
द्रौपदी–सत्यभामा संवादः (Draupadī and Satyabhāmā on ethical household conduct)
Upa-parva: Draupadī–Satyabhāmā Saṃvāda (Discourse on conjugal ethics and household governance)
Vaiśaṃpāyana narrates a meeting where Draupadī and Satyabhāmā sit together in a cordial setting. Satyabhāmā privately asks Draupadī how she maintains the Pandavas’ affection and compliance, explicitly inquiring about vows, austerities, ritual baths, mantras, medicines, and other techniques. Draupadī rebukes the premise, refusing to endorse ‘asat-strī’ practices, and argues that a husband who suspects mantra-based control becomes distressed rather than peaceful. She warns of the dangers of clandestine powders and poisons and of the social harms attributed to such conduct. Draupadī then enumerates her method: abandoning ego, desire, and anger; practicing careful speech and demeanor; prioritizing service and attentiveness; observing domestic discipline (timely food, cleanliness, hospitality); honoring elders (especially Kuntī); and maintaining detailed oversight of resources, guests, and staff. She portrays household stability as achieved through tireless, transparent duty and respectful comportment. Satyabhāmā, hearing the dharma-consistent explanation, apologizes for her teasing inquiry and affirms Draupadī’s conduct.
Chapter Arc: मार्कण्डेय के वचन से कथा एक अनोखे ‘यज्ञ-विश्व’ में प्रवेश करती है—जहाँ अग्नि केवल ज्वाला नहीं, देव-स्वरूप नामों और विधानों का जीवित जाल है; भूर्-भुवः-स्वः आदि महाव्याहृतियों से ध्यान-मन्त्र का आरम्भ होता है। → अग्नियों के अनेक नाम, वंश-परम्परा और यज्ञ-प्रयोग क्रमशः खुलते हैं—‘शिव’ नामक अग्नि शक्तिपूजा में रत, ‘शम्भु’ और ‘आवसथ्य’ जैसे गृह्य-अग्नि-स्वरूप, दर्श-पौर्णमास, आग्रयण आदि कर्मों में किस अग्नि को हवि मिले—यह सूक्ष्म विधान कथा को गहन बनाता है; साथ ही चेतावनी आती है कि गृहस्थ अग्नियों का दावानल से संसर्ग हो जाए तो प्रायश्चित्त-इष्टि आवश्यक है। → विधि का शिखर उस क्षण पर आता है जब प्रायश्चित्त और ‘स्विष्टकृत्’ की परम भूमिका प्रतिपादित होती है—यज्ञ की त्रुटि को ‘स्विष्ट’ बनाकर पूर्ण करने वाला अग्नि-तत्त्व ही रक्षक है; ‘विश्वपति’ नामक अग्नि को वेदों में ‘सम्पूर्ण जगत् का पति’ कहे जाने का उल्लेख इस अध्याय का दार्शनिक उत्कर्ष बनता है। → अग्नि-नामों, उनके कर्म-क्षेत्र और शुद्धि-विधानों का संहिताबद्ध निष्कर्ष देकर मार्कण्डेय आंगिरसोपाख्यान के इस खण्ड को पूर्ण करते हैं—यज्ञ की शुद्धि, नाम-स्मरण और नियत हवि-समर्पण से लोक-व्यवस्था टिकती है। → आंगिरसोपाख्यान की अगली कड़ी में अग्नि-परम्परा/विधान का विस्तार आगे बढ़ने का संकेत रहता है।
Verse 1
