Adhyaya 50
Adi ParvaAdhyaya 5054 Verses

Adhyaya 50

Āstīka-stuti at Janamejaya’s Sacrifice (आस्तीकस्तुतिः / यज्ञप्रशंसा)

Upa-parva: Āstīka-parva (Serpent-Sacrifice Episode)

This chapter presents Āstīka’s formal address within Janamejaya’s sacrificial assembly. He compares the king’s yajña to paradigmatic sacrifices associated with deities (Soma, Varuṇa, Prajāpati, Śakra/Indra, Yama) and exemplary royal patrons (e.g., Rantideva, Gaya, Śaśabindu, Nṛga, and others), repeatedly concluding with an auspicious refrain wishing well-being to the king and his dear ones. The rhetoric then shifts from comparative praise to institutional validation: Āstīka asserts the unmatched status of the officiants, especially Dvaipāyana (Vyāsa), and notes the competence and wide presence of his disciples. The chapter further sacralizes the rite by describing Agni (Hutabhuj) as splendid and properly receiving the oblations. Finally, the praise is redirected to Janamejaya’s qualities as protector and householder of the sacrifice, likening his guardianship and radiance to exemplary figures. The Sūta concludes that the king, priests, and fire are pleased; observing their favorable dispositions, King Janamejaya then speaks—marking a narrative hinge toward the next procedural step.

Chapter Arc: श्रृंगी—महातेजस्वी, तिग्मवीर्य और अतिकोपी—अपने आचार्य के आश्रम से आज्ञा लेकर लौटता है; उधर कुरुवंश के राजा परीक्षित् के भाग्य पर अदृश्य सर्प-छाया घिरने लगती है। → शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी द्वारा दिए गए शाप का वृत्तान्त फैलता है; राजा की रक्षा हेतु कश्यप वैद्य-ब्राह्मण ‘सद्यः अपज्वर’ करने और सर्प-विष को निष्फल करने निकलता है, पर मार्ग में तक्षक उसे लोभ देकर रोकने का षड्यन्त्र रचता है। → तक्षक कश्यप को धन-लोभ में फँसाकर लौटा देता है—और छल से परीक्षित् को डँसकर मृत्यु देता है; धर्म-रक्षा का अवसर हाथ से निकल जाता है और राजवंश पर शोक का वज्रपात होता है। → पिता की मृत्यु का वृत्तान्त सुनकर जनमेजय प्रतिकार का संकल्प करता है: तक्षक का ‘महानतिक्रम’—ब्राह्मण को द्रव्य देकर राजा को न बचाने देना—राजधर्म और लोकधर्म दोनों पर आघात है; वह उत्तंक को प्रिय करने और पितृ-अपचित्ति हेतु आगे बढ़ता है। → जनमेजय का प्रतिशोध किस रूप में फूटेगा—और तक्षक के विरुद्ध कौन-सा यज्ञ-प्रचण्ड विधान उठेगा?

Shlokas

Verse 1

नऔहा-<> ड-ऑ का पज्चाशत्तमो<्ध्याय: शृंगी ऋषिका परीक्षित्‌को शाप, तक्षकका काश्यपको लौटाकर छलसे परीक्षित्‌को डँसना और पिताकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर जनमेजयकी तक्षकसे बदला लेनेकी प्रतिज्ञा मन्त्रिण ऊचु. ततः स राजा राजेन्द्र स्कन्धे तस्य भुजड़मम्‌ | मुने: क्षुतक्षाम आसज्य स्वपुरं पुनराययौ,मन्त्री बोले--राजेन्द्र! उस समय राजा परीक्षित्‌ भूखसे पीड़ित हो शमीक मुनिके कंधेपर मृतक सर्प डालकर पुनः अपनी राजधानीमें लौट आये

जनमेजय उवाच— ततः स राजा राजेन्द्र क्षुत्क्षामः स मुनेः स्कन्धे मृतं सर्पं समासज्य स्वपुरं पुनराययौ। मन्त्रिण ऊचुः— राजेन्द्र! तदा राजा परीक्षित् क्षुधापीडितः शमीकस्य मुनेः स्कन्धे मृतसर्पं निधाय पुनः स्वराजधानीं जगाम।

Verse 2

था |] ऋषेस्तस्य तु पुत्रो5भूद्‌ गवि जातो महायशा: । शृज्जी नाम महातेजास्तिग्मवीर्योडतिकोपन:,उन महर्षिके शृंगी नामक एक महातेजस्वी पुत्र था, जिसका जन्म गायके पेटसे हुआ वह महान्‌ यशस्वी, तीव्र शक्तिशाली और अत्यन्त क्रोधी था

ऋषेस्तस्य तु पुत्रोऽभूद् गवि जातो महायशाः। शृङ्गी नाम महातेजास्तिग्मवीर्योऽतिकोपनः॥

Verse 3

ब्रह्माणं समुपागम्य मुनि: पूजां चकार ह | सोअ&नुज्ञातस्ततस्तत्र शृद्धी शुश्राव तं तदा,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान्‌ शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्‌ने उनका तिरस्कार किया

ब्रह्माणं समुपागम्य मुनिः पूजां चकार ह। सोऽनुज्ञातस्ततस्तत्र शृङ्गी शुश्राव तं तदा॥ यथा ते पित्रा पितरं धर्षितं पुरा।

Verse 4

सख्यु: सकाशात्‌ पितरं पित्रा ते धर्षितं पुरा । मृतं सर्प समासक्तं स्थाणुभूतस्य तस्य तम्‌,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान्‌ शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्‌ने उनका तिरस्कार किया

सख्युः सकाशात् शृङ्गी शुश्राव—पितरं पित्रा ते धर्षितं पुरा; मृतं सर्पं समासक्तं स्थाणुभूतस्य तस्य च स्कन्धे, सोऽपराधं न कृतवानिति।

Verse 5

वहन्तं राजशार्दूल स्कन्धेनानपकारिणम्‌ | तपस्विनमतीवाथ त॑ मुनिप्रवरं नूप,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान्‌ शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्‌ने उनका तिरस्कार किया

