Adhyaya 28
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 2828 Verses

Adhyaya 28

अध्वर्यु–यति संवादः (Adhvaryu–Yati Dialogue on Svabhāva, Ahiṃsā, and Mokṣa)

Upa-parva: Adhvaryu–Yati Saṃvāda (Discourse on Yajña, Ahiṃsā, and Mokṣa) — within Āśvamedhika Parva

A brāhmaṇa voice presents a first-person analysis of sensory non-identification and mental non-appropriation: the speaker denies autonomous agency over smell, taste, sight, touch, and sound, and locates desire (kāma) and aversion (dveṣa) in svabhāva operating through embodied functions (prāṇa–apāna). He asserts that when one stands as the observing self within the body, one is not truly afflicted by kāma, krodha, aging, or death; non-craving and non-hatred prevent ‘adhesion’ of faults, like water on a lotus leaf. An ancient exemplum is then introduced: a yati criticizes the impending ritual killing of a goat; the adhvaryu replies with a cosmological redistribution argument (elements return to their sources) and claims śruti-sanctioned blamelessness. The yati counters by questioning beneficiary and consent, advancing ahiṃsā as the superior norm. The adhvaryu replies that ordinary living entails harm and frames perception and cognition as functions of the elements and prāṇa. The yati distinguishes the self’s dual aspect—akṣara (imperishable) and kṣara (perishable svabhāva)—and describes liberation as freedom from prāṇa-driven faculties, dualities, possessiveness, and fear, grounded in equality toward all beings. The adhvaryu acknowledges the instruction, continues the great rite without delusion, and the chapter closes by stating that such subtle mokṣa is known to brāhmaṇas and practiced under the guidance of the kṣetrajña (knower of the field).

Chapter Arc: अनुगीत के भीतर ब्राह्मण-गीत का सूक्ष्म द्वार खुलता है—ज्ञानी पुरुष की स्थिति का वर्णन, जहाँ इन्द्रियाँ विषयों को नहीं ‘भोगतीं’, केवल प्रकृति-स्वभाव के प्रवाह में कर्म घटता दिखता है। → संवाद में स्वभाव (प्रकृति) की प्रबलता उभरती है—काम-द्वेष का युद्ध, प्राण-अपान का देह में निवेश, और यह प्रश्न कि जब प्रत्येक चेष्टा में किसी-न-किसी रूप की हिंसा अनिवार्य है, तो यति/अध्वर्यु का आचरण कैसे निर्दोष कहा जाए। → यति आत्मा के द्वैध रूप का निर्णायक प्रतिपादन करता है—अक्षर (अविनाशी, सद्भाव) और क्षर (परिवर्तनशील, स्वभाव-प्रवृत्त); और ब्राह्मण-स्वर में यह बोध चरम पर पहुँचता है कि ‘क्षेत्रज्ञ’ की दृष्टि से देह-स्थित भावों को देखते हुए भी आसक्ति न हो—काम, क्रोध, जरा, मृत्यु से परे स्थित रहना ही मोक्ष का सूक्ष्म मार्ग है। → अध्वर्यु यति की बुद्धि-दीप्ति को स्वीकार कर अपने व्रत/मन्त्रकृत कर्म के संदर्भ में ‘भगवद्बुद्धि’ से आचरण की शुद्धि का निवेदन करता है; निष्कर्ष रूप में ब्राह्मण कहते हैं कि मोक्ष का यह अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप ब्राह्मण जानते हैं और उसे जानकर ‘क्षेत्रज्ञ’ की अर्थदर्शी दृष्टि से अनुष्ठान करते हैं।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-साज बक। डे अष्टाविशोड ध्याय: ज्ञानी पुरुषकी स्थिति तथा अध्वर्यु और यतिका संवाद ब्राह्मण उवाच गन्धान्‌ न जिप्रामि रसान्‌ न वेझि रूपं॑ न पश्यामि न च स्पृशामि | न चापि शब्दान्‌ विविधान्‌ शूणोमि न चापि संकल्पमुपैमि कंचित्‌,ब्राह्मण कहते हैं--मैं न तो गन्धोंको सूँघता हूँ, न रसोंका आस्वादन करता हूँ, न रूपको देखता हूँ, न किसी वस्तुका स्पर्श करता हूँ, न नाना प्रकारके शब्दोंको सुनता हूँ और न कोई संकल्प ही करता हूँ

婆罗门说道:“我不嗅诸香;我不觉诸味。我不见诸色,亦不触。种种声响我也不闻;甚至我不生起任何意向或心念造作。”

