Adhyaya 43
Adi ParvaAdhyaya 4340 Verses

Adhyaya 43

Jaratkāru’s Marital Compact and Departure (जरत्कारु–जरत्कारुणी संवादः)

Upa-parva: Āstīka Upākhyāna (Serpent-cycle episode: Jaratkāru–Jaratkāruṇī marriage and progeny)

Sauti narrates how Vāsuki addresses the sage Jaratkāru, offering his sister—named Jaratkāruṇī—as a wife, promising her maintenance and protection. After this pledge, Jaratkāru proceeds to the Nāga residence and performs the marriage rite with mantras and proper procedure. The couple resides in a prepared chamber, and Jaratkāru establishes a strict mutual condition: she must never act or speak in a way he finds displeasing, or he will depart. Jaratkāruṇī, anxious yet compliant, serves him attentively and later approaches him during her fertile period; conception occurs, described as luminous and ascetically potent. On a later day, Jaratkāru sleeps with his head in her lap as sunset approaches. Jaratkāruṇī faces a dilemma: waking him risks anger, but letting him sleep risks a lapse in saṃdhyā observance. She wakes him gently, urging twilight worship and water-rituals. Jaratkāru interprets this as disrespect and announces his departure in accordance with the prior agreement. She pleads, emphasizing her innocence and the Nāgas’ need for offspring due to a maternal curse, but the sage confirms the pregnancy—foretelling a highly dharmic, learned son—and leaves to resume severe austerities.

Chapter Arc: तक्षक को ज्ञात होता है कि कश्यप—मंत्रबल से विषहरण करने वाले द्विजश्रेष्ठ—राजा परीक्षित को बचाने के लिए मार्ग में आ रहे हैं; मृत्यु का निश्चित दूत अपने लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही एक और शक्ति से टकराने वाला है। → तक्षक कश्यप की विद्या को चुनौती देता है—‘अपने मन्त्रबल का पराक्रम दिखाओ’; कश्यप प्रत्युत्तर में कहता है कि यदि तक्षक वृक्ष को भस्म कर सकता है तो वह उसी भस्मराशि से उसे पुनर्जीवित कर देगा। तक्षक वृक्ष को दग्ध करता है, और कश्यप उसे विद्या से जीवित कर देता है—इससे स्पष्ट हो जाता है कि यदि कश्यप राजा के पास पहुँच गया तो तक्षक का दंश निष्फल हो सकता है। तब तक्षक धन देकर कश्यप को लौटा देता है, और स्वयं नागलोक-सम्बद्ध नगर की ओर तीव्र गति से बढ़ता है; मार्ग में उसे राजा की स्थिति और समय-सीमा का समाचार मिलता रहता है। → तक्षक मायावी उपाय चुनता है: ‘फल-पुष्प-उदक’ आदि भेंट के बहाने अपने दूतों को निश्चिन्त भाव से राजा के पास भेजता है और स्वयं भी छल-रूप धारण कर निकट पहुँचता है; उधर राजा परीक्षित, काल-प्रेरित होकर, चेतना-शून्य-सा, उपहास करता हुआ भी अनजाने में मृत्यु के फन्दे की ओर बढ़ता है—और तक्षक भोगों से लिपटकर दंश के लिए तैयार होता है। → कश्यप, जो मन्त्र-विषहरण से रक्षा कर सकता था, धन-प्रलोभन से लौट चुका है; राजरक्षा का अन्तिम कवच हट जाता है। तक्षक की योजना सफल होने की दिशा में स्थिर हो जाती है—राजा के पास पहुँचने का मार्ग अब निर्विघ्न है। → तक्षक भेंट-छल के साथ राजा के समीप पहुँच चुका है—अब प्रश्न केवल यह है कि दंश किस क्षण होगा और राजवंश पर उसका क्या परिणाम पड़ेगा।

Shlokas

Verse 1

भीकम (2 अमान त्रिचत्वारिशो<् ध्याय: तक्षकका धन देकर काश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित्‌के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना तक्षक उवाच यदि दष्टं मयेह त्वं शक्त: किंचिच्चिकित्सितुम्‌ । ततो वृक्ष मया दष्टमिमं जीवय काश्यप,तक्षक बोला--काश्यप! यदि इस जगतमें मेरे डँसे हुए रोगीकी कुछ भी चिकित्सा करनेमें तुम समर्थ हो तो मेरे डँसे हुए इस वृक्षको जीवित कर दो

