
Adhyāya 52 (Sabhā-parva): Vidura Invites Yudhiṣṭhira to Hastināpura for the Dice Match
Upa-parva: Dyūta-āhvāna (Invitation to the Dice-Game) — Vidura’s Embassy Episode
Vaiśaṃpāyana narrates Vidura’s swift journey, sent by Dhṛtarāṣṭra, to the Pāṇḍavas. Vidura is received with honor by Yudhiṣṭhira, who immediately notices Vidura’s lack of cheer and inquires about the welfare of Dhṛtarāṣṭra, his sons, and the realm. Vidura reports the king’s well-being and delivers the formal invitation: a new assembly comparable to the Pāṇḍavas’ own, a reunion with kin, and a proposed friendly dice-game. Vidura then states the dangerous core of the arrangement—experienced gamblers are already seated—implying manipulation. Yudhiṣṭhira articulates a dharmic objection: gambling breeds quarrel and is disfavored by the wise; he asks who besides Dhṛtarāṣṭra’s sons will play, and Vidura lists prominent participants including Śakuni. Yudhiṣṭhira recognizes the peril of deceptive play yet resolves to go, asserting he will not refuse the king’s directive and that once summoned he does not turn back, treating this as an established vow. Preparations follow: the Pāṇḍavas travel with Draupadī and attendants to Hastināpura, are welcomed by elders and kin, housed with honor, and after the night’s rituals they enter the splendid sabhā in the morning, already crowded with gamblers—closing the chapter at the threshold of the contest.
Chapter Arc: सभा में दुर्योधन अपनी आँखों से देखे राजसूय-यज्ञ के वैभव का वृत्तांत सुनाने उठता है—युधिष्ठिर को राजाओं से भेंट में मिला धन, पशु, रत्न और जन-समुदाय उसके मन में जलन बनकर उबल रहा है। → वह एक-एक कर दूर-दूर के जनपदों और राजाओं के उपहार गिनाता है—घोड़े, हाथी, रथ, दास-दासियाँ, वस्त्र, वैदूर्य-मणि, मोतियों के ढेर, सिंहल के झूल, और अनगिनत कर-राशि। वर्णन के साथ-साथ उसके भीतर का विष भी बढ़ता जाता है: ‘मेरे शत्रुओं के घर’ में यह समृद्धि कैसे? → दुर्योधन यज्ञ-मण्डप की जीवंत तस्वीर खींच देता है—कहीं कच्चा अन्न तौला जा रहा है, कहीं पक रहा है, कहीं परोसा जा रहा है; ब्राह्मणों के ‘पुण्याह’ स्वरों से दिशाएँ गूँज रही हैं; और उसने किसी को भी ऐसा नहीं देखा जो तृप्त होकर, आभूषणों से विभूषित होकर, संतुष्ट न लौटा हो। यही दृश्य उसके हृदय में असह्य दाह बनकर फूटता है—वह कह उठता है कि यह देखकर उसे दुःख से मरने की इच्छा होती है। → वर्णन का अंत युधिष्ठिर की व्यवस्था और दान-धर्म की व्यापकता पर टिकता है—अतिथियों, स्नातकों और सेवकों तक की नियमित सेवा-व्यवस्था; राजाओं द्वारा समर्पित सम्पूर्ण राज्य-धन तक का यज्ञार्थ निवेदन। दुर्योधन का कथन वस्तुतः प्रशंसा नहीं, ईर्ष्या का प्रमाण बनकर सभा में ठहर जाता है। → समृद्धि का यह लेखा-जोखा दुर्योधन के भीतर प्रतिशोध की चिंगारी को हवा देता है—अब प्रश्न यह नहीं कि युधिष्ठिर कितना महान है, बल्कि यह कि दुर्योधन इस वैभव को सहने के लिए कौन-सा कपट रचेगा।
Verse 1
अफड--रू- द्विपञज्चाशत्तमो<ड ध्याय: युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन दुर्योधन उवाच दायं तु विविध तस्मै शृणु मे गदतो5नघ । यज्ञार्थ राजभिर्दत्तं महान्तं धनसंचयम्
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ଅନଘ! ମୋ କଥା ଶୁଣ। ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ଦିଆଯାଇଥିବା ନାନାପ୍ରକାର ଭେଟିର ବର୍ଣ୍ଣନା କରୁଛି—ଯଜ୍ଞାର୍ଥେ ରାଜମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଦତ୍ତ, ଅପାର ଧନସଞ୍ଚୟ।
