
Udyoga-parva Adhyāya 34 — Vidura’s Counsel on Deliberation, Speech-Discipline, and Dharmic Kingship
Upa-parva: Vidura-nīti (Counsel of Vidura) — Dhṛtarāṣṭra–Vidura Saṃvāda
Dhṛtarāṣṭra opens with an anxious request: he is “burning while awake” and asks Vidura—skilled in dharma and artha—to prescribe what should be done for the Kurus and for Ajātaśatru (Yudhiṣṭhira). Vidura frames counsel as benevolent truth-telling that prevents defeat, then develops a layered nīti manual. Key instructions include: avoid projects built on false premises or lacking proper means; do not act by impulse but by analyzing downstream consequences (anubandha) and ripening outcomes (vipāka). Governance requires measurement in revenue, territory, punishment, and public welfare; arrogance after attaining power destroys prosperity. Vidura uses analogies (fish and hook; unripe vs ripe fruit; bee collecting honey without harming flowers) to teach sustainable acquisition and non-destructive policy. He stresses self-control: the body as chariot, senses as horses, and the need to master internal enemies (kāma, krodha, etc.) before external rivals. He warns about harmful speech—verbal wounds that do not heal—and praises restraint and courteous language. The chapter culminates in explicit political counsel: Dhṛtarāṣṭra should accept Yudhiṣṭhira as a qualified ruler; opposition to the Pāṇḍavas reflects distorted judgment and invites decline.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, विदुर के वचनों से तृप्त न होकर फिर आग्रह करता है—“महाबुद्धे! धर्म और अर्थ से युक्त बातें पुनः कहो; इन्हें सुनकर भी मेरी तृष्णा नहीं मिटती।” → विदुर धृतराष्ट्र को निष्पक्षता का कठोर उपदेश देता है—कौरव और पाण्डव दोनों पुत्रों के प्रति समान आर्जव रखो; इसी से इस लोक में कीर्ति और परलोक में स्वर्ग मिलेगा। फिर वह एक दृष्टान्त की ओर ले जाता है—विरोचन और सुधन्वा का प्रह्लाद के पास विवाद, जो सत्य-धर्म की कसौटी बनेगा। → विरोचन-सुधन्वा का ‘प्राणों की बाज़ी’ वाला विवाद प्रह्लाद के सामने पहुँचता है; विरोचन कहता है कि वह असत्य नहीं बोलेगा और तत्त्व-निर्णय पिता से पूछता है—यहाँ सत्य, न्याय और पुत्र-हित के बीच प्रह्लाद की परीक्षा चरम पर आती है। → दृष्टान्त के सहारे विदुर धृतराष्ट्र को नीति-सूत्रों में बाँधता है: दुष्ट-लक्षणों (अगारदाही, गरद, मित्रध्रुक्, पारदारिक आदि) से सावधान रहो; समय रहते कल्याणकारी कर्म करो; बुद्धि-प्रधान कर्म श्रेष्ठ हैं। अंततः वह धृतराष्ट्र को चेताता है कि दुर्योधन-शकुनि-दुःशासन-कर्ण पर राज्य-भार रखकर समृद्धि नहीं मिल सकती, जबकि पाण्डव देवगणों-से समर्थ होकर भी तुम्हें पिता-वत् मानते हैं—तुम उन्हें पुत्र-वत् मानो। → धृतराष्ट्र के सामने निर्णायक मोड़ खड़ा है—क्या वह विदुर की निष्पक्ष नीति अपनाकर पाण्डवों से मेल करेगा, या दुर्योधन-पक्षपात में फँसकर विनाश की ओर बढ़ेगा?
Verse 1
ऑपन-मा_ज बक। डे पजञ्चत्रिशो<ड्ध्याय: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन््वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश ध्ृतराष्टर उवाच ब्रूहि भूयो महाबुद्धे धर्मार्थसहितं वच: । शृण्वतो नास्ति मे तृप्तिविचित्राणीह भाषसे
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ହେ ମହାବୁଦ୍ଧିମାନ! ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥ ସହିତ ଯୁକ୍ତ ବଚନ ପୁନଃ କହ। ଶୁଣୁଥିବା ସତ୍ତ୍ୱେ ମୋର ତୃପ୍ତି ହୁଏ ନାହିଁ; ତୁମେ ଏଠାରେ ବିଚିତ୍ର ଓ ଉପଦେଶମୟ କଥା କହୁଛ।
Verse 2
धृतराष्ट्रने कहा--महाबुद्धे! तुम पुनः धर्म और अर्थसे युक्त बातें कहो। इन्हें सुनकर मुझे तृप्ति नहीं होती। इस विषयमें तुम विलक्षण बातें कह रहे हो ।। विदुर उवाच सर्वतीर्थेषु वा स्नानं॑ सर्वभूतेषु चार्जवम् । उभे त्वेते समे स्यातामार्जवं वा विशिष्यते,विदुरजी बोले--राजन्! सब तीथर्थोमें स्नान और सब प्राणियोंके साथ कोमलताका बर्ताव--ये दोनों एक समान हैं; अथवा कोमलताके बर्तावका विशेष महत्त्व है
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ସମସ୍ତ ତୀର୍ଥରେ ସ୍ନାନ କରିବା ଓ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ପ୍ରତି ଆର୍ଜବ (ସରଳତା, ସିଧାସଳଖ ଓ କୋମଳ ଆଚରଣ) ରଖିବା—ଏ ଦୁଇଟିକୁ ସମାନ କୁହାଯାଇପାରେ; କିନ୍ତୁ ପ୍ରକୃତରେ ଆର୍ଜବର ମହତ୍ତ୍ୱ ଅଧିକ।
Verse 3
आर्ज॑वं प्रतिपद्यस्व पुत्रेषु सततं विभो । इह कीर्ति परां प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्स्यसि,विभो! आप अपने पुत्र कौरव, पाण्डव दोनोंके साथ (समानरूपसे) कोमलताका बर्ताव कीजिये। ऐसा करनेसे इस लोकमें महान् सुयश प्राप्त करके मरनेके पश्चात् लोकमें आप स्वर्गलोकमें जायँगे
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ବିଭୋ! ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ସଦା ଆର୍ଜବ (ସରଳତା ଓ ନିଷ୍ପକ୍ଷ ନ୍ୟାୟ) ଅବଲମ୍ବନ କର—କୌରବ ଓ ପାଣ୍ଡବ ଉଭୟଙ୍କୁ ସମଭାବରେ ଦେଖ। ଏପରି କଲେ ଏହି ଲୋକରେ ପରମ କୀର୍ତ୍ତି ପାଇ, ମୃତ୍ୟୁ ପରେ ସ୍ୱର୍ଗ ପ୍ରାପ୍ତ କରିବୁ।
Verse 4
यावत् कीर्तिर्मिनुष्यस्य पुण्या लोके प्रगीयते । तावत् स पुरुषव्याप्र स्वर्गलोके महीयते,पुरुषश्रेष्ठ] इस लोकमें जबतक मनुष्यकी पावन कीर्तिका गान किया जाता है, तबतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है
ବିଦୁର କହିଲେ—ଏହି ଲୋକରେ ଯେତେଦିନ ମନୁଷ୍ୟର ପବିତ୍ର କୀର୍ତ୍ତି ଗାୟନ ହୁଏ, ସେତେଦିନ ସେ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକରେ ମଧ୍ୟ ସମ୍ମାନିତ ଓ ମହିମାନ୍ୱିତ ହୁଏ।
Verse 5
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । विरोचनस्य संवाद केशिन्यर्थे सुधन््वना,इस विषयमें उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिसमें “केशिनी” के लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन है
ଏହି ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ଲୋକେ ଏକ ପୁରାତନ ଇତିହାସର ଉଦାହରଣ ଦିଅନ୍ତି—କେଶିନୀଙ୍କ କାରଣରେ ବିରୋଚନ ଓ ସୁଧନ୍ୱାଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ହୋଇଥିବା ସଂବାଦ-ବିବାଦ।
Verse 6
स्वयंवरे स्थिता कन्या केशिनी नाम नामतः । रूपेणाप्रतिमा राजन् विशिष्टपतिकाम्यया,राजन्! एक समयकी बात है, केशिनी नामवाली एक अनुपम सुन्दरी कन्या सर्वश्रेष्ठ पतिको वरण करनेकी इच्छासे स्वयंवर-सभामें उपस्थित हुई
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ଏକ ସମୟରେ କେଶିନୀ ନାମକ ଏକ କନ୍ୟା ସ୍ୱୟଂବର ସଭାରେ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲା। ରୂପରେ ସେ ଅପ୍ରତିମ; ଅତିଶ୍ରେଷ୍ଠ ପତିକୁ ବରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ଆସିଥିଲା।
Verse 7
विरोचनो<थ दैतेयस्तदा तत्राजगाम ह । प्राप्तुमिच्छंस्ततस्तत्र दैत्येन्द्रं प्राह केशिनी,उसी समय दैत्यकुमार विरोचन उसे प्राप्त करनेकी इच्छासे वहाँ आया। तब केशिनीने वहाँ दैत्यराजसे इस प्रकार बातचीत की
ତେବେ ଦୈତ୍ୟକୁମାର ବିରୋଚନ ତାକୁ ପାଇବା ଇଚ୍ଛାରେ ସେଠାକୁ ଆସିଲା। ତାପରେ କେଶିନୀ ସେଠାରେ ଦୈତ୍ୟମାନଙ୍କ ଅଧିପତିଙ୍କୁ ଏଭଳି କହିଲା।
Verse 8
केशिन्युवाच किं ब्राह्मणा: स्विच्छेयांसो दितिजा: स्विद् विरोचन । अथ केन सम पर्यड्कं सुधन््वा नाधिरोहति,केशिनी बोली--विरोचन! ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं या दैत्य? यदि ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं तो सुधन्वा ब्राह्मण ही मेरी शय्यापर क्यों न बैठे? अर्थात् मैं सुधन्वासे ही विवाह क्यों न करूँ?
