Adhyaya 28
Udyoga ParvaAdhyaya 2859 Verses

Adhyaya 28

Udyoga-parva Adhyāya 28: Dharmādharmalakṣaṇa in Āpad (Crisis-Discernment of Right and Wrong)

Upa-parva: Sañjaya–Yudhiṣṭhira Dharmādharmaviveka (Ethical Discernment in Crisis)

Yudhiṣṭhira addresses Sañjaya and accepts the premise that dharma is superior among human undertakings, while insisting on accountability: Sañjaya should censure him if he strays into adharma. He then articulates the epistemic difficulty of moral judgment in crisis—adharma can wear the forms of dharma and dharma can appear as adharma; therefore, only the wise, through बुद्धि (reflective intelligence), can correctly perceive the distinction. He proposes a diagnostic rule for āpaddharma: the ‘first sign’ (ādya-liṅga) or primary indicator becomes the measure for determining what is legitimate under distress. He notes that when normal conditions (prakṛti) are disrupted, acts undertaken to accomplish necessary ends may still be blameworthy, and even those who remain in ordinary conditions while behaving as if in crisis can be censurable. He references prāyaścitta (expiation) as a divinely instituted corrective for Brahmins seeking non-violation, and he frames improper crisis-conduct (vikarma) as subject to critique. The chapter contrasts disciplined ethical inquiry with indiscriminate negationism and extreme prescriptions. It culminates in a pragmatic turn: Yudhiṣṭhira invokes Kṛṣṇa (Keśava/Vāsudeva) as a competent arbiter of action and consequence, describing the Yādava-Vṛṣṇi-Andhaka political strength and Kṛṣṇa’s capacity to guide rulers, and requests Kṛṣṇa’s counsel on whether relinquishment or battle would avoid blame while preserving svadharma.

Chapter Arc: संजय के वचनों के प्रत्युत्तर में श्रीकृष्ण का स्वर कठोर हो उठता है—वे धृतराष्ट्र के लिए चेतावनी बनकर कहते हैं कि पाण्डवों की अविनाशिता और धर्म-बल को हल्के में लेना विनाश को बुलाना है। → कृष्ण धृतराष्ट्र-पुत्रों की लोभ-ग्रस्तता और सभा की कायर चुप्पी को उघाड़ते हैं: युधिष्ठिर का शम (क्षमा-शान्ति) ‘सुदुष्कर’ होते हुए भी प्रदर्शित हुआ, फिर भी धृतराष्ट्र सपरिवार गृद्ध (लालची) बना रहा—ऐसे में कलह क्यों न भड़के? वे संकेत करते हैं कि यदि पाण्डव पितृ-धर्म निभाते हुए भी दिष्टवश मृत्यु को प्राप्त हों, तो वह भी उनके लिए प्रशस्त निधन होगा—पर अधर्मियों के लिए नहीं। → सभा-धर्म का निर्णायक क्षण आता है: द्यूतकाले शकुनि की निकृष्ट वाणी और छल का स्मरण कराया जाता है, और बताया जाता है कि कैसे ‘कार्पण्य’ से ग्रस्त राजाओं ने प्रतिवचन न किया; केवल विदुर (क्षत्ता) ने धर्म्य अर्थ बोलकर अल्पबुद्धि को प्रत्युत्तर दिया। यही बिन्दु धृतराष्ट्र के राज्य में अधर्म के संस्थानीकरण का प्रमाण बनता है। → कृष्ण संजय के माध्यम से धृतराष्ट्र को अंतिम रूप से स्पष्ट करते हैं: पाण्डव शान्ति के लिए स्थिर हैं, सेवा-भाव से भी खड़े हैं, पर वे योद्धा भी समर्थ हैं—धृतराष्ट्र जो कर्तव्य चुनेगा, वही परिणाम का द्वार खोलेगा। क्षत्रिय-धर्म, प्रजा-रक्षा, दान-यज्ञ और धर्म-अध्ययन का स्मरण कराकर वे नीति का मार्ग दिखाते हैं। → धृतराष्ट्र क्या विदुर-वाणी और कृष्ण-चेतावनी को स्वीकार करेगा, या पुत्र-मोह और शकुनि-नीति के साथ चलकर युद्ध को अपरिहार्य बना देगा?

Shlokas

Verse 1

ऑपन-माज बक। डे: एकोनत्रिशो< ध्याय: संजयकी बातोंका प्रत्युत्तर देते हुए श्रीकृष्णका उसे धृतराष्ट्रके लिये चेतावनी देना वायुदेव उवाच अविनाशं संजय पाण्डवाना- मिच्छाम्यहं भूतिमेषां प्रियं च । तथा राज्ञो धृतराष्ट्रस्य सूत समाशंसे बहुपुत्रस्य वृद्धिम्‌,भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा--सूत संजय! मैं जिस प्रकार पाण्डवोंको विनाशसे बचाना, उनको ऐश्वर्य दिलाना तथा उनका प्रिय करना चाहता हूँ, उसी प्रकार अनेक पुत्रोंसे युक्त राजा धृतराष्ट्रका भी अभ्युदय चाहता हूँ

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ—ହେ ସୂତ ସଞ୍ଜୟ, ମୁଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ବିନାଶରୁ ରକ୍ଷା କରିବାକୁ, ସେମାନଙ୍କୁ ଐଶ୍ୱର୍ୟ ଦେବାକୁ ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ ପ୍ରିୟକୁ ସିଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି। ସେହିଭଳି ଅନେକ ପୁତ୍ରଯୁକ୍ତ ବୃଦ୍ଧ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ମଙ୍ଗଳ ଓ ଅଭ୍ୟୁଦୟକୁ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଆଶା କରୁଛି।

Verse 2

१ ॥ जज है ्द् जि - ] अ&24७०॥ के ५ | क 5" ः घ. - न है. २ पे ० > 5760४. ह «२७ | ७ शक $ कैप: + 65 30 प्र. ४७०० २७. कामो हि मे संजय नित्यमेव नान्यद्‌ ब्रूयां तान्‌ प्रति शाम्यतेति । राज्ञश्न हि प्रियमेतच्छुणोमि मन्ये चैतत्‌ पाण्डवानां समक्षम्‌,सूत! मेरी भी सदा यही अभिलाषा है कि दोनों पक्षोंमें शान्ति बनी रहे। “कुन्तीकुमारो! कौरवोंसे संधि करो, उनके प्रति शान्त बने रहो,” इसके सिवा दूसरी कोई बात मैं पाण्डवोंके सामने नहीं कहता हूँ। राजा युधिष्ठिरके मुँहसे भी ऐसा ही प्रिय वचन सुनता हूँ और स्वयं भी इसीको ठीक मानता हूँ

ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ, ମୋର ନିତ୍ୟ ଇଚ୍ଛା ଏହିଏ: ଉଭୟ ପକ୍ଷରେ ଶାନ୍ତି ସ୍ଥାପିତ ହେଉ। ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ମୁଁ ଏହା ଛଡ଼ା ଅନ୍ୟ କିଛି କହେନି—“କୌରବମାନଙ୍କ ସହ ସନ୍ଧି କର; ସେମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଶାନ୍ତ ରୁହ।” ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ମୁଖରୁ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଏହି ଏକେ ପ୍ରିୟ ଉପଦେଶ ଶୁଣେ, ଏବଂ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଏହାକୁ ଯଥାର୍ଥ ମନେ କରେ।

Verse 3

सुदुष्करस्तत्र शमो हि नून॑ प्रदर्शित: संजय पाण्डवेन । यस्मिन्‌ गृद्धो धृतराष्ट्र: सपुत्र: कस्मादेषां कलहो नावमूच्छेत्‌,संजय! जैसा कि पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने प्रकट किया है, राज्यके प्रश्नोंको लेकर दोनों पक्षोंमें शान्ति बनी रहे, यह अत्यन्त दुष्कर जान पड़ता है। पुत्रों-सहित धृतराष्ट्र (इनके स्वत्वरूप) जिस राज्यमें आसक्त होकर उसे लेनेकी इच्छा करते हैं, उसके लिये इन कौरव- पाण्डवोंमें कलह कैसे नहीं बढ़ेगा?

ସଞ୍ଜୟ! ପାଣ୍ଡବ ଯେଉଁ ଶାନ୍ତିର ପଥ ସେଠାରେ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛନ୍ତି, ତାହାକୁ ଧାରଣ କରି ରଖିବା ନିଶ୍ଚୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଷ୍କର। ଯେ ରାଜ୍ୟ ପ୍ରତି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ପୁତ୍ରସହିତ ଲୋଭରେ ଆସକ୍ତ ଓ ତାହା ଅଧିକାର କରିବାକୁ ଆକାଙ୍କ୍ଷୀ—ସେଇ ରାଜ୍ୟକୁ ନେଇ ଏହି କୌରବ-ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କଳହ କିପରି ଭଡ଼ିବ ନାହିଁ?

Verse 4

न त्वं धर्म विचारं संजयेह मत्तश्न जानासि युधिष्ठिराच्च । अथो कस्मात्‌ संजय पाण्डवस्य उत्साहिन: पूरयत: स्वकर्म,संजय! तुम यह अच्छी तरह जानते हो कि मुझसे और युधिष्छिरसे धर्मका लोप नहीं हो सकता, तो भी जो उत्साहपूर्वक स्वधर्मका पालन करते हैं तथा शास्त्रोंमें जैसा बताया गया है, उसके अनुसार ही कुट॒म्ब (गृहस्थाश्रम)-में रहते हैं, उन्हीं पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके धर्मलोपकी चर्चा या आशंका तुमने पहले किस आधारपर की है? गृहस्थ आश्रममें रहनेकी जो शास्त्रोक्त विधि है, उसके होते हुए भी इसके ग्रहण अथवा त्यागके विषयमें वेदज्ञ ब्राह्मणोंके भिन्न-भिन्न विचार हैं

ସଞ୍ଜୟ! ଧର୍ମ ବିଷୟରେ ସନ୍ଦେହ କରନି। ତୁମେ ଭଲଭାବେ ଜାଣ ଯେ ମୋଠାରୁ ଓ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଠାରୁ ଧର୍ମଚ୍ୟୁତି ହୋଇପାରେ ନାହିଁ। ତେବେ ଯେ ପାଣ୍ଡବ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଉତ୍ସାହରେ ନିଜ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ପୂରଣ କରେ, ତାଙ୍କ ଧର୍ମହାନିର ଆଶଙ୍କା ତୁମେ ପୂର୍ବେ କେଉଁ ଆଧାରରେ କରିଥିଲ?

