Adhyaya 29
Udyoga ParvaAdhyaya 2950 Verses

Adhyaya 29

अध्याय २९ — वासुदेव–संजय संवादः (Karma, Varṇa-Dharma, and the Ethics of Governance)

Upa-parva: Sañjaya–Vāsudeva Saṃvāda (Udyoga Parva: Ethical Counsel on Karma, Varṇa-Dharma, and Court Failure)

Krishna addresses Saṃjaya with a stated wish for the Pāṇḍavas’ non-destruction and welfare, while also expressing regard for Dhṛtarāṣṭra’s prosperity—framing his stance as peace-oriented yet principled. He argues that true śama (conciliation) is difficult when the Kuru side is driven by acquisitiveness, and questions Saṃjaya’s role if he withholds dharmic counsel in service of partisan court interests. The chapter advances a karma-centered doctrine: disciplined action produces tangible results in the world, illustrated through cosmic agents (sun, moon, wind, fire, earth, waters) whose constancy is portrayed as ‘work’ sustaining order. Krishna then enumerates varṇa-dharma: the Brāhmaṇa’s learning, sacrifice, giving, teaching; the Kṣatriya’s protection, lawful rule, sacrifice; the Vaiśya’s agriculture, trade, wealth stewardship; and the Śūdra’s service and diligence. He critiques predatory appropriation (theft by stealth or force) as blameworthy, recalls the Kuru court’s earlier failure to restrain the Draupadī humiliation, and frames restitution of the Pāṇḍavas’ share as ethically primary. Metaphors of trees, forest, and tigers depict mutual dependence between rulers and warrior-protectors, urging Dhṛtarāṣṭra to act appropriately: accept peace if possible, and recognize that continued injustice invites destructive consequences.

Chapter Arc: सभा के मध्य संजय को विदा करते हुए युधिष्ठिर धर्म और मर्यादा के साथ दूत-कार्य का आरम्भ कराते हैं—“अनुज्ञातः संजय स्वस्ति गच्छ”। → युधिष्ठिर संजय को विस्तृत संदेश सौंपते हैं: कृष्ण, भीम, अर्जुन, माद्रीसुत (नकुल/सहदेव), सात्यकि, चेकितान आदि का कुशल-समाचार; ब्राह्मण, तपस्वी, भिक्षु, वनवासी ऋषियों का अभिवादन; भीष्म जैसे कुरुवृद्धों के चरणों में निवेदन; और कुरु-युवाओं, पुत्र-पौत्रों, भ्राताओं तथा विविध दिशाओं के शूरवीरों का हाल पूछने की आज्ञा। → युधिष्ठिर का कठोरतम संदेश दुर्योधन के लिए उभरता है—उसकी देह-हृदय को जलाने वाली ‘कामना’ (कुरुओं को निष्पत्न करने की लालसा) को लक्ष्य कर चेतावनी: इस हठ की कोई युक्ति नहीं; या तो न्यायोचित अंश दे, या युद्ध के लिए प्रस्तुत हो। → संजय को स्पष्ट निर्देश मिलते हैं कि वह सबके प्रति शिष्टाचार निभाते हुए भीष्म-सभा और धृतराष्ट्र-दुर्योधन तक पांडवों का धर्मयुक्त, पर अडिग, पक्ष पहुँचा दे। → संजय हस्तिनापुर में यह संदेश सुनाएगा—पर क्या धृतराष्ट्र और दुर्योधन इसे स्वीकार करेंगे, या हठ युद्ध को अवश्यंभावी बना देगा?

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५९ “लोक हैं।] - इस प्रकार यद्यपि गृहस्थाश्रममें रहने और संन्यास लेनेका भी शास्त्रद्वारा ही विधान किया गया है, तथापि अन्य आश्रमोंमें प्राप्त होनेवाले ज्ञानकी उपलब्धि तो गृहस्थाश्रममें भी हो सकती है, परंतु गृहस्थ-साध्य यज्ञादि पुण्यकर्म आश्रमान्तरोंमें नहीं हो सकते; अत: सम्पूर्ण धर्मोकी सिद्धिका स्थान गृहस्थाश्रम ही है। त्रिशो5ध्याय: संजयकी विदाई तथा युधिषिरका संदेश संजय उवाच आमन्त्रये त्वां नरदेवदेव गच्छाम्यहं पाण्डव स्वस्ति तेडस्तु । कच्चिन्न वाचा वृजिनं हि किंचि- दुच्चारितं मे ममनसो5भिषज्भात्‌,संजयने कहा--नरदेवदेव पाण्डुनन्दन! आपका कल्याण हो। अब मैं आपसे विदा लेता और हस्तिनापुरको जाता हूँ। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि मैंने मानसिक आवेगके कारण वाणीद्वारा कोई ऐसी बात कह दी हो, जिससे आपको कष्ट हुआ हो? इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि युधिष्ठिरसंदेशे त्रिंशो 5ध्याय: ।। ३० || इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें युधिष्ठिरसंदेशविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३० ॥। [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५० “लोक हैं।] ऑपन--#हू< बछ। है २ >> एकत्रिशो<5 ध्याय: युधिष्ठटिरका मुख्य-मुख्य कुरुवंशियोंके प्रति संदेश युधिछिर उवाच उत सनन्‍्तमसन्तं वा बाल॑ वृद्ध च संजय । उताबलं बलीयांसं धाता प्रकुरुते वशे

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ନରଦେବଦେବ! ହେ ପାଣ୍ଡବ! ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ଏବେ ମୁଁ ତୁମଠାରୁ ବିଦାୟ ନେଇ ହସ୍ତିନାପୁରକୁ ଯାଉଛି। କହ—ମନର ହଠାତ୍ ଆବେଗରେ ମୁଁ ମୁଖରେ କିଛି ଅନୁଚିତ କିମ୍ବା ତୁମକୁ କଷ୍ଟଦାୟକ କଥା କହିଦେଇଛି କି?

Verse 2

जनार्दनं भीमसेनार्जुनौ च माद्रीसुतो सात्यकिं चेकितानम्‌ । आमन्त्रय गच्छामि शिवं सुखं व: सौम्येन मां पश्यत चक्षुषा नूपा:,भगवान्‌ श्रीकृष्ण, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव, सात्यकि तथा चेकितानसे भी आज्ञा लेकर मैं जा रहा हूँ। आपलोगोंको सुख और कल्याणकी प्राप्ति हो। राजाओ! आप मेरी ओर स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखें

ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଜନାର୍ଦନ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ), ଭୀମସେନ ଓ ଅର୍ଜୁନ, ଏବଂ ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ରଦ୍ୱୟ, ସାତ୍ୟକି ଓ ଚେକିତାନ—ଏମାନଙ୍କୁ ବିଦାୟ ଜଣାଇ ମୁଁ ଯାଉଛି। ତୁମମାନଙ୍କୁ ଶୁଭ ଓ ସୁଖ ମିଳୁ। ହେ ରାଜାମାନେ, ମୋତେ ସ୍ନେହଭରା ଦୃଷ୍ଟିରେ ଦେଖ।

Verse 3

युधिछिर उवाच अनुज्ञात: संजय स्वस्ति गच्छ न नः स्मरस्यप्रियं जातु विद्वन्‌ विद्यश्ष त्वां ते च वयं च सर्वे शुद्धात्मानं मध्यगतं सभास्थम्‌,युधिष्ठिर बोले--संजय! मैं तुम्हें जानेकी अनुमति देता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम जाओ। विद्वन्‌! तुम कभी हमलोगोंका अनिष्ट-चिन्तन नहीं करते हो। इसलिये कौरव तथा हमलोग सभी तुम्हें शुद्धचित्त एवं मध्यस्थ सदस्य समझते हैं

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ସଞ୍ଜୟ, ତୁମକୁ ଯିବାକୁ ଅନୁମତି ଦେଲି; ମଙ୍ଗଳସହିତ ଯାଅ। ହେ ବିଦ୍ୱାନ, ତୁମେ କେବେ ଆମ ପ୍ରତି ଅପ୍ରିୟ କିମ୍ବା ଅହିତ ଚିନ୍ତା କର ନାହିଁ। ତେଣୁ କୌରବମାନେ ଓ ଆମେ ସମସ୍ତେ ତୁମକୁ ଶୁଦ୍ଧଚିତ୍ତ, ନିଷ୍ପକ୍ଷ—ସଭାମଧ୍ୟସ୍ଥ ବିଶ୍ୱସନୀୟ ବ୍ୟକ୍ତି ବୋଲି ମାନୁ।

Verse 4

आप्तो दूत: संजय सुप्रियो5सि कल्याणवाक्‌ शीलवांस्तृप्तिमांश्व न मुहोस्त्वं संजय जातु मत्या न च क़्ुद्धोरुच्यमानो दुरुक्तै:,संजय! तुम विश्वसनीय दूत और हमारे अत्यन्त प्रिय हो। तुम्हारी बातें कल्याणकारिणी होती हैं। तुम शीलवान्‌ और संतोषी हो। तुम्हारी बुद्धि कभी मोहित नहीं होती और कट वचन सुनकर भी तुम कभी क्रोध नहीं करते हो

