
Adhyāya 12: Devas’ Petition to Nahūṣa; Bṛhaspati on Śaraṇāgata-Dharma; Indrāṇī’s Strategic Delay
Upa-parva: Nahūṣa–Indrāṇī Episode (Embedded Itihāsa within Udyoga Parva)
Śalya narrates a crisis episode: the devas and ṛṣis, recognizing Nahūṣa’s anger and coercive intent, urge him to abandon krodha and to refrain from violating another’s marital bond. Nahūṣa, driven by desire and entitlement, rejects counsel and responds by citing Indra’s prior misconduct (Ahalyā) as a rhetorical justification, demanding that Indrāṇī be brought to him. The devas approach Bṛhaspati, acknowledging that Indrāṇī has taken refuge in his house under promised safety. Pressured to surrender her, Bṛhaspati refuses on principled grounds: a protector must not deliver a frightened supplicant to an adversary, and he supports this with compact aphoristic verses describing the social and ritual ruin that follows betrayal of refuge. He then proposes a strategic alternative—requesting a short delay from Nahūṣa—arguing that time will generate obstacles and that Nahūṣa’s pride, intensified by boons, will likely precipitate his own downfall. The devas accept this counsel and persuade Indrāṇī, praising her steadfastness and urging her to approach Nahūṣa for the plan’s success. Indrāṇī proceeds with modest reluctance, and Nahūṣa reacts with elation, his judgment impaired by desire—setting the stage for subsequent reversal.
Chapter Arc: शल्य के वचन से देव-सभा का दृश्य खुलता है—नहुष के क्रोध और काम से त्रस्त इन्द्राणी की रक्षा का प्रश्न उठ खड़ा होता है, और देवता उसे शांत करने की याचना करते हैं: ‘देवराज! क्रोध छोड़ें।’ → देवता नहुष को समझाते हैं कि श्रेष्ठ जन परायी स्त्री पर कुपित/आसक्त नहीं होते; पर संकट टलता नहीं। इन्द्राणी आँसुओं में डूबी बृहस्पति के पास जाती है और उपाय माँगती है। बृहस्पति ब्राह्मण-धर्म, सत्य और नीति की मर्यादा का स्मरण कराते हुए भी देव-हित का मार्ग खोजते हैं—समय जीतना ही अब रक्षा है। → निर्णायक योजना बनती है: इन्द्राणी स्वयं नहुष के पास जाए और ‘पाँच-छह समय’ (अवधि) माँगकर उसे टाल दे—देवता उसे पतिव्रता-सत्यपरायणा कहकर धैर्य बँधाते हैं और नहुष के शीघ्र विनाश का संकेत देते हैं। → देवताओं की सहमति और बृहस्पति की नीति-युक्त सलाह से इन्द्राणी का कर्तव्य स्पष्ट होता है—वह भय के बावजूद समय-याचना के लिए प्रस्थान करती है, ताकि इन्द्र की रक्षा और नहुष के अधर्म का अंत निकट लाया जा सके। → इन्द्राणी को देखते ही नहुष काम से अंधा होकर हर्षित होता है—अब उसके सामने इन्द्राणी की वाणी-नीति की परीक्षा है कि वह कैसे समय माँगकर संकट को टाल पाएगी।
Verse 1
