Adhyaya 3
Udyoga ParvaAdhyaya 329 Verses

Adhyaya 3

Udyoga-parva Adhyāya 3 — Sātyaki on Inner Disposition, Legitimacy, and Coercive Readiness

Upa-parva: Udyoga Parva — Early Court Debates (Sātyaki’s Ethical-Strategic Discourse)

This chapter is a sustained speech attributed to Sātyaki that links moral psychology to political speech: a person speaks in accordance with the nature of the inner self (ātman/antarātman). He contrasts courageous and ignoble dispositions, using a lineage metaphor to note that the same family can produce both excellence and deficiency, as one tree bears fruitful and fruitless branches. He rejects fault-finding in the addressee’s words but criticizes those who accept or propagate blame against Dharmarāja (Yudhiṣṭhira) in public assembly. The argument then turns to legitimacy: victory in the dice match is framed as secured by expertise and manipulation against an opponent lacking comparable competence, and therefore not a dharma-grounded conquest. He asserts that if the Pāṇḍava had been defeated in a fair contest, the result would be morally defensible; since deceit (nikṛti) is alleged, the moral standing of the outcome collapses. The speech escalates into a strategic posture: if restitution is refused despite counsel from elders (Bhīṣma, Droṇa), coercion is presented as an enforceable remedy, with Sātyaki invoking the combined martial capacity of allies (Arjuna, Kṛṣṇa, Bhīma, the twins, Dhṛṣṭadyumna, Draupadī’s sons, Abhimanyu, and others). The chapter concludes by reframing the ethical calculus: harming declared aggressors is not treated as adharma, while petitioning enemies is depicted as disgraceful; the desired end-state is restoration of the kingdom to the Pāṇḍava, or mutual destruction in battle as the terminal alternative.

Chapter Arc: सात्यकि सभा में वाणी का धनुष चढ़ाते हैं—मनुष्य जैसा भीतर से होता है, वैसा ही बोलता है; और कौरवों की बातों में भीतर का भय व कपट झलकता है। → वे शूर और कापुरुष—दोनों प्रकार के पुरुषों का भेद रखकर कौरव-पक्ष की नीति पर चोट करते हैं: वनवास-काल पूर्ण कर लौटे पाण्डव न्याय से पैतृक राज्य के अधिकारी हैं, फिर भी भीष्म-द्रोण-विदुर के समझाने पर भी कौरव देने को तैयार नहीं। याचना को अपयश बताकर वे युद्ध की अनिवार्यता की ओर सभा को धकेलते हैं। → सात्यकि का गर्जन: यदि युधिष्ठिर के चरणों में गिरकर संधि न की गई तो कौरव अपने मंत्रियों सहित यमलोक को जाएंगे; और कौरव-सेना में कौन है जो जीवित रहने की इच्छा रखते हुए अर्जुन-गाण्डीव, चक्रधारी श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न आदि का सामना कर सके? → वे निष्कर्ष रखते हैं कि आततायी शत्रुओं के सामने याचना अधर्म और अपयश है; अतः शत्रु-वध में पाप नहीं। लक्ष्य स्पष्ट: शकुनि सहित दुर्योधन और कर्ण का वध कर युधिष्ठिर का राज्याभिषेक। → सभा के भीतर संधि की अंतिम संभावना सिकुड़ती है—अब प्रश्न यह रह जाता है कि कौरव झुकेंगे या युद्ध का शंख अनिवार्य रूप से बजेगा।

Shlokas

Verse 1

अपन बछ। है २ >> तृतीयो<ध्याय: सात्यकिके वीरोचित उद्गार सात्यकिर॒ुवाच यादृश: पुरुषस्यात्मा तादृशं सम्प्रभाषते । यथारूपो<न्तरात्मा ते तथारूप॑ प्रभाषसे,सात्यकिने कहा--बलरामजी! मनुष्यका जैसा हृदय होता है, वैसी ही बात उसके मुखसे निकलती है। आपका भी जैसा अन्तःकरण है, वैसा ही आप भाषण दे रहे हैं

ସାତ୍ୟକି କହିଲେ—ମଣିଷର ଅନ୍ତରାତ୍ମା ଯେପରି, ତାହାର କଥା ମଧ୍ୟ ସେପରି ହୁଏ। ଅନ୍ତର୍ମନର ରୂପ ଯେପରି, ବାଣୀ ମଧ୍ୟ ସେହି ରୂପକୁ ଅନୁସରେ; ଆପଣଙ୍କ କଥା ମଧ୍ୟ ଆପଣଙ୍କ ଅନ୍ତର୍ଭାବକୁ ଦର୍ଶାଏ।