Verse 2

अर्थानिष्टान्‌ कामयते स्वभाव: सर्वान्‌ देष्यान्‌ प्रद्धिषते स्वभाव: । कामद्वेषायुद्धवत: स्वभावात्‌ प्राणापानौ जन्‍्तुदेहान्निवेश्य,स्वभाव ही अभीष्ट पदार्थोकी कामना रखता है, स्वभाव ही सम्पूर्ण द्वेष्य वस्तुओंके प्रति द्वेष करता है। जैसे प्राण और अपान स्वभावसे ही प्राणियोंके शरीरोंमें प्रविष्ट होकर अन्न-पाचन आदिका कार्य करते रहते हैं, उसी प्रकार स्वभावसे ही राग और द्वेषकी उत्पत्ति होती है। तात्पर्य यह कि बुद्धि आदि इन्द्रियाँ स्वभावसे ही पदार्थोंमें बर्त रही हैं

婆罗门说道:渴求所爱者,是本性;厌离一切可憎者,也是本性。正如普拉那与阿帕那(prāṇa、apāna)依其固有作用进入众生之身,恒常运作消化等诸过程;同样地——由本性自身——执著与憎厌便生起。其旨在于:智性与诸根等诸能力,受先天禀赋所驱,使其不断与境相接。

Verse 3

तेभ्यश्नान्यांस्तेषु नित्यांश्व भावान्‌ भूतात्मानं लक्षयेरन्‌ शरीरे । तस्मिंस्तिष्ठन्नास्मि सक्त: कथंचित्‌ कामक्रोधाभ्यां जरया मृत्युना च,इन बाह्य इन्द्रियों और विषयोंसे भिन्न जो स्वप्न और सुषुप्तिके वासनामय विषय एवं इन्द्रियाँ हैं तथा उनमें भी जो नित्यभाव हैं, उनसे भी विलक्षण जो भूतात्मा है, उसको शरीरके भीतर योगीजन देख पाते हैं। उसी भूतात्मामें स्थित हुआ मैं कहीं किसी तरह भी काम, क्रोध, जरा और मृत्युसे ग्रस्त नहीं होता

有别于外在诸根与其境——亦有别于梦与熟睡之域:在那里,习气(vāsanā)织就微细的对象与机能,并且还有恒常的倾向——瑜伽行者于此身之内洞见“部多阿特曼”(Bhūtātman),即由诸大所成的本我。安住于彼自性,我不为任何方式所系缚:欲与怒不能攫我,老与死亦不能胜我。

Verse 4

अकामयानस्य च सर्वकामा- नविद्विषाणस्य च सर्वदोषान्‌ | न मे स्वभावेषु भवन्ति लेपा- स्तोयस्य बिन्दोरिव पुष्करेषु,मैं सम्पूर्ण कामनाओंमेंसे किसीकी कामना नहीं करता। समस्त दोषोंसे भी कभी द्वेष नहीं करता। जैसे कमलके पत्तोंपर जल-बिन्दुका लेप नहीं होता, उसी प्रकार मेरे स्वभावमें राग और द्वेषका स्पर्श नहीं है

婆罗门说:“我不贪求诸欲境中的任何一境;对一切过失,我亦不怀憎恨。正如一滴水不著莲叶,执著与憎厌也不黏附于我的本性。”

Verse 5

नित्यस्य चैतस्य भवन्त्यनित्या निरीक्ष्यमाणस्य बहुस्वभावान्‌ | न सज्जते कर्मसु भोगजालं दिवीव सूर्यस्य मदूखजालम्‌,जिनका स्वभाव बहुत प्रकारका है, उन इन्द्रिय आदिको देखनेवाले इस नित्यस्वरूप आत्माके लिये सब भोग अनित्य हो जाते हैं। अतः वे भोगसमुदाय उस विद्वानको उसी प्रकार कर्मोमें लिप्त नहीं कर सकते, जैसे आकाशमें सूर्यकी किरणोंका समुदाय सूर्यको लिप्त नहीं कर सकता

对于这永恒的自我而言,它只是观照诸根与诸境那多种多样的戏演;一切享受皆被见为无常。因此,欲乐之网不能缠缚智者于诸业——正如日光在虚空中铺展,也不能玷污或系缚太阳本身。

Verse 6

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । अध्वर्युयतिसंवादं तं निबोध यशस्विनि,यशस्विनि! इस विषयमें अध्वर्यु और यतिके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, तुम उसे सुनो