2 ड-ण का द्वादशोड् ध्याय: देवता-नहुष-संवाद, बृहस्पतिके द्वारा इन्द्राणीकी रक्षा तथा इन्द्राणीका नहुषके 5 कक छ समयकी अवधि माँगनेके जाना शल्य उवाच क्रुद्धं तु नहुषं दृष्टवा देवा ऋषिपुरोगमा: । अब्लुवन् देवराजानं नहुषं घोरदर्शनम्,शल्य कहते हैं--युधिष्ठि!! देवराज नहुषको क्रोधमें भरे हुए देख देवतालोग ऋषियोंको आगे करके उनके पास गये। उस समय उनकी दृष्टि बड़ी भयंकर प्रतीत होती थी। देवताओं तथा ऋषियोंने कहा--
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ଯୁଧିଷ୍ଠିର! କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳିତ ନହୁଷଙ୍କୁ ଦେଖି ଦେବତାମାନେ ଋଷିମାନଙ୍କୁ ଆଗରେ ରଖି ତାଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲେ ଏବଂ ଘୋରଦର୍ଶନ ଦେବରାଜ ନହୁଷଙ୍କୁ କହିଲେ। ତେବେ ଦେବତା ଓ ଋଷିମାନେ କହିଲେ—
Verse 2
देवराज जहि क्रोध॑ त्वयि क्रुद्धे जगद् विभो । त्रस्तं सासुरगन्धर्व सकिन्नरमहोरगम्,“देवराज! आप क्रोध छोड़ें। प्रभो! आपके कुपित होनेसे असुर, गन्धर्व, किन्नर और महानागगणोंसहित सम्पूर्ण जगत् भयभीत हो उठा है
ଦେବରାଜ! କ୍ରୋଧ ତ୍ୟାଗ କର। ବିଭୋ! ତୁମେ କ୍ରୁଦ୍ଧ ହେଲେ ଅସୁର, ଗନ୍ଧର୍ବ, କିନ୍ନର ଓ ମହାସର୍ପମାନଙ୍କ ସହ ସମଗ୍ର ଜଗତ କମ୍ପିତ ହୁଏ। ଶାସକଙ୍କ କ୍ରୋଧ ସାର୍ବଜନୀନ ଭୟ ଓ ଅବ୍ୟବସ୍ଥାର କାରଣ; ତେଣୁ ରୋଷ ସଂଯମ କର।
Verse 3
जहि क्रोधमिमं साधो न कुप्यन्ति भवद्विधा: । परस्य पत्नी सा देवी प्रसीदस्व सुरेश्वर,'साधो! आप इस क्रोधको त्याग दीजिये। आप-जैसे श्रेष्ठ पुरुष दूसरोंपर कोप नहीं करते हैं। अतः प्रसन्न होइये। सुरेश्वर! शची देवी दूसरे इन्द्रकी पत्नी हैं
ସାଧୋ! ଏହି କ୍ରୋଧ ତ୍ୟାଗ କର; ତୁମ ପରି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ଉପରେ କୋପ କରନ୍ତି ନାହିଁ। ତେଣୁ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଉ, ସୁରେଶ୍ୱର! ସେ ଦେବୀ ଶଚୀ ପର ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପତ୍ନୀ—ଅର୍ଥାତ୍ ଅନ୍ୟର।
Verse 4
निवर्तय मन: पापात् परदाराभिमर्शनात् | देवराजो5सि भद्ठं ते प्रजा धर्मेण पालय,“परायी स्त्रियोंका स्पर्श पापकर्म है। उससे मनको हटा लीजिये। आप देवताओंके राजा हैं। आपका कल्याण हो। आप धर्मपूर्वक प्रजाका पालन कीजिये'
ପରସ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ସ୍ପର୍ଶ କିମ୍ବା ତାଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ ପାପ; ସେହି ପାପରୁ ମନକୁ ଫେରାଇ ନିଅ। ତୁମେ ଦେବରାଜ—ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ଧର୍ମପୂର୍ବକ ପ୍ରଜାଙ୍କୁ ପାଳନ ଓ ରକ୍ଷା କର।
Verse 5
एवमुक्तो न जग्राह तद्गच: काममोहितः । अथ देवानुवाचेदमिन्द्रं प्रति सुराधिप:,उनके ऐसा कहनेपर भी काममोहित नहुषने उनकी बात नहीं मानी। उस समय देवेश्वर नहुषने इन्द्रके विषयमें देवताओंसे इस प्रकार कहा--
ଏପରି କହିଲେ ମଧ୍ୟ କାମ ଓ ମୋହରେ ମୁଗ୍ଧ ନହୁଷ ସେହି କଥା ଗ୍ରହଣ କଲା ନାହିଁ। ତାପରେ ସୁରାଧିପ ନହୁଷ ଇନ୍ଦ୍ର ବିଷୟରେ ଦେବମାନଙ୍କୁ ଏଭଳି କହିଲା।
Verse 6
अहल्या धर्षिता पूर्वमृषिपत्नी यशस्विनी । जीवतो भर्तुरिन्द्रेण स व: कि न निवारित:,'देवताओ! जब इन्द्रने पूर्वकालमें यशस्विनी ऋषि-पत्नी अहल्याका उसके पति गौतमके जीते-जी सतीत्व नष्ट किया था, उस समय आपलोगोंने उन्हें क्यों नहीं रोका?
ହେ ଦେବମାନେ! ପୂର୍ବକାଳରେ ଯଶସ୍ୱିନୀ ଋଷିପତ୍ନୀ ଅହଲ୍ୟାଙ୍କୁ—ତାଙ୍କର ପତି ଜୀବିତ ଥିବାବେଳେ—ଇନ୍ଦ୍ର ଅପମାନିତ କରିଥିଲେ; ସେତେବେଳେ ଆପଣମାନେ ତାଙ୍କୁ କାହିଁକି ରୋକିଲେ ନାହିଁ?
