
भीष्म–जामदग्न्यसंवादः (Amba-prasaṅga and Kurukṣetra Dvandva Declaration) / Bhishma–Jamadagnya Dialogue
Upa-parva: Bhīṣma–Jāmadagnya (Paraśurāma) Saṃvāda / Kurukṣetra Dvandva-niścaya Episode
Bhīṣma narrates that Jāmadagnya (Paraśurāma) arrives and is received with full royal-ritual honors, including brāhmaṇas, ṛtviks, and purohitas. Paraśurāma censures Bhīṣma regarding the Kāśī princess: she was brought without consent and later released, and—having been rejected by Śālva—Paraśurāma orders Bhīṣma to accept her to restore her social standing. Bhīṣma refuses, arguing that she had already declared herself Śālva’s and was permitted to depart; he asserts that he will not abandon kṣatra-dharma from fear, pity, greed, or desire. Paraśurāma responds with escalating anger and threatens lethal enforcement. Bhīṣma attempts conciliatory speech, appeals to guru-status, and questions the rationale for combat. He then articulates a principled boundary: he will not kill a brāhmaṇa-guru, yet dharma permits force against a brāhmaṇa who fights “like a kṣatriya,” and role-based duty follows conduct. Citing a traditional maxim (attributed to Marutta) about disciplining an arrogant or misguided guru, Bhīṣma concludes that a duel is justified; he invites Paraśurāma to Kurukṣetra for single combat and asserts confidence in his martial capacity, framing the encounter as a test of dharma under contested authority.
Chapter Arc: भीष्म स्मित-सा लिए रणभूमि में परशुराम को ललकारते हैं—यदि युद्ध की इच्छा है तो कवच बाँधकर रथ पर आरूढ़ हों; कुरुक्षेत्र में दो युग-पुरुष आमने-सामने खड़े हैं। → परशुराम भी मुसकराते हुए अपने रथ और दिव्य साधनों का गर्वोक्त परिचय देते हैं; भीष्म उन्हें रथस्थ, सर्वश्रेष्ठ आयुधों से दीप्त देखते हैं और दोनों के बीच वाक्य-शर और शर-प्रहार साथ-साथ बढ़ते जाते हैं। → भीष्म तीक्ष्ण भल्ल से परशुराम के धनुष की कोटि काटकर उसे भूमिपात कर देते हैं—क्षण भर को युद्ध का पलड़ा भीष्म की ओर झुकता है और गुरु-शिष्य संघर्ष अपनी चरम सीमा छूता है। → भीष्म के भीतर करुणा उमड़ती है; वे स्वयं को धैर्य देकर भी ‘धिग् धिग्’ कहकर क्षत्रधर्म की कठोरता को धिक्कारते हैं और फिर परशुराम पर आगे प्रहार नहीं करते—युद्ध-नीति पर दया का अंकुश लग जाता है। → दिन ढलने/सूर्य के तपने के साथ युद्ध का वेग थमता है, पर द्वंद्व का निर्णय शेष रहता है—अगले अध्याय में यह संघर्ष किस दिशा में मुड़ेगा, यही उत्कंठा बनी रहती है।
Verse 1
भीकम (2 अमान एकोनाशीरत्याधिेकशततमो<् ध्याय: संकल्पनिर्मित रथपर आरूढ़ परशुरामजीके साथ भीष्मका युद्ध प्रारम्भ करना भीष्म उवाच तमहं स्मयन्निव रणे प्रत्यभाषं व्यवस्थितम् । भूमिष्ठं नोत्सहे योद्धुं भवन्तं रथमास्थित:,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! तब मैं युद्धके लिये खड़े हुए परशुरामजीसे मुसकराता हुआ-सा बोला--'ब्रह्मन! मैं रथपर बैठा हूँ और आप भूमिपर खड़े हैं। ऐसी दशामें मैं आपके साथ युद्ध नहीं कर सकता
ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ରଣଭୂମିରେ ଯୁଦ୍ଧପାଇଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହୋଇ ଭୂମିରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ପରଶୁରାମଙ୍କୁ ଦେଖି ମୁଁ ମନେ ହେଲା ହଳକା ହସ ସହ କହିଲି—“ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ମୁଁ ରଥରେ ଅଛି, ଆପଣ ଭୂମିରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ; ଏପରି ଅବସ୍ଥାରେ ଆପଣଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ମୁଁ ଉଚିତ ମନେ କରୁନାହିଁ।”
Verse 2
आरोह स्यन्दनं वीर कवचं च महाभुज । बधान समरे राम यदि योद्धुं मयेच्छसि,“महाबाहो! वीरवर राम! यदि आप समरभूमिमें मेरे साथ युद्ध करना चाहते हैं तो रथपर आरूढ़ होइये और कवच भी बाँध लीजिये
ମହାବାହୁ ବୀରବର ରାମ! ଯଦି ତୁମେ ସମରଭୂମିରେ ମୋ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କର, ତେବେ ରଥରେ ଆରୋହଣ କର ଏବଂ କବଚ ବାନ୍ଧ।
Verse 3
ततो मामब्रवीद् राम: स्मयमानो रणाजिरे | रथो मे मेदिनी भीष्म वाहा वेदा: सदश्ववत्,तब परशुरामजी समरांगणमें किंचित् मुसकराते हुए मुझसे बोले--“कुरुनन्दन भीष्म! मेरे लिये तो पृथ्वी ही रथ है, चारों वेद ही उत्तम अश्वोंके समान मेरे वाहन हैं, वायुदेव ही सारथि हैं और वेदमाताएँ (गायत्री, सावित्री और सरस्वती) ही कवच हैं। इन सबसे आवृत एवं सुरक्षित होकर मैं रणक्षेत्रमें युद्ध करूँगा”
ତେବେ ରଣଭୂମିରେ କିଛି ହସି ରାମ (ପରଶୁରାମ) ମୋତେ କହିଲେ— “କୁରୁନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମ! ମୋ ପାଇଁ ପୃଥିବୀ ହିଁ ରଥ; ଚାରି ବେଦ ହିଁ ଉତ୍ତମ ଅଶ୍ୱମାନଙ୍କ ପରି ମୋର ବାହନ।”
Verse 4
सूतश्न मातरिश्वा वै कवचं वेदमातर: । सुसंवीतो रणे ताभिरय्योत्स्ये5हं कुरुनन्दन,तब परशुरामजी समरांगणमें किंचित् मुसकराते हुए मुझसे बोले--“कुरुनन्दन भीष्म! मेरे लिये तो पृथ्वी ही रथ है, चारों वेद ही उत्तम अश्वोंके समान मेरे वाहन हैं, वायुदेव ही सारथि हैं और वेदमाताएँ (गायत्री, सावित्री और सरस्वती) ही कवच हैं। इन सबसे आवृत एवं सुरक्षित होकर मैं रणक्षेत्रमें युद्ध करूँगा”
ମାତରିଶ୍ୱା (ବାୟୁଦେବ) ହିଁ ମୋର ସାରଥି, ଏବଂ ବେଦମାତାମାନେ ହିଁ ମୋର କବଚ। ସେମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସୁସଂବୃତ ହୋଇ, କୁରୁନନ୍ଦନ, ମୁଁ ରଣରେ ଯୁଦ୍ଧ କରିବି।
Verse 5
एवं ब्रुवाणो गान्धारे रामो मां सत्यविक्रम: । शरब्रातेन महता सर्वतः प्रत्यवारयत्,गान्धारीनन्दन! ऐसा कहते हुए सत्यपराक्रमी परशुरामजीने मुझे सब ओरसे अपने बाणोंके महान् समुदायद्वारा आवृत कर लिया
ଗାନ୍ଧାରୀନନ୍ଦନ! ଏପରି କହୁଥିବା ସତ୍ୟପରାକ୍ରମୀ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ମହାନ ବାଣସମୂହରେ ମୋତେ ସବୁଦିଗରୁ ଘେରି ନେଲେ।
Verse 6
ततो<पश्यं जामदग्न्यं रथमध्ये व्यवस्थितम् । सर्वायुधवरे श्रीमत्यद्भुतोपमदर्शने,उस समय मैंने देखा, जमदग्निनन्दन परशुराम सम्पूर्ण श्रेष्ठ आयुधोंसे सुशोभित, तेजस्वी एवं अद्भुत दिखायी देनेवाले रथमें बैठे हैं
ତେବେ ମୁଁ ଦେଖିଲି—ଜାମଦଗ୍ନ୍ୟ (ପରଶୁରାମ) ରଥମଧ୍ୟରେ ଅବସ୍ଥିତ; ସମସ୍ତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆୟୁଧରେ ସୁସଜ୍ଜିତ, ତେଜସ୍ବୀ ଓ ଅଦ୍ଭୁତ-ଉପମ ଦର୍ଶନ।