Verse 5

यथा55ख्यातमावसत: कुट॒म्बे पुरा कस्मात्‌ साधुविलोपमात्थ । अस्मिन्‌ विधौ वर्तमाने यथाव- दुच्चावचा मतयो ब्राह्मणानाम्‌,संजय! तुम यह अच्छी तरह जानते हो कि मुझसे और युधिष्छिरसे धर्मका लोप नहीं हो सकता, तो भी जो उत्साहपूर्वक स्वधर्मका पालन करते हैं तथा शास्त्रोंमें जैसा बताया गया है, उसके अनुसार ही कुट॒म्ब (गृहस्थाश्रम)-में रहते हैं, उन्हीं पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके धर्मलोपकी चर्चा या आशंका तुमने पहले किस आधारपर की है? गृहस्थ आश्रममें रहनेकी जो शास्त्रोक्त विधि है, उसके होते हुए भी इसके ग्रहण अथवा त्यागके विषयमें वेदज्ञ ब्राह्मणोंके भिन्न-भिन्न विचार हैं

ସଞ୍ଜୟ! ପରମ୍ପରାନୁସାରେ ଗୃହସ୍ଥାଶ୍ରମରେ ବସୁଥିବା ବ୍ୟକ୍ତି ବିଷୟରେ ତୁମେ ପୂର୍ବେ ‘ସାଧୁତାର ଲୋପ’ କାହିଁକି କହିଥିଲ? ଗୃହସ୍ଥଧର୍ମର ଏହି ଶାସ୍ତ୍ରୋକ୍ତ ବିଧି ଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ଏହାକୁ ଗ୍ରହଣ କରିବା କି ତ୍ୟାଗ କରିବା—ଏ ବିଷୟରେ ବେଦଜ୍ଞ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ମତ ଭିନ୍ନ-ଭିନ୍ନ।

Verse 6

कर्मणा<<हु: सिद्धिमेके परत्र हित्वा कर्म विद्यया सिद्धिमेके । नाभुज्जानो भक्ष्यभोज्यस्य तृप्येद्‌ विद्वानपीह विदहितं ब्राह्म॒णानाम्‌,कोई तो (गृहस्थाश्रममें रहकर) कर्मयोगके द्वारा ही परलोकमें सिद्धि-लाभ होनेकी बात बताते हैं,- दूसरे लोग कर्मको त्यागकर ज्ञानके द्वारा ही सिद्धि (मोक्ष)-का प्रतिपादन करते हैं। विद्वान्‌ पुरुष भी इस जगत्‌में भक्ष्य-भोज्य पदार्थोको भोजन किये बिना तृप्त नहीं हो सकता, अतएव दिद्वान्‌ ब्राह्मणके लिये भी क्षुधानिवृत्तिके लिये भोजन करनेका विधान है

କେହି କହନ୍ତି—କର୍ମ ଦ୍ୱାରା ପରଲୋକରେ ସିଦ୍ଧି ମିଳେ; ଆଉ କେହି କହନ୍ତି—କର୍ମ ତ୍ୟାଗ କରି ଜ୍ଞାନ ଦ୍ୱାରା ମାତ୍ର ସିଦ୍ଧି (ମୋକ୍ଷ) ଲଭ୍ୟ। କିନ୍ତୁ ଏହି ଲୋକରେ ବିଦ୍ୱାନ୍ ମଣିଷ ମଧ୍ୟ ଭକ୍ଷ୍ୟ-ଭୋଜ୍ୟ ସେବନ ନ କଲେ ତୃପ୍ତ ହୋଇପାରେ ନାହିଁ; ତେଣୁ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ କ୍ଷୁଧାନିବୃତ୍ତି ନିମିତ୍ତ ଭୋଜନର ବିଧାନ ଅଛି।

Verse 7

या वै विद्या: साधयन्तीह कर्म तासां फलं विद्यते नेतरासाम्‌ । तत्रेह वै दृष्टफलं तु कर्म पीत्वोदकं शाम्यति तृष्णयाडडर्त:,जो विद्याएँ कर्मका सम्पादन करती हैं, उन्हींका फल दृष्टिगोचर होता है, दूसरी विद्याओंका नहीं। विद्या तथा कर्ममें भी कर्मका ही फल यहाँ प्रत्यक्ष दिखायी देता है। प्याससे पीड़ित मनुष्य जल पीकर ही शान्त होता है (उसे जानकर नहीं; अतः गृहस्थाश्रममें रहकर सत्कर्म करना ही श्रेष्ठ है)

ଯେ ବିଦ୍ୟାମାନେ ଏଠାରେ କର୍ମସାଧନ କରାନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କର ଫଳ ମାତ୍ର ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ; ଅନ୍ୟମାନଙ୍କର ନୁହେଁ। ଏହି ଲୋକରେ ଦୃଷ୍ଟଫଳ ତ କର୍ମର ହିଁ—ଯେପରି ତୃଷ୍ଣାର୍ତ୍ତ ମଣିଷ ଜଳ ପିଇଲେ ମାତ୍ର ଶାନ୍ତ ହୁଏ; କେବଳ ଜାଣିଲେ ନୁହେଁ।

Verse 8

सो<यं विधिर्विहिित: कर्मणैव संवर्तते संजय तत्र कर्म | तत्र योडन्यत्‌ कर्मण: साधु मन्ये- न्मोघं तस्यालपितं दुर्बलस्य,संजय! ज्ञानका विधान भी कर्मको साथ लेकर ही है; अतः ज्ञानमें भी कर्म विद्यमान है। जो कर्मसे भिन्न कर्मोके त्यागको श्रेष्ठ मानता है, वह दुर्बल है, उसका कथन व्यर्थ ही है

ହେ ସଞ୍ଜୟ! ଏହି ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ବିଧି କର୍ମ ସହିତ ହିଁ ଚାଲେ; ସେଠାରେ କର୍ମ ଅନ୍ତର୍ନିହିତ। ଯେ କର୍ମରୁ ଏହାକୁ ଅଲଗା କରି କର୍ମତ୍ୟାଗକୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାବେ ମାନେ, ସେ ଦୁର୍ବଳ; ତାହାର କଥା ବ୍ୟର୍ଥ, ହେ ସଞ୍ଜୟ।

Verse 9

कर्मणामी भान्ति देवा: परत्र कर्मणैवेह प्लवते मातरिश्वा । अहोरात्रे विदधत्‌ कर्मणैव अतनन्‍्द्रितो नित्यमुदेति सूर्य:,ये देवता कर्मसे ही स्वर्गलोकमें प्रकाशित होते हैं। वायुदेव कर्मको अपनाकर ही सम्पूर्ण जगत्‌में विचरण करते हैं तथा सूर्यदेव आलस्य छोड़कर कर्म-द्वारा ही दिन-रातका विभाग करते हुए प्रतिदिन उदित होते हैं

ଦେବତାମାନେ ନିଜ କର୍ମଦ୍ୱାରା ପରଲୋକରେ ଦୀପ୍ତିମାନ ହୁଅନ୍ତି। ଏଠାରେ ମଧ୍ୟ ମାତରିଶ୍ୱା (ବାୟୁ) କର୍ମକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ସମଗ୍ର ଜଗତରେ ବିଚରଣ କରନ୍ତି; ଏବଂ ସୂର୍ଯ୍ୟଦେବ ଅଲସ୍ୟହୀନ ହୋଇ କର୍ମଦ୍ୱାରା ଦିନ-ରାତିର ବିଭାଗ କରି ପ୍ରତିଦିନ ଉଦୟ ହୁଅନ୍ତି।

Verse 10

मासार्धमासानथ नक्षत्रयोगा- नतन्द्रितश्रन्द्रमा श्चा भ्युपैति । अतन्द्रितो दहते जातवेदा: समिध्यमान: कर्म कुर्वन्‌ प्रजाभ्य:,चन्द्रमा भी आलस्य त्यागकर (कर्मके द्वारा ही) मास, पक्ष तथा नक्षत्रोंका योग प्राप्त करते हैं; इसी प्रकार जातवेदा (अग्निदेव) भी आलस्यरहित होकर प्रजाके लिये कर्म करते हुए ही प्रज्वलित होकर दाह-क्रिया सम्पन्न करते हैं

ଚନ୍ଦ୍ରମା ମଧ୍ୟ ଅଲସ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରି କର୍ମଦ୍ୱାରା ହିଁ ମାସ, ପକ୍ଷ ଓ ନକ୍ଷତ୍ର-ଯୋଗ ପ୍ରାପ୍ତ କରନ୍ତି। ସେହିପରି ଜାତବେଦା (ଅଗ୍ନିଦେବ) ମଧ୍ୟ ଅଲସ୍ୟହୀନ ହୋଇ, ପ୍ରଜାମାନଙ୍କ ହିତାର୍ଥେ ନିଜ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ କରି, ପ୍ରଜ୍ୱଲିତ ହେଲେ ଦାହ-କ୍ରିୟା ସମ୍ପନ୍ନ କରନ୍ତି।

Verse 11

अतन्द्रिता भारमिमं महान्तं बिभर्ति देवी पृथिवी बलेन । अतन्द्रिता: शीघ्रमपो वहन्ति संतर्पयन्त्य: सर्वभूतानि नद्यः,पृथ्वीदेवी भी आलस्यशून्य हो (कर्ममें तत्पर रहकर ही) बलपूर्वक विश्वके इस महान्‌ भारको ढोती हैं। ये नदियाँ भी आलस्य छोड़कर (कर्मपरायण हो) सम्पूर्ण प्राणियोंको तृप्त करती हुई शीघ्रतापूर्वक जल बहाया करती हैं

ପୃଥିବୀଦେବୀ ମଧ୍ୟ ଅତନ୍ଦ୍ରିତ ହୋଇ, କର୍ମରେ ତତ୍ପର ରହି, ନିଜ ବଳରେ ଏହି ମହାଭାର ବହନ କରନ୍ତି। ନଦୀମାନେ ମଧ୍ୟ ଅଲସ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରି ଶୀଘ୍ର ଜଳ ବହାଇ, ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କୁ ସନ୍ତର୍ପିତ କରନ୍ତି।

Verse 12

अतन्द्रितो वर्षति भूरितेजा: संनादयजन्नन्तरिक्षं दिशश्चव । अतनन्‍्द्रितो ब्रह्मचर्य चचार श्रेष्ठव्वमिच्छन्‌ बलभिद्‌ देवतानाम्‌

ଅତନ୍ଦ୍ରିତ ହୋଇ, ଅପାର ତେଜସ୍ବୀ ସେ ବର୍ଷା ବର୍ଷାଇଲେ; ତାହାରେ ଅନ୍ତରିକ୍ଷ ଓ ଦିଗମାନ ଗର୍ଜନରେ ଗୁଞ୍ଜି ଉଠିଲା। ଏବଂ ଅତନ୍ଦ୍ରିତ ହୋଇ ସେ ବ୍ରହ୍ମଚର୍ୟ ଆଚରଣ କଲେ—ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠତ୍ୱ ଇଚ୍ଛା କରି; ସେ ହେଉଛନ୍ତି ବଳଭିଦ୍।

Verse 13

जिन्होंने देवताओंमें श्रेष्ठ स्थान पानेकी इच्छासे तन्‍्द्रारहित होकर ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया था, वे महातेजस्वी बलसूदन इन्द्र भी आलस्य छोड़कर (कर्मपरायण होकर ही) मेघगर्जनाद्वारा आकाश तथा दिशाओंको गुँजाते हुए समय-समयपर वर्षा करते हैं ।। हित्वा सुखं मनसश्न प्रियाणि तेन शक्र: कर्मणा श्रैष्ठ्यमाप । सत्यं धर्म पालयन्नप्रमत्तो दमं तितिक्षां समतां प्रियं च,इन्द्रने सुख तथा मनको प्रिय लगनेवाली वस्तुओंका त्याग करके सत्कर्मके बलसे ही देवताओंमें ऊँची स्थिति प्राप्त की। उन्होंने सावधान होकर सत्य, धर्म, इन्द्रियसंयम, सहिष्णुता, समदर्शिता तथा सबको प्रिय लगनेवाले उत्तम बर्तावका पालन किया था। इन समस्त सदगुणोंका सेवन करनेके कारण ही इन्द्रको देवसग्राट्का श्रेष्ठ पद प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार बृहस्पतिजीने भी नियमपूर्वक समाहित एवं संयतचित्त होकर सुखका परित्याग करके समस्त इन्द्रियोंकों अपने वशमें रखते हुए ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया था। इसी सत्कर्मके प्रभावसे उन्होंने देवगुरुका सम्मानित पद प्राप्त किया है। आकाशके सारे नक्षत्र सत्कर्मके ही प्रभावसे परलोकमें प्रकाशित हो रहे हैं। रुद्र, आदित्य, वसु तथा विश्वदेवगण भी कर्मबलसे ही महत्त्वको प्राप्त हुए हैं