Verse 2
दुर्योधन बोला--अनघ! राजाओंद्वारा युधिष्ठिरके यज्ञके लिये दिये हुए जिस महान् धनका संग्रह वहाँ हुआ था, वह अनेक प्रकारका था। मैं उसका वर्णन करता हूँ, सुनिये ।। मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् | ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ଅନଘ! ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଯଜ୍ଞ ପାଇଁ ରାଜମାନେ ଯେ ମହାନ୍ ଧନସଞ୍ଚୟ ସେଠାରେ ଦାନ କରିଥିଲେ, ତାହା ନାନାପ୍ରକାର ଥିଲା। ମୁଁ ତାହାର ବର୍ଣ୍ଣନା କରୁଛି; ଶୁଣ। ମେରୁ ଓ ମନ୍ଦର ମଧ୍ୟରେ ଶୈଲୋଦା ନାମକ ନଦୀ ଅଛି; ତାହାର ତଟରେ କୀଚକ ବାଁଶର ରମ୍ୟ ଛାୟାରେ କେତେକ ଲୋକ ଆଶ୍ରୟ ନେଇଥାନ୍ତି।
Verse 3
खसा एकासना हार्हा: प्रदरा दीर्घवेणव: । पारदाश्न कुलिन्दाश्न तड़णा: परतड़णा:
ଖସ, ଏକାସନ, ହାର୍ହ୍ୟ, ପ୍ରଦର, ଦୀର୍ଘବେଣୁ; ତଥା ପାରଦ ଓ କୁଲିନ୍ଦ; ତଙ୍ଗଣ ଓ ପରତଙ୍ଗଣ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ (ସେଇ ରାଜସଭାରେ) ଉପସ୍ଥିତ ଜନପଦ ଥିଲେ।
Verse 4
तद् वै पिपीलिकं नाम उद्धृतं यत् पिपीलिकै: । जातरूपं द्रोणमेयमहार्षु: पुज्जशो नृपा:
ଏହାହିଁ ‘ପିପୀଳିକ’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ—ଯାହା ପିପୀଳିକା (ଚିଁଟି) ଦ୍ୱାରା ଉଦ୍ଧୃତ। ରାଜମାନେ ହର୍ଷସହିତ ଜାତରୂପ ସୁବର୍ଣ୍ଣକୁ ଢେର-ଢେର ଆଣିଥିଲେ; ତାହାର ମାପ ଦ୍ରୋଣ ପ୍ରମାଣରେ ହୁଏ।
Verse 5
मेरु और मन्दराचलके बीचमें प्रवाहित होनेवाली शैलोदा नदीके दोनों तटोंपर छिठ्रोंमें वायुके भर जानेसे वेणुकी तरह बजनेवाले बाँसोंकी रमणीय छायामें जो लोग बैठते और विश्राम करते हैं, वे खस, एकासन, अह, प्रदर, दीर्घवेणु, पारद, पुलिन्द, तंगण और परतंगण आदि नरेश भेंटमें देनेके लिये पिपीलिकाओं (चींटियों)-द्वारा निकाले हुए पिपीलिक नामवाले सुवर्णके ढेर-के-ढेर उठा लाये थे। उसका माप द्रोणसे किया जाता था ॥। २-- ४।। कृष्णॉल्ललामां श्वमराज्छुक्लां श्षान्याज्छशि प्रभान् । हिमवत्पुष्पजं चैव स्वादु क्षौद्रं तथा बहु
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ମେରୁ ଓ ମନ୍ଦର ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରବାହିତ ଶୈଲୋଦା ନଦୀର ଉଭୟ ତଟରେ, ବାଁଶର ଛିଦ୍ରରେ ବାୟୁ ଭରିଲେ ସେଗୁଡ଼ିକ ବେଣୁ ପରି ମଧୁର ନାଦ କରେ; ସେହି ରମ୍ୟ ଛାୟାରେ ବସି ବିଶ୍ରାମ କରୁଥିବା ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଖସ, ଏକାସନ, ଆହ, ପ୍ରଦର, ଦୀର୍ଘବେଣୁ, ପାରଦ, ପୁଲିନ୍ଦ, ତଙ୍ଗଣ, ପରତଙ୍ଗଣ ଆଦି ନରେଶମାନେ ଭେଟି ଦେବାକୁ ପିପୀଳିକା (ଚିଁଟି) ଦ୍ୱାରା ଉଦ୍ଧୃତ ବୋଲି କୁହାଯାଉଥିବା ‘ପିପୀଳିକ’ ନାମକ ସୁବର୍ଣ୍ଣର ଢେର-ଢେର ଉଠାଇ ଆଣିଥିଲେ; ତାହାର ମାପ ଦ୍ରୋଣ ପ୍ରମାଣରେ ହୁଏ। ତଦୁପରି କୃଷ୍ଣ-ଚିହ୍ନିତ, ଶ୍ୱେତ, ଚନ୍ଦ୍ରପ୍ରଭା ସମ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ବସ୍ତୁ ଓ ହିମବତ୍ ପୁଷ୍ପଜନ୍ୟ ମଧୁର ମଧୁ ମଧ୍ୟ ସେମାନେ ବହୁ ପରିମାଣରେ ଆଣିଥିଲେ।
Verse 6
उत्तरेभ्य: कुरुभ्यश्षाप्पपोढं माल्यमम्बुभि: । उत्तरादपि कैलासादोषधी: सुमहाबला:
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଉତ୍ତର କୁରୁଦେଶରୁ ପବିତ୍ର ଜଳରେ ଧୋଇ ଶାପମୁକ୍ତ କରାଯାଇଥିବା ମାଳା ଆସେ; ଏବଂ ଉତ୍ତର ଦିଗର କୈଲାସ ପର୍ବତରୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବଳବତୀ ଔଷଧି ମିଳେ। ସେଇ ଦୂର ଉତ୍ତର ଦେଶରେ ଏମିତି ଅଦ୍ଭୁତ କଥା ପ୍ରଚଳିତ।
Verse 7
पर्वतीया बलिं चान्यमाहृत्य प्रणता: स्थिता: । अजाततशभत्रोर्नुपतेर्द्धारि तिष्ठन्ति वारिता:
ପର୍ବତୀୟ ବଳି ଓ ଅନ୍ୟ ଉପହାର ଆଣି ରାଜାମାନେ ମସ୍ତକ ନମାଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ; କିନ୍ତୁ ଅଜାତଶତ୍ରୁ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଦ୍ୱାରରେ, ଦେବାକୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ସେମାନଙ୍କୁ ରୋକି ରଖାଯାଇଥିଲା।
Verse 8
