
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, जुए के परिणामों से व्याकुल, विदुर से पूछता है—वनगमन के लिए निकले धर्मपुत्र युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल-सहदेव, द्रौपदी और धौम्य कैसे जा रहे हैं; नगर और जन-मन की दशा क्या है। → विदुर का वर्णन यात्रा के दृश्य को शोक-चित्र बना देता है: पुरोहित धौम्य यम-सम्बन्धी साम-मन्त्रों के साथ आगे-आगे चलते हैं; पीछे-पीछे पाण्डव, द्रौपदी और जनसमूह। अर्जुन का संकेतात्मक आचरण (रेत बिखेरना/भूमि पर चिह्न बनाना) भविष्य के शरवर्षा-सम प्रतिशोध का पूर्वाभास देता है। नगर में अपशकुन उभरते हैं—राहु का सूर्य को ग्रसना, उल्का का विपरीत दिशा में घूमना, अशुभ संकेतों से राजधानी का मन टूटता है। → अपशकुनों और जन-शोक के बीच विदुर का निर्णायक कथन उभरता है: यह दुःख क्षणिक सुख की छाया-सा है; पाण्डवों का संयम और बाहुबल दोनों साथ चल रहे हैं—वे अपनी भुजाओं की ओर देखते हुए (भविष्यकर्म का संकल्प) वन की ओर बढ़ते हैं, और राज्य-सभा में हुए अन्याय का फल समय पर लौटाने का संकेत देते हैं। → यात्रा का क्रम स्थिर होता है—धौम्य के वैदिक अनुष्ठान, द्रौपदी का दुःख, पाण्डवों का धैर्य, और प्रजाजनों का विलाप एक साथ बहते हैं। धृतराष्ट्र को विदुर के शब्दों से यह बोध मिलता है कि जो हुआ वह केवल तत्कालीन विजय नहीं, दीर्घकालीन विनाश का बीज है। → अर्जुन के ‘असक्त शरवर्षा’ जैसे भविष्य-संकेत और राजधानी के अपशकुन यह प्रश्न छोड़ते हैं—यह अन्याय किस दिन किस रूप में लौटेगा, और किसके सिर पर उसका दण्ड गिरेगा?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २९ श्लोक मिलाकर कुल ६५ श्लोक हैं) अीद-आफीाद-- बछ। एफ काया अशीतितमोब<्ध्याय: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन वैशम्पायन उवाच तमागतमथो राजा विदुरं दीर्घदर्शिनम् । साशडूक इव पप्रच्छ धृतराष्ट्रोडम्बिकासुत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दूरदर्शी विदुरजीके आनेपर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने शंकित-सा होकर पूछा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଜନମେଜୟ! ଦୂରଦର୍ଶୀ ବିଦୁର ଆସିବା ପରେ ଅମ୍ବିକାସୁତ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ସନ୍ଦେହାକୁଳ ହୋଇଥିବା ପରି ତାଙ୍କୁ ପଚାରିଲେ।
Verse 2
धृतराष्ट उवाच कथं गच्छति कौन्तेयो धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: । भीमसेन: सव्यसाची माद्रीपुत्रोी च पाण्डवौ,धृतराष्ट्र बोले--विदुर! कुन्तीनन्दन धर्मपुत्र युधिष्ठिर किस प्रकार जा रहे हैं? भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव--ये चारों पाण्डव भी किस प्रकार यात्रा करते हैं?
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— ବିଦୁର! କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର କିପରି ଯାଉଛି? ଭୀମସେନ, ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ ଏବଂ ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ନକୁଳ-ସହଦେବ—ଏହି ପାଣ୍ଡବମାନେ କିପରି ଯାତ୍ରା କରୁଛନ୍ତି?
Verse 3
धौम्यश्नैव कथं क्षत्तद्रौपदी च यशस्विनी । श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्व तेषां शंस विचेष्टितम्,पुरोहित धौम्य तथा यशस्विनी द्रौपदी भी कैसे जा रही है? मैं उन सबकी पृथक्-पृथक् चेष्टाओंको सुनना चाहता हूँ, तुम मुझसे कहो
ହେ କ୍ଷତ୍ତ! ପୁରୋହିତ ଧୌମ୍ୟ ଏବଂ ଯଶସ୍ୱିନୀ ଦ୍ରୌପଦୀ କିପରି ଯାଉଛନ୍ତି? ମୁଁ ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ ଚେଷ୍ଟା-ଚଳନ ସବୁ ଶୁଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛି; ତୁମେ ମୋତେ କହ।
Verse 4
विदुर उवाच वस्त्रेण संवृत्य मुखं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । बाहू विशालौ सम्पश्यन् भीमो गच्छति पाण्डव:,विदुर बोले--कुन्तीनन्दन युधिष्छिर वस्त्रसे मुँह ढँककर जा रहे हैं। पाण्डुकुमार भीमसेन अपनी विशाल भुजाओंकी ओर देखते हुए जाते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ— କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବସ୍ତ୍ରରେ ମୁହଁ ଢାକି ଯାଉଛି। ପାଣ୍ଡବ ଭୀମସେନ ନିଜ ବିଶାଳ ବାହୁଦ୍ୱୟକୁ ଦେଖିଦେଖି ଚାଲିଯାଉଛି।
Verse 5
सिकता वपन् सव्यसाची राजानमनुगच्छति । माद्रीपुत्र: सहदेवो मुखमालिप्य गच्छति,सव्यसाची अर्जुन बालू बिखेरते हुए राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे जा रहे हैं। माद्रीकुमार सहदेव अपने मुँहपर मिट्टी पोतकर जाते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ— ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ ବାଲି ଛିଟାଇଛିଟାଇ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଯାଉଛି। ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ସହଦେବ ମୁହଁରେ ମାଟି ଲେପି ଯାଉଛି।
Verse 6
पांसूपलिप्तसर्वाड्रो नकुलक्षित्तविद्दल: । दर्शनीयतमो लोके राजानमनुगच्छति,लोकमें अत्यन्त दर्शनीय मनोहर रूपवाले नकुल अपने सब अंगोंमें धूल लपेटकर व्याकुलचित हो राजा युधिष्ठिरका अनुसरण कर रहे हैं
ଲୋକରେ ସର୍ବାଧିକ ଦର୍ଶନୀୟ ନକୁଳ ସମଗ୍ର ଅଙ୍ଗରେ ଧୂଳି ଲେପିତ, ଚିତ୍ତେ ବ୍ୟାକୁଳ ହୋଇ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କରୁଛନ୍ତି।
Verse 7
कृष्णा तु केशौ: प्रच्छाद्य मुखमायतलोचना । दर्शनीया प्ररुदती राजानमनुगच्छति,परम सुन्दरी विशाललोचना कृष्णा अपने केशोंसे ही मुँह ढँककर रोती हुई राजाके पीछे-पीछे जा रही है
