Adhyaya 19
Udyoga ParvaAdhyaya 1941 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; पर कौरव-पक्ष में संख्यात्मक/गठबंधन-आधारित बढ़त का स्पष्ट संकेत (ग्यारह अक्षौहिणियाँ एकत्र)।

Adhyaya 19

सेनासमागमः — The Convergence of Armies

Upa-parva: Sainyasamudāya (Alliance & Army Mustering Episode)

Vaiśaṃpāyana describes the large-scale convergence of allied forces as the political crisis hardens into organized mobilization. Yuyudhāna (Sātyaki), a leading Sātvata charioteer, arrives to Yudhiṣṭhira with a substantial fourfold army; the troops are portrayed through an inventory-like catalogue of weapons (axes, spears, maces, swords, bows, and varied arrows), emphasizing readiness and standardized martial display. Multiple rulers then join the Pāṇḍava side with akṣauhiṇī contingents—among them Dhṛṣṭaketu of Cedi, Jayatsena of Magadha, the Pāṇḍya with coastal and riverine fighters, Drupada’s forces, and Virāṭa of the Matsyas with mountain kings—culminating in a count of seven akṣauhiṇīs assembling around the Pāṇḍavas. The narrative then mirrors this with the Kaurava coalition: Bhagadatta contributes an akṣauhiṇī with Cīnas and Kirātas; Bhūriśravā and Śalya arrive separately; Kṛtavarmā comes with Bhoja-Andhaka forces; Jayadratha and Sindhu-Sauvīra rulers join; Sudakṣiṇa of Kāmboja arrives with Yavanas and Śakas; Nīla of Māhiṣmatī and the Avanti kings come with southern contingents; and the Kekaya brothers advance—bringing Duryodhana’s total to eleven akṣauhiṇīs. The chapter closes by noting that Hastināpura cannot accommodate the influx, and it enumerates surrounding regions (Pañcanada, Kuru-jāṅgala, Rohitaka forest, desert tracts, and named localities) filled with troops, observed by a Pāñcāla priest sent toward the Kauravas—an administrative witness to the scale of mobilization.

Chapter Arc: जनमेजय के प्रश्नों के बीच वैशम्पायन युद्ध-पूर्व की सबसे निर्णायक हलचल दिखाते हैं—सात्वतों के महारथी युयुधान (सात्यकि) विशाल चतुरंगिणी सेना सहित युधिष्ठिर के पास आ पहुँचते हैं। → एक-एक कर दूर-दूर के नरेश, अपने-अपने ध्वजों और आयुधों से सुसज्जित, दोनों पक्षों की ओर खिंचते चले आते हैं; सेनाओं की गणना ‘अक्षौहिणी’ में होने लगती है और शक्ति-संतुलन का पलड़ा लगातार डोलता रहता है। → कौरव-पक्ष में एक के बाद एक बड़े संयोग घटते हैं—कृतवर्मा (हृदिकपुत्र) भोज-अन्धक-कुकुर वीरों सहित एक अक्षौहिणी लेकर दुर्योधन के पास आता है; केकय के पाँच सगे भाई-राजा भी एक अक्षौहिणी के साथ पहुँचते हैं; फिर भूरिश्रवा और शल्य भी पृथक्-पृथक् एक-एक अक्षौहिणी के साथ दुर्योधन से जा मिलते हैं—और अंततः दुर्योधन के पास ग्यारह अक्षौहिणियाँ एकत्र हो जाती हैं। → अध्याय का निष्कर्ष युद्ध की अनिवार्यता को और ठोस करता है: दोनों ओर की सैन्य-सम्पदा, आयुध-वैभव और राजकीय गठबंधनों का स्पष्ट लेखा सामने आ जाता है, मानो कुरुक्षेत्र की भूमि अभी से सेनाओं के भार से गूँजने लगी हो। → गठबंधन बन चुके हैं, सेनाएँ गिन ली गई हैं—अब प्रश्न केवल यह रह जाता है कि इन एकत्रित शक्तियों का पहला प्रहार किस दिशा में और किस नीति से होगा।

Shlokas

Verse 1

है ० बक। है २ एकोनविशो< ध्याय: युधिष्ठिर और ६ कि यहाँ सहायताके लिये आयी हुई ओंका संक्षिप्त विवरण वैशमग्पायन उवाच युयुधानस्ततो वीर: सात्वतानां महारथ: । महता चतुरड्रेण बलेनागाद्‌ युधिष्ठिरम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ସାତ୍ୱତମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମହାରଥୀ ବୀର ଯୁୟୁଧାନ, ବିଶାଳ ଚତୁରଙ୍ଗ ସେନା ସହିତ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଲେ।