जनमेजय उवाच—राजशार्दूल राजेन्द्र! स मुनिप्रवरः तपस्वी निरपराधोऽपि, स्कन्धेनानपकारिणं भूतं वहन्नेव, तव पित्रा परीक्षिताऽवमानितः; मौनसमाधौ स्थितस्य तस्य मुनिश्रेष्ठस्य स्कन्धे मृतसर्पं निक्षिप्य स तिरस्कृतवान्।

Verse 6

जितेन्द्रियं विशुद्धं च स्थितं कर्मण्यथाद्भुतम्‌ । तपसा द्योतितात्मान स्वेष्वड्रेषु यतं तदा,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान्‌ शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्‌ने उनका तिरस्कार किया

तदा स जितेन्द्रियो विशुद्धश्च कर्मणि सुस्थितोऽद्भुततेजाः; तपसा द्योतितात्मा स्वेष्वङ्गेषु यतः स्थितः।

Verse 7

शुभाचारं शुभकथं सुस्थितं तमलोलुपम्‌ । अक्षुद्रमनसूयं च वृद्ध मौनव्रते स्थितम्‌ । शरण्यं सर्वभूतानां पित्रा विनिकृतं तव,एक दिन उसने आचार्यदेवके समीप जाकर पूजा की और उनकी आज्ञा ले वह घरको लौटा। उसी समय शृंगी ऋषिने अपने एक सहपाठी मित्रके मुखसे तुम्हारे पिताद्वारा अपने पिताके तिरस्कृत होनेकी बात सुनी। राजसिंह! शृंगीको यह मालूम हुआ कि मेरे पिता काठकी भाँति चुपचाप बैठे थे और उनके कंधेपर मृतक साँप डाल दिया गया। वे अब भी उस सर्पको अपने कंधेपर रखे हुए हैं। यद्यपि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। वे मुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान्‌ शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्‌ने उनका तिरस्कार किया

शुभाचारं शुभकथं सुस्थितं तमलोलुपम्। अक्षुद्रमनसूयं च वृद्धं मौनव्रते स्थितम्॥ शरण्यं सर्वभूतानां पित्रा विनिकृतं तव।

Verse 8

शशापाथ महातेजा: पितरं ते रुषान्वित: । ऋषे: पुत्रो महातेजा बालोडपि स्थविरण्युति:,यह सब जानकर वह बाल्यावस्थामें भी वृद्धोंका-सा तेज धारण करनेवाला महातेजस्वी ऋषिकुमार क्रोधसे आगबबूला हो उठा और उसने तुम्हारे पिताको शाप दे दिया

स शशापाथ महातेजाः पितरं ते रुषान्वितः। ऋषेः पुत्रो महातेजा बालोऽपि स्थविरद्युतिः॥

Verse 9

स क्षिप्रमुदकं स्पृष्टवा रोषादिदमुवाच ह । पितरं तेडभिसंधाय तेजसा प्रज्वलन्निव

स क्षिप्रमुदकं स्पृष्ट्वा रोषादिदमुवाच ह। पितरं तेऽभिसन्धाय तेजसा प्रज्वलन्निव॥

Verse 10

अनागसि गुरौ यो मे मृतं सर्पमवासृजत्‌ । त॑ नागस्तक्षकः क्रुद्धस्तेजसा प्रदहिष्यति

जनमेजय उवाच— अनागसि गुरौ यो मे मृतं सर्पमवासृजत् । तं नागस्तक्षकः क्रुद्धस्तेजसा प्रदहिष्यति ॥

Verse 11

आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदित: । सप्तरात्रादित: पापं पश्य मे तपसो बलम्‌

आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदितः । सप्तरात्रादितः पापं पश्य मे तपसो बलम् ॥

Verse 12

शंंगी तेजसे प्रज्यलित-सा हो रहा था। उसने शीघ्र ही हाथमें जल लेकर तुम्हारे पिताको लक्ष्य करके रोषपूर्वक यह बात कही--'जिसने मेरे निरपराध पितापर मरा साँप डाल दिया है, उस पापीको आजसे सात रातके बाद मेरी वाक॒शक्तिसे प्रेरित प्रचण्ड तेजस्वी विषधर तक्षक नाग कुपित हो अपनी विषाग्निसे जला देगा। देखो, मेरी तपस्याका बल” || ९-- ११ || इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र पिता यत्रास्य सो5भवत्‌ | दृष्टवा च पितरं तस्मै तं शापं प्रत्यवेदयत्‌,ऐसा कहकर वह बालक उस स्थानपर गया, जहाँ उसके पिता बैठे थे। पिताको देखकर उसने राजाको शाप देनेकी बात बतायी

इत्युक्त्वा स कुमारस्तु शीघ्रं गत्वा पितुः समीपम् । दृष्ट्वा पितरमाचख्यौ शापं राज्ञि कृतं तदा ॥ सप्तमेऽहनि तक्षको नागः क्रुद्धो विषानलैः । मद्वाक्यबलचोदितो राजानं प्रदहिष्यति ॥

Verse 13

स चापि मुनिशार्दूल: प्रेषषामास ते पितु: । शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं गुणान्वितम्‌,तब मुनिश्रेष्ठ शमीकने तुम्हारे पिताके पास अपने शिष्य गौरमुखको भेजा, जो सुशील और गुणवान्‌ था। उसने विश्राम कर लेनेपर राजासे सब बातें बतायीं और महर्षिका संदेश इस प्रकार सुनाया--“'भूपाल! मेरे पुत्रने तुम्हें शाप दे दिया है; अतः सावधान हो जाओ

स चापि मुनिशार्दूलः प्रेषयामास ते पितुः । शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं गुणान्वितम् ॥