ପରମ ସୁନ୍ଦରୀ, ବିଶାଳନୟନା କୃଷ୍ଣା ନିଜ କେଶରେ ମୁହଁ ଢାକି, କାନ୍ଦୁଥିବା ଅବସ୍ଥାରେ ରାଜାଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଯାଉଛନ୍ତି।
Verse 8
धौम्यौ रौद्राणि सामानि याम्यानि च विशाम्पते । गायन् गच्छति मार्गेषु कुशानादाय पाणिना,महाराज! पुरोहित धौम्यजी हाथमें कुश लेकर रुद्र तथा यमदेवतासम्बन्धी साम- मन्त्रोंका गान करते हुए आगे-आगे मार्गपर चल रहे हैं
ହେ ପ୍ରଜାପତି ସମ ରାଜନ! ପୁରୋହିତ ଧୌମ୍ୟ ହାତରେ କୁଶ ଧରି, ରୁଦ୍ର ଓ ଯମଦେବ ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ସାମମନ୍ତ୍ର ଗାଇ ଗାଇ ମାର୍ଗରେ ଆଗେ ଆଗେ ଯାଉଛନ୍ତି।
Verse 9
धृतराष्ट्र रवाच विविधानीह रूपाणि कृत्वा गच्छन्ति पाण्डवा: | तन्ममाचक्ष्व विदुर कस्मादेवं व्रजन्ति ते
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ବିଦୁର! ଏଠାରେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ବିଭିନ୍ନ ରୂପ ଧାରଣ କରି ପ୍ରସ୍ଥାନ କରୁଛନ୍ତି। ସେମାନେ ଏଭଳି କାହିଁକି ଯାଉଛନ୍ତି? ମୋତେ କୁହ।
Verse 10
धृतराष्ट्रने पूछा--विदुर! पाण्डवलोग यहाँ जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी चेष्टाएँ करते हुए यात्रा कर रहे हैं, उसका क्या रहस्य है, यह बताओ। वे क्यों इस प्रकार जा रहे हैं? ।। विदुर उवाच निकृतस्यापि ते पुनत्रैहते राज्ये धनेषु च । न धर्माच्चलते बुद्धिर्धर्मराजस्य धीमत:,विदुर बोले--महाराज! यद्यपि आपके पुत्रोंने छलपूर्ण बर्ताव किया है। पाण्डवोंका राज्य और धन सब कुछ चला गया है तो भी परम बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्लिरकी बुद्धि धर्मसे विचलित नहीं हो रही है
ବିଦୁର କହିଲେ—ମହାରାଜ! ଆପଣଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ଛଳ କରି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ରାଜ୍ୟ ଓ ଧନ ହରଣ କରିଛନ୍ତି; ତଥାପି ପରମ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ବୁଦ୍ଧି ଧର୍ମରୁ ଚ୍ୟୁତ ହୁଏ ନାହିଁ।
Verse 11
योडसौ राजा घृणी नित्य धार्तराष्ट्रबु भारत । निकृत्या भ्रंशित: क्रोधान्नोन्मीलयति लोचने
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ହେ ଭାରତ! ସେଇ ରାଜା ସଦା କରୁଣାଶୀଳ; କିନ୍ତୁ ଛଳନାରେ ତାଙ୍କୁ ନ୍ୟାୟପଥରୁ ଭ୍ରଷ୍ଟ କରାଯାଇଛି। କ୍ରୋଧରେ ସେ ଆଖି ମଧ୍ୟ ଖୋଲୁନାହାନ୍ତି।
Verse 12
भारत! राजा युधिष्ठिर आपके पुत्रोंपर सदा दयाभाव बनाये रखते थे, किंतु इन्होंने छलपूर्ण जूएका आश्रय लेकर उन्हें राज्यसे वंचित किया है, इससे उनके मनमें बड़ा क्रोध है और इसीलिये वे अपनी आँखोंको नहीं खोलते हैं ।। नाहं जन निर्दहेयं दृष्टवा घोरेण चक्षुषा | स पिधाय मुखं राजा तस्माद् गच्छति पाण्डव:,“मैं भयानक दृष्टिसे देखकर किसी (निरपराधी) मनुष्यको भस्म न कर डालूँ' इसी भयसे पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर अपना मुँह ढँककर जा रहे हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ଭାରତ (ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର)! ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଆପଣଙ୍କ ପୁଅମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ସଦା ଦୟାଭାବ ରଖୁଥିଲେ; କିନ୍ତୁ ସେମାନେ ଛଳପୂର୍ଣ୍ଣ ଜୁଆର ଆଶ୍ରୟ ନେଇ ତାଙ୍କୁ ରାଜ୍ୟରୁ ବଞ୍ଚିତ କରିଛନ୍ତି। ଏହି କାରଣରୁ ତାଙ୍କ ହୃଦୟରେ ଭୟଙ୍କର କ୍ରୋଧ ଉଠିଛି; ତେଣୁ ସେ ଆଖି ମଧ୍ୟ ଖୋଲୁନାହାନ୍ତି। ‘ଭୟାନକ ଦୃଷ୍ଟିରେ ଦେଖି କେଉଁ ନିର୍ଦୋଷକୁ ଭସ୍ମ କରିନ ଦେଉ’—ଏହି ଭୟରୁ ପାଣ୍ଡବ ରାଜା ମୁହଁ ଢାକି ଯାଉଛନ୍ତି।
Verse 13
यथा च भीमो व्रजति तन्मे निगदत: शृणु । बाह्वोर्बले नास्ति समो ममेति भरतर्षभ,अब भीमसेन जिस प्रकार चल रहे हैं, उसका रहस्य बताता हूँ, सुनिये! भरतश्रेष्ठ! उन्हें इस बातका अभिमान है कि बाहुबलमें मेरे समान दूसरा कोई नहीं है
ବିଦୁର କହିଲେ—ଭୀମ ଯେପରି ଆଗେଇ ଯାଉଛି, ତାହା ମୋ ପାଖରୁ ଶୁଣ। ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତାଙ୍କର ଗର୍ବ—‘ଭୁଜବଳରେ ମୋ ସମାନ କେହି ନାହିଁ’।
Verse 14
बाहू विशालौ कृत्वासौ तेन भीमो5पि गच्छति । बाहू विदर्शयन् राजन् बाहुद्रविणदर्पित:
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ସେ ନିଜ ବାହୁଦ୍ୱୟକୁ ବିଶାଳ କରି ଚାଲୁଛି; ସେହିପରି ଭୀମ ମଧ୍ୟ ଆଗେଇ ଯାଉଛି—ବାହୁ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରି, ବାହୁବଳ ଓ ଧନ-ଐଶ୍ୱର୍ୟର ଦର୍ପରେ ଫୁଲି।
Verse 15
प्रदिशज्छरसम्पातान् कुन्तीपुत्रो&र्जुनस्तदा,कुन्तीपुत्र सव्यसाची अर्जुन उस समय राजाके पीछे-पीछे जो बालू बिखेरते हुए यात्रा कर रहे थे, उसके द्वारा वे शत्रुओंपर बाण बरसानेकी अभिलाषा व्यक्त करते थे। भारत! इस समय उनके गिराये हुए बालूके कण जैसे आपसमें संसक्त न होते हुए लगातार गिरते हैं, उसी प्रकार वे शत्रुओंपर परस्पर संसक्त न होनेवाले असंख्य बाणोंकी वर्षा करेंगे
ବିଦୁର କହିଲେ—ସେ ସମୟରେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ ମନେ ହେଉଥିଲେ ଯେନେ ଶରବର୍ଷାର ସଙ୍କେତ ଦେଉଛନ୍ତି। ଯେପରି ରାଜାଙ୍କ ପଛେ ଛିଟିକି ପଡ଼ିଥିବା ବାଲୁକଣା ପରସ୍ପର ଲଗିନଥାଇ ଅବିଚ୍ଛିନ୍ନ ଧାରାରେ ପଡ଼ିଚାଲେ, ସେପରି ସେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଉପରେ ଅସଂଖ୍ୟ ବାଣର ବର୍ଷା କରିବେ—ପ୍ରତ୍ୟେକ ଅଲଗା, କିନ୍ତୁ ଧାରା ଅଖଣ୍ଡ।
Verse 16
सिकता वपन् सव्यसाची राजानमनुगच्छति । असक्ता: सिकतास्तस्य यथा सम्प्रति भारत । असक्तं शरवर्षाणि तथा मोक्ष्यति शत्रुषु,कुन्तीपुत्र सव्यसाची अर्जुन उस समय राजाके पीछे-पीछे जो बालू बिखेरते हुए यात्रा कर रहे थे, उसके द्वारा वे शत्रुओंपर बाण बरसानेकी अभिलाषा व्यक्त करते थे। भारत! इस समय उनके गिराये हुए बालूके कण जैसे आपसमें संसक्त न होते हुए लगातार गिरते हैं, उसी प्रकार वे शत्रुओंपर परस्पर संसक्त न होनेवाले असंख्य बाणोंकी वर्षा करेंगे