इतना ही नहीं, वे सुन्दर काले रंगके चँवर तथा चन्द्रमाके समान श्वेत दूसरे चामर एवं हिमालयके पुष्पोंसे उत्पन्न हुआ स्वादिष्ट मधु भी प्रचुर मात्रामें लाये थे। उत्तरकुरुदेशसे गंगाजल और मालाके योग्य रत्न तथा उत्तर कैलाससे प्राप्त हुई अतीव बलसम्पन्न औषधियाँ एवं अन्य भेंटकी सामग्री साथ लेकर आये हुए पर्वतीय भूपालगण अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरके द्वारपर रोके जाकर विनीतभावसे खड़े थे ।। ये परार्थे हिमवत: सूर्योदयगिरौ नृपा: । कारूषे च समुद्रान्ते लौहित्यमभितश्न ये,पिताजी! मैंने देखा कि जो राजा हिमालयके परार्धभागमें निवास करते हैं, जो उदयगिरिके निवासी हैं, जो समुद्र-तटवर्ती कारूषदेशमें रहते हैं तथा जो लौहित्यपर्वतके दोनों ओर वास करते हैं, फल और मूल ही जिनका भोजन है, वे चर्मवस्त्रधारी क्रूरतापूर्वक शस्त्र चलानेवाले और क्रूरकर्मा किरातनरेश भी वहाँ भेंट लेकर आये थे
ଏତିକି ନୁହେଁ—ସେମାନେ ସୁନ୍ଦର କଳା ଚାମର, ଚନ୍ଦ୍ରମା ସମ ଶ୍ୱେତ ଅନ୍ୟ ଚାମର, ଏବଂ ହିମାଳୟର ପୁଷ୍ପରୁ ଉତ୍ପନ୍ନ ସ୍ୱାଦିଷ୍ଟ ମଧୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଚୁର ପରିମାଣରେ ଆଣିଥିଲେ। ଉତ୍ତରକୁରୁଦେଶରୁ ଗଙ୍ଗାଜଳ ଓ ମାଳାଯୋଗ୍ୟ ରତ୍ନ, ଏବଂ ଉତ୍ତର କୈଲାସ ଅଞ୍ଚଳରୁ ମିଳିଥିବା ଅତ୍ୟନ୍ତ ବଳବତୀ ଔଷଧି ଓ ଅନ୍ୟ ଭେଟି ସାମଗ୍ରୀ ନେଇ ଆସିଥିବା ପର୍ବତୀୟ ଭୂପାଳମାନେ ଅଜାତଶତ୍ରୁ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଦ୍ୱାରରେ ରୋକାଯାଇ ବିନୟରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ। ଆଉ, ପିତା, ମୁଁ ନିଜେ ଦେଖିଛି—ହିମାଳୟର ପରାର୍ଧ ଭାଗରେ ବସୁଥିବା, ସୂର୍ଯ୍ୟୋଦୟଗିରିର ନିବାସୀ, ସମୁଦ୍ରତଟୀୟ କାରୂଷଦେଶର, ଏବଂ ଲୌହିତ୍ୟ ପର୍ବତଶ୍ରେଣୀର ଉଭୟ ପାର୍ଶ୍ୱରେ ବସୁଥିବା ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାକୁ ଆସିଥିଲେ; ଫଳ-ମୂଳାହାରୀ, ଚର୍ମବସ୍ତ୍ରଧାରୀ, କ୍ରୂର ଶସ୍ତ୍ରପ୍ରୟୋଗୀ ଓ କ୍ରୂରକର୍ମା କିରାତ ନରେଶମାନେ ସୁଦ୍ଧା ଭେଟି ନେଇ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ।
Verse 9
फलमूलाशना ये च किराताश्चर्मवासस: । क्रूरशस्त्रा: क्रूरकृतस्तांश्व पश्याम्यहं प्रभो,पिताजी! मैंने देखा कि जो राजा हिमालयके परार्धभागमें निवास करते हैं, जो उदयगिरिके निवासी हैं, जो समुद्र-तटवर्ती कारूषदेशमें रहते हैं तथा जो लौहित्यपर्वतके दोनों ओर वास करते हैं, फल और मूल ही जिनका भोजन है, वे चर्मवस्त्रधारी क्रूरतापूर्वक शस्त्र चलानेवाले और क्रूरकर्मा किरातनरेश भी वहाँ भेंट लेकर आये थे
ପିତା, ପ୍ରଭୁ! ଫଳ ଓ ମୂଳ ଖାଇଥିବା, ଚର୍ମବସ୍ତ୍ରଧାରୀ, କ୍ରୂର ଶସ୍ତ୍ରଧାରୀ ଓ କ୍ରୂରକର୍ମା ସେଇ କିରାତମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଏଠାରେ ଦେଖୁଛି।
Verse 10
चन्दनागुरुकाष्ठानां भारान् कालीयकस्य च । चर्मरत्नसुवर्णानां गन्धानां चैव राशय:,राजन्! चन्दन और अगुरुकाष्ठ तथा कृष्णागुरुकाष्ठके अनेक भार, चर्म, रत्न, सुवर्ण तथा सुगन्धित पदार्थोकी राशि और दस हजार किरातदेशीय दासियाँ, सुन्दर-सुन्दर पदार्थ, दूर देशोंके मृग और पक्षी तथा पर्वतोंसे संगृहीत तेजस्वी सुवर्ण एवं सम्पूर्ण भेंट-सामग्री लेकर आये हुए राजालोग द्वारपर रोके जानेके कारण खड़े थे
ହେ ରାଜନ! ଚନ୍ଦନ ଓ ଅଗୁରୁକାଠର ଅନେକ ଭାର, କାଳୀୟକର ଭାର ମଧ୍ୟ; ଏବଂ ଚର୍ମ, ରତ୍ନ, ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଓ ସୁଗନ୍ଧିତ ପଦାର୍ଥର ରାଶି—ଏମିତି ଭେଟି ନେଇ ଆସିଥିବା ସେଇ ରାଜାମାନେ ଦ୍ୱାରରେ ରୋକାଯାଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ।
Verse 11
कैरातकीनामयुतं दासीनां च विशाम्पते । आह्त्य रमणीयार्थान् दूरजान् मृगपक्षिण:,राजन्! चन्दन और अगुरुकाष्ठ तथा कृष्णागुरुकाष्ठके अनेक भार, चर्म, रत्न, सुवर्ण तथा सुगन्धित पदार्थोकी राशि और दस हजार किरातदेशीय दासियाँ, सुन्दर-सुन्दर पदार्थ, दूर देशोंके मृग और पक्षी तथा पर्वतोंसे संगृहीत तेजस्वी सुवर्ण एवं सम्पूर्ण भेंट-सामग्री लेकर आये हुए राजालोग द्वारपर रोके जानेके कारण खड़े थे