تکشک نے کہا—اے کاشیپ! اگر اس دنیا میں تم میرے ڈسے ہوئے کی کچھ بھی درمان کر سکتے ہو، تو پھر اس درخت کو—جسے میں نے ڈسا ہے—زندہ کر دکھاؤ۔

Verse 2

परं मन्त्रबलं यत्‌ ते तद्‌ दर्शय यतस्व च । न्यग्रोधमेनं धक्ष्यामि पश्यतस्ते द्विजोत्तम,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे पास जो उत्तम मन्त्रका बल है, उसे दिखाओ और यत्न करो। लो, तुम्हारे देखते-देखते इस वटवृक्षको मैं भस्म कर देता हूँ

تکشک بولا—تمہارے پاس جو اعلیٰ ترین منتر-بل ہے، اسے دکھاؤ اور کوشش کرو۔ اے بہترین دِویج! تمہارے دیکھتے دیکھتے میں اس برگد کے درخت کو راکھ کر دوں گا۔

Verse 3

काश्यप उवाच दश नागेन्द्र वृक्ष॑ त्वं यद्येतदभिमन्यसे । अहमेनं त्वया दष्टं जीवयिष्ये भुजजड्रम,काश्यपने कहा--नागराज! यदि तुम्हें इतना अभिमान है तो इस वृक्षको डँसो। भुजंगम! तुम्हारे डँसे हुए इस वृक्षको मैं अभी जीवित कर दूँगा

کاشیپ نے کہا—اے ناگوں کے سردار! اگر تجھے اتنا ہی غرور ہے تو اس درخت کو ڈس۔ اے بھجنگ! تیرے ڈسے ہوئے اس درخت کو میں پھر سے زندہ کر دوں گا۔

Verse 4

सौतिर्वाच एवमुक्त: स नागेन्द्र: काश्यपेन महात्मना । अदशद्‌ वृक्षमभ्येत्य न्यग्रोध॑ं पन्नगोत्तम:,उग्रश्रवाजी कहते हैं--महात्मा काश्यपके ऐसा कहनेपर सर्पोमें श्रेष्ठ नागराज तक्षकने निकट जाकर बरगदके वृक्षको डँस लिया

سوتی نے کہا—جب مہاتما کاشیپ نے یوں کہا تو ناگوں میں برتر ناگراج تکشک نزدیک گیا اور اس برگد کے درخت کو ڈس لیا۔

Verse 5

स वक्षस्तेन दष्टस्तु पन्नगेन महात्मना । आशीविषविषोपेत: प्रजज्वाल समन्तत:,उस महाकाय विषधर सर्पके डँसते ही उसके विषसे व्याप्त हो वह वृक्ष सब ओरसे जल उठा

اس عظیم الجثہ زہریلے سانپ کے ڈسنے ہی سے، آشی وِش کے زہر سے بھر کر وہ درخت ہر طرف سے بھڑک اٹھا۔

Verse 6

त॑ दग्ध्वा स नगं॑ नाग: काश्यपं पुनरब्रवीत्‌ । कुरु यत्नं द्विजश्रेष्ठ जीवयैनं वनस्पतिम्‌,इस प्रकार उस वृक्षको जलाकर नागराज पुन: काश्यपसे बोला--'द्विजश्रेष्ठ] अब तुम यत्न करो और इस वृक्षको जिला दो”

درخت کو جلا کر ناگراج نے پھر کاشیپ سے کہا—“اے دِویجِ برتر! اب تم کوشش کرو اور اس نباتات کو پھر سے زندہ کر دو۔”

Verse 7

सौतिरुवाच भस्मी भूत॑ं ततो वृक्ष पन्नगेन्द्रस्य तेजसा । भस्म सर्व समादह्ृत्य काश्यपो वाक्यमब्रवीत्‌,उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनकजी! नागराजके तेजसे भस्म हुए उस वृक्षकी सारी भस्मराशिको एकत्र करके काश्यपने कहा--

سوتی نے کہا—اے شونک! ناگ راج کے تیز سے وہ درخت راکھ ہو گیا۔ پھر کاشیپ نے ساری راکھ سمیٹ کر کلام کیا۔

Verse 8

विद्याबलं पन्नगेन्द्र पश्य मेउद्य वनस्पतौ । अहं संजीवयाम्येनं पश्यतस्ते भुजड्रम,“नागराज! इस वनस्पतिपर आज मेरी विद्याका बल देखो। भुजंगम! मैं तुम्हारे देखते- देखते इस वृक्षको जीवित कर देता हूँ

