Adhyaya 7
Sabha ParvaAdhyaya 733 Verses

Adhyaya 7

Śakrasya Divyā Sabhā (Indra’s Radiant Assembly Hall)

Upa-parva: Śakra-sabhā-varṇana (Description of Indra’s Assembly Hall)

Nārada describes Śakra’s celestial sabhā as a divinely luminous structure, fashioned by Indra himself and characterized by extraordinary scale and mobility. The hall is portrayed as free from decay, grief, fatigue, and danger, and adorned with seats, mansions, and divine trees. Indra sits on the supreme seat accompanied by Śacī (Indrāṇī) and personified prosperity (Śrī/Lakṣmī), while attendants and hosts—Maruts, Siddhas, Devarṣis, Sādhyas, and other divine collectives—continuously honor him. The chapter enumerates a wide range of sages and cosmic functionaries (including artisans and personified abstractions such as Śraddhā, Medhā, Sarasvatī, Artha, Dharma, Kāma, and Vidyut), alongside natural forces and ritual constituents (yajñas, dakṣiṇās, mantras). Apsarases and Gandharvas entertain through music, dance, and performance, while eminent teachers (Bṛhaspati and Śukra) arrive, and many others travel in radiant vimānas. The section closes with Nārada’s attestation that he has witnessed this hall and signals a transition to describing another quarter (the southern direction), indicating a cataloguing sequence of celestial assemblies.

Chapter Arc: नारद मुनि धृतराष्ट्र-पुत्रों के वैभव-गर्व को छूते हुए युधिष्ठिर से कहते हैं—हे कौरव्य, मैंने शक्र (इन्द्र) की दिव्य सभा अपनी आँखों से देखी है, जो सूर्य-समान प्रभा को भी जीत लेने वाली है। → सभा का विस्तार, उसकी वैहायसी (आकाशगामी) प्रकृति, और वहाँ से जरा-शोक-क्लम का निषेध—ये सब वर्णन धीरे-धीरे एक ऐसी परिपूर्णता रचते हैं जो पृथ्वी के राजवैभव को तुच्छ ठहराती है। फिर सिद्ध, देवर्षि, साध्य, मरुत्-गण, गन्धर्व-अप्सराएँ और असंख्य ऋषियों की उपस्थिति का क्रमशः उद्घाटन उस दिव्य दरबार की ‘अप्राप्य’ ऊँचाई को और तीव्र करता है। → नारद इन्द्रसभा के चरम वैभव का चित्र खींचते हैं—कमल-मालाओं से सुशोभित पुष्कर-मालिनी सभा में देवर्षि शोक-ज्वर-रहित हैं, और अप्सराएँ-गन्धर्व नृत्य, वाद्य, गीत, हास्य तथा स्तुति-मंगलपाठ से वृत्रहन्ता इन्द्र का मनोरंजन करते हैं; यह दृश्य दिव्य सत्ता, सौंदर्य और विजय-गौरव का शिखर बन जाता है। → वर्णन एक स्थिर निष्कर्ष पर टिकता है—इन्द्र की सभा केवल भवन नहीं, कर्म-निर्मित दिव्यता का प्रतीक है: जहाँ भय, थकावट, शोक, जरा का प्रवेश नहीं; जहाँ देव-समाज और ऋषि-समाज एक साथ उपस्थित होकर देवराज की महिमा को पुष्ट करते हैं। → नारद संकेत देते हैं कि इन्द्रसभा के बाद वे यम की सभा का भी वर्णन सुनाएँगे—‘याम्यामपि सभां शृणु’।

Shlokas

Verse 1

/ ऑपन-- माल छा -जडि सप्तमो<्ध्याय: इन्द्रसभाका वर्णन नारद उवाच शक्रस्य तु सभा दिव्या भास्वरा कर्मनिर्मिता । स्वयं शक्रेण कौरव्य निर्जितार्कसमप्रभा,नारदजी कहते हैं--कुरुनन्दन! इन्द्रकी तेजोमयी दिव्य सभा सूर्यके समान प्रकाशित होती है। (विश्वकर्माके) प्रयत्नोंसे उसका निर्माण हुआ है। स्वयं इन्द्रने (सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके) उसपर विजय पायी है

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ କୌରବକୁଳନନ୍ଦନ! ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଦିବ୍ୟ ସଭା ତେଜୋମୟ, କୁଶଳ ଶିଳ୍ପରେ ନିର୍ମିତ। ସେ ସୂର୍ଯ୍ୟସମ ପ୍ରଭାରେ ଦୀପ୍ତ; ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ର ନିଜ ପୁଣ୍ୟ-ପରାକ୍ରମରେ ତାହାକୁ ଜୟ କରି ଅଧିଷ୍ଠିତ କରିଛନ୍ତି।

Verse 2

विस्तीर्णा योजनशतं शतमध्यर्धमायता । वैहायसी कामगमा पञ्चयोजनमुच्छिता,उसकी लंबाई डेढ़ सौ और चौड़ाई सौ योजनकी है। वह आकाशगमें विचरनेवाली और इच्छाके अनुसार तीव्र या मन्द गतिसे चलनेवाली है। उसकी ऊँचाई भी पाँच योजनकी है

ତାହାର ପ୍ରସ୍ଥ ଶତ ଯୋଜନ ଏବଂ ଦୀର୍ଘତା ଶତାଧିକ ପଞ୍ଚାଶ (ଦେଢଶ) ଯୋଜନ। ସେ ଆକାଶମାର୍ଗେ ବିଚରେ ଓ ଆରୋହୀର ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ତୀବ୍ର କିମ୍ବା ମନ୍ଦ ଗତିରେ ଚାଲେ। ତାହାର ଉଚ୍ଚତା ପାଞ୍ଚ ଯୋଜନ।

Verse 3

जराशोकक्लमापेता निरातड्का शिवा शुभा । वेश्मासनवती रम्या दिव्यपादपशोभिता,उसमें जीर्णता, शोक और थकावट आदिका प्रवेश नहीं है। वहाँ भय नहीं है, वह मंगलमयी और शोभासम्पन्न है। उसमें ठहरनेके लिये सुन्दर-सुन्दर महल और बैठनेके लिये उत्तमोत्तम सिंहासन बने हुए हैं। वह रमणीय सभा दिव्य वृक्षोंसे सुशोभित होती है

ସେଠାରେ ଜରା, ଶୋକ ଓ କ୍ଲମ (କ୍ଲାନ୍ତି)ର ପ୍ରବେଶ ନାହିଁ। ସେ ଭୟରହିତ, ମଙ୍ଗଳମୟ ଓ ଶୋଭାସମ୍ପନ୍ନ। ରହିବାକୁ ସୁନ୍ଦର ପ୍ରାସାଦ ଏବଂ ବସିବାକୁ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସିଂହାସନ ଅଛି; ଏବଂ ସେଇ ରମଣୀୟ ସଭା ଦିବ୍ୟ ବୃକ୍ଷମାନଙ୍କରେ ସୁଶୋଭିତ।

