
सूर्य–कर्णोपदेशः (Sūrya’s Counsel to Karṇa on Kīrti and the Kuṇḍala)
Upa-parva: Karna–Indra–Sūrya Saṃvāda (Kundala-dāna Pratiṣedha Episode)
Sūrya addresses Karṇa, affirming his prior beneficence toward self, friends, family, and parents, then reframes the pursuit of lasting fame (kīrti) as incompatible with actions that destroy life (prāṇa-virodha). He argues that meaningful work and social obligations belong to the living—parents, children, kin, and rulers act only while life remains—and that fame is valuable chiefly for one who can experience and operationalize it. The discourse introduces a guarded divine secret (deva-guhya), withheld until the proper time, and pivots to a concrete injunction: Karṇa should not give his radiant kuṇḍala to a mendicant who is in fact Vajrapāṇi (Indra). Sūrya underscores the ornaments’ protective and symbolic power, asserts that Arjuna cannot defeat Karṇa while he retains them (even if Indra’s own force were weaponized), and advises rhetorical strategies to repeatedly and plausibly deflect Indra’s request. The chapter thus integrates moral reasoning (fame versus life), devotion-based admonition, and strategic foresight oriented toward an impending martial encounter.
Chapter Arc: समुद्र-तट पर राम के चारों ओर वानर-सेना का महासंगठन होता है—कोटि-कोटि तरस्वी यूथपति, सुषेण, गज, गवय आदि अपने-अपने दलों सहित उपस्थित होकर लंका-गमन की घड़ी को विराट बना देते हैं। → समुद्र अजेय बाधा बनकर सामने खड़ा है। राम उपाय से पहले विनय चुनते हैं—समुद्र की आराधना और उपवास का संकल्प; पर भीतर-ही-भीतर यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि यदि मार्ग न मिला तो वे अप्रतिहत महास्त्रों से समुद्र को दग्ध कर देंगे। → राम का निर्णायक संकल्प—‘मार्ग न दिखा तो दहन’—प्रकृति के सामने धर्म-बल और राज-बल का चरम उद्घोष बनता है; इसी निर्णायक क्षण से समाधान का द्वार खुलता है और सेतु-निर्माण की दिशा निश्चित होती है। → विभीषण की सम्मति के अनुसार सेतु के द्वारा राम एक मास में समस्त सेना सहित महासागर को पार करते हैं। मार्ग बन जाता है, अभियान को ठोस आधार मिलता है, और लंका के द्वार पर युद्ध की भूमिका तैयार हो जाती है। → लंका-समक्ष पहुँचकर राक्षस-दूत अपने वास्तविक रूप में प्रकट होते हैं; राम उन्हें अपनी सेना का दर्शन कराकर छोड़ देते हैं—अब अगला चरण सीधे लंका-युद्ध की देहरी पर है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ श्लोक मिलाकर कुल ७१ ६ “लोक हैं) 3 “+(>9) #2<# # 5-7 त्रयशीर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: वानर-सेनाका संगठन, है का का निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना मार्कण्डेय उवाच ततस्तत्रैव रामस्य समासीनस्य तै: सह । समाजग्मु: कपिश्रेष्ठा: सुग्रीववचनात् तदा,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर सुग्रीवकी आज्ञाके अनुसार बड़े-बड़े वानरवीर माल्यवान् पर्वतपर लक्ष्मण आदिके साथ बैठे हुए भगवान् श्रीरामके पास पहुँचने लगे