کاشیپ نے کہا—اے ناگ راج! آج اس درخت پر میری ودیا کی قوت دیکھ۔ اے بھجنگم! تیرے دیکھتے دیکھتے میں اسے پھر سے زندہ کر دوں گا۔

Verse 9

ततः स भगवान्‌ दिद्वान्‌ काश्यपो द्विजसत्तम: । भस्मराशीकृतं वृक्ष विद्यया समजीवयत्‌,तदनन्तर सौभाग्यशाली दिद्वान्‌ द्विजश्रेष्ठ काश्यपने भस्मराशिके रूपमें विद्यमान उस वृक्षको विद्याके बलसे जीवित कर दिया

تب وہ بزرگ، دانا اور دو بار جنم لینے والوں میں افضل کاشیپ نے اپنی ودیا کی قوت سے راکھ کا ڈھیر بنے ہوئے اس درخت کو پھر سے زندہ کر دیا۔

Verse 10

अड्कुरं कृतवांस्तत्र ततः पर्णद्वयान्वितम्‌ । पलाशिनं शाखिनं च तथा विटपिनं पुन:,पहले उन्होंने उसमेंसे अंकुर निकाला, फिर उसे दो पत्तेका कर दिया। इसी प्रकार क्रमश: पल्‍लव, शाखा और प्रशाखाओंसे युक्त उस महान्‌ वृक्षको पुनः पूर्ववत्‌ खड़ा कर दिया

پہلے اس نے وہاں کونپل نکالی، پھر اسے دو پتّوں سے آراستہ کیا۔ پھر ترتیب وار نرم شگوفوں، شاخوں اور ذیلی شاخوں سے بھر کر اس عظیم درخت کو دوبارہ پہلے کی طرح قائم کر دیا۔

Verse 11

त॑ दृष्टवा जीवितं वृक्ष काश्यपेन महात्मना । उवाच तक्षको ब्रह्मन्‌ नैतदत्यद्भुतं त्वयि,महात्मा काश्यपद्वारा जिलाये हुए उस वृक्षको देखकर तक्षकने कहा--'ब्रह्मन! तुम- जैसे मन्त्रवेत्तामें ऐसे चमत्कारका होना कोई अद्भुत बात नहीं है

مہاتما کاشیپ کے زندہ کیے ہوئے اس درخت کو دیکھ کر تکشک بولا—اے برہمن! تم جیسے منتر وید کے جاننے والے میں یہ کوئی بہت بڑا تعجب نہیں۔

Verse 12

द्विजेन्द्र यद्‌ विषं हनया मम वा मद्विधस्य वा । कं त्वमर्थमभिप्रेप्सुर्यासि तत्र तपोधन,“तपस्याके धनी द्विजेन्द्र! जब तुम मेरे या मेरे-जैसे दूसरे सर्पके विषको अपनी विद्याके बलसे नष्ट कर सकते हो तो बताओ, तुम कौन-सा प्रयोजन सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ जा रहे हो

اے تپودھن دْوِجَیندر! جب تم میرے یا میرے جیسے دوسرے سانپ کے زہر کو اپنی ودیا کے بل سے مٹا سکتے ہو، تو بتاؤ—تم کس مقصد کی تکمیل کی خواہش سے وہاں جا رہے ہو؟

Verse 13

यत्‌ तेडभिलपितं प्राप्तुं फलं तस्मान्नूपोत्तमात्‌ । अहमेव प्रदास्यामि तत्‌ ते यद्यपि दुर्लभम्‌,“उस श्रेष्ठ राजासे जो फल प्राप्त करना तुम्हें अभीष्ट है, वह अत्यन्त दुर्लभ हो तो भी मैं ही तुम्हें दे दूँगा

اس بہترین بادشاہ سے جو پھل تم حاصل کرنا چاہتے ہو—خواہ وہ کتنا ہی دشوار و نایاب کیوں نہ ہو—وہ میں خود تمہیں عطا کر دوں گا۔

Verse 14

विप्रशापाभिभूते च क्षीणायुषि नराधिपे । घटमानस्य ते विप्र सिद्धि: संशयिता भवेत्‌,“विप्रवर! महाराज परीक्षित्‌ ब्राह्मणके शापसे तिरस्कृत हैं और उनकी आयु भी समाप्त हो चली है। ऐसी दशामें उन्हें जिलानेके लिये चेष्टा करनेपर तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी, इसमें संदेह है