Verse 2

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर सात्वतवंशके महारथी वीर युयुधान (सात्यकि) विशाल चतुरंगिणी सेना साथ लेकर युधिष्ठिरके पास आये ।। तस्य योधा महावीर्या नानादेशसमागता: । नानाप्रहरणा वीरा: शोभयाज्चक्रिरे बलम्‌,उनके सैनिक बड़े पराक्रमी वीर थे। विभिन्न देशोंसे उनका आगमन हुआ था। वे भाँति- भाँतिके अस्त्र-शस्त्र लिये उस सेनाकी शोभा बढ़ा रहे थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଜନମେଜୟ! ତଦନନ୍ତରେ ସାତ୍ୱତ ବଂଶର ମହାରଥୀ ବୀର ଯୁଯୁଧାନ (ସାତ୍ୟକି) ବିଶାଳ ଚତୁରଙ୍ଗିଣୀ ସେନା ସହିତ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଲେ। ତାଙ୍କର ଯୋଧାମାନେ ମହାପରାକ୍ରମୀ, ନାନା ଦେଶରୁ ସମାଗତ; ନାନାପ୍ରକାର ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଧାରଣ କରି ସେ ବୀରମାନେ ସେନାର ଶୋଭା ଓ ବଳ ବଢ଼ାଇଲେ।

Verse 3

परश्वधैर्भिन्दिपालै: शूलतोमरमुदगरै: । परिघैर्यष्टिभि: पाशै: करवालै क्ष निर्मल:

ସେମାନେ ପରଶୁ, ଭିନ୍ଦିପାଳ, ଶୂଳ, ତୋମର, ମୁଦ୍ଗର, ପରିଘ, ଯଷ୍ଟି, ପାଶ ଏବଂ ନିର୍ମଳ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ତଳୱାର ଦ୍ୱାରା ସୁସଜ୍ଜିତ ଥିଲେ।

Verse 4

खड्गकार्मुकनिर्व्यूहैः शरैश्व॒ विविधैरपि । तैलधौतै: प्रकाशद्धिस्तदशो भत वै बलम्‌

ଖଡ୍ଗ ଓ ଧନୁଷର ସୁସଂଗଠିତ ବିନ୍ୟାସରେ, ଏବଂ ନାନାପ୍ରକାର ବାଣରେ ସଜ୍ଜିତ ହୋଇ ସେ ସେନା ଅତି ଶୋଭା ପାଉଥିଲା; ତେଲରେ ଧୋଇ ଚମକୁଥିବା ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଦ୍ୱାରା ସେ ବଳ ଦୀପ୍ତିମାନ ଦେଖାଯାଉଥିଲା।

Verse 5

फरसे, भिन्दिपाल, शूल, तोमर, मुद्गर, परिघ, यष्टि, पाश, निर्मल तलवार, खड््‌गः, धनुषसमूह तथा भाँति-भाँतिके बाण आदि अस्त्र-शस्त्र तेलमें धुले होनेके कारण चमचमा रहे थे, जिनसे वह सेना सुशोभित हो रही थी ।। तस्य मेघप्रकाशस्य सौवर्ण: शोभितस्य च । बभूव रूप॑ सैन्यस्य मेघस्येव सविद्युत:,सात्यकिकी वह सेना (हाथियोंके समूहके कारण तथा काली वर्दी पहननेसे) मेघोंके समान काली दिखायी देती थी। सैनिकोंके सुनहरे आभूषणोंसे सुशोभित हो वह ऐसी जान पड़ती थी, मानो बिजलियोंसहित मेघोंकी घटा छा रही हो

ସେ ସେନାର ରୂପ ମେଘ ପରି କଳା ଥିଲା; ଏବଂ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଆଭୂଷଣର ଶୋଭାରେ ତାହା ଏମିତି ଲାଗୁଥିଲା, ଯେନେ ବିଜୁଳି ସହିତ ଘନ ମେଘଛାୟା ଛାଇଯାଇଛି।

Verse 6

अक्षौहिणी तु सा सेना तदा यौधिष्ठिरं बलम्‌ । प्रविश्यान्तर्दधे राजन्‌ सागरं कुनदी यथा,राजन्‌! वह एक अक्षौहिणी सेना युधिष्ठिरकी विशाल वाहिनीमें समाकर उसी प्रकार विलीन हो गयी, जैसे कोई छोटी नदी समुद्रमें मिल गयी हो

ହେ ରାଜନ୍! ସେ ଏକ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ବିଶାଳ ବଳରେ ପ୍ରବେଶ କରି ସେଥିରେ ଏମିତି ଲୟ ହୋଇଗଲା, ଯେପରି ଛୋଟ ନଦୀ ସାଗରରେ ମିଶି ହରାଇଯାଏ।