Verse 7
बहूनि च नृशंसानि कृतानीन्द्रेण वै पुरा । वैधर्म्याण्युपधाश्वैव स व: कि न निवारित:,'प्राचीनकालमें इन्द्रने बहुत-से क्रूरतापूर्ण कर्म किये हैं। अनेक अधार्मिक कृत्य तथा छल-कपट उनके द्वारा हुए हैं। उन्हें आपलोगोंने क्यों नहीं रोका था?
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ପ୍ରାଚୀନ କାଳରେ ଇନ୍ଦ୍ର ଅନେକ ନିର୍ଦୟ କର୍ମ କରିଥିଲେ। ଧର୍ମବିରୋଧୀ ଅନେକ କାର୍ଯ୍ୟ ଓ ଛଳ-କୌଶଳ ମଧ୍ୟ କରିଥିଲେ; ତେବେ ତୁମେ ସେତେବେଳେ ତାଙ୍କୁ କାହିଁକି ରୋକିଲେ ନାହିଁ?
Verse 8
उपतिष्ठतु देवी मामेतदस्या हितं परम् । युष्माकं च सदा देवा: शिवमेवं भविष्यति,“शची देवी मेरी सेवामें उपस्थित हों। इसीमें इनका परम हित है तथा देवताओ! ऐसा होनेपर ही सदा तुम्हारा कल्याण होगा”
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ଶଚୀ ଦେବୀ ମୋ ସେବାରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଉନ୍ତୁ; ଏହିଥିରେ ତାଙ୍କର ପରମ ହିତ ଅଛି। ହେ ଦେବଗଣ, ଏଭଳି ହେଲେ ମାତ୍ର ତୁମର କଲ୍ୟାଣ ସଦା ରହିବ।
Verse 9
देवा ऊचु इन्द्राणीमानयिष्यामो यथेच्छसि दिवस्पते । जहि क्रोधमिमं वीर प्रीतो भव सुरेश्वर,देवता बोले--स्वर्गलोकके स्वामी वीर देवेश्वर! आपकी जैसी इच्छा है, उसके अनुसार हमलोग इन्द्राणीको आपकी सेवामें ले आयेंगे। आप यह क्रोध छोड़िये और प्रसन्न होइये
ଦେବତାମାନେ କହିଲେ—ହେ ଦିବସ୍ପତେ! ତୁମ ଇଚ୍ଛାଅନୁସାରେ ଆମେ ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀଙ୍କୁ ତୁମ ସେବାରେ ଆଣିଦେବୁ। ହେ ବୀର ସୁରେଶ୍ୱର, ଏହି କ୍ରୋଧ ତ୍ୟାଗ କରି ପ୍ରସନ୍ନ ହୁଅ।
Verse 10
शल्य उवाच इत्युक्त्वा तं तदा देवा ऋषिभि: सह भारत । जम्मुर्ब॑हस्पतिं वक्तुमिन्द्राणीं चाशुभं वच:
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ତାଙ୍କୁ ଏପରି କହି ସେ ସମୟରେ ଦେବତାମାନେ ଋଷିମାନଙ୍କ ସହ ବୃହସ୍ପତିଙ୍କୁ କଥା କହିବାକୁ ଗଲେ; ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ତତ୍କାଳ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ (କଠୋର) ବଚନ କହିବାକୁ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 11
शल्यने कहा--युधिष्ठिर! नहुषसे ऐसा कहकर उस समय सब देवता ऋषियोंके साथ इन्द्राणीसे यह अशुभ वचन कहनेके लिये बृहस्पतिजीके पास गये ।। जानीम: शरणं प्राप्तामिन्द्राणीं तव वेश्मनि । दत्ताभयां च विप्रेन्द्र त्वया देवर्षिसत्तम,उन्होंने कहा--'देवर्षिप्रवर! विप्रेन्द्र! हमें पता लगा है कि इन्द्राणी आपकी शरणमें आयी हैं और आपके ही भवनमें रह रही हैं। आपने उन्हें अभय-दान दे रखा है
ସେମାନେ କହିଲେ—ହେ ଦେବର୍ଷିପ୍ରବର, ହେ ବିପ୍ରେନ୍ଦ୍ର! ଆମେ ଜାଣିଛୁ ଯେ ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀ ତୁମ ଶରଣକୁ ଆସି ତୁମ ଗୃହରେ ରହୁଛନ୍ତି; ଏବଂ ହେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଋଷି, ତୁମେ ତାଙ୍କୁ ଅଭୟଦାନ (ରକ୍ଷା) ଦେଇଛ।