मार्कण्डेय उवाच—ततस्तत्रैव रामस्य तैः सह समासीनस्य, सुग्रीववचनात् तदा कपिश्रेष्ठाः समाजग्मुः।
Verse 2
वृत: कोटिसहस्रेण वानराणां तरस्विनाम् । श्वशुरो वालिन: श्रीमान् सुषेणो राममभ्ययात्,सबसे पहले वालीके श्वशुर श्रीमान् सुषेण श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें उपस्थित हुए। उनके साथ वेगशाली वानरोंकी सहस्र कोटि (दस अरब) सेना थी
वृतः कोटिसहस्रेण वानराणां तरस्विनाम्। वालिनः श्वशुरः श्रीमान् सुषेणो राममभ्ययात्॥
Verse 3
कोटीशतवृतो वापि गजो गवय एव च । वानरेन्द्रौ महावीर्यों पृथक् पृथगदृश्यताम्,फिर महापराक्रमी वानरराज “गज” और “गवय' पृथक्-पृथक् एक-एक अरब सेनाके साथ आते दिखायी दिये
कोटीशतवृतो वापि गजो गवय एव च। वानरेन्द्रौ महावीर्यौ पृथक् पृथगदृश्यताम्॥
Verse 4
षष्टिकोटिसहस्राणि प्रकर्षन् प्रत्यदृश्यत । गोलाड्गूलो महाराज गवाक्षो भीमदर्शन:,महाराज! गोलांगूल (लंगूर) जातिका वानर गवाक्ष, जो देखनेमें बड़ा भयंकर था, साठ सहस्र कोटि (छ: खरब) वानर-सेना साथ लिये दृष्टिगोचर हुआ
षष्टिकोटिसहस्राणि प्रकर्षन् प्रत्यदृश्यत। गोलाङ्गूलो महाराज गवाक्षो भीमदर्शनः॥
Verse 5
गन्धमादनवासी तु प्रथितो गन्धमादन: । कोटीशतसहस््राणि हरीणां समकर्षत,गन्धमादन पर्वतपर रहनेवाला गन्धमादन नामसे विख्यात वानर वानरोंकी दस खरब सेना साथ लेकर आया
मार्कण्डेय उवाच—गन्धमादनवासी तु प्रथितो गन्धमादनः । कोटीशतसहस्राणि हरीणां समकर्षत ॥
Verse 6
पनसो नाम मेधावी वानर: सुमहाबल: । कोटीर्दश द्वादश च त्रिंशत् पञ्च प्रकर्षति,पनस नामक बुद्धिमान् तथा महाबली वानर सत्तावन करोड़ सेना साथ लेकर आया
पनसो नाम मेधावी वानरः सुमहाबलः । कोटीर्दश द्वादश च त्रिंशत्पञ्च प्रकर्षति ॥
Verse 7
श्रीमान् दधिमुखो नाम हरिवृद्धो5तिवीर्यवान् । प्रचकर्ष महासैन्यं हरीणां भीमतेजसाम्,वानरोंमें वृद्ध तथा अत्यन्त पराक्रमी श्रीमान् दधिमुख भयंकर तेजसे सम्पन्न वानरोंकी विशाल सेना साथ लेकर आये
श्रीमान् दधिमुखो नाम हरिवृद्धोऽतिवीर्यवान् । प्रचकर्ष महासैन्यं हरीणां भीमतेजसाम् ॥
Verse 8
कृष्णानां मुखपुण्ड्राणामृक्षाणां भीमकर्मणाम् | कोटीशतसहस्रेण जाम्बवानू् प्रत्यदृश्यत,जिनके मुख (ललाट)-पर तिलकका चिह्न शोभा पा रहा था तथा जो भयंकर पराक्रम करनेवाले थे, ऐसे काले रंगके शतकोटि सहस्र (दस खरब) रीछोंकी सेनाके साथ वहाँ जाम्बवान् दिखायी दिये
कृष्णानां मुखपुण्ड्राणामृक्षाणां भीमकर्मणाम् । कोटीशतसहस्रेण जाम्बवान् प्रत्यदृश्यत ॥
Verse 9
एते चान्ये च बहवो हरियूथपयूथपा: । असंख्येया महाराज समीयू रामकारणात्,महाराज! ये तथा और भी बहुत-से वानर-यूथपतियोंके भी यूथपति, जिनकी कोई संख्या नहीं थी, श्रीरामचन्द्रजीके कार्यसे वहाँ एकत्र हुए
एते चान्ये च बहवो हरियूथपयूथपाः । असंख्येया महाराज समीयू रामकारणात् ॥
Verse 10
गिरिकूटनिभाड़ानां सिंहानामिव गर्जताम् | श्रूयते तुमुल: शब्दस्तत्र तत्र प्रधावताम्,उनके अंग पर्वतोंके शिखरके सदृश जान पड़ते थे। वे सबके सब सिंहोंके समान गरजते और इधर-उधर दौड़ते थे। उन सबका सम्मिलित शब्द बड़ा भयंकर प्रतीत होता था
