेके सिवा दूसरा कोई श्रेयस्कर कार्य नहीं है ।। दुर्योधनो हतो यत्र शल्यश्न निहतो युधि,एकेन समरे येन हतं पुत्रशतं मम | जब दुर्योधन मारा गया, शल्यका युद्धमें संहार हो गया तथा दुःशासन, विविंशति और महाबली विकर्ण भी मार डाले गये, तब मैं उस भीमसेनका उच्चस्वरसे कहा गया वचन कैसे सुनूँगा, जिसने अकेले ही समरांगणमें मेरे सौ पुत्रोंका वध कर डाला है

持国王说道:“三阇耶,我已堕入此境——如同被剪去双翼之鸟——于我而言,唯有退隐森林,别无更善之策。如今我家族覆灭,亲族盟友尽失,我将独自入林。对已至此境者,唯林居方为真正的良途。 在那样的世界里,杜罗约陀那已被诛,沙利耶战死沙场,而我百子又被一名勇士于战阵中尽数杀戮——我怎能忍受去听毗摩塞那那震天的言辞?”

Verse 51

दुःशासनो विविंशश्व विकर्णश्र महाबल: । कथं हि भीमसेनस्य श्रोष्ये5हं शब्दमुत्तमम्‌

持国王说道:“杜沙萨那、毗毗沙与大力的毗迦尔那——如今我怎能再听那毗摩塞那的高声之言?”

Verse 52

असकृद्धदतस्तस्य दुर्योधनवधेन च

持国王说道:“一次又一次,因为那件事——也因为都利约陀那被诛——我的心神反复被悲痛与动荡所击中。”

Verse 53

दुःखशोकाभिसंतप्तो न श्रोष्ये परुषा गिर: । दुर्योधनके वधसे दुःख और शोकसे संतप्त हुआ मैं बारंबार बोलनेवाले भीमसेनकी कठोर बातें नहीं सुन सकूँगा ।। ५२ ई ।। वैशम्पायन उवाच एवं वृद्धश्न संतप्त: पार्थिवो हतबान्धव:

他被痛苦与哀伤灼烧,宣称自己再也无法忍受听到毗摩塞那那一遍遍尖刻的言辞。毗舍婆耶那继续说道:于是这位国王——年迈而深受创痛,亲族尽遭杀戮——仍被悲苦吞噬;战争的残酷甚至使言语本身也成了新的创伤。

Verse 54

मुहुर्मुहुर्मुह्मान: पुत्राधिभिरभिप्लुत: । विलप्य सुचिरं काल धृतराष्ट्रोडम्बिकासुत:

毗舍婆耶那说道:一再地,持国王——安比迦之子——陷入迷惘,被对诸子的哀痛所淹没。他长久哀号,心神在战争余波中屡屡沉坠于执著与失落的重压之下。

Verse 55

दीर्घमुष्णं स नि:श्वस्य चिन्तयित्वा पराभवम्‌ | दुःखेन महता राजन्‌ संतप्तो भरतर्षभ:ः

毗舍婆耶那说道:他长长地、灼热地叹息一声,回想自己的败亡;那位婆罗多族之雄牛,内心被巨大的悲苦灼烧,啊,国王,他深陷痛楚。

Verse 56

पुनर्गावल्‍गर्णिं सूतं पर्यपृच्छद्‌ यथातथम्‌ । वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार पुत्रोंकी चिन्तामें डूबकर बारंबार मूर्च्छित होनेवाले, संतप्त एवं बूढ़े भरतश्रेष्ठ राजा अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र जिनके बन्धु-बान्धव मार डाले गये थे, दीर्घकालतक विलाप करके गरम साँस खींचते और अपने पराभवकी बात सोचते हुए महान्‌ दुःखसे संतप्त हो उठे तथा गवल्गणपुत्र संजयसे पुनः युद्धका यथावत्‌ समाचार पूछने लगे || ५३--५५ $ ।। धृतराष्ट्र रवाच भीष्मद्रोणौ हतीौ श्रुत्वा सूतपुत्रं च घातितम्‌

毗舍婆耶那说道:随后,他又询问御者三阇耶——伽瓦尔伽那之子——要他将战事经过如实详述,分毫不差。在毁灭与哀恸之中,国王执意求得准确的叙述,显出战争后果的道义重负,也显出人必须直面真相的需要,即便真相会使悲伤更深。