Verse 12
ते त्वां देवा: सगन्धर्वा ऋषयश्न महाद्युते । प्रसादयन्ति चेन्द्राणी नहुषाय प्रदीयताम्,“महद्युते! अब ये देवता, गन्धर्व तथा ऋषि आपको इस बातके लिये प्रसन्न करा रहे हैं कि आप इन्द्राणीको राजा नहुषकी सेवामें अर्पण कर दीजिये इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्राणीकालावधियाचने द्वादशोड्ध्याय:
ମହାଦ୍ୟୁତେ! ଦେବମାନେ, ଗନ୍ଧର୍ବମାନେ ଓ ଋଷିମାନେ ତୁମକୁ ପ୍ରସନ୍ନ କରି ଏହି ଅନୁରୋଧ କରୁଛନ୍ତି—ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀଙ୍କୁ ରାଜା ନହୁଷଙ୍କୁ ସମର୍ପଣ କରାଯାଉ।
Verse 13
इन्द्राद् विशिष्टो नहुषो देवराजो महाद्युति: । वृणोत्त्मं वरारोहा भर्तृत्वे वरवर्णिनी,“इस समय महातेजस्वी नहुष देवताओंके राजा हैं। अतः इन्द्रसे बढ़कर हैं। सुन्दर रूप- रंगवाली शची इन्हें अपना पति स्वीकार कर लें”
ମହାତେଜସ୍ବୀ ନହୁଷ ଏବେ ଦେବରାଜ; ସେ ଇନ୍ଦ୍ରଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ। ତେଣୁ, ସୁନ୍ଦରାଙ୍ଗୀ, ଉତ୍ତମବର୍ଣ୍ଣା ଶଚୀ! ତାଙ୍କୁ ପତିରୂପେ ଗ୍ରହଣ କର।
Verse 14
एवमुक्ता तु सा देवी बाष्पमुत्सूज्य सस्वनम् । उवाच रुदती दीना बृहस्पतिमिदं वच:,देवताओंके यह बात कहनेपर शची देवी आँसू बहाती हुई फूट-फ़ूटकर रोने लगीं और दीन-भावसे बृहस्पतिजीको सम्बोधित करके इस प्रकार बोलीं--
ଦେବମାନେ ଏପରି କହିବା ସହିତ ଦେବୀ ଶଚୀ ସଶବ୍ଦ ଅଶ୍ରୁ ଝରାଇଲେ। ଦୁଃଖରେ ଦୀନ ହୋଇ କାନ୍ଦୁଥିବାବେଳେ ସେ ବୃହସ୍ପତିଙ୍କୁ ଏହି କଥା କହିଲେ।
Verse 15
नाहमिच्छामि नहुषं पतिं देवर्षिसत्तम । शरणागतासि्मि ते ब्रह्मंंस्त्रायस्व महतो भयात्,'देवर्षियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणदेव! मैं नहुषको अपना पति बनाना नहीं चाहती; इसीलिये आपकी शरणमें आयी हूँ। आप इस महान् भयसे मेरी रक्षा कीजिये”
ଦେବର୍ଷିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣଦେବ! ମୁଁ ନହୁଷଙ୍କୁ ପତିରୂପେ ଚାହୁଁନି। ତେଣୁ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ଶରଣକୁ ଆସିଛି; ଏହି ମହାଭୟରୁ ମୋତେ ରକ୍ଷା କରନ୍ତୁ।
Verse 16
ब॒हस्पतिरुवाच शरणागतं न त्यजेयमिन्द्राणि मम निश्चय: । धर्मज्ञां सत्यशीलां च न त्यजेयमनिन्दिते,बृहस्पतिने कहा--इन्द्राणी! मैं शरणागतका त्याग नहीं कर सकता, यह मेरा दृढ़ निश्चय है। अनिन्दिते! तुम धर्मज्ञ और सत्यशील हो; अतः मैं तुम्हारा त्याग नहीं करूँगा
ବୃହସ୍ପତି କହିଲେ—ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀ! ଶରଣାଗତକୁ ମୁଁ ତ୍ୟାଗ କରିବି ନାହିଁ; ଏହା ମୋର ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ। ଅନିନ୍ଦିତେ! ତୁମେ ଧର୍ମଜ୍ଞା ଓ ସତ୍ୟଶୀଳା; ତେଣୁ ତୁମକୁ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ତ୍ୟାଗ କରିବି ନାହିଁ।
Verse 17