हि >> मय न [हुक आज अप > भू:, भुवः, स्वः, महः, जनः--ये पाँच महाव्याहतियाँ हैं। ध्यानके लिये मन्त्रप्रयोग इस प्रकार है--'* भूरजन्नमग्नये पृथिव्यै स्वाहा इत्यादि। एकविशर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: अग्निस्वरूप तप और भानु (मनु)-की संततिका वर्णन मार्कण्डेय उवाच गुरुभिरनियमैर्युक्तो भरतो नाम पावक: । अग्नि: पुष्टिमतिर्नाम तुष्ट: पुष्टिं प्रयच्छति । भरत्येष प्रजा: सर्वास्ततो भरत उच्यते,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युथिष्ठिर! पूर्वोक्त भरत नामक अग्नि (जो शंयुके पौत्र और ऊर्जके पुत्र हैं) गुरुतर नियमोंसे युक्त हैं। वे संतुष्ट होनेपर पुष्टि प्रदान करते हैं, इसलिये उनका एक नाम 'पुष्टिमति” भी है। समस्त प्रजाका भरण-पोषण करते हैं, इसलिये उन्हें भरत कहते हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ— ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ‘ଭରତ’ ନାମରେ ଏକ ପାବକ ଅଗ୍ନି ଅଛନ୍ତି, ଯିଏ ଗୁରୁତର ନିୟମ ଓ କଠୋର ଆଚାର-ବ୍ରତରେ ଯୁକ୍ତ। ସେ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ ପୁଷ୍ଟି ଓ ସମୃଦ୍ଧି ଦାନ କରନ୍ତି; ତେଣୁ ତାଙ୍କର ଆଉ ଏକ ନାମ ‘ପୁଷ୍ଟିମତି’। ସେ ସମସ୍ତ ପ୍ରଜାଙ୍କୁ ଧାରଣ କରି ପୋଷଣ କରନ୍ତି; ଏହି କାରଣରୁ ତାଙ୍କୁ ‘ଭରତ’ କୁହାଯାଏ।
Verse 2
अग्निर्यश्न शिवो नाम शक्तिपूजापरश्न सः | दुःखार्तानां च सर्वेषां शिवकृत् सततं शिव:,'शिव” नामसे प्रसिद्ध जो अग्नि हैं, वे शक्तिकी आराधनामें लगे रहते हैं। समस्त दुःखातुर मनुष्योंका सदा ही शिव (कल्याण) करते हैं, इसलिये उन्हें 'शिव” कहते हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ— ଯେ ଅଗ୍ନି ‘ଶିବ’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ, ସେ ସଦା ଶକ୍ତି-ପୂଜାରେ ପରାୟଣ। ସେ ଦୁଃଖାର୍ତ ସମସ୍ତଙ୍କର ନିରନ୍ତର କଲ୍ୟାଣ କରନ୍ତି; ତେଣୁ ତାଙ୍କୁ ‘ଶିବ’—କଲ୍ୟାଣକର—କୁହାଯାଏ।
Verse 3
तपसस्तु फल दृष्टवा सम्प्रवृद्धं तपो महत् | उद्धर्तुकामो मतिमान् पुत्रो जज्ञे पुरंदर:,तप (पाञ्चजन्य)-का तपस्याजनित फल (ऐश्वर्य) बढ़कर महान् हो गया है, यह देख उसे प्राप्त करनेकी इच्छासे मानो बुद्धिमान् इन्द्र ही पुरंदर नामसे उनके पुत्र होकर प्रकट हुए
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ— ତପସ୍ୟାର ଫଳ ଅତ୍ୟଧିକ ବୃଦ୍ଧି ପାଇ ମହାନ୍ ହୋଇଛି ବୋଲି ଦେଖି, ତାହାକୁ ହରଣ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ବୁଦ୍ଧିମାନ୍ ପୁରନ୍ଦର (ଇନ୍ଦ୍ର) ସେମାନଙ୍କ ପୁତ୍ରରୂପେ ଜନ୍ମ ନେଲେ ଏବଂ ‘ପୁରନ୍ଦର’ ନାମରେ ପ୍ରକଟ ହେଲେ।
Verse 4
* ऊष्मा चैवोष्मणो जज्ञे सोडग्निधूतस्य लक्ष्यते अग्निश्चापि मनुर्नाम प्राजापत्यमकारयत्,उन्हीं पांचजन्यसे “ऊष्मा” नामक अग्निका प्रादुर्भाव हुआ। जो समस्त प्राणियोंके शरीरमें ऊष्मा (गर्मी)-के द्वारा परिलक्षित होते हैं तथा तपके जो “मनु” नामक अग्निस्वरूप पुत्र हैं, उन्होंने 'प्राजापत्य” यज्ञ सम्पन्न कराया था
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ— ସେହି ଉଷ୍ମରୁ ‘ଉଷ୍ମା’ ନାମକ ଅଗ୍ନି ଜନ୍ମ ନେଲା; ଯାହା ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ଶରୀରରେ ଉଷ୍ଣତାରୂପେ ଲକ୍ଷ୍ୟ ହୁଏ। ଏବଂ ‘ମନୁ’ ନାମକ ଅଗ୍ନି ମଧ୍ୟ ଥିଲେ—ତପୋମୟ, ଅଗ୍ନିସ୍ୱରୂପ ପୁତ୍ର—ଯିଏ ‘ପ୍ରାଜାପତ୍ୟ’ ଯଜ୍ଞ ସମ୍ପନ୍ନ କରିଥିଲେ।
Verse 5
शम्भुमग्निमथ प्राहुब्राह्मिणा वेदपारगा: । आवसथशथ्यं द्विजा: प्राहुर्दीप्तमरग्निं महाप्रभम्,वेदोंके पारंगत दिद्वान् ब्राह्मण “शम्भु' तथा “आवसथ्य” नामक अग्निको देदीप्यमान तथा महान् तेज: पुछ्जसे सम्पन्न बताते हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ— ବେଦପାରଙ୍ଗତ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ‘ଶମ୍ଭୁ’ ନାମକ ପାବକଙ୍କ କଥା କହନ୍ତି। ଏବଂ ଦ୍ୱିଜମାନେ ‘ଆବସଥ୍ୟ’ ନାମକ ଅନ୍ୟ ଅଗ୍ନିକୁ ମଧ୍ୟ—ଦୀପ୍ତିମାନ୍ ଓ ମହାପ୍ରଭାସମ୍ପନ୍ନ—ବୋଲି କହନ୍ତି।