Verse 4

तस्यां देवेश्वर: पार्थ सभायां परमासने । आस्ते शच्या महेन्द्राण्या श्रिया लक्ष्म्या च भारत,भारत! कुन्तीनन्दन! उस सभामें सर्वश्रेष्ठ सिंहासनपर देवराज इन्द्र शोभामें लक्ष्मीके समान प्रतीत होनेवाली इन्द्राणी शचीके साथ विराजते हैं

ହେ ଭାରତ, ହେ ପାର୍ଥ! ସେଇ ସଭାର ପରମାସନରେ ଦେବେଶ୍ୱର ଇନ୍ଦ୍ର ମହେନ୍ଦ୍ରାଣୀ ଶଚୀଙ୍କ ସହ ଆସୀନ—ଶଚୀ ଶ୍ରୀଲକ୍ଷ୍ମୀ ସମ ଶୋଭାମୟୀ ଦିଶନ୍ତି।

Verse 5

बिश्रद्‌ वपुरनिर्देश्यं किरीटी लोहिताड़द: । विरजोअम्बरकश्षित्रमाल्यो ह्वीकीर्तिद्युतिभि: सह,उस समय वे अवर्णनीय रूप धारण करते हैं। उनके मस्तकपर किरीट रहता है और दोनों भुजाओंमें लाल रंगके बाजूबंद शोभा पाते हैं। उनके शरीरपर स्वच्छ वस्त्र और कण्ठमें विचित्र माला सुशोभित होती है। वे लज्जा, कीर्ति और कान्ति--इन देवियोंके साथ उस दिव्य सभामें विराजमान होते हैं

ସେ ସମୟରେ ତାଙ୍କର ରୂପ ଅବର୍ଣ୍ଣନୀୟ ଭାବେ ଦୀପ୍ତ ହୁଏ। ମସ୍ତକରେ କିରୀଟ, ଭୁଜାରେ ଲାଲ ଅଙ୍ଗଦ, ଦେହରେ ନିର୍ମଳ ବସ୍ତ୍ର ଏବଂ କଣ୍ଠରେ ବିଚିତ୍ର ମାଳା ଶୋଭା ପାଏ। ସେଇ ଦିବ୍ୟ ସଭାରେ ସେ ହ୍ରୀ, କୀର୍ତ୍ତି ଓ ଦ୍ୟୁତି—ଏହି ଦେବୀମାନଙ୍କ ସହ ବିରାଜିତ।

Verse 6

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापवके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें युधिष्ठिरकी दिव्य सभाओंके विषयमें जिज्ञासाविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ,तस्यामुपासते नित्यं महात्मानं शतक्रतुम्‌ । मरुतः सर्वशो राजन्‌ सर्वे च गृहमेधिन: राजन! उस दिव्य सभामें सभी मरुदगण और गृहवासी देवता सौ यज्ञोंका अनुष्ठान पूर्ण कर लेनेवाले महात्मा इन्द्रकी प्रतिदिन सेवा करते हैं

ହେ ରାଜନ୍! ସେଇ ଦିବ୍ୟ ସଭାଗୃହରେ ସମସ୍ତ ମରୁତଗଣ ଓ ଗୃହମେଧିନ (ଗୃହବାସୀ) ଦେବତାମାନେ ଶତଯଜ୍ଞକର୍ତ୍ତା ମହାତ୍ମା ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ପ୍ରତିଦିନ ସେବା-ଉପାସନା କରନ୍ତି।

Verse 7

सिद्धा देवर्षयश्नेव साध्या देवगणास्तथा । मरुत्वन्तश्न॒ सहिता भास्वन्तो हेममालिन:,सिद्ध, देवर्षि, साध्यदेवगणण तथा मरुत्वानू--ये सभी सुवर्णमालाओंसे सुशोभित हो तेजस्वी रूप धारण किये एक साथ उस दिव्य सभामें बैठकर शत्रुदमन महामना देवराज इन्द्रकी उपासना करते हैं। वे सभी देवता अपने अनुचरों (सेवकों)-के साथ वहाँ विराजमान होते हैं। वे दिव्यरूपधारी होनेके साथ ही उत्तमोत्तम अलंकारोंसे अलंकृत रहते हैं इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकसभाख्यानपर्वणि इन्द्रसभावर्णनं नाम सप्तमो5ध्याय:

ସେଠାରେ ସିଦ୍ଧମାନେ, ଦେବର୍ଷିମାନେ, ସାଧ୍ୟଦେବଗଣ ଓ ଅନ୍ୟ ଦେବସମୂହ, ଏବଂ ମରୁତଗଣ—ସମେତ ଏକତ୍ର ସମବେତ, ଦୀପ୍ତିମାନ, ସୁବର୍ଣ୍ଣମାଳାରେ ଶୋଭିତ—ସେଇ ଦିବ୍ୟ ସଭାରେ ଆସୀନ। ସେମାନେ ଶତ୍ରୁଦମନ ମହାମନା ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି; ସମସ୍ତେ ନିଜ ଅନୁଚରମାନଙ୍କ ସହ, ଦିବ୍ୟରୂପଧାରୀ ଓ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅଳଙ୍କାରରେ ଅଳଙ୍କୃତ।

Verse 8

एते सानुचरा: सर्वे दिव्यरूपा: स्वलंकृता: । उपासते महात्मानं देवराजमरिंदमम्‌,सिद्ध, देवर्षि, साध्यदेवगणण तथा मरुत्वानू--ये सभी सुवर्णमालाओंसे सुशोभित हो तेजस्वी रूप धारण किये एक साथ उस दिव्य सभामें बैठकर शत्रुदमन महामना देवराज इन्द्रकी उपासना करते हैं। वे सभी देवता अपने अनुचरों (सेवकों)-के साथ वहाँ विराजमान होते हैं। वे दिव्यरूपधारी होनेके साथ ही उत्तमोत्तम अलंकारोंसे अलंकृत रहते हैं

ଏହି ସମସ୍ତେ ନିଜ ଅନୁଚରମାନଙ୍କ ସହ, ଦିବ୍ୟରୂପଧାରୀ ଓ ସୁନ୍ଦର ଅଳଙ୍କାରରେ ଅଳଙ୍କୃତ ହୋଇ, ଶତ୍ରୁଦମନ ମହାତ୍ମା ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି।

Verse 9

तथा देवर्षय: सर्वे पार्थ शक्रमुपासते । अमला धूतपाप्मानो दीप्यमाना इवाग्नय:,कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार जिनके पाप धुल गये हैं, वे अग्निके समान उद्दीप्त होनेवाले सभी निर्मल देवर्षि वहाँ इन्द्रकी उपासना करते हैं

ହେ ପାର୍ଥ! ସେହିପରି ପାପରହିତ, ପାପଧୂତ ଓ ଅଗ୍ନିସମ ଦୀପ୍ତିମାନ ସମସ୍ତ ନିର୍ମଳ ଦେବର୍ଷିମାନେ ସେଠାରେ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି।