गिरिकूटनिभाङ्गानां सिंहानामिव गर्जताम् । श्रूयते तुमुलः शब्दस्तत्र तत्र प्रधावताम् ॥
Verse 11
गिरिकूटनिभा: केचित् केचिन्महिषसंनिभा: । शरदशभ्रप्रतीकाशा: केचिद्धिड्डुलकानना:,कोई पर्वत-शिखरके समान ऊँचे थे तो कोई भैंसोंके सदूश मोटे और काले। कितने ही वानर शरद-ऋतुके बादलोंकी तरह सफेद दिखायी देते थे, कितनोंके ही मुख सिन्दूरके समान लाल रंगके थे
गिरिकूटनिभाः केचित् केचिन्महिषसंनिभाः । शरदभ्रप्रतीकाशाः केचिद्धिड्डुलकाननाः ॥
Verse 12
उत्पतन्तः पतन्तश्न प्लवमानाश्न वानरा: । उद्धुन्वन्तो 5परे रेणून् समाजग्मु: समन्ततः,वे वानर सैनिक उछलते, गिरते-पड़ते, कूदते-फाँदते और धूल उड़ाते हुए चारों ओरसे एकत्र हो रहे थे
उत्पतन्तः पतन्तश्च प्लवमानाश्च वानराः । उद्धुन्वन्तोऽपरे रेणून् समाजग्मुः समन्ततः ॥
Verse 13
स वानरमहासैन्य: पूर्णसागरसंनिभ: । निवेशमकरोत तत्र सुग्रीवानुमते तदा,वानरोंकी वह विशाल सेना भरे-पूरे महासागरके समान दिखायी देती थी। सुग्रीवकी आज्ञासे उस समय माल्यवान् पर्वतके आस-पास ही उस समस्त सेनाका पड़ाव पड़ गया
स वानरमहासैन्यः पूर्णसागरसंनिभः । निवेशमकरोत तत्र सुग्रीवानुमते तदा ॥
Verse 14
ततस्तेषु हरीन्द्रेषु समावृत्तेषु सर्वश: । तिथौ प्रशस्ते नक्षत्रे मुहूर्ते चाभिपूजिते,तदनन्तर उन समस्त श्रेष्ठ वानरोंक सब ओरसे एकत्र हो जानेपर सुग्रीवसहित भगवान् श्रीरामने एक दिन शुभ तिथि, उत्तम नक्षत्र और शुभ मुहूर्तमें युद्धके लिये प्रस्थान किया। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो वे उस व्यूहरचनायुक्त सेनाके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंका संहार करने जा रहे हैं
ततस्तेषु हरीन्द्रेषु समावृत्तेषु सर्वशः । तिथौ प्रशस्ते नक्षत्रे मुहूर्ते चाभिपूजिते ॥
Verse 15
तेन व्यूढेन सैन्येन लोकानुद्)र्तयन्निव । प्रययौ राघव: श्रीमान् सुग्रीवसहितस्तदा,तदनन्तर उन समस्त श्रेष्ठ वानरोंक सब ओरसे एकत्र हो जानेपर सुग्रीवसहित भगवान् श्रीरामने एक दिन शुभ तिथि, उत्तम नक्षत्र और शुभ मुहूर्तमें युद्धके लिये प्रस्थान किया। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो वे उस व्यूहरचनायुक्त सेनाके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंका संहार करने जा रहे हैं
तेन व्यूढेन सैन्येन लोकानुद्धर्तयन्निव । प्रययौ राघवः श्रीमान् सुग्रीवसहितस्तदा ॥
Verse 16
मुखमासीत् तु सैन्यस्य हनूमान् मारुतात्मज: । जघनं पालयामास सौमित्रिरकुतोभय:,उस सेनाके मुहानेपर वायुपुत्र हनुमानजी विद्यमान थे। किसीसे भी भय न माननेवाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण उसके पृष्ठभागकी रक्षा कर रहे थे
मुखमासीत् तु सैन्यस्य हनूमान् मारुतात्मजः । जघनं पालयामास सौमित्रिरकुतोभयः ॥
Verse 17
बद्धगोधाडुलित्राणौ राघवौ तत्र जम्मतुः । वृतौ हरिमहामात्रै श्वन्द्रसूर्यों ग्रहैरिव,दोनों रघुवंशी वीर श्रीराम और लक्ष्मण हाथोंमें गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने पहने हुए थे। वे ग्रहोंसे घिरे हुए चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति वानरजातीय मन्त्रियोंके बीचमें होकर चल रहे थे