Verse 6
ऊर्जस्करान् हव्यवाहान् सुवर्णसदृशप्रभान् । ततस्तपो हाजनयत् पज्च यज्ञसुतानिह,इस प्रकार जिन्हें यज्ञमें सोमकी आहुति दी जाती है, ऐसे पाँच पुत्रोंको तपने पैदा किया। वे सब-के-सब सुवर्ण-सदृश कान्तिमान, बल और तेजकी प्राप्ति करानेवाले तथा देवताओंके लिये हविष्य पहुँचानेवाले हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ— ତାପରେ ସେହି ତପସ୍ୟା ଏଠାରେ ଯଜ୍ଞର ପାଞ୍ଚ ପୁତ୍ରଙ୍କୁ ଜନ୍ମ ଦେଲା—ଯେମାନେ ବଳ ଓ ତେଜ ଦେଇଥାନ୍ତି, ଦେବତାମାନଙ୍କ ପାଇଁ ହବ୍ୟ ବହନ କରନ୍ତି, ଏବଂ ସୁବର୍ଣ୍ଣସଦୃଶ ପ୍ରଭାରେ ଦୀପ୍ତ।
Verse 7
प्रशान्तेअग्निर्महाभाग परिश्रान्तो गवां पति: । असुरान् जनयन् घोरानू् मर्त्याश्चवैव पृथग्विधान्,महाभाग! अस्तकालमें परिश्रमसे थके-माँदे सूर्यदेव (अग्निमें प्रविष्ट होनेके कारण) अग्निस्वरूप हो जाते हैं।* भयंकर असुरों तथा नाना प्रकारके मरणधर्मा मनुष्योंको उत्पन्न करते हैं। (उन्हें भी तपकी ही संततिके अन्तर्गत माना गया है)
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ— ମହାଭାଗ! ଗବାଂ ପତି (ସୂର୍ଯ୍ୟ) ପରିଶ୍ରମରେ କ୍ଲାନ୍ତ ହୋଇ ଶାନ୍ତ ହେଲେ ସେ ଅଗ୍ନିରୂପ ହୁଏ। ସେଠାରୁ ସେ ଭୟଙ୍କର ଅସୁରମାନଙ୍କୁ ଓ ନାନାପ୍ରକାର ମର୍ତ୍ୟ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଜନ୍ମ ଦେଉଛି।
Verse 8
तपसश्च मनु पुत्र भानुं चाप्यड्रिरा: सृजत् । बृहद्धानु तु त॑ प्राहुब्राह्मिणा वेदपारगा:,तपके मनु (प्रजापति) स्वरूप पुत्र भानु नामक अग्निको अंगिराने भी (अपना प्रभाव अर्पित करके) नूतन जीवन प्रदान किया है। वेदोंके पारगामी विद्वान ब्राह्मण भानुको ही “बृहद्धानु' कहते हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ହେ ମନୁପୁତ୍ର! ତପସ୍ୟାର ପ୍ରଭାବରେ ଅଙ୍ଗିରା ଭାନୁ ନାମକ ଅଗ୍ନିଙ୍କୁ ସୃଷ୍ଟି କରି, ତାଙ୍କୁ ନୂତନ ତେଜ ଦାନ କଲେ। ବେଦପାରଗ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ସେହି ଭାନୁଙ୍କୁ ‘ବୃହଦ୍ଧାନୁ’ ବୋଲି କହନ୍ତି।
Verse 9
भानोर्भार्या सुप्रजा तु बृहद्धासा तु सूर्यजा । असूजेतां तु षट् पुत्रान् शृणू तासां प्रजाविधिम्,भानुकी दो पत्नियाँ हुईं--सुप्रजा और बृहद्धासा। इनमें बृहद्धासा सूर्यकी कन्या थी। इन दोनोंने छः पुत्रोंको जन्म दिया। इनके द्वारा जो संतानोंकी सृष्टि हुई, उसका वर्णन सुनो
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଭାନୁଙ୍କର ଦୁଇ ଭାର୍ଯ୍ୟା ଥିଲେ—ସୁପ୍ରଜା ଓ ବୃହଦ୍ଧାସା; ଏବଂ ବୃହଦ୍ଧାସା ସୂର୍ଯ୍ୟଙ୍କ କନ୍ୟା ଥିଲେ। ସେଇ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ଠାରୁ ଛଅ ପୁତ୍ର ଜନ୍ମିଲେ। ଏବେ ତାଙ୍କର ସନ୍ତାନ-ସୃଷ୍ଟିର ବିଧି ଶୁଣ।
Verse 10
दुर्बलानां तु भूतानामसून् यः सम्प्रयच्छति । तमनग्निं बलदं प्राहुः प्रथमं भानुतः सुतम्,जो दुर्बल प्राणियोंको प्राण एवं बल प्रदान करते हैं, उन्हें 'बलद' नामक अग्नि बताया जाता है। ये भानुके प्रथम पुत्र हैं
ଯେ ଅଗ୍ନି ଦୁର୍ବଳ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କୁ ପ୍ରାଣ ଓ ବଳ ଦାନ କରନ୍ତି, ସେଇ ଅଗ୍ନି ‘ବଳଦ’ ନାମେ ପରିଚିତ। ସେ ଭାନୁଙ୍କ ପ୍ରଥମ ପୁତ୍ର।
Verse 11
यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति दारुण: । अग्नि: स मन्युमान्नाम द्वितीयो भानुत: सुत:,जो शान्त प्राणियोंमें भयंकर “क्रोध” बनकर प्रकट होते हैं, वे 'मन्युमान्” नामक अग्नि भानुके द्वितीय पुत्र हैं