Verse 2

सन्ति वै पुरुषा: शूरा: सन्ति कापुरुषास्तथा । उभावेतौ दृढौ पक्षौ दृश्येते पुरुषान्‌ प्रति

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ନିଶ୍ଚୟ କିଛି ପୁରୁଷ ଶୂର ଅଛନ୍ତି, ଏବଂ କିଛି କାପୁରୁଷ (କାୟର) ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି। ମଣିଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏହି ଦୁଇ ଦୃଢ଼ ପ୍ରବୃତ୍ତି—ଶୌର୍ୟ ଓ କାୟରତା—ଦେଖାଯାଏ।

Verse 3

संसारमें शूरवीर पुरुष भी हैं और कापुरुष (कायर) भी। पुरुषोंमें ये दोनों पक्ष निश्चितरूपसे देखे जाते हैं ।। एकस्मिन्नेव जायेते कुले क्लीबमहाबलौ । फलाफलवती शाखे यथैकस्मिन्‌ वनस्पतौ,जैसे एक ही वृक्षमें कोई शाखा फलवती होती है और कोई फलहीन। इसी प्रकार एक ही कुलमें दो प्रकारकी संतान उत्पन्न होती है, एक नपुंसक और दूसरी महान्‌ बलशाली इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि सात्यकिक्रोधवाक्ये तृतीयो<5ध्याय:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜଗତରେ ଏକେଇ କୁଳରେ ମଧ୍ୟ କାୟର ଓ ଶୂର—ଦୁହେଁ ଜନ୍ମ ନେଇଥାନ୍ତି। ଯେପରି ଏକେଇ ଗଛରେ ଗୋଟିଏ ଶାଖା ଫଳବତୀ ଓ ଅନ୍ୟ ଶାଖା ଫଳହୀନ ଥାଏ; ସେପରି ଏକେଇ ବଂଶରେ ଦୁଇ ପ୍ରକାର ସନ୍ତାନ ହୁଏ—ଏକ ଦୁର୍ବଳଚିତ୍ତ, ଅନ୍ୟ ମହାବଳଶାଳୀ।

Verse 4

नाभ्यसूयामि ते वाक्यं ब्रुवतो लाज़लध्वज | ये तु शृण्वन्ति ते वाक्‍्यं तानसूयामि माधव,अपनी ध्वजामें हलका चिह्न धारण करनेवाले मधुकुलरत्न! आप जो कुछ कह रहे हैं, उसमें मैं दोष नहीं निकाल रहा हूँ, जो लोग आपकी बातें चुप-चाप सुन रहे हैं, उन्हींको मैं दोषी मानता हूँ

ଲାଙ୍ଗଳଧ୍ୱଜଧାରୀ ମଧୁକୁଳରତ୍ନ! ଆପଣ କହୁଥିବା କଥାରେ ମୁଁ ଦୋଷ ଖୋଜୁନାହିଁ; କିନ୍ତୁ ଯେମାନେ ନିରବରେ ଆପଣଙ୍କ କଥା ଶୁଣୁଛନ୍ତି, ଦୋଷ ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ ଦେଉଛି, ହେ ମାଧବ।

Verse 5

कथं हि धर्मराजस्य दोषमल्पमपि ब्रुवन्‌ । लभते परिषन्मध्ये व्याहर्तुमकुतो भय:,भला, कोई भी मनुष्य भरी सभामें निर्भय होकर धर्मराज युधिष्ठिरपर थोड़ा-सा भी दोषारोपण करे, तो वह कैसे बोलनेका अवसर पा सकता है?

ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଉପରେ ଯଦି କେହି ଅତି ସାନ ଦୋଷ ମଧ୍ୟ କହେ, ତେବେ ସେ ଭୟହୀନ ହୋଇ ସଭାମଧ୍ୟରେ କିପରି କଥା କହିବାର ସୁଯୋଗ ପାଇବ?

Verse 6

समाहूय महात्मानं जितवन्तो$क्षकोविदा: | अनक्षकज्ञं यथाश्रद्धं तेषु धर्मजय: कुत:,महात्मा युधिष्ठिर जूआ खेलना नहीं जानते थे, तो भी जूएके खेलमें निपुण धूर्तोने उन्हें अपने घर बुलाकर अपने विश्वासके अनुसार हराया अथवा जीता है। यह उनकी धर्मपूर्वक विजय कैसे कही जा सकती है?