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ପ୍ରଜାପତି ରାଜନ୍! କିରାତଦେଶରୁ ଦଶହଜାର ଦାସୀ, ମନୋହର ଦ୍ରବ୍ୟ ଏବଂ ଦୂରଦେଶରୁ ଆଣିଥିବା ମୃଗ ଓ ପକ୍ଷୀ—ଏସବୁ ଉପହାରରୂପେ ସେମାନେ ନେଇ ଆସିଛନ୍ତି।
Verse 12
निचितं पर्वतेभ्यश्व हिरण्यं भूरिवर्चसम् । बलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिता:,राजन्! चन्दन और अगुरुकाष्ठ तथा कृष्णागुरुकाष्ठके अनेक भार, चर्म, रत्न, सुवर्ण तथा सुगन्धित पदार्थोकी राशि और दस हजार किरातदेशीय दासियाँ, सुन्दर-सुन्दर पदार्थ, दूर देशोंके मृग और पक्षी तथा पर्वतोंसे संगृहीत तेजस्वी सुवर्ण एवं सम्पूर्ण भेंट-सामग्री लेकर आये हुए राजालोग द्वारपर रोके जानेके कारण खड़े थे
ପର୍ବତମାନଙ୍କୁ ଠାରୁ ସଂଗୃହୀତ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୀପ୍ତିମାନ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବଲି (କର/ଉପହାର) ନେଇ, ସେମାନେ ଦ୍ୱାରେ ରୋକାଯାଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଅଛନ୍ତି।
Verse 13
कैराता दरदा दर्वा: शूरा वै यमकास्तथा । औदुम्बरा दुर्विभागा: पारदा बाह्विकैः सह
କୈରାତ, ଦରଦ, ଦର୍ବ—ନିଶ୍ଚୟ ଶୂର—ଏବଂ ଯମକ; ଔଦୁମ୍ବର, ଦୁର୍ବିଭାଗ, ପାରଦ—ବାହ୍ୱିକମାନଙ୍କ ସହ (ସମସ୍ତେ ଉପସ୍ଥିତ)।
Verse 14
काश्मीराश्च कुमाराश्न घोरका हंसकायना: । शिबित्रिगर्तयौधेया राजन्या भद्रकेकया:
କାଶ୍ମୀରୀ ଓ କାମ୍ବୋଜ; ଘୋରକ ଓ ହଂସକାୟନ; ଶିବି, ତ୍ରିଗର୍ତ୍ତ ଓ ଯୌଧେୟ; ରାଜନ୍ୟ, ଭଦ୍ରକ ଓ କେକୟ (ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି)।
Verse 15
अम्बष्ठा: कौकुरास्तार्क्ष्या वस्त्रपा: पह्ववैः सह । वशातलाश्च मौलेया: सह क्षुद्रकमालवै:
ଅମ୍ବଷ୍ଠ, କୌକୁର, ତାର୍କ୍ଷ୍ୟ, ବସ୍ତ୍ରପ—ପହ୍ୱବମାନଙ୍କ ସହ; ଏବଂ ବଶାତଲ ଓ ମୌଲେୟ—କ୍ଷୁଦ୍ରକ-ମାଳବମାନଙ୍କ ସହ (ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି)।
Verse 16
शौण्डिका: कुकुराश्चैव शकाश्नैव विशाम्पते । अज्ज वज्जश्न पुण्ड्राश्न शाणवत्या गयास्तथा
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ପ୍ରଜାଧିପ! ଶୌଣ୍ଡିକ, କୁକୁର ଓ ଶକ; ତଥା ଅଜ୍ଜ–ବଜ୍ଜଶ୍ନ, ପୁଣ୍ଡ୍ରାଶ୍ନ, ଶାଣବତ୍ୟ ଏବଂ ଗୟ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି।
Verse 17
सुजातय: श्रेणिमन्त: श्रेयांस: शस्त्रधारिण: । अहार्ष: क्षत्रिया वित्त शतशो5जातशत्रवे
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସୁଜାତ, ସୁସଂଗଠିତ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ଶସ୍ତ୍ରଧାରୀ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନେ—ଶତଶତ କରି—ଅଜାତଶତ୍ରୁ (ଯୁଧିଷ୍ଠିର)ଙ୍କୁ ଧନ କରରୂପେ ଆଣି ଦେଲେ।
Verse 18
किरात, दरद, दर्व, शूर, यमक, औदुम्बर, दुर्विभाग, पारद, बाह्लिक, काश्मीर, कुमार, घोरक, हंसकायन, शिबि, त्रिगर्त, यौधेय, भद्र, केकय, अम्बष्ठ, कौकुर, तार्क्ष्य, वस्त्रप, पह्चवव, वशातल, मौलेय, क्षुद्रक, मालव, शौण्डिक, कुक्कुर, शक, अंग, वंग, पुण्ड्र, शाणवत्य तथा गय--ये उत्तम कुलनमें उत्पन्न श्रेष्ठ एवं शस्त्रधारी क्षत्रिय राजकुमार सैकड़ोंकी संख्यामें पंक्तिबद्ध खड़े होकर अजातशत्रु युधिष्ठिरको बहुत धन अर्पित कर रहे थे || १३-- १७ || वज्भा: कलिड्डरा मगधास्ताग्रलिप्ता: सपुण्ड्रका: । दौवालिका: सागरका: पत्रोर्णा: शैशवास्तथा,भारत! वंग, कलिंग, मगध, ताग्रलिप्त, पुण्ड्रक, दौवालिक, सागरक, पत्रोर्ण, शैशव तथा कर्णप्रावरण आदि बहुत-से क्षत्रियनरेश वहाँ दरवाजेपर खड़े थे तथा राजाज्ञासे द्वारपालगण उन सबको यह संदेश देते थे कि आपलोग अपने लिये समय निश्चित कर लें। फिर उत्तम भेंट-सामग्री अर्पित करें। इसके बाद आपलोगोंको भीतर जानेका मार्ग मिल सकेगा
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ଭାରତ! ବଙ୍ଗ, କଳିଙ୍ଗ, ମଗଧ, ତାମ୍ରଲିପ୍ତ ଓ ପୁଣ୍ଡ୍ର; ସହିତ ଦୈବାଲିକ, ସାଗରକ, ପତ୍ରୋର୍ଣ ଓ ଶୈଶବ—ଏମାନଙ୍କ ରାଜାମାନେ ଦ୍ୱାରରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ।