Verse 7

|! /__ 0:2४! |॥| 68 तथैवाक्षौहिणीं गृह चेदीनामृषभो बली । धृष्टकेतुरुपागच्छत्‌ पाण्डवानमितौजस:,इसी प्रकार महाबली चेदिराज धृष्टकेतु अपनी एक अक्षौहिणी सेना साथ लेकर अमित तेजस्वी पाण्डवोंके पास आये

ସେହିପରି ଚେଦିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହାବଳୀ ଧୃଷ୍ଟକେତୁ ଏକ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ସହ ଅମିତ ପରାକ୍ରମୀ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଲେ।

Verse 8

मागधश्न जयत्सेनो जारासन्धिर्महाबल: । अक्षौहिण्यैव सैन्यस्य धर्मराजमुपागमत्‌,मागध वीर जयत्सेन और जरासंधका महाबली पुत्र सहदेव--ये दोनों एक अक्षौहिणी सेनाके साथ धर्मराज युधिष्ठिरके पास आये थे

ମାଗଧ ବୀର ଜୟତ୍ସେନ ଓ ଜରାସନ୍ଧଙ୍କ ମହାବଳୀ ପୁତ୍ର ସହଦେବ—ଏହି ଦୁଇଜଣ ଏକ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ସହ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଲେ।

Verse 9

तथैव पाण्ड्यो राजेन्द्र सागरानूपवासिभि: । वृतो बहुविधैर्योधैर्युधिष्ठिरमुपागमत्‌,राजेन्द्र! इसी प्रकार समुद्रतटवर्ती जलप्राय देशके निवासी अनेक प्रकारके सैनिकोंसे घिरे हुए पाण्ड्यनरेश युधिष्ठिरके पक्षमें पधारे थे

ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ସେହିପରି ସମୁଦ୍ରତଟବର୍ତ୍ତୀ ଅଞ୍ଚଳର ନିବାସୀ ନାନାପ୍ରକାର ଯୋଧାମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଘେରାଯାଇ ପାଣ୍ଡ୍ୟରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଲେ।

Verse 10

तस्य सैन्यमतीवासीत्‌ तस्मिन्‌ बलसमागमे । प्रेक्षणीयतरं राजन्‌ सुवेषं बलवत्‌ तदा,राजन! उस सैन्य-समागमके समय युधिष्ठिरकी सुन्दर वेश-भूषासे विभूषित तथा प्रबल सेना, जिसकी संख्या बहुत अधिक थी, देखने ही योग्य जान पड़ती थी

ରାଜନ୍! ସେହି ବଳସମାଗମ ସମୟରେ ତାଙ୍କ ସେନା ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିଶାଳ ଥିଲା; ସେତେବେଳେ ସୁନ୍ଦର ବେଶଭୂଷାରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ଓ ବଳରେ ପ୍ରବଳ ହୋଇ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦର୍ଶନୀୟ ଲାଗୁଥିଲା।

Verse 11

द्रुपदस्याप्य भूत्‌ सेना नानादेशसमागतै: । शोभिता पुरुषै: शूरै: पुत्रैश्चास्य महारथै:,द्रपदकी सेना तो वहाँ पहलेसे ही उपस्थित थी, जो विभिन्न देशोंसे आये हुए शूरवीर पुरुषों तथा द्रुपदके महारथी पुत्रोंसे सुशोभित थी

ଦ୍ରୁପଦଙ୍କ ସେନା ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ପୂର୍ବରୁ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲା; ନାନା ଦେଶରୁ ଆସିଥିବା ଶୂର ପୁରୁଷମାନେ ଓ ତାଙ୍କର ମହାରଥୀ ପୁତ୍ରମାନେ ତାହାକୁ ଶୋଭିତ କରୁଥିଲେ।

Verse 12

तथैव राजा मत्स्यानां विराटो वाहिनीपति: । पर्वतीयैर्महीपालै: सहित: पाण्डवानियात्‌,इसी प्रकार मत्स्यनरेश सेनापति विराट भी पर्वतीय राजाओंके साथ पाण्डवोंकी सहायताके लिये प्रस्तुत थे

ସେହିପରି ମତ୍ସ୍ୟରାଜ ଓ ସେନାପତି ବିରାଟ ମଧ୍ୟ ପର୍ବତବାସୀ ରାଜମାନଙ୍କ ସହ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହାୟତା ପାଇଁ ଯାତ୍ରାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ଥିଲେ।

Verse 13

इतश्रेतश्न पाण्डूनां समाजम्मुर्महात्मनाम्‌ । अक्षौहिण्यस्तु सप्तैता विविधध्वजसंकुला:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସମାବେଶରେ ନାନାପ୍ରକାର ଧ୍ୱଜରେ ଘନ ଭରିଥିବା ସାତ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ଥିଲା।