ଯେ ଅଗ୍ନି ଶାନ୍ତ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ଦାରୁଣ କ୍ରୋଧ ରୂପେ ଉଦ୍ଭବ ହୁଏ, ସେ ‘ମନ୍ୟୁମାନ୍’ ନାମକ ଅଗ୍ନି। ସେ ଭାନୁଙ୍କ ଦ୍ୱିତୀୟ ପୁତ୍ର।
Verse 12
दर्शे च पौर्णमासे च यस्येह हविरुच्यते । विष्णु्नामेह यो<ग्निस्तु धृतिमान्नाम सोडज्लिरा:,यहाँ जिनके लिये दर्श तथा पौर्णमास यागोंमें हविष्य-समर्पणका विधान पाया जाता है, उन अग्निका नाम “विष्णु” है। वे “अंगिरा” गोत्रीय माने गये हैं। उन्हींका दूसरा नाम “धृतिमान' अग्नि है (ये भानुके तीसरे पुत्र हैं)
ଏହି ଲୋକରେ ଦର୍ଶ ଓ ପୌର୍ଣ୍ଣମାସ ଯାଗରେ ଯାହାଙ୍କ ପାଇଁ ହବି ଅର୍ପଣର ବିଧାନ ଅଛି, ସେଇ ପବିତ୍ର ଅଗ୍ନି ‘ବିଷ୍ଣୁ’ ନାମେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ। ସେ ଅଙ୍ଗିରା-ଗୋତ୍ରୀୟ ବୋଲି ଗଣ୍ୟ, ଏବଂ ‘ଧୃତିମାନ୍’ ନାମରେ ମଧ୍ୟ ପରିଚିତ।
Verse 13
३ इन्द्रेण सहितं यस्य हविराग्रयणं स्मृतम् । अग्निराग्रयणो नाम भानोरेवान्वयस्तु सः
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଯାହାଙ୍କ ପ୍ରଥମ ହବିରାଗ୍ରୟଣ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସହିତ ସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇଥିଲା ବୋଲି ସ୍ମରଣ କରାଯାଏ, ସେ ‘ଅଗ୍ନି-ଆଗ୍ରୟଣ’ ନାମରେ ପରିଚିତ; ଏବଂ ତାଙ୍କର ବଂଶଧାରା ନିଶ୍ଚୟ ଭାନୁ (ସୂର୍ଯ୍ୟ) ଠାରୁ ହିଁ।
Verse 14
इन्द्रसहित जिनके लिये आग्रयण (नूतन अद्नद्वारा सम्पन्न होनेवाले यज्ञ) कर्ममें हविष्य- अर्पणका विधान है, वे “आग्रयण' नामक अग्नि भानुके ही (चौथे) पुत्र हैं ।। चातुर्मास्येषु नित्यानां हविषां योनिरग्रह: । चतुर्भि: सहित: पुत्रैर्भानोरेवान्वय: स्तुभ:,चातुर्मास्य यज्ञोंमें नित्य विहित आग्नेय आदि आठ हविष्योंके जो उद्धवस्थान हैं, उनका नाम “अग्रह' है। (वे ही वैश्वदेव पर्वमें प्रधान विश्वदेव नामक अग्नि हैं--से भानुके पाँचवें पुत्र हैं) 'स्तुभ” नामक अग्नि भी भानुके ही पुत्र हैं। पहले कहे हुए चार पुत्रोंके साथ जो ये अग्रह (वैश्वदेव) और स्तुभ हैं, इन्हें मिलाकर भानुके छ: पुत्र हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଚାତୁର୍ମାସ୍ୟ ଯଜ୍ଞମାନଙ୍କରେ ନିତ୍ୟବିହିତ ହବିଷ୍ୟମାନଙ୍କର ଯେ ଉଦ୍ଭବସ୍ଥାନ, ତାହା ‘ଅଗ୍ରହ’ ନାମରେ ପରିଚିତ। ‘ସ୍ତୁଭ’ ମଧ୍ୟ ଭାନୁଙ୍କ ହିଁ ବଂଶଧାରାର; ଭାନୁଙ୍କ ପୂର୍ବୋକ୍ତ ଚାରି ପୁତ୍ରଙ୍କ ସହ ଅଗ୍ରହ ଓ ସ୍ତୁଭକୁ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ସନ୍ତାନ ଭାବେ ଗଣାଯାଏ।
Verse 15
निशा त्वजनयत् कन्यामग्नीषोमाबुभौ तथा । मनोरेवाभवद् भार्या सुषुवे पडच पावकान्,मनु (भानु)-की ही एक तीसरी पत्नी थी, जिसका नाम था निशा। उसने एक कन्या और दो पुत्रों-को जन्म दिया। (कन्याका नाम “रोहिणी” तथा) पुत्रोंके नाम थे--अग्नि और सोम, इनके सिवा, निशाने पाँच अग्निस्वरूप पुत्र और भी उत्पन्न किये। (जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार हैं--वैश्वानर, विश्वपति, सब्निहित, कपिल और अग्रणी)
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ନିଶା ଏକ କନ୍ୟାକୁ ଜନ୍ମ ଦେଲେ; ଏବଂ ସେହିପରି ଦୁଇ ପୁତ୍ରକୁ—ଅଗ୍ନି ଓ ସୋମକୁ। ସେ ମନୁଙ୍କ ଭାର୍ଯ୍ୟା ହେଲେ ଏବଂ ଅଗ୍ନିସ୍ୱଭାବୀ ପାଞ୍ଚ ପୁତ୍ରକୁ ମଧ୍ୟ ଜନ୍ମ ଦେଲେ।
Verse 16
