Adhyaya 20
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 2028 Verses

Adhyaya 20

Abhaya-Itihāsa: Karma, Indriyas, and the Non-sensory Brahman (Brāhmaṇī–Brāhmaṇa Saṃvāda)

Upa-parva: Āśvamedhika-parva — Itihāsa of Abhaya (Pārtha-saṃvāda) episode

Vāsudeva introduces an ancient exemplum named “Abhaya,” presented as a dialogue. A brāhmaṇī approaches her brāhmaṇa husband, described as secluded and learned, and asks about her posthumous destination given dependence on her husband’s spiritual attainments (1–5). The brāhmaṇa replies by reframing common assumptions: people often fixate on “karma” as what is grasped, seen, and heard, yet action without knowledge tends to constrain understanding; non-action as a mere physical state is not straightforwardly available in embodied life (6–7). He then outlines a technical account of action through body, mind, and speech, and points to an inner ‘āyatana’ where a non-dual Brahman is contemplated—beyond sensory objects, reached by mind and disciplined insight (8–13). The discourse proceeds to prāṇic physiology (prāṇa, apāna, samāna, vyāna, udāna), their locations and functions in waking and sleep, and the role of udāna in restraint and ascetic discipline (14–17). A sacrificial-analytic metaphor follows: the inner Vaiśvānara fire is described with seven “fuel-sticks/offerings” mapped to sense faculties and cognitive functions, with corresponding objects and agents (18–22). Finally, seven “yonis” (earth, wind, space, water, light, mind, intellect) are named as matrices into which qualities enter, re-emerge, and are reabsorbed at dissolution; from these arise sensory qualities and cognitive states such as doubt and resolve, completing a sevenfold generative schema (23–27).

Chapter Arc: वायुदेव एक प्राचीन इतिहास का आह्वान करते हैं—एक ब्राह्मणी अपने एकान्त-निवासी, कर्म-त्यागी, ज्ञान-विज्ञान-पारगामी पति के पास जाकर अपने परलोक-गमन का प्रश्न उठाती है: ‘पत्नी को पति के कृत लोक मिलते हैं—तो मैं तुम्हारे आश्रय में किस गति को जाऊँ?’ → ब्राह्मणी कर्म के प्रत्यक्ष, ‘ग्रह्य-दृश्य-सत्य’ स्वरूप को सामने रखती है—दीक्षा, व्रत, यज्ञ, गृहस्थ-धर्म; और ‘कर्म ही कर्म’ कहकर कर्ममार्ग की प्रतिष्ठा करती है। पति का वैराग्य और पत्नी की आशंका टकराती है: क्या केवल संन्यास-भाव से, कर्म-त्याग से, पत्नी का भी कल्याण सुनिश्चित हो सकता है? → उपदेश का शिखर उस सूक्ष्म ब्रह्म-तत्त्व की ओर उठता है जहाँ द्वन्द्व-रहित परमात्मा का संकेत है—जहाँ सोम और अग्नि के साथ ‘धीर’ पुरुष नित्य संयम/योग-स्थित होकर भूतों को धारण करता है। फिर सृष्टि-तत्त्व का निर्णायक विवेचन आता है: पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज, मन, बुद्धि—ये ‘सप्त-योनि’; प्रलय में उनका अन्तःकरण में निरोध; और सृष्टि में क्रमशः गन्ध-रस-रूप-स्पर्श-शब्द का उद्भव, संशय से निष्ठा तक का जन्म-क्रम—यही ‘ज्ञानयज्ञ’ का आन्तरिक यज्ञ बन जाता है। → पति का उत्तर कर्म-त्याग की जड़ता नहीं, बल्कि ज्ञान-यज्ञ की परिपक्वता सिद्ध करता है: बाह्य कर्म की सीमा दिखाकर वह अन्तःकरण-स्थित यज्ञ, तत्त्व-चिन्तन, और निष्ठा की स्थापना करता है—जिससे पत्नी का भय शान्त होता है और ‘पति-आश्रय’ का अर्थ केवल लौकिक कर्म नहीं, ब्रह्म-विद्या का साझा पथ बनता है। → पत्नी के भीतर उठे ‘कर्म बनाम ज्ञान’ के द्वन्द्व का अन्तिम निर्णय—क्या वह गृहस्थ-कर्म को ही परम मानेगी या ज्ञानयज्ञ को—अगले प्रसंग की ओर संकेत करता है।