Verse 19
कर्णप्रावरणाश्रैव बहवस्तत्र भारत । तत्रस्था द्वारपालैस्ते प्रोच्यन्ते राजशासनात् | कृतकाला: सुबलयस्ततो द्वारमवाप्स्यथ,भारत! वंग, कलिंग, मगध, ताग्रलिप्त, पुण्ड्रक, दौवालिक, सागरक, पत्रोर्ण, शैशव तथा कर्णप्रावरण आदि बहुत-से क्षत्रियनरेश वहाँ दरवाजेपर खड़े थे तथा राजाज्ञासे द्वारपालगण उन सबको यह संदेश देते थे कि आपलोग अपने लिये समय निश्चित कर लें। फिर उत्तम भेंट-सामग्री अर्पित करें। इसके बाद आपलोगोंको भीतर जानेका मार्ग मिल सकेगा
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ଭାରତ! କର୍ଣ୍ଣପ୍ରାବରଣ ଆଦି ଅନେକ ରାଜା ସେଠାରେ ଦ୍ୱାରରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଥିଲେ। ରାଜାଜ୍ଞାନୁସାରେ ଦ୍ୱାରପାଳମାନେ କହୁଥିଲେ—‘ନିଜ ନିଜ ସମୟ ନିଶ୍ଚିତ କର; ପରେ ଉପହାର ସଜାଇ ଦ୍ୱାର ଦ୍ୱାରା ପ୍ରବେଶ ପାଇବ।’
Verse 20
ईषादन्तान् हेमकक्षान् पद्मवर्णान् कुथावृतान् । शैलाभान् नित्यमत्तांक्षाप्पभित: काम्यकं सर:,तदनन्तर एक-एक क्षमाशील और कुलीन राजाने काम्यक सरोवरके निकट उत्पन्न हुए एक-एक हजार हाथियोंकी भेंट देकर द्वारके भीतर प्रवेश किया। उन हाथियोंके दाँत हलदण्डके समान लंबे थे। उनको बाँधनेकी रस्सी सोनेकी बनी हुई थी। उन हाथियोंका रंग कमलके समान सफेद था। उनकी पीठपर झूल पड़ा हुआ था। वे देखनेमें पर्वताकार और उन्मत्त प्रतीत होते थे
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସେହି ହାତୀମାନଙ୍କର ଦାନ୍ତ ହଳର ଦଣ୍ଡ ପରି ଦୀର୍ଘ; ସୁବର୍ଣ୍ଣ ରଶିରେ ବାନ୍ଧା; ପଦ୍ମବର୍ଣ୍ଣ (ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଧଳା) ଏବଂ ସୁକୁମାର ବସ୍ତ୍ରରେ ଆବୃତ। ସେମାନେ ପର୍ବତ ସଦୃଶ ଦିଶୁଥିଲେ ଓ ସଦା ମଦୋନ୍ମତ୍ତ ପ୍ରତୀତ ହୁଅଥିଲେ।
Verse 21
दत्त्वैकैको दश शतान् कुञ्जरान् कवचावृतान् । क्षमावन्त: कुलीनाश्न द्वारेण प्राविशंस्तदा,तदनन्तर एक-एक क्षमाशील और कुलीन राजाने काम्यक सरोवरके निकट उत्पन्न हुए एक-एक हजार हाथियोंकी भेंट देकर द्वारके भीतर प्रवेश किया। उन हाथियोंके दाँत हलदण्डके समान लंबे थे। उनको बाँधनेकी रस्सी सोनेकी बनी हुई थी। उन हाथियोंका रंग कमलके समान सफेद था। उनकी पीठपर झूल पड़ा हुआ था। वे देखनेमें पर्वताकार और उन्मत्त प्रतीत होते थे
ତାପରେ କ୍ଷମାଶୀଳ ଓ କୁଳୀନ ରାଜାମାନେ ଏକେକ କରି ଦ୍ୱାର ଦ୍ୱାରା ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ; ପ୍ରତ୍ୟେକେ କବଚାବୃତ ଏକ ହଜାର ହାତୀ ଉପହାର ଦେଲେ।
Verse 22
एते चान्ये च बहवो गणा दिग्भ्य: समागता: । अन्यैश्नोपाह्तान्यत्र रत्नानीह महात्मभि:,ये तथा और भी बहुत-से भूपालगण अनेक दिशाओंसे भेंट लेकर आये थे। दूसरे-दूसरे महामना नरेशोंने भी वहाँ रत्नोंकी भेंट अर्पित की थी
ଏମାନେ ଓ ଏପରି ଅନେକ ଦଳ ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ଏଠାକୁ ସମାଗତ ହୋଇଛନ୍ତି। ଅନ୍ୟ ମହାତ୍ମା ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ଏଠାରେ ରତ୍ନ-ଧନ ଉପହାର ଭାବେ ଅର୍ପଣ କରିଛନ୍ତି।
Verse 23
राजा चित्ररथो नाम गन्धर्वो वासवानुग: । शतानि चत्वार्यददद्धयानां वातरंहसाम्,इन्द्रके अनुगामी गन्धर्वराज चित्ररथने चार सौ दिव्य अश्व दिये, जो वायुके समान वेगशाली थे
ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ଅନୁଗାମୀ ଚିତ୍ରରଥ ନାମକ ଗନ୍ଧର୍ବରାଜ ବାୟୁସମ ବେଗଶାଳୀ ଚାରିଶେ ଅଶ୍ୱ ଦାନ କଲେ।
Verse 24
तुम्बुरुस्तु प्रमुदितो गन्धर्वो वाजिनां शतम् । आम्रपत्रसवर्णानामददाद्धेममालिनाम्,तुम्बुरु नामक गन्धर्वराजने प्रसन्नतापूर्वक सौ घोड़े भेंट किये, जो आमके पत्तेके समान हरे रंगवाले तथा सुवर्णकी मालाओंसे विभूषित थे
ତୁମ୍ବୁରୁ ନାମକ ଗନ୍ଧର୍ବ ହର୍ଷିତ ହୋଇ ଶତ ଅଶ୍ୱ ଉପହାର ଦେଲେ—ଆମ୍ରପତ୍ର ସଦୃଶ ହରିତବର୍ଣ୍ଣ ଓ ସୁବର୍ଣ୍ଣମାଳାଭୂଷିତ।