କେଶିନୀ କହିଲା—ବିରୋଚନ! କହ, ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କି ଦିତିପୁତ୍ର ଦୈତ୍ୟମାନେ? ଯଦି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ତେବେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ସୁଧନ୍ୱା କାହିଁକି ତୁମ ସହ ସମାନ ଭାବେ ସେଇ ପର୍ଯ୍ୟଙ୍କରେ ଅଧିରୋହଣ କରୁନାହିଁ? ଅର୍ଥାତ୍ ମୁଁ ସୁଧନ୍ୱାକୁ ହିଁ ପତି ଭାବେ କାହିଁକି ନ ବରିବି?
Verse 9
विरोचन उवाच प्राजापत्यास्तु वै श्रेष्ठा वयं केशिनि सत्तमा: । अस्माकं खल्विमे लोका: के देवा: के द्विजातय:,विरोचनने कहा--केशिनी! हम प्रजापतिकी श्रेष्ठ संतानें हैं, अतः सबसे उत्तम हैं। यह सारा संसार हमलोगोंका ही है। हमारे सामने देवता क्या हैं? और ब्राह्मण कौन चीज हैं?
ବିରୋଚନ କହିଲା— କେଶିନୀ! ଆମେ ପ୍ରଜାପତିଙ୍କ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସନ୍ତାନ, ତେଣୁ ସର୍ବୋତ୍ତମ। ଏହି ସମସ୍ତ ଲୋକ ଆମର; ଆମ ସମ୍ମୁଖରେ ଦେବତା କିଏ? ଦ୍ୱିଜ (ବ୍ରାହ୍ମଣ) କିଏ?
Verse 10
केशिन्युवाच इहैवावां प्रतीक्षाव उपस्थाने विरोचन । सुधन्वा प्रातरागन्ता पश्येयं वां समागतौ,केशिनी बोली--विरोचन! इसी जगह हम दोनों प्रतीक्षा करें; कल प्रातः:काल सुधन्वा यहाँ आवेगा। फिर मैं तुम दोनोंको एकत्र उपस्थित देखूँगी
କେଶିନୀ କହିଲା— ବିରୋଚନ! ଏହି ମିଳନସ୍ଥାନରେ ଆମେ ଦୁଇଜଣ ଏଠିଏ ଅପେକ୍ଷା କରିବା। କାଲି ପ୍ରଭାତେ ସୁଧନ୍ୱା ଏଠାକୁ ଆସିବ; ତେବେ ମୁଁ ତୁମ ଦୁଇଜଣଙ୍କୁ ଏକାସାଥି ଉପସ୍ଥିତ ଦେଖିବି।
Verse 11
विरोचन उवाच तथा भद्रे करिष्यामि यथा त्वं भीरु भाषसे । सुधन्वानं च मां चैव प्रातर्द्रष्टासि संगतो,विरोचन बोला--कल्याणी! तुम जैसा कहती हो, वही करूँगा। भीरु! प्रातःकाल तुम मुझे और सुधन्वाको एक साथ उपस्थित देखोगी
ବିରୋଚନ କହିଲା— କଲ୍ୟାଣୀ! ହେ ଭୀରୁ, ତୁମେ ଯେପରି କହୁଛ, ସେପରି ମୁଁ କରିବି। ପ୍ରଭାତେ ତୁମେ ସୁଧନ୍ୱା ଓ ମୋତେ ଏକାସାଥି ମିଳିଥିବା ଦେଖିବ।
Verse 12
विदुर उवाच अतीतायां च शर्वर्यामुदिते सूर्यमण्डले । अथाजगाम त॑ देशं सुधन्वा राजसत्तम । विरोचनो यत्र विभो केशिन्या सहित: स्थित:,विदुरजी कहते हैं--राजाओंमें श्रेष्ठ धृतराष्ट्! इसके बाद जब रात बीती और सूर्यमण्डलका उदय हुआ, उस समय सुधन्वा उस स्थानपर आया, जहाँ विरोचन केशिनीके साथ उपस्थित था
ବିଦୁର କହିଲେ— ରାଜଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର! ରାତି ଅତୀତ ହୋଇ ସୂର୍ଯ୍ୟମଣ୍ଡଳ ଉଦିତ ହେବା ପରେ, ସୁଧନ୍ୱା ସେହି ସ୍ଥାନକୁ ଆସିଲା, ଯେଉଁଠାରେ ପ୍ରବଳ ବିରୋଚନ କେଶିନୀ ସହିତ ଅବସ୍ଥିତ ଥିଲା।
Verse 13
सुधन्वा च समागच्छत् प्राह्मदिं केशिनीं तथा । समागतं द्विजं दृष्टवा केशिनी भरतर्षभ । प्रत्युत्थायासनं तस्मै पाद्यमर्घ्य ददौ पुन:,भरतमश्रेष्ठ! सुधन्वा प्रह्मादकुमार विरोचन और केशिनीके पास आया। ब्राह्मगको आया देख केशिनी उठ खड़ी हुई और उसने उसे आसन, पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया
ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ପ୍ରାହ୍ମଦଙ୍କ ପୁତ୍ର ସୁଧନ୍ୱା ବିରୋଚନ ଓ କେଶିନୀଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସିଲା। ଆସିଥିବା ଦ୍ୱିଜ (ବ୍ରାହ୍ମଣ) କୁ ଦେଖି କେଶିନୀ ଉଠି ଦାଁଡ଼ାଇ, ତାଙ୍କୁ ଆସନ, ପାଦ୍ୟ ଓ ଅର୍ଘ୍ୟ ପୁନର୍ବାର ନିବେଦନ କଲା।
Verse 14
युधन्वोवाच अन्वालभे हिरण्मयं प्राह्मदे ते वरासनम् | एकत्वमुपसम्पन्नो न त्वासे5हं त्वया सह,सुधन्वा बोला--प्रह्लादनन्दन! मैं तुम्हारे इस सुवर्णमय सुन्दर सिंहासनको केवल छू लेता हूँ, तुम्हारे साथ इसपर बैठ नहीं सकता; क्योंकि ऐसा होनेसे हम दोनों एक समान हो जायूँगे
ଯୁଧନ୍ୱା କହିଲା—ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ତୁମର ଏହି ସୁବର୍ଣ୍ଣମୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆସନକୁ ମୁଁ କେବଳ ସ୍ପର୍ଶ କରୁଛି; ତୁମ ସହ ଏଥିରେ ବସିପାରିବି ନାହିଁ। କାରଣ ଏମିତି କଲେ ଆମେ ଦୁଇଜଣ ସମାନ ହୋଇଯିବୁ।
Verse 15
विरोचन उवाच तवा्हते तु फलकं कूर्च वाप्यथवा बृसी । सुधन्वन् न त्वमहोंडसि मया सह समासनम्,विरोचनने कहा--सुधन्वन्! तुम्हारे लिये तो पीढ़ा, चटाई या कुशका आसन उचित है; तुम मेरे साथ बराबरके आसनपर बैठनेयोग्य हो ही नहीं
ବିରୋଚନ କହିଲା—ସୁଧନ୍ୱନ୍! ତୁମ ପାଇଁ ପିଢ଼ା, ଚଟାଇ କିମ୍ବା କୁଶାସନ ଯଥୋଚିତ; ମୋ ସହ ସମାସନରେ ବସିବାକୁ ତୁମେ କେବେ ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 16
युधन्वोवाच पितापुत्रौ सहासीतां द्वौ विप्रौ क्षत्रियावपि । वृद्धौ वैश्यौ च शूद्रौ च न त्वन्यावितरेतरम्,सुधन्वाने कहा--विरोचन! पिता और पुत्र एक साथ एक आसनपर बैठ सकते हैं; दो ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वृद्ध, दो वैश्य और दो शूद्र भी एक साथ बैठ सकते हैं; किंतु दूसरे कोई दो व्यक्ति परस्पर एक साथ नहीं बैठ सकते
ସୁଧନ୍ୱା କହିଲା—ହେ ବିରୋଚନ! ପିତା ଓ ପୁତ୍ର ଏକାସନରେ ସହ ବସିପାରନ୍ତି। ଏହିପରି ଦୁଇ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ଦୁଇ କ୍ଷତ୍ରିୟ, ଦୁଇ ବୃଦ୍ଧ, ଦୁଇ ବୈଶ୍ୟ ଓ ଦୁଇ ଶୂଦ୍ର ମଧ୍ୟ ସହ ବସିପାରନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ଏହାଛଡ଼ା ଅନ୍ୟ କୌଣସି ଦୁଇଜଣ ପରସ୍ପର ସମାନ ହୋଇ ଏକାସନରେ ବସିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
Verse 17
पिता हि ते समासीनमुपासीतैव मामधथ: । बाल: सुखैधितो गेहे न त्वं किंचन बुध्यसे,तुम्हारे पिता प्रह्नाद नीचे बैठकर ही उच्चासनपर आसीन हुए मुझ सुधन्वाकी सेवा किया करते हैं। तुम अभी बालक हो, घरमें सुखसे पले हो; अतः तुम्हें इन बातोंका कुछ भी ज्ञान नहीं है
ସୁଧନ୍ୱା କହିଲା—ତୁମେ ଉପର ଆସନରେ ବସିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ତୁମ ପିତା ପ୍ରହ୍ଲାଦ ତଳେ ବସି ମୋର ସେବା କରୁଥିଲେ। ତୁମେ ଏଯାବତ୍ ଶିଶୁ, ଘରର ସୁଖରେ ପାଳିତ; ତେଣୁ ଏହି କଥାର କିଛି ମଧ୍ୟ ତୁମେ ବୁଝୁନାହ।
Verse 18
विरेचन उवाच हिरण्यं च गवाश्चृं च यद् वित्तमसुरेषु न: । सुधन्वन् विपणे तेन प्रश्न॑ पृच्छाव ये विदु:,विरोचन बोला--सुधन्वन्! हम असुरोंके पास जो कुछ भी सोना, गौ, घोड़ा आदि धन है, उसकी मैं बाजी लगाता हूँ; हम-तुम दोनों चलकर जो इस विषयके जानकार हों, उनसे पूछें कि हम दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है?
ବିରୋଚନ କହିଲା—ସୁଧନ୍ୱନ୍! ଆମ ଅସୁରମାନଙ୍କ ପାଖରେ ଯେତେ ଧନ ଅଛି—ସୁନା, ଗାଈ, ଘୋଡ଼ା ଇତ୍ୟାଦି—ସବୁକୁ ମୁଁ ପଣ ରଖୁଛି। ଆସ, ଆମେ ଦୁଇଜଣ ଯେମାନେ ଏହି ବିଷୟ ଭଲଭାବେ ଜାଣନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କୁ ପଚାରିବା: ଆମ ଦୁଇଜଣ ମଧ୍ୟରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କିଏ?