Shlokas

Verse 1

भीकम (2 अमान विशो< ध्याय: ब्राह्मगणीता--एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना वायुदेव उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । दम्पत्यो: पार्थ संवादो यो5भवद्‌ भरतर्षभ,श्रीकृष्ण कहते हैं--भरतश्रेष्ठ! अर्जुन! इसी विषयमें पति-पत्नीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्रह्म॒गीतासु विंशो5ध्याय: ।। २० || इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २० ॥। ऑपन-माज बछ। जज :डिडि एकविशो< ध्याय: दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । निबोध 3240 38 | विधानमथ यादृशम्‌

风神伐由说道:“此处亦援引一则古老的史例:昔日曾有夫妻之间的一段对话——噢,帕尔塔啊,婆罗多族中的雄杰啊。”

Verse 2

ब्राह्मणी ब्राह्मणं कंचिज्ज्ञानविज्ञानपारगम्‌ | दृष्टवा विविक्त आसीनं भार्या भर्तारमब्रवीत्‌,एक ब्राह्मण, जो ज्ञान-विज्ञानके पारगामी विद्वान्‌ थे, एकान्त स्थानमें बैठे हुए थे, यह देखकर उनकी पत्नी ब्राह्मणी अपने उन पतिदेवके पास जाकर बोली--'प्राणनाथ! मैंने सुना है कि स्त्रियाँ पतिके कर्मानुसार प्राप्त हुए लोकोंको जाती हैं; किंतु आप तो कर्म छोड़कर बैठे हैं और मेरे प्रति कठोरताका बर्ताव करते हैं। आपको इस बातका पता नहीं है कि मैं अनन्यभावसे आपके ही आश्रित हूँ। ऐसी दशामें आप-जैसे पतिका आश्रय लेकर मैं किस लोकमें जाऊँगी? आपको पतिरूपमें पाकर मेरी क्या गति होगी”

风神伐由说道:一位婆罗门妇人看见一位婆罗门——既通达灵性之智,又具世间辨识之明——独坐幽静之处。她走近丈夫,说道:“我生命之主啊,我曾听闻:女子将随丈夫之业而得其所至之界。然而你却弃业而坐,并以严厉待我。你难道不知我以一心不二之信,唯独依止于你吗?若我依止你这样的丈夫,我将往何界而去?以你为夫,我的归宿究竟如何?”

Verse 3

क॑ नु लोकं गमिष्यामि त्वामहं पतिमाश्रिता । न्यस्तकर्माणमासीनं कीनाशमविचक्षणम्‌,एक ब्राह्मण, जो ज्ञान-विज्ञानके पारगामी विद्वान्‌ थे, एकान्त स्थानमें बैठे हुए थे, यह देखकर उनकी पत्नी ब्राह्मणी अपने उन पतिदेवके पास जाकर बोली--'प्राणनाथ! मैंने सुना है कि स्त्रियाँ पतिके कर्मानुसार प्राप्त हुए लोकोंको जाती हैं; किंतु आप तो कर्म छोड़कर बैठे हैं और मेरे प्रति कठोरताका बर्ताव करते हैं। आपको इस बातका पता नहीं है कि मैं अनन्यभावसे आपके ही आश्रित हूँ। ऐसी दशामें आप-जैसे पतिका आश्रय लेकर मैं किस लोकमें जाऊँगी? आपको पतिरूपमें पाकर मेरी क्या गति होगी”

伐由说道:“我既以你为夫而依止,我将往何界而去?你弃却一切作为而坐——如同不思之农夫——毫无辨识。”