在此亦有人援引一则古老的先例作为譬喻。请听吧,尊贵的夫人——那旧事乃是阿德瓦律祭官与苦行者耶提之间的对话,用以阐明此事及其道义旨趣。

Verse 7

प्रोक्ष्यमाणं पशुं दृष्टवा यज्ञकर्मण्यथाब्रवीत्‌ । यतिरध्वर्युमासीनो हिंसेयमिति कुत्सयन्‌,किसी यज्ञ-कर्ममें पशुका प्रोक्षण होता देख वहीं बैठे हुए एक यतिने अध्वर्युसे उसकी निन्दा करते हुए कहा--'यह हिंसा है (अत: इससे पाप होगा)'

见一兽在祭仪中被洒以净水,一位坐在旁侧的出家苦行者耶提便责难主祭的阿德瓦律道:“此乃暴行;必招罪业。”

Verse 8

तमध्वर्यु: प्रत्युवाच नायं छागो विनश्यति । श्रेयसा योक्ष्यते जन्तुर्यदि श्रुतिरियं तथा,अध्वर्युने यतिको इस प्रकार उत्तर दिया--'यह बकरा नष्ट नहीं होगा। यदि “पशुर्व नीयमान:” इत्यादि श्रुति सत्य है तो यह जीव कल्याणका ही भागी होगा

阿德瓦律祭官答道:“此羊并非毁灭。若吠陀圣传(śruti)所言‘牺牲之兽被牵引而行’确为真实,则此有情将被引向更高之善。”

Verse 9

यो हास्य पार्थिवो भाग: पृथिवीं स गमिष्यति । यदस्य वारिजं किंचिदपस्तत्‌ सम्प्रवेक्ष्यति,“इसके शरीरका जो पार्थिव भाग है, वह पृथ्वीमें विलीन हो जायगा। इसका जो कुछ भी जलीय भाग है, वह जलमें प्रविष्ट हो जायगा

婆罗门说道:“此身之中,凡属地者,终将归地而融入大地;凡属水者,终将入水而归于水。由此可见,有身之众生不过是诸元素暂时和合,终必复归其本源,以此令心安住于离著与正见。”

Verse 10

सूर्य चक्षु्दिश: श्रीत्रं प्राणोडस्य दिवमेव च । आगमगमे वर्तमानस्य न मे दोषो5स्ति कश्षन,“नेत्र सूर्यमें, कान दिशाओंमें और प्राण आकाशमें ही लयको प्राप्त होगा। शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार बर्ताव करनेवाले मुझको कोई दोष नहीं लगेगा'

婆罗门说道:“我的眼力将融入太阳,我的听觉将归于诸方,而我的生命之气(普拉那)将归入虚空——确乎归入那天界的广阔穹苍。由于我依照经典的戒命与既定的传统而行,所以任何过失都不会加诸于我。”

Verse 11

यतिरुवाच प्राणैर्वियोगे च्छागस्य यदि श्रेय: प्रपश्यसि । छागार्थे वर्तते यज्ञों भवत: कि प्रयोजनम्‌,यतिने कहा--यदि तुम बकरेके प्राणोंका वियोग हो जानेपर भी उसका कल्याण ही देखते हो, तब तो यह यज्ञ उस बकरेके लिये ही हो रहा है। तुम्हारा इस यज्ञसे क्या प्रयोजन है?

苦行者(游行者)说道:“若你认为即便这山羊的生命之气离散,它仍得其善,那么这祭祀便只是为这山羊而行。你在此祭中又有何所求?”

Verse 12

अत्र त्वां मन्‍्यतां भ्राता पिता माता सखेति च । मन्त्रयस्वैनमुन्नीय परवन्तं विशेषत:,श्रुति कहती है 'पशो! इस विषयमें तुझे तेरे भाई, पिता, माता और सखाकी अनुमति प्राप्त होनी चाहिये।' इस श्रुतिके अनुसार विशेषतः पराधीन हुए इस पशुको ले जाकर इसके पिता माता आदिसे अनुमति लो (अन्यथा तुझे हिंसाका दोष अवश्य प्राप्त होगा)

婆罗门说道:“在此,应当征询它的兄弟、父亲、母亲与朋友的意见,并得其允可。因此,把这生灵——如今尤为受制于他人——牵离此处,去求得它的父母及其余亲属的许可;否则,此举必然招致暴害之罪。”