नाकार्य कर्तुमिच्छामि ब्राह्मण: सन् विशेषत: । श्रुतर्थर्मा सत्यशीलो जानन् धर्मानुशासनम्,विशेषतः ब्राह्मण होकर मैं यह न करने योग्य कार्य नहीं कर सकता। मैंने धर्मकी बातें सुनी हैं और सत्यको अपने स्वभावमें उतार लिया है। शास्त्रोंमें जो धर्मका उपदेश किया गया है, उसे भी जानता हूँ; अतः मैं यह पापकर्म नहीं करूँगा! सुरश्रेष्ठटण! आपलोग लौट जायँ। इस विषयमें ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जो गीत गाया था, वह इस प्रकार है, सुनिये
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ଯାହା କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ, ସେହି କାର୍ଯ୍ୟ ମୁଁ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରେନି; ବିଶେଷତଃ ମୁଁ ବ୍ରାହ୍ମଣ। ମୁଁ ଧର୍ମର ଉପଦେଶ ଶୁଣିଛି, ସତ୍ୟକୁ ସ୍ୱଭାବ କରିଛି, ଏବଂ ଧର୍ମ ଶିଖାଉଥିବା ଶାସ୍ତ୍ରାନୁଶାସନକୁ ଜାଣେ। ତେଣୁ ଏହି ପାପକର୍ମ ମୁଁ କରିବି ନାହିଁ। ହେ ସୁରଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ, ତୁମେ ଫେରିଯାଅ। ଏହି ବିଷୟରେ ପୁରାତନକାଳରେ ବ୍ରହ୍ମା ଯେ ଗୀତ ଗାଇଥିଲେ, ତାହା ଶୁଣ।
Verse 18
नाहमेतत् करिष्यामि गच्छथ्वं वै सुरोत्तमा: । असिमिंश्षार्थे पुरा गीत॑ ब्रह्मणा श्रूयतामिदम्,विशेषतः ब्राह्मण होकर मैं यह न करने योग्य कार्य नहीं कर सकता। मैंने धर्मकी बातें सुनी हैं और सत्यको अपने स्वभावमें उतार लिया है। शास्त्रोंमें जो धर्मका उपदेश किया गया है, उसे भी जानता हूँ; अतः मैं यह पापकर्म नहीं करूँगा! सुरश्रेष्ठटण! आपलोग लौट जायँ। इस विषयमें ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जो गीत गाया था, वह इस प्रकार है, सुनिये
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ମୁଁ ଏହା କରିବି ନାହିଁ। ହେ ସୁରୋତ୍ତମମାନେ, ତୁମେ ଯାଅ। ଏହି ଅର୍ଥରେ ପୁରାତନକାଳରେ ବ୍ରହ୍ମା ଯେ ଗୀତ ଗାଇଥିଲେ, ଏହାକୁ ଶୁଣ।
Verse 19
न तस्य बीजं रोहति रोहकाले न तस्य वर्ष वर्षति वर्षकाले । भीतं प्रपन्न॑ प्रददाति शत्रवे न सत्रातारं लभते त्राणमिच्छन्,“जो भयभीत होकर शरणमें आये हुए प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसका बोया हुआ बीज समयपर नहीं जमता है। उसके यहाँ ठीक समयपर वर्षा नहीं होती और वह जब कभी अपनी रक्षा चाहता है, तो उसे कोई रक्षक नहीं मिलता है
ଯେ ଲୋକ ଭୟରେ ଶରଣାଗତ ପ୍ରାଣୀକୁ ତାହାର ଶତ୍ରୁର ହାତରେ ସମର୍ପଣ କରେ, ତାହାର ବୁଣା ବୀଜ ଅଙ୍କୁରିତ ହେବାର ସମୟରେ ଅଙ୍କୁରିତ ହୁଏ ନାହିଁ; ବର୍ଷା ହେବାର ସମୟରେ ବର୍ଷା ହୁଏ ନାହିଁ; ଏବଂ ସେ ଯେତେବେଳେ ନିଜେ ରକ୍ଷା ଚାହେ, ସେତେବେଳେ ତାହାକୁ କୌଣସି ରକ୍ଷକ ମିଳେ ନାହିଁ।
Verse 20