Verse 7
मनसा विहिते पुण्ये विस्तीर्णे नगरोपमे । दिव्याश्वयुजि संनद्धे काड्चनेन विभूषिते,उसका विस्तार एक नगरके समान था। उस पुण्यरथका निर्माण उन्होंने अपने मानसिक संकल्पसे किया था। उसमें दिव्य अश्व जुते हुए थे। वह स्वर्णभूषित रथ सब प्रकारसे सुसज्जित था
ସେହି ପୁଣ୍ୟରଥ ମନସା ସଂକଳ୍ପରେ ନିର୍ମିତ; ବିସ୍ତାରରେ ନଗରସଦୃଶ। ତାହାରେ ଦିବ୍ୟ ଅଶ୍ୱ ଯୁକ୍ତ ଥିଲେ; ସୁବର୍ଣ୍ଣରେ ବିଭୂଷିତ ଓ ସବୁପ୍ରକାରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ଥିଲା।
Verse 8
कवचेन महाबाहो सोमार्ककृतलक्ष्मणा | धनुर्धरो बद्धतूणो बद्धगोधाड्गुलित्रवान्,महाबाहो! परशुरामजीने एक सुन्दर कवच धारण कर रखा था, जिसमें चन्द्रमा और सूर्यके चिह्न बने हुए थे। उन्होंने हाथमें धनुष लेकर पीठपर तरकस बाँध रखा था और अंगुलियोंकी रक्षाके लिये गोहके चर्मके बने हुए दस्ताने पहन रखे थे
ମହାବାହୋ! ପରଶୁରାମ ଚନ୍ଦ୍ର-ସୂର୍ଯ୍ୟ ଚିହ୍ନାଙ୍କିତ ସୁନ୍ଦର କବଚ ପିନ୍ଧିଥିଲେ। ସେ ଧନୁଷ ଧରି, ପିଠିରେ ତୂଣୀର ବାନ୍ଧି, ହାତର ରକ୍ଷା ପାଇଁ ଗୋଧା-ଚର୍ମର ଅଙ୍ଗୁଳିରକ୍ଷକ ବାନ୍ଧିଥିଲେ।
Verse 9
सारथ्यं कृतवांस्तत्र युयुत्सोरकृतव्रण: । सखा वेदविदत्यन्तं दयितो भार्गवस्य ह,उस समय युद्धके इच्छुक परशुरामजीके प्रिय सखा वेदवेत्ता अकृतव्रणने उनके सारथिका कार्य सम्पन्न किया
ସେ ସମୟରେ ଯୁଦ୍ଧକୁ ଉତ୍ସୁକ ପରଶୁରାମଙ୍କ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରିୟ ସଖା, ବେଦବିଦ୍ ଅକୃତବ୍ରଣ ସେଠାରେ ତାଙ୍କର ସାରଥ୍ୟ କାର୍ଯ୍ୟ କଲେ।
Verse 10
आह्वयान: स मां युद्धे मनो हर्षयतीव मे । पुन: पुनरभिक्रोशन्नभियाहीति भार्गव:,भुगुनन्दन राम “आओ, आओ” कहकर बार-बार मुझे पुकारते और युद्धके लिये मेरा आह्वान करते हुए मेरे मनको हर्ष और उत्साह-सा प्रदान कर रहे थे
ଭୃଗୁନନ୍ଦନ ରାମ “ଆସ, ଆସ” ବୋଲି ପୁନଃପୁନଃ ଡାକି, ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ମୋତେ ଆହ୍ୱାନ କରୁଥିଲେ; ତାହାରେ ମୋ ମନ ହର୍ଷ ଓ ବୀରୋତ୍ସାହରେ ପୂରିଯାଉଥିଲା।
Verse 11
तमादित्यमिवोद्यन्तमनाधृष्यं महाबलम् | क्षत्रियान्तकरं राममेकमेक: समासदम्,उदयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी, अजेय, महाबली और क्षत्रियविनाशक परशुराम अकेले ही युद्धके लिये खड़े थे। अतः मैं भी अकेला ही उनका सामना करनेके लिये गया
ଉଦୟମାନ ସୂର୍ଯ୍ୟ ସମ ତେଜସ୍ବୀ, ଅନାଧୃଷ୍ୟ, ମହାବଳୀ ଓ କ୍ଷତ୍ରିୟାନ୍ତକ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ଏକାକୀ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ; ତେଣୁ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଏକାକୀ ତାଙ୍କୁ ସମ୍ମୁଖୀନ କରିବାକୁ ଗଲି।
Verse 12
ततो<हं बाणपातेषु त्रिषु वाहान् निगृहा वै । अवतीर्य धर्नु्न्यस्य पदातिर्रषिसत्तमम्,जब वे तीन बार मेरे ऊपर बाणोंका प्रहार कर चुके, तब मैं घोड़ोंकी रोककर और धनुष रखकर रथसे उतर गया और उन ब्राह्मणशिरोमणि मुनिप्रवर परशुरामजीका समादर करनेके लिये पैदल ही उनके पास गया। जाकर विधिपूर्वक उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् यह उत्तम वचन बोला--
ତାପରେ ତିନିଥର ବାଣବର୍ଷା ହୋଇସାରିଲା ପରେ ମୁଁ ଘୋଡ଼ାମାନଙ୍କୁ ରୋକି, ଧନୁଷ ରଖି, ରଥରୁ ଅବତରିଲି ଏବଂ ସେଇ ଋଷିଶ୍ରେଷ୍ଠ ପରଶୁରାମଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କରିବାକୁ ପଦାତି ହୋଇ ତାଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲି। ବିଧିପୂର୍ବକ ପ୍ରଣାମ କରି ପରେ ଯଥୋଚିତ ବଚନ କହିଲି।