बद्धगोधाङ्गुलित्राणौ राघवौ तत्र जग्मतुः । वृतौ हरिमहामात्रैः शशिसूर्यौ ग्रहैरिव ॥
Verse 18
प्रबभौ हरिसैन्यं तत् सालतालशिलायुधम् | सुमहच्छालिभवनं यथा सूर्योदयं प्रति
प्रबभौ हरिसैन्यं तत् सालतालशिलायुधम् । सुमहच्छालिभवनं यथा सूर्योदयं प्रति ॥
Verse 19
श्रीरामचन्द्रजीके सम्मुख साल, ताल और शिलारूपी आयुध लिये वे समस्त वानर सैनिक सूर्योदयके समय पके हुए धानके विशाल खेतोंके समान जान पड़ते थे ।। नलनीलाड्डदक्राथमैन्दद्धिविदपालिता । ययौ सुमहती सेना राघवस्यार्थसिद्धये,नल, नील, अंगद, क्राथ, मैन्द तथा द्विविदके द्वारा सुरक्षित हुई वह विशाल वानरसेना श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सिद्ध करनेके लिये आगे बढ़ती चली जा रही थी
नलनीलाङ्गदक्राथमैन्दद्विविदपालिता । ययौ सुमहती सेना राघवस्यार्थसिद्धये ॥
Verse 20
विविधेषु प्रशस्तेषु बहुमूलफलेषु च । प्रभूतमधुमूलेषु वारिमत्सु शिवेषु च,जहाँ फल-मूलकी बहुतायत होती, मधु और कन्द-मूल प्रचुरमात्रामें उपलब्ध होते तथा जलकी अधिक सुविधा होती, ऐसे कल्याणकारी और उत्तम विविध पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालती हुई वह वानरसेना बिना किसी विघ्न-बाधाके खारे पानीवाले समुद्रके निकट जा पहुँची
विविधेषु प्रशस्तेषु बहुमूलफलेषु च । प्रभूतमधुमूलेषु वारिमत्सु शिवेषु च ॥ एवं गिरिशिखरेषु कल्याणेषु सुस्थलेषु च निवसन्ती सा वानरसेना निराबाधा क्षारोदं सागरं प्रत्युपैति ।
Verse 21
निवसन्ती निराबाधा तथैव गिरिसानुषु । उपायाद्धरिसेना सा क्षारोदमथ सागरम्,जहाँ फल-मूलकी बहुतायत होती, मधु और कन्द-मूल प्रचुरमात्रामें उपलब्ध होते तथा जलकी अधिक सुविधा होती, ऐसे कल्याणकारी और उत्तम विविध पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालती हुई वह वानरसेना बिना किसी विघ्न-बाधाके खारे पानीवाले समुद्रके निकट जा पहुँची
निवसन्ती निराबाधा तथैव गिरिसानुषु । उपायाद्धरिसेना सा क्षारोदं सागरम् ॥
Verse 22
द्वितीयसागरनिभं तद् बल॑ बहुलध्वजम् | वेलावनं समासाद्य निवासमकरोत् तदा,असंख्य ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित वह विशाल वाहिनी दूसरे महासागरके समान जान पड़ती थी। सागरके तटवर्ती वनमें पहुँचकर उसने अपना पड़ाव डाला
द्वितीयसागरनिभं तद् बलं बहुलध्वजम् । वेलावनं समासाद्य निवासमकरोत् तदा ॥
Verse 23
ततो दाशरथि: श्रीमान् सुग्रीव॑ प्रत्यभाषत । मध्ये वानरमुख्यानां प्राप्तकालमिदं वच:,तत्पश्चात् मुख्य-मुख्य वानरोंके बीचमें बैठे हुए दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामने सुग्रीवसे यह समयोचित बात कही--
ततो दाशरथिः श्रीमान् सुग्रीवं प्रत्यभाषत । मध्ये वानरमुख्यानां प्राप्तकालमिदं वचः ॥
Verse 24
उपाय: को नु भवतां मतः सागरलड्घने । इयं हि महती सेना सागरश्नातिदुस्तर:,“मित्रो! हमारी यह सेना बहुत बड़ी है और सामने अत्यन्त दुस्तर महासागर लहरें ले रहा है। ऐशी दशामें आपलोग समुद्रके पार जानेके लिये कौन-सा उपाय ठीक समझते हैं?