Verse 4

भार्या: पतिकृतॉल्लोकानाप्रुवन्तीति न: श्रुतम्‌ त्वामहं पतिमासाद्य कां गमिष्यामि वै गतिम्‌,एक ब्राह्मण, जो ज्ञान-विज्ञानके पारगामी विद्वान्‌ थे, एकान्त स्थानमें बैठे हुए थे, यह देखकर उनकी पत्नी ब्राह्मणी अपने उन पतिदेवके पास जाकर बोली--'प्राणनाथ! मैंने सुना है कि स्त्रियाँ पतिके कर्मानुसार प्राप्त हुए लोकोंको जाती हैं; किंतु आप तो कर्म छोड़कर बैठे हैं और मेरे प्रति कठोरताका बर्ताव करते हैं। आपको इस बातका पता नहीं है कि मैं अनन्यभावसे आपके ही आश्रित हूँ। ऐसी दशामें आप-जैसे पतिका आश्रय लेकर मैं किस लोकमें जाऊँगी? आपको पतिरूपमें पाकर मेरी क्या गति होगी”

风神伐由说道:“我们听说,妻子能到达丈夫以业行所赢得的诸界。然而若我得你为夫,却见你离群独坐,如弃业之人,并以严厉待我,我究竟将抵达怎样的归宿?以你为依止,我将往何界而去?”

Verse 5

एवमुक्त: स शान्तात्मा तामुवाच हसन्निव | सुभगे नाभ्यसूयामि वाक्यस्यास्य तवानघे,पत्नीके ऐसा कहनेपर वे शान्तचित्तवाले ब्राह्मण देवता हँसते हुए-से बोले --'सौभाग्यशालिनि! तुम पापसे सदा दूर रहती हो; अतः तुम्हारे इस कथनके लिये मैं बुरा नहीं मानता

被她如此质问,那位心地澄静者仿佛微微一笑,对她说道:“有福的女子啊,无垢者啊——既然你常远离罪垢,我并不因你这番话而见怪。”

Verse 6

ग्राह्मं दृश्यं च सत्यं वा यदिदं कर्म विद्यते | एतदेव व्यवस्यन्ति कर्म कर्मेति कर्मिण:,'संसारमें जो ग्रहण करनेयोग्य दीक्षा और व्रत आदि हैं तथा इन आँखोंसे दिखायी देनेवाले जो स्थूल कर्म हैं, उन्हींको वस्तुतः कर्म माना जाता है। कर्मठ लोग ऐसे ही कर्मको कर्मके नामसे पुकारते हैं

风神(Vāyu)说道:“在此世间,凡被称为‘应当受持’的行持——如戒律、受灌顶(入门)之仪、誓愿等——以及一切‘可见’之事,即外在而具体的作为,人们通常只把这些当作真正的行动。执著于行的人便断定唯此是‘业(karma)’,并称之为‘业’。”

Verse 7

मोहमेव नियच्छन्ति कर्मणा ज्ञानवर्जिता: । नैष्कर्म्य न च लोकेउस्मिन्‌ मुहूर्तमपि लभ्यते,'किंतु जिन्हें ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हुई है, वे लोग कर्मके द्वारा मोहका ही संग्रह करते हैं। इस लोकमें कोई दो घड़ी भी बिना कर्म किये रह सके, ऐसा सम्भाव नहीं है

缺乏真实智慧的人,以行为只会积聚迷妄本身。在此世间,彻底的无为(naiṣkarmya)连一刹那也不可得;无人能不作任何事而安住。

Verse 8

कर्मणा मनसा वाचा शुभं वा यदि वाशुभम्‌ | जन्मादिमूर्ति भेदान्तं कर्म भूतेषु वर्तते,मनसे, वाणीसे तथा क्रियाद्वारा जो भी शुभ या अशुभ कार्य होता है, वह तथा जन्म, स्थिति, विनाश एवं शरीरभेद आदि कर्म प्राणियोंमें विद्यमान हैं