ମହାତ୍ମା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦ୍ୟୁତକ୍ରୀଡାରେ ପାରଙ୍ଗତ ନଥିଲେ; ତଥାପି ଦ୍ୟୁତରେ ନିପୁଣ ଧୂର୍ତ୍ତମାନେ ତାଙ୍କୁ ନିଜ ଘରକୁ ଡାକି, ନିଜ ଚାଳ ଅନୁସାରେ ତାଙ୍କୁ ଜିତିଲେ। ଏପରି ଜୟକୁ ଧର୍ମଜୟ କିପରି କୁହାଯିବ?

Verse 7

यदि कुन्तीसुतं गेहे क्रीडन्तं भ्रातृभि: सह । अभिगम्य जयेयुस्ते तत्‌ तेषां धर्मतो भवेत्‌ । समाहूय तु राजानन क्षत्रधर्मरतं सदा,यदि भाइयोंसहित कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अपने घरपर जूआ खेलते होते और ये कौरव वहाँ जाकर उन्हें हरा देते, तो यह उनकी धर्मपूर्वक विजय कही जा सकती थी। परंतु उन्होंने सदा क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाले राजा युधिष्ठिरको बुलाकर छल और कपटसे उन्हें पराजित किया है। क्या यही उनका परम कल्याणमय कर्म कहा जा सकता है? ये राजा युधिष्ठिर अपनी वनवासविषयक प्रतिज्ञा तो पूर्ण ही कर चुके हैं, अब किस लिये उनके आगे मस्तक झुकायें--क्यों प्रणाम अथवा विनय करें?

ଯଦି କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନିଜ ଘରେ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ଦ୍ୟୁତକ୍ରୀଡା କରୁଥାନ୍ତେ ଏବଂ ସେମାନେ ସେଠାକୁ ଯାଇ ତାଙ୍କୁ ହରାଇଥାନ୍ତେ, ତେବେ ସେ ଜୟକୁ ସେମାନଙ୍କର ଧର୍ମସମ୍ମତ ଜୟ କୁହାଯାଇପାରିତ। କିନ୍ତୁ ସେମାନେ ସଦା କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମରେ ରତ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଡାକି ଆଣି, ଛଳ ଓ କପଟରେ ତାଙ୍କୁ ଜିତିଲେ।

Verse 8

निकृत्या जितवन्तस्ते कि नु तेषां परं शुभम्‌ । कथं प्रणिपतेच्चायमिह कृत्वा पणं परम्‌,यदि भाइयोंसहित कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अपने घरपर जूआ खेलते होते और ये कौरव वहाँ जाकर उन्हें हरा देते, तो यह उनकी धर्मपूर्वक विजय कही जा सकती थी। परंतु उन्होंने सदा क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाले राजा युधिष्ठिरको बुलाकर छल और कपटसे उन्हें पराजित किया है। क्या यही उनका परम कल्याणमय कर्म कहा जा सकता है? ये राजा युधिष्ठिर अपनी वनवासविषयक प्रतिज्ञा तो पूर्ण ही कर चुके हैं, अब किस लिये उनके आगे मस्तक झुकायें--क्यों प्रणाम अथवा विनय करें?

ସେମାନେ ନିକୃତିରେ ଜିତିଛନ୍ତି—ତେବେ ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ପରମ ଶୁଭ କ’ଣ? ଏହି ପୁରୁଷ ଏଠାରେ, ସର୍ବୋଚ୍ଚ ପଣ ପୂରଣ କରି ସାରି, କିପରି ମସ୍ତକ ନମାଇବ? ଯଦି ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନିଜ ଘରେ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ଧର୍ମବଦ୍ଧ ଭାବେ ଖେଳି ସେଠାରେ ହାରିଥାନ୍ତେ, ତେବେ ସେ ଜୟ ଧର୍ମସମ୍ମତ କୁହାଯାଇପାରିତ; କିନ୍ତୁ ତାଙ୍କୁ ଡାକି ଆଣି କପଟରେ ଜିତିଲେ। ଏବେ ବନବାସ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ପୂର୍ଣ୍ଣ—ତେଣୁ କାହିଁକି ପ୍ରଣାମ, କାହିଁକି ବିନୟ?