उपायः को नु भवतां मतः सागरलङ्घने । इयं हि महती सेना सागरश्चातिदुस्तरः ॥
Verse 25
तत्रान्ये व्याहरन्ति सम वानरा बहुमानिन: । समर्था लड्घने सिन्धोर्न तु तत् कृत्स्नकारकम्,तब वहाँ बहुत-से दूसरे-दूसरे वानर, जो बड़े अभिमानी थे, कहने लगे--“'हम तो समुद्रको लाँघ जानेमें समर्थ हैं, परंतु सब नहीं लाँध सकते”
तत्रान्येऽपि वानरा बहुमानिनः समव्याहरन्— “वयं तु सिन्धुं लङ्घयितुं समर्थाः; न तु तत्कृत्स्नं कार्यं समग्रतया कर्तुं शक्नुमः।”
Verse 26
केचिन्नौभिव्यवस्यन्ति केचिच्च विविधै: प्लवै: । नेति रामस्तु तान् सर्वान् सान्त्वयन् प्रत्यभाषत,कुछ वानर बड़ी-बड़ी नावोंके द्वारा समुद्रके पार जानेका निश्चय प्रकट करने लगे। कुछने नाव-डोंगी आदि विविध साधनोंद्वारा पार जानेकी बात बतायी। परंतु श्रीरामचन्द्रजीने उनकी यह सलाह माननेसे इनकार कर दिया और सबको सान्त्वना देते हुए कहा--
केचिन्नौभिर्व्यवस्यन्ति केचिद्विविधैः प्लवैः; नेति रामस्तु तान् सर्वान् सान्त्वयन् प्रत्यभाषत।
Verse 27
शतयोजन विस्तारं न शक्ता: सर्ववानरा: । क्रान्तुं तोयनिधिं वीरा नैषा वो नैप्ठेकी मति:,“वीरो! सभी वानरोंमें इतनी शक्ति नहीं है कि वे सौ योजन विस्तृत समुद्रको लाँघ सकें; अतः तुम लोगोंका यह निर्णय सर्वमान्य सिद्धान्तके रूपमें ग्राह्म नहीं है
शतयोजनविस्तारं न शक्ताः सर्ववानराः। क्रान्तुं तोयनिधिं वीरा; नैषा वो नैष्ठिकी मतिः॥
Verse 28
नावो न सन्ति सेनाया बह्वदयस्तारयितुं तथा । वणिजामुपघातं च कथमस्मद्विधश्चरेत्,“इतनी बड़ी सेनाको पार उतारनेके लिये हमलोगोंके पास अधिक नौकाएँ भी नहीं हैं। (यदि कहें, व्यापारियोंके जहाजोंसे काम लिया जाय, तो) मेरे-जैसा पुरुष अपने स्वार्थके लिये व्यापारियोंके व्यवसायको हानि कैसे पहुँचा सकता है?
नावो न सन्ति सेनाया बह्वद्यास्तारयितुं तथा। वणिजामुपघातं च कथमस्मद्विधश्चरेत्॥
Verse 29
विस्तीर्ण चैव नः सैन्यं हन्याच्छिद्रेण वै पर: । प्लवोडुपप्रतारश्न नैवात्र मम रोचते,“इसके सिवा नौका आदिसे यात्रा करनेपर हमारी सेना छिट-फुट होकर बहुत दूरतक फैल जायगी। उस दशामें अवसर पाकर शत्रु इसका नाश भी कर सकता है। इसीलिये डोंगी और नाव आदिपर बैठकर पार उतरनेकी बात मुझे ठीक नहीं जँचती है
विस्तीर्णं चैव नः सैन्यं हन्याच्छिद्रेण वै परः। प्लवोडुपप्रतारश्च नैवात्र मम रोचते॥
Verse 30
अहं त्विमं जलनिर्धि समारप्स्याम्युपायतः । प्रतिशेष्याम्युपवसन् दर्शयिष्यति मां ततः,“मैं तो किसी उपायसे इस समुद्रकी ही आराधना आरम्भ करूँगा। इसके तटपर अन्न- जल छोड़कर धरना दूँगा। इससे यह अवश्य मुझे दर्शन देगा तथा कोई मार्ग दिखायेगा
अहं त्विमं जलनिधिं समारप्स्याम्युपायतः । प्रतिशेष्याम्युपवसन् दर्शयिष्यति मां ततः ॥
Verse 31
न चेद् दर्शयिता मार्ग धक्ष्याम्पेनमहं ततः । महास्त्रैरप्रतिहतैरत्यग्निपवनोज्ज्वलै:,“यदि यह स्वयं प्रकट होकर कोई मार्ग नहीं दिखायेगा तो मैं अग्नि और वायुसे भी अधिक तेजस्वी तथा कभी न चूकनेवाले महान दिव्यास्त्रोंद्रारा इसे जलाकर भस्म कर डालूँगा'
न चेद् दर्शयिता मार्गं धक्ष्याम्येनमहं ततः । महास्त्रैरप्रतिहतैरत्यग्निपवनोज्ज्वलैः ॥
Verse 32
इत्युक्त्वा सह सौमित्रिरुपस्पृश्याथ राघव: । प्रतिशिश्ये जलनिधिं विधिवत् कुशसंस्तरे,ऐसा कहकर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीने आचमन करके समुद्रके तटपर कुशकी चटाई बिछाकर उसपर लेटकर विधिपूर्वक धरना दे दिया