Verse 14

आचख्यौ स च विश्रान्तो राज्ञ: सर्वमशेषत: । शप्तोडसि मम पुत्रेण यत्तो भव महीपते,तब मुनिश्रेष्ठ शमीकने तुम्हारे पिताके पास अपने शिष्य गौरमुखको भेजा, जो सुशील और गुणवान्‌ था। उसने विश्राम कर लेनेपर राजासे सब बातें बतायीं और महर्षिका संदेश इस प्रकार सुनाया--“'भूपाल! मेरे पुत्रने तुम्हें शाप दे दिया है; अतः सावधान हो जाओ

आचख्यौ स च विश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः । शप्तोऽसि मम पुत्रेण यत्तो भव महीपते ॥

Verse 15

तक्षकस्त्वां महाराज तेजसासौ दहिष्यति । श्रुत्वा च तद्‌ वचो घोरं पिता ते जनमेजय,“महाराज! (सात दिनके बाद) तक्षक नाग तुम्हें अपने तेजसे जला देगा।” जनमेजय! यह भयंकर बात सुनकर तुम्हारे पिता नागश्रेष्ठ तक्षकसे अत्यन्त भयभीत हो सतत सावधान रहने लगे। तदनन्तर जब सातवाँ दिन उपस्थित हुआ, तब उस दिन ब्रह्मर्षि काश्यपने राजाके समीप जानेका विचार किया। मार्गमें नागराज तक्षकने उस समय काश्यपको देखा

“महाराज! तक्षकः स्वतेजसा त्वां दहिष्यति।” इति तद् घोरं वचनं श्रुत्वा तव पिता—जनमेजय—नागश्रेष्ठात् तक्षकात् अत्यन्तं बिभ्यन् नित्यं सावधानोऽभवत्। अथ सप्तमेऽहनि समुपस्थिते ब्रह्मर्षिः काश्यपो राजसमीपं गन्तुम् अचिन्तयत्; मार्गे तस्मिन् काले नागराजस्तक्षकः काश्यपं ददर्श।

Verse 16

यत्तो5भवत्‌ परित्रस्तस्तक्षकात्‌ पन्नगोत्तमात्‌ | ततस्तस्मिंस्तु दिवसे सप्तमे समुपस्थिते,“महाराज! (सात दिनके बाद) तक्षक नाग तुम्हें अपने तेजसे जला देगा।” जनमेजय! यह भयंकर बात सुनकर तुम्हारे पिता नागश्रेष्ठ तक्षकसे अत्यन्त भयभीत हो सतत सावधान रहने लगे। तदनन्तर जब सातवाँ दिन उपस्थित हुआ, तब उस दिन ब्रह्मर्षि काश्यपने राजाके समीप जानेका विचार किया। मार्गमें नागराज तक्षकने उस समय काश्यपको देखा

जनमेजय उवाच—यतः स पन्नगोत्तमात् तक्षकात् परित्रस्तः, ततः प्रभृति स नित्यं रक्षितचित्तः सावधानश्चाभवत्। अथ सप्तमेऽहनि समुपस्थिते—यस्यां तक्षकस्य तेजसा दाहो मृत्युकाल इति पूर्वं व्याहृतम्—तदा नियतिं प्रति घटनाः प्रववृते।

Verse 17

राज्ञ: समीप ब्रद्यर्षि: काश्यपो गन्तुमैच्छत । त॑ ददर्शाथ नागेन्द्रस्तक्षक: काश्यपं तदा,“महाराज! (सात दिनके बाद) तक्षक नाग तुम्हें अपने तेजसे जला देगा।” जनमेजय! यह भयंकर बात सुनकर तुम्हारे पिता नागश्रेष्ठ तक्षकसे अत्यन्त भयभीत हो सतत सावधान रहने लगे। तदनन्तर जब सातवाँ दिन उपस्थित हुआ, तब उस दिन ब्रह्मर्षि काश्यपने राजाके समीप जानेका विचार किया। मार्गमें नागराज तक्षकने उस समय काश्यपको देखा

जनमेजय उवाच—ब्रह्मर्षिः काश्यपो राज्ञः समीपं गन्तुम् ऐच्छत्। अथ तदा नागेन्द्रस्तक्षकः पथि काश्यपं ददर्श। (एतस्मिन्नन्तरे पारिक्षितो राजा घोरां भविष्यवाणीं श्रुत्वा नित्यं सावधानोऽभवत्; सप्तमेऽहनि काश्यपः तं रक्षार्थं प्रस्थितः, तक्षकश्च तं मध्ये निरुद्धवान्।)

Verse 18

तमब्रवीत्‌ पन्नगेन्द्र: काश्यपं त्वरितं द्विजम्‌ । क्व भवांस्त्वरितो याति कि च कार्य चिकीर्षति १८ ।। विप्रवर काश्यप बड़ी उतावलीसे पैर बढ़ा रहे थे। उन्हें देखकर नागराजने (ब्राह्मणका वेष धारण करके) इस प्रकार पूछा--'द्विजश्रेष्ठ आप कहाँ इतनी तीव्र गतिसे जा रहे हैं और कौन-सा कार्य करना चाहते हैं?”

तमब्रवीत् पन्नगेन्द्रः काश्यपं त्वरितं द्विजम्—“क्व भवान् त्वरितो याति? किं च कार्यं चिकीर्षति?”