风神(Vāyu)说道:无论是善是恶——由身行、意念或言语所作——业都在众生之中运行;自出生起,贯穿一切受身形态的变迁,直至诸形态的最终分判与终结。

Verse 9

रक्षोभिव॑ध्यमानेषु दृश्यद्रव्येषु वर्त्मसु । आत्मस्थमात्मना तेभ्यो दृष्टमायतनं मया,“जब राक्षसों--दुर्जनोंने जहाँ सोम और घृत आदि दृश्य द्रव्योंका उपयोग होता है, उन कर्म-मार्गोका विनाश आरम्भ कर दिया, तब मैंने उनसे विरक्त होकर स्वयं ही अपने भीतर स्थित हुए आत्माके स्थानको देखा

当依赖可见供物的祭仪之道被罗刹摧毁之时,我便转身离开;并以自身内在之我,得见那安住于内的真我之所居。

Verse 10

यत्र तद ब्रह्म निर्दधन्द्ध यत्र सोम: सहाग्निना । व्यवायं कुरुते नित्यं धीरो भूतानि धारयन्‌,“जहाँ द्वन्धोंसे रहित वह परब्रहद्म परमात्मा विराजमान है, जहाँ सोम अग्निके साथ नित्य समागम करता है तथा जहाँ सब भूतोंको धारण करनेवाला धीर समीर निरन्तर चलता रहता है

在那里,无对无待的至上梵(Brahman)巍然安住;在那里,苏摩(Soma)与火神阿耆尼(Agni)恒常交会;在那里,沉毅之风,荷载万有众生,昼夜不息地运行。

Verse 11

यत्र ब्रह्मादयो युक्तास्तदक्षरमुपासते | विद्वांस: सुव्रता यत्र शान्तात्मानो जितेन्द्रिया:,“जहाँ ब्रह्मा आदि देवता तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शान्तचित्त जितेन्द्रिय विद्वान्‌ योगयुक्त होकर उस अविनाशी ब्रह्मकी उपासना करते हैं

彼处有一境界:梵天与诸天同修瑜伽,礼敬那不坏之梵。彼处亦住诸智者——守持清净胜誓者——其心寂静,诸根已伏。

Verse 12

प्राणेन न तदाप्रेयं नास्वाद्यं चैव जिह्नया । स्पर्शनेन तदस्पृश्यं मनसा त्ववगम्यते,“वह अविनाशी ब्रह्म प्राणेन्द्रियसे सूँघने और जिद्ठाद्वारा आस्वादन करनेयोग्य नहीं है। स्पर्शन्द्रिय--त्वचाद्वारा उसका स्पर्श भी नहीं किया जा सकता; केवल बुद्धिके द्वारा उसका अनुभव किया जा सकता है

风神伐由曰:彼不坏之梵,非气息所能嗅得,亦非舌根所能尝得;非触觉所能触及,唯可由心而证知。

Verse 13

चक्षुषामविषहां च यत्‌ किंचिच्छुवणात्‌ परम्‌ । अगन्धमरसस्पर्शमरूपाशब्दलक्षणम्‌,“वह नेत्रोंका विषय नहीं हो सकता। वह अनिर्वचनीय परब्रह्म श्रवणेन्द्रियकी पहुँचसे सर्वथा परे है। गन्ध, रस, स्पर्श, रूप और शब्द आदि कोई भी लक्षण उसमें उपलब्ध नहीं है

风神伐由曰:至上实在非眼所能堪受与执取,亦超越听觉之境——超越一切感官可及。无香、无味、无触、无形,亦无声等任何可标识之相。

Verse 14

यतः प्रवर्तते तन्त्र॑ यत्र च प्रतितिष्ठति । प्राणो5पान: समानक्ष व्यानक्षोदान एव च

风神伐由曰:此一切有身之生命体系所由发起、亦所安立者,借由诸生命气流而显:普拉那(prāṇa)、阿帕那(apāna)、萨玛那(samāna)、维亚那(vyāna)、乌达那(udāna)。