اے برہمنِ برتر! مہاراج پریکشت برہمن کے شاپ کے زیرِ اثر ہیں اور ان کی عمر بھی گھٹ چکی ہے۔ ایسی حالت میں انہیں بچانے کی کوشش کرو تو بھی تمہیں کامیابی ملے گی—اس میں شبہ ہے۔

Verse 15

ततो यशः प्रदीप्तं ते त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्‌ निरंशुरिव घर्माशुरन्तर्धानमितो व्रजेत्‌,“यदि तुम सफल न हुए तो तीनों लोकोंमें विख्यात एवं प्रकाशित तुम्हारा यश किरणरहित सूर्यके समान इस लोकसे अदृश्य हो जायगा”

اگر تم کامیاب نہ ہوئے تو تمہارا وہ یَش جو تینوں لوکوں میں روشن اور مشہور ہے—بے شعاع سورج کی مانند—اس جہان سے مٹ کر غائب ہو جائے گا۔

Verse 16

काश्यप उवाच धनार्थी याम्यहं तत्र तन्मे देहि भुजड़म । ततो<हं विनिवर्तिष्ये स्वापतेयं प्रगृह्य वै,काश्यपने कहा--नागराज तक्षक! मैं तो वहाँ धनके लिये ही जाता हूँ, वह तुम्हीं मुझे दे दो तो उस धनको लेकर मैं घर लौट जाऊँगा

کاشیپ نے کہا—اے بھجنگ! میں تو وہاں صرف دولت کے لیے جا رہا ہوں؛ وہ دولت تم ہی مجھے دے دو۔ پھر اپنا حق لے کر میں واپس لوٹ جاؤں گا۔

Verse 17

तक्षक उवाच यावद्धनं प्रार्थयसे तस्माद्‌ राज्ञस्ततो5थधिकम्‌ | अहमेव प्रदास्यामि निवर्तस्व द्विजोत्तम,तक्षक बोला--द्विजश्रेष्ठ! तुम राजा परीक्षितसे जितना धन पाना चाहते हो, उससे अधिक मैं ही दे दूँगा, अतः लौट जाओ

تکشک نے کہا—اے برہمنِ برتر! تو بادشاہ سے جتنا مال چاہتا ہے، اس سے بھی زیادہ میں خود دوں گا؛ لہٰذا واپس لوٹ جا۔

Verse 18

सौतिर्वाच तक्षकस्य वच: श्रुत्वा काश्यपो द्विजसत्तम: । प्रदध्यौ सुमहातेजा राजानं प्रति बुद्धिमान्‌,उग्रश्रवाजी कहते हैं--तक्षककी बात सुनकर परम बुद्धिमान्‌ महातेजस्वी विप्रवर काश्यपने राजा परीक्षितके विषयमें कुछ देर ध्यान लगाकर सोचा

سوتی نے کہا—تکشک کی بات سن کر، نہایت دانا اور درخشاں برہمنِ برتر کاشیپ نے بادشاہ کے بارے میں کچھ دیر غور و فکر کیا۔

Verse 19

दिव्यज्ञान: स तेजस्वी ज्ञात्वा तं नृपतिं तदा । क्षीणायुषं पाण्डवेयमपावर्तत काश्यप:,मन्त्रैंगदिर्विषहरै रक्ष्यमाणं प्रयत्नत: । तेजस्वी काश्यप दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न थे। उस समय उन्होंने जान लिया कि पाण्डववंशी राजा परीक्षितकी आयु अब समाप्त हो गयी है, अतः वे मुनिश्रेष्ठ तक्षकसे अपनी रुचिके अनुसार धन लेकर वहाँसे लौट गये। महात्मा काश्यपके समय रहते लौट जानेपर तक्षक तुरंत हस्तिनापुर नगरमें जा पहुँचा। वहाँ जानेपर उसने सुना, राजा परीक्षित्‌की मन्त्रों तथा विष उतारनेवाली ओषधियोंद्वारा प्रयत्नपूर्वक रक्षा की जा रही है

دِیویہ گیان سے یکت تیزسوی کاشیپ نے اسی وقت جان لیا کہ پانڈوَونشی نریپتی کی عمر گھٹ چکی ہے؛ اس لیے وہ پلٹ گیا۔ اور اس نے سنا کہ راجا کی حفاظت منتروں اور زہر اُتارنے والی دواؤں سے بڑی کوشش کے ساتھ کی جا رہی ہے۔