Verse 19

काश्यप उवाच यत्र राजा कुरुश्रेष्ठ: परिक्षिन्नाम वै द्विज । तक्षकेण भुजड़्ेन धक्ष्यते किल सोउद्य वै,काश्यपने कहा--ब्रह्मन! मैं वहाँ जाता हूँ जहाँ कुरुकुलके श्रेष्ठ राजा परीक्षित्‌ रहते हैं। सुना है कि आज ही तक्षक नाग उन्हें डँसेगा। अतः मैं तत्काल ही उन्हें नीरोग करनेके लिये जल्दी-जल्दी वहाँ जा रहा हूँ। मेरे द्वारा सुरक्षित नरेशको वह सर्प नष्ट नहीं कर सकेगा

काश्यप उवाच—“यत्र राजा कुरुश्रेष्ठः परीक्षित् नाम वै द्विज, तक्षकेण भुजङ्गेन दंश्यते किल सोऽद्य वै। तस्मादहं त्वरितो गच्छामि तं निरामयं कर्तुम्; मया रक्षितं नृपतिं स सर्पो न विनाशयितुं शक्ष्यति।”

Verse 20

गच्छाम्यहं तं त्वरित: सद्य: कर्तुमपज्वरम्‌ । मयाभिपन्नं तं चापि न सर्पो धर्षयिष्यति,काश्यपने कहा--ब्रह्मन! मैं वहाँ जाता हूँ जहाँ कुरुकुलके श्रेष्ठ राजा परीक्षित्‌ रहते हैं। सुना है कि आज ही तक्षक नाग उन्हें डँसेगा। अतः मैं तत्काल ही उन्हें नीरोग करनेके लिये जल्दी-जल्दी वहाँ जा रहा हूँ। मेरे द्वारा सुरक्षित नरेशको वह सर्प नष्ट नहीं कर सकेगा

काश्यप उवाच—अहं तं त्वरितः सद्यः गत्वा विषज्वरात् तत्क्षणमेव मोचयिष्यामि। मयाभिपन्नं च तं नृपं कश्चन सर्पो न धर्षयिष्यति।

Verse 21

तक्षक उवाच किमर्थ तं मया दष्टं संजीवयितुमिच्छसि । अहं स तक्षको ब्रह्मन्‌ पश्य मे वीर्यमद्भुतम्‌,तक्षकने कहा--ब्रह्मन! मेरे डँसे हुए मनुष्यको जिलानेकी इच्छा आप कैसे रखते हैं। मैं ही वह तक्षक हूँ। मेरी अद्भुत शक्ति देखिये। मेरे डँस लेनेपर उस राजाको आप जीवित नहीं कर सकते। ऐसा कहकर तक्षकने एक वृक्षको डँस लिया

तक्षक उवाच—किमर्थं त्वं मया दष्टं नरं संजीवयितुमिच्छसि? अहं स तक्षको ब्रह्मन्; पश्य मे वीर्यमद्भुतम्।

Verse 22

न शक्तस्त्वं मया दष्ट॑ त॑ं संजीवयितुं नृपम्‌ । इत्युक्त्वा तक्षकस्तत्र सोडदशद्‌ वै वनस्पतिम्‌,तक्षकने कहा--ब्रह्मन! मेरे डँसे हुए मनुष्यको जिलानेकी इच्छा आप कैसे रखते हैं। मैं ही वह तक्षक हूँ। मेरी अद्भुत शक्ति देखिये। मेरे डँस लेनेपर उस राजाको आप जीवित नहीं कर सकते। ऐसा कहकर तक्षकने एक वृक्षको डँस लिया

न शक्तस्त्वं मया दष्टं तं संजीवयितुं नृपम्। इत्युक्त्वा तक्षकस्तत्र सोऽदशद् वै वनस्पतिम्।

Verse 23

स दष्टमात्रो नागेन भस्मी भूतो 5 भवन्नग: । काश्यपश्च ततो राजन्नजीवयत त॑ नगम्‌,नागके डँसते ही वह वृक्ष जलकर भस्म हो गया। राजन! तदनन्तर काश्यपने (अपनी मन्त्र-विद्याके बलसे) उस वृक्षको पूर्ववत्‌ जीवित (हरा-भरा) कर दिया

स दष्टमात्रो नागेन भस्मीभूतोऽभवन्नगः। काश्यपश्च ततो राजन्नजीवयत तं नगम्।

Verse 24

ततस्तं लोभयामास काम ब्रूहीति तक्षक: । स एवमुक्तस्तं प्राह काश्यपस्तक्षकं पुन:,अब तक्षक काश्यपको प्रलोभन देने लगा। उसने कहा--'तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो।” तक्षकके ऐसा कहनेपर काश्यपने उससे कहा--'मैं तो वहाँ धनकी इच्छासे जा रहा हूँ! उनके ऐसा कहनेपर तक्षकने महात्मा काश्यपसे मधुर वाणीमें कहा --

ततः तं लोभयामास तक्षकः—कामं ब्रूहीति। स एवमुक्तः काश्यपस्तं तक्षकं पुनरुवाच।

Verse 25

धनलिप्सुरहं तत्र यामीत्युक्तश्व तेन सः । तमुवाच महात्मानं तक्षक: श्लक्षणया गिरा,अब तक्षक काश्यपको प्रलोभन देने लगा। उसने कहा--'तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो।” तक्षकके ऐसा कहनेपर काश्यपने उससे कहा--'मैं तो वहाँ धनकी इच्छासे जा रहा हूँ! उनके ऐसा कहनेपर तक्षकने महात्मा काश्यपसे मधुर वाणीमें कहा --

धनलिप्सुरहं तत्र यामीत्युक्तश्च तेन सः । तमुवाच महात्मानं तक्षकः श्लक्ष्णया गिरा ॥

Verse 26

यावद्धनं प्रार्थयसे राज्ञस्तस्मात्‌ ततो5धिकम्‌ । गृहाण मत्त एव त्वं संनिवर्तस्व चानघ,“अनघ! तुम राजासे जितना धन पाना चाहते हो, उससे भी अधिक मुझसे ही ले लो और लौट जाओ'

यावद्धनं प्रार्थयसे राज्ञस्तस्मात् ततोऽधिकम् । गृहाण मत्त एव त्वं संनिवर्तस्व चानघ ॥

Verse 27

स एवमुक्तो नागेन काश्यपो द्विपदां वर: | लब्ध्वा वित्त निववृते तक्षकाद्‌ यावदीप्सितम्‌,तक्षक नागकी यह बात सुनकर मनुष्योंमें श्रेष्ठ काश्यप उससे इच्छानुसार धन लेकर लौट गये

स एवमुक्तो नागेन काश्यपो द्विपदां वरः । लब्ध्वा वित्तं निववृते तक्षकाद् यावदीप्सितम् ॥