Verse 19
युधन्वोवाच हिरण्यं च गवाश्चं च तवैवास्तु विरोचन । प्राणयोस्तु पणं कृत्वा प्रश्न॑ पृच्छाव ये विदु:,सुधन्वा बोला--विरोचन! सुवर्ण, गाय और घोड़ा तुम्हारे ही पास रहें। हम दोनों प्राणोंकी बाजी लगाकर जो जानकार हों, उनसे पूछें
ସୁଧନ୍ୱା କହିଲେ—ହେ ବିରୋଚନ! ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଓ ଗୋଧନ ତୁମ ପାଖରେ ରହୁ। କିନ୍ତୁ ଆମେ ଦୁହେଁ ପ୍ରାଣକୁ ପଣ କରି, ଯେମାନେ ସତ୍ୟ ଜାଣନ୍ତି ସେମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଶ୍ନ କରିବା।
Verse 20
विरोचन उवाच आवां कुत्र गमिष्याव: प्राणयोर्विपणे कृते | नतु देवेष्वहं स्थाता न मनुष्येषु कहिचित्,विरोचनने कहा--अच्छा, प्राणोंकी बाजी लगानेके पश्चात् हम दोनों कहाँ चलेंगे? मैं तो न देवताओंके पास जा सकता हूँ और न कभी मनुष्योंसे ही निर्णण करा सकता हूँ
ବିରୋଚନ କହିଲେ—ତେବେ ପ୍ରାଣକୁ ପଣ କରିଦେଲାପରେ ଆମେ ଦୁହେଁ କେଉଁଠିକୁ ଯିବୁ? ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମୋର ସ୍ଥାନ ନାହିଁ, ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ କେବେ ନୁହେଁ।
Verse 21
युधन्वोवाच पितरं ते गमिष्याव: प्राणयोर्विपणे कृते । पुत्रस्यापि स हेतोहिं प्रह्ादो नानृतं वदेत्,सुधन्वा बोला--प्राणोंकी बाजी लग जानेपर हम दोनों तुम्हारे पिताके पास चलेंगे। [मुझे विश्वास है कि] प्रह्नाद अपने बेटेके (जीवनके) लिये भी झूठ नहीं बोल सकते हैं
ସୁଧନ୍ୱା କହିଲେ—ପ୍ରାଣକୁ ପଣ କରିଦେଲାପରେ ଆମେ ଦୁହେଁ ତୁମ ପିତାଙ୍କ ପାଖକୁ ଯିବୁ। କାରଣ ପ୍ରହ୍ଲାଦ ନିଜ ପୁତ୍ର ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଅସତ୍ୟ କହିବେ ନାହିଁ।
Verse 22
विदुर उवाच एवं कृतपणोौ क्रुद्धौ तत्राभिजग्मतुस्तदा । विरोचनसुधन्वानौ प्रह्वादो यत्र तिषठति,विदुरजी कहते हैं--राजन्! इस तरह बाजी लगाकर परस्पर क़ुद्ध हो विरोचन और सुधन्वा दोनों उस समय वहाँ गये, जहाँ प्रह्नमाद थे
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ଏଭଳି ପଣ ଧରି ପରସ୍ପର କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ବିରୋଚନ ଓ ସୁଧନ୍ୱା ସେତେବେଳେ ପ୍ରହ୍ଲାଦ ଯେଉଁଠି ଥିଲେ ସେଠାକୁ ଗଲେ।
Verse 23
प्रह्माद उवाच इमौ तौ सम्प्रदृश्येते याभ्यां न चरितं सह । आशीविषाविव क्रुद्धावेकमार्गाविहागतौ,प्रह्नादने (मन-ही-मन) कहा--जो कभी भी एक साथ नहीं चले थे, वे ही दोनों ये सुधन्वा और विरोचन आज साँपकी तरह क़ुद्ध होकर एक ही राहसे आते दिखायी देते हैं
ପ୍ରହ୍ଲାଦ (ମନେମନେ) କହିଲେ—ଯେ ଦୁଇଜଣ କେବେ ସହେ ସହେ ଚାଲିନଥିଲେ, ସେମାନେ ଏବେ ଦେଖାଯାଉଛନ୍ତି। କ୍ରୋଧିତ ବିଷଧର ସାପ ପରି ଏକେ ମାର୍ଗରେ ଏଠାକୁ ଆସିଛନ୍ତି।
Verse 24
कि वै सहैवं चरथो न पुरा चरथ: सह । विरोचनैतत् पृच्छामि कि ते सख्यं सुधन्वना,[फिर प्रकटरूपमें विरोचनसे कहा--] विरोचन! मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या सुधन्वाके साथ तुम्हारी मित्रता हो गयी है? फिर कैसे एक साथ आ रहे हो? पहले तो तुम दोनों कभी एक साथ नहीं चलते थे
ପ୍ରହ୍ଲାଦ କହିଲେ—ତୁମେ ଦୁଇଜଣ ଏଭଳି ଏକାସଙ୍ଗେ କାହିଁକି ଚାଲୁଛ? ପୂର୍ବେ ତ ତୁମେ କେବେ ଏକାସଙ୍ଗେ ଚାଲୁନଥିଲ। ବିରୋଚନ! ମୁଁ ସ୍ପଷ୍ଟଭାବେ ପଚାରୁଛି—ସୁଧନ୍ୱା ସହ ତୋର ମିତ୍ରତା ହୋଇଗଲା କି? ଯଦି ହୋଇଥାଏ, ତେବେ ଏହି ସାଥି କିପରି ହେଲା?
Verse 25
वियेचन उवाच न मे सुधन्वना सख्यं प्राणयोर्विपणावहे । प्रह्माद तत्त्वं पृच्छामि मा प्रश्नमनृतं वदे:,विरोचन बोला--पिताजी! सुधन्वाके साथ मेरी मित्रता नहीं हुई है। हम दोनों प्राणोंकी बाजी लगाये आ रहे हैं। मैं आपसे यथार्थ बात पूछता हूँ। मेरे प्रश्नका झूठा उत्तर न दीजियेगा
ବିରୋଚନ କହିଲା—ପିତାଜୀ! ସୁଧନ୍ୱା ସହ ମୋର ମିତ୍ରତା ହୋଇନାହିଁ; ଆମେ ଦୁଇଜଣ ପ୍ରାଣକୁ ପଣ ରଖି ଆସୁଛୁ। ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ ସତ୍ୟ କଥା ପଚାରୁଛି—ମୋ ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତର ମିଥ୍ୟା ଦିଅନ୍ତୁ ନାହିଁ।
Verse 26
प्रह्माद उवाच उदकं मधुपर्क वाप्यानयन्तु सुधन्वने । ब्रह्मन्न भ्यर्चनीयो 5सि श्वेता गौ: पीवरी कृता,प्रह्नमादने कहा--सेवको! सुधन्वाके लिये जल और मधुपर्क भी लाओ। [फिर सुधन्वासे कहा--] ब्रह्मन! तुम मेरे पूजनीय अतिथि हो, मैंने तुम्हें दान करनेके लिये खूब मोटी-ताजी सफेद गौ रख रखी है
ପ୍ରହ୍ଲାଦ କହିଲେ—ସେବକମାନେ! ସୁଧନ୍ୱା ପାଇଁ ଜଳ ଓ ମଧୁପର୍କ ମଧ୍ୟ ଆଣ। ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ତୁମେ ମୋର ପୂଜ୍ୟ ଅତିଥି; ଦାନ ପାଇଁ ମୁଁ ଏକ ପୁଷ୍ଟ, ଦୃଢ଼, ଶ୍ୱେତ ଗାଈ ପ୍ରସ୍ତୁତ ରଖିଛି।
Verse 27
युधन्वोवाच उदकं मधुपर्क च पथिष्वेवार्पितं मम । प्रह्मद त्वं तु मे तथ्यं प्रश्न॑ प्रत्रूहि पृष्छत: । कि ब्राह्मणा: स्विच्छेयांस उताहो स्विद् विरोचन:,सुधन्वा बोला--प्रह्नाद! जल और मधुपर्क तो मुझे मार्गमें ही मिल गया है। तुम तो जो मैं पूछ रहा हूँ, उस प्रश्नचका ठीक-ठीक उत्तर दो-ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं अथवा विरोचन?
ସୁଧନ୍ୱା କହିଲା—ଜଳ ଓ ମଧୁପର୍କ ମୋତେ ପଥରେ ହିଁ ଅର୍ପିତ ହୋଇଯାଇଛି। କିନ୍ତୁ ପ୍ରହ୍ଲାଦ! ମୁଁ ଯାହା ପଚାରୁଛି, ତାହାର ସତ୍ୟ ଉତ୍ତର ଦିଅ—ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ କି, ନା ବିରୋଚନ?
Verse 28
प्रह्माद उवाच पुत्र एको मम ब्रह्म॑ंस्त्वं च साक्षादिहास्थित: । तयोर्विवदतो: प्रश्न कथमस्मद्विधो वदेत्
ପ୍ରହ୍ଲାଦ କହିଲେ—ପୁତ୍ର! ଗୋଟିଏ ପକ୍ଷରେ ମୋର ନିଜ ପୁଅ ଅଛି, ଅନ୍ୟ ପକ୍ଷରେ ତୁମେ ସ୍ୱୟଂ ବ୍ରାହ୍ମଣ ରୂପେ ଏଠାରେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦଣ୍ଡାୟମାନ। ଏହି ଦୁଇଜଣ ବିବାଦ କରୁଥିବାବେଳେ ପ୍ରଶ୍ନ ଉଠିଲେ, ମୋ ପରି ଲୋକ କିପରି ଉତ୍ତର ଦେବ?