Verse 9

वनवासाद्‌ विमुक्तस्तु प्राप्त: पैतामहं पदम्‌ । यद्ययं पापवित्तानि कामयेत युधिषछ्िर:

ବନବାସରୁ ମୁକ୍ତ ହୋଇ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପୈତାମହ ପଦ—ରାଜ୍ୟାଧିକାର—ପ୍ରାପ୍ତ କରିଛନ୍ତି। ଯଦି ଏବେ ସେ ପାପବିତ୍ତକୁ କାମନା କରନ୍ତି, ତେବେ ତାହା ଧର୍ମରୁ ଭୟଙ୍କର ପତନ ହେବ।

Verse 10

एवमप्ययमत्यन्तं परान्‌ नाहति याचितुम्‌ । वनवासके बन्धनसे मुक्त होकर अब ये अपने बाप-दादोंके राज्यको पानेके न्यायतः अधिकारी हो गये हैं। यदि युधिष्ठिर अन्यायसे भी अपना धन, अपना राज्य लेनेकी इच्छा करें, तो भी अत्यन्त दीन बनकर शत्रुओंके सामने हाथ फैलाने या भीख माँगनेके योग्य नहीं हैं।। कथं च धर्मयुक्तास्ते न च राज्यं जिहीर्षव:

ତଥାପି ସେ ପରଙ୍କ ନିକଟେ ଯାଚନା କରିବାକୁ ସର୍ବଥା ସମର୍ଥ ନୁହେଁ। ବନବାସର ବନ୍ଧନରୁ ମୁକ୍ତ ହୋଇ ସେମାନେ ନ୍ୟାୟତଃ ପିତା-ପୈତାମହଙ୍କ ରାଜ୍ୟର ଅଧିକାରୀ ହୋଇଛନ୍ତି। ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଯଦି ଅନ୍ୟାୟ ଉପାୟରେ ମଧ୍ୟ ନିଜ ଧନ-ରାଜ୍ୟ ଫେରାଇ ନେବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ତଥାପି ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ହାତ ପସାରି ଭିକ୍ଷା ମାଗିବା ସେମାନଙ୍କୁ ଶୋଭା ଦିଏ ନାହିଁ। ଏବଂ ଯେମାନେ ଧର୍ମଯୁକ୍ତ, ସେମାନେ ନିଜ ରାଜ୍ୟକୁ କାହିଁକି ନ ଚାହିବେ?

Verse 11

अनुनीता हि भीष्मेण द्रोणेन विदुरेण च

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ନିଶ୍ଚୟ ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ ଓ ବିଦୁରଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୁନଃପୁନଃ ଅନୁନୟ-ବିନୟ ଓ ଉପଦେଶ ପାଇ, ଧର୍ମସମ୍ମତ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଓ ସଂଯମର ପଥେ ଚାଲିବାକୁ ପ୍ରେରିତ ହୋଇଥିଲା।

Verse 12

अहं तु ताञ्छितैर्बाणैरनुनीय रणे बलात्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କିନ୍ତୁ ମୁଁ ଯୁଦ୍ଧରେ ବଳପୂର୍ବକ, ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାଣଦ୍ୱାରା ସେମାନଙ୍କୁ ବଶ କରିଦେବି।

Verse 13

पादयो: पातयिष्यामि कौन्तेयस्य महात्मन: । मैं तो रणभूमिमें पैने बाणोंसे उन्हें बलपूर्वक मनाकर महात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरके चरणोंमें गिरा दूँगा ।। अथ ते न व्यवस्यन्ति प्रणिपाताय धीमत:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ ମହାତ୍ମା କୌନ୍ତେୟ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଦଦ୍ୱୟରେ ପତିତ କରିଦେବି; କିନ୍ତୁ ସେଇ ଧୀମାନ୍‌ମାନେ ପ୍ରଣିପାତ କରିବାକୁ ନିଶ୍ଚୟ କରୁନାହାନ୍ତି।

Verse 14

गमिष्यन्ति सहामात्या यमस्य सदन प्रति । यदि वे परम बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिरके चरणोंमें गिरनेका निश्चय नहीं करेंगे, तो अपने मन्त्रियोंसहित उन्हें यमलोककी यात्रा करनी पड़ेगी || १३ है ।। न हि ते युयुधानस्य संरब्धस्य युयुत्सत:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେମାନେ ନିଜ ଅମାତ୍ୟମାନଙ୍କ ସହିତ ଯମଙ୍କ ସଦନ ପ୍ରତି ଯିବେ; କାରଣ କ୍ରୋଧାନ୍ୱିତ ଓ ଯୁଦ୍ଧୋତ୍ସୁକ ଯୁୟୁଧାନଙ୍କୁ ସେମାନେ ପ୍ରତିରୋଧ କରିପାରିବେ ନାହିଁ।