Verse 10

पराशर: पर्वतश्न॒ तथा सावर्णिगालवौ,पराशर, पर्वत, सावर्णि, गालव, शंख, लिखित, गौरशिरा मुनि, दुर्वासा, क्रोधन, श्येन, दीर्घतमा मुनि, पवित्रपाणि, सावर्णि (द्वितीय), याज्ञवल्क्य, भालुकि, उद्दालक, श्वेतकेतु, ताण्ड्य, भाण्डायनि, हविष्मान्‌, गरिष्ठ, राजा हरिश्वन्द्र, हृद्य, उदरशाण्डिल्य, पराशरनन्दन व्यास, कृषीवल, वातस्कन्ध, विशाख, विधाता, काल, करालदन्त, त्वष्टा, विश्वकर्मा तथा तुम्बुरु--ये और दूसरे अयोनिज या योनिज मुनि एवं वायु पीकर रहनेवाले तथा हविष्य- पदार्थोंको खानेवाले महर्षि सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर वज्रधारी इन्द्रकी उपासना करते हैं

ପରାଶର, ପର୍ବତ, ସାବର୍ଣ୍ଣି ଓ ଗାଲବ; ଶଙ୍ଖ, ଲିଖିତ ଏବଂ ଗୌରଶିରା ମୁନି; ଦୁର୍ବାସା, କ୍ରୋଧନ, ଶ୍ୟେନ ଓ ଦୀର୍ଘତମା ମୁନି; ପବିତ୍ରପାଣି; ଦ୍ୱିତୀୟ ସାବର୍ଣ୍ଣି; ଯାଜ୍ଞବଲ୍କ୍ୟ; ଭାଲୁକି; ଉଦ୍ଦାଳକ ଓ ଶ୍ୱେତକେତୁ; ତାଣ୍ଡ୍ୟ ଓ ଭାଣ୍ଡାୟନି; ହବିଷ୍ମାନ୍ ଓ ଗରିଷ୍ଠ; ରାଜା ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ର; ହୃଦ୍ୟ; ଉଦରଶାଣ୍ଡିଲ୍ୟ; ପରାଶରନନ୍ଦନ ବ୍ୟାସ; କୃଷୀବଳ; ବାତସ୍କନ୍ଧ; ବିଶାଖ; ବିଧାତା; କାଳ; କରାଳଦନ୍ତ; ତ୍ୱଷ୍ଟା; ବିଶ୍ୱକର୍ମା ଏବଂ ତୁମ୍ବୁରୁ—ଏମାନେ ଓ ଅନ୍ୟ ଅନେକ ମହର୍ଷି, ଅୟୋନିଜ ହେଉନ୍ତୁ କି ଯୋନିଜ, ବାୟୁଭକ୍ଷ ହେଉନ୍ତୁ କି ହବିଷ୍ୟାଶନ—ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କ ଅଧୀଶ୍ୱର ବଜ୍ରପାଣି ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି।

Verse 11

शड्खश्न लिखितश्चैव तथा गौरशिरा मुनि: । दुर्वासा: क्रोधन: श्येनस्तथा दीर्घतमा मुनि:,पराशर, पर्वत, सावर्णि, गालव, शंख, लिखित, गौरशिरा मुनि, दुर्वासा, क्रोधन, श्येन, दीर्घतमा मुनि, पवित्रपाणि, सावर्णि (द्वितीय), याज्ञवल्क्य, भालुकि, उद्दालक, श्वेतकेतु, ताण्ड्य, भाण्डायनि, हविष्मान्‌, गरिष्ठ, राजा हरिश्वन्द्र, हृद्य, उदरशाण्डिल्य, पराशरनन्दन व्यास, कृषीवल, वातस्कन्ध, विशाख, विधाता, काल, करालदन्त, त्वष्टा, विश्वकर्मा तथा तुम्बुरु--ये और दूसरे अयोनिज या योनिज मुनि एवं वायु पीकर रहनेवाले तथा हविष्य- पदार्थोंको खानेवाले महर्षि सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर वज्रधारी इन्द्रकी उपासना करते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ଶଙ୍ଖ ଓ ଲିଖିତ, ଏବଂ ଗୌରଶିରା ମୁନି; ଦୁର୍ବାସା, କ୍ରୋଧନ, ଶ୍ୟେନ ଓ ଦୀର୍ଘତମା ମୁନି—ଏମାନେ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅନେକ ଋଷି, କେହି ଅୟୋନିଜ, କେହି ଯୋନିଜ; କେହି ବାୟୁଭକ୍ଷ, କେହି ହବିଷ୍ୟାଶୀ—ସମସ୍ତ ଲୋକର ଅଧୀଶ୍ୱର ବଜ୍ରଧାରୀ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି।

Verse 12

पवित्रपाणि: सावर्णियाज्ञवल्क्यो5थ भालुकि: । उद्दालक: श्वेतकेतुस्ताण्ड्यो भाण्डायनिस्तथा,पराशर, पर्वत, सावर्णि, गालव, शंख, लिखित, गौरशिरा मुनि, दुर्वासा, क्रोधन, श्येन, दीर्घतमा मुनि, पवित्रपाणि, सावर्णि (द्वितीय), याज्ञवल्क्य, भालुकि, उद्दालक, श्वेतकेतु, ताण्ड्य, भाण्डायनि, हविष्मान्‌, गरिष्ठ, राजा हरिश्वन्द्र, हृद्य, उदरशाण्डिल्य, पराशरनन्दन व्यास, कृषीवल, वातस्कन्ध, विशाख, विधाता, काल, करालदन्त, त्वष्टा, विश्वकर्मा तथा तुम्बुरु--ये और दूसरे अयोनिज या योनिज मुनि एवं वायु पीकर रहनेवाले तथा हविष्य- पदार्थोंको खानेवाले महर्षि सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर वज्रधारी इन्द्रकी उपासना करते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ପବିତ୍ରପାଣି, ସାବର୍ଣ୍ଣି, ଯାଜ୍ଞବଲ୍କ୍ୟ ଓ ଭାଲୁକି; ଏବଂ ଉଦ୍ଦାଲକ, ଶ୍ୱେତକେତୁ, ତାଣ୍ଡ୍ୟ ଓ ଭାଣ୍ଡାୟନି—ଏମାନେ ଓ ଅନ୍ୟ ମହର୍ଷିମାନେ ସମସ୍ତ ଲୋକର ଅଧୀଶ୍ୱର ବଜ୍ରଧାରୀ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି।