Verse 13

एवमेवानुमन्येरंस्तान्‌ भवान्‌ द्रष्टमरहति । तेषामनुमतं श्रुत्वा शक्‍्या कर्तु विचारणा,पहले तुम्हें इस पशुके उन सम्बन्धियोंसे मिलना चाहिये। यदि वे भी ऐसा ही करनेकी अनुमति दे दें, तब उनका अनुमोदन सुनकर तदनुसार विचार कर सकते हो

“同样,你应当前去会见那些人。听取他们的同意之后,方可斟酌并据此作出决定。”

Verse 14

प्राणा अप्यस्य छागस्य प्रापितास्ते स्वयोनिषु । शरीरं केवल शिष्ट निश्चेष्टमिति मे मति:,तुमने इस छागकी इन्द्रियोंको उनके कारणोंमें विलीन कर दिया है। मेरे विचारसे अब तो केवल इसका निश्वेष्ट शरीर ही अवशिष्ट रह गया है

婆罗门说道:“连这山羊的生命之气也已被引回各自的本源。依我之见,如今所剩不过是它的躯体——被遗下,毫无动静。”

Verse 15

इन्धनस्य तु तुल्येन शरीरेण विचेतसा । हिंसानिर्वेष्टकामानामिन्धनं पशुसंज्ञितम्‌,यह चेतनाशून्य जड शरीर ईंधनके ही समान है, उससे हिंसाके प्रायश्चित्तकी इच्छासे यज्ञ करनेवालोंके लिये ईँधन ही पशु है (अत: जो काम ईंधनसे होता है, उसके लिये पशु- हिंसा क्यों की जाय?)

此身无知无觉、无心无识,与柴薪并无差别。因此,凡欲以祭祀来赎补杀害之罪者,当以柴薪本身为“祭牲”;若仪式以柴薪即可成就,又何必再行杀生?

Verse 16

अहिंसा सर्वधर्माणामिति वृद्धानुशासनम्‌ | यदिहिंस्रं भवेत्‌ कर्म तत्‌ कार्यमिति विद्यहे,वृद्ध पुरुषोंका यह उपदेश है कि अहिंसा सब धर्मामें श्रेष्ठ है, जो कार्य हिंसासे रहित हो वही करने योग्य है, यही हमारा मत है

婆罗门说道:“这是长老相传的训诫:不害(阿希姆萨)为诸法之首。因此,我们认为唯有远离暴力之行,才真正值得去做。”

Verse 17

अहिंसेति प्रतिज्ञेयं यदि वक्ष्याम्यत: परम्‌ | शक्यं बहुविध॑ कर्तु भवता कार्यदूषणम्‌,इसके बाद भी यदि मैं कुछ कहूँ तो यही कह सकता हूँ कि सबको यह प्रतिज्ञा कर लेनी चाहिये कि “मैं अहिंसा-धर्मका पालन करूँगा।” अन्यथा आपके द्वारा नाना प्रकारके कार्य-दोष सम्पादित हो सकते हैं

婆罗门说道:“若我还要再说一句,那便是:当立坚固誓愿——‘我将奉行不害之法。’否则,你的作为将引生种种过失,败坏本分。”

Verse 18

अहिंसा सर्वभूतानां नित्यमस्मासु रोचते । प्रत्यक्षत: साधयामो न परोक्षमुपास्महे,किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना ही हमें सदा अच्छा लगता है। हम प्रत्यक्ष फलके साधक हैं, परोक्षकी उपासना नहीं करते हैं

婆罗门说道:“对一切众生不加伤害,常令我等心悦。我们求取的是眼前可证之果,不事那迂回幽隐、不可见之道。”

Verse 19

अध्वर्युर्वाच भूमेर्गन्धगुणान्‌ भुड्क्षे पिबस्पापोमयान्‌ रसान्‌ । ज्योतिषां पश्यसे रूप॑ स्पृशस्यनिलजान्‌ गुणान्‌,अध्वर्युने कहा--यते! यह तो तुम मानते ही हो कि सभी भूतोंमें प्राण है, तो भी तुम पृथ्वीके गन्ध गुणोंका उपभोग करते हो, जलमय रसोंको पीते हो, तेजके गुण? रूपका दर्शन करते हो और वायुके गुण स्पर्शको छूते हो, आकाशजनित शब्दोंको सुनते हो और मनसे मतिका मनन करते हो

阿德瓦留祭官说道:“噢,苦行者!你享用大地之香;你饮取水之味;你观见色相——那是火与光之德;你触摸风所生的触感。你既承认生命遍在诸有情,却仍以诸根逐其境界——你将如何使你的主张与自身所行相合?”