Verse 57

यं य॑ सेनाप्रणेतारं युधि कुर्वन्ति मामका:

毗舍摩波耶那说道:“凡我方在战阵之中所任命为统帅者……”

Verse 58

रणमूर्थ्नि हतो भीष्म: पश्यतां व: किरीटिना

毗舍摩波耶那说道:“就在战场最前沿,毗湿摩当着你们的面,被戴冠的战士(阿周那)击倒。”

Verse 59

एवमेव हत: कर्ण: सूतपुत्र: प्रतापवान्‌

毗舍摩波耶那说道:“同样地,迦尔那——那位英勇的御者之子——也被杀了。”

Verse 60

पूर्वमेवाहमुक्तो वै विदुरेण महात्मना

毗舍摩波耶那说道:“先前我确已受大心者毗度罗的教诲。”

Verse 61

केचिन्न सम्यक्‌ पश्यन्ति मूढा: सम्यगवेक्ष्य च । तदिदं मम मूढस्य तथाभूतं वच: सम तत्‌,संसारमें कुछ मूढ़ मनुष्य ऐसे होते हैं, जो अच्छी तरह देखकर भी नहीं देख पाते। मैं भी वैसा ही मूढ़ हूँ। मेरे लिये वह वचन वैसा ही हुआ (मैं उसे सुनकर भी न सुन सका)

毗舍摩波耶那说道:“有些迷妄之人,即使细察也不能真见。吾亦如是愚昧;那番劝诫于我竟如无物——听见却未领受——因此我未能明其旨意,也未能依之而行。”

Verse 62

यदब्रवीत्‌ स धर्मात्मा विदुरो दीर्घदर्शिवान्‌ | तत्तथा समनुप्राप्तं वचनं सत्यवादिन:,दूरदर्शी धर्मात्मा विदुरने पहले जो कुछ कहा था, वह सब उसी रूपमें सामने आया है। सत्यवादी महात्माका वचन सत्य होकर ही रहा

毗湿摩波耶那说:先前那位正直而目光深远的毗度罗所言,如今已一一如实应验。那位说真语的大圣者之言,在现实中证明了其真实不虚。

Verse 63

दैवोपहतचित्तेन यन्मया न कृतं पुरा । अनयस्य फल तस्य ब्रूहि गावल्गणे पुन:,संजय! पहले दैवसे मेरी बुद्धि मारी गयी थी; इसलिये मैंने जो विदुरजीकी बात नहीं मानी, मेरे उस अन्यायका फल जैसे-जैसे प्रकट हुआ है, उसका वर्णन करो

毗湿摩波耶那说:“噢,伽瓦尔伽那,三阇耶——从前我的心智为命运所击倒,因此未能行当行之事。你再告诉我:那不义之举的果报,是如何一步一步显现出来的?”

Verse 64

को वा मुखमनीकानामासीत्‌ कर्णे निपातिते । अर्जुन वासुदेवं च को वा प्रत्युद्ययौ रथी,कर्णके मारे जानेपर सेनाके मुखस्थानपर खड़ा होनेवाला कौन था? कौन रथी अर्जुन और श्रीकृष्णका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा?

毗湿摩波耶那说:“当迦尔那被击倒之后,谁站在俱卢军阵的最前列?又是哪位车战勇士挺身而出,要去迎战阿周那与婆苏提婆(奎师那)?”

Verse 65

केडरक्षन्‌ दक्षिणं चक्र मद्रराजस्य संयुगे । वाम॑ च योद्धुकामस्य के वा वीरस्य पृष्ठत:,युद्धस्थलमें जूझनेकी इच्छावाले मद्रराज शल्यके दाहिने या बायें पहियेकी रक्षा किन लोगोंने की? अथवा उस वीर सेनापतिके पृष्ठ-रक्षक कौन थे?

毗湿摩波耶那说:“在鏖战之中,渴望交锋的摩陀罗王沙利耶,其战车右轮由谁护卫?左轮又由谁护卫?而那位英勇统帅的后卫又是谁?”