ବାୟୁ କହିଲେ—ସୁଖ ଓ ମନକୁ ପ୍ରିୟ ଲାଗୁଥିବା ବସ୍ତୁମାନଙ୍କୁ ତ୍ୟାଗ କରି ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ନିୟମିତ କର୍ମଦ୍ୱାରା ସର୍ବୋଚ୍ଚ ଶ୍ରେଷ୍ଠତା ପାଇଲେ। ସେ ସଦା ସଚେତନ ରହି ସତ୍ୟ ଓ ଧର୍ମ ପାଳନ କରି, ଇନ୍ଦ୍ରିୟ-ନିଗ୍ରହ, ସହିଷ୍ଣୁତା, ସମଭାବ ଓ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ ଓ ହିତକର ଆଚରଣ ଅଭ୍ୟାସ କଲେ।

Verse 14

एतानि सर्वाण्युपसेवमान: स देवराज्यं मघवान्‌ प्राप मुख्यम्‌ । बृहस्पतिर्तब्रह्मचर्य चचार समाहित: संशितात्मा यथावत्‌,इन्द्रने सुख तथा मनको प्रिय लगनेवाली वस्तुओंका त्याग करके सत्कर्मके बलसे ही देवताओंमें ऊँची स्थिति प्राप्त की। उन्होंने सावधान होकर सत्य, धर्म, इन्द्रियसंयम, सहिष्णुता, समदर्शिता तथा सबको प्रिय लगनेवाले उत्तम बर्तावका पालन किया था। इन समस्त सदगुणोंका सेवन करनेके कारण ही इन्द्रको देवसग्राट्का श्रेष्ठ पद प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार बृहस्पतिजीने भी नियमपूर्वक समाहित एवं संयतचित्त होकर सुखका परित्याग करके समस्त इन्द्रियोंकों अपने वशमें रखते हुए ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया था। इसी सत्कर्मके प्रभावसे उन्होंने देवगुरुका सम्मानित पद प्राप्त किया है। आकाशके सारे नक्षत्र सत्कर्मके ही प्रभावसे परलोकमें प्रकाशित हो रहे हैं। रुद्र, आदित्य, वसु तथा विश्वदेवगण भी कर्मबलसे ही महत्त्वको प्राप्त हुए हैं

ବାୟୁ କହିଲେ—ଏହି ସମସ୍ତ ଗୁଣ ଅନୁସେବନ କରି ମଘବାନ୍ (ଇନ୍ଦ୍ର) ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ରାଜ୍ୟ ପାଇଲେ। ଏହିପରି ବୃହସ୍ପତି ମଧ୍ୟ ସମାହିତଚିତ୍ତ ଓ ସଂଯତାତ୍ମା ହୋଇ ଯଥାବିଧି ବ୍ରହ୍ମଚର୍ୟ ଆଚରଣ କଲେ।

Verse 15

हित्वा सुखं प्रतिरुध्येन्द्रियाणि तेन देवानामगमद्‌ गौरवं सः । तथा नक्षत्राणि कर्मणामुत्र भान्ति रुद्रादित्या वसवो5थापि विश्वे,इन्द्रने सुख तथा मनको प्रिय लगनेवाली वस्तुओंका त्याग करके सत्कर्मके बलसे ही देवताओंमें ऊँची स्थिति प्राप्त की। उन्होंने सावधान होकर सत्य, धर्म, इन्द्रियसंयम, सहिष्णुता, समदर्शिता तथा सबको प्रिय लगनेवाले उत्तम बर्तावका पालन किया था। इन समस्त सदगुणोंका सेवन करनेके कारण ही इन्द्रको देवसग्राट्का श्रेष्ठ पद प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार बृहस्पतिजीने भी नियमपूर्वक समाहित एवं संयतचित्त होकर सुखका परित्याग करके समस्त इन्द्रियोंकों अपने वशमें रखते हुए ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया था। इसी सत्कर्मके प्रभावसे उन्होंने देवगुरुका सम्मानित पद प्राप्त किया है। आकाशके सारे नक्षत्र सत्कर्मके ही प्रभावसे परलोकमें प्रकाशित हो रहे हैं। रुद्र, आदित्य, वसु तथा विश्वदेवगण भी कर्मबलसे ही महत्त्वको प्राप्त हुए हैं

ବାୟୁ କହିଲେ—ସୁଖ ତ୍ୟାଗ କରି ଇନ୍ଦ୍ରିୟମାନଙ୍କୁ ନିଗ୍ରହ କରି, ସେ ଧର୍ମକର୍ମର ବଳରେ ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଉଚ୍ଚ ଗୌରବ ପାଇଲେ। ଏହିପରି ନକ୍ଷତ୍ରମାନେ ମଧ୍ୟ ପରଲୋକରେ ନିଜ କର୍ମବଳରେ ଦୀପ୍ତିମାନ; ରୁଦ୍ର, ଆଦିତ୍ୟ, ବସୁ ଓ ବିଶ୍ୱଦେବଗଣ ମଧ୍ୟ କର୍ମଶକ୍ତିରେ ମହତ୍ତ୍ୱ ପାଇଛନ୍ତି।

Verse 16

यमो राजा वैश्रवण: कुबेरो गन्धर्वयक्षाप्सरसश्व सूत । ब्रह्मविद्यां ब्रह्मचर्य क्रियां च निषेवमाणा ऋषयोअमुत्र भान्ति,सूत! यमराज, विश्रवाके पुत्र कुबेर, गन्धर्व, यक्ष तथा अप्सराएँ भी अपने-अपने कर्मोंके प्रभावसे ही स्वर्गमें विराजमान हैं। ब्रह्मज्ञान तथा ब्रह्मचर्यकर्मका सेवन करनेवाले महर्षि भी कर्मबलसे ही परलोकमें प्रकाशमान हो रहे हैं

ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ସୂତ! ଯମରାଜ, ବୈଶ୍ରବଣ କୁବେର, ଏବଂ ଗନ୍ଧର୍ବ, ଯକ୍ଷ, ଅପ୍ସରାମାନେ ମଧ୍ୟ ନିଜ-ନିଜ କର୍ମବଳରେ ସ୍ୱର୍ଗରେ ଦୀପ୍ତିମାନ। ଏହିପରି ବ୍ରହ୍ମବିଦ୍ୟା, ବ୍ରହ୍ମଚର୍ୟ ଓ ବୈଦିକ କ୍ରିୟାରେ ନିଷ୍ଠ ମହର୍ଷିମାନେ ମଧ୍ୟ ପରଲୋକରେ ଅଭ୍ୟସ୍ତ କର୍ମଶକ୍ତିରେ ପ୍ରକାଶିତ ହୁଅନ୍ତି।

Verse 17

जानन्निमं सर्वलोकस्य धर्म विप्रेन्द्राणां क्षत्रियाणां विशां च । स कस्मात्‌ त्वं जानतां ज्ञानवान्‌ सन्‌ व्यायच्छसे संजय कौरवार्थे

ବାୟୁ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ଲୋକକୁ ଧାରଣ କରୁଥିବା ଏହି ଧର୍ମ ତୁମେ ଜାଣ—ବ୍ରାହ୍ମଣଶ୍ରେଷ୍ଠ, କ୍ଷତ୍ରିୟ ଓ ବୈଶ୍ୟମାନଙ୍କର ଯଥୋଚିତ ଆଚରଣ। ତେବେ, ହେ ସଞ୍ଜୟ! ଜାଣୁଥିବାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଜ୍ଞାନବାନ୍ ହୋଇ ସୁଦ୍ଧା କୌରବମାନଙ୍କ ହିତ ପାଇଁ ତୁମେ କାହିଁକି ନିଜକୁ ରୋକି ପଛକୁ ହଟୁଛ?

Verse 18

संजय! तुम श्रेष्ठ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा सम्पूर्ण लोकोंके इस सुप्रसिद्ध धर्मको जानते हो। तुम ज्ञानियोंमें भी श्रेष्ठ ज्ञानी हो, तो भी तुम कौरवोंकी स्वार्थसिद्धिके लिये क्‍यों वाग्जाल फैला रहे हो? ।। आम्नायेषु नित्यसंयोगमस्य तथाश्वमेधे राजसूये च विद्धि । संयुज्यते धनुषा वर्मणा च हस्त्यश्वाद्यै रथशस्त्रैश्न भूय:,राजा युधिष्ठिरका वेद-शास्त्रोंके साथ स्वाध्यायके रूपमें सदा सम्बन्ध बना रहता है। इसी प्रकार अश्वमेध तथा राजसूय आदि यज्ञोंसे भी इनका सदा लगाव है। ये धनुष और कवचसे भी संयुक्त हैं। हाथी-घोड़े आदि वाहनों, रथों और अस्त्र-शस्त्रोंकी भी इनके पास कमी नहीं है। ये कुन्तीपुत्र यदि कौरवोंका वध किये बिना ही अपने राज्यकी प्राप्तिका कोई दूसरा उपाय जान लेंगे, तो भीमसेनको आग्रहपूर्वक आर्य पुरुषोंके द्वारा आचरित सद्व्यवहारमें लगाकर धर्मरक्षारूप पुण्यका ही सम्पादन करेंगे, तुम ऐसा (भलीभाँति) समझ लो

ବାୟୁ କହିଲେ— “ସଞ୍ଜୟ! ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣ, କ୍ଷତ୍ରିୟ, ବୈଶ୍ୟ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଲୋକମାନେ ଯେ ଖ୍ୟାତ ଧର୍ମକୁ ଆଚରଣ କରନ୍ତି, ତୁମେ ସେହି ଧର୍ମକୁ ଜାଣ। ତୁମେ ଜ୍ଞାନୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ତେବେ କୌରବମାନଙ୍କ ସ୍ୱାର୍ଥସିଦ୍ଧି ପାଇଁ କାହିଁକି ବାକ୍ୟଜାଲ ବିସ୍ତାର କରୁଛ? ଜାଣ—ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନିତ୍ୟ ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ ଦ୍ୱାରା ବେଦ-ଶାସ୍ତ୍ର ସହ ସଦା ସଂଯୁକ୍ତ; ଅଶ୍ୱମେଧ ଓ ରାଜସୂୟ ପରି ମହାଯଜ୍ଞରେ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କର ନିରନ୍ତର ଆସକ୍ତି ଅଛି। ଧନୁ ଓ କବଚରେ ସେ ସୁସଜ୍ଜିତ; ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା, ରଥ ଓ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ରରେ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ପାଖରେ କୌଣସି ଅଭାବ ନାହିଁ। ଯଦି କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରମାନେ କୌରବମାନଙ୍କୁ ବଧ ନ କରି ରାଜ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତିର କୌଣସି ଉପାୟ ଜାଣିପାରନ୍ତି, ତେବେ ସେମାନେ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ସଂଯମ କରି ଆର୍ୟମାନେ ଆଚରିତ ସଦ୍ବ୍ୟବହାରରେ ସ୍ଥିର କରି, ଧର୍ମରକ୍ଷାରୂପ ପୁଣ୍ୟ ହିଁ ସମ୍ପାଦନ କରିବେ—ଏହା ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ ବୁଝ।”

Verse 19

ते चेदिमे कौरवाणामुपाय- मवगच्छेयुरवधेनैव पार्था: । धर्मत्राणं पुण्यमेषां कृतं स्था- दार्ये वृत्ते भीमसेनं निगृहा,राजा युधिष्ठिरका वेद-शास्त्रोंके साथ स्वाध्यायके रूपमें सदा सम्बन्ध बना रहता है। इसी प्रकार अश्वमेध तथा राजसूय आदि यज्ञोंसे भी इनका सदा लगाव है। ये धनुष और कवचसे भी संयुक्त हैं। हाथी-घोड़े आदि वाहनों, रथों और अस्त्र-शस्त्रोंकी भी इनके पास कमी नहीं है। ये कुन्तीपुत्र यदि कौरवोंका वध किये बिना ही अपने राज्यकी प्राप्तिका कोई दूसरा उपाय जान लेंगे, तो भीमसेनको आग्रहपूर्वक आर्य पुरुषोंके द्वारा आचरित सद्व्यवहारमें लगाकर धर्मरक्षारूप पुण्यका ही सम्पादन करेंगे, तुम ऐसा (भलीभाँति) समझ लो