Verse 13

हविष्मांश्न गरिष्ठश्न॒ हरिश्रन्द्रश्न पार्थिव: | हृद्यश्नोदरशाण्डिल्य: पाराशर्य: कृषीवल:,पराशर, पर्वत, सावर्णि, गालव, शंख, लिखित, गौरशिरा मुनि, दुर्वासा, क्रोधन, श्येन, दीर्घतमा मुनि, पवित्रपाणि, सावर्णि (द्वितीय), याज्ञवल्क्य, भालुकि, उद्दालक, श्वेतकेतु, ताण्ड्य, भाण्डायनि, हविष्मान्‌, गरिष्ठ, राजा हरिश्वन्द्र, हृद्य, उदरशाण्डिल्य, पराशरनन्दन व्यास, कृषीवल, वातस्कन्ध, विशाख, विधाता, काल, करालदन्त, त्वष्टा, विश्वकर्मा तथा तुम्बुरु--ये और दूसरे अयोनिज या योनिज मुनि एवं वायु पीकर रहनेवाले तथा हविष्य- पदार्थोंको खानेवाले महर्षि सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर वज्रधारी इन्द्रकी उपासना करते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ହବିଷ୍ମାନ, ଗରିଷ୍ଠ, ରାଜା ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ର, ହୃଦ୍ୟ, ଉଦର-ଶାଣ୍ଡିଲ୍ୟ, ପାରାଶର୍ୟ (ବ୍ୟାସ) ଓ କୃଷୀବଲ—ଏମାନେ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅନେକ ମୁନି, କେହି ଅୟୋନିଜ, କେହି ଯୋନିଜ; କେହି ବାୟୁଭକ୍ଷ, କେହି ହବିଷ୍ୟାଶୀ—ସମସ୍ତ ଲୋକର ଅଧୀଶ୍ୱର ବଜ୍ରଧାରୀ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି।

Verse 14

वातस्कन्धो विशाखशक्ष विधाता काल एव च | करालदन्तस्त्वष्टा च विश्वकर्मा च तुम्बुरु:,पराशर, पर्वत, सावर्णि, गालव, शंख, लिखित, गौरशिरा मुनि, दुर्वासा, क्रोधन, श्येन, दीर्घतमा मुनि, पवित्रपाणि, सावर्णि (द्वितीय), याज्ञवल्क्य, भालुकि, उद्दालक, श्वेतकेतु, ताण्ड्य, भाण्डायनि, हविष्मान्‌, गरिष्ठ, राजा हरिश्वन्द्र, हृद्य, उदरशाण्डिल्य, पराशरनन्दन व्यास, कृषीवल, वातस्कन्ध, विशाख, विधाता, काल, करालदन्त, त्वष्टा, विश्वकर्मा तथा तुम्बुरु--ये और दूसरे अयोनिज या योनिज मुनि एवं वायु पीकर रहनेवाले तथा हविष्य- पदार्थोंको खानेवाले महर्षि सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर वज्रधारी इन्द्रकी उपासना करते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ବାତସ୍କନ୍ଧ, ବିଶାଖ, ବିଧାତା ଓ କାଳ; କରାଳଦନ୍ତ, ତ୍ୱଷ୍ଟା, ବିଶ୍ୱକର୍ମା ଏବଂ ତୁମ୍ବୁରୁ—ଏମାନେ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅନେକ ମୁନି ସମସ୍ତ ଲୋକର ଅଧୀଶ୍ୱର ବଜ୍ରଧାରୀ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି।

Verse 15

अयोनिजा योनिजाश्व वायुभक्षा हुताशिन: । ईशानं सर्वलोकस्य वज्िणं समुपासते,पराशर, पर्वत, सावर्णि, गालव, शंख, लिखित, गौरशिरा मुनि, दुर्वासा, क्रोधन, श्येन, दीर्घतमा मुनि, पवित्रपाणि, सावर्णि (द्वितीय), याज्ञवल्क्य, भालुकि, उद्दालक, श्वेतकेतु, ताण्ड्य, भाण्डायनि, हविष्मान्‌, गरिष्ठ, राजा हरिश्वन्द्र, हृद्य, उदरशाण्डिल्य, पराशरनन्दन व्यास, कृषीवल, वातस्कन्ध, विशाख, विधाता, काल, करालदन्त, त्वष्टा, विश्वकर्मा तथा तुम्बुरु--ये और दूसरे अयोनिज या योनिज मुनि एवं वायु पीकर रहनेवाले तथा हविष्य- पदार्थोंको खानेवाले महर्षि सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर वज्रधारी इन्द्रकी उपासना करते हैं

ଅୟୋନିଜ ଓ ଯୋନିଜ, ବାୟୁଭକ୍ଷ ଓ ହବିଷ୍ୟାଶୀ—ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ସମସ୍ତ ଲୋକର ଅଧୀଶ୍ୱର ବଜ୍ରଧାରୀ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି।

Verse 16

सहदेव: सुनीथश्च वाल्मीकिश्न महातपा: । शमीकः: सत्यवाक्‌ चैव प्रचेता: सत्यसंगर:,भरतवंशी नरेश पाण्डुनन्दन! सहदेव, सुनीथ, महातपस्वी वाल्मीकि, सत्यवादी शमीक, सत्यप्रतिज्ञ प्रचेता, मेधातिथि, वामदेव, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरुत्त, मरीचि, महातपस्वी स्थाणु, कक्षीवान्‌, गौतम, तार्क्ष्य, वैश्वानर मुनि, षडर्तु, कवष, धूम्र, रैभ्य, नल, परावसु, स्वस्त्यात्रेय, जरत्कारु, कहोल, काश्यप, विभाण्डक, ऋष्यशृंग, उन्मुख, विमुख, कालकवृक्षीय मुनि, आश्राव्य, हिरण्मय, संवर्त, देवहव्य, पराक्रमी विष्वक्सेन, कण्व, कात्यायन, गार्ग्य, कौशिक, दिव्य जल, ओषधियाँ, श्रद्धा, मेधा, सरस्वती, अर्थ, धर्म, काम, विद्युत, जलधर मेघ, वायु, गर्जना करनेवाले बादल, प्राची दिशा, यज्ञके हविष्यको वहन करनेवाले सत्ताईस पावक,- सम्मिलित अग्नि और सोम, संयुक्त इन्द्र और अग्नि, मित्र, सविता, अर्यमा, भग, विश्वेदेव, साध्य, बृहस्पति, शुक्र, विश्वावसु, चित्रसेन, सुमन, तरुण, विविध यज्ञ, दक्षिणा, ग्रह, तारा और यज्ञनिर्वाहक मन्त्र--ये सभी वहाँ इन्द्रसभामें बैठते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସଭାରେ ସହଦେବ ଓ ସୁନୀଥ, ମହାତପସ୍ବୀ ବାଲ୍ମୀକି, ସତ୍ୟବାଦୀ ଶମୀକ ଏବଂ ସତ୍ୟପ୍ରତିଜ୍ଞ ପ୍ରଚେତା—ଏ ସମସ୍ତେ ସେଠାରେ ଆସୀନ ଥିଲେ।