ବିଦୁର କହିଲେ— ହେ ଭାରତ, କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ ରାଜାଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଚାଲି ଚାଲି ପଥରେ ବାଲି ଛିଟାଉଛି। ଯେପରି ତାହାର ବାଲିକଣାଗୁଡ଼ିକ ପରସ୍ପର ଲଗିନଥାଇ ଅବିଚ୍ଛିନ୍ନ ଧାରାରେ ପଡ଼େ, ସେପରି ସେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଉପରେ ଅସଂଖ୍ୟ, ଦ୍ରୁତ, ପରସ୍ପର ଅସଂସକ୍ତ ବାଣବର୍ଷା ଶୀଘ୍ର କରିବ—ଧର୍ମଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ସଂଯମିତ କିନ୍ତୁ ଦୃଢ଼ ପ୍ରସ୍ତୁତିର ଏହି ଚିହ୍ନ।
Verse 17
न मे कश्चिद् विजानीयान्मुखमद्येति भारत । मुखमालिप्य तेनासौ सहदेवो5पि गच्छति,भारत! “आज इस दुर्दिनमें कोई मेरे मुँहको पहचान न ले” यही सोचकर सहदेव अपने मुँहमें मिट्टी पोतकर जा रहे हैं
ବିଦୁର କହିଲେ— ହେ ଭାରତ, “ଆଜି କେହି ମୋ ମୁହଁକୁ ଚିହ୍ନିନ ଦେଉ” ଭାବି ସହଦେବ ମଧ୍ୟ ମୁହଁରେ ମାଟି ଲେପି ଚାଲିଯାଉଛି, ଏହି ଦୁର୍ଦିନରେ ଅଚିହ୍ନା ରହି ଆତ୍ମରକ୍ଷା କରିବାକୁ।
Verse 18
नाहं मनांस्याददेयं मार्गे सत्रीणामिति प्रभो । पांसूलिप्तसर्वाड्रो नकुलस्तेन गच्छति,प्रभो! “मार्ममें मैं स्त्रियोंका चित्त न चुरा लूँ" इस भयसे नकुल अपने सारे अंगोंमें धूल लगाकर यात्रा करते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ— ପ୍ରଭୋ, “ମାର୍ଗରେ ଯାଉଥିବାବେଳେ ମୁଁ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଚିତ୍ତ ହରଣ କରି ନ ଦେଉ” ଏହି ଭୟରୁ ନକୁଳ ସମଗ୍ର ଶରୀରରେ ଧୂଳି ଲେପି ଯାଉଛି, ନିଜ ଶୋଭା ଦମନ କରି ସଂଯମ ରକ୍ଷା ପାଇଁ।
Verse 19
एकव्स्त्रा प्ररुदती मुक्तकेशी रजस्वला । शोणितेनाक्तवसना द्रौपदी वाक्यमब्रवीत्,द्रौपदीके शरीरपर एक ही वस्त्र था, उसके बाल खुले हुए थे, वह रजस्वला थी और उसके कपड़ोंमें रक्त (रज)-का दाग लगा हुआ था, उसने रोते हुए यह बात कही थी
ବିଦୁର କହିଲେ— ଦ୍ରୌପଦୀ ଏକମାତ୍ର ବସ୍ତ୍ର ପିନ୍ଧି, କାନ୍ଦୁଥିବା, କେଶ ଖୋଲା, ରଜସ୍ୱଳା ଅବସ୍ଥାରେ, ରକ୍ତଦାଗ ଲାଗିଥିବା ବସ୍ତ୍ର ସହିତ ସଭାମଧ୍ୟରେ ଏହି କଥା କହିଥିଲା। ଏହା ଧର୍ମର ଭୟଙ୍କର ବିଡମ୍ବନା—ରାଜସଭାରେ ନାରୀ-ମର୍ଯ୍ୟାଦାର ଅପମାନ, ଏବଂ ସଭା ଅଧର୍ମର ସାକ୍ଷୀ ହେବା।
Verse 20
यत्कृते5हमिदं प्राप्ता तेषां वर्षे चतुर्दशे । हतपत्यो हतसुता हतबन्धुजनप्रिया:,“जिनके अन्यायसे आज मैं इस दशाको पहुँची हूँ, आजके चौदहवें वर्षमें उनकी स्त्रियाँ भी अपने पति, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके मारे जानेसे उनकी लाशोंके पास लोट-लोटकर रोयेंगी और अपने अंगोंमें रक्त तथा धूल लपेटे, बाल खोले हुए, अपने सगे-सम्बन्धियोंको तिलांजलि दे इसी प्रकार हस्तिनापुरमें प्रवेश करेंगी”
ଦ୍ରୌପଦୀ କହିଲା— ଯାହାଙ୍କ ଅନ୍ୟାୟରୁ ମୁଁ ଆଜି ଏହି ଦଶାକୁ ପହଞ୍ଚିଛି, ଚତୁର୍ଦ୍ଦଶ ବର୍ଷରେ ସେମାନଙ୍କ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ମଧ୍ୟ ପତି, ପୁତ୍ର ଓ ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବ ହତ ହେବାରୁ ଶବମାନଙ୍କ ପାଖରେ ଲୁଠି ଲୁଠି ବିଲାପ କରିବେ; ରକ୍ତ ଓ ଧୂଳିରେ ଲିପ୍ତ ଅଙ୍ଗ, କେଶ ଖୋଲା, ନିଜ ସ୍ୱଜନଙ୍କୁ ତିଲାଞ୍ଜଲି ଦେଇ, ଏହିପରି ହସ୍ତିନାପୁରରେ ପ୍ରବେଶ କରିବେ।
Verse 21
बहुशोणितदिग्धाड़यो मुक्तकेशयो रजस्वला: । एवं कृतोदका भार्या: प्रवेक्ष्यन्ति गजाह्नयम्,“जिनके अन्यायसे आज मैं इस दशाको पहुँची हूँ, आजके चौदहवें वर्षमें उनकी स्त्रियाँ भी अपने पति, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके मारे जानेसे उनकी लाशोंके पास लोट-लोटकर रोयेंगी और अपने अंगोंमें रक्त तथा धूल लपेटे, बाल खोले हुए, अपने सगे-सम्बन्धियोंको तिलांजलि दे इसी प्रकार हस्तिनापुरमें प्रवेश करेंगी”
Vidura foretells a grim reversal: the very women of those who have committed injustice will, in the fourteenth year, enter Hastināpura in the same condition—rolling beside the corpses of their slain husbands, sons, and kinsmen, weeping uncontrollably, their bodies smeared with blood and dust, hair dishevelled, and performing the final water-offering rites for their own relatives. The warning frames adharma as self-returning violence: cruelty inflicted on the innocent ripens into identical suffering for one’s own household.
Verse 22
कृत्वा तु नैतान् दर्भान् धीरो धौम्य: पुरोहित: । सामानि गायन् याम्यानि पुरतो याति भारत
Having arranged these darbha grasses, the steadfast priest Dhaumya proceeds in front, chanting the Sāman hymns associated with the southern (Yama’s) direction—O Bhārata—thus leading the rite forward with solemn, dharma-governed order.
Verse 23
भारत! धीरस्वभाववाले पुरोहित धौम्यजी कुशोंका अग्रभाग नै#ऋत्यकोणकी ओर करके यमदेवतासम्बन्धी साम-मन्त्रोंका गान करते हुए पाण्डवोंके आगे-आगे जा रहे हैं ।। हतेषु भारतेष्वाजौी कुरूणां गुरवस्तदा । एवं सामानि गास्यन्तीत्युक्त्वा धौम्योडपि गच्छति
Vidura said: “O Bhārata, the steadfast priest Dhaumya, taking the tips of the kuśa grass and turning them toward the south‑western quarter, proceeds ahead of the Pāṇḍavas while chanting Sāman hymns connected with Yama. Saying, ‘When the Kurus’ elders have been slain in battle, I too shall chant such Sāman hymns,’ Dhaumya goes on.”