Verse 13
अभ्यागच्छं तदा राममर्चिष्यन् द्विजसत्तमम् । अभिवाद्य चैनं विधिवदब्रुवं वाक्यमुत्तमम्,जब वे तीन बार मेरे ऊपर बाणोंका प्रहार कर चुके, तब मैं घोड़ोंकी रोककर और धनुष रखकर रथसे उतर गया और उन ब्राह्मणशिरोमणि मुनिप्रवर परशुरामजीका समादर करनेके लिये पैदल ही उनके पास गया। जाकर विधिपूर्वक उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् यह उत्तम वचन बोला--
ତେବେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାମ (ପରଶୁରାମ)ଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କରି ପୂଜିବା ଇଚ୍ଛାରେ ମୁଁ ତାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲି। ବିଧିପୂର୍ବକ ପ୍ରଣାମ କରି ମୁଁ ଯଥୋଚିତ ଓ ଉତ୍ତମ ବଚନ କହିଲି।
Verse 14
योत्स्ये त्वया रणे राम सदृशेनाधिकेन वा । गुरुणा धर्मशीलेन जयमाशास्व मे विभो,“भगवन् परशुराम! आप मेरे समान अथवा मुझसे भी अधिक शक्तिशाली हैं। मेरे धर्मात्मा गुरु हैं। मैं इस रणक्षेत्रमें आपके साथ युद्ध करूँगा; अत: आप मुझे विजयके लिये आशीर्वाद दें”
ହେ ରାମ (ପରଶୁରାମ)! ରଣରେ ଆପଣ ମୋ ସମାନ ହେଉନ୍ତୁ କି ମୋଠାରୁ ଅଧିକ—ଆପଣ ଧର୍ମଶୀଳ ମୋର ଗୁରୁ। ଏହି ରଣଭୂମିରେ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବି; ତେଣୁ, ହେ ବିଭୋ, ମୋତେ ବିଜୟର ଆଶୀର୍ବାଦ ଦିଅନ୍ତୁ।
Verse 15
राम उवाच एवमेतत् कुरुश्रेष्ठ कर्तव्यं भूतिमिच्छता । धर्मो होष महाबाहो विशिष्टे: सह युध्यताम्,परशुरामजीने कहा--कुरुश्रेष्ठ! अपनी उन्नतिके चाहनेवाले प्रत्येक योद्धाको ऐसा ही करना चाहिये। महाबाहो! अपनेसे विशिष्ट गुरुजनोंके साथ युद्ध करनेवाले राजाओंका यही धर्म है
ରାମ କହିଲେ—ହେ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଉନ୍ନତି ଇଚ୍ଛା କରୁଥିବା ବୀର ଏଭଳି ହିଁ କରିବା ଉଚିତ। ହେ ମହାବାହୋ! ନିଜଠାରୁ ବିଶିଷ୍ଟ ଗୁରୁଜନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିବା ରାଜାମାନଙ୍କର ଏହି ହିଁ ଧର୍ମ।
Verse 16
शपेयं त्वां न चेदेवमागच्छेथा विशाम्पते । युध्यस्व त्वं रणे यत्तो धैर्यमालम्ब्य कौरव,प्रजानाथ! यदि तुम इस प्रकार मेरे समीप नहीं आते तो मैं तुम्हें शाप दे देता। कुरुनन्दन! तुम धैर्य धारण करके इस रफक्षेत्रमें प्रयत्नपूर्वक युद्ध करो
ହେ ପ୍ରଜାନାଥ! ତୁମେ ଏହିପରି ଭାବେ ମୋ ନିକଟକୁ ନ ଆସିଥାନ୍ତ, ମୁଁ ତୁମକୁ ଶାପ ଦେଇଥାନ୍ତି। ତେଣୁ, ହେ କୌରବ! ଧୈର୍ୟ ଧରି ଏହି ରଣରେ ପ୍ରୟତ୍ନପୂର୍ବକ ଯୁଦ୍ଧ କର।
Verse 17
न तु ते जयमाशासे त्वां विजेतुमहं स्थित: । गच्छ युध्यस्व धर्मेण प्रीतो5स्मि चरितेन ते,मैं तो तुम्हें विजयसूचक आशीर्वाद नहीं दे सकता; क्योंकि इस समय मैं तुम्हें पराजित करनेके लिये खड़ा हूँ। जाओ, धर्मपूर्वक युद्ध करो। तुम्हारे इस शिष्टाचारसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ
କିନ୍ତୁ ମୁଁ ତୁମକୁ ବିଜୟର ଆଶୀର୍ବାଦ ଦେଇପାରିବି ନାହିଁ; କାରଣ ଏହି ସମୟରେ ମୁଁ ତୁମକୁ ପରାଜିତ କରିବାକୁ ଦଣ୍ଡାୟମାନ। ଯାଅ, ଧର୍ମପୂର୍ବକ ଯୁଦ୍ଧ କର; ତୁମର ଏହି ଶିଷ୍ଟାଚାରରେ ମୁଁ ପ୍ରସନ୍ନ।
Verse 18
ततो<हं तं नमस्कृत्य रथमारुहय सत्वर: । प्राध्मापयं रणे शड्खं पुनर्हेमपरिष्कृतम्,तब मैं उन्हें नमस्कार करके शीघ्र ही रथपर जा बैठा और उस युद्धभूमिमें मैंने पुनः अपने सुवर्णजटित शंखको बजाया