Verse 20

लब्ध्वा वित्त मुनिवरस्तक्षकाद्‌ यावदीप्सितम्‌ । निवृत्ते काश्यपे तस्मिन्‌ समयेन महात्मनि

جب مُنی وَر کاشیپ نے تکشک سے اپنی خواہش کے مطابق مال پا لیا تو وہ مہاتما، طے شدہ وقت کی شرط سے بندھا ہوا، (اپنے ارادے سے) باز آ کر واپس لوٹ گیا۔

Verse 21

जगाम तक्षकस्तूर्ण नगरं नागसाह्दयम्‌ | अथ शुश्राव गच्छन्‌ स तक्षको जगतीपतिम्‌

تکشک تیزی سے اُس شہر کی طرف گیا جو ناگوں کو نہایت عزیز تھا۔ جاتے جاتے اس نے جگت پتی (بادشاہ) کے بارے میں خبر سنی۔

Verse 22

सौतिर्वाच स चिन्तयामास तदा मायायोगेन पार्थिव:,फलदर्भोदकं गृह राज्ञे नागोडथ तक्षक: । उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनकजी! तब तक्षकने विचार किया, मुझे मायाका आश्रय लेकर राजाको ठग लेना चाहिये; किंतु इसके लिये क्या उपाय हो? तदनन्तर तक्षक नागने फल, दर्भ (कुशा) और जल लेकर कुछ नागोंको तपस्वीरूपमें राजाके पास जानेकी आज्ञा दी

سوتی نے کہا—تب تَکشک نے سوچا: “مایا کی قوت کا سہارا لے کر مجھے راجا کو دھوکا دینا چاہیے؛ مگر اس کا طریقہ کیا ہو؟” پھر تَکشک ناگ نے پھل، دربھ (کُشا گھاس) اور پانی کی نذر تیار کرائی اور چند ناگوں کو تپسوی کے بھیس میں راجا کے پاس جانے کا حکم دیا۔

Verse 23

मया वज्चयितव्योडसौ क उपायो भवेदिति । ततस्तापसरूपेण प्राहिणोत्‌ स भुजड़मान्‌

تَکشک نے سوچا: “مجھے اسے لازماً فریب دینا ہے؛ کون سا طریقہ کارگر ہوگا؟” یہ طے کر کے اس نے تپسوی کا بھیس اختیار کیا اور اپنے مقصد کی تکمیل کے لیے ناگوں کو روانہ کر دیا۔

Verse 24

तक्षक उवाच गच्छथ्वं यूयमव्यग्रा राजानं कार्यवत्तया

تَکشک نے کہا: “تم سب بے اضطراب جاؤ؛ اور یوں ظاہر کرو گویا کوئی نہایت ضروری کام درپیش ہے، پھر راجا کے پاس پہنچو۔”

Verse 25

सौतिरु्वाच ते तक्षकसमादिष्टास्तथा चक्रुर्भुजज्रमा:,उग्रश्रवाजी कहते हैं--तक्षकके आदेश देनेपर उन नागोंने वैसा ही किया

سوتی نے کہا—تَکشک کے حکم پر اُن ناگوں نے ویسا ہی کیا جیسا کہا گیا تھا۔

Verse 26

उपनिन्‍न्युस्तथा राज्ञे दर्भानाप: फलानि च | तच्च सर्व स राजेन्द्र: प्रतिजग्राह वीर्यवान्‌,वे राजाके पास कुश, जल और फल लेकर गये। परम पराक्रमी महाराज परीक्षित्‌ने उनकी दी हुई वे सब वस्तुएँ ग्रहण कर लीं

وہ راجا کے پاس دربھ (کُشا)، پانی اور پھل لے کر پہنچے۔ تب قوت و شوکت والے راجےندر پریکشت نے اُن کی دی ہوئی وہ سب چیزیں قبول کر لیں۔