Verse 24
धौम्यजी यह कहकर गये थे कि युद्धमें कौरवोंके मारे जानेपर उनके गुरु भी इसी प्रकार कभी सामगान करेंगे ।। हा हा गच्छन्ति नो नाथा: समवेक्षध्वमीदृशम् । अहो धिक् कुरुवृद्धानां बालानामिव चेष्टितम्,महाराज! उस समय नगरके लोग अत्यन्त दुःखसे आतुर हो बार-बार चिल्लाकर कह रहे थे कि “हाय! हाय! हमारे स्वामी पाण्डव चले जा रहे हैं। अहो! कौरवोंमें जो बड़े-बूढ़े लोग हैं, उनकी यह बालकोंकी-सी चेष्टा तो देखो। धिक््कार है उनके इस बर्तावको! ये कौरव लोभवश महाराज पाण्डुके पुत्रोंको राज्यसे निकाल रहे हैं। इन पाण्डुपुत्रोंसे वियुक्त होकर हम सब लोग आज अनाथ हो गये। इन लोभी और उद्दण्ड कौरवोंके प्रति हमारा प्रेम कैसे हो सकता है?
Vidura reports the citizens’ anguished outcry as the Pāṇḍavas depart: “Alas, alas—our lords are leaving! Look at this shameful spectacle! Fie upon the elders of the Kurus, behaving like children, O King.” The lament underscores a moral inversion: those expected to uphold restraint and dharma instead act from greed and impulsiveness, driving the rightful heirs into exile and leaving the people feeling orphaned and betrayed.
Verse 25
राष्ट्रेभ्य: पाण्डुदायादॉल्लो भान्निर्वासयन्ति ये । अनाथा: सम वयं सर्वे वियुक्ता: पाण्डुनन्दनै:,महाराज! उस समय नगरके लोग अत्यन्त दुःखसे आतुर हो बार-बार चिल्लाकर कह रहे थे कि “हाय! हाय! हमारे स्वामी पाण्डव चले जा रहे हैं। अहो! कौरवोंमें जो बड़े-बूढ़े लोग हैं, उनकी यह बालकोंकी-सी चेष्टा तो देखो। धिक््कार है उनके इस बर्तावको! ये कौरव लोभवश महाराज पाण्डुके पुत्रोंको राज्यसे निकाल रहे हैं। इन पाण्डुपुत्रोंसे वियुक्त होकर हम सब लोग आज अनाथ हो गये। इन लोभी और उद्दण्ड कौरवोंके प्रति हमारा प्रेम कैसे हो सकता है?
Vidura said: “Those who, out of greed, drive the heirs of Pāṇḍu out of the kingdom—once we are separated from the sons of Pāṇḍu, all of us become truly helpless and without a protector.”
Verse 26
दुर्विनीतेषु लुब्धेषु का प्रीति: कौरवेषु न: । इति पौरा: सुदु:खार्ता: क्रोशन्ति सम पुन: पुन:,महाराज! उस समय नगरके लोग अत्यन्त दुःखसे आतुर हो बार-बार चिल्लाकर कह रहे थे कि “हाय! हाय! हमारे स्वामी पाण्डव चले जा रहे हैं। अहो! कौरवोंमें जो बड़े-बूढ़े लोग हैं, उनकी यह बालकोंकी-सी चेष्टा तो देखो। धिक््कार है उनके इस बर्तावको! ये कौरव लोभवश महाराज पाण्डुके पुत्रोंको राज्यसे निकाल रहे हैं। इन पाण्डुपुत्रोंसे वियुक्त होकर हम सब लोग आज अनाथ हो गये। इन लोभी और उद्दण्ड कौरवोंके प्रति हमारा प्रेम कैसे हो सकता है?
“ଲୋଭୀ ଓ ଦୁର୍ବିନୀତ କୌରବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଆମର ପ୍ରେମ କିପରି ହେବ?”—ଏହିପରି କହି ନଗରବାସୀମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଃଖରେ ଆକୁଳ ହୋଇ ପୁନଃପୁନଃ କ୍ରନ୍ଦନ କରିଲେ। ସେମାନେ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କର ଶିଶୁସଦୃଶ ଆଚରଣକୁ ଧିକ୍କାର କଲେ, ଲୋଭବଶେ ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ରାଜ୍ୟରୁ ବାହାର କରିବାକୁ ନିନ୍ଦା କଲେ, ଏବଂ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ବିନା ନିଜେମାନେ ଅନାଥ ହୋଇଗଲୁ ବୋଲି ଭାବି ଅଧର୍ମୀ ଶାସନ ପ୍ରତି କ୍ରୋଧ ପ୍ରକାଶ କଲେ।
Verse 27
एवमाकारलिड्रैस्ते व्यवसायं मनोगतम् । कथयन्तश्न कौन्तेया वन॑ जम्मुर्मनस्विन:,महाराज! इस प्रकार मनस्वी कुन्तीपुत्र अपनी आकृति एवं चिह्लोंके द्वारा अपने आन्तरिक निश्चयको प्रकट करते हुए वनको गये हैं
ଏହିପରି ସେହି ମନସ୍ବୀ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରମାନେ ନିଜ ଆକୃତି ଓ ବାହ୍ୟ ଲକ୍ଷଣଦ୍ୱାରା ଅନ୍ତର୍ନିହିତ ନିଶ୍ଚୟକୁ ପ୍ରକାଶ କରି, ତାହା ଜଣାଇଦେଇଥିବା ପରି, ବନକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 28
एवं तेषु नराग्र्येषु निर्यत्सु गजसाह्वयात् । अनभ्रे विद्युतश्नासन् भूमिश्व समकम्पत
ସେହି ନରଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ ଗଜସାହ୍ୱୟ (ହସ୍ତିନାପୁର) ଠାରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରୁଥିବାବେଳେ, ମେଘହୀନ ଆକାଶରେ ବିଜୁଳି ଚମକିଲା ଏବଂ ପୃଥିବୀ ମଧ୍ୟ କମ୍ପି ଉଠିଲା।
Verse 29
राहुरग्रसदादित्यमपर्वणि विशाम्पते । उल्का चाप्यपसव्येन पुरं कृत्वा व्यशीर्यत
ହେ ପ୍ରଜାପତେ! ଅପର୍ବକାଳରେ ରାହୁ ସୂର୍ଯ୍ୟକୁ ଗ୍ରସିଲା; ଏବଂ ଅପସବ୍ୟ (ବାମଗତି) ରେ ଚାଲୁଥିବା ଉଲ୍କା ନଗରକୁ ପରିକ୍ରମା କରି ପରେ ଭାଙ୍ଗି ପଡ଼ିଲା।
Verse 30
हस्तिनापुरसे उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंके निकलते ही बिना बादलके बिजली गिरने लगी, पृथ्वी काँप उठी। राजन्! बिना पर्व (अमावस्या)-के ही राहुने सूर्यको ग्रस लिया था और नगरको दायें रखकर उल्का गिरी थी ।। प्रत्याहरन्ति क्रव्यादा गृध्रगोमायुवायसा: । देवायतनचैत्येषु प्राकाराट्टालकेषु च,गीध, गीदड़ और कौवे आदि मांसाहारी जन्तु नगरके मन्दिरों, देववृक्षों, चहारदीवारी तथा अट्टालिकाओंपर मांस और हड्डी आदि लाकर गिराने लगे थे
ଗିଧ, ଗୋମାୟୁ (ଶିଆଳ) ଓ କାଉଁଆ ଆଦି ମାଂସାହାରୀ ପ୍ରାଣୀମାନେ ମାଂସ ଓ ହାଡ଼ର ଖଣ୍ଡ ଉଠାଇ ଆଣି ନଗରର ଦେବାୟତନ, ଚୈତ୍ୟସ୍ଥାନ, ପ୍ରାକାର ଓ ଅଟ୍ଟାଳିକାମାନଙ୍କ ଉପରେ ପକାଇବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 31