Verse 14

युयुत्समाना: कुरुभि: पाण्डवान्‌ समहर्षयन्‌ । महात्मा पाण्डवोंके पास इधर-उधरसे सात अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हुई थीं, जो नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकाओंसे व्याप्त दिखायी देती थीं। ये सब सेनाएँ कौरवोंसे युद्ध करनेकी इच्छा रखकर पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाती थीं ।। १३ है ।। तथैव धार्तराष्ट्रस्य हर्ष समभिवर्धयन्‌,बभौ बलमनाधृष्यं कर्णिकारवनं यथा । इसी प्रकार राजा भगदत्तने दुर्योधनका हर्ष बढ़ाते हुए उसे एक अक्षौहिणी सेना प्रदान की। सुनहरे शरीरवाले चीन और किरात देशके योद्धाओंसे भरी हुई भगदत्तकी दुर्धर्ष सेना (खिले हुए) कनेरके जंगल-सी जान पड़ती थी

କୁରୁମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବା ଇଚ୍ଛାରେ ସେହି ସେନାମାନେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ହର୍ଷିତ କଲେ। ସେହିପରି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ)ର ହର୍ଷ ବଢ଼ାଇ ଏକ ଅଜେୟ ବଳ ଫୁଲିଥିବା କର୍ଣ୍ଣିକାର ବନ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଲା।

Verse 15

भगदत्तो महीपाल: सेनामक्षौहिणीं ददौ । तस्य चीनै: किरातैश्व काज्चनैरिव संवृतम्‌

ରାଜା ଭଗଦତ୍ତ ଗୋଟିଏ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ଦେଲେ; ତାଙ୍କ ସେନା ଚୀନ ଓ କିରାତ ଦେଶର ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା, ଯେନ ସୁବର୍ଣ୍ଣରେ ଆବୃତ, ଘେରା ଥିଲା।

Verse 16

तथा भूरिश्रवा: शूर: शल्यश्न कुरुनन्दन

ସେହିପରି, ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ, ଶୂର ଭୂରିଶ୍ରବା ଓ ଶଲ୍ୟ ମଧ୍ୟ।

Verse 17

कृतवर्मा च हार्दिक्यो भोजान्धकुकुरै: सह

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହୃଦୀକପୁତ୍ର କୃତବର୍ମା ମଧ୍ୟ ଭୋଜ, ଅନ୍ଧକ ଓ କୁକୁରମାନଙ୍କ ସହ ସେଠାକୁ ଆସିଲା; ଯାଦବ-ସଂପୃକ୍ତ କୁଳମାନଙ୍କ ଏହି ସମାବେଶ ଆଗାମୀ ସଂଘର୍ଷରେ ନିଷ୍ଠା ଓ ଧର୍ମଭାରର ଗୁରୁତ୍ୱ ସୂଚିତ କଲା।

Verse 18

तस्य तैः पुरुषव्याप्रैवनमाला धरैर्बलम्‌

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବନମାଳାଧାରୀ ସେହି ପୁରୁଷ-ବ୍ୟାଘ୍ରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ତାଙ୍କର ସେନା ଦୃଢ଼ ଓ ବଳବତୀ ହେଲା; ତାଙ୍କର ତେଜ ଓ ଶିଷ୍ଟାଚାର ସେନାର ଉତ୍ସାହ ଏବଂ ଧର୍ମନିଶ୍ଚୟ ବଢ଼ାଇଲା।

Verse 19

अशोभत यथा मन्तैर्वन॑ प्रक्रीडितैर्गजै: । उन वनमालाधारी पुरुषसिंहोंसे कृतवर्माकी सेना उसी प्रकार सुशोभित हुई, जैसे क्रीड़ापपयण मतवाले हाथियोंसे कोई (विशाल) वन शोभा पा रहा हो ।। १८ हू || जयद्रथमुखाश्षान्ये सिन्धुसौवीरवासिन:,इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि पुरोहितसैन्यदर्शने एकोनविंशो5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्रोगपर्वमें पुरोहितके द्वारा सैन्यदर्शनविषयक उत्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବନମାଳାଧାରୀ ସେହି ପୁରୁଷସିଂହମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସୁସଜ୍ଜିତ କୃତବର୍ମାଙ୍କ ସେନା ଏମିତି ଶୋଭିତ ହେଲା, ଯେପରି କ୍ରୀଡାରତ ମଦୋନ୍ମତ୍ତ ଗଜମାନେ ଘୁରୁଥିବା ଏକ ବିଶାଳ ବନ ଶୋଭା ପାଏ।