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ସଞ୍ଜୟ, ତୁମେ ବିଶ୍ୱସନୀୟ ଦୂତ ଏବଂ ଆମ ପାଇଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ। ତୁମର ବାଣୀ ମଙ୍ଗଳକର ଓ ହିତକର; ତୁମେ ଶୀଳବାନ୍ ଓ ସନ୍ତୁଷ୍ଟଚିତ୍ତ। ତୁମର ବିଚାରବୁଦ୍ଧି କେବେ ମୋହିତ ହୁଏନାହିଁ, ଏବଂ କଠୋର କଥା ଶୁଣିଲେ ମଧ୍ୟ ତୁମେ କ୍ରୋଧ କରନାହଁ।

Verse 5

न मर्मगां जातु वक्तासि रूक्षां नोपश्रुतिं कटुकां नोत मुक्ताम्‌ । धर्मारामामर्थवतीमहिंस्रा- मेतां वाचं तव जानीम सूत,सूत! तुम्हारे मुखसे कभी कोई ऐसी बात नहीं निकलती, जो कड़वी होनेके साथ ही मर्मपर आघात करनेवाली हो। तुम नीरस और अप्रासंगिक बात भी नहीं बोलते। हम अच्छी तरह जानते हैं कि तुम्हारा यह कथन धर्मानुकूल होनेके कारण मनोहर, अर्थयुक्त तथा हिंसाकी भावनासे रहित है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ସୂତ! ତୁମ ମୁଖରୁ କେବେ ଏମିତି ବାକ୍ୟ ବାହାରେନାହିଁ ଯାହା ମର୍ମକୁ ଆଘାତ କରେ—ରୁକ୍ଷ, କଟୁ, କିମ୍ବା ଅସାବଧାନତାରେ ଛୁଟିଯାଇଥିବା। ତୁମେ ନ ନୀରସ, ନ ଅପ୍ରାସଙ୍ଗିକ କଥା କହ। ଆମେ ଭଲଭାବେ ଜାଣୁଛୁ—ତୁମର ବାଣୀ ଧର୍ମାନୁକୂଳ, ସଜ୍ଜନଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ, ଅର୍ଥବତୀ ଏବଂ ହିଂସାଭାବରହିତ।

Verse 6

त्वमेव न: प्रियतमो5सि दूत इहागच्छेद्‌ विदुरो वा द्वितीय: । अभीक्षणदृष्टोडसि पुरा हि नस्त्वं धनंजयस्यात्मसम: सखासि,संजय! तुम्हीं हमारे अत्यन्त प्रिय हो। जान पड़ता है, दूसरे विदुरजी ही (दूत बनकर) यहाँ आ गये हैं। पहले भी तुम हमसे बारंबार मिलते रहे हो और धनंजयके तो तुम अपने आत्माके समान प्रिय सखा हो

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ସଞ୍ଜୟ, ତୁମେ ହିଁ ଆମର ସର୍ବାଧିକ ପ୍ରିୟ ଦୂତ। ମନେ ହୁଏ ଯେନେ ବିଦୁର ମହାଶୟ ଦ୍ୱିତୀୟ ଦୂତ ହୋଇ ଏଠାକୁ ଆସିଛନ୍ତି। କାରଣ ପୂର୍ବରୁ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ଆମ ସହ ବାରମ୍ବାର ମିଶିଛ; ଏବଂ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ପାଇଁ ତୁମେ ନିଜ ଆତ୍ମା ସମାନ ପ୍ରିୟ ସଖା, ସଞ୍ଜୟ।

Verse 7

इतो गत्वा संजय क्षिप्रमेव उपातिष्ठेथा ब्राह्मणान्‌ ये तदर्हा: । विशुद्धवीर्याश्वरणोपपन्ना: कुले जाता: सर्वधर्मोपपन्ना:,संजय! यहाँसे जाकर तुम शीघ्र ही जो आदर और सम्मानके योग्य हैं, उन विशुद्ध शक्तिशाली, ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न, कुलीन तथा सर्वधर्म-सम्पन्न ब्राह्मणोंको हमारी ओरसे प्रणाम कहना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ସଞ୍ଜୟ, ଏଠାରୁ ଯାଇ ବିଳମ୍ବ ନକରି ସେହି ଆଦରଯୋଗ୍ୟ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଭେଟ—ଯେମାନେ ଶୁଦ୍ଧ ତେଜସ୍ବୀ, ବ୍ରହ୍ମଚର୍ୟ ପାଳନ କରି ବେଦ-ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟରେ ନିରତ, କୁଳୀନ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଧର୍ମକର୍ତ୍ତବ୍ୟରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ। ସେମାନଙ୍କୁ ଆମ ପକ୍ଷରୁ ପ୍ରଣାମ ନିବେଦନ କର।

Verse 8

स्वाध्यायिनो ब्राह्मणा भिक्षवश्न तपस्विनो ये च नित्या वनेषु । अभिवाद्या वै मद्धचनेन वृद्धा- स्तथेतरेषां कुशलं वदेथा:,स्वाध्यायशील ब्राह्मणों, संन्यासियों तथा सदा वनमें निवास करनेवाले तपस्वी मुनियों एवं बड़े-बूढ़े लोगोंसे हमारी ओरसे प्रणाम कहना और दूसरे लोगोंसे भी कुशल-समाचार पूछना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ବେଦ-ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟରେ ନିରତ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ, ଭିକ୍ଷୁମାନଙ୍କୁ, ଏବଂ ସଦା ଅରଣ୍ୟରେ ବସୁଥିବା ତପସ୍ବୀ ମୁନିମାନଙ୍କୁ ମୋ ନାମରେ ପ୍ରଣାମ ଜଣାଇବ। ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ଅଭିବାଦନ କରି, ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତଙ୍କର ମଧ୍ୟ କୁଶଳ-ସମାଚାର ପଚାରିବ।

Verse 9

पुरोहित धृतराष्ट्रस्य राज्ञ- स्तथा55चायनित्विजो ये च तस्य । तैश्न त्वं तात सहितैर्य थाई संगच्छेथा: कुशलेनैव सूत,तात संजय! राजा धृतराष्ट्रके पुरोहित, आचार्य तथा उनके ऋत्विजोंसे भी (उनके साथ भेंट होनेपर) तुम (हमारी ओरसे) कुशल-मंगलका समाचार पूछते हुए ही मिलना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ପ୍ରିୟ ସଞ୍ଜୟ, ସୂତ! ତୁମେ ଯେତେବେଳେ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁରୋହିତ, ଆଚାର୍ଯ୍ୟମାନେ ଓ ତାଙ୍କ ଋତ୍ୱିଜମାନଙ୍କୁ ଭେଟିବ, ସେତେବେଳେ ଶିଷ୍ଟାଚାର ଓ ସଦ୍ଭାବ ସହିତ ତାଙ୍କ ପାଖକୁ ଯିବ। ଆମ ପକ୍ଷରୁ କେବଳ ତାଙ୍କ କୁଶଳ-ମଙ୍ଗଳ ପଚାରି ନମସ୍କାର କର, ଯେପରି ବିରୋଧ ବଢ଼ିଲେ ମଧ୍ୟ ଧର୍ମର ସୌଜନ୍ୟ ଓ ସମ୍ମାନଜନକ ବାଣୀ ତ୍ୟାଗ ହେବ ନାହିଁ।

Verse 10

(ततोड्व्यग्रस्तन्मना: प्राउ्जलि श्व कुर्या नमो मद्धवचनेन तेभ्य: ।) तदनन्तर शान्तभावसे उन्हींकी ओर मनकी वृत्तियोंको एकाग्र करके हाथ जोड़कर मेरे कहनेसे उन सबको प्रणाम निवेदन करना। अश्रोत्रिया ये च वसन्ति वृद्धा मनस्विन: शीलबलोपपन्ना: । आशंसन्तो<5स्माकमनुस्मरन्तो यथाशक्ति धर्ममात्रां चरन्त:

ତାପରେ କାଲି ମନକୁ ଏକାଗ୍ର କରି, ହାତ ଯୋଡ଼ି, ଶାନ୍ତ ଭାବରେ ମୋ ନାମରେ ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ନମସ୍କାର ନିବେଦନ କରିବ। ତା’ପରେ ସେଠାରେ ବସୁଥିବା ସେହି ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ କୁଶଳ ପଚାରିବ—ଯେମାନେ ଯଦିଓ ବେଦପାଠରେ ପାରଙ୍ଗତ ନୁହନ୍ତି, ତଥାପି ଉଚ୍ଚମନା, ଶୀଳ ଓ ବଳରେ ସମ୍ପନ୍ନ; ଯେମାନେ ଆମ ମଙ୍ଗଳ ଆଶା କରନ୍ତି, ଆମକୁ ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି ଏବଂ ଯଥାଶକ୍ତି ଧର୍ମର ମାପକୁ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତି।

Verse 11

ये जीवन्ति व्यवहारेण राष्टरे पशुूंश्ष ये पालयन्तो वसन्ति,(कृषीवला बिश्रति ये च लोकं तेषां सर्वेषां कुशल सम पृच्छे: ।) जो कौरव-राज्यमें व्यापारसे जीविका चलाते हैं, पशुओंका पालन करते हुए निवास करते हैं तथा जो खेती करके सब लोगोंका भरण-पोषण करते हैं, उन सब वैश्योंका भी कुशल-समाचार पूछना