Verse 15

तत एव प्रवर्तन्ते तदेव प्रविशन्ति च | “उसीसे सृष्टि आदिका विस्तार होता है और उसीमें उसकी स्थिति है। प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान--से उसीसे प्रकट होते और फिर उसीमें प्रविष्ट हो जाते हैं ।। १४ न्‍् समानव्यानयोर्मध्ये प्राणापानौ विचेरतु:,“समान और व्यान--इन दोनोंके बीचमें प्राण और अपान विचरते हैं। उस अपानसहित प्राणके लीन होनेपर समान और व्यानका भी लय हो जाता है। अपान और प्राणके बीचमें उदान सबको व्याप्त करके स्थित होता है। इसीलिये सोये हुए पुरुषको प्राण और अपान नहीं छोड़ते हैं

风神伐由曰:唯由彼而起,亦唯归彼而入。诸生命作用——普拉那、阿帕那、萨玛那、维亚那与乌达那——皆从那至上根基显现,终复融归其中。

Verse 16

तस्मिंल्लीने प्रलीयेत समानो व्यान एव च । अपानप्राणयोर्मध्ये उदानो व्याप्य तिष्ठति । तस्माच्छयान पुरुष प्राणापानौ न मुडचतः,“समान और व्यान--इन दोनोंके बीचमें प्राण और अपान विचरते हैं। उस अपानसहित प्राणके लीन होनेपर समान और व्यानका भी लय हो जाता है। अपान और प्राणके बीचमें उदान सबको व्याप्त करके स्थित होता है। इसीलिये सोये हुए पुरुषको प्राण और अपान नहीं छोड़ते हैं

风神伐由(Vāyu)说道:“当普拉那(prāṇa)融入阿帕那(apāna)之时,萨玛那(samāna)与维亚那(vyāna)亦随之偃息而没。于阿帕那与普拉那之间,乌达那(udāna)遍满一切而安住。故而人虽沉睡,普拉那与阿帕那并不弃之而去——纵使诸根休止,生命仍赖诸气之有序协同而得以维系。”

Verse 17

प्राणानामायतत्वेन तमुदान प्रचक्षते । तस्मात्‌ तपो व्यवस्यन्ति मद्गतं ब्रह्म॒वादिन:,'प्राणांका आयतन (आधार) होनेके कारण उसे विद्वान्‌ पुरुष उदान कहते हैं। इसलिये वेदवादी मुझमें स्थित तपका निश्चय करते हैं

伐由说道:“因其为诸生命之气的依处与根基,智者称此原理为‘乌达那’(Udāna)。因此,通达吠陀者立定苦行之志,视其为安立于我之中——向我而行,并在我之临在中确立。”

Verse 18

तेषामन्योन्यभक्षाणां सर्वेषां देहचारिणाम्‌ । अनिनिर्वेश्वानरो मध्ये सप्तधा दीव्यतेडन्तरा,“एक दूसरेके सहारे रहनेवाले तथा सबके शरीरोंमें संचार करनेवाले उन पाँचों प्राणवायुओंके मध्यभागमें जो समान वायुका स्थान नाभिमण्डल है, उसके बीचमें स्थित हुआ वैश्वानर अग्नि सात रूपोंमें प्रकाशमान है

伐由说道:“在诸生命之气之中——彼此相资相持,遍行一切众生之身——中央之域有毗湿婆那罗火(Vaiśvānara)安住。它处于中枢(脐轮之处,为萨玛那之座),此内火以七种不同形相辉耀。”