Verse 20

तेषामक्षौहिणी सेना बहुला विबभौ तदा

ତେବେ ତାଙ୍କର ଅକ୍ଷୌହିଣୀ-ପରିମିତ ସେନା ଅତ୍ୟନ୍ତ ବିପୁଳ ଓ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ପ୍ରତୀତ ହେଲା—ଯୁଦ୍ଧଦିଗକୁ ବଢ଼ୁଥିବା ଗତି ଏବଂ ତାହାର ଗୁରୁତର ଧର୍ମଭାରକୁ ସୂଚିତ କରି।

Verse 21

विधूयमानो वातेन बहुरूप इवाम्बुद: । उनकी वह एक अक्षौहिणी विशाल सेना उस समय हवासे उड़ाये जाते हुए अनेक रूपवाले मेघके समान प्रतीत होती थी ।| २० डे ।। सुदक्षिणश्न काम्बोजो यवनैश्न शकैस्तथा,स च सम्प्राप्य कौरव्यं तत्रैवान्तर्दधे तदा । राजन! कम्बोजनरेश सुदक्षिण भी यवनों और शकोंके साथ एक अक्षौहिणी सेना लिये दुर्योधनके पास आया। उसका सैन्य-समूह टिड्डियोंके दल-सा जान पड़ता था। वह सारा सैन्य-समुदाय कौरव-सेनामें आकर विलीन हो गया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବାତାସରେ ଧକ୍କା ଖାଇ ଅନେକ ରୂପ ଧାରଣ କରୁଥିବା ମେଘ ପରି, ସେହି ମହାସେନା ମଧ୍ୟ ସେ ସମୟରେ ନାନାରୂପା ପ୍ରତୀତ ହେଲା।

Verse 22

उपाजगाम कौरव्यमक्षौहिण्या विशाम्पते । तस्य सेनासमावाय: शलभानामिवाबभौ

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପ୍ରଜାପତେ! ଗୋଟିଏ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା କୌରବମାନଙ୍କ ଦିଗକୁ ଅଗ୍ରସର ହେଲା। ତାହାର ସେନାସମାବେଶ ଟିଡ଼ିପୋକର ଝୁଣ୍ଡ ପରି ଦେଖାଗଲା—ଘନ, ବିଶାଳ ଓ ଭୟଙ୍କର।

Verse 23

तथा माहिष्मतीवासी नीलो नीलायुथै: सह

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେହିପରି ମାହିଷ୍ମତୀର ବାସିନ୍ଦା ନୀଳ ମଧ୍ୟ ନୀଳବର୍ଣ୍ଣ ଦଳମାନଙ୍କ ସହ ଆସିଲା।

Verse 24

महीपालो महावीर्यर्दक्षिणापथवासिभि: । इसी प्रकार माहिष्मती पुरीके निवासी राजा नील भी दक्षिण देशके रहनेवाले श्यामवर्णके शस्त्रधारी महापराक्रमी सैनिकोंके साथ दुर्योधनके पक्षमें आये ।। आवलन्त्यौ च महीपालौ महाबलसुसंवृतौ

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାବୀର୍ୟବାନ ରାଜା ମହୀପାଳ ଦକ୍ଷିଣାପଥର ଯୋଧାମାନଙ୍କ ସହ ଆସିଲେ। ସେହିପରି ମାହିଷ୍ମତୀର ରାଜା ନୀଳ ମଧ୍ୟ ଦକ୍ଷିଣ ଦେଶର ଶ୍ୟାମବର୍ଣ୍ଣ, ଶସ୍ତ୍ରଧାରୀ, ମହାବଳୀ ସେନା ସହ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପକ୍ଷରେ ଆସିଲେ। ଏବଂ ଅବନ୍ତିର ଦୁଇ ରାଜା ମଧ୍ୟ ମହାବଳରେ ପରିବୃତ ହୋଇ ଆସିଲେ।

Verse 25

केकयाश्ष नरव्याप्रा: सोदर्या: पठ्च पार्थिवा:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କେକୟ ଦେଶର ସେହି ପାଞ୍ଚ ରାଜା, ଏକେ ମାତାର ସନ୍ତାନ, ନରବ୍ୟାଘ୍ର ଓ କର୍ମୋଦ୍ୟମୀ, ସେଠାରେ ସମବେତ ହେଲେ।

Verse 26

ततस्ततस्तु सर्वेषां भूमिपानां महात्मनाम्‌

ତାପରେ ସେହି ସମସ୍ତ ମହାତ୍ମା ଭୂପାଳମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କ୍ରମେ କ୍ରମେ ପରବର୍ତ୍ତୀ ଘଟଣାମାନ ଅଗ୍ରସର ହେଲା।