Verse 20

शृणोष्याकाशजान्‌ शब्दान्‌ मनसा मन्यसे मतिम्‌ । सर्वाण्येतानि भूतानि प्राणा इति च मन्यसे,अध्वर्युने कहा--यते! यह तो तुम मानते ही हो कि सभी भूतोंमें प्राण है, तो भी तुम पृथ्वीके गन्ध गुणोंका उपभोग करते हो, जलमय रसोंको पीते हो, तेजके गुण? रूपका दर्शन करते हो और वायुके गुण स्पर्शको छूते हो, आकाशजनित शब्दोंको सुनते हो और मनसे मतिका मनन करते हो

婆罗门说道:“你听见从虚空中生起的声音;又以心意思量,形成判断。你也认为这一切众生,究其实皆是‘普拉那’(prāṇa,生命之息)。”在此语境中,这话是在逼问一个伦理要点:即便承认生命遍在于一切有情,人仍不断动用诸根与内在思惟之力;因此必须省察,感官之享受与心识之造作,究竟如何与自己所宣称的敬生之心以及自制之戒相契合。

Verse 21

एक ओर तो तुम किसी प्राणीके प्राण लेनेके कार्यसे निवृत्त हो और दूसरी ओर हिंसामें लगे हुए हो। द्विजवर! कोई भी चेष्टा हिंसाके बिना नहीं होती। फिर तुम कैसे समझते हो कि तुम्हारे द्वारा अहिंसाका ही पालन हो रहा है?

婆罗门说道:“一方面你自称不再夺取任何生灵之命;另一方面你却仍在暴害之中行事。噢,二次生者中之最胜者!没有任何行动能完全不带伤害。既如此,你怎会以为自己所行尽是非暴力?”

Verse 22

यतिरुवाच अक्षरं च क्षरं चैव द्वैधीभावो5यमात्मन: । अक्षरं तत्र सद्भाव: स्वभाव: क्षर उच्यते,यतिने कहा--आत्माके दो रूप हैं--एक अक्षर और दूसरा क्षर। जिसकी सत्ता तीनों कालोंमें कभी नहीं मिटती वह सत्स्वरूप अक्षर (अविनाशी) कहा गया है तथा जिसका सर्वथा और सभी कालोंमें अभाव है, वह क्षर कहलाता है

苦行者说道:“自我(我性)被说为有二相:不坏与坏。凡真实存在,三世之中从不毁灭者,名为‘不坏’。而其性唯是非有,于一切时中全无真实者,名为‘坏’。”

Verse 23

प्राणादाने निवृत्तोडसि हिंसायां वर्तते भवान्‌ | नास्ति चेष्टा विना हिंसां कि वा त्वं मन्यसे द्विज,प्राणो जिह्ठा मन: सत्त्वं सद्भावो रजसा सह । भावैरेतैविंमुक्तस्य निर्दधन्द्स्य निराशिष: प्राण, जिह्ला, मन और रजोगुणसहित सत्त्वगगुण--ये रज अर्थात्‌ मायासहित सद्धाव हैं। इन भावोंसे मुक्त निर्दन्द्ध, निष्काम, समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखनेवाले, ममतारहित, जितात्मा तथा सब ओरसे बन्धनशून्य पुरुषको कभी और कहीं भी भय नहीं होता

婆罗门说道:“你虽已退离夺命之事,却仍在暴害的境域中行走。因为没有任何行动能不带伤害——你对此作何想,噢,二次生者?生命之息(prāṇa)、舌与心——并与萨埵与罗阇之德相伴——构成驱使有身之生的内在倾向。然而,对那已从这些冲动中解脱、超越对待二边、且不贪求果报之人,恐惧于任何处、任何时都不会生起。”

Verse 24

समस्य सर्वभूतेषु निर्ममस्य जितात्मन: । समन्तात्‌ परिमुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित्‌,प्राण, जिह्ला, मन और रजोगुणसहित सत्त्वगगुण--ये रज अर्थात्‌ मायासहित सद्धाव हैं। इन भावोंसे मुक्त निर्दन्द्ध, निष्काम, समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखनेवाले, ममतारहित, जितात्मा तथा सब ओरसे बन्धनशून्य पुरुषको कभी और कहीं भी भय नहीं होता