एवमेते महोत्पाता: प्रादुरासन् दुरासदा: । भरतानामभावाय राजन दुर्मन्त्रिते तव,राजन्! इस प्रकार आपकी दुर्मनत्रणाके कारण ऐसे-ऐसे अपशकुनरूप दुर्दम्य एवं महान् उत्पात प्रकट हुए हैं, जो भरतवंशियोंके विनाशकी सूचना दे रहे हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ରାଜନ! ଏହିପରି ଦୁର୍ନିବାର ଓ ମହାନ ଅପଶକୁନରୂପ ଉତ୍ପାତ ପ୍ରକଟ ହୋଇଛି। ତୁମ ଦୁର୍ମନ୍ତ୍ରଣାରେ ଏହା ଭରତବଂଶର ବିନାଶ ସୂଚାଉଛି।
Verse 32
वैशम्पायन उवाच एवं प्रवदतोरेव तयोस्तत्र विशाम्पते । धृतराष्ट्रस्य राज्ञश्न विदुरस्यथ च धीमतः,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र और बुद्धिमान विदुर जब दोनों वहाँ बातचीत कर रहे थे, उसी समय सभामें महर्षियोंसे घिरे हुए देवर्षि नारद कौरवोंके सामने आकर खड़े हो गये और यह भयंकर वचन बोले--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ସେଠାରେ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଓ ବୁଦ୍ଧିମାନ ବିଦୁର ଏଭଳି କଥାହେଉଥିବା ସମୟରେ, ମହର୍ଷିମାନଙ୍କ ଘେରାଉରେ ଦେବର୍ଷି ନାରଦ ସଭାକୁ ଆସି କୌରବମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହୋଇ, ଗମ୍ଭୀର ଓ ଅଶୁଭାର୍ଥକ ବଚନ କହିଲେ।
Verse 33
नारदश्न सभामध्ये कुरूणामग्रत: स्थित: । महर्षिभि: परिवृतो रौद्रं वाक्यमुवाच ह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र और बुद्धिमान विदुर जब दोनों वहाँ बातचीत कर रहे थे, उसी समय सभामें महर्षियोंसे घिरे हुए देवर्षि नारद कौरवोंके सामने आकर खड़े हो गये और यह भयंकर वचन बोले--
ସଭାମଧ୍ୟରେ କୁରୁମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ନାରଦ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେଲେ। ମହର୍ଷିମାନଙ୍କ ଘେରାଉରେ ସେ ରୌଦ୍ର ଓ ଭୟଙ୍କର ବଚନ କହିଲେ।
Verse 34
इतश्नतुर्दशे वर्षे विनक्ष्यन्तीह कौरवा: । दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च
ଆଜିଠାରୁ ଚତୁର୍ଦ୍ଦଶ ବର୍ଷରେ, ଦୁର୍ୟୋଧନର ଅପରାଧ ଓ ଭୀମ-ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ବଳରେ, ଏଠାରେ ହିଁ କୌରବମାନେ ବିନଷ୍ଟ ହେବେ।
Verse 35
“आजसे चौदहवें वर्षमें दुर्योधनके अपराधसे भीम और अर्जुनके पराक्रमद्वारा कौरवकुलका नाश हो जायगा” ।। इत्युक्त्वा दिवमाक्रम्य क्षिप्रमन््तरधीयत । ब्राह्मीं श्रियं सुविपुलां बिश्रद् देवर्षिसत्तम:
“ଆଜିଠାରୁ ଚତୁର୍ଦ୍ଦଶ ବର୍ଷରେ ଦୁର୍ୟୋଧନର ଅପରାଧରେ ଭୀମ ଓ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ପରାକ୍ରମ ଦ୍ୱାରା କୌରବକୁଳର ନାଶ ହେବ।” ଏହିପରି କହି, ଦେବର୍ଷିମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନାରଦ ଦିବ୍ୟଲୋକକୁ ଆରୋହଣ କରି ଶୀଘ୍ର ଅନ୍ତର୍ଧାନ ହେଲେ; ସେ ବ୍ରାହ୍ମୀ ଓ ଅତିବିପୁଳ ତେଜୋମୟ ଶ୍ରୀ ଧାରଣ କରିଥିଲେ।
Verse 36
ऐसा कहकर विशाल ब्रह्मतेज धारण करनेवाले देवर्षि-प्रवर नारद आकाशमें जाकर सहसा अन्तर्धान हो गये ।। (धृतराष्ट उवाच किमनब्रुवन् नागरिका: कि वै जानपदा जना: । महां तत्त्वेन चाचक्ष्व क्षत्त: सर्वमशेषत: ।। धृतराष्ट्रने पूछा--विदुर! जब पाण्डव वनको जाने लगे, उस समय नगर और देशके लोग क्या कह रहे थे, ये सब बातें मुझे पूर्णरूपसे ठीक-ठीक बताओ। विदुर उवाच ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्रा येडन्ये वदन्त्यथ । तच्छृणुष्व महाराज वक्ष्यते च मया तव ।। विदुर बोले--महाराज! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्यलोग इस घटनाके सम्बन्धमें जो कुछ कहते हैं, वह सुनिये, मैं आपसे सब बातें बता रहा हूँ। हा हा गच्छन्ति नो नाथा: समवेक्षध्वमीदृशम् । इति पौरा: सुदुःखार्ता: शोचन्ति सम समन्तत: ।। पाण्डवोंके जाते समय समस्त पुरवासी दुःखसे आतुर हो सब ओर शोकमें डूबे हुए थे और इस प्रकार कह रहे थे--'हाय! हाय! हमारे स्वामी, हमारे रक्षक वनमें चले जा रहे हैं। भाइयो! देखो, धृतराष्ट्रके पुत्रोंका यह कैसा अन्याय है?! तदहृष्टमिवाकूजं गतोत्सवमिवाभवत् | नगर हास्तिनपुरं सस्त्रीवृद्धकुमारकम् ।। स्त्री, बालक और वृद्धोंसहित सारा हस्तिनापुर नगर हर्षरहित, शब्दशून्य तथा उत्सवहीन-सा हो गया। सर्वे चासन् निरुत्साहा व्याधिना बाधिता यथा ।। पार्थात् प्रति नरा नित्यं चिनन््ताशोकपरायणा: । तत्र तत्र कथां चक्कर: समासाद्य परस्परम् ।। सब लोग दुन्तीपुत्रोंके लिये निरन्तर चिन्ता एवं शोकमें निमग्न हो उत्साह खो बैठे थे। सबकी दशा रोगियोंके समान हो गयी थी। सब एक-दूसरेसे मिलकर जहाँ-तहाँ पाण्डवोंके विषयमें ही वार्तालाप करते थे। वन॑ गते धर्मराजे दुः:खशोकपरायणा: । बभूवु: कौरवा वृद्धा भृशं॑ शोकेन पीडिता: ।। धर्मराजके वनमें चले जानेपर समस्त वृद्ध कौरव भी अत्यन्त शोकसे व्यथित हो दुःख और चिन्तामें निमग्न हो गये। ततः पौरजन: सर्व: शोचन्नास्ते जनाधिपम् | कुर्वाणाश्व कथास्तत्र ब्राह्मणा: पार्थिवं प्रति ।। तदनन्तर समस्त पुरवासी राजा युधिष्ठटिरके लिये शोकाकुल हो गये। उस समय वहाँ ब्राह्मणलोग राजा युधिष्ठिरके विषयमें निम्नांकित बातें करने लगे। ब्राह्मणा ऊचु कथं नु राजा धर्मात्मा वने वसति निर्जने । तस्यानुजाश्च ते नित्यं कृष्णा च द्रुपदात्मजा ।। सुखाहापि च दु:ःखारता कथं वसति सा वने ।। ब्राह्मणोंने