पूज्यते हविषाग्रयेण चातुर्मास्येषु पावक: । पर्जन्यसहित: श्रीमाननिनेर्वेश्वानरस्तु सः,चातुर्मास्य यज्ञोंमें प्रधान हविष्यद्वारा पर्जन्यसहित जिनकी पूजा की जाती है, वे कान्तिमान् वैश्वानर नामक अग्नि (मनुके प्रथम पुत्र) हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଚାତୁର୍ମାସ୍ୟ ଯଜ୍ଞମାନଙ୍କରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ହବିଷ୍ୟ ଦ୍ୱାରା ପାବକଙ୍କ ପୂଜା ହୁଏ। ପର୍ଜନ୍ୟଙ୍କ ସହିତ ପୂଜିତ ସେଇ ଶ୍ରୀମାନ୍ ବୈଶ୍ୱାନର ଅନିନିଙ୍କ ପୁତ୍ର।
Verse 17
अस्य लोकस्य सर्वस्य य: प्रभु: परिपठ्यते । सोअन्निर्विश्वपतिर्नाम द्वितीयो वै मनो: सुत:
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଏହି ସମସ୍ତ ଲୋକର ପ୍ରଭୁ ବୋଲି ଯାହାଙ୍କୁ ପାଠରେ ଉଚ୍ଚାରଣ କରାଯାଏ, ସେ ‘ଅନିର୍ବିଶ୍ୱପତି’ ନାମରେ ପରିଚିତ; ଏବଂ ସେ ମନୁଙ୍କ ଦ୍ୱିତୀୟ ପୁତ୍ର।
Verse 18
कन्या सा रोहिणी नाम हिरण्यकशिपो: सुता
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ସେଇ କନ୍ୟାର ନାମ ରୋହିଣୀ; ସେ ହିରଣ୍ୟକଶିପୁଙ୍କ କନ୍ୟା ଥିଲା।
Verse 19
कर्मणासौ बभौ भार्या स वह्नि: स प्रजापति: । मनुकी कन्या भी *स्विष्टकृत” ही मानी गयी है। उसका नाम रोहिणी है; वह मनुकी कुमारी पुत्री किसी अशुभ कर्मके कारण हिरण्यकशिपुकी पत्नी हुई थी। वास्तवमें “मनु” ही वह्नि है और वे ही 'प्रजापति' कहे गये हैं ।। १८ $ ।। प्राणानाश्रित्य यो देहं प्रवर्तयति देहिनाम् । तस्य संनिहितो नाम शब्दरूपस्य साधन:,जो देहधारियोंके प्राणोंका आश्रय लेकर उनके शरीरको कार्यमें प्रवृत्त करते हैं, उनका नाम है, 'संनिहित” अग्नि। ये मनुके तीसरे पुत्र हैं। इनके द्वारा शब्द तथा रूपको ग्रहण करनेमें सहायता मिलती है
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଯେ ଦିବ୍ୟ ତତ୍ତ୍ୱ ପ୍ରାଣଙ୍କୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଦେହଧାରୀମାନଙ୍କ ଦେହକୁ କାର୍ଯ୍ୟରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ କରେ, ତାହାର ନାମ ‘ସଂନିହିତ’ (ଅନ୍ତର୍ବର୍ତ୍ତୀ) ଅଗ୍ନି। ଶବ୍ଦ ଓ ରୂପର ଗ୍ରହଣ ଏବଂ ପ୍ରବର୍ତ୍ତନର ସାଧନ ସେଇ।
Verse 20
शुक्लकृष्णगतिर्देवो यो बिभर्ति हुताशनम् । अकल्मष: कल्मषाणां कर्ता क्रोधाश्रितस्तु सः,जो दीप्तिमान् महापुरुष, शुक्ल और कृष्ण गतिके आधार हैं, जो अग्निका धारण- पोषण करते हैं, जिनमें किसी प्रकारका कल्मष अर्थात् विकार नहीं है तथापि जो समस्त विकारस्वरूप जगतके कर्ता हैं, यति लोग जिनको सदा महर्षि कपिलके नामसे कहा करते हैं, जो सांख्ययोगके प्रवर्तक हैं वे क्रोधस्वरूप अग्निके आश्रय कपिल नामक अनिन हैं। (ये मनुके चौथे पुत्र हैं)
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଯେ ଦେବ ଶୁକ୍ଲ ଓ କୃଷ୍ଣ—ଉଭୟ ଗତିର ଆଧାର, ଯେ ହୁତାଶନ ଅଗ୍ନିକୁ ଧାରଣ-ପୋଷଣ କରେ, ଯେ ନିଜେ ନିର୍ମଳ ହୋଇ ମଧ୍ୟ କଲ୍ମଷମୟ ଜଗତର କର୍ତ୍ତା ହୁଏ—ସେ କ୍ରୋଧରେ ଆଶ୍ରିତ ଅଗ୍ନିସ୍ୱରୂପ। ତପସ୍ବୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସେ ‘କପିଲ’ ନାମେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ, ସାଂଖ୍ୟ ଓ ଯୋଗର ପ୍ରବର୍ତ୍ତକ।
Verse 21
कपिलं परमर्षि च यं प्राहुर्यतय: सदा । अग्नि: स कपिलो नाम सांख्ययोगप्रवर्तक:,जो दीप्तिमान् महापुरुष, शुक्ल और कृष्ण गतिके आधार हैं, जो अग्निका धारण- पोषण करते हैं, जिनमें किसी प्रकारका कल्मष अर्थात् विकार नहीं है तथापि जो समस्त विकारस्वरूप जगतके कर्ता हैं, यति लोग जिनको सदा महर्षि कपिलके नामसे कहा करते हैं, जो सांख्ययोगके प्रवर्तक हैं वे क्रोधस्वरूप अग्निके आश्रय कपिल नामक अनिन हैं। (ये मनुके चौथे पुत्र हैं)