କୌରବ-ରାଜ୍ୟରେ ବ୍ୟବସାୟ କରି ଜୀବିକା ଚାଲାଉଥିବା, ପଶୁପାଳନ କରି ବସୁଥିବା, ଏବଂ କୃଷି କରି ଲୋକଙ୍କୁ ପୋଷଣ କରୁଥିବା—ସେହି ସମସ୍ତ ବୈଶ୍ୟମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ କୁଶଳ-ସମାଚାର ପଚାରିବ।

Verse 12

आचार्य इष्टो नयगो विधेयो वेदानभीप्सन्‌ ब्रह्मचर्य चचार । योअस्त्रं चतुष्पात्‌ पुनरेव चक्रे द्रोण: प्रसन्नोडभिवाद्यस्त्ववासौ,जिन्होंने वेदोंकी शिक्षा प्राप्त करनेके लिये पहले ब्रह्मचर्यका पालन किया। तत्पश्चात्‌ मन्त्र, उपचार, प्रयोग तथा संहार--इन चार पादोंसे युक्त अस्त्रविद्याकी शिक्षा प्राप्त की, वे सबके प्रिय, नीतिज्ञ, विनयी तथा सदा प्रसन्नचित्त रहनेवाले आचार्य द्रोण भी हमारे अभिवादनके योग्य हैं, तुम उनसे भी मेरा प्रणाम कहना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଆମ ପ୍ରିୟ, ନୀତିଜ୍ଞ, ବିନୟୀ ଓ ସଦା ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତ ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ଦ୍ରୋଣ ବେଦ ଅଧ୍ୟୟନ ପାଇଁ ପ୍ରଥମେ ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟ ପାଳନ କରିଥିଲେ। ପରେ ମନ୍ତ୍ର, ଉପଚାର, ପ୍ରୟୋଗ ଓ ସଂହାର—ଏହି ଚାରି ପାଦରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାକୁ ସେ ଶିଖି ସୁସଂଗଠିତ କରିଥିଲେ। ସେ ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ଦ୍ରୋଣ ଆମ ଅଭିବାଦନର ଯୋଗ୍ୟ; ତାଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ମୋ ପ୍ରଣାମ କହିବ।

Verse 13

अधीतविद्यक्षरणोपपतन्नो योअस्त्रं चतुष्पात्‌ पुनरेव चक्रे । गन्धर्वपुत्रप्रतिमं तरस्विनं तमश्वत्थामानं कुशल सम पृच्छे:,जो वेदाध्ययनसम्पन्न तथा सदाचारयुक्त हैं, जिन्होंने चारों पादोंसे युक्त अस्त्रविद्याकी शिक्षा पायी है, जो गन्धर्वकुमारके समान वेगशाली वीर हैं, उन आचार्यपुत्र अश्वत्थामाका भी कुशल-समाचार पूछना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ବେଦାଧ୍ୟୟନରେ ସମ୍ପନ୍ନ ଓ ସଦାଚାରଯୁକ୍ତ, ଚାରି ପାଦରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟା ଭଲଭାବେ ଶିଖିଥିବା, ଗନ୍ଧର୍ବକୁମାର ସମାନ ବେଗଶାଳୀ ପରାକ୍ରମୀ—ସେହି ଆଚାର୍ଯ୍ୟପୁତ୍ର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମାଙ୍କର ମଧ୍ୟ କୁଶଳ-ସମାଚାର ପଚାରିବ।

Verse 14

शारद्वतस्यावसथ्ं सम गत्वा महारथस्यात्मविदां वरस्य । त्वं मामभीक्ष्णं परिकीर्तयन्‌ वै कृपस्य पादौ संजय पाणिना स्पृशे:,संजय! तदनन्तर आत्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महारथी कृपाचार्यके घर जाकर बारंबार मेरा नाम लेते हुए अपने हाथसे उनके दोनों चरणोंका स्पर्श करना

ସଞ୍ଜୟ! ଶାରଦ୍ୱତପୁତ୍ର, ଆତ୍ମବିଦ୍ୟାରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହାରଥୀ କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ଗୃହକୁ ଯାଇ, ବାରମ୍ବାର ମୋ ନାମ ଉଚ୍ଚାରଣ କରି, ନିଜ ହାତରେ ତାଙ୍କ ଦୁଇ ଚରଣ ସ୍ପର୍ଶ କର।

Verse 15

यस्मिन्‌ शौर्यमानृशंस्यं तपश्च प्रज्ञा शीलं॑ श्रुतिसत्त्वे धृतिश्व । पादौ गृहीत्वा कुरुसत्तमस्य भीष्मस्य मां तत्र निवेदयेथा:,जिनमें वीरत्व, दया, तपस्या, बुद्धि, शील, शास्त्रज्ञान, सत्त्व और धैर्य आदि सदगुण विद्यमान हैं, उन कुरुश्रेष्ठ पितामह भीष्मके दोनों चरण पकड़कर मेरा प्रणाम निवेदन करना

ଯାହାଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶୌର୍ଯ୍ୟ, ଦୟା, ତପ, ପ୍ରଜ୍ଞା, ଶୀଳ, ଶ୍ରୁତି-ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞାନ, ସତ୍ତ୍ୱ ଓ ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଆଦି ଗୁଣ ଅଛି, ସେହି କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ପିତାମହ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ଦୁଇ ଚରଣ ଧରି ସେଠାରେ ମୋ ପ୍ରଣାମ ନିବେଦନ କର।

Verse 16

प्रज्ञाचक्षुर्य: प्रणेता कुरूणां बहुश्रुतो वृद्धसेवी मनीषी । तस्मै राज्ञे स्थविरायाभिवाद्य आचक्षीथा: संजय मामरोगम्‌,संजय! जो कौरवगणोंके नेता, अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता, बड़े बूढ़ोंके सेवक और बुद्धिमान्‌ हैं, उन वृद्ध नरेश प्रज्ञाचक्षु धृतराष्ट्रको मेरा प्रणाम निवेदन करके यह बताना कि युधिष्ठिर नीरोग और सकुशल है

ସଞ୍ଜୟ! କୁରୁମାନଙ୍କ ନେତା, ବହୁଶ୍ରୁତ, ବୃଦ୍ଧସେବୀ ଓ ମନୀଷୀ—ଏମିତି ପ୍ରଜ୍ଞାଚକ୍ଷୁ ବୃଦ୍ଧ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରି କହିବୁ, ଯେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନିରୋଗ ଓ ସୁକୁଶଳ ଅଛନ୍ତି।

Verse 17

ज्येष्ठ: पुत्रो धृतराष्ट्रस्य मन्दो मूर्ख: शठ: संजय पापशील: । यस्यापवाद: पृथिवीं याति सर्वा सुयोधनं कुशलं तात पृच्छे:,तात संजय! जो धुृतराष्ट्रका ज्येष्ठ पुत्र, मन्दबुद्धि, मूर्ख, शठ और पापाचारी है तथा जिसकी निन्दा सारी पृथ्वीमें फैल रही है, उस सुयोधनसे भी मेरी ओरसे कुशल-मंगल पूछना

ତାତ ସଞ୍ଜୟ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ପୁତ୍ର ଯେ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି, ମୂର୍ଖ, ଶଠ ଓ ପାପଶୀଳ; ଯାହାର ଅପବାଦ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀରେ ପ୍ରସାରିତ—ସେହି ସୁୟୋଧନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ମୋ ପକ୍ଷରୁ କୁଶଳ-ମଙ୍ଗଳ ପଚାର।

Verse 18

भ्राता कनीयानपि तस्य मन्द- स्तथाशील: संजय सो<पि शश्चवत्‌ | महेष्वास: शूरतम: कुरूणां दुःशासन: कुशलं तात वाच्य:,तात संजय! जो दुर्योधनका छोटा भाई है तथा उसीके समान मूर्ख और सदा पापमें संलग्न रहनेवाला है, कुरुकुलके उस महाधनुर्धर एवं विख्यात वीर दुःशासनसे भी कुशल पूछकर मेरा कुशल-समाचार कहना

ତାତ ସଞ୍ଜୟ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ କନିଷ୍ଠ ଭ୍ରାତା ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ପରି ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ଓ ସଦା ପାପପ୍ରବୃତ୍ତ। ତଥାପି କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମହାଧନୁର୍ଧର ଓ ଶୂରତମ ଭାବେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଦୁଃଶାସନଙ୍କ କୁଶଳ ପଚାରି, ମୋ କୁଶଳ-ସମ୍ବାଦ ମଧ୍ୟ କହିଦେବୁ।

Verse 19

यस्य कामो वर्तते नित्यमेव नान्य: शमाद्‌ भारतानामिति सम | स बाह्लिकानामृषभो मनीषी त्वयाभिवाद्य: संजय साधुशील:,संजय! भरतवंशियोंमें परस्पर शान्ति बनी रहे, इसके सिवा दूसरी कोई कामना जिनके हृदयमें कभी नहीं होती है, जो बाह्नलीकवंशके श्रेष्ठ पुरुष हैं, उन साधु स्वभाववाले बुद्धिमान्‌ बाह्नलीकको भी तुम मेरा प्रणाम निवेदन करना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ! ଭାରତବଂଶୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସଦା ଶାନ୍ତି ଓ ସୌହାର୍ଦ୍ଦ ରହୁ—ଏହି ଏକମାତ୍ର ନିତ୍ୟ ଇଚ୍ଛା ଯାହାଙ୍କର, ମନଶ୍ଶମନ ଓ ସମନ୍ୱୟ ପୁନଃସ୍ଥାପନା ଛଡ଼ା ଅନ୍ୟ କୌଣସି କାମନା ନଥିବା, ବାହ୍ଲୀକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେ ଜ୍ଞାନୀ ଓ ସଦ୍‌ଶୀଳ ବାହ୍ଲୀକଙ୍କୁ ମୋ ପକ୍ଷରୁ ସଶ୍ରଦ୍ଧ ପ୍ରଣାମ ଜଣାଇବୁ।