Verse 66

कथं च व: समेतानां मद्रराजो महारथ: । निहतः पाण्डवै: संख्ये पुत्रो वा मम संजय,संजय! तुम सब लोगोंके एक साथ रहते हुए भी महारथी मद्रराज शल्य अथवा मेरा पुत्र दुर्योधन दोनों ही तुम्हारे सामने पाण्डवोंके हाथसे कैसे मारे गये?

毗湿摩波耶那说:“三阇耶!你们众人明明齐聚一处,为何大车战勇士摩陀罗王沙利耶——或是我的儿子(难敌)——竟在战阵之中被般度族所杀,就在你们眼前?如此败局,究竟如何发生?”

Verse 67

ब्रृहि सर्व यथातत्त्वं भरतानां महाक्षयम्‌ । यथा च निहत: संख्ये पुत्रो दुर्योधनो मम,तुम भरतवंशियोंके इस महान्‌ विनाशका सारा वृत्तान्त यथार्थ रूपसे बताओ। साथ ही यह भी कहो कि युद्धस्थलमें मेरा पुत्र दुर्योधन किस प्रकार मारा गया?

毗舍波耶那说道:“请如实无遗地告诉我,婆罗多族那场巨大的毁灭究竟如何发生;并且也请说明,在激战之中,我的儿子都利约陀那是怎样被杀的。”

Verse 68

पज्चालाश्च यथा सर्वे निहता: सपदानुगा: । धृष्टद्युम्न: शिखण्डी च द्रौपद्या: पजच चात्मजा:,समस्त पांचाल-सैनिक अपने सेवकोंसहित कैसे मारे गये? धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंका वध किस प्रकार हुआ?

毗舍波耶那说道:“所有的般遮罗人是以何种方式被杀的,连同他们的侍从与随从?而德里什塔丢姆那与尸建陀因又是如何被杀的,以及德劳帕蒂的五个儿子又是怎样遇害的?”

Verse 69

पाण्डवाश्व यथा मुक्तास्तथो भौ माधवीौ युधि । कृपश्च कृतवर्मा च भारद्वाजस्य चात्मज:,पाँचों पाण्डव, दोनों मधुवंशी वीर श्रीकृष्ण और सात्यकि, कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा--ये युद्धस्थलसे किस प्रकार जीवित बच गये?

毗舍波耶那说道:“五位般度之子是如何从战场上保全性命的?两位摩陀婆英雄——奎师那与萨提亚奇——又如何在战争之中幸存?而克利波、克利多伐尔摩,以及婆罗陀婆阇之子(阿湿婆他摩)也怎样得以活着脱身?”

Verse 70

यद्‌ यथा यादृशं चैव युद्ध वृत्तं च साम्प्रतम्‌ । अखिल श्रोतुमिच्छामि कुशलो हासि संजय,संजय! जो युद्धका वृत्तान्त जिस प्रकार और जैसे संघटित हुआ हो, वह सब इस समय मैं सुनना चाहता हूँ। तुम वह सब बतानेमें कुशल हो

毗舍波耶那说道:“三阇耶,我愿此刻听你详尽叙述这场战争的经过——它究竟如何发生、以何种方式展开,直至如今的情形。你善于陈述此事,因此把一切都告诉我。”

Verse 243

कि पुन: सहिता वीरा: कृतवैराश्न पाण्डवै: । “महाराज! मेरे इन सहयोगियोंमेंसे एक-एक वीर भी समरांगणमें कुपित होकर मुझपर आक्रमण करनेवाले समस्त पाण्डवोंको रोकनेमें समर्थ हैं। फिर यदि पाण्डवोंके साथ वैर रखनेवाले ये सारे वीर एक साथ होकर युद्ध करें तब क्या नहीं कर सकते

“大王啊!在我这些同盟之中,哪怕每一位勇士单独出阵,也足以在战场上怒起迎敌,阻挡那一切向我猛攻而来的般度诸子。更何况这些与般度结怨的英雄若齐心并肩而战,又有什么做不到的呢?”