कहा--हाय! धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर और उनके भाई निर्जन वनमें कैसे रहेंगे? तथा ट्रुपदकुमारी कृष्णा तो सुख भोगनेके ही योग्य है, वह दुःखसे आतुर हो वनमें कैसे रहेगी। विदुर उवाच एवं पौराश्न विप्राश्न॒ सदारा: सहपुत्रका: | स्मरन्त: पाण्डवान् सर्वे बभूवुर्भशदु:खिता: ।। विदुरजी कहते हैं--राजन्! इस प्रकार पुरवासी ब्राह्मण अपनी स्त्रियों और पुत्रोंके साथ पाण्डवोंका स्मरण करते हुए बहुत दुःखी हो गये। आविद्धा इव शस्त्रेण नाभ्यनन्दन् कथंचन । सम्भाष्यमाणा अपि ते न कंचित् प्रत्यपूजयन् ।। शस्त्रोंक आघातसे घायल हुए मनुष्योंकी भाँति वे किसी प्रकार सुखी न हो सके। बात कहनेपर भी वे किसीको आदरपूर्वक उत्तर नहीं देते थे। न भुक््त्वा न शयित्वा ते दिवा वा यदि वा निशि | शोकोपहततविज्ञाना नष्टसंज्ञा इवाभवन् ।। उन्होंने दिन अथवा रातमें न तो भोजन किया और न नींद ही ली; शोकके कारण उनका सारा विज्ञान आच्छादित हो गया था। वे सब-के-सब अचेत-से हो रहे थे। यदवस्था बभूवार्ता हायोध्या नगरी पुरा । रामे वन॑ गते दुःखादूधृतराज्ये सलक्ष्मणे ।। तदवस्थं बभूवार्तमद्येदं गजसाह्वयम् । गते पार्थे वनं दुःखादूधृतराज्ये सहानुजै: ।। जैसे त्रेतायुगमें राज्यका अपहरण हो जानेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीके वनमें चले जानेके बाद अयोध्या नगरी दुःखसे अत्यन्त आतुर हो बड़ी दुरवस्थाको पहुँच गयी थी, वही दशा राज्यके अपहरण हो जानेपर भाइयोंसहित युधिष्ठिरके वनमें चले जानेसे आज हमारे इस हस्तिनापुरकी हो गयी है। वैशम्पायन उवाच विदुरस्य वच: श्रुत्वा नागरस्य गिरं च वै । भूयो मुमोह शोकाच्च धृतराष्ट्र: सबान्धव: ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! विदुरका कथन और पुरवासियोंकी कही हुई बातें सुनकर बन्धु-बान्धवोंसहित राजा धृतराष्ट्र पुन: शोकसे मूर्च्छित हो गये। ततो दुर्योधन: कर्ण: शकुनिश्चापि सौबल: । द्रोणं द्वीपममन्यन्त राज्यं चास्मै न्न्यवेदयन्,तब दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिने द्रोणको अपना द्वीप (आश्रय) माना और सम्पूर्ण राज्य उनके चरणोंमें समर्पित कर दिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବିଦୁରଙ୍କ ବଚନ ଓ ନଗରବାସୀଙ୍କ ବିଲାପ ଶୁଣି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ବନ୍ଧୁବାନ୍ଧବ ସହିତ ଶୋକମୋହରେ ପୁନର୍ବାର ମୂର୍ଛିତ ହେଲେ। ତାପରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ, କର୍ଣ୍ଣ ଓ ସୁବଳପୁତ୍ର ଶକୁନି ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ ନିଜ ‘ଦ୍ୱୀପ’—ଅର୍ଥାତ୍ ନିରାପଦ ଆଶ୍ରୟ—ଭାବି ସମଗ୍ର ରାଜ୍ୟ ତାଙ୍କ ପାଦପଦ୍ମରେ ଅର୍ପଣ କରି ତାଙ୍କୁ ହସ୍ତାନ୍ତର କଲେ।
Verse 37
अथाब्रवीत् ततो द्रोणो दुर्योधनममर्षणम् । दुःशासनं च कर्ण च सवनिव च भारतान्,उस समय द्रोणाचार्यने अमर्षशील दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण तथा अन्य सब भरतवंशियोंसे कहा--
ତାହାପରେ ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟ କ୍ରୋଧପ୍ରବଣ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ, ଏବଂ ଦୁଃଶାସନ, କର୍ଣ୍ଣ ଓ ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ଭରତବଂଶୀ ରାଜକୁମାରମାନଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କରି କହିଲେ।
Verse 38
अवध्यान् पाण्डवान प्राहुर्देवपुत्रान् द्विजातय: । अहं वै शरण प्राप्तान् वर्तमानो यथाबलम्,'पाण्डव देवताओंके पुत्र हैं, अतः ब्राह्मणलोग उन्हें अवध्य बतलाते हैं। मैं यथाशक्ति सम्पूर्ण हृदयसे तुम्हारे अनुकूल प्रयत्न करता हुआ तुम्हारा साथ दूँगा। भक्तिपूर्वक अपनी शरणमें आये हुए इन राजाओंसहित धुृतराष्ट्रपुत्रोंका परित्याग करनेका साहस नहीं कर सकता। दैव ही सबसे प्रबल है
‘ପାଣ୍ଡବମାନେ ଦେବପୁତ୍ର; ତେଣୁ ଦ୍ୱିଜମାନେ ସେମାନଙ୍କୁ ଅବଧ୍ୟ ବୋଲି କହନ୍ତି। ଏବଂ ଯେମାନେ ଶରଣ ନେଇଛନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମୁଁ ଯଥାଶକ୍ତି ପ୍ରୟତ୍ନଶୀଳ ରହିବି।’
Verse 39
गन्ता सर्वात्मना भव्त्या धारत्तराष्ट्रानू सराजकान् । नोत्सहेयं परित्यक्तुं दैवं हि बलवत्तरम्,'पाण्डव देवताओंके पुत्र हैं, अतः ब्राह्मणलोग उन्हें अवध्य बतलाते हैं। मैं यथाशक्ति सम्पूर्ण हृदयसे तुम्हारे अनुकूल प्रयत्न करता हुआ तुम्हारा साथ दूँगा। भक्तिपूर्वक अपनी शरणमें आये हुए इन राजाओंसहित धुृतराष्ट्रपुत्रोंका परित्याग करनेका साहस नहीं कर सकता। दैव ही सबसे प्रबल है
‘ମୁଁ ସର୍ବାତ୍ମନା ତୁମ ସହିତ ଯିବି—ରାଜାମାନଙ୍କ ସହ ଧାର୍ତ୍ତରାଷ୍ଟ୍ରମାନଙ୍କୁ ଅନୁସରିବି। ଭକ୍ତିଭାବରେ ଶରଣ ନେଇଥିବାମାନଙ୍କୁ ପରିତ୍ୟାଗ କରିବାକୁ ମୋର ସାହସ ନାହିଁ; କାରଣ ଦୈବ ହିଁ ଅଧିକ ବଳବାନ।’
Verse 40
धर्मत: पाण्डुपुत्रा वै वनं गच्छन्ति निर्जिता: । ते च द्वादश वर्षाणि वने वत्स्यन्ति पाण्डवा:,'पाण्डव जूएमें पराजित होकर धर्मके अनुसार वनमें गये हैं। वे वहाँ बारह वर्षोतक रहेंगे
ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନେ ଜୁଆରେ ପରାଜିତ ହୋଇ ଧର୍ମାନୁସାରେ ବନକୁ ଯାଉଛନ୍ତି; ଏବଂ ସେହି ପାଣ୍ଡବମାନେ ସେଠାରେ ବାରୋ ବର୍ଷ ବସିବେ।
Verse 41
चरितब्रह्याचर्याश्च क्रोधामर्षवशानुगा: । वैरं निर्यातयिष्यन्ति महद् दुःखाय पाण्डवा:,“वनमें पूर्णरूपसे ब्रह्मचर्यका पालन करके जब वे क्रोध और अमर्षके वशीभूत हो यहाँ लौटेंगे, उस समय वैरका बदला अवश्य लेंगे। उनका वह प्रतीकार हमारे लिये महान् दुःखका कारण होगा
ବନରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟ ପାଳନ କରି, କ୍ରୋଧ ଓ ଅମର୍ଷର ବଶରେ ଯେତେବେଳେ ସେମାନେ ଏଠାକୁ ଫେରିବେ, ସେତେବେଳେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ନିଶ୍ଚୟ ଭାବେ ବୈରର ପ୍ରତିଶୋଧ ନେବେ। ସେହି ପ୍ରତିକାର ଆମ ପାଇଁ ମହାଦୁଃଖର କାରଣ ହେବ।
Verse 42
मया च भ्रंशितो राजन् द्रुपद: सखिवितग्रहे । पुत्रार्थभयजद् राजा वधाय मम भारत,“राजन! मैंने मैत्रीके विषयको लेकर कलह प्रारम्भ होनेपर राजा ट्रुपदको उनके राज्यसे भ्रष्ट किया था; भारत! इससे दुःखी होकर उन्होंने मेरे वधके लिये पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छासे एक यज्ञका आयोजन किया
ରାଜନ୍! ମିତ୍ରତାର ବିଷୟକୁ ନେଇ କଳହ ଉଠିଲାବେଳେ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ରାଜା ଦ୍ରୁପଦଙ୍କୁ ତାଙ୍କ ରାଜ୍ୟରୁ ଭ୍ରଷ୍ଟ କରିଥିଲି। ଭାରତ! ସେହି ଅପମାନରେ ଦୁଃଖିତ ଓ ଭୟଭୀତ ହୋଇ, ମୋ ବଧ ପାଇଁ ପୁତ୍ରଲାଭ ଇଚ୍ଛାରେ ସେ ଏକ ଯଜ୍ଞ କରାଇଥିଲେ।
Verse 43
याजोपयाजतपसा पुत्र लेभे स पावकात् । धृष्टद्रुम्न॑ द्रौोपदीं च वेदीमध्यात् सुमध्यमाम्
ୟାଜ ଓ ଉପୟାଜଙ୍କ ତପସ୍ୟାର ଫଳରେ ସେ ପାବକ (ଅଗ୍ନି) ଠାରୁ ପୁତ୍ର ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନକୁ ପାଇଲେ; ଏବଂ ବେଦୀର ମଧ୍ୟଭାଗରୁ ସୁମଧ୍ୟମା ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପାଇଲେ।
Verse 44
“याज और उपयाजकी तपस्यासे उन्होंने अग्निसे धृष्टद्युम्म और वेदीके मध्यभागसे सुन्दरी द्रौपदीको प्राप्त किया ।। धृष्टद्युम्नस्तु पार्थानां श्याल: सम्बन्धतो मतः । पाण्डवानां प्रियरतस्तस्मान्मां भयमाविशत्,'धृष्टद्युम्न तो सम्बन्धकी दृष्टिसे कुन्तीपुत्रोंका साला ही है, अतः सदा उनका प्रिय करनेमें लगा रहता है, उसीसे मुझे भय है”
ୟାଜ ଓ ଉପୟାଜଙ୍କ ତପସ୍ୟାରେ ସେ ଅଗ୍ନିଠାରୁ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନକୁ ଏବଂ ବେଦୀର ମଧ୍ୟଭାଗରୁ ସୁନ୍ଦରୀ ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କୁ ପାଇଲେ। ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ସମ୍ବନ୍ଧରେ ପାର୍ଥମାନଙ୍କ ଶ୍ୟାଳ ବୋଲି ଗଣ୍ୟ; ସେ ସଦା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରିୟକାର୍ଯ୍ୟରେ ରତ—ଏହି କାରଣରୁ ମୋତେ ଭୟ ଆବରଣ କଲା।
Verse 45
ज्वालावर्णो देवदत्तो धनुष्मान् कवची शरी । मर्त्यधर्मतया तस्मादद्य मे साध्वसो महान्,“उसके शरीरकी कान्ति अग्निकी ज्वालाके समान उद्धासित होती है। वह देवताका दिया हुआ पुत्र है और धनुष, बाण तथा कवचके साथ प्रकट हुआ है। मरणधर्मा मनुष्य होनेके कारण मुझे अब उससे महान् भय लगता है
ତାହାର ଦେହକାନ୍ତି ଅଗ୍ନିଜ୍ୱାଳା ପରି ଜ୍ୱଲିତ। ସେ ଦେବଦତ୍ତ; ଧନୁ, ବାଣ ଓ କବଚ ସହିତ ପ୍ରକଟ ହୋଇଛି। ତଥାପି ମରଣଧର୍ମୀ ମନୁଷ୍ୟ ହେବାରୁ, ଆଜି ତାହାକୁ ନେଇ ମୋର ମହାଭୟ ହୁଏ।
Verse 46
गतो हि पक्षतां तेषां पार्षत: परवीरहा । रथातिरथसंख्यायां यो5ग्रणीरजुनो युवा,शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न पाण्डवोंके पक्षका पोषक हो गया है। रथियों और अतिरथियोंकी गणनामें जिसका नाम सबसे पहले लिया जाता है, वह तरुण वीर अर्जुन धृष्टद्युम्नके लिये, यदि मेरे साथ उसका युद्ध हुआ तो, लड़कर प्राणतक देनेके लिये उद्यत हो जायगा। कौरवो! (अर्जुनके साथ मुझे लड़ना पड़े) इस पृथ्वीपर इससे बढ़कर महान् दुःख मेरे लिये और क्या हो सकता है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଶତ୍ରୁବୀର-ସଂହାରକ ପୃଷତପୁତ୍ର (ଦ୍ରୁପଦକୁମାର) ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ତାଙ୍କ ପକ୍ଷକୁ ଯାଇ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ମୁଖ୍ୟ ଆଶ୍ରୟ ହୋଇଛି। ଏବଂ ରଥୀ-ଅତିରଥୀଙ୍କ ଗଣନାରେ ଯାହାର ନାମ ସର୍ବପ୍ରଥମେ ନିଆଯାଏ ସେଇ ଯୁବବୀର ଅର୍ଜୁନ—ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନଙ୍କ କାରଣରେ ଯଦି ତାକୁ ମୋ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ପଡେ—ତେବେ ପ୍ରାଣ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପଣ କରି ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେବ। ହେ କୌରବମାନେ! ଏହି ପୃଥିବୀରେ ଅର୍ଜୁନ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ବାଧ୍ୟ ହେବାଠାରୁ ମୋ ପାଇଁ ଅଧିକ ଦୁଃଖ କ’ଣ?
Verse 47
सृष्टप्राणो भृशतरं तेन चेत् संगमो मम । किमन्यद् दुःखमधिकं परमं भुवि कौरवा:,शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न पाण्डवोंके पक्षका पोषक हो गया है। रथियों और अतिरथियोंकी गणनामें जिसका नाम सबसे पहले लिया जाता है, वह तरुण वीर अर्जुन धृष्टद्युम्नके लिये, यदि मेरे साथ उसका युद्ध हुआ तो, लड़कर प्राणतक देनेके लिये उद्यत हो जायगा। कौरवो! (अर्जुनके साथ मुझे लड़ना पड़े) इस पृथ्वीपर इससे बढ़कर महान् दुःख मेरे लिये और क्या हो सकता है?
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯଦି ତାଙ୍କ ସହ ମୋର ସଂଘର୍ଷ ହୁଏ, ସେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉଗ୍ରତାରେ ଯୁଦ୍ଧ କରିବ, ପ୍ରାଣ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପଣ ରଖିବ। ହେ କୌରବମାନେ! ଏହି ପୃଥିବୀରେ ଏହାଠାରୁ ବଡ଼, ଏହାଠାରୁ ଅସହ୍ୟ ଦୁଃଖ ମୋ ପାଇଁ ଆଉ କ’ଣ—ଏମିତି ଯୁଦ୍ଧକୁ ମୋତେ ବାଧ୍ୟ ହେବାକୁ ପଡୁଛି?