मोघमन्नं विन्दति चाप्यचेता: स्वर्गाल्लोकाद् भ्रश्यति नष्टचेष्ट: । भीतं प्रपन्न॑ प्रददाति यो वै न तस्य हव्यं॑ प्रतिगृह्नन्ति देवा:,“जो भयभीत शरणागतको शत्रुके हाथमें सौंप देता है, वह दुर्बलचित्त मानव जो अन्न ग्रहण करता है, वह व्यर्थ हो जाता है। उसके सारे उद्यम नष्ट हो जाते हैं और वह स्वर्गलोकसे नीचे गिर जाता है। इतना ही नहीं, देवतालोग उसके दिये हुए हविष्यको स्वीकार नहीं करते हैं
ଯେ ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି ଲୋକ ଭୟଭୀତ ଶରଣାଗତକୁ ଶତ୍ରୁର ହାତରେ ସମର୍ପଣ କରେ, ତାହାର ଅନ୍ନ ମଧ୍ୟ ବ୍ୟର୍ଥ ହୁଏ; ତାହାର ସମସ୍ତ ଉଦ୍ୟମ ନଷ୍ଟ ହୁଏ; ସେ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକରୁ ପତିତ ହୁଏ; ଏବଂ ଦେବତାମାନେ ତାହାର ଦିଆ ହବିଷ୍ୟକୁ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 21
प्रमीयते चास्य प्रजा हकाले सदा विवासं पितरो<सस््य कुर्वते । भीतं प्रपन्न॑ प्रददाति शत्रवे सेन्द्रा देवा: प्रहरन्त्यस्य वज्ञम्,“उसकी संतान अकालमें ही मर जाती है। उसके पितर सदा नरकमें निवास करते हैं। जो भयभीत शरणागतको शत्रुके हाथमें दे देता है, उसपर इन्द्र आदि देवता वज्रका प्रहार करते हैं!
ଯେ ଲୋକ ଭୟଭୀତ ଶରଣାଗତକୁ ଶତ୍ରୁର ହାତରେ ସମର୍ପଣ କରେ, ତାହାର ସନ୍ତାନ ଅକାଳରେ ମରିଯାଏ; ତାହାର ପିତୃମାନେ ସଦା ନରକବାସ କରନ୍ତି; ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ର ସହିତ ଦେବତାମାନେ ତାହା ଉପରେ ବଜ୍ରପ୍ରହାର କରନ୍ତି।
Verse 22
एतदेवं विजानन् वै न दास्यामि शचीमिमाम् | इन्द्राणीं विश्रुतां लोके शक्रस्य महिषीं प्रियाम्,इस प्रकार ब्रह्माजीके उपदेशके अनुसार शरणागतके त्यागसे होनेवाले अधर्मको मैं निश्चितरूपसे जानता हूँ; अतः जो सम्पूर्ण विश्वमें इन्द्रकी पत्नी तथा देवराजकी प्यारी पटरानीके रूपमें विख्यात हैं, उन्हीं इन शची देवीको मैं नहुषके हाथमें नहीं दूँगा
ଶରଣାଗତକୁ ତ୍ୟାଗ କଲେ ଅଧର୍ମ ହୁଏ—ଏହା ମୁଁ ନିଶ୍ଚିତଭାବେ ଜାଣେ। ତେଣୁ ସମଗ୍ର ଲୋକରେ ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀ, ଶକ୍ରଙ୍କ ପ୍ରିୟ ପ୍ରଧାନ ମହିଷୀ ଭାବେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଏହି ଶଚୀଦେବୀଙ୍କୁ ମୁଁ ନହୁଷଙ୍କ ହାତରେ ଦେବି ନାହିଁ।
Verse 23
अस्या हित॑ भवेद् यच्च मम चापि हित॑ भवेत् | क्रियतां तत् सुरश्रेष्ठा न हि दास्याम्यहं शचीम्,श्रेष्ठ देवताओ! जो इनके लिये हितकर हो, जिससे मेरा भी हित हो, वह कार्य आपलोग करें। मैं शचीको कदापि नहीं दूँगा
ହେ ସୁରଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ! ଯାହା ତାଙ୍କର ହିତ ହେବ ଏବଂ ମୋର ମଧ୍ୟ ହିତ ହେବ, ସେହି କାର୍ଯ୍ୟ ଆପଣମାନେ କରନ୍ତୁ। ମୁଁ ଶଚୀଙ୍କୁ କେବେ ମଧ୍ୟ ଦେବି ନାହିଁ।
Verse 24
शल्य उवाच अथ देवा: सगन्धर्वा गुरुमाहुरिदं वच: । कथं सुनीतं नु भवेन्मन्त्रयस्व बृहस्पते,शल्य कहते हैं--राजन! तब देवताओं तथा गन्धवोने गुरुसे इस प्रकार कहा --“बृहस्पते! आप ही सलाह दीजिये कि किस उपायका अवलम्बन करनेसे शुभ परिणाम होगा?”