Verse 17

मेधातिथिवईामदेव: पुलस्त्य: पुलह: क्रतुः । मरुत्तश्न मरीचिश्व स्थाणुश्चात्र महातपा:,भरतवंशी नरेश पाण्डुनन्दन! सहदेव, सुनीथ, महातपस्वी वाल्मीकि, सत्यवादी शमीक, सत्यप्रतिज्ञ प्रचेता, मेधातिथि, वामदेव, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरुत्त, मरीचि, महातपस्वी स्थाणु, कक्षीवान्‌, गौतम, तार्क्ष्य, वैश्वानर मुनि, षडर्तु, कवष, धूम्र, रैभ्य, नल, परावसु, स्वस्त्यात्रेय, जरत्कारु, कहोल, काश्यप, विभाण्डक, ऋष्यशृंग, उन्मुख, विमुख, कालकवृक्षीय मुनि, आश्राव्य, हिरण्मय, संवर्त, देवहव्य, पराक्रमी विष्वक्सेन, कण्व, कात्यायन, गार्ग्य, कौशिक, दिव्य जल, ओषधियाँ, श्रद्धा, मेधा, सरस्वती, अर्थ, धर्म, काम, विद्युत, जलधर मेघ, वायु, गर्जना करनेवाले बादल, प्राची दिशा, यज्ञके हविष्यको वहन करनेवाले सत्ताईस पावक,- सम्मिलित अग्नि और सोम, संयुक्त इन्द्र और अग्नि, मित्र, सविता, अर्यमा, भग, विश्वेदेव, साध्य, बृहस्पति, शुक्र, विश्वावसु, चित्रसेन, सुमन, तरुण, विविध यज्ञ, दक्षिणा, ग्रह, तारा और यज्ञनिर्वाहक मन्त्र--ये सभी वहाँ इन्द्रसभामें बैठते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ଏଠାରେ ମେଧାତିଥି, ବାମଦେବ, ପୁଲସ୍ତ୍ୟ, ପୁଲହ, କ୍ରତୁ, ମରୁତ୍ତ, ମରୀଚି ଏବଂ ମହାତପସ୍ବୀ ସ୍ଥାଣୁ ମଧ୍ୟ ଆସୀନ ଅଛନ୍ତି।

Verse 18

कक्षीवान्‌ गौतमस्ताक्ष्यस्तथा वैश्वानरो मुनि: । (षर्डर्तु: कवषो धूम्रो रैभ्यो नलपरावसू । स्वस्त्यात्रेयो जरत्कारु: कहोल: काश्यपस्तथा । विभाण्डकर्ष्यशूज्रौ च उन्मुखो विमुखस्तथा ।।) मुनि: कालकवृक्षीय आश्राव्यो5थ हिरण्मय:,भरतवंशी नरेश पाण्डुनन्दन! सहदेव, सुनीथ, महातपस्वी वाल्मीकि, सत्यवादी शमीक, सत्यप्रतिज्ञ प्रचेता, मेधातिथि, वामदेव, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरुत्त, मरीचि, महातपस्वी स्थाणु, कक्षीवान्‌, गौतम, तार्क्ष्य, वैश्वानर मुनि, षडर्तु, कवष, धूम्र, रैभ्य, नल, परावसु, स्वस्त्यात्रेय, जरत्कारु, कहोल, काश्यप, विभाण्डक, ऋष्यशृंग, उन्मुख, विमुख, कालकवृक्षीय मुनि, आश्राव्य, हिरण्मय, संवर्त, देवहव्य, पराक्रमी विष्वक्सेन, कण्व, कात्यायन, गार्ग्य, कौशिक, दिव्य जल, ओषधियाँ, श्रद्धा, मेधा, सरस्वती, अर्थ, धर्म, काम, विद्युत, जलधर मेघ, वायु, गर्जना करनेवाले बादल, प्राची दिशा, यज्ञके हविष्यको वहन करनेवाले सत्ताईस पावक,- सम्मिलित अग्नि और सोम, संयुक्त इन्द्र और अग्नि, मित्र, सविता, अर्यमा, भग, विश्वेदेव, साध्य, बृहस्पति, शुक्र, विश्वावसु, चित्रसेन, सुमन, तरुण, विविध यज्ञ, दक्षिणा, ग्रह, तारा और यज्ञनिर्वाहक मन्त्र--ये सभी वहाँ इन्द्रसभामें बैठते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—କକ୍ଷୀବାନ, ଗୌତମ, ତାର୍କ୍ଷ୍ୟ ଏବଂ ବୈଶ୍ୱାନର ମୁନି; ଷଡୃତୁ, କବଷ, ଧୂମ୍ର, ରୈଭ୍ୟ, ନଲ ଓ ପରାବସୁ; ସ୍ୱସ୍ତ୍ୟାତ୍ରେୟ, ଜରତ୍କାରୁ, କହୋଲ ଓ କାଶ୍ୟପ; ବିଭାଣ୍ଡକ ଓ ଋଷ୍ୟଶୃଙ୍ଗ; ଉନ୍ମୁଖ ଓ ବିମୁଖ; ଏବଂ କାଳକବୃକ୍ଷୀୟ ମୁନି, ଆଶ୍ରାବ୍ୟ, ହିରଣ୍ମୟ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଆସୀନ ଥିଲେ।

Verse 19

संवर्तो देवहव्यश्न विष्वक्सेनश्व वीर्यवान्‌ । (कण्व: कात्यायनो राजन गार्ग्य: कौशिक एव च ।) दिव्या आपस्तथौषध्य: श्रद्धा मेधा सरस्वती,भरतवंशी नरेश पाण्डुनन्दन! सहदेव, सुनीथ, महातपस्वी वाल्मीकि, सत्यवादी शमीक, सत्यप्रतिज्ञ प्रचेता, मेधातिथि, वामदेव, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरुत्त, मरीचि, महातपस्वी स्थाणु, कक्षीवान्‌, गौतम, तार्क्ष्य, वैश्वानर मुनि, षडर्तु, कवष, धूम्र, रैभ्य, नल, परावसु, स्वस्त्यात्रेय, जरत्कारु, कहोल, काश्यप, विभाण्डक, ऋष्यशृंग, उन्मुख, विमुख, कालकवृक्षीय मुनि, आश्राव्य, हिरण्मय, संवर्त, देवहव्य, पराक्रमी विष्वक्सेन, कण्व, कात्यायन, गार्ग्य, कौशिक, दिव्य जल, ओषधियाँ, श्रद्धा, मेधा, सरस्वती, अर्थ, धर्म, काम, विद्युत, जलधर मेघ, वायु, गर्जना करनेवाले बादल, प्राची दिशा, यज्ञके हविष्यको वहन करनेवाले सत्ताईस पावक,- सम्मिलित अग्नि और सोम, संयुक्त इन्द्र और अग्नि, मित्र, सविता, अर्यमा, भग, विश्वेदेव, साध्य, बृहस्पति, शुक्र, विश्वावसु, चित्रसेन, सुमन, तरुण, विविध यज्ञ, दक्षिणा, ग्रह, तारा और यज्ञनिर्वाहक मन्त्र--ये सभी वहाँ इन्द्रसभामें बैठते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ସଂବର୍ତ୍ତ, ଦେବହବ୍ୟ ଏବଂ ବୀର୍ୟବାନ ବିଷ୍ୱକ୍ସେନ; ଏବଂ ହେ ରାଜନ, କଣ୍ୱ, କାତ୍ୟାୟନ, ଗାର୍ଗ୍ୟ, କୌଶିକ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଥିଲେ। ଦିବ୍ୟ ଜଳ, ଔଷଧି, ଶ୍ରଦ୍ଧା, ମେଧା ଓ ସରସ୍ୱତୀ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ।