Verse 29
प्रह्नाद बोले--ब्रह्मन्! मेरे एक ही पुत्र है और इधर तुम स्वयं उपस्थित हो; भला, तुम दोनोंके विवादमें मेरे-जैसा मनुष्य कैसे निर्णय दे सकता है? ।। युधन्वोवाच गां प्रदद्यास्त्वौरसाय यद्धान्यत् स्यात् प्रियं धनम् । द्वयोविवदतोस्तथ्यं वाच्यं च मतिमंस्त्वया,सुधन्वा बोला--मतिमन्! तुम्हारे पास गौ तथा दूसरा जो कुछ भी प्रिय धन हो, वह सब अपने औरस पुत्र विरोचनको दे दो; परंतु हम दोनोंके विवादमें तो तुम्हें ठीक-ठीक उत्तर देना ही चाहिये
ପ୍ରହ୍ଲାଦ କହିଲେ— “ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ମୋର ତ ଏକମାତ୍ର ପୁତ୍ର ଅଛି, ଆଉ ଆପଣ ନିଜେ ଏଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ। ଆପଣମାନଙ୍କ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ବିବାଦରେ ମୋ ପରି ମଣିଷ କିପରି ନିଷ୍ପତ୍ତି ଦେଇପାରିବ?” ସୁଧନ୍ୱ କହିଲେ— “ଗାଈ ଓ ତୁମର ଯେଉଁ ପ୍ରିୟ ଧନ ଅଛି ସେସବୁ ତୁମ ଔରସ ପୁତ୍ର ବିରୋଚନକୁ ଦେଇଦିଅ; କିନ୍ତୁ ଆମ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ବିବାଦରେ, ହେ ବୁଦ୍ଧିମାନ, ତୁମେ ସତ୍ୟକୁ ହିଁ କହି ସଠିକ୍ ଉତ୍ତର ଦେବା ଉଚିତ।”
Verse 30
प्रह्माद उवाच अथ यो नैव प्रब्रूयात् सत्यं वा यदि वानृतम् । एतत् सुधन्वन् पृच्छामि दुर्विवक्ता सम कि वसेत्,प्रह्नमादने कहा--सुधन्वन्! अब मैं तुमसे यह बात पूछता हूँ--जो सत्य न बोले अथवा अस॒त्य निर्णय करे, ऐसे दुष्ट वक्ताकी क्या स्थिति होती है?
ପ୍ରହ୍ଲାଦ କହିଲେ— “ସୁଧନ୍ୱନ! ଏବେ ମୁଁ ତୁମକୁ ପଚାରୁଛି—ଯେ ସତ୍ୟ କହେନାହିଁ, କିମ୍ବା ନିଷ୍ପତ୍ତି ଦେବାବେଳେ ଅସତ୍ୟ ରାୟ ଦିଏ, ସେ ଦୁଷ୍ଟ ବକ୍ତାର କି ଗତି ହୁଏ?”
Verse 31
युधन्वोवाच यां रात्रिमधिविन्ना स्त्री यां चैवाक्षपराजित: । यां च भाराभिततप्ताड़्े दुर्विवक्ता सम तां वसेत्,सुधन्वा बोला--सौतवाली स्त्री, जूएमें हारे हुए जुआरी और भार ढोनेसे व्यथित शरीरवाले मनुष्यकी रातमें जो स्थिति होती है, वही स्थिति उलटा न्याय देनेवाले वक्ताकी भी होती है
ସୁଧନ୍ୱ କହିଲେ— “ଅନ୍ୟାୟରେ ପୀଡିତ ହୋଇ ତ୍ୟଜିତା ନାରୀ ଯେ ରାତି ଭୋଗେ; ପାଶାରେ ପରାଜିତ ଜୁଆଡ଼ି ଯେ ରାତି କାଟେ; ଏବଂ ଭାର ବୋହି ଦେହ ଜଳିଯାଇଥିବା ମଣିଷ ଯେ ରାତି ଭୋଗେ—ସେହିପରି ରାତି ଅନ୍ୟାୟ କଥା କହି ବିକୃତ ନ୍ୟାୟ ଦେଇଥିବା ଦୁର୍ବିବକ୍ତା ମଧ୍ୟ ସହେ।”
Verse 32
नगरे प्रतिरुद्ध: सन् बहिद्वरि बुभुक्षित: । अमित्रान् भूयस: पश्येद् यः साक्ष्यमनृतं वदेत्,जो झूठा निर्णय देता है, वह राजा नगरमें कैद होकर बाहरी दरवाजेपर भूखका कष्ट उठाता हुआ बहुत-से शत्रुओंको देखता है
ଯେ ମିଥ୍ୟା ସାକ୍ଷ୍ୟ କହେ, ସେ ନଗରରେ ଅଟକ ହୋଇ ବାହାର ଦ୍ୱାରେ ଭୁଖରେ ପୀଡିତ ହୋଇ ଅନେକ ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ଦେଖିବାକୁ ବାଧ୍ୟ ହୁଏ।
Verse 33
पज्च पश्चनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते । शतमश्चानृते हन्ति सहस्न॑ पुरुषानृते,(अपने स्वार्थके वशीभूत हो) पशुके लिये झूठ बोलनेसे पाँच, गौके लिये झूठ बोलनेपर दस, घोड़ेके लिये असत्य-भाषण करनेपर सौ पीढ़ियोंको और मनुष्यके लिये झूठ बोलनेपर एक हजार पीढ़ियोंको मनुष्य नरकमें गिराता है
ପଶୁ ପାଇଁ ମିଥ୍ୟା କହିଲେ ପାଞ୍ଚ (ପିଢ଼ି) ନଶେ; ଗାଈ ପାଇଁ ମିଥ୍ୟା କହିଲେ ଦଶ; ଘୋଡ଼ା ପାଇଁ ଅସତ୍ୟ କହିଲେ ଶତ; ଏବଂ ମଣିଷ ପାଇଁ ମିଥ୍ୟା କହିଲେ ସହସ୍ର—ଏବଂ ସେ ନରକକୁ ପତିତ ହୁଏ।
Verse 34
हन्ति जातानजातांश्व हिरण्यार्थेडनृतं वदन् । सर्व भूम्यनृते हन्ति मा सम भूम्यनृतं वदे:,सुवर्णके लिये झूठ बोलनेवाला अपनी भूत और भविष्य सभी पीढ़ियोंको नरकमें गिराता है। पृथ्वी तथा स्त्रीके लिये झूठ कहनेवाला तो अपना सर्वनाश ही कर लेता है; इसलिये तुम भूमि या स्त्रीके लिये कभी झूठ न बोलना
ସୁବର୍ଣ୍ଣର ଲୋଭରେ ଯେ ମିଥ୍ୟା କହେ, ସେ ଜନ୍ମିତ ଓ ଅଜନ୍ମା—ବର୍ତ୍ତମାନ ଓ ଭବିଷ୍ୟତ—ବଂଶକୁ ନାଶ କରେ। ଭୂମି (ଏବଂ ନାରୀ) ବିଷୟରେ ମିଥ୍ୟା ସର୍ବନାଶ ଆଣେ; ତେଣୁ ଭୂମି କିମ୍ବା ନାରୀ ପାଇଁ କେବେ ମିଥ୍ୟା କହିବ ନାହିଁ।
Verse 35
प्रह्माद उवाच मत्त: श्रेयानड्रिरा वै सुधन्वा त्वद्वधिरोचन | मातास्य श्रेयसी मातुस्तस्मात् त्वं तेन वै जित:,भरतश्रेष्ठ) पाण्डव तो सभी उत्तम गुणोंसे सम्पन्न हैं और आपमें पिताका-सा भाव रखकर बर्ताव करते हैं; आप भी उनपर पुत्रभाव रखकर उचित बर्ताव कीजिये ।। इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरनीतिवाक्ये पउठ्चत्रिंशो 5ध्याय: [
ପ୍ରହ୍ଲାଦ କହିଲେ—“ଅଙ୍ଗିରା ମୋଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ଏବଂ ସୁଧନ୍ୱା ତୋଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ—ସେ ତୋର ବିନାଶ ପାଇଁ ଅଚଳ ସଙ୍କଳ୍ପୀ। ତାହାର ମାତା ତୋର ମାତାଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ତେଣୁ ତୁ ତାହାଦ୍ୱାରା ଜିତାଯାଇଛୁ।”
Verse 36
प्रह्नमादने कहा--विरोचन! सुधन्वाके पिता अंगिरा मुझसे श्रेष्ठ हैं, सुधन्वा तुमसे श्रेष्ठ है, इसकी माता तुम्हारी मातासे श्रेष्ठ है; अतः तुम आज सुधन्वाके द्वारा जीते गये ।। विरोचन सुधन्वायं प्राणानामी श्वरस्तव । सुधन्वन् पुनरिच्छामि त्वया दत्तं विरोचनम्,विरोचन! अब सुधन्वा तुम्हारे प्राणोंका स्वामी है। सुधन्वन्! अब यदि तुम दे दो तो मैं विरोचनको पाना चाहता हूँ
ପ୍ରହ୍ଲାଦ କହିଲେ—“ବିରୋଚନ! ସୁଧନ୍ୱାର ପିତା ଅଙ୍ଗିରା ମୋଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ସୁଧନ୍ୱା ତୋଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ତାହାର ମାତା ତୋର ମାତାଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ତେଣୁ ଆଜି ତୁ ସୁଧନ୍ୱା ଦ୍ୱାରା ପରାଜିତ। ବିରୋଚନ! ଏବେ ସୁଧନ୍ୱା ତୋର ପ୍ରାଣର ଅଧିଶ୍ୱର। ସୁଧନ୍ୱନ! ତୁ ଯଦି ତାକୁ ଫେରାଇ ଦେବୁ, ତେବେ ତୋତେ ପଣ ରୂପେ ଦିଆଯାଇଥିବା ଏହି ବିରୋଚନକୁ ମୁଁ ପୁନଃ ପାଇବାକୁ ଚାହୁଁଛି।”
Verse 37
युधन्वोवाच यद् धर्ममवृणीथास्त्वं न कामादनृतं वदी: । पुनर्ददामि ते पुत्र॑ तस्मात् प्रह्मद दुर्लभम्,7 कि लक हा ५ खा 4 अर प 90-5० सुधन्वा बोला--प्रह्नाद! तुमने धर्मको ही स्वीकार किया है, स्वार्थवश झूठ नहीं कहा है; इसलिये अब तुम्हारे इस दुर्लभ पुत्रको फिर तुम्हें दे रहा हूँ
ସୁଧନ୍ୱା କହିଲା—“ପ୍ରହ୍ଲାଦ! ତୁ ଧର୍ମକୁ ହିଁ ବାଛିଲୁ, ସ୍ୱାର୍ଥବଶେ ମିଥ୍ୟା କହିଲୁ ନାହିଁ; ତେଣୁ ଏହି ଦୁର୍ଲଭ ପୁତ୍ରକୁ ମୁଁ ପୁନଃ ତୋତେ ଫେରାଇ ଦେଉଛି।”
Verse 38