Verse 27

तिस्रोडन्या: समवर्तन्त वाहिन्यो भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ) तदनन्तर इधर-उधरसे समस्त महामना नरेशोंकी तीन अक्षौहिणी सेनाएँ और आ पहुँचीं ।। एवमेकादशावृत्ता: सेना दुर्योधनस्य ता:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତାପରେ ଆଉ ତିନିଟି ବାହିନୀ ସମବେତ ହେଲା। ତଦନନ୍ତରେ ବିଭିନ୍ନ ଦିଗରୁ ମହାମନା ନରେଶମାନଙ୍କର ତିନି ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ମଧ୍ୟ ଆସି ପହଞ୍ଚିଲା। ଏଭଳି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ସେନା ସମୁଦାୟ ଏଗାର ଅକ୍ଷୌହିଣୀରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହେଲା।

Verse 28

न हास्तिनपुरे राजन्नवकाशो5भवत्‌ तदा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ସେ ସମୟରେ ହସ୍ତିନାପୁରରେ କୌଣସି ଅବକାଶ—ସ୍ଥାନ—ଅବଶିଷ୍ଟ ରହିଲା ନାହିଁ।

Verse 29

राज्ञां स्वबलमुख्यानां प्राधान्येनापि भारत । राजन! दुर्योधनकी अपनी सेनाके जो प्रधान-प्रधान राजा थे, उनके भी ठहरनेके लिये हस्तिनापुरमें स्थान नहीं रह गया था ।। २८ है ।। तत: पज्चनदं चैव कृत्स्नं च कुरुजाड्लम्‌,इसलिये भारत! पंचनद प्रदेश, सम्पूर्ण कुरुजांगल देश, रोहितकवन (रोहतक), समस्त मरुभूमि, अहिच्छत्र, कालकूट, गंगातट, वारण, वाटधान तथा यामुनपर्वत--यह प्रचुर धन- धान्यसे सम्पन्न सुविस्तृत प्रदेश कौरवोंकी सेनासे भलीभाँति घिर गया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପ୍ରଧାନ ସହାୟ ଯେ ଅଗ୍ରଗଣ୍ୟ ରାଜାମାନେ ନିଜ-ନିଜ ବଳର ନାୟକ ଥିଲେ, ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ହସ୍ତିନାପୁରରେ ରହିବାକୁ ସ୍ଥାନ ରହିଲା ନାହିଁ। ତେଣୁ ପଞ୍ଚନଦ ପ୍ରଦେଶ, ସମଗ୍ର କୁରୁଜାଙ୍ଗଲ, ରୋହିତକ ଅରଣ୍ୟ, ସମସ୍ତ ମରୁଭୂମି, ଅହିଚ୍ଛତ୍ର, କାଳକୂଟ, ଗଙ୍ଗାତଟ, ବାରଣ, ବାଟଧାନ ଓ ଯାମୁନ ପର୍ବତ—ଧନ-ଧାନ୍ୟରେ ସମୃଦ୍ଧ ଏହି ସୁବିସ୍ତୀର୍ଣ୍ଣ ଦେଶ—କୌରବ ସେନାଦ୍ୱାରା ସବୁଦିଗରୁ ଘେରାଯାଇ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଗଲା।

Verse 30

तथा रोहितकारण्यं मरुभूमिश्न केवला । अहिच्छत्रं कालकूटं गज़ाकूलं च भारत,इसलिये भारत! पंचनद प्रदेश, सम्पूर्ण कुरुजांगल देश, रोहितकवन (रोहतक), समस्त मरुभूमि, अहिच्छत्र, कालकूट, गंगातट, वारण, वाटधान तथा यामुनपर्वत--यह प्रचुर धन- धान्यसे सम्पन्न सुविस्तृत प्रदेश कौरवोंकी सेनासे भलीभाँति घिर गया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ଏହିପରି ରୋହିତକ ଅରଣ୍ୟ, ସମଗ୍ର ମରୁଭୂମି, ଅହିଚ୍ଛତ୍ର, କାଳକୂଟ ଓ ଗଙ୍ଗାତଟ—ଏହି ସମୃଦ୍ଧ ଦେଶମାନେ କୌରବ ସେନାଦ୍ୱାରା ସବୁଦିଗରୁ ଘେରାଯାଇଲେ।

Verse 31

वारणं वाटधानं च यामुनश्चैव पर्वत: । एष देश: सुविस्तीर्ण: प्रभूतधनधान्यवान्‌,इसलिये भारत! पंचनद प्रदेश, सम्पूर्ण कुरुजांगल देश, रोहितकवन (रोहतक), समस्त मरुभूमि, अहिच्छत्र, कालकूट, गंगातट, वारण, वाटधान तथा यामुनपर्वत--यह प्रचुर धन- धान्यसे सम्पन्न सुविस्तृत प्रदेश कौरवोंकी सेनासे भलीभाँति घिर गया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବାରଣ, ବାଟଧାନ ଓ ଯାମୁନ ନାମକ ପର୍ବତ—ଏହି ସମଗ୍ର ଦେଶ ସୁବିସ୍ତୀର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ଧନ-ଧାନ୍ୟରେ ପ୍ରଚୁର।