ବାୟୁ କହିଲେ— “ଯଦି ଏହି ପାର୍ଥମାନେ କୌରବମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ବଧ ବିନା କୌଣସି ଉପାୟ ଜାଣିପାରନ୍ତି, ତେବେ ସେମାନେ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ସଂଯମ କରି ଆର୍ୟମାନେ ଆଚରିତ ସଦ୍ବୃତ୍ତରେ ସ୍ଥିର କରିବେ; ଏବଂ ସେମାନଙ୍କର ଏହି କାର୍ଯ୍ୟ ଧର୍ମରକ୍ଷାରୂପ ପୁଣ୍ୟ ହେବ। ଏହାକୁ ଭଲଭାବେ ବୁଝ।”

Verse 20

ते चेत्‌ पित्रये कर्मणि वर्तमाना आपसट्येरन्‌ दिष्टवशेन मृत्युम्‌ । यथाशक्त्या पूरयन्त: स्वकर्म तदप्येषां निधन स्यात्‌ प्रशस्तम्‌,पाण्डव अपने बाप-दादोंके कर्म-क्षात्रधर्म (युद्ध आदि)-में प्रवृत्त हो यथाशक्ति अपने कर्तव्यका पालन करते हुए यदि दैववश मृत्युको भी प्राप्त हो जायेँ तो इनकी वह मृत्यु उत्तम ही मानी जायगी

ଯଦି ସେମାନେ ପିତୃପରମ୍ପରାଗତ କର୍ମରେ—ଅର୍ଥାତ୍ କ୍ଷାତ୍ରଧର୍ମ (ଯୁଦ୍ଧ ଆଦି)—ପ୍ରବୃତ୍ତ ହୋଇ, ଯଥାଶକ୍ତି ନିଜ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ପୂରଣ କରୁଥିବାବେଳେ, ଦୈବବଶତଃ ମୃତ୍ୟୁକୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଅନ୍ତି, ତେବେ ସେହି ମୃତ୍ୟୁ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ପ୍ରଶସ୍ତ ଓ ଉତ୍ତମ ମନାଯିବ।

Verse 21

उताहो त्वं मन्यसे शाम्यमेव राज्ञां युद्धे वर्तते धर्मतन्त्रम्‌ । अयुद्धे वा वर्तते धर्मतन्त्रं तथैव ते वाचमिमां शृणोमि

ବାୟୁ କହିଲେ— “ନାହିଁ କି ତୁମେ ଭାବୁଛ, ରାଜାମାନଙ୍କର ଧର୍ମତନ୍ତ୍ର କେବଳ ଯୁଦ୍ଧରେ ହିଁ କାର୍ଯ୍ୟକର? କିମ୍ବା ଯୁଦ୍ଧ ନ କରିବାରେ ମଧ୍ୟ ସେହି ଏକେ ଧର୍ମନିୟମ ଚାଲେ? ତୁମ କଥା ଶୁଣିଲେ ତ ଏମିତି ଲାଗୁଛି।”

Verse 22

यदि तुम शान्ति धारण करना ही ठीक समझते हो तो बताओ, युद्धमें प्रवृत्त होनेसे राजाओंके धर्मका ठीक-ठीक पालन होता है या युद्ध छोड़कर भाग जानेसे? क्षत्रियधर्मका विचार करते हुए तुम जो कुछ भी कहोगे, मैं तुम्हारी वही बात सुननेको उद्यत हूँ ।। चातुर्वर्ण्यस्य प्रथमं संविभाग- मवेक्ष्य त्वं संजय स्वं च कर्म । निशम्याथो पाण्डवानां च कर्म प्रशंस वा निन्‍द वा या मतिस्ते,संजय! तुम पहले ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके विभाग तथा उनमेंसे प्रत्येक वर्णके अपने-अपने कर्मको देख लो। फिर पाण्डवोंके वर्तमान कर्मपर दृष्टिपात करो; तत्पश्चात्‌ जैसा तुम्हारा विचार हो, उसके अनुसार इनकी प्रशंसा अथवा निन्‍्दा करना

ବାୟୁ କହିଲେ— “ଯଦି ତୁମେ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ଶାନ୍ତି ଧାରଣ କରିବାକୁ ହିଁ ଉଚିତ ଭାବୁଛ, ତେବେ କହ—ରାଜାମାନଙ୍କର ଧର୍ମ ଯୁଦ୍ଧରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହେଲେ ଠିକ୍‌ ଭାବେ ପାଳିତ ହୁଏ, ନା ଯୁଦ୍ଧ ଛାଡ଼ି ପଳାଇଗଲେ? କ୍ଷାତ୍ରଧର୍ମକୁ ବିଚାର କରି ତୁମେ ଯାହା କହିବ, ମୁଁ ସେହି କଥା ଶୁଣିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ। ପ୍ରଥମେ, ସଞ୍ଜୟ, ଚାତୁର୍ବର୍ଣ୍ୟର ମୂଳ ବିଭାଗ ଏବଂ ପ୍ରତ୍ୟେକ ବର୍ଣ୍ଣର ନିୟତ କର୍ମକୁ ଦେଖ; ନିଜ କର୍ତ୍ତବ୍ୟକୁ ମଧ୍ୟ ବିଚାର କର। ତାପରେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ବର୍ତ୍ତମାନ କ’ଣ କରୁଛନ୍ତି ତାହା ସାବଧାନରେ ନିରୀକ୍ଷଣ କର; ତା’ପରେ ତୁମ ମତାନୁସାରେ ସେମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଶଂସା କର କିମ୍ବା ନିନ୍ଦା।”

Verse 23

अधीयीत ब्राह्मणो वै यजेत दद्यादीयात्‌ तीर्थमुख्यानि चैव । अध्यापयेद्‌ याजयेच्चापि याज्यान्‌ प्रतिग्रहान्‌ वा विहितान्‌ प्रतीच्छेत्‌,ब्राह्मण अध्ययन, यज्ञ एवं दान करे तथा प्रधान-प्रधान तीर्थोंकी यात्रा करे, शिष्योंको पढ़ावे और यजमानोंका यज्ञ करावे अथवा शाख्त्रविहित प्रतिग्रह (दान) स्वीकार करे

ବାୟୁ କହିଲେ—ବ୍ରାହ୍ମଣ ଵେଦାଧ୍ୟୟନରେ ନିଷ୍ଠ ହେଉ; ଯଜ୍ଞ କରୁ; ବିଧିମତେ ଦାନ ଦେଉ ଏବଂ ଯଥୋଚିତ ଦାନ ଗ୍ରହଣ କରୁ; ଏବଂ ପ୍ରଧାନ ତୀର୍ଥମାନଙ୍କୁ ସେବନ କରୁ। ସେ ଶିଷ୍ୟମାନଙ୍କୁ ପଢ଼ାଉ, ଯୋଗ୍ୟ ଯଜମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଯଜ୍ଞ କରାଉ, ଏବଂ କେବଳ ଶାସ୍ତ୍ରସମ୍ମତ ପ୍ରତିଗ୍ରହ ଗ୍ରହଣ କରୁ।

Verse 24

(अधीयीत क्षत्रियो5थो यजेत दद्याद्‌ दानं न तु याचेत किंचित्‌ । न याजयेन्नापि चाध्यापयीत एष स्मृतः क्षत्रधर्म: पुराण: ।। ) इसी प्रकार क्षत्रिय स्वाध्याय, यज्ञ और दान करे। किसीसे किसी भी वस्तुकी याचना न करे। वह न तो दूसरोंका यज्ञ करावे और न अध्यापनका ही कार्य करे; यही धर्मशास्त्रोंमें क्षत्रियोंका प्राचीन धर्म बताया गया है। तथा राजन्यो रक्षणं वै प्रजानां कृत्वा धर्मेणाप्रमत्तो5थ दत्त्वा । यज्जैरिष्टवा सर्ववेदानधीत्य दारान्‌ कृत्वा पुण्यकृदावसेद्‌ गृहान्‌

ବାୟୁ କହିଲେ—କ୍ଷତ୍ରିୟ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ କରୁ, ଯଜ୍ଞ କରୁ, ଦାନ ଦେଉ; କିନ୍ତୁ କିଛି ମାଗୁ ନାହିଁ। ସେ ନ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ଯଜ୍ଞ କରାଉ, ନ ଅଧ୍ୟାପନ କରୁ—ଏହିଏ ସ୍ମୃତିରେ କଥିତ ପୁରାତନ କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମ। ସେ ଧର୍ମରେ ପ୍ରଜାରକ୍ଷା କରି, ଦାନ ଦେଇ, ଯଜ୍ଞଦ୍ୱାରା ଇଷ୍ଟ କରି, ସମସ୍ତ ବେଦ ଅଧ୍ୟୟନ କରି, ବିବାହ କରି, ପୁଣ୍ୟକର୍ମ କରୁଥିବା ଗୃହସ୍ଥ ହୋଇ ଗୃହେ ବସୁ।

Verse 25

वैश्यो5धीत्य कृषिगोरक्षपण्यै- वित्त चिन्चन्‌ पालयन्नप्रमत्त:

ବାୟୁ କହିଲେ—ବୈଶ୍ୟ ନିଜ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଜାଣି, କୃଷି, ଗୋରକ୍ଷା ଓ ବାଣିଜ୍ୟ ଦ୍ୱାରା ଧନ ସଂଗ୍ରହ କରୁ; ଏବଂ ସେହି ଧନକୁ ସଦା ସତର୍କତାରେ ପାଳନ କରୁ—ପ୍ରମାଦ କରୁ ନାହିଁ।

Verse 26

प्रियं कुर्वन्‌ ब्राह्मणक्षत्रियाणां धर्मशील: पुण्यकृदावसेद्‌ गृहान्‌ । वैश्य अध्ययन करके कृषि, गोरक्षा तथा व्यापारद्वारा धनोपार्जन करते हुए सावधानीके साथ उसकी रक्षा करे। ब्राह्मणों और क्षत्रियोंका प्रिय करते हुए धर्मशील एवं पुण्यात्मा होकर वह गृहस्थाश्रममें निवास करे ।। परिचर्या वन्दनं ब्राह्मणानां नाधीयीत प्रतिषिद्धो5स्य यज्ञ: । नित्योत्थितो भूतये5तन्द्रित: स्या- देवं स्मृतः शूद्रधर्म: पुराण: २६ ।। शूद्र ब्राह्मणोंकी सेवा तथा वन्दना करे, वेदोंका स्वाध्याय न करे। उसके लिये यज्ञका भी निषेध है। वह सदा उद्योगी और आलस्यरहित होकर अपने कल्याणके लिये चेष्टा करे। इस प्रकार शूद्रोंका प्राचीन धर्म बताया गया है

ବାୟୁ କହିଲେ—ବୈଶ୍ୟ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଓ କ୍ଷତ୍ରିୟଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ କରି, ଧର୍ମଶୀଳ ଓ ପୁଣ୍ୟକର୍ମରତ ହୋଇ ଗୃହସ୍ଥାଶ୍ରମରେ ବସୁ। ଶୂଦ୍ର ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ସେବା ଓ ବନ୍ଦନା କରୁ; ବେଦାଧ୍ୟୟନ କରୁ ନାହିଁ—ତାହା ପାଇଁ ଯଜ୍ଞ ନିଷିଦ୍ଧ। ସେ ସଦା ଉଦ୍ୟମୀ ହୋଇ, ଆଳସ୍ୟରହିତ ଭାବେ ନିଜ ମଙ୍ଗଳ ପାଇଁ ଚେଷ୍ଟା କରୁ—ଏହିଏ ଶୂଦ୍ରର ପୁରାତନ ଧର୍ମ ବୋଲି ସ୍ମୃତ।