Verse 15

को हि गाण्डीवधन्वानं कश्च चक्रायुधं युधि,को जिजीविषुरासादेद्‌ धृष्टद्युम्नं च पार्षतम्‌ कौरवदलमें ऐसा कौन है, जो जीवनकी इच्छा रखते हुए भी युद्धभूमिमें गाण्डीवधन्वा अर्जुन, चक्रधारी भगवान्‌ श्रीकृष्ण, क्रोधमें भरे हुए मुझ सात्यकि, दुर्धर्ष वीर भीमसेन, यम और कालके समान तेजस्वी दृढ़ धनुर्धर नकुल-सहदेव, यम और कालको भी अपने तेजसे तिरस्कृत करनेवाले वीरवर विराट और ट्रुपदका तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्मका भी सामना कर सकता है?

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜୀବିତ ରହିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଥିବା କିଏ ଯୁଦ୍ଧରେ ଗାଣ୍ଡୀବଧନ୍ୱା ଅର୍ଜୁନ, ଚକ୍ରାୟୁଧ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଏବଂ ପାର୍ଷତ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କୁ ସମ୍ମୁଖୀନ କରିବାକୁ ସାହସ କରିବ?

Verse 16

मां चापि विषदह्ेेत्‌ क्रुद्धं कश्न भीम॑ं दुरासदम्‌ । यमौ च दृढ्धन्वानौ यमकालोपमसझ्युती । विराटद्रुपदौ वीरौ यमकालोपमद्युती

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏହା ଦେଖି ମୋତେ ମଧ୍ୟ ବିଷାଦ ହୋଇପାରେ; କିନ୍ତୁ କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳିତ ଭୀମ ସେଠାରେ ଅଛନ୍ତି—ତାଙ୍କୁ ଜିତିବା ଦୁର୍ଲଭ। ଏବଂ ଦୃଢ଼ଧନୁ ଯମଜ (ନକୁଳ-ସହଦେବ) ଅଛନ୍ତି; ତାଙ୍କର ତେଜ ଯମ ଓ କାଳ ସମାନ। ତଥା ବୀର ବିରାଟ ଓ ଦ୍ରୁପଦ ଅଛନ୍ତି; ତାଙ୍କର ଦ୍ୟୁତି ଯମ-କାଳ ସମାନ।

Verse 17

पज्चैतान्‌ पाण्डवेयांस्तु द्रौपद्या: कीर्तिवर्धनान्‌

ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ ଗର୍ଭଜ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଏହି ପାଞ୍ଚ ପୁତ୍ର ତାଙ୍କ କୀର୍ତ୍ତି ବଢ଼ାଇଥିଲେ।

Verse 18

समप्रमाणान्‌ पाण्डूनां समवीर्यान्‌ मदोत्कटान्‌ | सौभद्रंं च महेष्वासममरैरपि दुःसहम्‌

ସେମାନେ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ—ଦେହପ୍ରମାଣରେ ସମାନ, ପରାକ୍ରମରେ ସମାନ, ଏବଂ ଗର୍ବୋନ୍ମତ୍ତ ଉଗ୍ର। ଏବଂ ସୌଭଦ୍ର (ଅଭିମନ୍ୟୁ) ନାମକ ମହାଧନୁର୍ଧରକୁ ମଧ୍ୟ—ଯେ ଅମରମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଦୁଃସହ।

Verse 19

गदप्रद्मुम्नसाम्बांश्न कालसूर्यानलोपमान्‌ । द्रौपदीकी कीर्तिको बढ़ानेवाले ये पाँचों पाण्डव-कुमार अपने पिताके समान ही डील- डौलवाले, वैसे ही पराक्रमी तथा उन्हींके समान रणोन्मत्त शूरवीर हैं। महान्‌ धनुर्धर सुभद्राकुमार अभिमन्युका वेग तो देवताओंके लिये भी दुःसह है, गद, प्रद्युम्म और साम्ब-- ये काल, सूर्य और अग्निके समान अजेय हैं--इन सबका सामना कौन कर सकता है? | १७-१८ ह || ते वयं धृतराष्ट्रस्य पुत्र शकुनिना सह