Verse 19

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उन्नीयवाँ अध्याय पूरा हुआ,घ्राणं जिद्दा च चक्षुश्न त्वक्‌ च श्रोत्रं च पठचमम्‌ | मनो बुद्धिश्न सप्तैता जिद्दा वैश्वानराचिष: “प्राण (नासिका), जिद्ा, नेत्र, त्वचा और पाँचवाँ कान एवं मन तथा बुद्धि--ये उस वैश्वानर अग्निकी सात जिद्लाएँ हैं। सूँघनेयोग्य गन्ध, दर्शनीय रूप, पीनेयोग्य रस, स्पर्श करनेयोग्य वस्तु, सुननेयोग्य शब्द, मनके द्वारा मनन करने और बुद्धिके द्वारा समझने योग्य विषय--ये सात मुझ वैश्वानरकी समिधाएँ हैं

伐由说道:“鼻、舌、眼、肤,以及第五为耳——并加上心与智——此七者,乃毗湿婆那罗火(Vaiśvānara)之七舌(七焰)。可嗅之香、可见之色相、可尝之味、可触之触境、可闻之声;以及心所当思惟者、智所当了知者——此七类,乃供养那内在毗湿婆那罗之七种柴供。”

Verse 20

घ्रेयं दृश्यं च पेयं च स्पृश्यं श्रव्यं तथैव च । मन्तव्यमथ बोद्धव्यं ता: सप्त समिधो मम,“प्राण (नासिका), जिद्ा, नेत्र, त्वचा और पाँचवाँ कान एवं मन तथा बुद्धि--ये उस वैश्वानर अग्निकी सात जिद्लाएँ हैं। सूँघनेयोग्य गन्ध, दर्शनीय रूप, पीनेयोग्य रस, स्पर्श करनेयोग्य वस्तु, सुननेयोग्य शब्द, मनके द्वारा मनन करने और बुद्धिके द्वारा समझने योग्य विषय--ये सात मुझ वैश्वानरकी समिधाएँ हैं

风神伐由说道:“可嗅之香、可见之形、可尝之味、可触之物、可闻之声;以及心所当思惟者、智所当了知者——此即供奉于我之七类柴供(samidh)。”

Verse 21

'सूँघनेवाला, खानेवाला, देखनेवाला, स्पर्श करने-वाला, पाँचवाँ श्रवण करनेवाला एवं मनन करनेवाला और समझनेवाला--ये सात श्रेष्ठ ऋत्विज्‌ हैं

风神伐由说道:“能嗅者、能食者、能见者、能触者,第五为能闻者,以及能思者与能知者:此七者,乃最上等的祭官(ṛtvij)。”

Verse 22

घ्रेये पेये च दृश्ये च स्पृश्ये श्रव्ये तथैव च । मन्तव्येडप्यथ बोद्धव्ये सुभगे पश्य सर्वदा,“सुभगे! सूँघनेयोग्य, पीनेयोग्य, देखनेयोग्य, स्पर्श करनेयोग्य, सुनने, मनन करने तथा समझनेयोग्य विषय--इन सबके ऊपर तुम सदा दृष्टिपात करो (इनमें हविष्य-बुद्धि करो)

伐由说道:“吉祥的女子啊,当恒常以觉照观照一切所缘——可嗅者、可饮者、可见者、可触者、可闻者,亦复可思惟者与可了知者。常以如供献般的清净之心观之,使诸根触境成为调御,而非为境所役。”

Verse 23

घ्राता भक्षयिता द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता च पठडचम: । मन्ता बोद्धा च सप्तैते भवन्ति परमर्त्विज:,हवींष्यग्निषु होतार: सप्तथा सप्त सप्तसु । सम्यक्‌ प्रक्षिप्य विद्वांसो जनयन्ति स्वयोनिषु 'पूर्वोक्त सात होता उक्त सात हविष्योंका सात रूपोंमें विभक्त हुए वैश्वानरमें भलीभाँति हवन करके (अर्थात्‌ विषयोंकी ओरसे आसक्ति हटाकर) विद्वान्‌ पुरुष अपने तन्मात्रा आदि योनियोंमें शब्दादि विषयोंको उत्पन्न करते हैं

伐由说道:“嗅者、食者、见者、触者、闻者、趋向所缘之动者、思者与知者——此七者行作至上祭官。又如七类供献,由七祭官投入七火之中。智者若能如法投献——即从诸境撤回贪著——便于自身之本源中,生起声等诸微细境。”