Verse 20

गुणैरनेकै: प्रवरैश्न युक्तो विज्ञानवान्‌ नैव च निष्ठरो यः । स्नेहादमर्ष सहते सदैव स सोमदत्त: पूजनीयो मतो मे,जो अनेक श्रेष्ठ गुणोंसे विभूषित और ज्ञानवान्‌ हैं, जिनमें निल्ठरताका लेशमात्र भी नहीं है, जो स्नेहवश सदा ही हमलोगोंका क्रोध सहन करते रहते हैं, वे सोमदत्त भी मेरे लिये पूजनीय हैं

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଯେ ଅନେକ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଗୁଣରେ ଯୁକ୍ତ, ବିବେକବାନ, ଯାହାଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କଠୋରତାର ଲେଶମାତ୍ର ନାହିଁ; ଯେ ସ୍ନେହବଶତଃ ସଦା ଆମ କ୍ରୋଧକୁ ସହନ କରନ୍ତି—ସେ ସୋମଦତ୍ତ ମଧ୍ୟ ମୋ ମତରେ ପୂଜନୀୟ।

Verse 21

अर्हत्तम: कुरुषु सौमदत्ति: स नो भ्राता संजय मत्सखा च | महेष्वासो रथिनामुत्तमो्ई: सहामात्य: कुशल तस्य पृच्छे:,संजय! सोमदत्तके पुत्र भूरिश्रवा कुरुकुलमें पूज्यतम पुरुष माने गये हैं। वे हमलोगोंके निकट सम्बन्धी और मेरे प्रिय सखा हैं। रथी वीरोंमें उनका बहुत ऊँचा स्थान है। वे महान्‌ धनुर्धर तथा आदरणीय वीर हैं। तुम मेरी ओरसे मन्त्रियोंसहित उनका कुशल-समाचार पूछना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ! କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସୌମଦତ୍ତି (ଭୂରିଶ୍ରବା) ସର୍ବାଧିକ ପୂଜ୍ୟ। ସେ ଆମର ଆତ୍ମୀୟ ଏବଂ ମୋର ପ୍ରିୟ ସଖା। ମହାରଥୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସେ ଅଗ୍ରଗଣ୍ୟ—ମହାଧନୁର୍ଧର ଓ ଶ୍ରଦ୍ଧେୟ ବୀର। ମୋ ପକ୍ଷରୁ ତାଙ୍କ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହିତ ତାଙ୍କର କୁଶଳମଙ୍ଗଳ ପଚାରିବୁ।

Verse 22

ये चैवान्ये कुरुमुख्या युवान: पुत्रा: पौत्रा भ्रातरश्वैव ये नः । यं यमेषां मन्यसे येन योग्यं तत्‌ तत्‌ प्रोच्यानामयं सूत वाच्या:,संजय! इनके सिवा और भी जो कुरुकुलके प्रधान नवयुवक हैं, जो हमारे पुत्र, पौत्र और भाई लगते हैं, इनमेंसे जिस-जिसको तुम जिस व्यवहारके योग्य समझो, उससे वैसी ही बात कहकर उन सबसे बताना कि पाण्डवलोग स्वस्थ और सानन्द हैं

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ! ଏମାନଙ୍କ ଛଡ଼ା କୁରୁବଂଶର ଅନ୍ୟ ଯେ ପ୍ରଧାନ ଯୁବକମାନେ ଅଛନ୍ତି—ଯେମାନେ ଆମ ପୁତ୍ର, ପୌତ୍ର ଓ ଭ୍ରାତାସମ—ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଯାହାକୁ ଯେପରି ସମ୍ବୋଧନ ଯୋଗ୍ୟ ବୋଲି ତୁମେ ଭାବ, ତାଙ୍କୁ ସେପରି କହି କଥା କହିବୁ। ହେ ସୂତ! ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଏହା ଜଣାଇଦେବୁ—ପାଣ୍ଡବମାନେ ସୁସ୍ଥ ଓ ପ୍ରସନ୍ନ।

Verse 23

ये राजान: पाण्डवायोधनाय समानीता धार्तराष्ट्रेण केचित्‌ । वशातय: शाल्वका: केकयाश्ष तथाम्बष्ठा ये त्रिगर्ताश्न॒ मुख्या:,दुर्योधनने हम पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेके लिये जिन-जिन राजाओंको बुलाया है। वे वशाति, शाल्व, केकय, अम्बष्ठ तथा त्रिगर्तदेशके प्रधान वीर, पूर्व, उत्तर, दक्षिण और पश्चिम दिशाके शौर्यसम्पन्न योद्धा तथा समस्त पर्वतीय नरेश वहाँ उपस्थित हैं। वे लोग दयालु तथा शील और सदाचारसे सम्पन्न हैं। संजय! तुम मेरी ओरसे उन सबका कुशल-मंगल पूछना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଯେଯେ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ଡାକିଛି—ବଶାତି, ଶାଲ୍ୱ, କେକୟ, ଅମ୍ବଷ୍ଠ ଏବଂ ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତମାନଙ୍କ ପ୍ରଧାନ ବୀରମାନେ—ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କର କୁଶଳମଙ୍ଗଳ ମୋ ପକ୍ଷରୁ ପଚାରିବୁ।

Verse 24

प्राच्योदीच्या दाक्षिणात्याश्व शूरा- स्तथा प्रतीच्या: पर्वतीयाश्न सर्वे अनुशंसा: शीलवृत्तोपपन्ना- स्तेषां सर्वेषां कुशलं सूत पृच्छे:,दुर्योधनने हम पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेके लिये जिन-जिन राजाओंको बुलाया है। वे वशाति, शाल्व, केकय, अम्बष्ठ तथा त्रिगर्तदेशके प्रधान वीर, पूर्व, उत्तर, दक्षिण और पश्चिम दिशाके शौर्यसम्पन्न योद्धा तथा समस्त पर्वतीय नरेश वहाँ उपस्थित हैं। वे लोग दयालु तथा शील और सदाचारसे सम्पन्न हैं। संजय! तुम मेरी ओरसे उन सबका कुशल-मंगल पूछना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ପୂର୍ବ, ଉତ୍ତର, ଦକ୍ଷିଣ ଓ ପଶ୍ଚିମ ଦିଗର ଶୂରବୀରମାନେ ଏବଂ ସମସ୍ତ ପର୍ବତୀୟ ରାଜାମାନେ ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ। ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ସଦ୍ଭାବସମ୍ପନ୍ନ, ଦୟାଳୁ, ଶୀଳ ଓ ସଦାଚାରରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ। ହେ ସୂତ! ମୋ ପକ୍ଷରୁ ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ କୁଶଳ-ମଙ୍ଗଳ ପଚାର।

Verse 25

हस्त्यारोहा रथिन: सादिनश्न पदातयश्चार्यसड्घा महान्त: । आख्याय मां कुशलिन सम नित्य- मनामयं परिपृच्छे: समग्रान्‌,जो हाथीसवार, रथी, घुड़सवार, पैदल तथा बड़े-बड़े सज्जनोंके समुदाय वहाँ उपस्थित हैं, उन सबसे मुझे सकुशल बताकर उनका भी आरोग्य-समाचार पूछना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହସ୍ତିଆରୋହୀ, ରଥୀ, ଅଶ୍ୱାରୋହୀ, ପଦାତି ଏବଂ ମହାନ ଆର୍ୟବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ସମୂହ ସେଠାରେ ଅଛନ୍ତି। ପ୍ରଥମେ ମୁଁ କୁଶଳରେ ଅଛି ବୋଲି ଜଣାଇ, ପରେ ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ ଆରୋଗ୍ୟ ଓ ନିରାମୟତା ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ପଚାର।

Verse 26

तथा रज्ञो हार्थयुक्तानमात्यान्‌ दौवारिकान्‌ ये च सेनां नयन्ति । आयदव्ययं ये गणयन्ति नित्य- मर्थाश्न ये महतश्षिन्तयन्ति,जो राजाके हितकर कार्योमें लगे हुए मन्त्री, द्वारपाल, सेनानायक, आय-व्ययनिरीक्षक तथा निरन्तर बड़े-बड़े कार्यों एवं प्रश्नोंपर विचार करनेवाले हैं, उनसे भी कुशल-समाचार पूछना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ରାଜାଙ୍କ ହିତକାର୍ଯ୍ୟରେ ନିଯୁକ୍ତ ମନ୍ତ୍ରୀମାନେ, ଦ୍ୱାରପାଳମାନେ, ସେନାନାୟକମାନେ, ନିତ୍ୟ ଆୟ-ବ୍ୟୟ ଗଣନା କରୁଥିବାମାନେ ଏବଂ ମହତ୍ କାର୍ଯ୍ୟ ଓ ଗୁରୁତର ପ୍ରଶ୍ନ ଉପରେ ସଦା ଚିନ୍ତା କରୁଥିବାମାନେ—ସେମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ କୁଶଳ-ସମାଚାର ପଚାର।