婆罗门说道:对于那对一切众生平等无偏、无所占有、能自制其心、并从四面八方的系缚中全然解脱之人,恐惧不生——无论何时何地。其伦理旨趣在于:恐惧由执著与自我认同所滋养;当它们借由内在的主宰与普遍的平等心而被舍离时,心便坚固不动,难以撼摇。

Verse 25

अध्वर्युरुवाच सद्धिरेवेह संवास: कार्यो मतिमतां वर । भवतो हि मतं श्रुत्वा प्रतिभाति मतिर्मम,अध्वर्युने कहा--बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ यते! इस जगतमें आप-जैसे साधुपुरुषोंके साथ ही निवास करना उचित है। आपका यह मत सुनकर मेरी बुद्धिमें भी ऐसी ही प्रतीति हो रही है। भगवन्‌! विप्रवर! मैं आपकी बुद्धिसे ज्ञानसम्पन्न होकर यह बात कह रहा हूँ कि वेदमन्त्रोंद्वारा निश्चित किये हुए व्रतका ही मैं पालन कर रहा हूँ। अतः इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है

阿德瓦梨优说道:“噢,智者中最卓越者,在这世间确应与善人同住。听闻你的见解之后,我的理解也以同样的方式豁然明亮。”

Verse 26

भगवन्‌ भगवदबुद्धया प्रतिपन्नो ब्रवीम्पहम्‌ । व्रतं मन्त्रकृतं कर्तुर्नापराधो5स्ति मे द्विज,अध्वर्युने कहा--बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ यते! इस जगतमें आप-जैसे साधुपुरुषोंके साथ ही निवास करना उचित है। आपका यह मत सुनकर मेरी बुद्धिमें भी ऐसी ही प्रतीति हो रही है। भगवन्‌! विप्रवर! मैं आपकी बुद्धिसे ज्ञानसम्पन्न होकर यह बात कह रहा हूँ कि वेदमन्त्रोंद्वारा निश्चित किये हुए व्रतका ही मैं पालन कर रहा हूँ। अतः इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है

“尊者啊,我已采纳与主相应的理解(亦与您明达的劝诫相合),因此我如此陈述:我所遵守的,只是为行祭者而由吠陀真言所确立的誓戒。故而,噢二次生者,在此事上我并无过失。”

Verse 27

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीतासग्बन्धी सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ,ब्राह्मण उवाच उपपचन्त्या यतिस्तृष्णीं वर्तमानस्तत: परम्‌ | अध्वर्युरपि निर्मोह: प्रचचार महामखे ब्राह्मण कहते हैं--प्रिये! अध्वर्युकी दी हुई युक्तिसे वह यति चुप हो गया और फिर कुछ नहीं बोला। फिर अध्वर्यु भी मोहरहित होकर उस महायज्ञमें अग्रसर हुआ

婆罗门说道:“爱人啊,当阿德瓦梨优以正当的理据作答时,那位苦行者便沉默不语,不再多言。随后,阿德瓦梨优也离却迷妄,在那场大祭中继续前行。”

Verse 28

एवमेतादृशं मोक्ष सुसूक्ष्मं ब्राह्मणा विदु: । विदित्वा चानुतिष्ठ न्ति क्षेत्रज्ञेनार्थदर्शिना,इस प्रकार ब्राह्मण मोक्षका ऐसा ही अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप बताते हैं और तत्त्वदर्शी पुरुषके उपदेशके अनुसार उस मोक्ष-धर्मको जानकर उसका अनुष्ठान करते हैं इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु अष्टाविंशो5ध्याय:

婆罗门们便是如此理解解脱:其性极其微妙。既已了知,他们便依“知田者”(kṣetrajña)——洞见真实与义理之人——的教导,修行那解脱之法。

Frequently Asked Questions

Whether a Vedic sacrificial act involving an animal can be ethically justified: the adhvaryu appeals to śruti and elemental-return reasoning, while the yati interrogates consent, benefit, and the primacy of ahiṃsā.

Liberation is framed as non-adhesion to svabhāva-driven impulses (kāma, dveṣa), stabilization in the observing self (kṣetrajña), and cultivation of equanimity and non-possessiveness, such that faults do not ‘stick’ to one’s nature.

A concluding meta-statement functions as the chapter’s validation: this mokṣa is ‘subtle’ and known to brāhmaṇas; having understood it, they practice accordingly under the guidance of the kṣetrajña perspective, emphasizing disciplined realization rather than a ritual reward claim.