Verse 32

बभूव कौरवेयाणां बलेनातीव संवृत: । तत्र सैन्यं तथा युक्त ददर्श स पुरोहित:,पांचालराज ट्रुपदने अपने जिन पुरोहित ब्राह्मणको कौरवोंके पास भेजा था, उन्होंने वहाँ पहुँचकर उस विशाल सेनाके जमावको देखा

କୌରବମାନଙ୍କ ସେନାବଳରେ ସେ ଅଞ୍ଚଳ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଆବୃତ ହୋଇଥିଲା। ସେଠାକୁ ପହଞ୍ଚି ଦ୍ରୁପଦ-ପ୍ରେଷିତ ପୁରୋହିତ ସୁସଜ୍ଜିତ ଭାବେ ଗଠିତ ସେଇ ବିଶାଳ ସେନାକୁ ଦେଖିଲେ।

Verse 33

य: स पाज्चालराजेन प्रेषित: कौरवान्‌ प्रति,पांचालराज ट्रुपदने अपने जिन पुरोहित ब्राह्मणको कौरवोंके पास भेजा था, उन्होंने वहाँ पहुँचकर उस विशाल सेनाके जमावको देखा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ପାଞ୍ଚାଳରାଜ ଦ୍ରୁପଦ ଯେ ବ୍ରାହ୍ମଣ ପୁରୋହିତଙ୍କୁ କୌରବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଦୂତ ଭାବେ ପଠାଇଥିଲେ, ସେ ତାହାଁକୁ ପହଞ୍ଚି ସେମାନଙ୍କର ବିଶାଳ ଓ ସୁସଂଗଠିତ ସେନାସମାବେଶ ଦେଖିଲେ।

Verse 153

बभौ बलमनाधृष्यं कर्णिकारवनं यथा । इसी प्रकार राजा भगदत्तने दुर्योधनका हर्ष बढ़ाते हुए उसे एक अक्षौहिणी सेना प्रदान की। सुनहरे शरीरवाले चीन और किरात देशके योद्धाओंसे भरी हुई भगदत्तकी दुर्धर्ष सेना (खिले हुए) कनेरके जंगल-सी जान पड़ती थी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେ ସେନା ଅନାଧୃଷ୍ୟ ବଳରେ ଫୁଲିଥିବା କର୍ଣ୍ଣିକାର-ବନ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ଥିଲା। ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ହର୍ଷ ବଢ଼ାଇବାକୁ ଭଗଦତ୍ତ ଏକ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ଦେଲେ; ଚୀନ ଓ କିରାତ ଦେଶର ଯୋଦ୍ଧାମାନେ ଭରିଥିବା, ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣକାନ୍ତିରେ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ସେଇ ଦୁର୍ଧର୍ଷ ବାହିନୀ କର୍ଣ୍ଣିକାର-ବନ ସଦୃଶ ଲାଗୁଥିଲା।

Verse 176

अक्षौहिण्यैव सेनाया दुर्योधनमुपागमत्‌ । हृदिकपुत्र कृतवर्मा भी भोज, अन्धक तथा कुकुरवंशी वीरोंके साथ एक अक्षौहिणी सेना लेकर दुर्योधनके पास आया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ହୃଦିକପୁତ୍ର କୃତବର୍ମା ଭୋଜ, ଆନ୍ଧକ ଓ କୁକୁରବଂଶୀ ବୀରମାନଙ୍କ ସହିତ ଏକ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ନେଇ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଲେ।

Verse 196

आज म्मु: पृथिवीपाला: कम्पयन्त इवाचलान्‌ । जयद्रथ आदि अन्य राजा, जो सिन्धु और सौवीरदेशके निवासी थे, पर्वतोंको कँपाते हुए-से दुर्योधनके पास आये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ପୃଥିବୀପାଳ ରାଜାମାନେ ପର୍ବତକୁ ମଧ୍ୟ କମ୍ପାଇଦେଉଥିବା ପରି ଆସିଲେ। ସିନ୍ଧୁ ଓ ସୌବୀର ଦେଶର ନିବାସୀ ଜୟଦ୍ରଥ ଆଦି ରାଜାମାନେ ସେଇ ପ୍ରଚଣ୍ଡ ଠାଠ-ବାଠ ସହ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପାଖକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।

Verse 226

स च सम्प्राप्य कौरव्यं तत्रैवान्तर्दधे तदा । राजन! कम्बोजनरेश सुदक्षिण भी यवनों और शकोंके साथ एक अक्षौहिणी सेना लिये दुर्योधनके पास आया। उसका सैन्य-समूह टिड्डियोंके दल-सा जान पड़ता था। वह सारा सैन्य-समुदाय कौरव-सेनामें आकर विलीन हो गया