एष प्रह्माद पुत्रस्ते मया दत्तो विरोचन: । पादप्रक्षालनं कुर्यात् कुमार्या: संनिधौ मम,प्रह्माद! तुम्हारे इस पुत्र विरोचनको मैंने पुनः तुम्हें दे दिया; किंतु अब यह कुमारी केशिनीके निकट चलकर मेरे पैर धोवे
ସୁଧନ୍ୱା କହିଲା—“ପ୍ରହ୍ଲାଦ! ତୋର ପୁତ୍ର ବିରୋଚନକୁ ମୁଁ ତୋତେ ଫେରାଇ ଦେଲି; କିନ୍ତୁ ମୋ ସମ୍ମୁଖରେ ସେ କୁମାରୀ କେଶିନୀଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଇ ମୋ ପାଦ ପ୍ରକ୍ଷାଳନ କରୁ।”
Verse 39
विदुर उवाच तस्माद् राजेन्द्र भूम्यर्थे नानृतं वक्तुमहसि । मा गम: ससुतामात्यो नाशं पुत्रार्थमब्रुवन्,विदुरजी कहते हैं--इसलिये राजेन्द्र! आप पृथ्वीके लिये झूठ न बोलें। बेटेके स्वार्थथश सच्ची बात न कहकर पुत्र और मन्त्रियोंके साथ विनाशके मुखमें न जायेँ
ବିଦୁର କହିଲେ—ଏହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଭୂମି ଓ ରାଜ୍ୟର ଲୋଭରେ ଅସତ୍ୟ କହିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ପୁତ୍ରମୋହରେ ସତ୍ୟ କହିବାରୁ ବିମୁଖ ହୋଇ, ପୁତ୍ର ଓ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ବିନାଶପଥେ ଯାଅ ନାହିଁ।
Verse 40
न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् | यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्धया संविभजन्ति तम्,देवतालोग चरवाहोंकी तरह डंडा लेकर किसीका पहरा नहीं देते। वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसे उत्तम बुद्धिसे युक्त कर देते हैं
ଦେବତାମାନେ ଗୋପାଳମାନଙ୍କ ପରି ଦଣ୍ଡ ଧରି କାହାରି ପହରା ଦିଅନ୍ତି ନାହିଁ। ଯାହାକୁ ରକ୍ଷା କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ତାହାକୁ ସେମାନେ ବିବେକଯୁକ୍ତ ବୁଦ୍ଧି ଦାନ କରନ୍ତି—ଯେପରି ସେ ନିଜେ ଠିକ୍ ବିଚାରରେ ନିଜକୁ ରକ୍ଷା କରିପାରେ।
Verse 41
यथा यथा हि पुरुष: कल्याणे कुरुते मन: । तथा तथास्यथ सर्वार्था: सिद्धयन्ते नात्र संशय:,मनुष्य जैसे-जैसे कल्याणमें मन लगाता है, वैसे-ही-वैसे उसके सारे अभीष्ट सिद्ध होते हैं--इसमें तनिक भी संदेह नहीं है
ମଣିଷ ଯେପରି ଯେପରି କଲ୍ୟାଣ ଓ ଧର୍ମରେ ମନ ଲଗାଏ, ସେପରି ସେପରି ତାହାର ସମସ୍ତ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହୁଏ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 42
प्रह्नमादजीका न्याय आत्रेय मुनि और साध्यगण नैनं छनन््दांसि वृजिनात् तारयन्ति मायाविनं मायया वर्तमानम् | नीडं शकुन्ता इव जातपक्षा- श्छन्दांस्थेनं प्रजहत्यन्तकाले,कपट॒पूर्ण व्यवहार करनेवाले मायावीको वेद पापोंसे मुक्त नहीं करते; किंतु जैसे पंख निकल आनेपर चिड़ियोंके बच्चे घोंसला छोड़ देते हैं, उसी प्रकार वेद भी अन्तकालमें उस (मायावी)-को त्याग देते हैं
ମାୟାରେ ଜୀବନ ଯାପନ କରୁଥିବା କପଟୀକୁ ବେଦଛନ୍ଦ ପାପରୁ ଉଦ୍ଧାର କରେ ନାହିଁ। ଅନ୍ତକାଳରେ ବେଦ ମଧ୍ୟ ତାକୁ ତ୍ୟାଗ କରେ—ଯେପରି ପକ୍ଷ ଗଜାଇଲେ ପକ୍ଷୀଛୁଆ ଘୋସା ଛାଡ଼ିଦିଏ।
Verse 43
मद्यपानं कलहूं, पूगवैरं भार्यपत्योरन्तरं ज्ञातिभेदम् । राजद्विष्ट॑ स्त्रीपुंसयोविवादं वर्ज्यान्याहुर्यश्व॒ पन्था: प्रदुष्ट:,शराब पीना, कलह, समूहके साथ वैर, पति-पत्नीमें भेद पैदा करना, कुटुम्बवालोंमें भेदबुद्धि उत्पन्न करना, राजाके साथ द्वेष, स्त्री और पुरुषमें विवाद और बुरे रास्ते--ये सब त्याग देनेयोग्य बताये गये हैं
ମଦ୍ୟପାନ, କଳହ, ନିଜ ଦଳ ସହିତ ବୈର, ସ୍ୱାମୀ-ସ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଦୂରତା ସୃଷ୍ଟି, ଜ୍ଞାତିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଭେଦ, ରାଜା ପ୍ରତି ଦ୍ୱେଷ, ସ୍ତ୍ରୀ-ପୁରୁଷ ମଧ୍ୟରେ ବିବାଦ, ଏବଂ ଯେ କୌଣସି ଆଚରଣପଥ ଦୂଷିତ—ଏସବୁ ତ୍ୟାଜ୍ୟ ବୋଲି କୁହାଯାଇଛି।
Verse 44
सामुद्रिकं वणिजं चोरपूर्व शलाकधूर्त॑ च चिकित्सकं च | अरिं च मित्र च कुशीलवं च नैतान् साक्ष्ये त्वधिकुर्वीत सप्त,हस्तरेखा देखनेवाला, चोरी करके व्यापार करनेवाला, जुआरी, वैद्य, शत्रु, मित्र और नर्तक--इन सातोंको कभी भी गवाह न बनावे
ବିଦୁର କହିଲେ—ସାକ୍ଷ୍ୟ ବିଷୟରେ ଏହି ସାତ ପ୍ରକାର ଲୋକଙ୍କୁ କେବେ ସାକ୍ଷୀ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ: ସାମୁଦ୍ରିକ/ହସ୍ତରେଖା ଦେଖୁଥିବା, ଚୋରିର ପୂର୍ବବୃତ୍ତି ଥିବା ବଣିକ, ଛଳରେ ନିପୁଣ ଜୁଆଡ଼ି, ଚିକିତ୍ସକ, ଶତ୍ରୁ, ମିତ୍ର ଏବଂ କୁଶୀଳବ (ନଟ-ନର୍ତ୍ତକ)।
Verse 45
मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुत मानयज्ञ: । एतानि चत्वार्यभयंकराणि भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि,आदरके साथ अमन्निहोत्र, आदरपूर्वक मौनका पालन, आदरपूर्वक स्वाध्याय और आदरके साथ यज्ञका अनुष्ठान--ये चार कर्म भयको दूर करनेवाले हैं; किंतु वे ही यदि ठीक तरहसे सम्पादित न हों तो भय प्रदान करनेवाले होते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ଶ୍ରଦ୍ଧାସହ ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର, ଶ୍ରଦ୍ଧାସହ ମୌନ, ଶ୍ରଦ୍ଧାସହ ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ ଏବଂ ଶ୍ରଦ୍ଧାସହ ଯଜ୍ଞ—ଏହି ଚାରି କର୍ମ ଭୟନାଶକ; କିନ୍ତୁ ଯଥାବିଧି ନ ହେଲେ ସେମାନେ ଭୟ ଦେଇଥାନ୍ତି।
Verse 46
अगारदाही गरद: कुण्डाशी सोमविक्रयी । पर्वकारश्न सूची च मित्रध्रुक् पारदारिक:,घरमें आग लगानेवाला, विष देनेवाला, जारज संतानकी कमाई खानेवाला, सोमरस बेचनेवाला, शस्त्र बनानेवाला, चुगली करनेवाला, मित्रद्रोही, परस्त्रीलम्पट, गर्भकी हत्या करनेवाला, गुरुस्त्रीगामी, ब्राह्मण होकर शराब पीनेवाला, अधिक तीखे स्वभाववाला, कौएकी तरह कार्ये-कार्यँ करनेवाला, नास्तिक, वेदकी निन्दा करनेवाला, ग्रामपुरोहित, व्रात्य-, क्रूर तथा शक्तिमान् होते हुए भी “मेरी रक्षा करो", इस प्रकार कहनेवाले शरणागतका जो वध करता है--ये सब-के-सब ब्रह्म-हत्यारोंके समान हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ଯେ ପରର ଘରେ ଆଗ ଲଗାଏ, ଯେ ବିଷ ଦିଏ, ଯେ ପରସ୍ତ୍ରୀ-ସମ୍ବନ୍ଧଜ ସନ୍ତାନର ଉପାର୍ଜନ ଖାଏ, ଯେ ସୋମ ବିକ୍ରୟ କରେ, ଯେ ଶସ୍ତ୍ର ତିଆରି କରେ, ଯେ ଚୁଗୁଳି କରେ, ଯେ ମିତ୍ରଦ୍ରୋହୀ, ଏବଂ ଯେ ପରସ୍ତ୍ରୀଲମ୍ପଟ—ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ଘୋର ଅପରାଧୀ।
Verse 47