Verse 256

योत्स्यन्ते सह राजेन्द्र हनिष्यन्ति च तान्‌ मृथे । 'राजेन्द्र! अथवा ये सभी योद्धा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके अनुयायियोंके साथ युद्ध करेंगे और उन सबको रणभूमिमें मार गिरायेंगे

大王啊,他们将并肩作战,并在战阵之中把那些人斩杀于沙场——这是一句进谏般的断言,宣告迫近的集体杀伐。

Verse 263

ततो नृपतयो वीरा: स्थास्यन्ति मम शासने । “अकेला कर्ण ही मेरे साथ रहकर समस्त पाण्डवोंको मार डालेगा। फिर सारे वीर नरेश मेरी आज्ञाके अधीन हो जायँगे

随后,诸位英勇的国王都将俯首听命于我。(他自以为然地想:)“只要迦尔那独自留在我身旁,便能诛尽般度五子;此后,所有雄豪的君主都将归我节制。”

Verse 273

न स संनहाते राजन्निति मामब्रवीद्‌ वच: । “राजन! पाण्डवोंके जो नेता हैं, वे महाबली वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण युद्धके लिये कवच नहीं धारण करेंगे।” ऐसी बात दुर्योधन मुझसे कहता था

他对我说:“大王啊,他不会披甲。”杜尔约陀那不断对我这样讲:“大王啊,般度族的强大领袖——瓦苏德瓦之子、圣克里希纳——上阵时不会穿戴铠甲。”

Verse 313

निहतः पाण्डवै: संख्ये किमन्यद्‌ भागधेयत: । जैसे सिंह सियारसे लड़कर मारा जाय, उसी प्रकार जहाँ लोकरक्षक प्रतापी वीर भीष्म शिखण्डीसे भिड़कर वधको प्राप्त हुए, जहाँ सम्पूर्ण शस्त्रास्त्रोंकी विद्याके पारंगत विद्वान्‌ ब्राह्मण द्रोणाचार्य पाण्डवोंद्वारा युद्धस्थलमें मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है?

持国王说道:“我的勇士既被般度五子在战阵中所杀,除命数之外还能有什么缘由?正如狮子也可能在与豺狼搏斗后丧命,同样,在那场战争里,护世的雄武英雄毗湿摩与尸建陀因交锋而至死;又在那儿,精通一切兵器与飞射之术的博学婆罗门德罗纳,也被般度五子在沙场上诛杀。如此情形,除宿命之外,还能作何解释?”

Verse 423

निहता बहवो यत्र किमन्यद्‌ भागधेयतः । ये तथा और भी बहुत-से अस्त्रवेत्ता, रणदुर्मद, शूरवीर और परिघ-जैसी भुजाओंवाले राजा एवं राजकुमार अधिक संख्यामें मार डाले गये, वहाँ भाग्यके सिवा और क्या कारण बताया जाय?

持国王说道:“在那许多人被杀之处,除命数之外还能指称什么原因?当无数精通兵器之人——战意狂烈的英勇国王与王子,臂如铁杵——成群倒下,被大量斩灭之时,除了命运所分配的份额,还能剩下什么解释?”

Verse 446

निहता: समरे सर्वे किमन्यद्‌ भागधेयत: । सूत संजय! जहाँ समरभूमिमें नाना देशोंसे आये हुए देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी बहुत-से शूरवीर महाथनुर्धर, अस्त्रवेत्ता एवं युद्धदुर्मद क्षत्रिय सारे-के-सारे मार डाले गये, वहाँ भाग्यके अतिरिक्त दूसरा क्या कारण हो सकता है?

众人皆已战死于沙场——除却命数,还能有什么别的缘由?车夫之子桑阇耶啊!在那战地之上,来自诸国、勇猛如天帝因陀罗的无数豪杰,大弓手、通晓兵器者、骁悍好战的刹帝利,尽皆被屠戮殆尽;如此,除命运之外,又能归因于何?

Verse 463

यस्तु भाग्यसमायुक्त: स शुभं प्राप्तुयान्नर: । निश्चय ही मनुष्य अपना-अपना भाग्य लेकर उत्पन्न होता है, जो सौभाग्यसे सम्पन्न होता है, उसे ही शुभ फलकी प्राप्ति होती है

唯有具足善福之人,方能得吉祥之果。诚然,人各自带着自己的命分而生;唯有蒙受顺福者,才能获得吉庆的结果。

Verse 513

एकेन समरे येन हतं पुत्रशतं मम | जब दुर्योधन मारा गया, शल्यका युद्धमें संहार हो गया तथा दुःशासन, विविंशति और महाबली विकर्ण भी मार डाले गये, तब मैं उस भीमसेनका उच्चस्वरसे कहा गया वचन कैसे सुनूँगा, जिसने अकेले ही समरांगणमें मेरे सौ पुत्रोंका वध कर डाला है

持国王说道:“我怎能忍受去听毗摩塞那那震天的呼喊——那在战场上以一己之力屠尽我百子之人?当杜尤陀那已被杀,当沙利耶在交锋中覆灭,而杜沙萨那、毗毗摩沙提以及大力的毗迦尔那也都被击倒之时——我又怎能忍受那使我族嗣空虚之人的凯歌?”

