अध्याय २९ — वासुदेव–संजय संवादः
Karma, Varṇa-Dharma, and the Ethics of Governance
या नो भार्या: संजय वेत्थ तत्र तासां सर्वासां कुशल तात पृच्छे: । सुसंगुप्ता: सुरभयो5नवद्या: कच्चिद् गृहानावसथाप्रमत्ता:,तात संजय! हस्तिनापुरमें हमारे भाइयोंकी जो स्त्रियाँ हैं, उन सबको तो तुम जानते ही हो। उन सबकी कुशल पूछना और कहना क्या तुमलोग सर्वथा सुरक्षित रहकर निर्दोष जीवन बिता रही हो? तुम्हें आवश्यक सुगन्ध आदि प्रसाधन-सामग्रियाँ प्राप्त होती हैं न? तुम घरमें प्रमादशून्य होकर रहती हो न? भद्र महिलाओ! क्या तुम अपने श्वशुरजनोंके प्रति क्रूरतारहित कल्याणकारी बर्ताव करती हो तथा जिस प्रकार तुम्हारे पति अनुकूल बने रहें, वैसे व्यवहार और सद्भावको अपने हृदयमें स्थान देती हो?
yā no bhāryāḥ sañjaya vettha tatra tāsāṁ sarvāsāṁ kuśala tāta pṛcchaḥ | susaṁguptāḥ surabhayo 'navadyāḥ kaccid gṛhān āvasathāpramattāḥ ||
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— “ସଞ୍ଜୟ, ହସ୍ତିନାପୁରରେ ଆମ ଭାଇମାନଙ୍କ ଯେ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ଅଛନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କୁ ତୁମେ ଜାଣ। ପ୍ରିୟ, ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ କୁଶଳ ପଚାର। ସେମାନେ କି ଭଲଭାବେ ସୁରକ୍ଷିତ ଓ ନିର୍ଦୋଷ ଆଚରଣରେ ଜୀବନ ଯାପନ କରୁଛନ୍ତି? ସୁଗନ୍ଧିତ ଉବଟଣ ଆଦି ଆବଶ୍ୟକ ପ୍ରସାଧନ-ସାମଗ୍ରୀ ସେମାନଙ୍କୁ ମିଳୁଛି କି? ଘରେ ସେମାନେ କି ସତର୍କ ଓ ଅପ୍ରମତ୍ତ ରହୁଛନ୍ତି?”
युधिछिर उवाच