Verse 20

अर्थो धर्मश्न कामश्न विद्युतश्वैव पाण्डव | जलवाहस्तथा मेघा वायव: स्तनयित्नव:,भरतवंशी नरेश पाण्डुनन्दन! सहदेव, सुनीथ, महातपस्वी वाल्मीकि, सत्यवादी शमीक, सत्यप्रतिज्ञ प्रचेता, मेधातिथि, वामदेव, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरुत्त, मरीचि, महातपस्वी स्थाणु, कक्षीवान्‌, गौतम, तार्क्ष्य, वैश्वानर मुनि, षडर्तु, कवष, धूम्र, रैभ्य, नल, परावसु, स्वस्त्यात्रेय, जरत्कारु, कहोल, काश्यप, विभाण्डक, ऋष्यशृंग, उन्मुख, विमुख, कालकवृक्षीय मुनि, आश्राव्य, हिरण्मय, संवर्त, देवहव्य, पराक्रमी विष्वक्सेन, कण्व, कात्यायन, गार्ग्य, कौशिक, दिव्य जल, ओषधियाँ, श्रद्धा, मेधा, सरस्वती, अर्थ, धर्म, काम, विद्युत, जलधर मेघ, वायु, गर्जना करनेवाले बादल, प्राची दिशा, यज्ञके हविष्यको वहन करनेवाले सत्ताईस पावक,- सम्मिलित अग्नि और सोम, संयुक्त इन्द्र और अग्नि, मित्र, सविता, अर्यमा, भग, विश्वेदेव, साध्य, बृहस्पति, शुक्र, विश्वावसु, चित्रसेन, सुमन, तरुण, विविध यज्ञ, दक्षिणा, ग्रह, तारा और यज्ञनिर्वाहक मन्त्र--ये सभी वहाँ इन्द्रसभामें बैठते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ପାଣ୍ଡବ! ସେଠାରେ ଅର୍ଥ, ଧର୍ମ ଓ କାମ, ଏବଂ ବିଦ୍ୟୁତ ମଧ୍ୟ ଥିଲା; ଜଳବାହୀ ମେଘ, ବାୟୁ ଓ ଗର୍ଜନାକାରୀ ମେଘମାଳା ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଥିଲେ।

Verse 21

भरतवंशी नरेश पाण्डुनन्दन! सहदेव, सुनीथ, महातपस्वी वाल्मीकि, सत्यवादी शमीक, सत्यप्रतिज्ञ प्रचेता, मेधातिथि, वामदेव, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरुत्त, मरीचि, महातपस्वी स्थाणु, कक्षीवान्‌, गौतम, तार्क्ष्य, वैश्वानर मुनि, षडर्तु, कवष, धूम्र, रैभ्य, नल, परावसु, स्वस्त्यात्रेय, जरत्कारु, कहोल, काश्यप, विभाण्डक, ऋष्यशृंग, उन्मुख, विमुख, कालकवृक्षीय मुनि, आश्राव्य, हिरण्मय, संवर्त, देवहव्य, पराक्रमी विष्वक्सेन, कण्व, कात्यायन, गार्ग्य, कौशिक, दिव्य जल, ओषधियाँ, श्रद्धा, मेधा, सरस्वती, अर्थ, धर्म, काम, विद्युत, जलधर मेघ, वायु, गर्जना करनेवाले बादल, प्राची दिशा, यज्ञके हविष्यको वहन करनेवाले सत्ताईस पावक,- सम्मिलित अग्नि और सोम, संयुक्त इन्द्र और अग्नि, मित्र, सविता, अर्यमा, भग, विश्वेदेव, साध्य, बृहस्पति, शुक्र, विश्वावसु, चित्रसेन, सुमन, तरुण, विविध यज्ञ, दक्षिणा, ग्रह, तारा और यज्ञनिर्वाहक मन्त्र--ये सभी वहाँ इन्द्रसभामें बैठते हैं

Narada said: “O prince of the Bharata line, son of Pandu! In Indra’s celestial assembly sit many exalted beings—Sahadeva and Sunitha; great ascetics such as Valmiki; truth-speaking sages like Shamika; those firm in vows such as Prachetas; and seers including Medhatithi, Vamadeva, Pulastya, Pulaha, Kratu, Marutta, Marichi, and the mighty ascetic Sthanu. There too are Kakshivan, Gautama, Tarkshya, the sage Vaishvanara, Shadritu, Kavasha, Dhumra, Raibhya, Nala, Paravasu, Svastyatreya, Jaratkaru, Kahola, Kashyapa, Vibhandaka, Rishyashringa, Unmukha, Vimukha, the Kalakavrikshiya sage, Ashravya, Hiranmaya, Samvarta, Devahavya, and the valiant Vishvaksena; also Kanva, Katyayana, Gargya, and Kaushika. Along with them are divine waters and healing herbs; personified virtues and powers—Faith, Intelligence, Sarasvati, Prosperity, Dharma, Desire; lightning, rain-bearing clouds, wind, and thunderous storm-clouds; the eastern direction; the twenty-seven fires that carry sacrificial offerings; Agni and Soma together; Indra united with Agni; Mitra, Savitar, Aryaman, Bhaga; the Vishvedevas and the Sadhyas; Brihaspati and Shukra; the Gandharvas Vishvavasu and Chitrasena; and also Suman, Taruna, diverse sacrifices, sacrificial fees, planets, stars, and the mantras that accomplish the rites. All these are seated there in Indra’s hall.”

Verse 22

भगो विश्वे च साध्याश्व गुरु: शुक्रस्तथैव च । विश्वावसुश्चित्रसेन: सुमनस्तरुणस्तथा,भरतवंशी नरेश पाण्डुनन्दन! सहदेव, सुनीथ, महातपस्वी वाल्मीकि, सत्यवादी शमीक, सत्यप्रतिज्ञ प्रचेता, मेधातिथि, वामदेव, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरुत्त, मरीचि, महातपस्वी स्थाणु, कक्षीवान्‌, गौतम, तार्क्ष्य, वैश्वानर मुनि, षडर्तु, कवष, धूम्र, रैभ्य, नल, परावसु, स्वस्त्यात्रेय, जरत्कारु, कहोल, काश्यप, विभाण्डक, ऋष्यशृंग, उन्मुख, विमुख, कालकवृक्षीय मुनि, आश्राव्य, हिरण्मय, संवर्त, देवहव्य, पराक्रमी विष्वक्सेन, कण्व, कात्यायन, गार्ग्य, कौशिक, दिव्य जल, ओषधियाँ, श्रद्धा, मेधा, सरस्वती, अर्थ, धर्म, काम, विद्युत, जलधर मेघ, वायु, गर्जना करनेवाले बादल, प्राची दिशा, यज्ञके हविष्यको वहन करनेवाले सत्ताईस पावक,- सम्मिलित अग्नि और सोम, संयुक्त इन्द्र और अग्नि, मित्र, सविता, अर्यमा, भग, विश्वेदेव, साध्य, बृहस्पति, शुक्र, विश्वावसु, चित्रसेन, सुमन, तरुण, विविध यज्ञ, दक्षिणा, ग्रह, तारा और यज्ञनिर्वाहक मन्त्र--ये सभी वहाँ इन्द्रसभामें बैठते हैं