Verse 48
धृष्टद्युम्नो द्रोणमृत्युरिति विप्रथितं वच: । मद्वधाय श्रुतो5प्येष लोके चाप्यतिविश्रुत:,'धृष्टद्युम्न द्रोणकी मौत है, यह बात सर्वत्र फैल चुकी है। मेरे वधके लिये ही उसका जन्म हुआ है। यह भी सब लोगोंने सुन रखा है। धृष्टद्युम्न स्वयं भी संसारमें अपनी वीरताके लिये विख्यात है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ‘ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ହେଉଛି ଦ୍ରୋଣଙ୍କ ମୃତ୍ୟୁ’—ଏହି କଥା ସର୍ବତ୍ର ପ୍ରଚାରିତ ହୋଇଛି। ସେ ମୋ ବଧ ପାଇଁ ହିଁ ଜନ୍ମିଛି ବୋଲି ମଧ୍ୟ ଲୋକେ ଶୁଣିରଖିଛନ୍ତି; ଏହା ଲୋକମଧ୍ୟରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସିଦ୍ଧ। ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ନିଜେ ମଧ୍ୟ ନିଜ ପରାକ୍ରମ ପାଇଁ ଜଗତରେ ଖ୍ୟାତ।
Verse 49
सो<यं नूनमनुप्राप्तस्त्वत्कृते काल उत्तम: । त्वरितं कुरुत श्रेयो नैतदेतावता कृतम्,“तुम्हारे लिये यह निश्चय ही बहुत उत्तम अवसर प्राप्त हुआ है। शीघ्र ही अपने कल्याण-साधनमें लग जाओ। पाण्डवोंको वनवास दे देनेमात्रसे तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध नहीं हो सकता
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତୁମମାନଙ୍କ ପାଇଁ ନିଶ୍ଚୟ ଏହି ଉତ୍ତମ ସମୟ ଆସିପହଞ୍ଚିଛି। ଯାହା ସତ୍ୟସତ୍ୟ ଶ୍ରେୟସ୍କର, ତାହା ଶୀଘ୍ର କର। କେବଳ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ବନବାସକୁ ପଠାଇଦେବା ମାତ୍ରରେ ତୁମ ଅଭିଷ୍ଟ ସିଦ୍ଧ ହେବ ନାହିଁ।
Verse 50
मुहूर्त सुखमेवैतत् तालच्छायेव हैमनी । यजध्वं च महायज्ञजैभोंगानश्रीत दत्त च
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଏହି ସୁଖ ମାତ୍ର କ୍ଷଣିକ; ହେମନ୍ତକାଳରେ ତାଳଗଛର ଛାୟା ପରି ଅସ୍ଥାୟୀ। ତେଣୁ ମହାଯଜ୍ଞ କର, ନିଜ ଭାଗ୍ୟର ଭୋଗ ଉପଭୋଗ କର, ଏବଂ ଦାନ ମଧ୍ୟ ଦିଅ।
Verse 51
इतश्नतुर्दशे वर्षे महत् प्राप्पस्पथ वैशसम् | “यह राज्य तुमलोगोंके लिये शीतकालमें होनेवाली ताड़के पेड़की छायाके समान दो ही घड़ीतक सुख देनेवाला है। अब तुम बड़े-बड़े यज्ञ करो, मनमाने भोग भोगो और इच्छानुसार दान कर लो। आजसे चौदहवें वर्षमें तुम्हें बहुत बड़ी मार-काटका सामना करना पड़ेगा" || ५० ई || द्रोणस्य वचन श्रुत्वा धृतराष्ट्रोडब्रवीदिदम्,द्रोणाचार्यकी यह बात सुनकर धुृतराष्ट्रने कहा--
“ଆଜିଠାରୁ ଚତୁର୍ଦ୍ଦଶ ବର୍ଷରେ ତୁମେ ମହା ବୈଷମ୍ୟ—ଭୟଙ୍କର ହତ୍ୟାକାଣ୍ଡ—ର ସମ୍ମୁଖୀନ ହେବ। ଏହି ରାଜ୍ୟ ତୁମ ପାଇଁ ଶୀତକାଳରେ ତାଳଗଛର ଛାୟା ପରି—ମାତ୍ର ଦୁଇ ଘଡ଼ି ସୁଖ ଦେଇଥାଏ। ତେଣୁ ଯେତେଦିନ ସମୟ ଅଛି, ବଡ଼ ବଡ଼ ଯଜ୍ଞ କର, ଇଚ୍ଛାମତେ ଭୋଗ କର, ଏବଂ ମନମତେ ଦାନ କର; କାରଣ ଆଜିଠାରୁ ଚତୁର୍ଦ୍ଦଶ ବର୍ଷରେ ତୁମ ସାମ୍ନାରେ ଘୋର ଓ ବିଶାଳ ସଂଘର୍ଷ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେବ।” ଦ୍ରୋଣଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—
Verse 52
सम्यगाह गुरु: क्षत्तरुपावर्तय पाण्डवान् | यदि ते न निवर्तन्ते सत्कृता यान्तु पाण्डवा: | सशस्त्ररथपादाता भोगवन्तश्न पुत्रका:,“विदुर! गुरु द्रोणाचार्यने ठीक कहा है। तुम पाण्डवोंको लौटा लाओ। यदि वे न लौटें तो वे अस्त्र-शस्त्रोंसे युक्त रथियों और पैदल सेनाओंसे सुरक्षित और भोग-सामग्रीसे सम्पन्न हो सत्कारपूर्वक वनमें भ्रमणके लिये जाया; क्योंकि वे भी मेरे पुत्र ही हैं'
“ଗୁରୁ ଠିକ୍ କହିଛନ୍ତି। ହେ କ୍ଷତ୍ତା (ବିଦୁର)! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଫେରାଇ ଆଣ। ଯଦି ସେମାନେ ଫେରନ୍ତି ନାହିଁ, ତେବେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ସତ୍କାରସହିତ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରୁନ୍ତୁ—ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ରସଜ୍ଜିତ ରଥୀ ଓ ପଦାତି ସେନା ଦ୍ୱାରା ସୁରକ୍ଷିତ, ଏବଂ ଭୋଗ-ସାମଗ୍ରୀରେ ସମ୍ପନ୍ନ; କାରଣ ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ମୋର ପୁତ୍ର।”
Verse 79
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें द्रौपदीकुन्तीसंवादविषयक उनासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଦ୍ରୌପଦୀ–କୁନ୍ତୀ ସଂବାଦବିଷୟକ ଏକୋଣାଶୀତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 80
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि विदुरधृतराष्ट्रद्रोणवाक्ये अशीतितमोड<ध्याय:
ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ବିଦୁର–ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର–ଦ୍ରୋଣବାକ୍ୟବିଷୟକ ଅଶୀତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।
Verse 146
चिकीर्षन् कर्म शत्रुभ्यो बाहुद्रव्यानुरूपत: । इसीलिये वे अपनी विशाल भुजाओंकी ओर देखते हुए यात्रा करते हैं। राजन्! अपने बाहुबलरूपी वैभवपर उन्हें गर्व है। अतः वे अपनी दोनों भुजाएँ दिखाते हुए शत्रुओंसे बदला लेनेके लिये अपने बाहुबलके अनुरूप ही पराक्रम करना चाहते हैं
“ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ବିରୋଧରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରି, ସେମାନେ ନିଜ ବାହୁବଳ-ବୈଭବ ଅନୁରୂପ ଭାବେ ଅଗ୍ରସର ହୁଅନ୍ତି। ତେଣୁ ସେମାନେ ନିଜ ବିଶାଳ ଭୁଜାଦ୍ୱୟକୁ ଦେଖିଦେଖି ଯାତ୍ରା କରନ୍ତି। ରାଜନ! ବାହୁବଳରୂପ ବୈଭବ ଉପରେ ସେମାନଙ୍କର ଗର୍ବ ଅଛି; ଏହିହେତୁ ଦୁଇ ଭୁଜା ପ୍ରଦର୍ଶନ କରି, ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ପ୍ରତିଶୋଧ ଦେବା ପାଇଁ ନିଜ ଶକ୍ତିଅନୁରୂପ ପରାକ୍ରମ କରିବାକୁ ସେମାନେ ଚାହାନ୍ତି।”