Verse 27

कृत्वा तेषां च कार्याणि गम्यतामित्युवाच तान्‌ | गतेषु तेषु नागेषु तापसच्छझरूपिषु,तदनन्तर उन्हें पारितोषिक देने आदिका कार्य करके कहा--“'अब आपलोग जाय॑।' तपस्वियोंके वेषमें छिपे हुए उन नागोंके चले जानेपर राजाने अपने मन्त्रियों और सुहृदोंसे कहा--'ये सब तपस्वियोंद्वारा लाये हुए बड़े स्वादिष्ठ फल हैं। इन्हें मेरे साथ आपलोग भी खायेँ।” ऐसा कहकर मन्सत्रियोंसहित राजाने उन फलोंको लेनेकी इच्छा की

ان کی خاطر تواضع اور رسم کے مطابق خدمت انجام دے کر اس نے اُن مہمانوں سے کہا: “اب تم جا سکتے ہو۔” جب وہ ناگ، جو تپسویوں کے بھیس میں چھپے ہوئے تھے، روانہ ہو گئے تو راجا نے اپنے وزیروں اور معتمد دوستوں سے کہا: “یہ تپسویوں کے لائے ہوئے نہایت لذیذ پھل ہیں؛ تم بھی میرے ساتھ کھاؤ۔” یہ کہہ کر راجا نے وزیروں سمیت اُن پھلوں کو لینے کی خواہش کی—پاکیزگی کے پردے میں چھپی فریب کاری سے بے خبر۔

Verse 28

अमात्यान्‌ सुहृदश्चैव प्रोवाच स नराधिप: । भक्षयन्तु भवन्तो वै स्वादूनीमानि सर्वश:,तदनन्तर उन्हें पारितोषिक देने आदिका कार्य करके कहा--“'अब आपलोग जाय॑।' तपस्वियोंके वेषमें छिपे हुए उन नागोंके चले जानेपर राजाने अपने मन्त्रियों और सुहृदोंसे कहा--'ये सब तपस्वियोंद्वारा लाये हुए बड़े स्वादिष्ठ फल हैं। इन्हें मेरे साथ आपलोग भी खायेँ।” ऐसा कहकर मन्सत्रियोंसहित राजाने उन फलोंको लेनेकी इच्छा की

تب اس نرادھپ نے اپنے وزیروں اور معتمد دوستوں سے کہا: “تم سب یہ لذیذ پھل کھاؤ۔”

Verse 29

तापसैरुपनीतानि फलानि सहिता मया । ततो राजा ससचिव: फलान्यादातुमैच्छत,तदनन्तर उन्हें पारितोषिक देने आदिका कार्य करके कहा--“'अब आपलोग जाय॑।' तपस्वियोंके वेषमें छिपे हुए उन नागोंके चले जानेपर राजाने अपने मन्त्रियों और सुहृदोंसे कहा--'ये सब तपस्वियोंद्वारा लाये हुए बड़े स्वादिष्ठ फल हैं। इन्हें मेरे साथ आपलोग भी खायेँ।” ऐसा कहकर मन्सत्रियोंसहित राजाने उन फलोंको लेनेकी इच्छा की

“تپسویوں نے میرے ساتھ آ کر یہ پھل پیش کیے؛ پھر راجا نے وزیروں سمیت اُن پھلوں کو قبول کرنا چاہا۔”

Verse 30

विधिना सम्प्रयुक्तो वै ऋषिवाक्येन तेन तु । यस्मिन्नेव फले नागस्तमेवा भक्षयत्‌ स्वयम्‌,विधाताके विधान एवं महर्षिके वचनसे प्रेरित होकर राजाने वही फल स्वयं खाया, जिसपर तक्षक नाग बैठा था

تقدیر کے جبر اور اُس رِشی کے کلام کی تحریک سے راجا نے خود وہی پھل کھا لیا جس پر سانپ (تکشک) بیٹھا تھا۔

Verse 31

ततो भक्षयतस्तस्य फलात्‌ कृमिरभूदणु: । हस्वक: कृष्णनयनस्ताम्रवर्णोडथ शौनक,शौनकजी! खाते समय राजाके हाथमें जो फल था, उससे एक छोटा-सा कीट प्रकट हुआ। देखनेमें वह अत्यन्त लघु था, उसकी आँखें काली और शरीरका रंग ताँबेके समान था

اے شَونک! جب وہ کھا رہا تھا تو اس کے ہاتھ میں موجود پھل سے ایک نہایت باریک کیڑا نمودار ہوا۔ وہ جسامت میں چھوٹا، آنکھیں سیاہ، اور بدن تانبے کے رنگ جیسا تھا۔