Verse 28

तस्मिन्‌ प्रतिगते विप्रे छद्मनोपेत्य तक्षक: । त॑ नृपं नृपतिश्रेष्ठ पितरं धार्मिक तव,ब्राह्मणके चले जानेपर तक्षकने छलसे भूपालोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे धर्मात्मा पिता राजा परीक्षितके पास पहुँचकर, यद्यपि वे महलमें सावधानीके साथ रहते थे, तो भी उन्हें अपनी विषाग्निसे भस्म कर दिया। नरश्रेष्ठ] तदनन्तर विजयकी प्राप्तिके लिये तुम्हारा राजाके पदपर अभिषेक किया गया

तस्मिन् प्रतिगते विप्रे छद्मनोपेत्य तक्षकः । तं नृपं नृपतिश्रेष्ठं पितरं धार्मिकं तव ॥

Verse 29

प्रासादस्थं यत्तमपि दग्धवान्‌ विषवद्लिना । ततस्त्वं पुरुषव्याप्र विजयायाभिषेचित:,ब्राह्मणके चले जानेपर तक्षकने छलसे भूपालोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे धर्मात्मा पिता राजा परीक्षितके पास पहुँचकर, यद्यपि वे महलमें सावधानीके साथ रहते थे, तो भी उन्हें अपनी विषाग्निसे भस्म कर दिया। नरश्रेष्ठ] तदनन्तर विजयकी प्राप्तिके लिये तुम्हारा राजाके पदपर अभिषेक किया गया

प्रासादस्थं यत्तमपि दग्धवान् विषवदग्निना । ततस्त्वं पुरुषव्याघ्र विजयायाभिषेचितः ॥

Verse 30

एतद्‌ दृष्ट श्रुतं चापि यथावन्नपसत्तम । अस्माभिननिखिलं सर्व कथितं तेडतिदारुणम्‌,नृपश्रेष्ठ! यद्यपि यह प्रसंग बड़ा ही निछ्ठर और दुःखदायक है, तथापि तुम्हारे पूछनेसे हमने सब बातें तुमसे कही हैं। यह सब कुछ हमने अपनी आँखों देखा और कानोंसे भी ठीक-ठीक सुना है

एतद्दृष्टं श्रुतं चापि यथावन्नपसत्तम । अस्माभिर्निखिलं सर्वं कथितं तेऽतिदारुणम् ॥ नृपश्रेष्ठ! यद्यपि एष प्रसङ्गोऽतिनिष्ठुरो दुःखदायकश्च, तथापि तव पृष्टत्वाद् वयं सर्वमशेषतः कथितवन्तः—यदस्माभिः स्वचक्षुषा दृष्टं यच्च सम्यक् श्रुतम् ।

Verse 31

श्र॒ुत्वा चैनं नरश्रेष्ठ पार्थिवस्थ पराभवम्‌ | अस्य चर्षेरुतंकस्य विधत्स्व यदनन्तरम्‌,महाराज! इस प्रकार तक्षकने तुम्हारे पिता राजा परीक्षित्‌का तिरस्कार किया है। इन महर्षि उत्तंकको भी उसने बहुत तंग किया है। यह सब तुमने सुन लिया, अब तुम जैसा उचित समझो, करो

श्रुत्वा चैनं नरश्रेष्ठ पार्थिवस्य पराभवम् । अस्य चर्षेरुतङ्कस्य विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ महाराज! तक्षकः पितरं ते राजा परीक्षितं भुवि स्थितं पराभूतवान्; महर्षिमुतङ्कं च बहु क्लेशयामास। एतत् सर्वं श्रुतं त्वया; इदानीं यदनन्तरं धर्म्यं मन्यसे तत् कुरु।

Verse 32

सौतिरु्वाच एतस्मिन्नेव काले तु स राजा जनमेजय: । उवाच मन्त्रिण: सर्वानिदं वाक्यमरिन्दम:,उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनक! उस समय शत्रुओंका दमन करनेवाले राजा जनमेजय अपने सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले

सौतिरुवाच—एतस्मिन्नेव काले तु स राजा जनमेजयः । उवाच मन्त्रिणः सर्वानिदं वाक्यमरिन्दमः ॥ शौनक! तस्मिन्काले शत्रुदमनः राजा जनमेजयः स्वान् सर्वान् मन्त्रिणोऽभ्यभाषत—इदं वचनम्।

Verse 33

जनमेजय उवाच अथ तत्‌ कथितं केन यद्‌ वृत्तं तद्‌ वनस्पतौ | आश्चर्यभूतं लोकस्य भस्मराशीकृतं तदा,जनमेजयने कहा--उस वृक्षके डँसे जाने और फिर हरे होनेकी बात आपलोगोंसे किसने कही? उस समय तक्षकके काटनेसे जो वृक्ष राखका ढेर बन गया था, उसे काश्यपने पुनः जिलाकर हरा-भरा कर दिया। यह सब लोगोंके लिये बड़े आश्वर्यकी बात है। यदि काश्यपके आ जानेसे उनके मन्त्रोंद्वारा तक्षकका विष नष्ट कर दिया जाता तो निश्चय ही मेरे पिताजी बच जाते

जनमेजय उवाच—अथ तत्कथितं केन यद्वृत्तं तद्वनस्पतौ । आश्चर्यभूतं लोकस्य भस्मराशीकृतं तदा ॥ तक्षकदष्टो यः स वृक्षो भस्मराशिरभूत्, तं काश्यपः पुनर्जीवयामास हरितं चकार—लोकस्य महदाश्चर्यम्। यदि काश्यप आगच्छेत् मन्त्रैस्तक्षकाशिवं विषं नाशयेत्, नूनं मे पिता न विनश्येत्।