ତାପରେ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ନମସ୍କାର କରି ଶୀଘ୍ର ରଥରେ ଚଢ଼ିଲି। ଏବଂ ସେହି ରଣଭୂମିରେ ମୁଁ ପୁନର୍ବାର ସୁବର୍ଣ୍ଣଜଟିତ ଶଙ୍ଖ ଧ୍ୱନି କଲି।
Verse 19
ततो युद्ध समभवन्मम तस्य च भारत | दिवसान् सुबहून् राजन् परस्परजिगीषया,राजन! भरतनन्दन! तदनन्तर एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे मेरा तथा परशुरामजीका युद्ध बहुत दिनोंतक चलता रहा
ତାପରେ, ହେ ଭାରତବଂଶଜ! ରାଜନ, ପରସ୍ପରକୁ ଜିତିବା ଇଚ୍ଛାରେ ମୋର ଓ ତାଙ୍କର ଯୁଦ୍ଧ ବହୁ ଦିନ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଚାଲିଲା।
Verse 20
स मे तस्मिन् रणे पूर्व प्राहरत् कड्कपत्रिभि: | षष्ट्या शतैश्ष नवभि: शराणां नतपर्वणाम्,उस रणभूमिमें उन्होंने ही पहले मेरे ऊपर गीधकी पाँखोंसे सुशोभित तथा मुड़े हुए पर्ववाले नौ सौ साठ बाणोंद्वारा प्रहार किया
ସେହି ରଣରେ ସେ ପ୍ରଥମେ ମୋ ଉପରେ ପ୍ରହାର କଲେ—ଗିଧର ପଖାରେ ଶୋଭିତ ଏବଂ ବଙ୍କା ପର୍ବଯୁକ୍ତ ନଅଶେ ଷାଠିଟି ବାଣ ବର୍ଷାଇ।
Verse 21
राजन! उन्होंने मेरे चारों घोड़ों तथा सारथिको भी अवरुद्ध कर दिया तो भी मैं पूर्ववत् कवच धारण किये उस समरभूमिमें डटा रहा
ରାଜନ, ସେ ମୋର ଚାରି ଘୋଡ଼ା ଓ ସାରଥିକୁ ମଧ୍ୟ ଅବରୋଧ କଲେ, ତଥାପି ମୁଁ ପୂର୍ବବତ୍ କବଚଧାରୀ ହୋଇ ସେହି ସମରଭୂମିରେ ଅଡ଼ିଗ ରହିଲି।
Verse 22
नमस्कृत्य च देवेभ्यो ब्राह्म॒णेभ्यो विशेषत: । तमहं स्मयन्निव रणे प्रत्यभाषं व्यवस्थितम्,तत्पश्चात् देवताओं और विशेषत:ः ब्राह्मणोंको नमस्कार कर मैं रणभूमिमें खड़े हुए परशुरामजीसे मुसकराता हुआ-सा बोला--
ତାପରେ ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ଏବଂ ବିଶେଷତଃ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ନମସ୍କାର କରି, ରଣଭୂମିରେ ସଜାଗ ଭାବେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ପରଶୁରାମଙ୍କୁ ମୁଁ ହସିବା ପରି କରି କଥା କହିଲି।
Verse 23
चत्वारस्तेन मे वाहा: सूतश्वचैव विशाम्पते | प्रतिरुद्धास्तथैवाहं समरे दंशित: स्थित:,आचार्यता मानिता मे निर्मयदि हापि त्वयि । भूयश्व शृणु मे ब्रह्मन् सम्पदं धर्मसंग्रहे “ब्रह्मन! यद्यपि आप अपनी मर्यादा छोड़े बैठे हैं तो भी मैंने सदा आपके आचार्यत्वका सम्मान किया है। धर्मसंग्रहके विषयमें मेरा जो दृढ़ विचार है, उसे आप पुनः सुन लीजिये
ଏହେତୁ, ହେ ପ୍ରଜାପତେ, ମୋର ଚାରିଟି ଅଶ୍ୱ ଅଛି; ସାରଥି ଓ ଅଶ୍ୱମାନେ ଯୁଦ୍ଧର ଭିଡ଼ରେ ରୋକାଯାଇ ଦଢ଼ିଆଛନ୍ତି, ଏବଂ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଅସ୍ତ୍ରଧାରୀ ହୋଇ ସମରେ ଅଚଳ ଅଛି। ତୁମେ ଯଦିଓ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ତ୍ୟାଗ କରିଛ, ତଥାପି ମୁଁ ସଦା ତୁମ ଆଚାର୍ୟତ୍ୱକୁ ସମ୍ମାନ କରିଛି। ଏବେ, ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ଧର୍ମସଂଗ୍ରହ—ଧର୍ମକୁ ଏକତ୍ର କରି ରକ୍ଷା କରିବାରେ ଥିବା ସତ୍ୟ ‘ସମ୍ପଦ’ ବିଷୟରେ ମୋର ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ ପୁନଃ ଶୁଣ।
Verse 24
ये ते वेदा: शरीरस्था ब्राह्माण्यं यच्च ते महत् । तपश्च ते महत् तप्तं न तेभ्य: प्रहराम्यहम्,“विप्रवर! आपके शरीरमें जो वेद हैं, जो आपका महान् ब्राह्मणत्व है तथा आपने जो बड़ी भारी तपस्या की है, उन सबके ऊपर मैं बाणोंका प्रहार नहीं करता हूँ