Verse 32

स त॑ गृहा नृपश्रेष्ठ सचिवानिदमब्रवीत्‌ । अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भयम्‌,नृपश्रेष्ठ परीक्षितने उस कीड़ेको हाथमें लेकर मन्त्रियोंसे इस प्रकार कहा--“अब सूर्यदेव अस्ताचलको जा रहे हैं; इसलिये इस समय मुझे सर्पके विषसे कोई भय नहीं है

تب نَریشریشٹھ نے اُس کیڑے کو ہاتھ میں لے کر وزیروں سے کہا— “اب سورج غروب ہو رہا ہے؛ اس لیے اس وقت مجھے سانپ کے زہر سے بھی کوئی خوف نہیں۔”

Verse 33

सत्यवागस्तु स मुनि: कृमिर्मा दशतामयम्‌ | तक्षको नाम भूत्वा वै तथा परिहृतं भवेत्‌,“वे मुनि सत्यवादी हों, इसके लिये यह कीट ही तक्षक नाम धारण करके मुझे डँस ले। ऐसा करनेसे मेरे दोषका परिहार हो जायगा

“وہ مُنی سچّا ثابت ہو؛ یہی کیڑا ‘تکشک’ نام دھار کر مجھے ڈس لے۔ یوں میرا قصور دور ہو جائے گا۔”

Verse 34

ते चैनमन्ववर्तन्त मन्त्रिण: कालचोदिता: । एवमुकक्‍्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवायां संनिवेश्य ह,कालसे प्रेरित होकर मन्त्रियोंने भी उनकी हाँ-में-हाँ मिला दी। मन्त्रियोंसे पूर्वोक्त बात कहकर राजाधिराज परीक्षित्‌ उस लघु कीटको कंधेपर रखकर जोर-जोरसे हँसने लगे। वे तत्काल ही मरनेवाले थे; अतः उनकी बुद्धि मारी गयी थी। राजा अभी हँस ही रहे थे कि उन्हें जो निवेदित किया गया था उस फलसे निकलकर तक्षक नागने अपने शरीरसे उनको जकड़ लिया। इस प्रकार वेगपूर्वक उनके शरीरमें लिपटकर नागराज तक्षकने बड़े जोरसे गर्जना की और भूपाल परीक्षित्‌को डँस लिया

وقت کے دھکے سے وزیروں نے بھی اسی کی راہ اختیار کی۔ یوں کہہ کر راجندر نے اسے اپنی گردن پر رکھ لیا۔

Verse 35

कृमिकं प्राहसत्‌ तूर्ण मुमूर्षुर्नष्टचेतन: । प्रहसन्नेव भोगेन तक्षकेण त्ववेष्ट्यत,कालसे प्रेरित होकर मन्त्रियोंने भी उनकी हाँ-में-हाँ मिला दी। मन्त्रियोंसे पूर्वोक्त बात कहकर राजाधिराज परीक्षित्‌ उस लघु कीटको कंधेपर रखकर जोर-जोरसे हँसने लगे। वे तत्काल ही मरनेवाले थे; अतः उनकी बुद्धि मारी गयी थी। राजा अभी हँस ही रहे थे कि उन्हें जो निवेदित किया गया था उस फलसे निकलकर तक्षक नागने अपने शरीरसे उनको जकड़ लिया। इस प्रकार वेगपूर्वक उनके शरीरमें लिपटकर नागराज तक्षकने बड़े जोरसे गर्जना की और भूपाल परीक्षित्‌को डँस लिया

موت قریب تھی اور ہوش جاتا رہا تھا؛ بادشاہ اس چھوٹے کیڑے پر فوراً زور سے ہنسا۔ ہنستے ہنستے ہی تکشک نے اپنے پیچوں سے اسے لپیٹ لیا۔

Verse 36

तस्मात्‌ फलादू विनिष्क्रम्य यत्‌ तद्‌ राज्ञे निवेदितम्‌ । वेष्टयित्वा च वेगेन विनद्य च महास्वनम्‌ | अदशत्‌ पृथिवीपालं तक्षकः पन्नगेश्वर:,कालसे प्रेरित होकर मन्त्रियोंने भी उनकी हाँ-में-हाँ मिला दी। मन्त्रियोंसे पूर्वोक्त बात कहकर राजाधिराज परीक्षित्‌ उस लघु कीटको कंधेपर रखकर जोर-जोरसे हँसने लगे। वे तत्काल ही मरनेवाले थे; अतः उनकी बुद्धि मारी गयी थी। राजा अभी हँस ही रहे थे कि उन्हें जो निवेदित किया गया था उस फलसे निकलकर तक्षक नागने अपने शरीरसे उनको जकड़ लिया। इस प्रकार वेगपूर्वक उनके शरीरमें लिपटकर नागराज तक्षकने बड़े जोरसे गर्जना की और भूपाल परीक्षित्‌को डँस लिया