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ତାପରେ ଦେବତାମାନେ ଗନ୍ଧର୍ବମାନଙ୍କ ସହ ଗୁରୁଙ୍କୁ ଏହି କଥା କହିଲେ—“ହେ ବୃହସ୍ପତି! କେଉଁ ଉପାୟ ଅବଲମ୍ବନ କଲେ ପରିଣାମ ସୁନୀତ ଓ ଶୁଭ ହେବ, ପରାମର୍ଶ ଦିଅନ୍ତୁ।”
Verse 25
ब॒हस्पतिरुवाच नहुषं याचतां देवी किंचित् कालान्तरं शुभा । इन्द्राणी हितमेतद्धि तथास्माकं भविष्यति,बृहस्पतिजीने कहा--देवगण! शुभलक्षणा शची देवी नहुषसे कुछ समयकी अवधि माँगें। इसीसे इनका और हमारा भी हित होगा
ବୃହସ୍ପତି କହିଲେ—ଦେବଗଣ! ଶୁଭଲକ୍ଷଣା ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀ ଶଚୀ ନହୁଷଙ୍କୁ ଅଳ୍ପ ସମୟର ଅବକାଶ ମାଗୁନ୍ତୁ। ଏହା ତାଙ୍କର ହିତ ଓ ଆମର ମଧ୍ୟ ହିତ ହେବ।
Verse 26
बहुविघ्न: सुरा: काल: काल: कालं॑ नयिष्यति । गर्वितो बलवांश्षापि नहुषो वरसंश्रयात्,देवताओ! समय अनेक प्रकारके विघ्नोंसे भरा होता है। इस समय नहुष आपलोगोंके वरदानके प्रभावसे बलवान् और गर्वीला हो गया है। काल ही उसे कालके गालमें पहुँचा देगा
ହେ ଦେବଗଣ! କାଳ ଅନେକ ପ୍ରକାର ବିଘ୍ନରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ। କାଳ ହିଁ କାଳକୁ ତାହାର ନିୟତ ଅନ୍ତକୁ ନେଇଯାଏ। ଆପଣମାନଙ୍କ ବରଦାନର ଆଶ୍ରୟରେ ନହୁଷ ବଳବାନ୍ ଓ ଗର୍ବିତ ହୋଇଛି; କିନ୍ତୁ କାଳ ହିଁ ତାକୁ ମୃତ୍ୟୁର ଗଳାରେ ପହଞ୍ଚାଇଦେବ।
Verse 27
शल्य उवाच ततस्तेन तथोक्ते तु प्रीता देवास्तथाब्रुवन् । ब्रह्मन् साथ्विवमुक्त ते हितं सर्वदिवौकसाम्,शल्य कहते हैं--राजन्! उनके इस प्रकार सलाह देनेपर देवता बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले--'ब्रह्मनन्! आपने बहुत अच्छी बात कही है। इसीमें सम्पूर्ण देवताओंका हित है
ଶଲ୍ୟ କହିଲେ—ସେ ଏପରି କହିବା ପରେ ଦେବତାମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ କହିଲେ—‘ହେ ବ୍ରାହ୍ମଣ! ତୁମେ ଯାହା କହିଛ, ତାହା ନିଶ୍ଚୟ ଉତ୍ତମ; ଏହିଥିରେ ସମସ୍ତ ସ୍ୱର୍ଗବାସୀଙ୍କ ହିତ ଅଛି।’
Verse 28
एवमेतद् द्विजश्रेष्ठ देवी चेयं प्रसाद्यताम् ततः: समस्ता इन्द्राणीं देवाश्चाग्निपुरोगमा: । ऊचुर्वचनमव्यग्रा लोकानां हितकाम्यया,'द्विजश्रेष्ठ] इसी बातके लिये शची देवीको राजी कीजिये।” तदनन्तर अग्नि आदि सब देवता इन्द्राणीके पास जा समस्त लोकोंके हितके लिये शान्तभावसे इस प्रकार बोले
‘ଏହିପରି ହେଉ, ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଏହି ଦେବୀଙ୍କୁ ପ୍ରସନ୍ନ କରାଯାଉ।’ ତାପରେ ଅଗ୍ନିଙ୍କୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି ସମସ୍ତ ଦେବତା ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲେ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କ ହିତକାମନାରେ, ଅବ୍ୟଗ୍ର ଚିତ୍ତରେ, ଶାନ୍ତଭାବେ ତାଙ୍କୁ କହିଲେ।
Verse 29
देवा ऊचु त्वया जगदिदं सर्व धृतं स्थावरजड्रमम् | एकपत्न्यसि सत्या च गच्छस्व नहुषं प्रति