इत्युक्त्वा सह सौमित्रिरुपस्पृश्याथ राघवः । प्रतिशिश्ये जलनिधिं विधिवत् कुशसंस्तरे ॥
Verse 33
सागरस्तु ततः स्वप्ने दर्शयामास राघवम् | देवो नदनदीभर्ता श्रीमान् यादोगणैर्वृत:,तब नदों और नदियोंके स्वामी श्रीमान् समुद्रदेवने जल-जन्तुओंके साथ प्रकट होकर स्वप्नमें श्रीरामचन्द्रजीको दर्शन दिया
सागरस्तु ततः स्वप्ने दर्शयामास राघवम् । देवो नदनदीभर्ता श्रीमान् यादोगणैर्वृतः ॥
Verse 34
कौसल्यामातरित्येवमाभाष्य मधुरं वच: । इदमित्याह रत्नानामाकरै: शतशो वृत:,वह सैकड़ों रत्नके आकरोंसे घिरा हुआ था। उसने “कौसल्यानन्दन” कहकर श्रीरामको सम्बोधित किया और मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा--
कौसल्यामातरित्येवमाभाष्य मधुरं वचः । इदमित्याह रत्नानामाकरैः शतशो वृतः ॥
Verse 35
ब्रृहि कि ते करोम्यत्र साहाय्यं पुरुषर्षभ । ऐक्ष्वाको हास्मि ते ज्ञातिरिति रामस्तमब्रवीत्,“नरश्रेष्ठ! कहो, मैं यहाँ तुम्हारी क्या सहायता करूँ? सगरपुत्रोंसे संवर्धित होनेके कारण मैं भी इक्ष्वाकुवंशीय तथा तुम्हारा भाई-बन्धु हूँ"। यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा --
रामस्तमब्रवीत्— “ब्रूहि किं ते करोम्यत्र साहाय्यं पुरुषर्षभ। ऐक्ष्वाकोऽहं तव ज्ञातिः; तस्माद् अबाधं वद।”
Verse 36
मार्गमिच्छामि सैन्यस्य दत्तं नदनदीपते । येन गत्वा दशग्रीवं हन्यां पौलस्त्यपांसनम्,“नद-नदीश्वर! मैं अपनी सेनाके लिये तुम्हारे द्वारा दिया हुआ मार्ग चाहता हूँ, जिससे जाकर पुलस्त्यकुलांगार दशमुख रावणको मार सकूँ
“मार्गमिच्छामि सैन्यस्य दत्तं नदनदीपते। येन गत्वा दशग्रीवं हन्यां पौलस्त्यपांसनम्॥”
Verse 37
यद्येवं याचतो मार्ग न प्रदास्यति मे भवान् | शरैस्त्वां शोषयिष्यामि दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितै:,“यदि इस प्रकार याचना करनेपर तुम मुझे मार्ग न दोगे तो मैं दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंद्वारा तुम्हें सुखा दूँगा”
“यद्येवं याचतो मार्गं न प्रदास्यति मे भवान्। शरैस्त्वां शोषयिष्यामि दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः॥”
Verse 38
इत्येवं ब्रुवत: श्रुत्वा रामस्य वरुणालय: । उवाच व्यथितो वाक्यमिति बद्धाञ्जलि: स्थित:,श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर वरुणालय समुद्र व्यथित हो उठा और खड़े हुए हाथ जोड़कर बोला--
इत्येवं ब्रुवतः श्रुत्वा रामस्य वरुणालयः। उवाच व्यथितो वाक्यमिति बद्धाञ्जलिः स्थितः॥
Verse 39
नेच्छामि प्रतिघातं ते नास्मि विघ्नकरस्तव । शृणु चेदं वचो राम श्रुत्वा कर्तव्यमाचर,“श्रीराम! मैं तुम्हारा सामना करना नहीं चाहता और न मैं तुम्हारे मार्गमें विघ्न डालनेकी ही इच्छा रखता हूँ। मेरी यह बात सुनो और सुनकर जो कर्तव्य हो, उसे करो
“नेच्छामि प्रतिघातं ते नास्मि विघ्नकरस्तव। शृणु चेदं वचो राम श्रुत्वा कर्तव्यमाचर॥”
Verse 40
यदि दास्यामि ते मार्ग सैन्यस्य व्रजतो55ज्ञया । अन्ये>प्याज्ञापयिष्यन्ति मामेवं धनुषो बलात्,“यदि मैं इस समय तुम्हारी आज्ञासे तुम्हें और लंका जाती हुई तुम्हारी सेनाको मार्ग दे दूँगा तो दूसरे लोग भी इसी प्रकार धनुषके बलसे मुझपर हुक्म चलाया करेंगे