Verse 27

एतान्‌ राजा पालयजन्नप्रमत्तो नियोजयन्‌ सर्ववर्णान्‌ स्वधर्मे । अकामात्मा समतवृत्तिः प्रजासु नाधार्मिकाननुरुध्येत कामान्‌,राजा सावधानीके साथ इन सब वर्णोका पालन करते हुए ही इन्हें अपने-अपने धर्ममें लगावे। वह कामभोगमें आसक्त न होकर समस्त प्रजाओंके साथ समानभावसे बर्ताव करे और पापपूर्ण इच्छाओंका कदापि अनुसरण न करे

ବାୟୁ କହିଲେ—ରାଜା ସତର୍କ ଓ ଅପ୍ରମତ୍ତ ହୋଇ ଏମାନଙ୍କୁ ପାଳନ କରୁ, ଏବଂ ସମସ୍ତ ବର୍ଣ୍ଣକୁ ନିଜ-ନିଜ ସ୍ୱଧର୍ମରେ ନିଯୁକ୍ତ କରୁ। ସେ କାମନାରେ ଆସକ୍ତ ନ ହେଉ, ପ୍ରଜାମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ସମଭାବ ରଖୁ, ଏବଂ ଅଧାର୍ମିକ ଇଚ୍ଛାକୁ କେବେ ଅନୁସରଣ ନ କରୁ।

Verse 28

श्रेयांस्तस्माद्‌ यदि विद्येत कश्नि- दभिज्ञात: सर्वधर्मोपपन्न: । सतं द्रष्टमनुशिष्यात्‌ प्रजानां न चैतद्‌ बुध्येदिति तस्मिन्नसाधु:,यदि राजाको यह ज्ञात हो जाय कि उसके राज्यमें कोई सर्वधर्मसम्पन्न श्रेष्ठ पुरुष निवास करता है तो वह उसीको प्रजाके गुण-दोषका निरीक्षण करनेके लिये नियुक्त करे तथा उसके द्वारा पता लगवावे कि मेरे राज्यमें कोई पापकर्म करनेवाला तो नहीं है

ଏହେତୁ ଯଦି ରାଜା ନିଜ ରାଜ୍ୟରେ ଏମିତି କୌଣସି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷଙ୍କୁ ଜାଣନ୍ତି—ଯିଏ ବିବେକୀ ଏବଂ ସର୍ବଧର୍ମସମ୍ପନ୍ନ—ତେବେ ଅନୁଭବସିଦ୍ଧ ସେହି ସଜ୍ଜନଙ୍କୁ ପ୍ରଜାଙ୍କ ଆଚରଣ ନିରୀକ୍ଷଣ ଓ ଶାସନ ପାଇଁ ନିଯୁକ୍ତ କରିବା ଉଚିତ। ତାଙ୍କ ମାଧ୍ୟମରେ ରାଜା ଜାଣିବେ—ରାଜ୍ୟରେ କେହି ପାପକର୍ମ କରୁଛି କି ନାହିଁ; ଯେ ଏହା ବୁଝି ମଧ୍ୟ କାର୍ଯ୍ୟ କରେ ନାହିଁ, ସେ ଏହି ବିଷୟରେ ଅସାଧୁ।

Verse 29

यदा गृध्येत्‌ परभूतौ नृशंसो विधिप्रकोपाद्‌ बलमाददान: । ततो राज्ञामभवद्‌ युद्धमेतत्‌ तत्र जात॑ वर्म शस्त्र धनुश्च,जब कोई क्रूर मनुष्य दूसरेकी धन-सम्पत्तिमें लालच रखकर उसे ले लेनेकी इच्छा करता है और विधाताके कोपसे (परपीडनके लिये) सेना-संग्रह करने लगता है, उस समय राजाओंमें युद्धका अवसर उपस्थित होता है। इस युद्धके लिये ही कवच, अस्त्र-शस्त्र और धनुषका आविष्कार हुआ है इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि कृष्णवाक्ये एकोनत्रिंशो 5ध्याय:

ଯେତେବେଳେ କୌଣସି ନିର୍ଦୟ ମଣିଷ ଅନ୍ୟର ଧନସମ୍ପତ୍ତି ପ୍ରତି ଲୋଭ କରି, ବିଧିର କୋପରେ ପ୍ରେରିତ ହୋଇ, ପରପୀଡନ ପାଇଁ ବଳ ସଂଗ୍ରହ କରିବାକୁ ଲାଗେ, ସେତେବେଳେ ରାଜାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଯୁଦ୍ଧର ଅବସର ଉପସ୍ଥିତ ହୁଏ। ଏହି ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ହିଁ କବଚ, ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଓ ଧନୁଷର ଉଦ୍ଭବ—ସଂଘର୍ଷ ଓ ଲୋଭର ଜନ୍ମସନ୍ତାନ ଏଗୁଡ଼ିକ।

Verse 30

इन्द्रेणेतद्‌ दस्युवधाय कर्म उत्पादितं वर्म शस्त्र धनुश्च,स्वयं देवराज इन्द्रने ऐसे लुटेरोंका वध करनेके लिये कवच, अस्त्र-शस्त्र और धनुषका आविष्कार किया है

ଦସ୍ୟୁମାନଙ୍କ ବଧ ପାଇଁ ହିଁ ଇନ୍ଦ୍ର ଏହି କାର୍ଯ୍ୟ ଉତ୍ପନ୍ନ କରିଥିଲେ; ସ୍ୱୟଂ ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ର ହିଁ କବଚ, ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଓ ଧନୁଷ ନିର୍ମାଣ କରିଥିଲେ—ଏମିତି ଲୁଟେରାମାନଙ୍କୁ ରୋକି ନଶ୍ଟ କରିବା ପାଇଁ।

Verse 31

तत्र पुण्यं दस्युवधेन लभ्यते सो<यं दोष: कुरुभिस्तीव्ररूप: । अधर्मजिर्धर्ममबुध्यमानै: प्रादुर्भूत: संजय साधु तन्न,(राजाओंको) लुटेरोंका वध करनेसे पुण्यकी प्राप्ति होती है। संजय! कौरवोंमें यह लुटेरेपनका दोष तीव्ररूपसे प्रकट हो गया है, जो अच्छा नहीं है। वे अधर्मके तो पूरे पण्डित हैं; परंतु धर्मकी बात बिलकुल नहीं जानते

ଏପରି ଅବସ୍ଥାରେ ଦସ୍ୟୁବଧ କରିଲେ ପୁଣ୍ୟ ଲଭ୍ୟ ହୁଏ। କିନ୍ତୁ ସଞ୍ଜୟ! କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସେହି ଦୋଷ—ଲୁଟେରାପଣର ପ୍ରବୃତ୍ତି—ତୀବ୍ର ରୂପରେ ପ୍ରାଦୁର୍ଭୂତ ହୋଇଛି; ଏହା ଶୁଭ ନୁହେଁ। ସେମାନେ ଅଧର୍ମରେ ନିପୁଣ, କିନ୍ତୁ ଧର୍ମକୁ ବୁଝନ୍ତି ନାହିଁ।

Verse 32

तत्र राजा धृतराष्ट्र: सपुत्रो धर्म्य हरेत्‌ पाण्डवानामकस्मात्‌ | नावेक्षन्ते राजधर्म पुराणं तदन्वया: कुरव: सर्व एव,राजा धृतराष्ट्र अपने पुत्रोंके साथ मिलकर सहसा पाण्डवोंके धर्मतः प्राप्त उनके पैतृक राज्यका अपहरण करनेको उतारू हो गये हैं। अन्य समस्त कौरव भी उन्हींका अनुसरण कर रहे हैं। वे प्राचीन राजधर्मकी ओर नहीं देखते हैं

ସେଠାରେ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ, ହଠାତ୍ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ଧର୍ମତଃ ପ୍ରାପ୍ତ ପୈତୃକ ରାଜ୍ୟକୁ ଅପହରଣ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହୋଇଛନ୍ତି। ତାଙ୍କ ଅନୁସରଣକାରୀ ସମସ୍ତ କୁରୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାଚୀନ ରାଜଧର୍ମକୁ ଦେଖୁନାହାନ୍ତି; ସମୟ-ସମ୍ମତ ରାଜମର୍ଯ୍ୟାଦାକୁ ସେମାନେ ଅବହେଳା କରୁଛନ୍ତି।

Verse 33

स्तेनो हरेद्‌ यत्र धन हादृष्ट: प्रसह वा यत्र हरेत दृष्ट: । उभौ गह्याँ भवतः संजयैतौ कि वै पृथक्त्वं धृतराष्ट्रस्य पुत्रे,चोर छिपा रहकर धन चुरा ले जाय अथवा सामने आकर डाका डाले, दोनों ही दशाओंमें वे चोर-डाकू निन्दाके ही पात्र होते हैं। संजय! तुम्हीं कहो, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन और उन चोर-डाकुओंमें क्या अन्तर है?

ଚୋର ଅଦୃଶ୍ୟ ଥାଇ ଧନ ଚୋରି କରୁ କିମ୍ବା ଦୃଶ୍ୟ ଥାଇ ବଳପୂର୍ବକ ଛିନିନେଉ—ଦୁଇ ଅବସ୍ଥାରେ ମଧ୍ୟ ସେ ନିନ୍ଦନୀୟ ଏବଂ ଧରାପଡ଼ିବାଯୋଗ୍ୟ। ସଞ୍ଜୟ! କହ—ଏମିତି ଚୋର-ଡାକୁ ଓ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରକୃତ ତଫାତ କ’ଣ?

Verse 34

सो<यं लोभान्मन्यते धर्ममेतं यमिच्छति क्रोधवशानुगामी । भाग: पुनः पाण्डवानां निविष्ट- स्तं न: कस्मादाददीरन्‌ परे वै,दुर्योधन क्रोधके वशीभूत हो उसके अनुसार चलनेवाला है और वह लोभसे राज्यको ले लेना चाहता है। इसे वह धर्म मान रहा है; परंतु वह तो पाण्डवोंका भाग है, जो कौरवोंके यहाँ धरोहरके रूपमें रखा गया है। संजय! हमारे उस भागको हमसे शत्रुता रखनेवाले कौरव कैसे ले सकते हैं?

ଲୋଭରେ ପ୍ରେରିତ ଏବଂ କ୍ରୋଧବଶ ହୋଇ ଚାଲୁଥିବା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ରାଜ୍ୟ ହରଣ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି; ଯାହାକୁ ସେ ଇଚ୍ଛା କରେ, ସେହିକୁ ‘ଧର୍ମ’ ବୋଲି ମନେ କରୁଛି। କିନ୍ତୁ ସେ ଅଂଶ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର; କୌରବମାନଙ୍କ ପାଖରେ ତାହା କେବଳ ଧରୋହର ଭାବେ ରହିଛି। ସଞ୍ଜୟ! ଆମ ପ୍ରତି ଶତ୍ରୁତା ରଖୁଥିବା ସେ କୌରବମାନେ ଆମ ଅଂଶକୁ ଆମଠାରୁ କିପରି ନେଇପାରିବେ?