ହେ ବିପ୍ରଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମ ଶରୀରରେ ଅଧିଷ୍ଠିତ ବେଦ, ତୁମ ମହାନ ବ୍ରାହ୍ମଣ୍ୟ, ଏବଂ ତୁମେ କରିଥିବା ଭାରୀ ତପସ୍ୟା—ଏସବୁ ଉପରେ ମୁଁ ବାଣ ପ୍ରହାର କରେନି। ପବିତ୍ର ବିଦ୍ୟା ଓ ତପୋମହିମା ପ୍ରତି ଶ୍ରଦ୍ଧାରୁ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଭଙ୍ଗ ହେବ ଏମିତି ଭାବେ ମୁଁ ତୁମକୁ ଆଘାତ କରିବି ନାହିଁ।
Verse 25
प्रहरे क्षत्रधर्मस्य यं राम त्वं समाश्रित: । ब्राह्मण: क्षत्रियत्वं हि याति शस्त्रसमुद्यमात्,“राम! आपने जिस क्षत्रियधर्मका आश्रय लिया है, मैं उसीपर प्रहार करूँगा; क्योंकि ब्राह्मण हथियार उठाते ही क्षत्रियभावको प्राप्त कर लेता है
ହେ ରାମ! ତୁମେ ଯେ କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମର ଆଶ୍ରୟ ନେଇଛ, ମୁଁ ପ୍ରହାର କରିବି ସେହି ଧର୍ମ ଉପରେ; କାରଣ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଶସ୍ତ୍ର ଉଠାଇଲେ ମାତ୍ରେ କ୍ଷତ୍ରିୟଭାବକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ।
Verse 26
पश्य मे धनुषो वीर्य पश्य बाद्दोर्बलं मम । एष ते कार्मुकं वीर छिनझि निशितेषुणा,“अब आप मेरे धनुषकी शक्ति और मेरी भुजाओंका बल देखिये। वीर! मैं अपने बाणसे आपके धनुषको अभी काट देता हूँ
ଏବେ ମୋ ଧନୁଷର ବୀର୍ୟ ଦେଖ, ମୋ ଭୁଜବଳ ଦେଖ। ହେ ବୀର! ଏହି କ୍ଷଣେ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାଣରେ ତୋ ଧନୁଷକୁ କାଟିଦେବି।
Verse 27
तस्याहं निशितं भल्ल्लं चिक्षेप भरतर्षभ । तेनास्य धनुष: कोटिं छित्त्वा भूमावपातयम्,भरतश्रेष्ठ! ऐसा कहकर मैंने उनके ऊपर तेज धारवाले एक भलल नामक बाणका प्रहार किया और उसके द्वारा उनके धनुषकी कोटि (अग्रभाग)-को काटकर पृथ्वीपर गिरा दिया
ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏମିତି କହି ମୁଁ ତାଙ୍କ ଉପରେ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ‘ଭଲ୍ଲ’ ବାଣ ଛାଡ଼ିଲି। ସେହି ବାଣରେ ତାଙ୍କ ଧନୁଷର ଅଗ୍ରଭାଗ କାଟି ତାହାକୁ ଭୂମିରେ ପତିତ କରିଦେଲି।
Verse 28
तथैव च पृषत्कानां शतानि नतपर्वणाम् । चिक्षेप कड़कपत्राणां जामदग्न्यरथं प्रति,इसी प्रकार परशुरामजीके रथकी ओर मैंने गीधकी पाँख और झुकी हुई गाँठवाले सौ बाण चलाये
ସେହିପରି ମୁଁ ନତ-ପର୍ବଯୁକ୍ତ ଏବଂ ଗୃଧ୍ର-ପକ୍ଷସଦୃଶ ପିଛା ଥିବା ଶତଶତ ବାଣ ଜାମଦଗ୍ନ୍ୟ (ପରଶୁରାମ)ଙ୍କ ରଥ ପ୍ରତି ନିକ୍ଷେପ କଲି।
Verse 29
काये विषक्तास्तु तदा वायुना समुदीरिता: । चेलु: क्षरन्तो रुधिरं नागा इव च ते शरा:
ତେବେ ସେହି ବାଣଗୁଡ଼ିକ ଦେହରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ବିଷକ୍ତ ଥିଲେ; ବାୟୁଦ୍ୱାରା ଉଦ୍ଦୀପିତ ହୋଇ କମ୍ପିତ ହେଲେ ଏବଂ ଚଳିତ ହେବା ସହିତ ରକ୍ତ ଝରାଇଲେ—ସର୍ପମାନଙ୍କ ପରି।
Verse 30
वे बाण वायुद्वारा उड़ाये हुए सर्पोकी भाँति परशुरामजीके शरीरमें धँसकर खून बहाते हुए चल दिये ।। क्षतजोक्षितसर्वाड़: क्षरन् स रुधिरं रणे । बभौ रामस्तदा राजन मेरुर्धातुमिवोत्सूजन्,राजन्! उस समय उनके सारे अंग लहूलुहान हो गये। जैसे मेरु पर्वत वर्षाकालमें गेरु आदि धातुओंसे मिश्रित जलकी धार बहाता है, उसी प्रकार उस रणभूमिमें अपने अंगोंसे रक्तकी धारा बहाते हुए परशुरामजी शोभा पाने लगे
ରାଜନ୍! ସେତେବେଳେ ରାମ (ପରଶୁରାମ)ଙ୍କ ସମସ୍ତ ଅଙ୍ଗ ଘାଉରେ ରକ୍ତସିକ୍ତ ଥିଲା; ରଣଭୂମିରେ ରକ୍ତ ଝରାଇ ଝରାଇ ସେ ଏମିତି ଶୋଭିତ ହେଲେ, ଯେପରି ବର୍ଷାକାଳେ ମେରୁ ପର୍ବତ ଧାତୁରେ ରଞ୍ଜିତ ଜଳଧାରା ଉତ୍ସର୍ଗ କରେ।