Verse 34

यद्‌ वृक्षं जीवयामास काश्यपस्तक्षकेण वै | नूनं मन्त्रहतविषो न प्रणश्येत काश्यपात्‌,जनमेजयने कहा--उस वृक्षके डँसे जाने और फिर हरे होनेकी बात आपलोगोंसे किसने कही? उस समय तक्षकके काटनेसे जो वृक्ष राखका ढेर बन गया था, उसे काश्यपने पुनः जिलाकर हरा-भरा कर दिया। यह सब लोगोंके लिये बड़े आश्वर्यकी बात है। यदि काश्यपके आ जानेसे उनके मन्त्रोंद्वारा तक्षकका विष नष्ट कर दिया जाता तो निश्चय ही मेरे पिताजी बच जाते

जनमेजय उवाच—यद्वृक्षं जीवयामास काश्यपस्तक्षकेण वै । नूनं मन्त्रहतविषो न प्रणश्येत काश्यपात् ॥ तक्षकदष्टो यः स वृक्षो भस्मराशिरभूत्; काश्यपेन पुनर्जीवितः स हरितोऽभवत्—लोकस्य महदाश्चर्यम्। यदि काश्यपः समागच्छेत् मन्त्रैर्विषं नाशयेत्, नूनं मे पिता न विनश्येत्।

Verse 35

चिन्तयामास पापात्मा मनसा पन्नगाधम: । दष्टं यदि मया विप्र: पार्थिवं जीवयिष्यति,परंतु उस पापात्मा नीच सर्पने अपने मनमें यह सोचा होगा--“यदि मेरे डँसे हुए राजाको ब्राह्मण जिला देंगे तो लोग कहेंगे कि तक्षकका विष भी नष्ट हो गया। इस प्रकार तक्षक लोकमें उपहासका पात्र बन जायगा।” अवश्य ही ऐसा सोचकर उसने ब्राह्मणको धनके द्वारा संतुष्ट किया था

जनमेजय उवाच—चिन्तयामास पापात्मा मनसा पन्नगाधमः। दष्टं यदि मया विप्रः पार्थिवं जीवयिष्यति, जनाः वदिष्यन्ति—तक्षकस्यापि विषं नष्टम्; एवं तक्षकः लोके हास्यतां यास्यति। इति मत्वा स धनैरेव द्विजं तुष्टिं निनाय, धर्मादपि यशः-मानं गुरुतरं कृत्वा॥

Verse 36

तक्षकः संहतविषो लोके यास्यति हास्यताम्‌ | विचिन्त्यैवं कृता तेन ध्रुवं तुश्टिरद्धिजस्य वै,परंतु उस पापात्मा नीच सर्पने अपने मनमें यह सोचा होगा--“यदि मेरे डँसे हुए राजाको ब्राह्मण जिला देंगे तो लोग कहेंगे कि तक्षकका विष भी नष्ट हो गया। इस प्रकार तक्षक लोकमें उपहासका पात्र बन जायगा।” अवश्य ही ऐसा सोचकर उसने ब्राह्मणको धनके द्वारा संतुष्ट किया था

जनमेजय उवाच—तक्षकः संहतविषो लोके यास्यति हास्यताम्। विचिन्त्यैवं कृता तेन ध्रुवं तुष्टिरद्विजस्य वै—धनैः॥

Verse 37

480 पक यस्य दास्यामि यातनाम्‌ | एकं तु 4 तद्‌ वृत्तं निर्जने वने,अच्छा, भविष्यमें प्रयत्नपूर्वक कोई-न-कोई उपाय करके तक्षकको इसके लिये दण्ड दूँगा। परंतु एक बात मैं सुनना चाहता हूँ। नागराज तक्षक और काश्यप ब्राह्मणका वह संवाद तो निर्जन वनमें हुआ होगा। यह सब वृत्तान्त किसने देखा और सुना था? आपलोगोंतक यह बात कैसे आयी? यह सब सुनकर मैं सर्पोके नाशका विचार करूँगा

जनमेजय उवाच—भविष्येऽहं प्रयत्नेन तक्षकं दण्डयिष्यामि। किंतु श्रोतुमिच्छाम्येकं—निर्जने वने तद्वृत्तं यत्, तक्षकस्य काश्यपस्य च संवादः; तत् कः पश्यन् श्रुतवान्? कथं वा भवत्सु समागतम्? एतच्छ्रुत्वा पन्नगनाशाय मतिं करिष्यामि॥

Verse 38

संवादं पन्नगेन्द्रस्य काश्यपस्य च कस्तदा | श्रुतवान्‌ दृष्टवांश्वापि भवत्सु कथमागतम्‌ | श्रुत्वा तस्य विधास्ये5हं पन्नगान्तकरीं मतिम्‌,अच्छा, भविष्यमें प्रयत्नपूर्वक कोई-न-कोई उपाय करके तक्षकको इसके लिये दण्ड दूँगा। परंतु एक बात मैं सुनना चाहता हूँ। नागराज तक्षक और काश्यप ब्राह्मणका वह संवाद तो निर्जन वनमें हुआ होगा। यह सब वृत्तान्त किसने देखा और सुना था? आपलोगोंतक यह बात कैसे आयी? यह सब सुनकर मैं सर्पोके नाशका विचार करूँगा

जनमेजय उवाच—संवादं पन्नगेन्द्रस्य काश्यपस्य च कस्तदा श्रुतवान् दृष्टवांश्चापि? भवत्सु कथमागतम्? श्रुत्वा तस्य विधास्येऽहं पन्नगान्तकरीं मतिम्॥

Verse 39

मन्त्रिण ऊचु. शृणु राजन्‌ यथास्माकं येन तत्‌ कथितं पुरा । समागतं द्विजेन्द्रस्य पन्नगेन्द्रस्य चाध्वनि,मन्त्री बोले--राजन्‌! सुनो, विप्रवर काश्यप और नागराज तक्षकका मार्गमें एक- दूसरेके साथ जो समागम हुआ था, उसका समाचार जिसने और जिस प्रकार हमारे सामने बताया था, उसका वर्णन करते हैं। भूपाल! उस वृक्षपर पहलेसे ही कोई मनुष्य लकड़ी लेनेके लिये सूखी डाली खोजता हुआ चढ़ गया था