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଗଦ, ପ୍ରଦ୍ୟୁମ୍ନ ଓ ସାମ୍ବ—କାଳ, ସୂର୍ଯ୍ୟ ଓ ଅଗ୍ନି ସମାନ; ଅଜେୟ। ଏବଂ ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ କୀର୍ତ୍ତି ବଢ଼ାଇଥିବା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସେହି ପାଞ୍ଚ ପୁତ୍ର—ପିତୃସମ ଦେହଯଷ୍ଟି, ପରାକ୍ରମରେ ସମ, ଏବଂ ରଣୋନ୍ମତ୍ତ ଉଗ୍ର ବୀର। ତା’ପରେ ସୌଭଦ୍ର, ମହାଧନୁର୍ଧର ଅଭିମନ୍ୟୁ—ଯାହାର ବେଗ ଓ ତେଜ ଦେବମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଦୁଃସହ। ଏ ସମସ୍ତଙ୍କ ସାମ୍ନା କିଏ କରିପାରିବ? ତଥାପି ଆମେ—ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ—ଶକୁନି ସହିତ ଦଣ୍ଡାୟମାନ।

Verse 20

नाधर्मो विद्यते कश्चिच्छबत्रूनू हत्वा5डततायिन:

ଆତତାୟୀ—ଯେ ପ୍ରଥମେ ଆକ୍ରମଣ କରି ପ୍ରାଣ ଓ ଧର୍ମକୁ ସଙ୍କଟରେ ପକାଏ—ଏମିତି ଶତ୍ରୁକୁ ବଧ କରିବାରେ କୌଣସି ଅଧର୍ମ ନାହିଁ।

Verse 21

हद्गतस्तस्य य: कामस्तं कुरुध्वमतन्द्रिता:,अतः पाए्डुपुत्र युधिष्ठिरके मनमें जो अभिलाषा है, उसीकी आपलोग आलस्य छोड़कर सिद्धि करें। धृतराष्ट्र राज्य लौटा दें और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर उसे ग्रहण करें। अब पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको राज्य मिल जाना चाहिये, अन्यथा समस्त कौरव युद्धमें मारे जाकर रणभूमिमें सदाके लिये सो जायँगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାହାର ହୃଦୟରେ ଯେ ଇଚ୍ଛା ଅଛି, ତାହାକୁ ଅବହେଳା ନ କରି ପୂରଣ କର। ତେଣୁ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ମନର ଅଭିଲାଷାକୁ ଆଳସ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରି ସିଦ୍ଧ କର। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ରାଜ୍ୟ ଫେରାଇ ଦିଅନ୍ତୁ, ଏବଂ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ତାହା ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ। ଏବେ ପାଣ୍ଡୁଙ୍କ ପ୍ରିୟ ପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ରାଜ୍ୟ ମିଳିବା ନ୍ୟାୟ; ନଚେତ୍ ସମସ୍ତ କୌରବ ଯୁଦ୍ଧରେ ନିହତ ହୋଇ ରଣଭୂମିରେ ସଦାକାଳ ପଡ଼ି ରହିବେ।

Verse 22

निसृष्टं धृतराष्ट्रेण राज्यं प्राप्रोतु पाण्डव: । अद्य पाण्डुसुतो राज्यं लभतां वा युधिष्ठिर:,अतः पाए्डुपुत्र युधिष्ठिरके मनमें जो अभिलाषा है, उसीकी आपलोग आलस्य छोड़कर सिद्धि करें। धृतराष्ट्र राज्य लौटा दें और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर उसे ग्रहण करें। अब पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको राज्य मिल जाना चाहिये, अन्यथा समस्त कौरव युद्धमें मारे जाकर रणभूमिमें सदाके लिये सो जायँगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଯେ ରାଜ୍ୟ ଛାଡ଼ି (ଫେରାଇ) ଦେଇଛନ୍ତି, ସେହି ରାଜ୍ୟ ପାଣ୍ଡବ ପାଉନ୍ତୁ। ଆଜିହିଁ ପାଣ୍ଡୁସୁତ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ରାଜ୍ୟାଧିକାର ଲଭନ୍ତୁ। ଏହିଏ ନ୍ୟାୟ—ଯଥାଧିକାରୀକୁ ତାଙ୍କ ଯଥୋଚିତ ଭାଗରେ ଧର୍ମପୂର୍ବକ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରିବା; ନଚେତ୍ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଜିନିଷ ଫେରାଇ ଦେବାକୁ ଅସ୍ୱୀକାର କୌରବମାନଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧବିନାଶ ଦିଗକୁ ଠେଲିଦେବ।