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଯତିମାନେ ଯାହାଙ୍କୁ ସଦା ପରମର୍ଷି ‘କପିଲ’ ବୋଲି କହନ୍ତି, ସେ ‘କପିଲ’ ନାମରେ ସ୍ୱୟଂ ଅଗ୍ନି—ସାଂଖ୍ୟ ଓ ଯୋଗର ପ୍ରବର୍ତ୍ତକ। ସେ ନିର୍ମଳ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ବିବିଧ ବିକାରମୟ ଜଗତର ପ୍ରକାଶର ହେତୁ ହୁଅନ୍ତି; ତେଣୁ ମୁନିମାନେ ତାଙ୍କୁ ଜ୍ଞାନ ଓ ସଂଯମର ଅଗ୍ନିମୂଳ ଆଧାର ଭାବେ ପୂଜନ୍ତି।
Verse 22
अग्र॑ यच्छन्ति भूतानां येन भूतानि नित्यदा । कर्मस्विह विचित्रेषु सो5ग्रणीर्वद्विरुच्यते,मनुष्य आदि समस्त भूत-प्राणी सर्वदा भाँति-भाँतिके कर्मोमें जिनके द्वारा सब भूतोंके लिये अन्नका अग्रभाग अर्पण करते हैं वे अग्रणी नामक अग्नि (मनुके पाँचवें पुत्र) कहलाते हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଏଠାରେ ବିବିଧ କର୍ମରେ ସମସ୍ତ ଭୂତଙ୍କ ହିତାର୍ଥେ ନିତ୍ୟ ଅନ୍ନର ଅଗ୍ରଭାଗ ଅର୍ପିତ ହୁଏ, ଯାହାଦ୍ୱାରା ପ୍ରାଣୀମାନେ ପୋଷିତ ହୁଅନ୍ତି—ସେ ‘ଅଗ୍ରଣୀ’ (ନେତା) ନାମେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ।
Verse 23
इमानन्यान् समसृजत् पावकान् प्रथितान् भुवि । अन्निहोत्रस्य दुष्टस्य प्रायश्षित्तार्थमुल्वणान्,मनुने अग्निहोत्र कर्ममें की हुई त्रुटिके प्रायश्चित्त [समाधान)-के लिये इन लोकविख्यात तेजस्वी अग्नियोंकी सृष्टि की, जो पूर्वोक्त अग्नियोंसे भिन्न हैं
ଅଗ୍ନିହୋତ୍ରକର୍ମରେ ହୋଇଥିବା ଦୋଷର ପ୍ରାୟଶ୍ଚିତ୍ତ ସାଧନାର୍ଥେ, ମନୁ ପୂର୍ବୋକ୍ତ ଅଗ୍ନିମାନଙ୍କଠାରୁ ଭିନ୍ନ, ଭୂମିରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ତେଜସ୍ବୀ ପାବକମାନଙ୍କୁ ସୃଷ୍ଟି କଲେ।
Verse 24
संस्पृशेयुर्यदान्योन्यं कथज्चिद् वायुनाग्नय: । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै शुचये5ग्नये,यदि किसी प्रकार हवाके चलनेसे अग्नियोंका परस्पर स्पर्श हो जाय तो अष्टाकपाल (आठ कपालोंमें- संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए) पुरोडाशके द्वारा शुचि नामक अग्निके लिये इष्टि करनी (आहुति देनी) चाहिये
ଯଦି କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ବାୟୁର ଗତିରେ ଅଗ୍ନିମାନେ ପରସ୍ପର ସ୍ପର୍ଶ କରିଦିଅନ୍ତି, ତେବେ ଅଷ୍ଟାକପାଳ ପୁରୋଡାଶ ଦ୍ୱାରା ‘ଶୁଚି’ ନାମକ ଅଗ୍ନି ପାଇଁ ଇଷ୍ଟି (ଆହୁତି) କରିବା ଉଚିତ।
Verse 25
दक्षिणानिनिर्यदा द्वाभ्यां संसजेत तदा किल | इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै वीतयेडग्नये,जब दक्षिणाग्निका गार्हपत्य तथा हवनीय नामक दो अग्नियोंसे संसर्ग हो जाय, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए पुरोडाशद्वारा “वीति” नामक अग्निके लिये आहुति देनी चाहिये
ଯେତେବେଳେ ଦକ୍ଷିଣାଗ୍ନି ଗାର୍ହପତ୍ୟ ଓ ଆହବନୀୟ—ଏହି ଦୁଇ ଅଗ୍ନି ସହିତ ସଂସର୍ଗ କରେ, ସେତେବେଳେ ଅଷ୍ଟାକପାଳ ପୁରୋଡାଶ ଦ୍ୱାରା ‘ବୀତି’ ନାମକ ଅଗ୍ନି ପାଇଁ ଇଷ୍ଟି (ଆହୁତି) କରିବା ଉଚିତ।
Verse 26
यद्यग्नयो हि स्पृश्येयुर्निवेशस्था दवाग्निना । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या तु शुचयेडग्नये,यदि गृहस्थित अग्नियोंका दावानलसे संसर्ग हो जाय तो मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा शुचि नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये
ଯଦି ନିଜ ନିବେଶସ୍ଥାନରେ ସ୍ଥାପିତ ଗୃହାଗ୍ନିମାନେ ଦାବାଗ୍ନି ସହିତ ସ୍ପର୍ଶ କରନ୍ତି, ତେବେ ଅଷ୍ଟାକପାଳ ପାତ୍ରରେ ସଂସ୍କୃତ ଚରୁ ଦ୍ୱାରା ‘ଶୁଚି’ ନାମକ ଅଗ୍ନି ପାଇଁ ଇଷ୍ଟି (ଆହୁତି) କରିବା ଉଚିତ।
