Adhyaya 169
Anushasana ParvaAdhyaya 16918 Verses

Adhyaya 169

Chapter Arc: युधिष्ठिर, धर्म-चिन्तन के बीच, एक तीखा प्रश्न उठाते हैं—यदि विद्या, बल और बुद्धि होते हुए भी मनुष्य को फल न मिले, तो क्या भाग्य ही प्रधान है? → वे उदाहरणों से उलझन बढ़ाते हैं: प्रयत्न करके भी लाभ न होना, अयत्न से समृद्धि मिल जाना; नीति-शास्त्र पढ़कर भी नीति का आचरण न दिखना; और समय (काल) के आगे मानवीय योजना का बार-बार विफल होना। → भीष्म का निर्णायक प्रतिपादन ‘काल’ के नियम से होता है—“नाप्राप्तकालो म्रियते विद्धः शरशतैरपि… प्राप्तकालो न जीवति”; अर्थात् समय न आया हो तो सैकड़ों बाण भी नहीं मारते, और समय आ गया हो तो तृणाग्र-स्पर्श भी प्राण ले लेता है। → भीष्म भाग्य/काल की प्रधानता स्वीकारते हुए भी निष्कर्ष को निराशावादी नहीं बनने देते—विद्या और नीति का त्याग नहीं; क्योंकि विद्या स्वभावतः साध्य-सिद्धि का साधन है, और पुरुषार्थ धर्मसम्मत मार्ग को स्थिर रखता है, भले फल का क्षण काल के अधीन हो। → युधिष्ठिर के मन में अगला स्वाभाविक प्रश्न उभरता है—जब फल कालाधीन है, तब पुरुषार्थ और धर्माचरण का वास्तविक प्रयोजन क्या है?

Shlokas

Verse 1

/ अपर बक। ] अत्णऑकाड त्रेषष्ट्याधिकशततमोब<् ध्याय: युधिष्ठटिरका विद्या

尤提士提罗说道:即使是力大无穷之人,若无命运所分之份,也得不到财富;而有福运相随者,即便羸弱、仍是孩童,也能获得兴盛与富足。

Verse 2

7 नालाभकाले लभते प्रयत्नेडपि कृते सति । लाभकाले<प्रयत्नेन लभते विपुलं धनम्‌

尤提士提罗说道:获利之时未至,即便竭力经营也难见成效;而当得利之季来临,人便能得丰厚财物——有时甚至不必多劳——因为命数与时机已使结果成熟。

Verse 3

कृतयत्नाफलाश्रैव दृश्यन्ते शतशो नरा: । अयत्नेनैधमानाश्र दृश्यन्ते बहवो जना:

尤提士提罗说道:“世间可见成百之人,辛劳而无果——纵然奋力,也得不到所求;亦可见许多人,不费力气,财富却日日增长。”

Verse 4

यदि यत्नो भवेन्मर्त्य: स सर्व फलमाप्नुयात्‌ नालभ्यं चोपलभ्येत नृणां भरतसत्तम

尤提士提罗说道:“若仅凭人的努力便能定夺一切,人必将无不获果。然而,噢婆罗多族之最优者,凡因宿命之力而为人所不可得者,即使竭尽艰辛,也终究不可得。”

Verse 5

प्रयत्नं कृतवन्तो5पि दृश्यन्ते ह्फला नरा: । मार्गत्यायशतैरर्थानमार्गश्वापर: सुखी

尤提士提罗说道:“即便竭力之人,也常见其无所得。有人以百般正道求财;而另有人走上邪途,却看似富足安乐。”

Verse 6

युधिष्ठिरने कहा--पितामह! भाग्यहीन मनुष्य बलवान हो तो भी उसे धन नहीं मिलता और जो भाग्यवान्‌ है

尤提士提罗说道:“噢,祖父啊!我们见到许多人,纵然屡屡行不义之事,仍旧贫乏无财;也见到另一些人,安住于自身应尽的正当职责,却拥有财富——然而也有人即便如此,仍然贫穷。那么,究竟是什么主宰了富贵的获得:命运、行为,还是别的什么?”

Verse 7

अधीत्य नीतिशास्त्राणि नीतियुक्तो न दृश्यते । अनभिशनज्ञश्न साचिव्यं गमित: केन हेतुना

尤提士提罗说道:“即便研读了治国与伦理的论典,也未必见得此人真正为正行所导;反过来,有时不通政略之人却被擢升为大臣。这究竟因何而起?”