मन्त्रिण ऊचुः—शृणु राजन् यथास्माकं येन तत् कथितं पुरा। समागतं द्विजेन्द्रस्य पन्नगेन्द्रस्य चाध्वनि॥

Verse 40

तस्मिन्‌ वृक्षे नर: कश्चिदिन्धनार्थाय पार्थिव । विचिन्वन्‌ पूर्वमारूढ: शुष्कशाखां वनस्पतौ,मन्त्री बोले--राजन्‌! सुनो, विप्रवर काश्यप और नागराज तक्षकका मार्गमें एक- दूसरेके साथ जो समागम हुआ था, उसका समाचार जिसने और जिस प्रकार हमारे सामने बताया था, उसका वर्णन करते हैं। भूपाल! उस वृक्षपर पहलेसे ही कोई मनुष्य लकड़ी लेनेके लिये सूखी डाली खोजता हुआ चढ़ गया था

तस्मिन् वृक्षे, पार्थिव, कश्चिन्नरः पूर्वमेवारूढः, इन्धनार्थं शुष्कशाखाः विचिन्वन् वनस्पतौ स्थितः।

Verse 41

न बुध्येतामुभौ तौ च नगस्थं पन्नगद्वधिजौ । सह तेनैव वृक्षेण भस्मी भूतो5 भवन्नूप,तक्षक नाग और ब्राह्मण--दोनों ही नहीं जानते थे कि इस वृक्षपर कोई दूसरा मनुष्य भी है। राजन्‌! तक्षकके काटनेपर उस वृक्षके साथ ही वह मनुष्य भी जलकर भस्म हो गया था

न बुध्येतामुभौ तौ च नगस्थं पन्नगद्वधिजौ। तक्षकस्य दंशनेन स नरः सह तेनैव वृक्षेण दग्धो भस्मीभूतः, नृप।

Verse 42

द्विजप्रभावादू राजेन्द्र व्यजीवत्‌ सवनस्पति: । तेनागम्य नरश्रेष्ठ पुंसास्मासु निवेदितम्‌,परंतु राजेन्द्र! ब्राह्मणके प्रभावसे वह भी उस वृक्षके साथ जी उठा। नरश्रेष्ठ! उसी मनुष्यने आकर हमलोगोंसे तक्षक और ब्राह्मणकी जो घटना थी, वह सुनायी

द्विजप्रभावाद् राजेन्द्र स वनस्पतिः पुनर्जीवितः। ततः स नरश्रेष्ठ आगत्य तक्षकस्य द्विजस्य च वृत्तान्तं पुंसामस्मासु निवेदितवान्।

Verse 43

यथावृत्त॑ तु तत्‌ सर्व तक्षकस्य द्विजस्थ च । एतत्‌ ते कथितं राजन्‌ यथा दृष्टं श्रुतं च यत्‌ श्रुत्वा च नृपशार्दूल विधत्स्व यदनन्तरम्‌,राजन! इस प्रकार हमने जो कुछ सुना और देखा है, वह सब तुम्हें कह सुनाया। भूपालशिरोमणे! यह सुनकर अब तुम्हें जैसा उचित जान पड़े, वह करो

यथावृत्तं तु तत्सर्वं तक्षकस्य द्विजस्य च। एतत्ते कथितं राजन् यथा दृष्टं श्रुतं च यत्; श्रुत्वा च नृपशार्दूल विधत्स्व यदनन्तरम्।

Verse 44

सौतिर्वाच मन्त्रिणां तु वच: श्रुव्वा स राजा जनमेजय: । पर्यतप्यत दुःखार्त: प्रत्यपिंषघत्‌ करं करे,उग्रश्रवाजी कहते हैं--मन्त्रियोंकी बात सुनकर राजा जनमेजय दुःखसे आतुर हो संतप्त हो उठे और कुपित होकर हाथसे हाथ मलने लगे

सौतिरुवाच—मन्त्रिणां तु वचः श्रुत्वा स राजा जनमेजयः। दुःखार्तः पर्यतप्यत, क्रोधसंरब्धः करेण करं प्रत्यपिंषत्।

Verse 45

निः:श्वासमुष्णमसकृद्‌ दीर्घ राजीवलोचन: । मुमोचाश्रूणि च तदा नेत्राभ्यां प्ररुदन्‌ नृप:,वे बारम्बार लम्बी और गरम साँस छोड़ने लगे। कमलके समान नेत्रोंवाले राजा जनमेजय उस समय नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए फ़ूट-फ़ूटकर रोने लगे

निःश्वासमुष्णमसकृद्दीर्घं राजीवलोचनः । मुमोचाश्रूणि च तदा नेत्राभ्यां प्ररुदन्नृपः ॥

Verse 46

उवाच च महीपालो दुःखशोकसमन्वित: । दुर्धरं वाष्पमुत्सृज्य स्पृष्टवा चापो यथाविधि,राजाने दो घड़ीतक ध्यान करके मन-ही-मन कुछ निश्चय किया, फिर दुःख-शोक और अमर्षमें डूबे हुए नरेश न थमनेवाले आँसुओंकी अविच्छिन्न धारा बहाते हुए विधिपूर्वक जलका स्पर्श करके सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले--

उवाच च महीपालो दुःखशोकसमन्वितः । दुर्धरं वाष्पमुत्सृज्य स्पृष्ट्वा चापो यथाविधि ॥

Verse 47

मुहूर्तमिव च ध्यात्वा निश्चित्य मनसा नृप: । अमर्षी मन्त्रिण: सर्वानिदं वचनमब्रवीत्‌,राजाने दो घड़ीतक ध्यान करके मन-ही-मन कुछ निश्चय किया, फिर दुःख-शोक और अमर्षमें डूबे हुए नरेश न थमनेवाले आँसुओंकी अविच्छिन्न धारा बहाते हुए विधिपूर्वक जलका स्पर्श करके सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले--