Verse 24

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्न पठचमम्‌ । मनो बुद्धिश्व सप्तैता योनिरित्येव शब्दिता:,'पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज, मन और बुद्धि--ये सात योनि कहलाते हैं

风神伐由说道:“地、风、空、水,以光为第五;并且还有意与智——此七者,被称为‘胎藏/本源’(yoni)。”

Verse 25

हविर्भूता गुणा: सर्वे प्रविशन्त्यग्निजं गुणम्‌ | अन्तर्वासमुषित्वा च जायन्ते स्वासु योनिषु,“इनके जो समस्त गुण हैं, वे हविष्यरूप हैं। जो अग्निजनित गुण (बुद्धिवृत्ति)-में प्रवेश करते हैं। वे अन्तःकरणमें संस्काररूपसे रहकर अपनी योनियोंमें जन्म लेते हैं

风神伐由说道:“一切诸德性(guṇa)皆如供献之物。它们进入‘由火而生的德性’——即由认知之内火所生的心之作用——在内中以潜在印记(saṃskāra)而住。既住其间,便依其自性,于各自之胎源(yoni)中再度出生。”

Verse 26

तत्रैव च निरुध्यन्ते प्रलये भूतभावने । ततः: संजायते गन्धस्तत: संजायते रस:,*वे प्रलयकालमें अन्त:करणमें ही अवरुद्ध रहते और भूतोंकी सृष्टिके समय वहींसे प्रकट होते हैं। वहींसे गन्ध और वहींसे रसकी उत्पत्ति होती है

风神伐由说道:“就在彼处,于大劫坏灭之时,它们被约束不动——噢,众生之所依、众生之本源。正从那内在的根基,香气生起;亦从那根基,味觉显现。”

Verse 27

ततः: संजायते रूप॑ ततः स्पर्शोडभिजायते । ततः संजायते शब्द: संशयस्तत्र जायते । ततः: संजायते निष्ठा जन्मैतत्‌ सप्तथा विदु:,“वहींसे रूप, स्पर्श और शब्दका प्राकट्य होता है। संशयका जन्म भी वहीं होता है और निश्चयात्मिका बुद्धि भी वहीं पैदा होती है। यह सात प्रकारका जन्म माना गया है

“由那源头,色相生起;由它,触觉出生。由它,声音兴起;而疑惑也在彼处生成。由它亦生坚固的确定(决断之智)。此被理解为七重的生起之法。”

Verse 28

अनेनैव प्रकारेण प्रगृहीतं पुरातनै: । पूर्णाहुतिभिरापूर्णास्त्रिभि: पूर्यन्ति तेजसा,“इसी प्रकारसे पुरातन ऋषियोंने श्रुतिके अनुसार प्राण आदिका रूप ग्रहण किया है। ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय--इन तीन आहुतियोंसे समस्त लोक परिपूर्ण हैं। वे सभी लोक आत्मज्योतिसे परिपूर्ण होते हैं"

风神伐由说道:“正以此法,古代圣仙依循吠陀启示(闻传,Śruti),领受并阐明了如普拉那 prāṇa(生命之息)等诸形态。凭借三种‘供献’——知者、所知之智、与可知之境——一切世界得以圆满充盈;而那些世界亦放光明,浸润于自性(我,Ātman)的辉耀之中。”

Frequently Asked Questions

The brāhmaṇī questions whether her spiritual destination is contingent on her husband’s attainments, reflecting anxiety about dependence, merit-transfer, and the ethical mechanics of posthumous outcomes within household life.

Embodied action is unavoidable, but its binding force depends on ignorance versus understanding; the chapter recommends moving from externalized “karma-only” fixation to a knowledge-guided interpretation that recognizes a non-sensory Brahman and the inner structure of agency.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the meta-function is instructional mapping—using prāṇic and sacrificial schemas to situate ethical action within a liberation-oriented metaphysics.