मार्कण्डेय उवाच— यदि दास्यामि ते मार्गं सैन्यस्य व्रजतोऽज्ञया । अन्येऽप्याज्ञापयिष्यन्ति मामेवं धनुषो बलात् ॥
Verse 41
अस्ति त्वत्र नलो नाम वानर: शिल्पिसम्मत: । त्वष्टदेंवस्य तनयो बलवान विश्वकर्मण:,“तुम्हारी सेनामें एक नल नामक वानर है जो शिल्पियोंके लिये भी आदरणीय है। बलवान् नल देवशिल्पी विश्वकर्माका पुत्र है
अस्ति त्वत्र नलो नाम वानरः शिल्पिसम्मतः । त्वष्टृदेवस्य तनयो बलवान् विश्वकर्मणः ॥
Verse 42
स यत् काष्ठ तृणं वापि शिलां वा क्षेप्स्यते मयि । सर्व तद् धारयिष्यामि स ते सेतुर्भविष्यति,“वह अपने हाथसे उठाकर जो भी काठ, तिनका या पत्थर मेरे भीतर डाल देगा, वह सब मैं जलके ऊपर-धारण किये रहूँगा। वही तुम्हारे लिये पुल हो जायगा”
स यत्काष्ठं तृणं वापि शिलां वा क्षेप्स्यते मयि । सर्वं तद्धारयिष्यामि स ते सेतुर्भविष्यति ॥
Verse 43
इत्युक्त्वान्तरहिते तस्मिन् रामो नलमुवाच ह । कुरु सेतु समुद्रे त्वं शक्तो हसि मतो मम,ऐसा कहकर समुद्र अन्तर्धान हो गया। तत्पश्चात् श्रीयीमने उठकर नलसे कहा--“तुम समुद्रपर एक पुल तैयार करो। मैं जानता हूँ, तुममें यह कार्य करनेकी शक्ति है”
इत्युक्त्वान्तरहिते तस्मिन् रामो नलमुवाच ह । कुरु सेतुं समुद्रे त्वं शक्तोऽसि मतो मम ॥
Verse 44
तेनोपायेन काकुत्स्थ: सेतुबन्धमकारयत् । दशयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम्,उसी उपायसे रघुनाथजीने समुद्रपर सौ योजन लंबा और दस योजन चौड़ा पुल तैयार कराया
तेनोपायेन काकुत्स्थः सेतुबन्धमकारयत् । दशयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम् ॥
Verse 45
नलसेतुरिति ख्यातो योडद्यापि प्रथितो भुवि | रामस्थाज्ञां पुरस्कृत्य निर्यातो गिरिसंनिभ:,वह आज भी भूमण्डलमें “नलसेतु” के नामसे विख्यात है। श्रीरामजीकी आज्ञा मानकर समुद्रने उस पर्वताकार पुलको अपने ऊपर धारण किया
नलसेतुरिति ख्यातो योऽद्यापि प्रथितो भुवि । रामस्याज्ञां पुरस्कृत्य समुद्रोऽपि गिरिसंनिभं सेतुं स्वोपरि दधार ॥
Verse 46
तत्रस्थं स तु धर्मात्मा समागच्छद् विभीषण: । भ्राता वै राक्षसेन्द्रस्य चतुर्भि: सचिवै: सह,श्रीरामचन्द्रजी अभी समुद्रके किनारे ही थे कि राक्षसराज रावणके भाई धर्मात्मा विभीषण अपने चार मन्सत्रियोंक साथ उनसे मिलनेके लिये आये
तत्रस्थं तु तदा रामं समागच्छद् विभीषणः । राक्षसेन्द्रस्य भ्राता स धर्मात्मा चतुर्भिः सचिवैः सह ॥
Verse 47
7 जन ] ४! । (/9,|।। #//7+7) ९३४४ ।। प्रतिजग्राह समस्तं स्वागतेन महामना: । सुग्रीवस्य तु शड्काभूत् प्रणिधि: स्यादिति सम ह,महामना श्रीरामने स्वागतपूर्वक उन्हें अपनाया। उस समय सुग्रीवके मनमें यह शंका हुई कि “कहीं यह शत्रुका कोई गुप्तचर न हो”
प्रतिजग्राह तान् सर्वान् स्वागतेन महामनाः । सुग्रीवस्य तु शङ्का अभूत् प्रणिधिः स्यादिति शत्रोः ॥
Verse 48
राघव: सत्यचेष्टाभि: सम्यक् च चरितेज्डितै: । यदा तत्त्वेन तुष्टो$भूत् तत एनमपूजयत्,परंतु श्रीरामचन्द्रजीने उनकी सत्य चेष्टाओं, उत्तम आचरणों और मुख-नेत्र आदिके संकेतोंसे सूचित होनेवाले मनोभावोंकी सम्यक् समीक्षा करके जब अच्छी तरह संतोष प्राप्त कर लिया, तब विभीषणका बहुत आदर किया
राघवः सत्यचेष्टाभिः सम्यक् चरितचेष्टितैः । यदा तत्त्वेन तुष्टोऽभूत् तत एनमपूजयत् ॥
Verse 49