Verse 27

वृन्दारक॑ कुरुमध्येष्वमूढं महाप्रज्ञं सर्वधर्मोपपन्नम्‌ । न तस्य युद्ध रोचते वै कदाचिद्‌ वैश्यापुत्रं कुशलं तात पृच्छे:,तात! जो समस्त कौरवोंमें श्रेष्ठ, महाबुद्धिमान, ज्ञानी तथा सब धर्मोसे सम्पन्न हैं, जिसे कौरव और पाण्डवोंका युद्ध कभी अच्छा नहीं लगता, उस वैश्यापुत्र युयुत्सुका भी मेरी ओरसे कुशल-मंगल पूछना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ! କୁରୁମଧ୍ୟରେ ବୈଶ୍ୟପୁତ୍ର ଯୁୟୁତ୍ସୁ ଅଛି—ସେ ଅମୂଢ, ମହାପ୍ରଜ୍ଞ ଓ ସର୍ବଧର୍ମସମ୍ପନ୍ନ। କୌରବ-ପାଣ୍ଡବ ଯୁଦ୍ଧ ତାହାକୁ କେବେ ମଧ୍ୟ ରୁଚେ ନାହିଁ। ପ୍ରିୟ! ମୋ ପକ୍ଷରୁ ତାହାର ମଧ୍ୟ କୁଶଳ-ମଙ୍ଗଳ ପଚାର।

Verse 28

निकर्तने देवने योउद्धितीय- श्छन्नोपथ: साधुदेवी मताक्ष: । यो दुर्जयो देवरथेन संख्ये स चित्रसेन: कुशलं तात वाच्य:,तात! जो धनके अपहरण और द्यूतक्रीड़ामें अद्वितीय है, छलको छिपाये रखकर अच्छी तरहसे जूआ खेलता है, पासे फेंकनेकी कलामें प्रवीण है तथा जो युद्धमें दिव्य रथारूढ़ वीरके लिये भी दुर्जय है, उस चित्रसेनसे भी कुशल-समाचार पूछना और बताना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ପ୍ରିୟ! ଯେ ଧନାପହରଣ ଓ ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡାରେ ଅଦ୍ୱିତୀୟ, ନିଜ ଛଳକୁ ଗୁପ୍ତ ରଖି ଗଣନାସହିତ ନିପୁଣ ଭାବେ ଜୁଆ ଖେଳେ, ପାଶା ଛାଡ଼ିବା କଳାରେ ପ୍ରବୀଣ, ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧରେ ଦିବ୍ୟ ରଥାରୂଢ ବୀରଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଦୁର୍ଜୟ—ସେଇ ଚିତ୍ରସେନଙ୍କର ମଧ୍ୟ କୁଶଳ-ସମାଚାର ପଚାରି ମୋତେ ଜଣାଇବ।

Verse 29

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यसम्बन्धी उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,गान्धारराज: शकुनि: पर्वतीयो निकर्तने योडद्धितीयो<क्षदेवी । मान कुर्वन्‌ धार्तराष्ट्रस्य सूत मिथ्याबुद्धेः कुशलं तात पृच्छे: तात संजय! जो जूआ खेलकर पराये धनका अपहरण करनेकी कलामें अपना सानी नहीं रखता तथा दुर्योधन-का सदा सम्मान करता है, उस भिथ्याबुद्धि पर्वतनिवासी गान्धारराज शकुनिकी भी कुशल पूछना

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ସଞ୍ଜୟୟାନପର୍ବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣବାକ୍ୟସମ୍ବନ୍ଧୀ ଉଣତ୍ରିଂଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ! ପର୍ବତବାସୀ ଗାନ୍ଧାରରାଜ ଶକୁନିଙ୍କର ମଧ୍ୟ କୁଶଳ ପଚାର; ଯିଏ ଦ୍ୟୂତକଳାରେ ଓ ଦ୍ୟୂତ ଖେଳି ପରଧନ ଅପହରଣ କରିବାରେ ନିଜକୁ ଅଦ୍ୱିତୀୟ ମାନେ, ଏବଂ ଯିଏ ସଦା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ମାନ-ସମ୍ମାନ ଦେଇ ତୋଷାମୋଦ କରେ; ସେହି ମିଥ୍ୟାବୁଦ୍ଧି ପୁରୁଷର ମଙ୍ଗଳ ମଧ୍ୟ ଜାଣିବା।

Verse 30

यः पाण्डवानेकरथेन वीर: समुत्सहत्यप्रधृष्यान्‌ विजेतुम्‌ । यो मुहातां मोहयिताद्वितीयो वैकर्तन: कुशलं तस्य पृच्छे:,जो अद्वितीय वीर एकमात्र रथकी सहायतासे अजेय पाण्डवोंको भी जीतनेका उत्साह रखता है तथा जो मोहमें पड़े हुए धृतराष्ट्रके पुत्रोंकोी और भी मोहित करनेवाला है, उस वैकर्तन कर्णकी भी कुशल पूछना

ଯେ ଅଦ୍ୱିତୀୟ ବୀର ଏକମାତ୍ର ରଥର ସହାୟତାରେ ଅଜେୟ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଜୟ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ, ଏବଂ ଯେ ମୂଢତାରେ ପତିତ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଆହୁରି ମୋହିତ କରେ—ସେହି ବୈକର୍ତ୍ତନ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କର ମଧ୍ୟ କୁଶଳ ପଚାର।

Verse 31

स एव भक्त: स गुरु: स भर्ता सवैपिता सच माता सुद्ृच्च । अगाधबुद्धि्विंदुरो दीर्घदर्शी स नो मन्त्री कुशलं तं सम पृच्छे:

ସେଇ ଏକମାତ୍ର ସତ୍ୟ ଭକ୍ତ, ସେଇ ଗୁରୁ, ସେଇ ପାଳକ-ଆଶ୍ରୟ; ସେଇ ପିତା ଏବଂ ସେଇ ମାତା—ଦୃଢ ଓ ଭରସାଯୋଗ୍ୟ। ଅଗାଧ ବୁଦ୍ଧି ଓ ଦୀର୍ଘଦର୍ଶୀ ବିଦୁର ଆମର ମନ୍ତ୍ରୀ। ହେ ସଞ୍ଜୟ, ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ସହିତ ତାଙ୍କୁ ଆମ ହିତ-କଲ୍ୟାଣ ବିଷୟରେ ପଚାର।

Verse 32

अगाधबुद्धि दूरदर्शी विदुरजी हमलोगोंके प्रेमी, गुर, पालक, पिता-माता और सुहूृद्‌ हैं, वे ही हमारे मन्त्री भी हैं। संजय! तुम मेरी ओरसे उनकी भी कुशल पूछना ।। वृद्धाः स्त्रियो याश्व गुणोपपन्ना ज्ञायन्ते न: संजय मातरस्ता: । ताभि: सर्वाभि: सहिताभि: समेत्य स्त्रीभिवृद्धाभिरभिवादं वदेथा:,संजय! राजघरानेमें जो सदगुणवती वृद्धा स्त्रियाँ हैं, वे सब हमारी माताएँ लगती हैं। उन सब वृद्धा स्त्रियोंसे एक साथ मिलकर तुम उनसे हमारा प्रणाम निवेदन करना

ଅଗାଧ ବୁଦ୍ଧି ଓ ଦୂରଦର୍ଶୀ ବିଦୁର ଆମର ପ୍ରିୟ, ଗୁରୁ, ପାଳକ, ପିତା-ମାତା ଓ ସୁହୃଦ; ସେଇ ଆମର ମନ୍ତ୍ରୀ ମଧ୍ୟ। ହେ ସଞ୍ଜୟ, ମୋ ପକ୍ଷରୁ ତାଙ୍କର ମଧ୍ୟ କୁଶଳ ପଚାର। ଏବଂ ରାଜଗୃହରେ ଯେ ସଦ୍ଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ବୃଦ୍ଧା ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ଅଛନ୍ତି, ସଞ୍ଜୟ, ଆମେ ସେମାନଙ୍କୁ ମାତୃସମ ଜାଣୁ। ସେହି ସମସ୍ତ ବୃଦ୍ଧା ସ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ସହ ଏକତ୍ର ହୋଇ, ସେମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଆମ ପ୍ରଣାମ ନିବେଦନ କର।

Verse 33

कच्चित्‌ पुत्रा जीवपुत्रा: सुसम्यग्‌ वर्तन्ते वो वृत्तिमनृशंसरूपा: । इति स्मोक्‍्त्वा संजय ब्रूहि पश्चा- दजातशत्रुः कुशली सपुत्र:,संजय! उन बड़ी-बूढ़ी स्त्रियोंसे इस प्रकार कहना--“माताओ! आपके पुत्र आपके साथ उत्तम बर्ताव करते हैं न? उनमें क्रूरता तो नहीं आ गयी है? उन सबके दीर्घायु पुत्र हो गये हैं न?” इस प्रकार कहकर पीछे यह बताना कि आपका बालक अजातशत्रु युधिष्ठिर पुत्रोंसहित सकुशल है