Nārada said: “There, in Indra’s celestial assembly, sit Bhaga; the Viśvedevas and the Sādhyas; Bṛhaspati and Śukra; the Gandharvas Viśvāvasu and Citraseṇa, along with Suman and Taruṇa. There also sit many renowned sages and seers—Valmīki the great ascetic; Śamīka, steadfast in truth; Pracetā of firm vows; Medhātithi; Vāmadeva; Pulastya, Pulaha, Kratu, Marīci, and others—together with Kakṣīvān, Gautama, Tārkṣya, and the sage Vaiśvānara. Along with them are various other ṛṣis, and even the personified powers and supports of the world: divine waters, healing herbs, Faith (Śraddhā), Intelligence (Medhā), Sarasvatī, and the aims of life—Artha, Dharma, and Kāma—together with lightning, wind, and the rain-bearing clouds that thunder, and the eastern direction itself. The fires that carry sacrificial offerings, the combined Agni and Soma, the united Indra and Agni, and the deities Mitra, Savitṛ, Aryaman, and Bhaga—along with diverse sacrifices, sacrificial fees (dakṣiṇā), planets and stars, and the mantras that sustain ritual—these all are seated there in Indra’s hall.”

Verse 23

प्राची दिग्र यज्ञवाहा श्व॒ पावका: सप्तविंशति: । अग्नीषोमौ तथेन्द्राग्नी मित्रश्न सवितार्यमा,यज्ञाश्ष दक्षिणाश्षैवं ग्रहास्ताराश्न भारत | यज्ञवाहश्न ये मन्त्रा: सर्वे तत्र समासते भरतवंशी नरेश पाण्डुनन्दन! सहदेव, सुनीथ, महातपस्वी वाल्मीकि, सत्यवादी शमीक, सत्यप्रतिज्ञ प्रचेता, मेधातिथि, वामदेव, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरुत्त, मरीचि, महातपस्वी स्थाणु, कक्षीवान्‌, गौतम, तार्क्ष्य, वैश्वानर मुनि, षडर्तु, कवष, धूम्र, रैभ्य, नल, परावसु, स्वस्त्यात्रेय, जरत्कारु, कहोल, काश्यप, विभाण्डक, ऋष्यशृंग, उन्मुख, विमुख, कालकवृक्षीय मुनि, आश्राव्य, हिरण्मय, संवर्त, देवहव्य, पराक्रमी विष्वक्सेन, कण्व, कात्यायन, गार्ग्य, कौशिक, दिव्य जल, ओषधियाँ, श्रद्धा, मेधा, सरस्वती, अर्थ, धर्म, काम, विद्युत, जलधर मेघ, वायु, गर्जना करनेवाले बादल, प्राची दिशा, यज्ञके हविष्यको वहन करनेवाले सत्ताईस पावक,- सम्मिलित अग्नि और सोम, संयुक्त इन्द्र और अग्नि, मित्र, सविता, अर्यमा, भग, विश्वेदेव, साध्य, बृहस्पति, शुक्र, विश्वावसु, चित्रसेन, सुमन, तरुण, विविध यज्ञ, दक्षिणा, ग्रह, तारा और यज्ञनिर्वाहक मन्त्र--ये सभी वहाँ इन्द्रसभामें बैठते हैं

Nārada said: “In that assembly are present the eastern quarter, the twenty-seven sacred fires that bear the oblations, and the paired deities Agni-and-Soma and Indra-and-Agni; likewise Mitra, Savitṛ, Aryaman, and Bhaga; the Viśvedevas and the Sādhyas; Bṛhaspati and Śukra; the Gandharvas Viśvāvasu and Citraseṇa, along with Suman and Taruṇa. There too are the various sacrifices, the sacrificial fees (dakṣiṇā), the planets (grahas), the stars, and all those mantras that carry the offering. All of these are gathered there in Indra’s hall.”

Verse 24

तथैवाप्सरसो राजन्‌ गन्धर्वाश्व॒ मनोरमा: । नृत्यवादित्रगीतैश्व हास्यैश्न विविधेरपि

Nārada said: “In the same manner, O King, delightful Apsarases and Gandharvas (were present), entertaining (the assembly) with dance, instrumental music, and song, and also with various kinds of humorous amusements.”

Verse 25

स्तुतिभिम्मड्नलैश्वैव स्तुवन्त: कर्मभिस्तथा

“With hymns and auspicious benedictions, they praised (him); and likewise, through their prescribed acts and services, they continued to honor him.”

Verse 26

ब्रह्मराजर्षयश्वैव सर्वे देवर्षयस्तथा,ब्रह्मर्षि, राजर्षि तथा सम्पूर्ण देवर्षि माला पहने एवं वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो, नाना प्रकारके दिव्य विमानोंद्वारा अग्निके समान देदीप्यमान होते हुए वहाँ आते-जाते रहते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ସେଠାରେ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷି ଓ ରାଜର୍ଷିମାନେ, ଏବଂ ସମସ୍ତ ଦେବର୍ଷିମାନେ, ଋଷିଯୋଗ୍ୟ ପୂର୍ଣ୍ଣ ମାଳା ପିନ୍ଧି, ଦୀପ୍ତ ବସ୍ତ୍ର ଓ ଆଭୂଷଣରେ ବିଭୂଷିତ ହୋଇ, ନାନା ପ୍ରକାର ଦିବ୍ୟ ବିମାନରେ ଅଗ୍ନିସମ ତେଜରେ ଜ୍ୱଳିତ ହୋଇ ନିତ୍ୟ ଆସିଯାଆନ୍ତି।

Verse 27

विमानैर्विविधीर्दिव्यैर्दीप्यपमाना इवाग्नय: । स्रग्विणो भूषिता: सर्वे यान्ति चायान्ति चापरे,ब्रह्मर्षि, राजर्षि तथा सम्पूर्ण देवर्षि माला पहने एवं वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो, नाना प्रकारके दिव्य विमानोंद्वारा अग्निके समान देदीप्यमान होते हुए वहाँ आते-जाते रहते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ସେଇ ଲୋକରେ ବ୍ରହ୍ମର୍ଷି, ରାଜର୍ଷି ଓ ଦେବର୍ଷିମାନଙ୍କ ସମୂହ, ମାଳାଧାରୀ ଓ ଉତ୍ତମ ବସ୍ତ୍ର-ଆଭୂଷଣରେ ଭୂଷିତ ହୋଇ, ନାନା ପ୍ରକାର ଦିବ୍ୟ ବିମାନରେ ଅଗ୍ନି ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ହୋଇ ଏଦିକ-ସେଦିକ ଗମନାଗମନ କରନ୍ତି—କେହି ଆସନ୍ତି, କେହି ପ୍ରସ୍ଥାନ କରନ୍ତି।