Verse 563

सेनापतिं प्रणेतारं किमकुर्वत मामका: । धृतराष्ट्रने कहा--संजय! भीष्म और द्रोणाचार्यके वधका तथा युद्ध-संचालक सेनापति सूतपुत्र कर्णके विनाशका समाचार सुनकर मेरे पुत्रोंने क्या किया?

持国王说道:“桑阇耶!听闻毗湿摩与德罗纳阿阇梨已被杀,又闻那担任统帅、指挥战事的车夫之子迦尔纳也已覆灭之后,我的儿子们做了什么?”

Verse 576

अचिरेणैव कालेन तं त॑ निधघ्नन्ति पाण्डवा: | मेरे पुत्र युद्धस्थलमें जिस-जिस वीरको अपना सेनापति बनाते थे, पाण्डव उस-उसको थोड़े ही समयमें मार गिराते थे

不消片刻,般度五子便将我儿子们在战场上所任命的每一位统帅逐一击杀。

Verse 583

एवमेव हतो द्रोण: सर्वेषामेव पश्यताम । युद्धके मुहानेपर तुमलोगोंके देखते-देखते भीष्मजी किरीटधारी अर्जुनके हाथसे मारे गये। इसी प्रकार द्रोणाचार्यका भी तुम सब लोगोंके सामने ही संहार हो गया

毗舍波耶那说道:“德罗那亦是如此被杀——就在众人眼前。正如毗湿摩在战场上于众目睽睽之下倒下,德罗那阿阇梨也同样在集结的武士面前公开遭逢毁灭。”

Verse 593

स राजकानां सर्वेषां पश्यतां व: किरीटिना । इसी तरह प्रतापी सूतपुत्र कर्ण भी राजाओंसहित तुम सब लोगोंके देखते-देखते किरीटधारी अर्जुनके हाथसे मारा गया

毗舍波耶那说道:“在诸王面前——也在你们众人眼前——强大的迦尔纳,那位勇武的御者之子,也同样被戴冠的阿周那所杀。叙述强调此事乃公开见证之举:在战争中,即便最伟大者也会在命运之前倒下,并承受自己所择同盟与行为的后果。”

Verse 606

दुर्योधनापराधेन प्रजेयं विनशिष्यति । महात्मा विदुरने मुझसे पहले ही कहा था कि *दुर्योधनके अपराधसे इस प्रजाका विनाश हो जायगा”

毗舍波耶那说道:“由于都律约陀那的罪过,这百姓将遭毁灭。大心的毗度罗早已先行告诫我:‘都律约陀那的过失将给国土带来覆亡。’”

Verse 2936

व्यायच्छमाना: समरे किमन्यद्‌ भागधेयत: । जब ऐसे वीरोंके बीचमें रहकर भी प्रयत्नपूर्वक लड़नेवाले मेरे पुत्र समरांगणमें मार डाले गये, तब इसे भाग्यके सिवा और क्या कहा जा सकता है?

持国说道:“他们在战阵中竭尽全力——这还能称作别的什么,若非命运?即便身处那般英雄之中,仍以审慎之力奋战,我的儿子们却在战场上被杀。若非宿命,此事又当如何称呼?”

Frequently Asked Questions

Dhṛtarāṣṭra confronts the dilemma of responsibility: whether the catastrophe should be attributed primarily to destiny (bhāgadheya/daiva) or to culpable choices—especially partiality toward Duryodhana and the neglect of ethical counsel.

The chapter models retrospective ethical audit: grief is not only emotional loss but also an interpretive moment forcing recognition that governance without discernment, restraint, and receptivity to wise counsel produces predictable harm.

No explicit phalaśruti appears in this adhyāya; its meta-function is historiographic and ethical—linking narrative reportage (Saṃjaya’s account) to a broader framework of accountability and the consequences of adharma.