Verse 8

विद्यायुक्तो हाविद्यश्न धनवान्‌ दुर्मतिस्तथा । यदि विद्यामुपाश्रित्य नर: सुखमवाप्लुयात्‌

尤提士提罗说道:“纵有学识之人,也可能在行止上仍然无明;纵有财富之人,也可能判断乖谬。若人只凭依‘学问’,便能真正获得幸福……”

Verse 9

यथा पिपासां जयति पुरुष: प्राप्प वै जलम्‌

尤提士提罗说道:“正如人唯有真正得水,方能战胜口渴。”

Verse 10

नाप्राप्तकालो म्रियते विद्ध: शरशतैरपि । तृणाग्रेणापि संस्पृष्ट: प्राप्तकालो न जीवति

尤提士提罗说道:“未到死期之人,纵被百箭穿身亦不死;而死期既至之人,纵只被草尖轻触,也不能再活。”

Verse 11

भीष्म उवाच ईहमान: समारम्भान्‌ यदि नासादयेद्‌ धनम्‌ । उग्र॑ तप: समारोहेन्न हानुप्तं प्ररोहति

毗湿摩说道:“孩子啊!若人纵然多方努力、兴办诸事,仍不能得财,当修严厉苦行;因为不播种子,便不会生出嫩芽。”

Verse 12

दानेन भोगी भवति मेधावी वृद्धसेवया । अहिंसया च दीर्घायुरिति प्राहुमनीषिण:

毗湿摩说道:“智者宣说:以布施,人得享乐之资;以侍奉长者,人得真慧;以行不害(阿希姆萨),人得长寿。”

Verse 13

तस्माद्‌ दद्यान्न याचेत पूजयेद्‌ धार्मिकानपि । सुभाषी प्रियकृच्छान्त: सर्वसत्त्वाविहिंसक:

毗湿摩说道:“因此,当自施而不向他人乞求;当敬礼诸持法之人;当言辞善美,利济一切众生;当安忍宁静;并且不伤害任何有情。”

Verse 14

यदा प्रमाणं प्रसव: स्वभावश्च सुखासुखे । दंशकीटपिपीलानां स्थिरो भव युधिछिर

毗湿摩说道:“尤提士提罗啊!生之所受、其量度与自性,皆为苦乐之因。即便是蚊蚋、虫豸、蚁类,也依其所作之业而成其性,生于各自之胎类,受其苦乐。念此,当安住而坚定。”

Verse 83

न विद्वान्‌ विद्यया हीन॑ वृत्त्यर्थमुपसंश्रयेत्‌ । कभी-कभी विद्वान्‌ और मूर्ख दोनों एक-जैसे धनी दिखायी देते हैं। कभी खोटी बुद्धिवाले मनुष्य तो धनवान्‌ हो जाते हैं (और अच्छी बुद्धि रखनेवाले मनुष्यको थोड़ा-सा धन भी नहीं मिलता)। यदि विद्या पढ़कर मनुष्य अवश्य ही सुख पा लेता तो विद्वानको जीविकाके लिये किसी मूर्ख धनीका आश्रय नहीं लेना पड़ता

尤提士提罗说道:“真正有学识的人,不应为谋生而投靠无学之辈。然而世间常见智者与愚者似乎同样富有;有时心智邪曲者反而致富,而聪慧之人却几无资财。若仅凭读书求知便必然得乐,那么学者就绝不会被迫为生计而依赖富有的愚人。”

Verse 93

इष्टार्थो विद्यया होव न विद्यां प्रजह्ेन्नर: । जिस प्रकार पानी पीनेसे मनुष्यकी प्यास अवश्य बुझ जाती है

尤提士提罗说道:“若人所求之愿必定能凭学识而成,则无人会舍弃或轻慢知识。正如饮水必能解渴一般;同样地——若学习总能无失地带来所愿之果,人人都会紧紧执持它。”

Verse 162

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें धर्मके प्रमाणका वर्णनविषयक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ

至此,尊贵的《摩诃婆罗多》之《教诫篇》(Anuśāsana Parva)中“施法品”(Dānadharma)关于阐明达摩之权威依据与证成的第一百六十二章告终。

Verse 163

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि धर्मप्रशंसायां त्रिषष्ट्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें धर्मकी प्रशंशाविषयक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

如是,在《圣摩诃婆罗多》之《教诫篇》(Anuśāsana Parva)中,尤以“施法”(dāna-dharma)一段为然:赞颂达摩之章,作为第一百六十三章而告终。卷末题记标明此单元圆满,强调此番论说旨在确立达摩为正行之准绳,尤以布施与正当之义务为要。