Verse 28

बृहस्पतिश्न शुक्रश्न नित्यमास्तां हि तत्र वै । एते चान्ये च बहवो महात्मानो यतव्रता:,बृहस्पति और शुक्र वहाँ नित्य विराजते हैं। ये तथा और भी बहुत-से संयमी महात्मा जिनका दर्शन चन्द्रमाके समान प्रिय है, चन्द्रमाकी भाँति चमकीले विमानोंद्वारा वहाँ उपस्थित होते हैं। राजन! भृूगु और सप्तर्षि, जो साक्षात्‌ ब्रह्माजीके समान प्रभावशाली हैं, ये भी इन्द्र-सभाकी शोभा बढ़ाते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ସେଠାରେ ବୃହସ୍ପତି ଓ ଶୁକ୍ର ସତ୍ୟই ନିତ୍ୟ ବିରାଜମାନ। ତାଙ୍କ ସହ ଭ୍ରତ-ନିୟମରେ ସଂଯମିତ ଅନେକ ମହାତ୍ମାମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ରହନ୍ତି।

Verse 29

विमानैश्वन्द्रसंकाशै: सोमवत्तप्रियदर्शना: । ब्रह्मण: सदृशा राजन्‌ भृगुः सप्तर्षयस्तथा,बृहस्पति और शुक्र वहाँ नित्य विराजते हैं। ये तथा और भी बहुत-से संयमी महात्मा जिनका दर्शन चन्द्रमाके समान प्रिय है, चन्द्रमाकी भाँति चमकीले विमानोंद्वारा वहाँ उपस्थित होते हैं। राजन! भृूगु और सप्तर्षि, जो साक्षात्‌ ब्रह्माजीके समान प्रभावशाली हैं, ये भी इन्द्र-सभाकी शोभा बढ़ाते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ସେମାନେ ଚନ୍ଦ୍ରସଦୃଶ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ବିମାନରେ ସେଠାକୁ ଆସନ୍ତି; ସେମାନଙ୍କ ଦର୍ଶନ ସୋମ ପରି ପ୍ରିୟ। ରାଜନ! ଭୃଗୁ ଓ ସପ୍ତର୍ଷିମାନେ ମଧ୍ୟ—ବ୍ରହ୍ମା ସଦୃଶ ପ୍ରଭାବଶାଳୀ—ସେଇ ଦିବ୍ୟ ସଭାକୁ ଶୋଭାୟିତ କରନ୍ତି।

Verse 30

एषा सभा मया राजन्‌ दृष्टा पुष्करमालिनी । शतक्रतोर्महाबाहो याम्यामपि सभां शृणु,महाबाहु नरेश! शतक्रतु इन्द्रकी यह कमल-मालाओंसे सुशोभित सभा मैंने अपनी आँखों देखी है। अब यमराजकी सभाका वर्णन सुनो

ନାରଦ କହିଲେ—ରାଜନ, ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କର ଏହି ପଦ୍ମମାଳାରେ ଶୋଭିତ ସଭାକୁ ମୁଁ ନିଜ ଚକ୍ଷୁରେ ଦେଖିଛି। ଏବେ, ମହାବାହୋ, ଯମଙ୍କ ସଭାର ବର୍ଣ୍ଣନା ମଧ୍ୟ ଶୁଣ।

Verse 96

तेजस्विन: सोमसुतो विशोका विगतज्वरा: । वे देवर्षिगण तेजस्वी, सोमयाग करनेवाले तथा शोक और चिन्तासे शून्य हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ସୋମଜାତ ସେଇ ତେଜସ୍ବୀ ଦେବର୍ଷିମାନେ ଶୋକରହିତ, ଜ୍ୱରସଦୃଶ ବ୍ୟାକୁଳତାରୁ ଅସ୍ପୃଶ୍ୟ। ସେମାନେ ସ୍ୱତେଜରେ ଦୀପ୍ତିମାନ, ସୋମଯାଗ କରୁଥିବା, ଏବଂ ଶୋକ-ଚିନ୍ତାର ଭାରରୁ ସଦା ମୁକ୍ତ।

Verse 243

रमयन्ति सम नृपते देवराजं शतक्रतुम्‌ । राजन! इसी प्रकार मनोहर अप्सराएँ तथा सुन्दर गन्धर्व नृत्य, वाद्य, गीत एवं नाना प्रकारके हास्योंद्वारा देवराज इन्द्रका मनोरंजन करते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ନୃପତି, ଏହିପରି ମନୋହର ଅପ୍ସରାମାନେ ଓ ସୁନ୍ଦର ଗନ୍ଧର୍ବମାନେ ନୃତ୍ୟ, ବାଦ୍ୟ, ଗୀତ ଏବଂ ନାନାପ୍ରକାର ହାସ୍ୟ-ପରିହାସ ଦ୍ୱାରା ଦେବରାଜ ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ରମାନ୍ତି।

Verse 256

विक्रमैश्व महात्मानं बलवृत्रनिषू्‌दनम्‌ | इतना ही नहीं, वे स्तुति, मंगलपाठ और पराक्रम-सूचक कर्मोंके गायनद्वारा बल और वृत्रनामक असुरोंके नाशक महात्मा इन्द्रका स्तवन करते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ସ୍ତୁତି, ମଙ୍ଗଳପାଠ ଓ ପରାକ୍ରମସୂଚକ କର୍ମକୀର୍ତ୍ତନ ଦ୍ୱାରା ସେମାନେ ମହାତ୍ମା ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ସ୍ତବନ କରନ୍ତି—ଯିଏ ବଲ ଓ ବୃତ୍ର ନାମକ ଅସୁରମାନଙ୍କର ନିଷୂଦନକର୍ତ୍ତା। ଏହାଦ୍ୱାରା ଲୋକରକ୍ଷାର୍ଥେ ପ୍ରୟୁକ୍ତ ଶକ୍ତିକୁ ପ୍ରଶଂସା କରୁଥିବା ଧର୍ମକ୍ରମ ସୁଦୃଢ଼ ହୁଏ।

Frequently Asked Questions

The implied tension is between idealized institutional order (a secure, luminous sabhā populated by purified beings) and the vulnerabilities of human assemblies, where prestige and procedure may outpace ethical discernment.

The chapter suggests that a functioning court is an ecosystem of competencies and virtues—knowledge, discipline, ritual order, and prosperity—where authority is reinforced by the presence of ethical and intellectual capital.

No explicit phalaśruti appears here; the closing signal is Nārada’s eyewitness confirmation of the sabhā and his transition marker indicating he will next describe another assembly associated with the southern quarter.