ହେ ସଞ୍ଜୟ! ସେହି ବୃଦ୍ଧା ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ଏପରି କହ—“ମାଆମାନେ! ତୁମ ପୁଅମାନେ ତୁମ ସହିତ ଭଲଭାବେ ବ୍ୟବହାର କରୁଛନ୍ତି ତ? ସେମାନଙ୍କ ମନରେ କୌଣସି କ୍ରୂରତା ତ ଜନ୍ମ ନେଇନାହିଁ? ଏବଂ ତୁମେ ସମସ୍ତେ ଦୀର୍ଘାୟୁ ପୁଅମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଧନ୍ୟ ହୋଇଛ କି?” ଏହିପରି କହି ପରେ ଜଣାଇବା—ଅଜାତଶତ୍ରୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନିଜ ପୁଅମାନଙ୍କ ସହିତ କୁଶଳରେ ଅଛନ୍ତି।

Verse 34

या नो भार्या: संजय वेत्थ तत्र तासां सर्वासां कुशल तात पृच्छे: । सुसंगुप्ता: सुरभयो5नवद्या: कच्चिद्‌ गृहानावसथाप्रमत्ता:,तात संजय! हस्तिनापुरमें हमारे भाइयोंकी जो स्त्रियाँ हैं, उन सबको तो तुम जानते ही हो। उन सबकी कुशल पूछना और कहना क्या तुमलोग सर्वथा सुरक्षित रहकर निर्दोष जीवन बिता रही हो? तुम्हें आवश्यक सुगन्ध आदि प्रसाधन-सामग्रियाँ प्राप्त होती हैं न? तुम घरमें प्रमादशून्य होकर रहती हो न? भद्र महिलाओ! क्‍या तुम अपने श्वशुरजनोंके प्रति क्रूरतारहित कल्याणकारी बर्ताव करती हो तथा जिस प्रकार तुम्हारे पति अनुकूल बने रहें, वैसे व्यवहार और सद्भावको अपने हृदयमें स्थान देती हो?

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— “ସଞ୍ଜୟ, ହସ୍ତିନାପୁରରେ ଆମ ଭାଇମାନଙ୍କ ଯେ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ଅଛନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କୁ ତୁମେ ଜାଣ। ପ୍ରିୟ, ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ କୁଶଳ ପଚାର। ସେମାନେ କି ଭଲଭାବେ ସୁରକ୍ଷିତ ଓ ନିର୍ଦୋଷ ଆଚରଣରେ ଜୀବନ ଯାପନ କରୁଛନ୍ତି? ସୁଗନ୍ଧିତ ଉବଟଣ ଆଦି ଆବଶ୍ୟକ ପ୍ରସାଧନ-ସାମଗ୍ରୀ ସେମାନଙ୍କୁ ମିଳୁଛି କି? ଘରେ ସେମାନେ କି ସତର୍କ ଓ ଅପ୍ରମତ୍ତ ରହୁଛନ୍ତି?”

Verse 35

कच्चिद्‌ वृत्तिं श्वशुरेषु भद्रा: कल्याणी वर्तध्वमनृशंसरूपाम्‌ । यथा च व: स्यु: पतयो5नुकूला- स्तथा वृत्तिमात्मन: स्थापयध्वम्‌,तात संजय! हस्तिनापुरमें हमारे भाइयोंकी जो स्त्रियाँ हैं, उन सबको तो तुम जानते ही हो। उन सबकी कुशल पूछना और कहना क्या तुमलोग सर्वथा सुरक्षित रहकर निर्दोष जीवन बिता रही हो? तुम्हें आवश्यक सुगन्ध आदि प्रसाधन-सामग्रियाँ प्राप्त होती हैं न? तुम घरमें प्रमादशून्य होकर रहती हो न? भद्र महिलाओ! क्‍या तुम अपने श्वशुरजनोंके प्रति क्रूरतारहित कल्याणकारी बर्ताव करती हो तथा जिस प्रकार तुम्हारे पति अनुकूल बने रहें, वैसे व्यवहार और सद्भावको अपने हृदयमें स्थान देती हो?

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— “ଭଦ୍ର ନାରୀମାନେ କି ଶ୍ୱଶୁରଜନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କଲ୍ୟାଣକାରୀ, ମୃଦୁ ଓ ଅକ୍ରୂର ଆଚରଣ ରଖୁଛନ୍ତି? ଏବଂ କି ସେମାନେ ନିଜ ଚରିତ୍ରକୁ ଏମିତି ଭାବେ ସ୍ଥାପନ କରୁଛନ୍ତି ଯେ ତାଙ୍କର ପତିମାନେ ସଦା ଅନୁକୂଳ ରହନ୍ତି? ପ୍ରିୟ ସଞ୍ଜୟ, ସେମାନଙ୍କ କୁଶଳ ନିଶ୍ଚୟ ପଚାର।”

Verse 36

या नः स्नुषा: संजय वेत्थ तत्र प्राप्ता: कुलेभ्यश्व गुणोपपन्ना: । प्रजावत्यो ब्रूहि समेत्य ताश्न युधिष्ठिरो वो$भ्यवदत्‌ प्रसन्न:,संजय! तुम वहाँ उन स्त्रियोंको भी जानते हो, जो हमारी पुत्रवधुएँ लगती हैं, जो उत्तम कुलोंसे आयी हैं तथा सर्वगुणसम्पन्न और संतानवती हैं। वहाँ जाकर उनसे कहना --“बहुओ! युधिष्छिर प्रसन्न होकर तुमलोगों-का कुशल-समाचार पूछते थे”

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— “ସଞ୍ଜୟ, ସେଠାରେ ଆମର ଯେ ପୁତ୍ରବଧୂମାନେ ଅଛନ୍ତି—ଉତ୍ତମ କୁଳରୁ ଆସିଥିବା, ଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ଓ ସନ୍ତାନବତୀ—ସେମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ଜାଣ। ଯାଇ ସେମାନଙ୍କୁ ଭେଟି କହ— ‘ବହୁମାନେ, ଯୁଧିଷ୍ଠିର ପ୍ରସନ୍ନ ହୃଦୟରେ ତୁମ କୁଶଳ ପଚାରୁଛନ୍ତି।’”

Verse 37

कन्या: स्वजेथा: सदनेषु संजय अनामयं मद्वगचनेन पृष्टवा । कल्याणा व: सन्तु पतयोडनुकूला यूयं पतीनां भवतानुकूला:,संजय! राजमहलमें जो छोटी-छोटी बालिकाएँ हैं, उन्हें हृदयसे लगाना और मेरी ओरसे उनका आरोग्य-समाचार पूछकर उन्हें कहना--'पुत्रियो! तुम्हें कल्याणकारी पति प्राप्त हों और वे तुम्हारे अनुकूल बने रहें। साथ ही तुम भी पतियोंके अनुकूल बनी रहो”

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— “ସଞ୍ଜୟ, ରାଜଭବନରେ ଥିବା କନ୍ୟାମାନଙ୍କୁ ନିଜ କନ୍ୟା ପରି ସ୍ନେହ କରି ଆଲିଙ୍ଗନ କର। ମୋ ପକ୍ଷରୁ ସେମାନଙ୍କ ଆରୋଗ୍ୟ ପଚାରି କହ— ‘କନ୍ୟାମାନେ, ତୁମେ ମଙ୍ଗଳକାରୀ ଓ ଅନୁକୂଳ ପତି ପାଅ; ଏବଂ ତୁମେ ମଧ୍ୟ ନିଜ ପତିଙ୍କ ପ୍ରତି ଅନୁକୂଳ ଓ ସମର୍ପିତ ରୁହ।’”

Verse 38

अलंकृता वस्त्रवत्य: सुगन्धा अबीभत्सा: सुखिता भोगवत्य: । लघु यासां दर्शनं वाक्‌ च लघ्वी वेशस्त्रिय: कुशल तात पृच्छे:,तात संजय! जिनका दर्शन मनोहर और बातें मनको प्रिय लगनेवाली होती हैं, जो वेश- भूषासे अलंकृत, सुन्दर वस्त्रोंस सुशोभित, उत्तम सुगन्ध धारण करनेवाली, घृणित व्यवहारसे रहित, सुखशालिनी और भोग-सामग्रीसे सम्पन्न हैं, उन वेश (शृंगार) धारण करानेवाली स्त्रियोंकी भी कुशल पूछना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— “ପ୍ରିୟ ସଞ୍ଜୟ, ଯେ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ବେଶ-ଭୂଷା ଓ ଶୃଙ୍ଗାରର ସେବା କରନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କ କୁଶଳ ମଧ୍ୟ ପଚାର—ଯାହାଙ୍କ ଦର୍ଶନ ମନୋହର, ବାକ୍ୟ ମୃଦୁ; ଯେମାନେ ଆଭୂଷଣରେ ଅଲଙ୍କୃତ, ଉତ୍ତମ ବସ୍ତ୍ରରେ ସୁଶୋଭିତ, ସୁଗନ୍ଧିତ; ଘୃଣିତ ଆଚରଣରହିତ, ସୁଖୀ ଓ ଭୋଗ-ସାମଗ୍ରୀରେ ସମ୍ପନ୍ନ।”