Verse 25
कृती राजा च कौरव्य शूकराणां विशाम्पते । अददाद् गजरत्नानां शतानि सुबहून्यथ,महाराज! शूकरदेशके पुण्यात्मा राजाने कई सौ गजरत्न भेंट किये
ହେ କୌରବ୍ୟ, ପ୍ରଜାପତେ! ଶୂକରଦେଶର କୃତୀ ରାଜା ଅନେକ—ବହୁ ଶତ—ଗଜରତ୍ନ ଉପହାର ଭାବେ ଅର୍ପଣ କଲେ।
Verse 26
विराटेन तु मत्स्येन बल्यर्थ हेममालिनाम् । कुण्जराणां सहस्रे द्वे मत्तानां समुपाहते,मत्स्यदेशके राजा विराटने सुवर्णमालाओंसे विभूषित दो हजार मतवाले हाथी उपहारके रूपमें दिये
ମତ୍ସ୍ୟଦେଶର ରାଜା ବିରାଟ ବଳି-ଉପହାର ରୂପେ ସୁବର୍ଣ୍ଣମାଳାରେ ଭୂଷିତ ଦୁଇ ହଜାର ମତ୍ତ ହାତୀ ଦାନ କଲେ।
Verse 27
पांशुराष्ट्राद वसुदानो राजा षड्विंशतिं गजान् | अश्वानां च सहस्रे द्वेी राजन् काड्चनमालिनाम्,राजन! राजा वसुदानने पांशुदेशसे छब्बीस हाथी, वेग और शक्तिसे सम्पन्न दो हजार सुवर्णमालाभूषित जवान घोड़े और सब प्रकारकी दूसरी भेंट-सामग्री भी पाण्डवोंको समर्पित की
ରାଜନ! ପାଂଶୁରାଷ୍ଟ୍ରରୁ ରାଜା ବସୁଦାନ ଛବିଶ ହାତୀ ଏବଂ ସୁବର୍ଣ୍ଣମାଳାରେ ଭୂଷିତ ଦୁଇ ହଜାର ଘୋଡ଼ା ନିବେଦନ କଲେ।
Verse 28
जवसत्त्वोपपन्नानां वयस्थानां नराधिप । बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवेभ्यो न्यवेदयत्,राजन! राजा वसुदानने पांशुदेशसे छब्बीस हाथी, वेग और शक्तिसे सम्पन्न दो हजार सुवर्णमालाभूषित जवान घोड़े और सब प्रकारकी दूसरी भेंट-सामग्री भी पाण्डवोंको समर्पित की
ନରାଧିପ! ସେଇ ଘୋଡ଼ାମାନେ ବେଗ ଓ ବଳରେ ସମ୍ପନ୍ନ, ଯୌବନସ୍ଥ ଥିଲେ; ଏବଂ ସେ ସମଗ୍ର ବଳି-ଭେଟ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ନିବେଦନ କଲେ।
Verse 29
यज्ञसेनेन दासीनां सहस्राणि चतुर्दश । दासानामयुतं चैव सदाराणां विशाम्पते । गजयुक्ता महाराज रथा: षड्विंशतिस्तथा
ହେ ବିଶାମ୍ପତେ! ଯଜ୍ଞସେନ ଚୌଦହ ହଜାର ଦାସୀ, ଏବଂ ସଦାରା ଦଶ ହଜାର ଦାସ ଦେଲେ; ମହାରାଜ, ଗଜଯୁକ୍ତ ଛବିଶ ରଥ ମଧ୍ୟ।
Verse 30
राज्यं च कृत्स्नं पार्थेभ्यो यज्ञार्थ वै निवेदितम् राजन! राजा द्रुपदने चौदह हजार दासियाँ, दस हजार सपत्नीक दास, हाथी जुते हुए छब्बीस रथ तथा अपना सम्पूर्ण राज्य कुन्तीपुत्रोंको यज्ञके लिये समर्पित किया था ।। वासुदेवो<पि वार्ष्णेयो मानं कुर्वबन् किरीटिन:
ଏବଂ ଯଜ୍ଞାର୍ଥେ ପାର୍ଥମାନଙ୍କୁ ନିଜ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ରାଜ୍ୟ ମଧ୍ୟ ନିବେଦିତ ହେଲା। ବୃଷ୍ଣିବଂଶୀ ବାସୁଦେବ ମଧ୍ୟ କିରୀଟଧାରୀ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ମାନ ବଢ଼ାଉଥିଲେ।
Verse 31
अददाद् गजमुख्यानां सहस्राणि चतुर्दश । आत्मा हि कृष्ण: पार्थस्य कृष्णस्यात्मा धनंजय:
ସେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ହାତୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଚୌଦହ ହଜାର ଦାନ କଲା। କାରଣ କୃଷ୍ଣ ହିଁ ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କ ଆତ୍ମା, ଏବଂ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ) ହିଁ କୃଷ୍ଣଙ୍କ ଆତ୍ମା।
Verse 32
वृष्णिकुलभूषण वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने भी अर्जुनका आदर करते हुए चौदह हजार उत्तम हाथी दिये। श्रीकृष्ण अर्जुनके आत्मा हैं और अर्जुन श्रीकृष्णके आत्मा हैं ।। यद् ब्रूयादर्जुन: कृष्णं सर्व कुर्यादसंशयम् । कृष्णो धनंजयस्यार्थे स्वर्गलोकमपि त्यजेत्,अर्जुन श्रीकृष्णसे जो कह देंगे, वह सब वे निःसंदेह पूर्ण करेंगे। श्रीकृष्ण अर्जुनके लिये परमधामको भी त्याग सकते हैं
ଅର୍ଜୁନ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଯାହା କହିବେ, କୃଷ୍ଣ ନିଶ୍ଚୟ ତାହା ସବୁ କରିଦେବେ। ଧନଞ୍ଜୟଙ୍କ ହିତ ପାଇଁ କୃଷ୍ଣ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକକୁ ମଧ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରିପାରିବେ।
Verse 33
तथैव पार्थ: कृष्णार्थे प्राणानपि परित्यजेत् । सुरभी श्रन्दनरसान् हेमकुम्भसमास्थितान्