جو پھل بادشاہ کو پیش کیا گیا تھا، اسی میں سے نکل کر سانپوں کے سردار تکشک نے تیزی سے زمین کے نگہبان کو لپیٹ لیا۔ زبردست گرج کے ساتھ اس نے راجہ پریکشت کو ڈس لیا۔

Verse 43

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि तक्षकदंशे त्रिचत्वारिंशो5 ध्याय: ।। ४३ ।। इस प्रकार श्रीमह्ा भारत आदिपव॑के अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें तक्षक-दंशनविषयक तैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

یوں شری مہابھارت کے آدی پَرو کے تحت آستیک پَرو میں تَکشک کے ڈسنے سے متعلق تینتالیسواں باب اختتام کو پہنچا۔

Verse 213

मन्त्रैंगदिर्विषहरै रक्ष्यमाणं प्रयत्नत: । तेजस्वी काश्यप दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न थे। उस समय उन्होंने जान लिया कि पाण्डववंशी राजा परीक्षितकी आयु अब समाप्त हो गयी है, अतः वे मुनिश्रेष्ठ तक्षकसे अपनी रुचिके अनुसार धन लेकर वहाँसे लौट गये। महात्मा काश्यपके समय रहते लौट जानेपर तक्षक तुरंत हस्तिनापुर नगरमें जा पहुँचा। वहाँ जानेपर उसने सुना, राजा परीक्षित्‌की मन्त्रों तथा विष उतारनेवाली ओषधियोंद्वारा प्रयत्नपूर्वक रक्षा की जा रही है

تَکشک نے کہا—“میں نے سنا ہے کہ راجا پریکشت کی بڑی کوشش کے ساتھ حفاظت کی جا رہی ہے—حفاظتی منتروں سے اور زہر اتارنے والی دواؤں سے۔”

Verse 233

फलदर्भोदकं गृह राज्ञे नागोडथ तक्षक: । उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनकजी! तब तक्षकने विचार किया, मुझे मायाका आश्रय लेकर राजाको ठग लेना चाहिये; किंतु इसके लिये क्या उपाय हो? तदनन्तर तक्षक नागने फल, दर्भ (कुशा) और जल लेकर कुछ नागोंको तपस्वीरूपमें राजाके पास जानेकी आज्ञा दी

اُگرشروَا نے کہا—“شونک جی! تب تَکشک نے سوچا—مایا کا سہارا لے کر راجا کو دھوکا دینا چاہیے؛ مگر اس کے لیے کیا تدبیر ہو؟ پھر تَکشک ناگ نے پھل، دَربھ (کُشا) اور پانی لے کر چند ناگوں کو تپسوی کا روپ دھار کر راجا کے پاس جانے کا حکم دیا۔”

Verse 246

फलपुष्पोदकं नाम प्रतिग्राहयितुं नृपम्‌ तक्षकने कहा--तुमलोग कार्यकी सफलताके लिये राजाके पास जाओ, किंतु तनिक भी व्यग्र न होना। तुम्हारे जानेका उद्देश्य है--महाराजको फल, फूल और जल भेंट करना

تَکشک نے کہا—“کام کی کامیابی کے لیے تم لوگ راجا کے پاس جاؤ، مگر ذرا بھی گھبرانا نہیں۔ تمہارا مقصد یہ ہے کہ مہاراج کو پھل، پھول اور پانی کی نذر پیش کرو۔”

Frequently Asked Questions

Jaratkāruṇī must choose between two risks: waking her husband may violate the marital samaya by displeasing him, while not waking him may allow a lapse in saṃdhyā observance—framed as a heavier dharmic fault due to time-bound ritual duty.

The chapter teaches that dharma often involves competing obligations; intention and context matter, but agreements and ritual disciplines carry real normative force. It also illustrates how private ethical choices can serve broader communal outcomes (lineage welfare and curse-resolution).

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s meta-significance is narrative-causal: it authorizes the future importance of the unborn child by describing the pregnancy’s exceptional qualities and linking it to a larger lineage-and-curse framework.