भ्रूणहा गुरुतल्पी च यश्न स्यात् पानपो द्विज: । अतितीक्षणश्न॒ काकश्न नास्तिको वेदनिन्दक:,घरमें आग लगानेवाला, विष देनेवाला, जारज संतानकी कमाई खानेवाला, सोमरस बेचनेवाला, शस्त्र बनानेवाला, चुगली करनेवाला, मित्रद्रोही, परस्त्रीलम्पट, गर्भकी हत्या करनेवाला, गुरुस्त्रीगामी, ब्राह्मण होकर शराब पीनेवाला, अधिक तीखे स्वभाववाला, कौएकी तरह कार्ये-कार्यँ करनेवाला, नास्तिक, वेदकी निन्दा करनेवाला, ग्रामपुरोहित, व्रात्य-, क्रूर तथा शक्तिमान् होते हुए भी “मेरी रक्षा करो", इस प्रकार कहनेवाले शरणागतका जो वध करता है--ये सब-के-सब ब्रह्म-हत्यारोंके समान हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ଭ୍ରୂଣହନ୍ତା, ଗୁରୁତଳ୍ପଗାମୀ (ଗୁରୁପତ୍ନୀଗାମୀ), ମଦ୍ୟପାନୀ ଦ୍ୱିଜ, ଅତିତୀକ୍ଷ୍ଣ ସ୍ୱଭାବୀ, କାକ ପରି ଅବିବେକୀ, ନାସ୍ତିକ ଏବଂ ବେଦନିନ୍ଦକ—ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ବ୍ରହ୍ମହତ୍ୟାସମାନ।
Verse 48
ख्रुवप्रग्रहणो व्रात्य: कीनाशश्नात्मवानपि । रक्षेत्युक्तश्न यो हिंस्यात् सर्वे ब्रह्मृहभि: समा:,घरमें आग लगानेवाला, विष देनेवाला, जारज संतानकी कमाई खानेवाला, सोमरस बेचनेवाला, शस्त्र बनानेवाला, चुगली करनेवाला, मित्रद्रोही, परस्त्रीलम्पट, गर्भकी हत्या करनेवाला, गुरुस्त्रीगामी, ब्राह्मण होकर शराब पीनेवाला, अधिक तीखे स्वभाववाला, कौएकी तरह कार्ये-कार्यँ करनेवाला, नास्तिक, वेदकी निन्दा करनेवाला, ग्रामपुरोहित, व्रात्य-, क्रूर तथा शक्तिमान् होते हुए भी “मेरी रक्षा करो", इस प्रकार कहनेवाले शरणागतका जो वध करता है--ये सब-के-सब ब्रह्म-हत्यारोंके समान हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ବ୍ରାତ୍ୟ ହେଉ, କୃଷକ ହେଉ, କିମ୍ବା ଆତ୍ମବଳସମ୍ପନ୍ନ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ହେଉ—ଯେ ‘ମୋତେ ରକ୍ଷା କର’ ବୋଲି ଶରଣ ନେଇ ଆସେ, ତାହାକୁ ହିଂସା କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। ଯେ ଏମିତି ଶରଣାଗତକୁ ଆଘାତ କରେ କିମ୍ବା ବଧ କରେ, ସେ ବ୍ରହ୍ମହନ୍ତାସମାନ।
Verse 49
तृणोल्कया ज्ञायते जातरूप॑ं वृत्तेन भद्रो व्यवहारेण साधु: । शूरो भयेष्वर्थकृच्छेषु धीर: कृच्छेष्वापत्सु सुहृदश्चारयश्च,जलती हुई आगसे सुवर्णकी पहचान होती है, सदाचारसे सत्पुरुषकी, व्यवहारसे श्रेष्ठ पुरुषकी, भय प्राप्त होनेपर शूरकी, आर्थिक कठिनाईमें धीरकी और कठिन आपपत्तिमें शत्रु एवं मित्रकी परीक्षा होती है
ବିଦୁର କହିଲେ—ଅଗ୍ନିର ପରୀକ୍ଷାରେ ସୁବର୍ଣ୍ଣର ପରିଚୟ ହୁଏ; ଆଚରଣରେ ସଜ୍ଜନ, ବ୍ୟବହାରରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷ ଚିହ୍ନଟ ହୁଏ। ଭୟ ଆସିଲେ ଶୂର, ଧନସଙ୍କଟରେ ଧୀର; ଏବଂ ଘୋର ବିପଦରେ କିଏ ସତ୍ୟ ମିତ୍ର, କିଏ ଶତ୍ରୁ—ତାହା ଜଣାପଡ଼େ।
Verse 50
जरा रूप॑ हरति हि धैर्यमाशा मृत्यु: प्राणान् धर्मचर्यामसूया । क्रोध: श्रियं शीलमनार्यसेवा हियं काम: सर्वमेवाभिमान:,बुढ़ापा (सुन्दर) रूपको, आशा धीरताको, मृत्यु प्राणोंको, असूया (गुणोंमें दोष देखनेका स्वभाव) धर्माचरणको, क्रोध लक्ष्मीको, नीच पुरुषोंकी सेवा सत्स्वभभावको, काम लज्जाको और अभिमान सर्वस्वको नष्ट कर देता है
ବିଦୁର କହିଲେ—ଜରା ରୂପକୁ ହରିନେଇଯାଏ; ଆସକ୍ତିମୟ ଆଶା ଧୈର୍ଯ୍ୟକୁ କ୍ଷୟ କରେ; ମୃତ୍ୟୁ ପ୍ରାଣକୁ ନେଇଯାଏ; ଦୋଷଦର୍ଶୀ ଅସୂୟା ଧର୍ମାଚରଣକୁ ନଷ୍ଟ କରେ। କ୍ରୋଧ ଶ୍ରୀକୁ ନାଶ କରେ; ଅନାର୍ୟଙ୍କ ସେବା ଶୀଳକୁ ନଷ୍ଟ କରେ; କାମ ଲଜ୍ଜାକୁ ହରେ; ଏବଂ ଅଭିମାନ ସର୍ବସ୍ୱକୁ ଗ୍ରସିନେଇଯାଏ।
Verse 51
श्रीमड्नलात् प्रभवति प्रागल्भ्यात् सम्प्रवर्धते । दाक्ष्यात् तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठति,शुभ कर्मोसे लक्ष्मीकी उत्पत्ति होती है, प्रगल्भतासे वह बढ़ती है, चतुरतासे जड़ जमा लेती है और संयमसे सुरक्षित रहती है
ବିଦୁର କହିଲେ—ଶୁଭ କର୍ମରୁ ଲକ୍ଷ୍ମୀ ଜନ୍ମ ନେଉଛି; ପ୍ରଗଳ୍ଭ ପ୍ରୟାସରେ ବଢ଼େ; ଦକ୍ଷତାରେ ମୂଳ ଧରେ; ଏବଂ ସଂଯମରେ ସ୍ଥିର ଓ ସୁରକ୍ଷିତ ରହେ।
Verse 52
अष्टौ गुणा: पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दम: श्रुतं च । पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च,आठ गुण पुरुषकी शोभा बढ़ाते हैं--बुद्धि, कुलीनता, दम, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, बहुत न बोलना, यथाशक्ति दान देना और कृतज्ञ होना
ବିଦୁର କହିଲେ—ଆଠଟି ଗୁଣ ପୁରୁଷକୁ ଦୀପ୍ତ କରେ: ପ୍ରଜ୍ଞା, କୁଳୀନତା, ଦମ (ଇନ୍ଦ୍ରିୟ-ନିଗ୍ରହ), ଶ୍ରୁତ (ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞାନ), ପରାକ୍ରମ, ଅଳ୍ପଭାଷିତା, ଯଥାଶକ୍ତି ଦାନ, ଏବଂ କୃତଜ୍ଞତା।
Verse 53
एतान् गुणांस्तात महानुभावा- नेको गुण: संश्रयते प्रसहा । राजा यदा सत्कुरुते मनुष्यं सर्वान् गुणानेष गुणो विभाति,तात! एक गुण ऐसा है, जो इन सभी महत्त्वपूर्ण गुणोंपर हठात् अधिकार जमा लेता है। जिस समय राजा किसी मनुष्यका सत्कार करता है, उस समय यह एक ही गुण (राजसम्मान) सभी गुणोंसे बढ़कर शोभा पाता है
ବିଦୁର କହିଲେ—ତାତ! ଏହି ମହାନ ଗୁଣମାନଙ୍କୁ ଏକମାତ୍ର ଗୁଣ ବଳପୂର୍ବକ ନିଜ ଆଶ୍ରୟରେ ନେଇଯାଏ। ରାଜା ଯେତେବେଳେ କାହାକୁ ସତ୍କାର କରନ୍ତି, ସେତେବେଳେ ସେଇ ଏକ ଗୁଣ—ରାଜସମ୍ମାନ—ସମସ୍ତ ଗୁଣକୁ ଅତିକ୍ରମ କରି ଦୀପ୍ତ ହୁଏ।
Verse 54
अष्टी नृपेमानि मनुष्यलोके स्वर्गस्थ लोकस्य निदर्शनानि । चत्वार्येषामन्ववेतानि सद्धि- श्वृत्वारि चैषामनुयान्ति सन््तः,राजन! मनुष्यलोकमें ये आठ गुण स्वर्गलोकका दर्शन करानेवाले हैं; इनमेंसे चार तो संतोंके साथ नित्य सम्बद्ध हैं--उनमें सदा विद्यमान रहते हैं और चारका सज्जन पुरुष अनुसरण करते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ମନୁଷ୍ୟଲୋକରେ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକକୁ ସୂଚାଇବା ନିମିତ୍ତ ସ୍ପଷ୍ଟ ନିଦର୍ଶନ ସ୍ୱରୂପ ଆଠଟି ଗୁଣ ଅଛି। ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଚାରିଟି ସତ୍ପୁରୁଷଙ୍କ ସଙ୍ଗରେ ଅବିଚ୍ଛିନ୍ନ ଭାବେ ନିତ୍ୟ ରହେ—ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସଦା ବିଦ୍ୟମାନ; ଅନ୍ୟ ଚାରିଟିକୁ ସଜ୍ଜନମାନେ ସଚେତନ ଭାବେ ଅନୁସରଣ ଓ ଅଭ୍ୟାସ କରନ୍ତି।
Verse 55
यज्ञों दानमध्ययनं तपश्न चत्वार्येतान्यन्ववेतानि सद्धिः | दम: सत्यमार्जवमानृशंस्यं चत्वार्येतान्यनुयान्ति सन्त:,यज्ञ, दान, शास्त्रोंका अध्ययन और तप--ये चार सज्जनोंके साथ नित्य सम्बद्ध हैं और इन्द्रियनिग्रह, सत्य, सरलता तथा कोमलता--इन चारोंका संतलोग अनुसरण करते हैं
ଯଜ୍ଞ, ଦାନ, ଶାସ୍ତ୍ରାଧ୍ୟୟନ ଓ ତପ—ଏହି ଚାରିଟି ସତ୍ପୁରୁଷଙ୍କ ସହ ନିତ୍ୟ ସଂଲଗ୍ନ ରହେ। ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ରିୟନିଗ୍ରହ, ସତ୍ୟ, ସରଳତା ଓ କରୁଣା—ଏହି ଚାରିଟିକୁ ସନ୍ତଜନ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତି।