सर्वराक्षसराज्ये चाप्यभ्यषिज्चद् विभीषणम् । चक्रे च मन्त्रसचिवं सुहृदं लक्ष्मणस्थ च
सर्वराक्षसराज्ये चाप्यभ्यषिञ्चद् विभीषणम् । चक्रे च मन्त्रसचिवं सुहृदं लक्ष्मणं तदा ॥
Verse 50
विभीषणमते चैव सोउत्यक्रामन्महार्णवम् । ससैन्य: सेतुना तेन मासेनैव नराधिप,नरेश्वरर विभीषणकी सलाहसे श्रीरामचन्द्रजीने उसी सेतुद्वारा एक ही महीनेमें सेनासहित महासागरको पार कर लिया
विभीषणमते चैव सोऽत्यक्रामन्महार्णवम् । ससैन्यः सेतुना तेन मासेनैव नराधिप ॥
Verse 51
ततो गत्वा समासाद्य लड़कोद्यानान्यनेकश: । भेदयामास कपिभिर्महान्ति च बहूनि च,तत्पश्चात् उन्होंने लंकाकी सीमामें पहुँचकर वानरोंद्वारा वहाँके बहुत-से बड़े-बड़े उद्यानोंको छिन्न-भिन्न करा दिया
ततो गत्वा समासाद्य लङ्कोद्यानान्यनेकशः । भेदयामास कपिभिर्महान्ति च बहूनि च ॥
Verse 52
ततस्तौ रावणामात्यौ मन्त्रिणौ शुकसारणौ । चरौ वानररूपेण तौ जग्राह विभीषण:,उस सेनामें वानरोंका रूप घारण करके रावणके दो मन्त्री शुक और सारण गुप्तचरका काम करनेके लिये घुस आये थे। विभीषणने उन दोनोंको पहचानकर कैद कर लिया
ततस्तौ रावणामात्यौ मन्त्रिणौ शुकसारणौ । चरौ वानररूपेण तौ जग्राह विभीषणः ॥
Verse 53
प्रतिपन्नौ यदा रूप॑ राक्षसं तौ निशाचरौ । दर्शयित्वा तत: सैन्यं राम: पश्चादवासृजत्
प्रतिपन्नौ यदा रूपं राक्षसं तौ निशाचरौ । दर्शयित्वा ततः सैन्यं रामः पश्चादवासृजत् ॥
Verse 54
जब वे दोनों निशाचर अपने राक्षसरूपमें प्रकट हुए, तब श्रीरामने उन्हें अपनी सेनाका दर्शन कराकर छोड़ दिया ।। निवेश्योपवने सैन्यं तत् पुर: प्राज्ञवानरम् । प्रेषयामास दौत्येन रावणस्य ततो$5ज्भदम्,लंकापुरीके उपवनमें वानरसेनाको ठहराकर श्रीरघुनाथजीने बुद्धिमान् वानर अंगदको दूतके रूपमें रावणके यहाँ भेजा
निवेश्योपवने सैन्यं तत्पुरः प्राज्ञवानरम् । प्रेषयामास दौत्येन रावणस्य ततोऽङ्गदम् ॥
Verse 59
साथ ही उन्हें समस्त राक्षसोंके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और लक्ष्मणका सुहृद् तथा अपना सलाहकार बना लिया
ततः स तान् समस्तराक्षसराज्येऽभिषिच्य, लक्ष्मणं च स्वसुहृदं स्वमन्त्रिणं च कृतवान्।
Verse 283
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि सेतुबन्धने त्रयशीत्यधिकद्धिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ााभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें सेतुबन्धविषयक दो सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्याने सेतुबन्धनविषये त्रयशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः समाप्तः।
Whether the pursuit of enduring fame justifies self-harm or avoidable loss of life; Sūrya argues that fame sought through prāṇa-virodha is self-defeating and ethically unsound.
Reputation is ethically meaningful when aligned with the preservation of life and the capacity to fulfill duties; prudence and self-protection can be dharmic when they sustain one’s responsibilities.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-level emphasis is practical: dharma is evaluated through lived consequence—only the living can enact duty and meaningfully receive the fruits of fame.