Verse 39

दास्य: स्युर्या ये च दासा: कुरूणां तदाश्रया बहव: कुब्जखजञ्जा: | आखूयाय मां कुशलिन सम तेभ्यो- 5प्यनामयं परिपृच्छेर्जघन्यम्‌,कौरवोंके जो दास-दासियाँ हों तथा उनके आश्रित जो बहुत-से कुबड़े और लँगड़े मनुष्य रहते हों, उन सबसे मुझे सकुशल बताकर अन्तमें मेरी ओरसे उनकी भी कुशल पूछना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—କୌରବମାନଙ୍କର ଯେ ଦାସ-ଦାସୀ ଅଛନ୍ତି ଓ ତାଙ୍କ ଆଶ୍ରୟରେ ରହୁଥିବା ଅନେକ କୁବ୍ଜ ଓ ଖଞ୍ଜ ଲୋକ ଅଛନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ମୋର କୁଶଳ ସମ୍ବାଦ କହ; ଏବଂ ଶେଷରେ ମୋ ପକ୍ଷରୁ ସେମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ କୁଶଳ-କ୍ଷେମ ପଚାର।

Verse 40

कच्चिद्‌ वृत्तिं वर्तते वै पुराणीं कच्चिद्‌ भोगान्‌ धार्तराष्ट्रो ददाति । अंगहीनान्‌ कृपणान्‌ वामनान्‌ वा यानानृशंस्यो धृतराष्ट्रो बिभर्ति,(और कहना--) क्या राजा धृतराष्ट्र दयावश जिन अंगहीनों, दीनों और बौने मनुष्योंका पालन करते हैं, उन्हें दुर्योधन भरण-पोषणकी सामग्री देता है? क्या वह उनकी प्राचीन जीविका-वृत्तिका निर्वाह करता है?

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ସେମାନଙ୍କର ପୁରୁଣା, ପରମ୍ପରାଗତ ଜୀବିକା-ବୃତ୍ତି କି ଏବେ ମଧ୍ୟ ଚାଲୁଛି? ଧାର୍ତ୍ତରାଷ୍ଟ୍ର (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ) କି ସେମାନଙ୍କୁ ଭୋଗ-ସାମଗ୍ରୀ ଓ ନିର୍ବାହ ଦେଉଛି? ଏବଂ ଦୟାଳୁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଯେଉଁ ଅଙ୍ଗହୀନ, ଦୀନ ଓ ବାମନ ଲୋକଙ୍କୁ ପାଳନ କରନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କ ପୋଷଣ ପାଇଁ ଆବଶ୍ୟକ ସାମଗ୍ରୀ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଯୋଗାଉଛି କି?

Verse 41

अन्धांश्व सर्वान्‌ स्थविरांस्तथैव हस्त्याजीवा बहवो ये>त्र सन्ति । आखूयाय मां कुशलिन सम तेभ्यो- 5प्यनामयं परिपृच्छेर्जघन्यम्‌

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଏଠାରେ ଥିବା ସମସ୍ତ ଅନ୍ଧ, ସମସ୍ତ ବୃଦ୍ଧ, ଏବଂ ଏଠାରେ ଥିବା ଅନେକ ହସ୍ତ୍ୟାଜୀବ (ହାତୀ ଉପରେ ଜୀବିକା କରୁଥିବା) ଲୋକ—ସେମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ମୋର କୁଶଳ କହ; ଏବଂ ଶେଷରେ ସେମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ଆରୋଗ୍ୟ-କ୍ଷେମ ପଚାର। ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ନିମ୍ନ ଲୋକଟିଏ ମଧ୍ୟ ପଚାରା ଛାଡ଼ି ରହିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।

Verse 42

हस्तिनापुरमें जो बहुत-से हाथीवान हैं तथा जो अन्धे और बूढ़े हैं, उन सबको मेरी कुशल बताकर अन्तमें मेरी ओरसे उनके भी आरोग्य आदिका समाचार पूछना ।। मा भैष्ट दुःखेन कुजीवितेन नूनं कृतं परलोकेषु पापम्‌ । निगृहा शत्रून्‌ सुहृदो$नुगृहा वासोभिरन्नेन च वो भरिष्ये,साथ ही उन्हें आश्वासन देते हुए मेरा यह संदेश सुना देना। तुम्हें जो दुःख प्राप्त होता है अथवा कुत्सित जीवन बिताना पड़ता है, इसके कारण तुमलोग भयभीत न होना। निश्चय ही यह दूसरे जन्मोंमें किये हुए पापका फल प्रकट हुआ है। मैं कुछ ही दिनोंमें अपने शत्रुओंको कैद करके हितैषी सुहृदोंपर अनुग्रह करते हुए अन्न और वस्त्रद्वारा तुमलोगोंका भरण- पोषण करूँगा

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହସ୍ତିନାପୁରରେ ଥିବା ଅନେକ ହସ୍ତ୍ୟାଜୀବ, ଏବଂ ଯେଉଁମାନେ ଅନ୍ଧ ଓ ବୃଦ୍ଧ—ସେମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ମୋର କୁଶଳ କହ; ଏବଂ ଶେଷରେ ମୋ ପକ୍ଷରୁ ସେମାନଙ୍କର ମଧ୍ୟ ଆରୋଗ୍ୟାଦି କୁଶଳ-କ୍ଷେମ ପଚାର। ତା’ପରେ ସେମାନଙ୍କୁ ଆଶ୍ୱାସନ ଦେଇ ମୋର ଏହି ସନ୍ଦେଶ ଶୁଣା—ଦୁଃଖ କିମ୍ବା ନିନ୍ଦିତ ଜୀବନ ଯାପନ କରିବାକୁ ପଡ଼ୁଛି ବୋଲି ଭୟ କରନି; ନିଶ୍ଚୟ ଏହା ପୂର୍ବଜନ୍ମର ପାପଫଳ ପକ୍କ ହୋଇ ପ୍ରକଟ ହୋଇଛି। ମୁଁ ଶୀଘ୍ର ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଦମନ କରି ବନ୍ଦୀ କରିବି, ସୁହୃଦମାନଙ୍କୁ ଅନୁଗ୍ରହ କରିବି, ଏବଂ ଅନ୍ନ ଓ ବସ୍ତ୍ର ଦ୍ୱାରା ତୁମମାନଙ୍କୁ ପୋଷଣ କରିବି।

Verse 43

सन्त्येव मे ब्राह्मणेभ्य: कृतानि भावीन्यथो नो बत वर्तयन्ति । तान्‌ पश्यामि युक्तरूपांस्तथैव तामेव सिद्धि श्रावयेथा नृपं तम्‌,राजा दुर्योधनसे कहना, मैंने कुछ ब्राह्मणोंके लिये वार्षिक जीविका-वृत्तियाँ नियत कर रखी थीं, किंतु खेद है कि तुम्हारे कर्मचारीगण उन्हें ठीकसे नहीं चला रहे हैं। मैं उन ब्राह्मणोंको पुनः पूर्ववत्‌ उन्हीं वृत्तियोंसे युता देखना चाहता हूँ। तुम किसी दूतके द्वारा मुझे यह समाचार सुना दो कि उन वृत्तियोंका अब यथावत्रूपसे पालन होने लगा है

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—କିଛି ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ପାଇଁ ମୁଁ ବାର୍ଷିକ ଜୀବିକା-ବୃତ୍ତି ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରି ରଖିଥିଲି; କିନ୍ତୁ ହାୟ, ସେଗୁଡ଼ିକ ଯଥାଯଥ ଭାବେ ଚାଲୁନାହିଁ। ମୁଁ ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ପୁନଃ ପୂର୍ବବତ୍ ଯଥୋଚିତ ଭାବେ ସେଇ ବୃତ୍ତିଗୁଡ଼ିକରେ ଯୁକ୍ତ ଦେଖିବାକୁ ଚାହୁଁଛି। ତେଣୁ ଦୂତ ମାଧ୍ୟମରେ ସେ ରାଜାଙ୍କୁ ଏହି ସମ୍ବାଦ ଶୁଣାଇଦିଅ—ଏବେ ସେ ବୃତ୍ତିଗୁଡ଼ିକ ଯଥାବତ୍ ଭାବେ ପାଳିତ ହେଉଛି।

Verse 44

ये चानाथा दुबला: सर्वकाल- मात्मन्येव प्रयतन्ते5थ मूढा: । तांश्वापि त्वं कृपणान्‌ सर्वथैव हास्मद्वाक्यात्‌ कुशलं तात पृच्छे:,संजय! जो अनाथ, दुर्बल एवं मूर्खजन सदा अपने शरीरका पोषण करनेके लिये ही प्रयत्न करते हैं, तुम मेरे कहनेसे उन दीनजनोंके पास भी जाकर सब प्रकारसे उनका कुशल-समाचार पूछना

ଆଉ ଯେମାନେ ଅନାଥ, ଦୁର୍ବଳ ଓ ମୋହଗ୍ରସ୍ତ—ଯେମାନେ ସଦା କେବଳ ନିଜ ଦେହଧାରଣ ପାଇଁ ହିଁ ପ୍ରୟାସ କରନ୍ତି—ହେ ସଞ୍ଜୟ, ମୋ କଥାରେ ତୁମେ କୃପାକରି ସେହି ଦୀନଜନଙ୍କ ପାଖକୁ ମଧ୍ୟ ଯାଇ ସବୁ ପ୍ରକାରେ ତାଙ୍କର କୁଶଳ ସମ୍ବାଦ ପଚାର।