ସେ କୌରବକୁମାରଙ୍କ ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚି ସେଠାରେଇ ଅନ୍ତର୍ଧାନ ହେଲା। ରାଜନ, କମ୍ବୋଜରାଜ ସୁଦକ୍ଷିଣ ଯବନ ଓ ଶକମାନଙ୍କ ସହିତ ଏକ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ନେଇ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଲେ। ତାଙ୍କ ସେନାସମୂହ ଟିଡ଼ିପୋକର ଝୁଣ୍ଡ ପରି ଦେଖାଯାଉଥିଲା। ସେ ସମଗ୍ର ସେନାସମୁଦ୍ର ଆସି କୌରବସେନାରେ ଲୀନ ହୋଇଗଲା।

Verse 246

अक्षौहिण्या च कौरव्यं दुर्योधनमुपागतौ । अवन्तीदेशके दोनों राजा विन्द और अनुविन्द भी पृथक्‌-पृथक्‌ एक अक्षौहिणी सेनासे घिरे हुए दुर्योधनके पास आये

ଏକ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ସହ କୌରବବଂଶୀ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପାଖକୁ ସେମାନେ ଆସିଲେ। ଅବନ୍ତୀଦେଶର ଦୁଇ ରାଜା—ବିନ୍ଦ ଓ ଅନୁବିନ୍ଦ—ମଧ୍ୟ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍, ନିଜ ନିଜ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନାରେ ଘେରା ହୋଇ, ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସିଲେ।

Verse 256

संहर्षयन्त: कौरव्यमक्षौहिण्या समाद्रवन्‌ । केकयदेशके पुरुषसिंह पाँच नरेश, जो परस्पर सगे भाई थे, दुर्योधनका हर्ष बढ़ाते हुए एक अक्षौहिणी सेनाके साथ आ पहुँचे

କୌରବକୁମାର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ହର୍ଷ ବଢ଼ାଇ ସେମାନେ ଏକ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ସହ ଧାଇ ଆସିଲେ। କେକୟଦେଶର ପୁରୁଷସିଂହ ସେଇ ପାଞ୍ଚ ରାଜା—ଯେମାନେ ପରସ୍ପର ସହୋଦର—ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପାଖକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।

Verse 276

युयुत्सममाना: कौन्तेयान्‌ नानाध्वजसमाकुला: । इस प्रकार दुर्योधनके पास सब मिलाकर ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हो गयीं, जो भाँति-भाँतिकी ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित थीं और कुन्तीकुमारोंसे युद्ध करनेका उत्साह रखती थीं

କୌନ୍ତେୟମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଉତ୍ସୁକ ଏବଂ ନାନା ପ୍ରକାର ଧ୍ୱଜ-ପତାକାରେ ଭରିଥିବା ସେନାମାନେ ଏଭଳି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପାଖରେ ଏକତ୍ର ହେଲେ। ସମୁଦାୟ ମିଶି ଏଗାର ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ଜମା ହେଲା—ବିଭିନ୍ନ ଧ୍ୱଜରେ ଶୋଭିତ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ବିରୋଧରେ ଯୁଦ୍ଧସଙ୍କଳ୍ପରେ ଦୃଢ଼।

Verse 1636

दुर्योधनमुपायातावक्षौहिण्या पृथक्‌ पृथक्‌ । कुरुनन्दन! इसी प्रकार शूरवीर भूरिश्रवा तथा राजा शल्य पृथक्‌-पृथक्‌ एक-एक अक्षौहिणी सेना साथ लेकर दुर्योधनके पास आये

କୁରୁନନ୍ଦନ, ଏହିପରି ଶୂରବୀର ଭୂରିଶ୍ରବା ଓ ରାଜା ଶଲ୍ୟ ମଧ୍ୟ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍, ପ୍ରତ୍ୟେକେ ଏକ-ଏକ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନା ସହ ନେଇ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଲେ। ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ବଳଗୁଡ଼ିକ ଏଭଳି ଏକେକରି, ପୃଥକ୍ ଭାବେ, ଆସି ଯୋଗ ଦେଉଥିଲା।

Frequently Asked Questions

The tension lies in converting political grievance into irreversible collective action: once allies commit akṣauhiṇīs and occupy regions, the ethical space for negotiated settlement narrows, raising questions about responsibility for escalation.

It illustrates how power in epic polity is operational: legitimacy is performed through coalition visibility, standardized organization, and control of space—showing that strategic capacity and moral claims develop together, not separately.

No explicit phalaśruti appears in this passage; its meta-function is archival and logistical, documenting force composition and geography to contextualize later strategic choices within the broader narrative.