Verse 31
हेमन्तान्ते5डशोक इव रक्तस्तबकमण्डित: । बभौ रामस्तथा राजन् प्रफुल्ल इव किंशुक:,राजन! जैसे वसनन््त-ऋतुमें लाल फूलोंके गुच्छोंस अलंकृत अशोक और खिला हुआ पलाश सुशोभित होता है, परशुरामजीकी भी वैसी ही शोभा हुई
ରାଜନ୍! ହେମନ୍ତାନ୍ତେ ରକ୍ତ ପୁଷ୍ପଗୁଚ୍ଛରେ ମଣ୍ଡିତ ଅଶୋକ ଯେପରି ଶୋଭେ, ଏବଂ ପ୍ରଫୁଲ୍ଲ କିଂଶୁକ (ପଲାଶ) ଯେପରି ଦୀପ୍ତ ହୁଏ, ସେହିପରି ରାମ (ପରଶୁରାମ) ମଧ୍ୟ ଦୀପ୍ତିମାନ ଦିଶିଲେ।
Verse 32
ततो<न्यद् धनुरादाय राम: क्रोधसमन्वितः । हेमपुड्खान् सुनिशिताअ्शरांस्तान् हि ववर्ष सः,तब क्रोधमें भरे हुए परशुरामजीने दूसरा धनुष लेकर सोनेकी पाँखोंसे सुशोभित अत्यन्त तीखे बाणोंकी वर्षा आरम्भ की
ତାପରେ କ୍ରୋଧସମନ୍ୱିତ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ଅନ୍ୟ ଧନୁ ଗ୍ରହଣ କରି, ସୁବର୍ଣ୍ଣ-ପିଛାଯୁକ୍ତ ଅତ୍ୟନ୍ତ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାଣମାନଙ୍କୁ ବର୍ଷା ପରି ବର୍ଷାଇଲେ।
Verse 33
ते समासाद्य मां रौद्रा बहुधा मर्मभेदिन: । अकम्पयन् महावेगा: सर्पानलविषोपमा:,वे नाना प्रकारके भयंकर बाण मुझपर चोट करके मेरे मर्मस्थानोंका भेदन करने लगे। उनका वेग महान् था। वे सर्प, अग्नि और विषके समान जान पड़ते थे। उन्होंने मुझे कम्पित कर दिया
ସେଇ ରୌଦ୍ର ବାଣଗୁଡ଼ିକ ମୋ ପାଖକୁ ଆସି, ବହୁବାର ମୋର ମର୍ମସ୍ଥାନକୁ ଭେଦିବାକୁ ଲାଗିଲେ। ସେମାନଙ୍କର ବେଗ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରଚଣ୍ଡ; ସେମାନେ ସର୍ପ, ଅଗ୍ନି ଓ ବିଷ ସମାନ ଲାଗୁଥିଲେ। ତାଙ୍କ ଆଘାତରେ ମୋ ଦେହ କମ୍ପି ଉଠିଲା।
Verse 34
तमहं समवष्टभ्य पुनरात्मानमाहवे । शतसंख्यै: शरै: क्रुद्धस्तदा राममवाकिरम्
ଯୁଦ୍ଧମଧ୍ୟରେ ମୁଁ ନିଜକୁ ସମ୍ଭାଳି ପୁନର୍ବାର ଧୈର୍ୟ ଧରିଲି; ତାପରେ କ୍ରୋଧରେ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ଉପରେ ଶତଶଂଖ୍ୟକ ବାଣ ବର୍ଷା କଲି।
Verse 35
तब मैंने पुन: अपने-आपको स्थिर करके कुपित हो उस युद्धमें परशुरामजीपर सैकड़ों बाण बरसाये ।। स तैरग्न्यर्कसंकाशै: शरैराशीविषोपमै: । शितैरभ्यर्दितो रामो मन्दचेता इवाभवत्,वे बाण अग्नि, सूर्य तथा विषधर सर्पोके समान भयंकर एवं तीक्ष्ण थे। उनसे पीड़ित होकर परशुरामजी अचेत-से हो गये
ସେଇ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାଣଗୁଡ଼ିକ ଅଗ୍ନି ଓ ସୂର୍ଯ୍ୟ ପରି ଜ୍ୱଳନ୍ତ, ଏବଂ ବିଷଧର ସର୍ପ ପରି ଭୟଙ୍କର ଥିଲେ। ସେମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୁନଃପୁନଃ ଆହତ ହୋଇ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ବେଦନାରେ ଆବୃତ ହୋଇ ମନେ ହେଲା ଯେନେ ତାଙ୍କର ଚେତନା ମନ୍ଦ ପଡ଼ିଗଲା।
Verse 36
ततो<हं कृपया5<विष्टो विष्टभ्यात्मानमात्मना । धिग्धिगित्यब्रुव॑ युद्ध क्षत्रधर्मं च भारत,भारत! तब मैं दयासे द्रवित हो स्वयं ही अपने-आपमें धैर्य लाकर युद्ध और क्षत्रियधर्मको धिक्कार देने लगा
ହେ ଭାରତ! ତାପରେ କୃପାରେ ଆବିଷ୍ଟ ହୋଇ ମୁଁ ନିଜ ସଙ୍କଳ୍ପରେ ମନକୁ ସ୍ଥିର କଲି; ଏବଂ ‘ଧିକ୍ ଧିକ୍’ ବୋଲି କହି ଯୁଦ୍ଧ ଓ କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମକୁ ନିନ୍ଦା କରିବାକୁ ଲାଗିଲି।
Verse 37
असकृच्चाब्रुवं राजन् शोकवेगपरिप्लुत: । अहो बत कृतं पापं मेयदं क्षत्रधर्मणा
ହେ ରାଜନ୍! ଶୋକର ବେଗରେ ଆବୃତ ହୋଇ ମୁଁ ପୁନଃପୁନଃ କହିଲି—‘ହାୟ! କ୍ଷତ୍ରଧର୍ମର ନାମରେ ମୁଁ କେତେ ପାପ କରିଦେଲି!’