ସେହିପରି ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ) ମଧ୍ୟ କୃଷ୍ଣଙ୍କ ପାଇଁ ପ୍ରାଣ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତ୍ୟାଗ କରିଦେବେ। ଏବଂ ସୁଗନ୍ଧିତ ଚନ୍ଦନରସ ଆଦି ସୁବର୍ଣ୍ଣ କୁମ୍ଭରେ ସଞ୍ଚିତ ଅଛି।
Verse 34
मणिरत्नानि भास्वन्ति काउ्चनं सूक्ष्मवस्त्रकम्
ଦୀପ୍ତିମାନ ମଣିରତ୍ନ, ସୁବର୍ଣ୍ଣ, ଏବଂ ସୂକ୍ଷ୍ମ (କୋମଳ) ବସ୍ତ୍ର।
Verse 35
समुद्रसारं वैदूर्य मुक्तासड्घांस्तथैव च
ସମୁଦ୍ରସାର ଵୈଦୂର୍ଯ୍ୟ (ବିଲେଇ-ଆଖି ରତ୍ନ) ଏବଂ ମୁକ୍ତାର ଗୁଚ୍ଛମାନେ ମଧ୍ୟ।
Verse 36
शतशक्ष कुथांस्तत्र सिंहला: समुपाहरन् । सिंहलदेशके क्षत्रियोंने समुद्रका सारभूत वैदूर्य, मोतियोंके ढेर तथा हाथियोंके सैकड़ों झूल अर्पित किये ।। संवृता मणिचीरैस्तु श्यामास्ताम्रान्तलोचना:,उपाजहुर्विशश्वैव शूद्रा: शुश्रूषवस्तथा । वे सिंहलदेशीय वीर मणियुक्त वस्त्रोंसे अपने शरीरोंको ढके हुए थे। उनके शरीरका रंग काला था और उनकी आँखोंके कोने लाल दिखायी देते थे। उन भेंट-सामग्रियोंको लेकर वे सब लोग दरवाजेपर रोके हुए खड़े थे। ब्राह्मण, विजित क्षत्रिय, वैश्य तथा सेवाकी इच्छावाले शूट्र प्रसन्नता-पूर्वक वहाँ उपहार अर्पित करते थे
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ସିଂହଳ ଦେଶରୁ ସେମାନେ ଶତଶଃ ଶଙ୍ଖ, କୁଥା ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅନେକ ଉପହାର ଆଣିଲେ। ସିଂହଳଦେଶୀୟ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନେ ଯେନେ ସମୁଦ୍ରର ସାରରୁ ଉଦ୍ଭୂତ—ବୈଦୂର୍ଯ୍ୟ ରତ୍ନ, ମୁକ୍ତାର ଢେର ଓ ହାତୀଙ୍କ ଶତଶଃ ଝୁଲ-ସାମଗ୍ରୀ ଅର୍ପଣ କଲେ। ମଣିଖଚିତ ବସ୍ତ୍ରରେ ଦେହ ଢାକିଥିବା, ଶ୍ୟାମବର୍ଣ୍ଣ ଓ ଚକ୍ଷୁକୋଣ ରକ୍ତିମ ଥିବା ସେମାନେ ଉପହାର ସହିତ ଦ୍ୱାରେ ରୋକାଯାଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରହିଲେ। ବ୍ରାହ୍ମଣ, ବିଜିତ କ୍ଷତ୍ରିୟ, ବୈଶ୍ୟ ଓ ସେବାକାମୀ ଶୂଦ୍ରମାନେ ମଧ୍ୟ ବାହ୍ୟ ଆନନ୍ଦ ଦେଖାଇ ସେଠାରେ ଉପହାର ଅର୍ପଣ କଲେ।”
Verse 37
ता गृहीत्वा नरास्तत्र द्वारि तिष्ठन्ति वारिता: | प्रीत्यर्थ ब्राह्मणाश्रैव क्षत्रियाश्व विनिर्जिता:,उपाजहुर्विशश्वैव शूद्रा: शुश्रूषवस्तथा । वे सिंहलदेशीय वीर मणियुक्त वस्त्रोंसे अपने शरीरोंको ढके हुए थे। उनके शरीरका रंग काला था और उनकी आँखोंके कोने लाल दिखायी देते थे। उन भेंट-सामग्रियोंको लेकर वे सब लोग दरवाजेपर रोके हुए खड़े थे। ब्राह्मण, विजित क्षत्रिय, वैश्य तथा सेवाकी इच्छावाले शूट्र प्रसन्नता-पूर्वक वहाँ उपहार अर्पित करते थे
ସେଇ ଉପହାରଗୁଡ଼ିକ ନେଇ ସେମାନେ ସେଠାରେ ଦ୍ୱାରେ ରୋକାଯାଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରହିଲେ; ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶର ଅନୁମତି ମିଳିଲା ନାହିଁ। କୃପା ଲାଭ ପାଇଁ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ବିଜିତ କ୍ଷତ୍ରିୟ, ବୈଶ୍ୟ ଓ ସେବାକାମୀ ଶୂଦ୍ର—ସମସ୍ତେ ବାହ୍ୟ ସଦ୍ଭାବ ଦେଖାଇ ସେଠାରେ ଉପହାର ଅର୍ପଣ କଲେ।
Verse 38
।। प्रीत्या च बहुमानाच्चाप्युपागच्छन् युधिष्ठिरम्
ବାହ୍ୟ ପ୍ରୀତି ଓ ବହୁମାନ ଦେଖାଇ ସେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ନିକଟେ ଗଲା।
Verse 39
नानादेशसमुत्थैश्ष नानाजातिभिरेव च
ସେଠାରେ ନାନା ଦେଶରୁ ଆସିଥିବା ଓ ନାନା ଜାତିର ଲୋକ ଥିଲେ।
Verse 40
उच्चावचानुपग्राहान् राजभि: प्रापितान् बहूनू
ରାଜାମାନଙ୍କ ମାଧ୍ୟମରେ ବଡ଼-ଛୋଟ ଅନେକ ଉପକାର ଓ ସହାୟତା ଲଭ୍ୟ ହୋଇଥିଲା।
Verse 41
शत्रूणां पश्यतो दु:खान्मुमूर्षा मे व्यजायत । भृत्यास्तु ये पाण्डवानां तांस्ते वक्ष्यामि पार्थिव
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଦୁଃଖ ଦେଖୁଦେଖୁ ମୋ ମନରେ ମରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା ଜାଗିଲା। ହେ ରାଜନ, ଏବେ ମୁଁ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ଭୃତ୍ୟମାନଙ୍କ ବିଷୟ କହିବି।
Verse 42