Verse 35

अस्मिन्‌ पदे युध्यतां नो वधो5पि श्लाघ्य: पित्रयं परराज्याद्‌ विशिष्टम्‌ । एतान्‌ धर्मान्‌ कौरवाणां पुराणा- नाचक्षीथा: संजय राजमध्ये,सूत! इस राज्यभागकी प्राप्तिके लिये युद्ध करते हुए हमलोगोंका वध हो जाय तो वह भी हमारे लिये स्पृहणीय ही है। बाप-दादोंका राज्य पराये राज्यकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। संजय! तुम राजाओंकी मण्डलीमें राजाओंके इन प्राचीन धर्मोंका कौरवोंके समक्ष वर्णन करना

ଏହି ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଅଂଶ ପାଇଁ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିବାବେଳେ ଯଦି ଆମର ବଧ ମଧ୍ୟ ହୋଇଯାଏ, ସେଥି ମଧ୍ୟ ଆମ ପାଇଁ ଗୌରବଜନକ। ପିତୃପାରମ୍ପରିକ ରାଜ୍ୟ ପରରାଜ୍ୟଠାରୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ। ତେଣୁ, ସଞ୍ଜୟ—ହେ ସୂତ! ରାଜମଣ୍ଡଳୀର ମଧ୍ୟରେ କୌରବମାନଙ୍କ ଏହି ପ୍ରାଚୀନ ଧର୍ମଗୁଡ଼ିକୁ ବର୍ଣ୍ଣନା କର।

Verse 36

एते मदान्मृत्युवशाभिपन्ना: समानीता धार्तराष्ट्रेण मूढा: । इदं पुनः कर्म पापीय एव सभामध्ये पश्य वृत्तं कुरूणाम्‌,दुर्योधनने जिन्हें युद्धके लिये बुलवाया है, वे मूर्ख राजा बलके मदसे मोहित होकर मौतके फंदेमें फँस गये हैं। संजय! भरी सभामें कौरवोंने जो यह अत्यन्त पापपूर्ण कर्म किया था, उनके इस दुराचारपर दृष्टि डालो

ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଯାହାଙ୍କୁ ଡାକିଛି, ସେଇ ମୂଢ ରାଜାମାନେ ବଳମଦରେ ମୋହିତ ହୋଇ ମୃତ୍ୟୁର ପାଶରେ ପଡ଼ିଛନ୍ତି। ସଞ୍ଜୟ! ଭରି ସଭାରେ କୌରବମାନେ କରିଥିବା ସେଇ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପାପପୂର୍ଣ୍ଣ କର୍ମକୁ—ତାଙ୍କ ଦୁରାଚାରକୁ ପୁନର୍ବାର ଦେଖ।

Verse 37

प्रियां भार्या द्रौपदी पाण्डवानां यशस्विनीं शीलवृत्तोपपन्नाम्‌ | यदुपैक्षन्त कुरवो भीष्ममुख्या: कामानुगेनोपरुद्धां व्रजन्तीम्‌,पाण्डवोंकी प्यारी पत्नी यशस्विनी द्रौपदी जो शील और सदाचारसे सम्पन्न है, रजस्वला-अवस्थामें सभाके भीतर लायी जा रही थी, परंतु भीष्म आदि प्रधान कौरवोंने भी उसकी ओरसे उपेक्षा दिखायी

ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରିୟ ଭାର୍ଯ୍ୟା, ଯଶସ୍ବିନୀ ଦ୍ରୌପଦୀ—ଶୀଳ ଓ ସଦାଚାରରେ ସମ୍ପନ୍ନା—କାମାନ୍ଧମାନଙ୍କ ଅତ୍ୟାଚାରରେ ଅସହାୟ ହୋଇ ସଭାଭିତରକୁ ଟାଣିନେଇଯାଉଥିବାବେଳେ ମଧ୍ୟ, ଭୀଷ୍ମପ୍ରମୁଖ କୌରବମାନେ ତାଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରିବା ପରିବର୍ତ୍ତେ ଉପେକ୍ଷା ଦେଖାଇଲେ।

Verse 38

त॑ चेत्‌ तदा ते सकुमारवृद्धा अवारयिष्यन्‌ कुरव: समेता: । मम प्रियं धृतराष्ट्रो5करिष्यत्‌ पुत्राणां च कृतमस्याभविष्यत्‌,यदि बालकसे लेकर बूढ़ेतक सभी कौरव उस समय दुःशासनको रोक देते तो राजा धृतराष्ट्र मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करते तथा उनके पुत्रोंका भी प्रिय मनोरथ सिद्ध हो जाता

ବାୟୁ କହିଲେ— ସେ ସମୟରେ ଛୋଟ ପିଲାଠାରୁ ବୃଦ୍ଧ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସମସ୍ତ କୁରୁ ଏକତ୍ର ହୋଇ ଦୁଃଶାସନକୁ ରୋକିଥାନ୍ତେ, ତେବେ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ମୋ ପାଇଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ କାର୍ଯ୍ୟ କରିଥାନ୍ତେ; ଏବଂ ତାଙ୍କ ପୁଅମାନଙ୍କର ପ୍ରିୟ ମନୋରଥ ମଧ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହୋଇଥାନ୍ତା।

Verse 39

दुःशासन: प्रातिलोम्यान्निनाय सभामध्ये श्वशुराणां च कृष्णाम्‌ । सा तत्र नीता करुणं व्यपेक्ष्य नानय॑ क्षत्तु्नाथमवाप किंचित्‌,दुःशासन मर्यादाके विपरीत द्रौपदीको सभाके भीतर श्वशुरजनोंके समक्ष घसीट ले गया। द्रौपदीने वहाँ जाकर कातरभावसे चारों ओर करुणदृष्टि डाली, परंतु उसने वहाँ विदुरजीके सिवा और किसीको अपना रक्षक नहीं पाया

ଦୁଃଶାସନ ଶିଷ୍ଟାଚାର ଓ ନ୍ୟାୟକ୍ରମକୁ ଉଲ୍ଲଂଘନ କରି କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ)ଙ୍କୁ ଘସିଟି ନେଇ ସଭାମଧ୍ୟକୁ, ଶ୍ୱଶୁରପକ୍ଷର ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଆଣିଲା। ସେଠାରେ ଆଣାଯାଇ ସେ କରୁଣ ଦୃଷ୍ଟିରେ ଚାରିଦିଗକୁ ଚାହିଲେ; କିନ୍ତୁ ସେ ସଭାରେ କ୍ଷତ୍ତା ବିଦୁରଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଅନ୍ୟ କାହାକୁ ମଧ୍ୟ ସତ୍ୟ ଆଶ୍ରୟ ଭାବେ ପାଇଲେ ନାହିଁ।

Verse 40

कार्पण्यादेव सहितास्तत्र भूपा नाशवनुवन्‌ प्रतिवक्तुं सभायाम्‌ | एक: क्षत्ता धर्म्यमर्थ ब्रुवाणो धर्मबुद्धा प्रत्युवाचाल्पबुद्धिम्‌,उस समय सभामें बहुत-से भूपाल एकत्रित थे, परंतु अपनी कायरताके कारण वे उस अन्यायका प्रतिवाद न कर सके। एकमात्र विदुरजीने अपना धर्म समझकर मन्दबुद्धि दुर्योधनसे धर्मानुकूल वचन कहकर उसके अन्यायका विरोध किया

ସେ ରାଜସଭାରେ ଅନେକ ରାଜା ଏକତ୍ର ଥିଲେ; କିନ୍ତୁ କାୟରତାରୁ ସେମାନେ ସେ ଅନ୍ୟାୟର ପ୍ରତିବାଦ କରିବାକୁ ସାହସ କରିପାରିଲେ ନାହିଁ। କେବଳ କ୍ଷତ୍ତା ବିଦୁର ଧର୍ମବୁଦ୍ଧିରେ ଧର୍ମସଙ୍ଗତ କଥା କହି ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଉତ୍ତର ଦେଇ ତାଙ୍କ ଦୁଷ୍କର୍ମକୁ ପ୍ରତିରୋଧ କଲେ।

Verse 41

अबुदृध्वा त्वं धर्ममेतं सभाया- मथेच्छसे पाण्डवस्योपदेष्टम्‌ । कृष्णा त्वेतत्‌ कर्म चकार शुद्ध सुदुष्करं तत्र सभां समेत्य,संजय! द्यूतसभामें जो अन्याय हुआ था, उसे भुलाकर तुम पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको धर्मका उपदेश देना चाहते हो। द्रौपदीने उस दिन सभामें जाकर अत्यन्त दुष्कर और पवित्र कार्य किया कि उसने पाण्डवों तथा अपनेको महान्‌ संकटसे बचा लिया; ठीक उसी तरह, जैसे नौका समुद्रकी अगाध जलराशिमें डूबनेसे बचा लेती है। उस सभामें कृष्णा श्वशुरजनोंके समीप खड़ी थी, तो भी सूतपुत्र कर्णने उसे अपमानित करते हुए कहा --'याज्ञसेनि! अब तेरे लिये दूसरी गति नहीं है, तू दासी बनकर दुर्योधनके महलमें चली जा। पाण्डव जूएमें अपनेको हार चुके हैं, अतः अब वे तेरे पति नहीं रहे। भाविनि! अब तू किसी दूसरेको अपना पति वरण कर ले'

ସଞ୍ଜୟ! ସଭାରେ ଯେ ଧର୍ମସ୍ଥିତି ଥିଲା, ତାହା ସଠିକ୍ ଭାବେ ନ ବୁଝି ତୁମେ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଧର୍ମର ଉପଦେଶ ଦେବାକୁ ଚାହୁଁଛ। କିନ୍ତୁ କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ) ସେଇ ସଭାକୁ ପ୍ରବେଶ କରି ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଷ୍କର ଓ ପବିତ୍ର କାର୍ଯ୍ୟ କରିଥିଲେ—ଯାହାଦ୍ୱାରା ସେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଓ ନିଜକୁ ମହା ସଙ୍କଟରୁ ଉଦ୍ଧାର କରିଥିଲେ, ଯେପରି ନୌକା ସମୁଦ୍ରର ପ୍ରଚଣ୍ଡ ଉଛ୍ଛ୍ୱାସରୁ ରକ୍ଷା କରେ। ତଥାପି, ଶ୍ୱଶୁରପକ୍ଷର ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ସମୀପରେ ଦାଁଡ଼ିଥିବା କୃଷ୍ଣାଙ୍କୁ ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣ ଅପମାନ କରି କହିଲା— ‘ଯାଜ୍ଞସେନୀ! ଏବେ ତୋ ପାଇଁ ଅନ୍ୟ ଗତି ନାହିଁ; ଦାସୀ ହୋଇ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ଭବନକୁ ଯା। ପାଣ୍ଡବମାନେ ପାଶାଖେଳରେ ନିଜକୁ ହାରିଛନ୍ତି; ତେଣୁ ଏବେ ସେମାନେ ତୋର ପତି ନୁହେଁ। ଭାବିନୀ! ଏବେ ଅନ୍ୟ କାହାକୁ ପତି ଭାବେ ବରଣ କର।’

Verse 42

येन कृच्छात्‌ पाण्डवानुज्जहार तथा5त्मानं नौरिव सागरौघात्‌ | यत्राब्रवीत्‌ सूतपुत्र: सभायां कृष्णां स्थितां श्वशुराणां समीपे,संजय! द्यूतसभामें जो अन्याय हुआ था, उसे भुलाकर तुम पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको धर्मका उपदेश देना चाहते हो। द्रौपदीने उस दिन सभामें जाकर अत्यन्त दुष्कर और पवित्र कार्य किया कि उसने पाण्डवों तथा अपनेको महान्‌ संकटसे बचा लिया; ठीक उसी तरह, जैसे नौका समुद्रकी अगाध जलराशिमें डूबनेसे बचा लेती है। उस सभामें कृष्णा श्वशुरजनोंके समीप खड़ी थी, तो भी सूतपुत्र कर्णने उसे अपमानित करते हुए कहा --'याज्ञसेनि! अब तेरे लिये दूसरी गति नहीं है, तू दासी बनकर दुर्योधनके महलमें चली जा। पाण्डव जूएमें अपनेको हार चुके हैं, अतः अब वे तेरे पति नहीं रहे। भाविनि! अब तू किसी दूसरेको अपना पति वरण कर ले'

ସଞ୍ଜୟ! ସେଇ କାର୍ଯ୍ୟକୁ ସ୍ମରଣ କର—ଯାହାଦ୍ୱାରା ଦ୍ରୌପଦୀ ମହା କଷ୍ଟରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଓ ନିଜକୁ ବିପଦରୁ ଉଦ୍ଧାର କରିଥିଲେ, ଯେପରି ନୌକା ସମୁଦ୍ରର ଉଛ୍ଛ୍ୱାସିତ ପ୍ରବାହରୁ ରକ୍ଷା କରେ। ଏବଂ ସେଇ ସଭାରେ, ଶ୍ୱଶୁରପକ୍ଷର ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ସମୀପରେ ଦାଁଡ଼ିଥିବା କୃଷ୍ଣାଙ୍କୁ ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣ ଅପମାନଜନକ କଥା କହିଥିଲା। ତଥାପି, ଦ୍ୟୂତସଭାର ସେ ଅନ୍ୟାୟକୁ ଅନଦେଖା କରି ତୁମେ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଧର୍ମ ଉପଦେଶ ଦେବାକୁ ଚାହୁଁଛ!

