शारद्वतस्यावसथ्ं सम गत्वा महारथस्यात्मविदां वरस्य । त्वं मामभीक्ष्णं परिकीर्तयन् वै कृपस्य पादौ संजय पाणिना स्पृशे:,संजय! तदनन्तर आत्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महारथी कृपाचार्यके घर जाकर बारंबार मेरा नाम लेते हुए अपने हाथसे उनके दोनों चरणोंका स्पर्श करना
ସଞ୍ଜୟ! ଶାରଦ୍ୱତପୁତ୍ର, ଆତ୍ମବିଦ୍ୟାରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହାରଥୀ କୃପାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ଗୃହକୁ ଯାଇ, ବାରମ୍ବାର ମୋ ନାମ ଉଚ୍ଚାରଣ କରି, ନିଜ ହାତରେ ତାଙ୍କ ଦୁଇ ଚରଣ ସ୍ପର୍ଶ କର।
युधिछिर उवाच