Verse 56
इज्याध्ययनदानानि तप: सत्य॑ क्षमा घृणा । अलोभ इति मार्गो<यं धर्मस्याष्टविध: स्मृत:,यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और निर्लेभता--ये धर्मके आठ प्रकारके मार्ग बताये गये हैं
ଇଜ୍ୟା (ଯଜ୍ଞ), ଅଧ୍ୟୟନ, ଦାନ, ତପ, ସତ୍ୟ, କ୍ଷମା, ଦୟା ଓ ନିର୍ଲୋଭତା—ଏହିଟି ଧର୍ମର ଅଷ୍ଟବିଧ ମାର୍ଗ ବୋଲି ସ୍ମୃତ।
Verse 57
तत्र पूर्वचतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते । उत्तरश्न चतुर्वर्गो नामहात्मसु तिष्तति,इनमेंसे पहले चारोंका तो कोई (दम्भी पुरुष भी) दम्भके लिये सेवन कर सकता है, परंतु अन्तिम चार तो जो महात्मा नहीं हैं, उनमें रह ही नहीं सकते
ଏଠାରେ ପ୍ରଥମ ଚାରିଟି ଗୁଣ ଦମ୍ଭ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ସେବନ କରାଯାଇପାରେ; କିନ୍ତୁ ଶେଷ ଚାରିଟି ଗୁଣ ମହାତ୍ମା ନୁହେଁ ଏମିତି ଲୋକଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସତ୍ୟରେ ରହିପାରେ ନାହିଁ।
Verse 58
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा नते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम् नासौ धर्मों यत्र न सत्यमस्ति न तत् सत्यं यच्छलेना भ्युपेतम्,जिस सभामें बड़े-बूढ़े नहीं, वह सभा नहीं; जो धर्मकी बात न कहें, वे बूढ़े नहीं; जिसमें सत्य नहीं, वह धर्म नहीं और जो कपटसे पूर्ण हो, वह सत्य नहीं है
ଯେଉଁ ସଭାରେ ବୃଦ୍ଧଜନ ନାହାନ୍ତି, ସେ ସଭା ନୁହେଁ; ଯେମାନେ ଧର୍ମ କଥା କହନ୍ତି ନାହିଁ, ସେମାନେ ବୃଦ୍ଧ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ। ଯେଉଁଠାରେ ସତ୍ୟ ନାହିଁ, ସେଠାରେ ଧର୍ମ ନାହିଁ; ଏବଂ ଛଳରେ ଗ୍ରହୀତ ଯାହା, ତାହା ସତ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 59
सत्यं रूप॑ श्रुतं विद्या कौल्यं शीलं बलं धनम् | शौर्य च चित्रभाष्यं च दशेमे स्वर्गयोनय:,सत्य, विनयकी मुद्रा, शास्त्रज्ञान, विद्या, कुलीनता, शील, बल, धन, शूरता और चमत्कारपूर्ण बात कहना--ये दस स्वर्गके हेतु हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ସତ୍ୟ, ମନୋହର ଓ ଗରିମାମୟ ରୂପ, ଶ୍ରବଣଦ୍ୱାରା ପ୍ରାପ୍ତ ଶାସ୍ତ୍ର-ପରମ୍ପରାଜ୍ଞାନ, ସତ୍ୟ ବିଦ୍ୟା, କୁଳୀନତା, ଶୀଳ, ବଳ, ଧନ, ଶୌର୍ଯ୍ୟ ଓ ଚିତ୍ରମୟ ଦୀପ୍ତିମାନ ବାକ୍ଚାତୁର୍ୟ—ଏହି ଦଶଟି ସ୍ୱର୍ଗପ୍ରାପ୍ତିର ହେତୁ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।
Verse 60
पाप॑ं कुर्वन् पापकीर्ति: पापमेवा श्ुते फलम् | पुण्य॑ कुर्वन् पुण्यकीर्ति: पुण्यमत्यन्तमश्चुते,पापकीर्तिवाला निन्दित मनुष्य पापाचरण करता हुआ पापके फलको ही प्राप्त करता है और पुण्य कीर्तिवाला (प्रशंसित) मनुष्य पुण्य करता हुआ अत्यन्त पुण्यफलका ही उपभोग करता है
ପାପ କରୁଥିବା ପାପକୀର୍ତ୍ତିଧାରୀ ମନୁଷ୍ୟ ପାପର ଫଳକୁ ହିଁ ଭୋଗ କରେ; ପୁଣ୍ୟ କରୁଥିବା ପୁଣ୍ୟକୀର୍ତ୍ତିଧାରୀ ମନୁଷ୍ୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପୁଣ୍ୟଫଳକୁ ହିଁ ଭୋଗ କରେ।
Verse 61
तस्मात् पापं न कुर्वीत पुरुष: शंसितव्रत: । पापं प्रज्ञां नाशयति क्रियमाणं पुन: पुन:,इसलिये प्रशंसित व्रतका आचरण करनेवाले पुरुषको पाप नहीं करना चाहिये; क्योंकि बारंबार किया हुआ पाप बुद्धिको नष्ट कर देता है
ଏହେତୁ ପ୍ରଶଂସିତ ବ୍ରତ ପାଳନକାରୀ ପୁରୁଷ ପାପ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ; କାରଣ ପୁନଃପୁନଃ କରାଯାଇଥିବା ପାପ ପ୍ରଜ୍ଞାକୁ ନାଶ କରେ।
Verse 62
नष्टप्रज्ञ: पापमेव नित्यमारभते नर: । पुण्यं प्रज्ञां वर्धयति क्रियमाणं पुन: पुन:,जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, वह मनुष्य सदा पाप ही करता रहता है। इसी प्रकार बारंबार किया हुआ पुण्य बुद्धिको बढ़ाता है
ଯାହାର ପ୍ରଜ୍ଞା ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଏ, ସେ ନର ସଦା ପାପକାର୍ଯ୍ୟରେ ହିଁ ଲାଗିଥାଏ; ଏବଂ ସେହିପରି ପୁନଃପୁନଃ କରାଯାଇଥିବା ପୁଣ୍ୟ ପ୍ରଜ୍ଞାକୁ ବଢ଼ାଏ।
Verse 63
वृद्धप्रज्ञ: पुण्यमेव नित्यमारभते नर: । पुण्यं कुर्वन् पुण्यकीर्ति: पुण्यं स्थानं सम गच्छति । तस्मात् पुण्यं निषेवेत पुरुष: सुसमाहितः,जिसकी बुद्धि बढ़ जाती है, वह मनुष्य सदा पुण्य ही करता है। इस प्रकार पुण्यकर्मा मनुष्य पुण्य करता हुआ पुण्यलोकको ही जाता है। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह सदा एकाग्रचित्त होकर पुण्यका ही सेवन करे
ଯାହାର ପ୍ରଜ୍ଞା ବୃଦ୍ଧି ପାଇଛି, ସେ ନର ସଦା ପୁଣ୍ୟକାର୍ଯ୍ୟରେ ହିଁ ଲାଗେ। ପୁଣ୍ୟ କରି କରି ସେ ପୁଣ୍ୟକୀର୍ତ୍ତି ଲାଭ କରେ ଏବଂ ପୁଣ୍ୟସ୍ଥାନକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ। ତେଣୁ ମନୁଷ୍ୟ ସୁସମାହିତ ହୋଇ ପୁଣ୍ୟକୁ ହିଁ ନିଷେବନ କରୁ।
Verse 64
असूयको दन्दशूको निष्ठछरो वैरकूच्छठ: । स कृच्छूं महदाप्रोति न चिरात् पापमाचरन्,गुणोंमें दोष देखनेवाला, मर्मपर आघात करने-वाला, निर्दयी, शत्रुता करनेवाला और शठ मनुष्य पापका आचरण करता हुआ शीघ्र ही महान् कष्टको प्राप्त होता है
ଯେ ମନୁଷ୍ୟ ଇର୍ଷ୍ୟାଳୁ, କଟୁ ବାକ୍ୟରେ ଦଂଶ କରେ, ନିଷ୍ଠୁର, ବୈର ପୋଷେ ଏବଂ ଶଠ—ସେ ପାପାଚରଣରେ ଲିପ୍ତ ରହି ଅଚିରେ ମହା କଷ୍ଟକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ।
Verse 65
अनसूयु: कृतप्रज्ञ: शोभनान्याचरन् सदा । न कृच्छूं महदाप्रोति सर्वत्र च विरोचते,दोषदृष्टिसे रहित शुद्ध बुद्धिवाला पुरुष सदा शुभकर्मोका अनुष्ठान करता हुआ महान् सुखको प्राप्त होता है और सर्वत्र उसका सम्मान होता है
ଯେ ମନୁଷ୍ୟ ଦୋଷଦୃଷ୍ଟିରହିତ, ସ୍ଥିରବୁଦ୍ଧି ଏବଂ ସଦା ଶୁଭାଚରଣରତ—ସେ ମହା କଷ୍ଟକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ; ସେ ସର୍ବତ୍ର ଦୀପ୍ତିମାନ ହୋଇ ସମ୍ମାନ ପାଏ।
Verse 66
प्रज्ञामेवागमयति य: प्राज्ञेभ्य:ः स पण्डित: । प्राज्ञो हवाप्य धर्मार्थी शक््नोति सुखमेधितुम्,जो बुद्धिमान् पुरुषोंसे सदबुद्धि प्राप्त करता है, वही पण्डित है; क्योंकि बुद्धिमान् पुरुष ही धर्म और अर्थको प्राप्तककर अनायास ही अपनी उन्नति करनेमें समर्थ होता है
ଯେ ଜ୍ଞାନୀମାନଙ୍କଠାରୁ ପ୍ରଜ୍ଞା ଲାଭ କରେ, ସେଇ ପଣ୍ଡିତ; କାରଣ ପ୍ରାଜ୍ଞ ପୁରୁଷ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥ ସାଧି ଅନାୟାସେ ସୁଖସହ ଉନ୍ନତି କରିପାରେ।
Verse 67
दिवसेनैव तत् कुर्याद् येन रात्रौ सुखं वसेत् अष्टमासेन तत् कुर्याद् येन वर्षा: सुखं वसेत्,दिनभरमें ही वह कार्य कर ले, जिससे रातमें सुखसे रह सके और आठ महीनोंमें वह कार्य कर ले, जिससे वर्षाके चार महीने सुखसे व्यतीत कर सके