Verse 23

निहता वा रणे सर्वे स्वप्स्यन्ति वसुधातले,अतः पाए्डुपुत्र युधिष्ठिरके मनमें जो अभिलाषा है, उसीकी आपलोग आलस्य छोड़कर सिद्धि करें। धृतराष्ट्र राज्य लौटा दें और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर उसे ग्रहण करें। अब पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको राज्य मिल जाना चाहिये, अन्यथा समस्त कौरव युद्धमें मारे जाकर रणभूमिमें सदाके लिये सो जायँगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯଦି ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଯୁଦ୍ଧରେ ନିହତ ହୁଅନ୍ତି, ତେବେ ପୃଥିବୀତଳେ ଶୟନ କରିବେ। ତେଣୁ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବିଷୟରେ ତୁମ ମନରେ ଯେ କୌଣସି ଅଭିଲାଷା ଅଛି, ଆଳସ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରି ତାହା ପୂରଣ କର। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ରାଜ୍ୟ ଫେରାଇ ଦିଅନ୍ତୁ, ଏବଂ ପାଣ୍ଡୁସୁତ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ତାହା ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ। ଏବେ ପାଣ୍ଡୁବଂଶର ହର୍ଷ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ରାଜ୍ୟ ମିଳିବା ଉଚିତ; ନଚେତ୍ ସମସ୍ତ କୌରବ ଯୁଦ୍ଧରେ ନିହତ ହୋଇ ରଣଭୂମିରେ ସଦାକାଳ ପଡ଼ି ରହିବେ।

Verse 106

निवृत्तवासान्‌ कौन्तेयान्‌ य आहुर्विदिता इति | कुन्तीके पुत्र वनवासकी अवधि पूरी करके जब लौटे हैं, तब कौरव यह कहने लगे हैं कि हमने तो इन्हें समय पूर्ण होनेसे पहले ही पहचान लिया है। ऐसी दशामें यह कैसे कहा जाय कि कौरव धर्ममें तत्पर हैं और पाण्डवोंके राज्यका अपहरण नहीं करना चाहते हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରମାନେ ବନବାସର ଅବଧି ପୂରଣ କରି ଫେରିଆସିବା ପରେ କୌରବମାନେ କହିଲେ, “ସମୟ ସମାପ୍ତ ହେବା ପୂର୍ବରୁ ଆମେ ସେମାନଙ୍କୁ ଚିହ୍ନି ନେଇଥିଲୁ।” ଏପରି ଅବସ୍ଥାରେ କୌରବମାନେ ଧର୍ମପରାୟଣ ଓ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ରାଜ୍ୟ ଅପହରଣ କରିବାକୁ ଚାହାନ୍ତି ନାହିଁ—ଏହା କିପରି କୁହାଯିବ?

Verse 116

न व्यवस्यन्ति पाण्डूनां प्रदातुं पैतृक वसु । वे भीष्म, द्रोण और विदुरके बहुत अनुनय-विनय करनेपर भी पाण्डवोंको उनका पैतृक धन वापस देनेका निश्चय अथवा प्रयास नहीं कर रहे हैं

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେମାନେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପୈତୃକ ଧନ ଫେରାଇ ଦେବାକୁ ନିଷ୍ପତ୍ତି କରୁନାହାନ୍ତି। ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ ଓ ବିଦୁରଙ୍କ ଅନେକ ଅନୁନୟ-ବିନୟ ଓ ସାନ୍ତ୍ୱନାମୟ ଉପଦେଶ ସତ୍ତ୍ୱେ ସେମାନେ ନ ନିଷ୍ପତ୍ତି ନେଉଛନ୍ତି, ନ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛନ୍ତି—ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଅଧିକାର ଫେରାଇ ଦେବାକୁ; ଏହି ନ୍ୟାୟବିମୁଖତା ହିଁ ରାଜ୍ୟକୁ ସଂଘର୍ଷ ଦିଗକୁ ନେଇଯାଏ।