ଦେବତାମାନେ କହିଲେ—‘ଦେବୀ! ତୁମେ ହିଁ ଏହି ସମଗ୍ର ଜଗତକୁ—ସ୍ଥାବର ଓ ଜଙ୍ଗମ ସହିତ—ଧାରଣ କରି ରଖିଛ। ତୁମେ ଏକପତ୍ନୀବ୍ରତା ଓ ସତ୍ୟନିଷ୍ଠ; ତେଣୁ ନହୁଷଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଅ।’
Verse 30
क्षिप्रं वामभिकामश्न विनशिष्यति पापकृत् | नहुषो देवि शक्रश्न सुरैश्चवर्यमवाप्स्यति
‘ଶୀଘ୍ର ହିଁ କାମାନ୍ଧ ପାପୀ ବିନଶିଯିବ। ହେ ଦେବୀ! ନ ନହୁଷ, ନ ଶକ୍ର—ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠତା ପାଇବେ।’
Verse 31
देवता बोले--देवि! यह समस्त चराचर जगत् तुमने ही धारण कर रखा है, क्योंकि तुम पतिव्रता और सत्यपरायणा हो। अतः तुम नहुषके पास चलो। देवेश्वरि! तुम्हारी कामना करनेके कारण पापी नहुष शीघ्र नष्ट हो जायगा और इन्द्र पुनः अपने देवसाम्राज्यको प्राप्त कर लेंगे ।। एवं विनिश्चयं कृत्वा इन्द्राणी कार्यसिद्धये । अभ्यगच्छत सव्रीडा नहुषं घोरदर्शनम्,अपनी कार्य-सिद्धिके लिये ऐसा निश्चय करके इन्द्राणी भयंकर दृष्टिवाले नहुषके पास बड़े संकोचके साथ गयी
ଦେବତାମାନେ କହିଲେ—‘ଦେବୀ! ତୁମେ ପତିବ୍ରତା ଓ ସତ୍ୟପରାୟଣା ଥିବାରୁ ଏହି ସମସ୍ତ ଚରାଚର ଜଗତକୁ ତୁମେ ହିଁ ଧାରଣ କରି ରଖିଛ। ତେଣୁ ନହୁଷଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଅ। ହେ ଦେବେଶ୍ୱରୀ! ତୁମକୁ କାମନା କରିବାରୁ ପାପୀ ନହୁଷ ଶୀଘ୍ର ନଷ୍ଟ ହେବ ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ର ପୁନର୍ବାର ନିଜ ଦେବସାମ୍ରାଜ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତ କରିବେ।’ ଏପରି ନିଶ୍ଚୟ କରି କାର୍ଯ୍ୟସିଦ୍ଧି ପାଇଁ ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀ ଲଜ୍ଜା-ସଙ୍କୋଚ ସହିତ ଭୟଙ୍କର ଦର୍ଶନ ନହୁଷଙ୍କ ପାଖକୁ ଗଲେ।
Verse 32
दृष्टवा तां नहुषश्चापि वयोरूपसमन्विताम् | समदह्ृष्यत दुष्टात्मा कामोपहतचेतन:,नयी अवस्था और सुन्दर रूपसे सुशोभित इन्द्राणीको देखकर दुष्टात्मा नहुष बहुत प्रसन्न हुआ। कामभावनासे उसकी बुद्धि मारी गयी थी
ଯୌବନ ଓ ରୂପରେ ଶୋଭିତ ଇନ୍ଦ୍ରାଣୀଙ୍କୁ ଦେଖି ଦୁଷ୍ଟାତ୍ମା ନହୁଷ ଅତ୍ୟନ୍ତ ହର୍ଷିତ ହେଲା। କାମନା ତାହାର ଚେତନା-ବୁଦ୍ଧିକୁ ଆଘାତ କରି, ସେ ନୀତି-ସଂଯମ ହରାଇଲା।
Whether Bṛhaspati and the devas should comply with an illegitimate demand by surrendering Indrāṇī, despite her having sought refuge under explicit protection—pitting expedient appeasement against the binding duty to safeguard a supplicant.
That betrayal of a frightened person who has taken refuge is a foundational breach that undermines prosperity, ritual legitimacy, and social trust; ethical governance begins with honoring protection pledges even under political pressure.
No explicit phalaśruti appears in this chapter; instead, the text uses normative consequences (social, ritual, and political ruin) as meta-commentary to reinforce why the doctrine of refuge-protection is indispensable to dharma.