Verse 43

न ते गतिर्विद्यते याज्ञसेनि प्रपद्य दासी धार्तराष्ट्रस्य वेश्म | पराजितास्ते पतयो न सन्ति पतिं चान्यं भाविनि त्वं वृणीष्व,संजय! द्यूतसभामें जो अन्याय हुआ था, उसे भुलाकर तुम पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको धर्मका उपदेश देना चाहते हो। द्रौपदीने उस दिन सभामें जाकर अत्यन्त दुष्कर और पवित्र कार्य किया कि उसने पाण्डवों तथा अपनेको महान्‌ संकटसे बचा लिया; ठीक उसी तरह, जैसे नौका समुद्रकी अगाध जलराशिमें डूबनेसे बचा लेती है। उस सभामें कृष्णा श्वशुरजनोंके समीप खड़ी थी, तो भी सूतपुत्र कर्णने उसे अपमानित करते हुए कहा --'याज्ञसेनि! अब तेरे लिये दूसरी गति नहीं है, तू दासी बनकर दुर्योधनके महलमें चली जा। पाण्डव जूएमें अपनेको हार चुके हैं, अतः अब वे तेरे पति नहीं रहे। भाविनि! अब तू किसी दूसरेको अपना पति वरण कर ले'

ବାୟୁ କହିଲେ— “ହେ ଯାଜ୍ଞସେନୀ! ତୋ ପାଇଁ ଆଉ କୌଣସି ଗତି ନାହିଁ। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରଙ୍କ ଗୃହକୁ ଯାଇ ଦାସୀଭାବେ ଶରଣ ନେ। ତୋର ପତିମାନେ ପରାଜିତ; ଏବେ ସେମାନେ ତୋର ପତି ନୁହେଁ। ହେ ଭାବିନୀ, ଅନ୍ୟ ପୁରୁଷକୁ ପତି ଭାବେ ବର, ସଞ୍ଜୟ।”

Verse 44

यो बीभत्सोहदये प्रोत आसी- दस्थिच्छिन्दन्‌ मर्मघाती सुघोर: । कर्णाच्छरो वाड्मयस्तिग्मतेजा: प्रतिष्ठितो हृदये फाल्गुनस्य,कर्णके मुखसे निकला हुआ वह अत्यन्त घोर कटुवचनरूपी बाण मर्मपर चोट पहुँचानेवाला था। वह कानके रास्तेसे भीतर जाकर हड्डियोंको छेदता हुआ अर्जुनके हृदयमें धँस गया। तीखी कसक पैदा करनेवाला वह वाग्बाण आज भी अर्जुनके हृदयमें गड़ा हुआ है (और इनके कलेजेको साल रहा है)

ବାୟୁ କହିଲେ— “ସେ ଭୟଙ୍କର ବାକ୍ୟ-ଶର—ମର୍ମଭେଦୀ, ଯେନେ ଅସ୍ଥି ଛେଦିଦେଉଛି—କାନ ମାର୍ଗରେ ପ୍ରବେଶ କରି ଫାଲ୍ଗୁନଙ୍କ ହୃଦୟରେ ଗାଢ଼ିଗଲା। ତୀକ୍ଷ୍ଣ ତେଜସ୍ବୀ ସେ ବାଗ୍ବାଣ ଆଜି ମଧ୍ୟ ସେଠି ଅଟୁଟ ରହି ତାଙ୍କୁ ଦହାଇ ଚାଲିଛି।”

Verse 45

कृष्णाजिनानि परिधित्समानान्‌ दुःशासन: कटुकान्य भ्यभाषत्‌ । एते सर्वे षण्ढतिला विनष्टा: क्षयं गता नरक॑ दीर्घकालम्‌,जिस समय पाण्डव वनमें जानेके लिये कृष्ण-मृगचर्म धारण करना चाहते थे, उस समय दुःशासनने उनके प्रति कितनी ही कड़वी बातें कहीं--'ये सब-के-सब हीजड़े अब नष्ट हो गये, चिरकालके लिये नरकके गर्तमें गिर गये”

ପାଣ୍ଡବମାନେ ବନଗମନ ପାଇଁ କୃଷ୍ଣମୃଗଚର୍ମ ପରିଧାନ କରିବାକୁ ଯେତେବେଳେ ଉଦ୍ୟତ ହେଲେ, ଦୁଃଶାସନ କଟୁବାକ୍ୟ କହିଲା— “ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ନଷ୍ଟ; ନପୁଂସକ-ସଦୃଶ ନିନ୍ଦ୍ୟ ଲୋକ—ବିନାଶକୁ ପହଞ୍ଚି, ଦୀର୍ଘକାଳ ନରକରେ ପଡିବେ।”

Verse 46

गान्धारराज: शकुनिर्निकृत्या यदब्रवीद्‌ द्यूतकाले स पार्थम्‌ पराजितो नन्दन: कि तवास्ति कृष्णया त्वं दीव्य वै याज्ञसेन्या,गान्धारराज शकुनिने द्यूतक्रीड़ाके समय कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरसे शठतापूर्वक यह बात कही थी कि अब तो तुम अपने छोटे भाईको भी हार गये, अब तुम्हारे पास क्या है? इसलिये इस समय तुम द्रुपदनन्दिनी कृष्णाको दाँवपर रखकर जूआ खेलो

ବାୟୁ କହିଲେ— “ଦ୍ୟୂତକାଳରେ ଗାନ୍ଧାରରାଜ ଶକୁନି ଛଳରେ ପାର୍ଥଙ୍କୁ କହିଥିଲା— ‘ହେ ପୁତ୍ର, ତୁମେ ପରାଜିତ; ଏବେ ତୁମ ପାଖରେ କ’ଣ ଅଛି? ତେଣୁ ଯାଜ୍ଞସେନୀଙ୍କ କନ୍ୟା କୃଷ୍ଣାକୁ ପଣ ରଖି ଖେଳ।’”

Verse 47

जानासि त्वं संजय सर्वमेतद्‌ द्यूते वाक्यं गहमिवं यथोक्तम्‌ । स्वयं त्वहं प्रार्थये तत्र गन्तुं समाधातु कार्यमेतद्‌ विपन्नम्‌,संजय! (कहाँतक गिनाऊँ,) जूएके समय जितने और जैसे निन्दनीय वचन कहे गये थे, वे सब तुम्हें ज्ञात हैं, तथापि इस बिगड़े हुए कार्यको बनानेके लिये मैं स्वयं हस्तिनापुर चलना चाहता हूँ

“ସଞ୍ଜୟ! ଦ୍ୟୂତକାଳରେ ଯେପରି ନିନ୍ଦନୀୟ ବାକ୍ୟ କୁହାଯାଇଥିଲା, ସେସବୁ ତୁମେ ଜାଣ। ତଥାପି ଏହି ବିପନ୍ନ କାର୍ଯ୍ୟକୁ ସୁଧାରିବା ପାଇଁ ମୁଁ ସ୍ୱୟଂ ସେଠାକୁ ଯିବାକୁ ଚାହୁଁଛି, ସଞ୍ଜୟ।”

Verse 48

अहापयित्वा यदि पाण्डवार्थ शमं कुरूणामपि चेच्छकेयम्‌ | पुण्यं च मे स्याच्चरितं महोदयं मुच्येरंश्न॒ कुरवो मृत्युपाशात्‌,यदि पाण्डवोंका स्वार्थ नष्ट किये बिना ही मैं कौरवोंके साथ इनकी संधि करानेमें सफल हो सका तो मेरे द्वारा यह परम पवित्र और महान्‌ अभ्युदयका कार्य सम्पन्न हो जायगा तथा कौरव भी मौतके फंदेसे छूट जायँगे

ବାୟୁ କହିଲେ— ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ହିତକୁ କ୍ଷତି ନକରି ଯଦି ମୁଁ କୁରୁମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ଶାନ୍ତି ସ୍ଥାପନ କରିପାରିବି, ତେବେ ମୋ ଦ୍ୱାରା ପରମ ପବିତ୍ର ଓ ମହାମଙ୍ଗଳକର କାର୍ଯ୍ୟ ସମ୍ପନ୍ନ ହେବ; ଏବଂ କୁରୁମାନେ ମଧ୍ୟ ମୃତ୍ୟୁପାଶରୁ ମୁକ୍ତ ହେବେ।

Verse 49

अपि मे वाचं भाषमाणस्य काव्यां धर्मारामामर्थवतीमहिंस्राम्‌ । अवेक्षेरन्‌ धार्तराष्ट्रा: समक्ष॑ मां च प्राप्त कुरव: पूजयेयु:,मैं वहाँ जाकर शुक्रनीतिके अनुसार धर्म और अर्थसे युक्त ऐसी बातें कहूँगा, जो हिंसावृत्तिको दबानेवाली होंगी। क्या धृतराष्ट्रके पुत्र मेरी उन बातोंपर विचार करेंगे? क्‍या कौरवगण अपने सामने उपस्थित होनेपर मेरा सम्मान करेंगे?

ମୁଁ ସେଠାକୁ ଯାଇ ଶୁକ୍ରନୀତି ଅନୁସାରେ ଧର୍ମରେ ରମଣୀୟ, ଅର୍ଥଯୁକ୍ତ ଓ ହିଂସାକୁ ଦମନ କରୁଥିବା ସୁଗଠିତ ବାଣୀ କହିବି। ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ମୋ କଥାକୁ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ଭାବିବେ କି? ଏବଂ ମୁଁ ସମ୍ମୁଖରେ ପହଞ୍ଚିଲେ କୁରୁମାନେ ମୋତେ ସମ୍ମାନ କରିବେ କି?