Verse 45

ये चाप्यन्ये संश्रिता धार्तराष्ट्रान्‌ नानादिग्भ्यो5 भ्यागता: सूतपुत्र । दृष्टवा तांश्चैवार्हतश्चापि सर्वान्‌ सम्पृच्छेथा: कुशलं चाव्ययं च,सूतपुत्र! इनके सिवा विभिन्न दिशाओंसे आये हुए दूसरे-दूसरे लोग धृतराष्ट्रपुत्रोंका आश्रय लेकर रहते हैं। उन सब माननीय पुरुषोंसे भी मिलकर उनकी कुशल और क्‍या वे जीवित बचे रहेंगे, इस सम्बन्धमें भी प्रश्न करना

ଏହାଛଡ଼ା ଅନେକ ଦିଗରୁ ଆସି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ଆଶ୍ରୟ ନେଇଥିବା ଅନ୍ୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି—ହେ ସୂତପୁତ୍ର, ସେମାନଙ୍କୁ ଓ ସମସ୍ତ ମାନ୍ୟଜନଙ୍କୁ ଦେଖି ତାଙ୍କର କୁଶଳ ପଚାର; ଏବଂ ସେମାନେ ସୁରକ୍ଷିତ ଓ ଅନାହତ ଅଛନ୍ତି କି ନାହିଁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଶ୍ନ କର।

Verse 46

एवं सर्वानागताभ्यागतांश्ष॒ राज्ञो दूतान्‌ सर्वदिग्भ्यो<्भ्युपेतान्‌ । पृष्टवा सर्वान्‌ कुशल तांश्व सूत पश्चादहं कुशली तेषु वाच्य:,इस प्रकार वहाँ सब दिशाओंसे पधारे हुए राजदूतों तथा अन्य सब अभ्यागतोंसे कुशल- मंगल पूछकर अन्तमें उनसे मेरा कुशल-समाचार भी निवेदन करना

ଏହିପରି ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ଆସିଥିବା ରାଜଦୂତମାନେ ଓ ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ଅଭ୍ୟାଗତଙ୍କର ପ୍ରଥମେ କୁଶଳ-ମଙ୍ଗଳ ପଚାରି, ହେ ସୂତ, ଶେଷରେ ସେମାନଙ୍କୁ ମୋ କୁଶଳ ସମ୍ବାଦ ମଧ୍ୟ ଜଣାଇଦେବା।

Verse 47

न हीदृशा: सन्त्यपरे पृथिव्यां ये योधका धार्तराष्ट्रेण लब्धा: । धर्मस्तु नित्यो मम धर्म एव महाबल: शत्रुनिबर्हणाय,यद्यपि दुर्योधनने जिन योद्धाओंका संग्रह किया है, वैसे वीर इस भूमण्डलमें दूसरे नहीं हैं, तथापि धर्म ही नित्य है और मेरे पास शत्रुओंका नाश करनेके लिये धर्मका ही सबसे महान्‌ बल है

ଏହି ପୃଥିବୀରେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଯେଉଁ ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କୁ ସଂଗ୍ରହ କରିଛି, ସେମାନଙ୍କ ପରି ଅନ୍ୟ କେହି ନାହାନ୍ତି। ତଥାପି ଧର୍ମ ହିଁ ନିତ୍ୟ; ଏବଂ ଶତ୍ରୁନାଶ ପାଇଁ ମୋ ପାଖରେ ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହାବଳ ଧର୍ମ ହିଁ।

Verse 48

इदं पुनर्वचन धार्त॑राष्ट्र सुयोधनं संजय श्रावयेथा: । यस्ते शरीरे हृदयं दुनोति काम: कुरूनसपत्नो<नुशिष्याम्‌,संजय! दुर्योधनको तुम मेरी यह बात पुनः सुना देना--“ तुम्हारे शरीरके भीतर मनमें जो यह अभिलाषा उत्पन्न हुई है कि मैं कौरवोंका निष्कण्टक राज्य करूँ, वह तुम्हारे हृदयको पीड़ा-मात्र दे रही है। उसकी सिद्धिका कोई उपाय नहीं है। हम ऐसे पौरुषहीन नहीं हैं कि तुम्हारा यह प्रिय कार्य होने दें। भरतवंशके प्रमुख वीर! तुम इन्द्रप्रस्थपुरी फिर मुझे ही लौटा दो अथवा युद्ध करो”

ହେ ସଞ୍ଜୟ, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ସୁୟୋଧନଙ୍କୁ ମୋ ଏହି କଥା ପୁନର୍ବାର ଶୁଣାଇଦେବା—“କୁରୁମାନଙ୍କୁ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦ୍ୱୀହୀନ ଭାବେ ଶାସନ କରିବି ବୋଲି ତୋ ଭିତରେ ଯେ ଆକାଙ୍କ୍ଷା ଜାଗିଛି, ସେଇ ତୋ ହୃଦୟକୁ ମାତ୍ର ପୀଡ଼ା ଦେଉଛି। ତାହା ସିଦ୍ଧ ହେବାର କୌଣସି ଉପାୟ ନାହିଁ। ତୋ ପ୍ରିୟ କାର୍ଯ୍ୟ ସଫଳ ହେବାକୁ ଦେବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଆମେ ଏତେ ପୌରୁଷହୀନ ନୁହେଁ। ହେ ଭାରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୀର, ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥ ମୋତେ ଫେରାଇଦେ; ନଚେତ୍ ଯୁଦ୍ଧ ବାଛ।”

Verse 49

न विद्यते युक्तिरेतस्य काचि- न्नैवंविधा: स्याम यथा प्रियं ते । ददस्व वा शक्रपुरी ममैव युध्यस्व वा भारतमुख्य वीर,संजय! दुर्योधनको तुम मेरी यह बात पुनः सुना देना--“ तुम्हारे शरीरके भीतर मनमें जो यह अभिलाषा उत्पन्न हुई है कि मैं कौरवोंका निष्कण्टक राज्य करूँ, वह तुम्हारे हृदयको पीड़ा-मात्र दे रही है। उसकी सिद्धिका कोई उपाय नहीं है। हम ऐसे पौरुषहीन नहीं हैं कि तुम्हारा यह प्रिय कार्य होने दें। भरतवंशके प्रमुख वीर! तुम इन्द्रप्रस्थपुरी फिर मुझे ही लौटा दो अथवा युद्ध करो”

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ତୁମର ଏହି ଇଚ୍ଛା ସିଦ୍ଧ ହେବା ପାଇଁ କୌଣସି ଉପାୟ ନାହିଁ। ଆମ ହାନିରେ ତୁମ ପ୍ରିୟ କାର୍ଯ୍ୟ ସାଧିତ ହେବାକୁ ଦେବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଆମେ ଏତେ ଦୁର୍ବଳ ନୁହେଁ। ତେଣୁ, ହେ ଭରତବଂଶର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୀର! ଶକ୍ରପୁରୀ (ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥ) ମୋତେ ଫେରାଇ ଦିଅ, ନହେଲେ ଯୁଦ୍ଧ କର।”

Verse 106

श्लाघस्व मां कुशलिन सम तेभ्यो हानामयं तात पृच्छेर्जघन्यम्‌ । तात! जो अअभ्रोत्रिय (शूद्र) वृद्ध पुरुष मनस्वी तथा शील और बलसे सम्पन्न हैं एवं हस्तिनापुरमें निवास करते हैं, जो यथाशक्ति कुछ धर्मका आचरण करते हुए हमलोगोंके प्रति शुभ कामना रखते हैं और बारंबार हमें याद करते हैं, उन सबसे हमलोगोंका कुशल- समाचार निवेदन करना। तत्पश्चात्‌ उनके स्वास्थ्यका समाचार पूछना

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—“ହେ ଭାଗ୍ୟବାନ! ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ମୋର ପ୍ରଣାମ ଜଣାଇବୁ, ପ୍ରିୟ, ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ କୁଶଳ-କ୍ଷେମ ଓ ରୋଗମୁକ୍ତିର ସମାଚାର ପଚାରିବୁ। ବିଶେଷକରି ହସ୍ତିନାପୁରରେ ବସୁଥିବା ସେଇ ବୃଦ୍ଧମାନେ—ଯେମାନେ ଶୂଦ୍ର ଓ ଶ୍ରୋତ୍ରିୟ ନୁହେଁ, ତଥାପି ଦୃଢମନ, ଶୀଳବାନ ଓ ବଳବାନ; ଯେମାନେ ଯଥାଶକ୍ତି ଧର୍ମାଚରଣ କରନ୍ତି, ଆମ ପ୍ରତି ଶୁଭକାମନା ରଖନ୍ତି ଏବଂ ପୁନଃପୁନଃ ଆମକୁ ସ୍ମରଣ କରନ୍ତି—ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଆମ କୁଶଳ ସମାଚାର ଜଣାଇବୁ। ତା’ପରେ ସାବଧାନରେ ସେମାନଙ୍କ ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟ ପଚାରିବୁ।”

Frequently Asked Questions

How to preserve kinship and political stability through peace while refusing to legitimize greed-based dispossession—i.e., whether conciliation remains ethical when restitution is systematically denied.

That karma—steady, role-aligned action—sustains both cosmic order and social order; therefore governance must be disciplined, lawful, and corrective rather than driven by desire or anger.

No explicit phalaśruti is stated; instead the chapter uses consequential reasoning—social and cosmic analogies—to imply that understanding and practicing dharma-aligned action yields stability, while injustice yields systemic collapse.