ରାତିରେ ସୁଖରେ ରହିବା ପାଇଁ ଦିନେଇ ସେ କାମ କରି ସାରିବା ଉଚିତ; ଏବଂ ବର୍ଷାର ଚାରି ମାସ ସୁଖରେ କଟିବା ପାଇଁ ଆଠ ମାସରେଇ ସେ କାମ ସମାପ୍ତ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 68
पूर्वे वयसि तत् कुर्याद् येन वृद्ध: सुखं वसेत् । यावज्जीवेन तत् कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत्,पहली अवस्थामें वह काम करे, जिससे वृद्धावस्थामें सुखपूर्वक रह सके और जीवनभर वह कार्य करे, जिससे मरनेके बाद भी (परलोकमें) सुखसे रह सके
ବୃଦ୍ଧାବସ୍ଥାରେ ସୁଖରେ ରହିବା ପାଇଁ ପ୍ରାରମ୍ଭିକ ବୟସରେଇ ସେ କାମ କରିବା ଉଚିତ; ଏବଂ ମୃତ୍ୟୁ ପରେ ପରଲୋକରେ ସୁଖରେ ବସିବା ପାଇଁ ସାରା ଜୀବନ ଏମିତି କର୍ମ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 69
जीर्णमन्नं प्रशंसन्ति भार्या च गतयौवनाम् । शूरं विजितसंग्रामं गतपारं तपस्विनम्,सज्जन पुरुष पच जानेपर अन्नकी, (निष्कलंक) यौवन बीत जानेपर स्त्रीकी, संग्राम जीत लेनेपर शूरकी और संसारसागरको पार कर लेनेपर तपस्वीकी प्रशंसा करते हैं
ଲୋକେ ବାସି ଅନ୍ନକୁ, ଯୌବନ ଅତୀତ ଭାର୍ଯ୍ୟାକୁ, ସଂଗ୍ରାମ ଜିତିଥିବା ଶୂରକୁ ଏବଂ ସଂସାର-ସାଗର ପାର ହୋଇଥିବା ତପସ୍ବୀକୁ ହିଁ ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତି।
Verse 70
धनेनाधर्मलब्धेन यच्छिद्रमपिधीयते । असंवृतं तद् भवति ततो<न्यदवदीर्यते,अधर्मसे प्राप्त हुए धनके द्वारा जो दोष छिपाया जाता है, वह तो छिपता नहीं; (परंतु दोष छिपानेके कारण) उससे भिन्न और नया दोष प्रकट हो जाता है
ଅଧର୍ମରେ ଲଭ୍ୟ ଧନ ଦ୍ୱାରା ଯେ ଦୋଷ ଢାକାଯାଏ, ସେ ଢାକାଯାଏ ନାହିଁ; ଉଲ୍ଟେ ତାହାରୁ ଆଉ ଏକ ନୂଆ ଦୋଷ ପ୍ରକାଶ ପାଏ।
Verse 71
गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम् | अथ प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्चतो यम:,अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें करनेवाले शिष्योंके शासक गुरु हैं, दुष्टोंके शासक राजा हैं और छिपे-छिपे पाप करनेवालोंके शासक सूर्यपुत्र यमराज हैं
ଆତ୍ମସଂୟମୀମାନଙ୍କର ଶାସକ ଗୁରୁ, ଦୁଷ୍ଟମାନଙ୍କର ଶାସକ ରାଜା, ଏବଂ ଗୁପ୍ତରେ ପାପ କରୁଥିବାମାନଙ୍କର ଶାସକ ବୈବସ୍ୱତ ଯମ।
Verse 72
ऋषीणां च नदीनां च कुलानां च महात्मनाम् | प्रभवो नाधिगन्तव्यः स्त्रीणां दुश्नरितस्थ च,ऋषि, नदी, वंश एवं महात्माओंका तथा स्त्रियोंके दुश्चरित्रका उत्पत्तिस्थान नहीं जाना जा सकता
ଋଷି, ନଦୀ, କୁଳ ଓ ମହାତ୍ମାମାନଙ୍କର ଉତ୍ପତ୍ତିସ୍ଥାନ ଜଣାଯାଏ ନାହିଁ; ସେପରି ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଦୁଶ୍ଚରିତ୍ରର ମୂଳ ମଧ୍ୟ ନିଶ୍ଚିତ କରାଯାଏ ନାହିଁ।
Verse 73
द्विजातिपूजाभिरतो दाता ज्ञातिषु चार्जवी । क्षत्रिय: शीलभागू राजंश्विरं पालयते महीम्,राजन! ब्राह्मणोंकी सेवा-पूजामें संलग्न रहनेवाला, दाता, कुट॒म्बीजनोंके प्रति कोमलताका बर्ताव करने-वाला और शीलवान् राजा चिरकालतक पृथ्वीका पालन करता है
ରାଜନ୍! ଯେ କ୍ଷତ୍ରିୟ ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ପୂଜା-ସେବାରେ ରତ, ଦାତା, ନିଜ ଜ୍ଞାତିମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ସରଳ ଓ କୋମଳ ବ୍ୟବହାରକାରୀ, ଏବଂ ଶୀଳବାନ—ସେ ରାଜା ଦୀର୍ଘକାଳ ପୃଥିବୀକୁ ପାଳନ କରେ।
Verse 74
सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषास्त्रय: । शूरश्न कृतविद्यश्न यश्व जानाति सेवितुम्,शूर, विद्वान् और सेवाधर्मको जाननेवाले--ये तीन प्रकारके मनुष्य पृथ्वीरूप लतासे सुवर्णरूपी पुष्पका संचय करते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ଏହି ପୃଥିବୀ ସୁବର୍ଣ୍ଣ-ପୁଷ୍ପ ଧାରଣ କରୁଥିବା ଲତା ପରି। ସେହି ସୁବର୍ଣ୍ଣ ପୁଷ୍ପ କେବଳ ତିନି ପ୍ରକାର ପୁରୁଷ ସଂଗ୍ରହ କରନ୍ତି—(୧) ଶୂର, (୨) କୃତବିଦ୍ୟ ଅର୍ଥାତ୍ ଶିକ୍ଷା-ପ୍ରଶିକ୍ଷଣରେ ସିଦ୍ଧ ବିଦ୍ୱାନ, ଏବଂ (୩) ଯେ ସେବାଧର୍ମ ଜାଣେ—ଯଥାବିଧି ସେବା କରିବାକୁ ଜାଣେ।
Verse 75
बुद्धिश्रेष्ठानि कर्माणि बाहुमध्यानि भारत । तानि जड्घाजघन्यानि भारप्रत्यवराणि च,भारत! बुद्धिसे विचारकर किये हुए कर्म श्रेष्ठ होते हैं, बाहुबलसे किये जानेवाले कर्म मध्यम श्रेणीके हैं, जंघासे किये जानेवाले कार्य अधम हैं और भार ढोनेका काम महान् अधम है
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ବୁଦ୍ଧିରେ ବିଚାର କରି କରାଯାଇଥିବା କର୍ମ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ବାହୁବଳରେ କରାଯାଇଥିବା କର୍ମ ମଧ୍ୟମ; ଜଂଘା/ପାଦବଳରେ କରାଯାଇଥିବା କାର୍ଯ୍ୟ ଅଧମ; ଏବଂ କେବଳ ଭାର ବୋହିବା କାମ ସର୍ବାଧିକ ଅଧମ।
Verse 76
दुर्योधनेड5थ शकुनौ मूढे दुःशासने तथा । कर्णे चैश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि,राजन! अब आप दुर्योधन, शकुनि, मूर्ख दुःशासन तथा कर्णपर राज्यका भार रखकर उन्नति कैसे चाहते हैं?
ବିଦୁର କହିଲେ—ରାଜନ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, ଶକୁନି, ମୂଢ ଦୁଃଶାସନ ଏବଂ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ଉପରେ ରାଜ୍ୟ-ଐଶ୍ୱର୍ୟର ଭାର ରଖି ଆପଣ କିପରି ଶ୍ରେୟ ଓ ଉନ୍ନତି ଆଶା କରୁଛନ୍ତି?
Verse 77
सर्वर्गणैरुपेतास्तु पाण्डवा भरतर्षभ | पितृवत् त्वयि वर्तन्ते तेषु वर्तस्व पुत्रवत्
ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ପାଣ୍ଡବମାନେ ସମସ୍ତ ଅନୁଚର ସହିତ ଆପଣଙ୍କ ପ୍ରତି ପିତାଙ୍କ ପରି ଆଚରଣ କରୁଛନ୍ତି; ତେଣୁ ଆପଣ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ପରି ଆଚରଣ କରନ୍ତୁ।
How a ruler should choose policy under anxiety and factional pressure: Vidura argues for dharma-grounded decisions that weigh consequences, restrain impulse, and prevent self-inflicted decline.
Sovereignty is stabilized by pramāṇa (proper measure), sustainable acquisition without harm, disciplined speech, and mastery over internal enemies; without self-control, external victory efforts become counterproductive.
No formal phalaśruti is stated in the provided passage; instead, the chapter embeds pragmatic “results” logic—prosperity follows dharmic conduct and measured policy, while arrogance, uncontrolled senses, and harsh speech produce political deterioration.