Verse 50

अतो<न्‍्यथा रथिना फाल्गुनेन भीमेन चैवाहवर्दशितेन । परासिक्तान धार्तराष्टांश्व विद्धि प्रदह्ममानान्‌ कर्मणा स्वेन पापान्‌,संजय! यदि ऐसा नहीं हुआ--कौरवोंने इसके विपरीत भाव दिखाया तो समझ लो कि रथपर बैठे हुए अर्जुन और युद्धके लिये कवच धारण करके तैयार हुए भीमसेनके द्वारा पराजित होकर धूृतराष्ट्रके वे सभी पापात्मा पुत्र अपने ही कर्मदोषसे दग्ध हो जायूँगे

ଯଦି ଏହା ଅନ୍ୟଥା ହୁଏ—କୁରୁମାନେ ଧର୍ମବିରୋଧୀ ଭାବ ଦେଖାନ୍ତି—ତେବେ, ସଞ୍ଜୟ, ଜାଣ: ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସେ ପାପାତ୍ମା ପୁତ୍ରମାନେ ରଥୀ ଫାଲ୍ଗୁନ (ଅର୍ଜୁନ) ଓ ଯୁଦ୍ଧପାଇଁ ସନ୍ନଦ୍ଧ ଭୀମଙ୍କ ହାତରେ ପରାଜିତ ଓ ଛିନ୍ନଭିନ୍ନ ହେବେ। ନିଜ କର୍ମଫଳର ଦାହରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ, ନିଜ ଦୋଷରେ ନିଜେ ନଶିବେ।

Verse 51

पराजितान्‌ पाण्डवेयांस्तु वाचो रौद्रा रूक्षा भाषते धार्तराष्ट्र: । गदाहस्तो भीमसेनो <प्रमत्तो दुर्योधनं स्मारयिता हि काले

ବାୟୁ କହିଲେ— ପାଣ୍ଡବମାନେ ଦମିତ ହୋଇଛନ୍ତି ବୋଲି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ର ରୌଦ୍ର ଓ ରୁକ୍ଷ ବାକ୍ୟ କହୁଛି। କିନ୍ତୁ ସମୟ ଆସିଲେ ଗଦାହସ୍ତ ଓ ଉଗ୍ର ସଙ୍କଳ୍ପରେ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ଭୀମସେନ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ (ସେହି ଦର୍ପର ଫଳ) ସ୍ମରଣ କରାଇଦେବ।

Verse 52

द्यूतके समय जब पाण्डव हार गये थे, तब दुर्योधनने उनके प्रति बड़ी भयानक और कड़वी बातें कही थीं; अतः सदा सावधान रहनेवाले भीमसेन युद्धके समय गदा हाथमें लेकर दुर्योधनको उन बातोंकी याद दिलायेंगे ।। सुयोधनो मन्युमयो महाद्रुम: स्कन्ध: कर्ण: शकुनिस्तस्य शाखा: । दुःशासन: पुष्पफले समद्धे मूलं राजा धृतराष्ट्रोइमनीषी

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ— ଦ୍ୟୁତକ୍ରୀଡାରେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ହାରିଥିବାବେଳେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସେମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଭୟଙ୍କର ଓ କଟୁ ବାକ୍ୟ କହିଥିଲା। ତେଣୁ ସଦା ସାବଧାନ ଭୀମସେନ ଯୁଦ୍ଧକାଳରେ ଗଦା ଧରି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ସେହି କଥା ସ୍ମରଣ କରାଇବ। ସୁୟୋଧନ (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ) କ୍ରୋଧମୟ ଏକ ମହାବୃକ୍ଷ— କର୍ଣ୍ଣ ତାହାର କାଣ୍ଡ, ଶକୁନି ତାହାର ଶାଖା; ଦୁଃଶାସନ ତାହାର ପୁଷ୍ପ-ଫଳର ସମୃଦ୍ଧି; ଏବଂ ତାହାର ମୂଳ ଅବିବେକୀ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର।

Verse 53

दुर्योधन क्रोधमय विशाल वृक्षके समान है, कर्ण उस वृक्षका स्कन्ध, शकुनि शाखा और दुःशासन समृद्ध फल-पुष्प है। अज्ञानी राजा धृतराष्ट्र ही इसके मूल (जड़) हैं |। युधिष्ठिरो धर्ममयो महाद्रुम: स्कन्धो<र्जुनो भीमसेनो5स्य शाखा: । माद्रीपुत्रौ पुष्पफले समृद्धे मूलं त्वहं ब्रह्म च ब्राह्मणाश्न,युधिष्ठिर धर्ममय विशाल वृक्ष हैं। अर्जुन (उस वृक्षके) स्कन्ध, भीमसेन शाखा और माद्रीनन्दन नकुल-सहदेव इसके समृद्ध फल-पुष्प हैं। मैं, वेद और ब्राह्मण ही इस वृक्षके मूल (जड़) हैं

ବାୟୁ କହିଲେ—ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କ୍ରୋଧମୟ ଏକ ମହାବୃକ୍ଷ ସମ; କର୍ଣ୍ଣ ତାହାର କାଣ୍ଡ, ଶକୁନି ତାହାର ଶାଖା, ଦୁଃଶାସନ ତାହାର ସମୃଦ୍ଧ ପୁଷ୍ପ-ଫଳ। ଅଜ୍ଞ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ହିଁ ତାହାର ମୂଳ। କିନ୍ତୁ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଧର୍ମମୟ ମହାବୃକ୍ଷ; ଅର୍ଜୁନ ତାହାର କାଣ୍ଡ, ଭୀମସେନ ତାହାର ଶାଖାମାନେ, ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର (ନକୁଳ-ସହଦେବ) ତାହାର ସମୃଦ୍ଧ ପୁଷ୍ପ-ଫଳ। ସେଇ ବୃକ୍ଷର ମୂଳ ମୁଁ (ବାୟୁ), ବେଦ, ବ୍ରହ୍ମ ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ।

Verse 54

वन॑ राजा धृतराष्ट्र: सपुत्रो व्याप्रास्ते वै संजय पाण्डुपुत्रा: । सिंहाभिगुप्तं न वनं विनश्येत्‌ सिंहो न नश्येत वनाभिगुप्त:,संजय! पुत्रोंसहित राजा धृतराष्ट्र एक वन हैं और पाण्डव उस वनमें निवास करनेवाले व्याप्र हैं। सिंहोंसे रक्षित वन नष्ट नहीं होता एवं वनमें रहकर सुरक्षित सिंह नष्ट नहीं होता उस वनका उच्छेद न करो

ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ! ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହିତ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଏକ ବନ ସମାନ, ଏବଂ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନେ ସେଇ ବନରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବା ବ୍ୟାଘ୍ର ସମାନ। ସିଂହମାନେ ରକ୍ଷା କରୁଥିବା ବନ ନଶେ ନାହିଁ; ବନରେ ଆଶ୍ରୟ ପାଇ ସୁରକ୍ଷିତ ସିଂହ ମଧ୍ୟ ନଶେ ନାହିଁ। ତେଣୁ ସେଇ ବନର ଉଚ୍ଛେଦ କରିବାକୁ ଯାଉନି।

Verse 55

निर्वनो वध्यते व्याप्रो निर्व्याच्रंं छिद्यते वनम्‌ । तस्माद्‌ व्याप्रो वन रक्षेद्‌ वन॑ व्याप्रं च पालयेत्‌,क्योंकि वनसे बाहर निकला हुआ व्याप्र मारा जाता है और बिना व्याप्रके वनको सब लोग आसानीसे काट लेते हैं। अतः व्याप्र वनकी रक्षा करे और वन व्याप्रकी

ବନରୁ ବାହାରିଲେ ବ୍ୟାଘ୍ର ବଧ ହୁଏ; ବ୍ୟାଘ୍ର ନଥିଲେ ବନକୁ ଲୋକେ ସହଜରେ କାଟି ଦିଅନ୍ତି। ତେଣୁ ବ୍ୟାଘ୍ର ବନକୁ ରକ୍ଷା କରୁ, ଏବଂ ବନ ମଧ୍ୟ ବ୍ୟାଘ୍ରକୁ ପାଳନ-ରକ୍ଷା କରୁ।

Verse 56

लताधर्मा धार्तराष्ट्रा: शाला: संजय पाण्डवा: । न लता वर्धते जातु महाद्रुममनाश्रिता,संजय! धृतराष्ट्रके पुत्र लताओंके समान हैं और पाण्डव शाल-वृक्षोंके समान। कोई भी लता किसी महान्‌ वृक्षका आश्रय लिये बिना कभी नहीं बढ़ती है (अतः पाण्डवोंका आश्रय लेकर ही धृतराष्ट्रपुत्र बढ़ सकते हैं)

ବାୟୁ କହିଲେ—ହେ ସଞ୍ଜୟ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ସ୍ୱଭାବରେ ଲତା ସମାନ, ଏବଂ ପାଣ୍ଡବମାନେ ଶାଳବୃକ୍ଷ ସମାନ। ମହାବୃକ୍ଷର ଆଶ୍ରୟ ନେଇନଥିଲେ କୌଣସି ଲତା କେବେ ବଢ଼େ ନାହିଁ।

Verse 57

स्थिता: शुश्रूषितुं पार्था: स्थिता योद्धुमरिंदमा: । यत्‌ कृत्यं धृतराष्ट्रस्य तत्‌ करोतु नराधिप:,शत्रुओंका दमन करनेवाले कुन्तीपुत्र धृतराष्ट्रकी सेवा करनेके लिये भी उद्यत हैं और युद्धके लिये भी। अब राजा धृतराष्ट्रका जो कर्तव्य हो, उसका वे पालन करें

ଶତ୍ରୁଦମନକାରୀ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରମାନେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସେବା କରିବାକୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରସ୍ତୁତ, ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରସ୍ତୁତ। ଏବେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଯେ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ, ନରାଧିପ ସେହି କରୁନ୍ତୁ।

Verse 58

स्थिता: शमे महात्मान: पाण्डवा धर्मचारिण: । योधा: समर्थास्तद्‌ विद्वन्नाचक्षीथा यथातथम्‌,विद्वन्‌ संजय! धर्मका आचरण करनेवाले महात्मा पाण्डव शान्तिके लिये भी तैयार हैं और युद्ध करनेमें भी समर्थ हैं। इन दोनों अवस्थाओंको समझकर तुम राजा धुृतराष्ट्रसे यथार्थ बातें कहना

ବାୟୁ କହିଲେ—ଧର୍ମାଚାରୀ ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବମାନେ ସଂଯମରେ ସ୍ଥିତ ଓ ଶାନ୍ତି ପାଇଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ; ତଥାପି ସେମାନେ ସମର୍ଥ ଯୋଦ୍ଧା। ହେ ବିଦ୍ୱାନ ସଞ୍ଜୟ, ଏହି ଦୁଇ ଅବସ୍ଥା ବୁଝି ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ଯଥାର୍ଥ କଥା ଜଣାଇବୁ।

Verse 246

स धर्मात्मा धर्ममधीत्य पुण्यं यदिच्छया व्रजति ब्रह्मलोकम्‌ । इसके सिवा क्षत्रिय धर्मके अनुसार सावधान रहकर प्रजाजनोंकी रक्षा करे, दान दे, यज्ञ करे, सम्पूर्ण वेदोॉंका अध्ययन करके विवाह करे और पुण्य कर्मोका अनुष्ठान करता हुआ गृहस्थाश्रममें रहे। इस प्रकार वह धर्मात्मा क्षत्रिय धर्म एवं पुण्यका सम्पादन करके अपनी इच्छाके अनुसार ब्रह्मलोकको जाता है

ବାୟୁ କହିଲେ—ସେ ଧର୍ମାତ୍ମା ପୁରୁଷ ଧର୍ମକୁ ଅଧ୍ୟୟନ କରି ଓ ବିଧିପୂର୍ବକ ଆଚରଣ କରି ପୁଣ୍ୟ ସଞ୍ଚୟ କରେ, ଏବଂ ନିଜ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ବ୍ରହ୍ମଲୋକ ପ୍ରାପ୍ତ କରେ। ତଦୁପରି କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମ ଅନୁସାରେ ସତର୍କ ରହି ପ୍ରଜାଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରିବ, ଦାନ ଦେବ, ଯଜ୍ଞ କରିବ, ସମଗ୍ର ବେଦ ଅଧ୍ୟୟନ କରିବ, ବିବାହ କରିବ ଏବଂ ଗୃହସ୍ଥାଶ୍ରମରେ ରହି ପୁଣ୍ୟକର୍ମର ନିରନ୍ତର ଅନୁଷ୍ଠାନ କରିବ। ଏଭଳି କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମ ଓ ପୁଣ୍ୟ ସମ୍ପାଦନ କରି ସେ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ବ୍ରହ୍ମଲୋକକୁ ଯାଏ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to choose a course of action under crisis when the usual outward markers of righteousness fail—i.e., when adharma can resemble dharma and dharma can look compromised—raising the question of what conduct is justifiable and who may rightly censure it.

Moral evaluation in āpad requires reasoned discernment (buddhi) and attention to primary indicators (liṅga) rather than reliance on appearances; ethical judgment must be context-sensitive while remaining accountable to critique and corrective mechanisms such as prāyaścitta.

No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; the chapter instead functions as methodological meta-ethics, emphasizing discernment, censure, and authoritative counsel as the interpretive frame for subsequent decisions.