Verse 38
ततो न प्राहरं भूयो जामदग्न्याय भारत,भारत! उसके बादसे मैंने परशुरामजीपर फिर प्रहार नहीं किया। इधर सहस्र किरणोंवाले भगवान् सूर्य इस पृथ्वीको तपाकर दिनका अन्त होनेपर अस्त हो गये; इसलिये वह युद्ध बंद हो गया
ତେବେ, ହେ ଭାରତ, ମୁଁ ଜମଦଗ୍ନିପୁତ୍ର ପରଶୁରାମଙ୍କୁ ପୁଣି ପ୍ରହାର କଲି ନାହିଁ। ଏପଟେ ସହସ୍ରକିରଣ ସୂର୍ଯ୍ୟ ପୃଥିବୀକୁ ତପାଇ ଦିନର ଶେଷରେ ଅସ୍ତ ଗଲେ; ତେଣୁ ସେହି ଯୁଦ୍ଧ ଥମ୍ବିଗଲା।
Verse 39
अथावताप्य पृथिवीं पूषा दिवससंक्षये । जगामास्तं सहस्रांशुस्ततो युद्धमुपारमत्,भारत! उसके बादसे मैंने परशुरामजीपर फिर प्रहार नहीं किया। इधर सहस्र किरणोंवाले भगवान् सूर्य इस पृथ्वीको तपाकर दिनका अन्त होनेपर अस्त हो गये; इसलिये वह युद्ध बंद हो गया
ତାପରେ ପୃଥିବୀକୁ ତପାଇ ସହସ୍ରକିରଣ ପୂଷା (ସୂର୍ଯ୍ୟ) ଦିନର ଶେଷରେ ଅସ୍ତ ଗଲେ; ତେଣୁ ଯୁଦ୍ଧ ଥମ୍ବିଗଲା।
Verse 178
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अग्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम और भीष्मका कुरुक्षेत्रमें युद्धके लिये अवतरणविषयक एक सौ अठद्ठत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅମ୍ବୋପାଖ୍ୟାନପର୍ବରେ କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରରେ ଯୁଦ୍ଧାର୍ଥେ ପରଶୁରାମ ଓ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ଅବତରଣ-ବର୍ଣ୍ଣନାବିଷୟକ ଏକଶ ଅଠସତ୍ତରିତମ (୧୭୮ତମ) ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 179
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि रामभीष्मयुद्धे एकोनाशीत्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अग्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम और भीष्यका युद्धविषयक एक सौ उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅମ୍ବୋପାଖ୍ୟାନପର୍ବରେ ରାମ (ପରଶୁରାମ) ଓ ଭୀଷ୍ମଙ୍କ ଯୁଦ୍ଧବିଷୟକ ଏକଶ ଏକୋଣାଶୀତିତମ (୧୭୯ତମ) ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 376
गरुद्धिजातिर्धर्मात्मा यदेवं पीडित: शरै: । राजन! उस समय शोकके वेगसे व्याकुल हो मैं बार-बार इस प्रकार कहने लगा --'अहो! मुझ क्षत्रियने यह बड़ा भारी पाप कर डाला, जो कि धर्मात्मा एवं ब्राह्मण गुरुको इस प्रकार बाणोंसे पीड़ित किया”
ଗରୁଡବଂଶରେ ଜନ୍ମିତ ସେ ଧର୍ମାତ୍ମା ଯେତେବେଳେ ଏଭଳି ବାଣରେ ପୀଡିତ ହେଲେ, ହେ ରାଜନ, ଶୋକର ବେଗରେ ବ୍ୟାକୁଳ ହୋଇ ମୁଁ ପୁନଃପୁନଃ ଏହିପରି କହୁଥିଲି— ‘ହାୟ! ମୁଁ କ୍ଷତ୍ରିୟ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଭାରି ପାପ କରିଦେଲି; ଧର୍ମାତ୍ମା ବ୍ରାହ୍ମଣ, ତଦୁପରି ମୋର ଗୁରୁ—ତାଙ୍କୁ ଏଭଳି ବାଣରେ ପୀଡିତ କରିଦେଲି।’
Whether Bhīṣma is ethically obligated to accept the Kāśī princess to repair perceived harm to her social standing, despite his prior release of her by consent and his vow-based commitment to procedural propriety and kṣatriya-dharma.
Authority is relational and conditioned by conduct: reverence for a guru is normative, but dharma reasoning evaluates actions by role, context, and justice; when coercion replaces counsel, duty may require principled resistance while still articulating moral limits on harm.
No explicit phalaśruti is stated; instead, the chapter embeds meta-commentary through a cited traditional maxim on disciplining a misguided guru and through Bhīṣma’s explicit dharma-justification for when combat becomes procedurally permissible.