Verse 146

वेगं समर्था: संसोढुं वज़स्येव महीधरा: । जैसे बड़े-बड़े पर्वत भी वज्गजका वेग सहन करनेमें समर्थ नहीं हैं, उसी प्रकार युद्धकी इच्छा रखनेवाले और क्रोधमें भरे हुए मुझ सात्यकिके प्रहार-वेगको सहन करनेकी सामर्थ्य उनमेंसे किसीमें भी नहीं है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯେପରି ବଡ଼ ବଡ଼ ପର୍ବତମାନେ ମଧ୍ୟ ବଜ୍ରର ବେଗ ସହି ପାରନ୍ତି ନାହିଁ, ସେପରି ଯୁଦ୍ଧେଚ୍ଛାରେ ଓ କ୍ରୋଧରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିବା ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କେହି ମଧ୍ୟ ମୋ—ସାତ୍ୟକିର—ପ୍ରହାରବେଗ ସହିବାକୁ ସମର୍ଥ ନୁହେଁ।

Verse 166

को जिजीविषुरासादेद्‌ धृष्टद्युम्नं च पार्षतम्‌ कौरवदलमें ऐसा कौन है, जो जीवनकी इच्छा रखते हुए भी युद्धभूमिमें गाण्डीवधन्वा अर्जुन, चक्रधारी भगवान्‌ श्रीकृष्ण, क्रोधमें भरे हुए मुझ सात्यकि, दुर्धर्ष वीर भीमसेन, यम और कालके समान तेजस्वी दृढ़ धनुर्धर नकुल-सहदेव, यम और कालको भी अपने तेजसे तिरस्कृत करनेवाले वीरवर विराट और ट्रुपदका तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्मका भी सामना कर सकता है?

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଜୀବନ ଚାହୁଁଥିବା କୌରବଦଳରେ ଏମିତି କିଏ ଅଛି, ଯେ ପୃଷତପୁତ୍ର ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କୁ ସମ୍ମୁଖୀନ କରିବାକୁ ସାହସ କରିବ? ରଣଭୂମିରେ ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀ ଅର୍ଜୁନ, ଚକ୍ରଧାରୀ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ, କ୍ରୋଧରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ମୁଁ ସାତ୍ୟକି, ଦୁର୍ଧର୍ଷ ବୀର ଭୀମସେନ, ଯମ-କାଳ ସମ ତେଜସ୍ୱୀ ଦୃଢ଼ ଧନୁର୍ଧର ନକୁଳ-ସହଦେବ, ଏବଂ ନିଜ ତେଜରେ ଯମ-କାଳକୁ ମଧ୍ୟ ତିରସ୍କୃତ କରୁଥିବା ବୀର ବିରାଟ ଓ ଦ୍ରୁପଦ—ଏମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କୁ କିଏ ମୁକାବିଲା କରିପାରିବ?

Verse 196

कर्ण चैव निहत्याजावभिषेक्ष्याम पाण्डवम्‌ | हमलोग शकुनिसहित धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको तथा कर्णको भी युद्धमें मारकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका राज्याभिषेक करेंगे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯୁଦ୍ଧରେ କର୍ଣ୍ଣକୁ ନିହତ କରି ଆମେ ପାଣ୍ଡବଙ୍କୁ ଅଭିଷେକ କରିବୁ। ଶକୁନି ସହିତ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ମଧ୍ୟ ଏବଂ କର୍ଣ୍ଣକୁ ମଧ୍ୟ ରଣରେ ନିପାତ କରି, ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସିଂହାସନରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରିବୁ।

Verse 203

अधर्म्यमयशस्यं च शात्रवाणां प्रयाचनम्‌ । आततायी शत्रुओंका वध करनेमें कोई पाप नहीं शत्रुओंके सामने याचना करना ही अधर्म और अपयशकी बात है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଯାଚନା କରିବା ଅଧର୍ମ ଓ ଅପୟଶ। ଯଦି ଶତ୍ରୁ ‘ଆତତାୟୀ’—ନିର୍ଦୟ ଆକ୍ରମଣକାରୀ—ହୁଏ, ତେବେ ତାହାର ବଧରେ ପାପ ନାହିଁ; ପାପ ହେଉଛି ତାଙ୍କ ଆଗରେ ମିନତି କରିବା—ସେଇ ଅଧର୍ମ ଓ ଅପମାନ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether to treat a formally concluded but allegedly manipulated contest (the dice game) as binding, or to prioritize substantive justice—restoring rightful sovereignty—even if that requires coercive action after failed counsel and negotiation.

Speech and judgment are presented as expressions of inner disposition; ethical evaluation must examine the integrity of means. A public claim gains authority when grounded in fairness and communal standards of dharma rather than in technical victory alone.

No explicit phalaśruti is stated. The chapter functions as justificatory meta-discourse: it records the rationale by which later actions are framed as dharma-consistent within the epic’s broader moral accounting.