मुहूर्तमिव च ध्यात्वा निश्चित्य मनसा नृपः । अमर्षी मन्त्रिणः सर्वानिदं वचनमब्रवीत् ॥

Verse 48

जनमेजय उवाच श्रुत्वैतद्‌ भवतां वाक्यं पितुर्मे स्वर्गतिं प्रति । निश्चितेयं मम मतिर्या च तां मे निबोधत । अनन्तरं च मन्ये5हं तक्षकाय दुरात्मने,जनमेजयने कहा--मन्त्रियो! मेरे पिताके स्वर्गलोकगमनके विषयमें आपलोगोंका यह वचन सुनकर मैंने अपनी बुद्धिद्वारा जो कर्तव्य निश्चित किया है, उसे आप सुन लें। मेरा विचार है, उस दुरात्मा तक्षकसे तुरंत बदला लेना चाहिये, जिसने शृंगी ऋषिको निमित्तमात्र बनाकर स्वयं ही मेरे पिता महाराजको अपनी विषाग्निसे दग्ध करके मारा है

जनमेजय उवाच श्रुत्वैतद्भवतां वाक्यं पितुर्मे स्वर्गतिं प्रति । निश्चितेयं मम मतिर्या च तां मे निबोधत । अनन्तरं च मन्येऽहं तक्षकाय दुरात्मने ॥

Verse 49

प्रतिकर्तव्यमित्येवं येन मे हिंसित: पिता । शज्धिणं हेतुमात्रं यः कृत्वा दग्ध्वा च पार्थिवम्‌,जनमेजयने कहा--मन्त्रियो! मेरे पिताके स्वर्गलोकगमनके विषयमें आपलोगोंका यह वचन सुनकर मैंने अपनी बुद्धिद्वारा जो कर्तव्य निश्चित किया है, उसे आप सुन लें। मेरा विचार है, उस दुरात्मा तक्षकसे तुरंत बदला लेना चाहिये, जिसने शृंगी ऋषिको निमित्तमात्र बनाकर स्वयं ही मेरे पिता महाराजको अपनी विषाग्निसे दग्ध करके मारा है

प्रतिकर्तव्यमित्येवं येन मे हिंसितः पिता । शृङ्गिणं हेतुमात्रं यः कृत्वा दग्ध्वा च पार्थिवम् ॥

Verse 50

इयं दुरात्मता तस्य काश्यपं यो न्यवर्तयत्‌ । यदा55गच्छेत्‌ स वै विप्रो ननु जीवेत्‌ पिता मम,उसकी सबसे बड़ी दुष्टता यह है कि उसने काश्यपको लौटा दिया। यदि वे ब्राह्मणदेवता आ जाते तो मेरे पिता निश्चय ही जीवित हो सकते थे इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि पारिक्षिन्मन्त्रिसंवादे पज्चाशत्तमोडध्याय:

जनमेजय उवाच—एषा तस्य दुरात्मनः परमा दुरात्मता यत् स काश्यपं न्यवर्तयत्। यदि स वै विप्रः समागच्छेत्, ननु मम पिता निश्चयेन जीवेत्॥

Verse 51

परिहीयेत कि तस्य यदि जीवेत्‌ स पार्थिव: । काश्यपस्य प्रसादेन मन्त्रिणां विनयेन च,यदि मन्त्रियोंके विनय और काश्यपके कृपाप्रसादसे महाराज जीवित हो जाते तो इसमें उस दुष्टकी क्‍या हानि हो जाती?

किं तस्य परिहीयेत यदि स पार्थिवो जीवेत्? काश्यपस्य प्रसादेन मन्त्रिणां विनयेन च॥

Verse 52

स तु वारितवान्‌ मोहात्‌ काश्यपं द्विजसत्तमम्‌ | संजिजीवयिषुं प्राप्त राजानमपराजितम्‌,जो कहीं भी परास्त न होते थे, ऐसे मेरे पिता राजा परीक्षित्‌को जीवित करनेकी इच्छासे द्विजश्रेष्ठ काश्यप आ पहुँचे थे, किंतु तक्षकने मोहवश उन्हें रोक दिया

स तु मोहात् काश्यपं द्विजसत्तमम् अवारयत्। संजीवयितुम् प्राप्तं राजानमपराजितम्॥

Verse 53

महानतिक्रमो होष तक्षकस्य दुरात्मन: । द्विजस्य योडददद्‌ द्रव्यं मा नृपं जीवयेदिति,दुरात्मा तक्षकका यह सबसे बड़ा अपराध है कि उसने ब्राह्मणदेवको इसलिये धन दिया कि वे महाराजको जिला न दें

महानतिक्रमो ह्येष तक्षकस्य दुरात्मनः। द्विजस्य योऽददद् द्रव्यं मा नृपं जीवयेदिति॥

Verse 54

उत्तड़कस्य प्रियं कर्तुमात्मनश्न महत्‌ प्रियम्‌ । भवतां चैव सर्वेषां गच्छाम्यपचितिं पितु:,इसलिये मैं महर्षि उत्तंकका, अपना तथा आप सब लोगोंका अत्यन्त प्रिय करनेके लिये पिताके वैरका अवश्य बदला लूँगा

उत्तङ्कस्य प्रियं कर्तुमात्मनश्च महत् प्रियम्। भवतां चैव सर्वेषां गच्छाम्यपचितिं पितुः॥

Frequently Asked Questions

Rather than an explicit dilemma, the chapter frames an ethical pressure point: how royal power expressed through ritual should be bounded by auspicious intent, learned oversight, and public legitimacy—preparing the setting for consequential decisions.

The chapter models how speech and precedent regulate authority: praise is not merely decorative but a normative tool that aligns kingship with dharma through ritual correctness, qualified expertise, and welfare-oriented intentions.

No explicit phalaśruti is stated; the closest meta-commentary is the narrative note that all parties (king, priests, and fire) become pleased, signaling that correct ritual speech and procedure are treated as efficacious and socially stabilizing.