Verse 27
अग्निं रजस्वला वै स्त्री संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वसुमते5ग्नये,यदि अनि्निहोत्र सम्बन्धी अग्निको कोई रजस्वला स्त्री छू दे तो वसुमान् अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा आहुति देनी चाहिये
ଯଦି କୌଣସି ରଜସ୍ୱଳା ସ୍ତ୍ରୀ ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର-ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ଅଗ୍ନିକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରେ, ତେବେ ଅଷ୍ଟାକପାଳ ପାତ୍ରରେ ସଂସ୍କୃତ ଚରୁ ଦ୍ୱାରା ‘ବସୁମତ୍’ ନାମକ ଅଗ୍ନି ପାଇଁ ଇଷ୍ଟି (ଆହୁତି) କରିବା ଉଚିତ।
Verse 28
मृत: श्रूयेत यो जीव: परेयु: पशवो यदा । इष्टिरशकपालेन कार्या सुरभिमतेडग्नये,यदि किसी प्राणीका मृत्युसूचक विलाप आदि सुनायी दे अथवा कुक्कुर आदि पशु उस अग्निका स्पर्श कर लें, उस दशामें मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा सुरभिमान् नामक अग्निकी प्रसन्नताके लिये होम करना चाहिये
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଯଦି କୌଣସି ଜୀବର ମୃତ୍ୟୁସୂଚକ ବିଲାପ ଆଦି ଶୁଣାଯାଏ, କିମ୍ବା କୁକୁର ଆଦି ପଶୁ ସେହି ପବିତ୍ର ଅଗ୍ନିକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରନ୍ତି, ତେବେ ସେହି ଅବସ୍ଥାରେ ପ୍ରାୟଶ୍ଚିତ୍ତାର୍ଥେ ମାଟିର ଆଠ କପାଳରେ ସଂସ୍କୃତ ପୁରୋଡାଶ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରି ‘ସୁରଭିମାନ୍’ ନାମକ ଅଗ୍ନିଙ୍କ ପ୍ରସନ୍ନତା ପାଇଁ ଇଷ୍ଟି-ହୋମ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 29
आर्तों न जुहुयादनिंे त्रिरात्र॑ यस्तु ब्राह्मण: । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या स्वादुत्तराग्नये,जो ब्राह्मण किसी पीड़ासे आतुर होकर तीन राततक अनिनिहोत्र न करे, उसे मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा “उत्तरर नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଯେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଦୁଃଖରେ ଆର୍ତ୍ତ ହୋଇ ତିନି ରାତି ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅଗ୍ନିରେ ଆହୁତି ନ ଦେଉଛି, ସେ ପ୍ରାୟଶ୍ଚିତ୍ତାର୍ଥେ ମାଟିର ଆଠ କପାଳରେ ସଂସ୍କୃତ ଚରୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରି ‘ଉତ୍ତର’ ନାମକ ଅଗ୍ନିଙ୍କୁ ଇଷ୍ଟି-ଆହୁତି ଦେବା ଉଚିତ।
Verse 30
दर्श च पौर्णमासं च यस्य तिछेत् प्रतिष्ठितम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या पथिकृतेडग्नये
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ଯାହାର ଦର୍ଶ ଓ ପୌର୍ଣ୍ଣମାସ ଯାଗାନୁଷ୍ଠାନ ବିଧିମତ୍ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ, ସେ ମାଟିର ଆଠ କପାଳରେ ସଂସ୍କୃତ ହବି ପ୍ରସ୍ତୁତ କରି ‘ପଥିକୃତ୍’ ନାମକ ଅଗ୍ନିଙ୍କୁ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କରି ଇଷ୍ଟି କରିବା ଉଚିତ।
Verse 31
जिसका चालू किया हुआ दर्श और पौर्णमास याग बीचमें ही बंद हो जाय अथवा बिना आहुति किये ही रह जाय, उसे “पथिकृत” नामक अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा होम करना चाहिए ।। सूतिकाग्निर्यदा चाग्निं संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या चाग्निमतेडग्नये,जब सूतिकागृहकी अग्नि, अग्निहोत्रकी अग्निका स्पर्श कर ले, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा 'अग्निमान” नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये
ଯାହାର ଆରମ୍ଭ କରାଯାଇଥିବା ଦର୍ଶ ଓ ପୌର୍ଣ୍ଣମାସ ଯାଗ ମଧ୍ୟରେ ଛିନ୍ନ ହୋଇଯାଏ କିମ୍ବା ଆହୁତି ନ ଦେଇ ଅପୂର୍ଣ୍ଣ ରହିଯାଏ, ସେ ‘ପଥିକୃତ୍’ ନାମକ ଅଗ୍ନି ପାଇଁ ମାଟିର ଆଠ କପାଳରେ ସଂସ୍କୃତ ଚରୁ ଦ୍ୱାରା ହୋମ କରିବା ଉଚିତ। ଆଉ ଯେତେବେଳେ ସୂତିକାଗୃହର ଅଗ୍ନି ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର ଅଗ୍ନିକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରେ, ସେତେବେଳେ ମାଟିର ଆଠ କପାଳରେ ସଂସ୍କୃତ ପୁରୋଡାଶ ଦ୍ୱାରା ‘ଅଗ୍ନିମାନ୍’ ନାମକ ଅଗ୍ନି ପାଇଁ ଇଷ୍ଟି-ହୋମ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 173
ततः स्विष्ट॑ भवेदाज्यं स्विष्टकृत् परमस्तु सः । जो वेदोंमें सम्पूर्ण जगत॒के पति” कहे गये हैं, वे विश्वपति नामक अग्नि मनुके द्वितीय पुत्र हैं। उन्हींके प्रभावसे हविष्यकी सुन्दरभावसे आहुति-क्रिया सम्पन्न होती है; अतः वे परम स्विष्टकृत् (उत्तम अभीष्टकी पूर्ति करनेवाले) कहे जाते हैं
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—ତାପରେ ଘୃତ ସତ୍ୟରେ ‘ସ୍ୱିଷ୍ଟ’ ହୁଏ; କାରଣ ସେଇ ପରମ ସ୍ୱିଷ୍ଟକୃତ୍—ଯାହାଙ୍କ ପ୍ରଭାବରେ ହବିର ଆହୁତି-କ୍ରିୟା ଶୋଭନ ଓ ବିଧିମତ୍ ଭାବେ ସମ୍ପନ୍ନ ହୁଏ। ତେଣୁ ସେ ଇଷ୍ଟ ଯଜ୍ଞ ଓ ତାହାର ଫଳର ସର୍ବୋଚ୍ଚ ସିଦ୍ଧିକର୍ତ୍ତା ବୋଲି ପ୍ରଶଂସିତ।
Verse 220
इस प्रकार श्रीमह्या भारत वनपवकि अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्मानविषयक दो सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ମାର୍କଣ୍ଡେୟ-ସମାସ୍ୟପର୍ବରେ ଆଙ୍ଗିରସୋପାଖ୍ୟାନବିଷୟକ ଦୁଇଶେ କୋଡ଼ିଏତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। ଏହି ସମାପ୍ତି-ବାକ୍ୟ ଉପଦେଶ ଓ କଥାର ଏକ ଖଣ୍ଡର ପୂର୍ଣ୍ଣତା ସୂଚାଏ ଏବଂ ଏମାତ୍ର ବର୍ଣ୍ଣିତ ଘଟଣାର ଧର୍ମିକ-ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ଅର୍ଥ ଉପରେ ଚିନ୍ତନ ପାଇଁ ବିରାମ ଦିଏ।
Verse 221
इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आंगिरसोपाख्याने एकविंशत्यधिकद्वधिशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ମାର୍କଣ୍ଡେୟ କହିଲେ—“ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ମାର୍କଣ୍ଡେୟ-ସମାସ୍ୟପର୍ବରେ ‘ଆଙ୍ଗିରସୋପାଖ୍ୟାନ’ ନାମକ ଦୁଇଶେ ଏକୋଇଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।” ଅର୍ଥାତ୍ ଏହି ସମାପ୍ତି-ବାକ୍ୟ ଅଧ୍ୟାୟର ଔପଚାରିକ ଶେଷ ଘୋଷଣା କରେ ଏବଂ ଶ୍ରୋତାକୁ ଏହାର ନୀତି-ଧର୍ମାର୍ଥ ମନେ ଧାରଣ କରିବାକୁ ଆହ୍ୱାନ କରେ।
The dilemma concerns whether relational influence should be sought through covert techniques (mantras, medicines, coercive stratagems) or through ethically transparent conduct; Draupadī treats the former as corrosive to trust and peace within intimate life.
Sustainable concord arises from self-governance and service: controlling anger and desire, speaking carefully, honoring elders, maintaining hospitality and cleanliness, and managing resources responsibly—thereby making trust, not fear, the basis of stability.
No formal phalaśruti is stated; the closure functions as ethical validation through Satyabhāmā’s acknowledgment and apology, marking the discourse as dharma-consistent and socially commendable rather than ritually reward-framed.