येषामामं च पक्वं च संविधत्ते युधिष्ठिर: । मेरे शत्रुओंके घरमें राजाओंद्वारा लाये हुए बहुत-से छोटे-बड़े उपहारोंको देखकर दुःखसे मुझे मरनेकी इच्छा होती थी। राजन! पाण्डवोंके वहाँ जिन लोगोंका भरण-पोषण होता है, उनकी संख्या मैं आपको बता रहा हूँ। राजा युधिष्ठिर उन सबके लिये कच्चे-पक्के भोजनकी व्यवस्था करते हैं || ४०-४१ $ ।। अयुतं त्रीणि पद्मानि गजारोहा: ससादिन:
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର କଚ୍ଚା ସାମଗ୍ରୀ ଓ ପକ୍କା ଭୋଜନ—ଦୁହେଁ ବ୍ୟବସ୍ଥା କରନ୍ତି। ସଂଖ୍ୟା ଅପାର: ତିନି ଅୟୁତ ଓ ତିନି ପଦ୍ମ ଯୋଦ୍ଧା—ଗଜାରୋହୀ ଓ ଅଶ୍ୱାରୋହୀ ସହିତ।
Verse 43
प्रमीयमाणमामं च पच्यमानं तथैव च
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ଯାହା ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ କଚ୍ଚା ଅଛି ଓ ନଷ୍ଟ ହେଉଛି, ଏବଂ ଯାହା ସେହିପରି ପକୁଛି—
Verse 44
नाभुक्तवन्तं नापीत॑ं नालड्कृतमसत्कृतम्
ଏଠାରେ କେହି ନ ଖାଇ ରହିଲେ ନାହିଁ, ନ ପିଇ ରହିଲେ ନାହିଁ; କେହି ଅଲଙ୍କାର ବିନା ନୁହେଁ, କେହି ସତ୍କାର ବିନା ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 45
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिन:
ସ୍ନାତକ ଗୃହମେଧୀ—ଏପରି ଅଠାଏଁଶି ହଜାର (ଲୋକ) ଅଛନ୍ତି।
Verse 46
सुप्रीता: परितुष्टाश्न ते ह्वाशंसन्त्यरिक्षयम्,वे सब ब्राह्मण भोजनसे अत्यन्त तृप्त एवं संतुष्ट हो राजा युधिष्ठिरको उनके (काम- क्रोधादि) शत्रुओंके विनाशके लिये आशीर्वाद देते हैं
ଭୋଜନରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ତୃପ୍ତ ଓ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ ସେହି ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଆଶୀର୍ବାଦ କଲେ—କାମ, କ୍ରୋଧ ଆଦି ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କର ନାଶ ହେଉ।
Verse 47
दशान्यानि सहस््राणि यतीनामूर्थ्वरेतसाम् । भुज्जते रुक्मपात्रीभिय्युधिष्ठिरनिवेशने,इसी प्रकार युधिष्ठिरके महलमें दूसरे दस हजार ऊर्ध्वरेता यति भी सोनेकी थालियोंमें भोजन करते हैं
ଏହିପରି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ନିବାସରେ ଆଉ ଦଶହଜାର ଊର୍ଧ୍ୱରେତା ଯତିମାନେ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ପାତ୍ରରେ ଭୋଜନ କରୁଥିଲେ।
Verse 48
अभुक्तं भुक्तवद् वापि सर्वमाकुब्जवामनम् । अभुज्जाना याज्ञसेनी प्रत्यवैक्षद् विशाम्पते,राजन! उस यज्ञमें द्रौपदी प्रतिदिन स्वयं पहले भोजन न करके इस बातकी देखभाल करती थी कि कुबड़े और बौनोंसे लेकर सब मनुष्योंमें किसने खाया है और किसने अभीतक भोजन नहीं किया है
ରାଜନ୍! ସେହି ଯଜ୍ଞରେ ଦ୍ରୌପଦୀ ପ୍ରତିଦିନ ନିଜେ ପ୍ରଥମେ ଭୋଜନ ନ କରି, କୁବ୍ଜ ଓ ବାମନ ଆଦି ସମେତ ସମସ୍ତଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ କିଏ ଖାଇଛି ଓ କିଏ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଖାଇନାହିଁ—ତାହା ଦେଖାଶୁଣା କରୁଥିଲେ।
Verse 49
द्वौ करौ न प्रयच्छेतां कुन्तीपुत्राय भारत । सम्बन्धिकेन पञ्चाला: सख्येनान्धकवृष्णय:,भारत! कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको दो ही कुलके लोग कर नहीं देते थे। सम्बन्धके कारण पांचाल और मित्रताके कारण अन्धक एवं वृष्णि
ଭାରତ! କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ କେବଳ ଦୁଇ ପକ୍ଷ କର ଦେଉନଥିଲେ—ସମ୍ବନ୍ଧ ହେତୁ ପାଞ୍ଚାଳମାନେ, ଏବଂ ସଖ୍ୟ ହେତୁ ଅନ୍ଧକ ଓ ବୃଷ୍ଣିମାନେ।
Verse 52
इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे द्विपञ्चाशत्तमो<5ध्याय: ।। ५२ |। इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବର ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ‘ଦୁର୍ୟୋଧନସନ୍ତାପ’ ନାମକ ଦ୍ୱିପଞ୍ଚାଶତ୍ତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 336
मलयाद् दर्दुराच्चैव चन्दनागुरुसंचयान् । इसी प्रकार अर्जुन भी श्रीकृष्णके लिये अपने प्राणोंतकका त्याग कर सकते हैं। मलय तथा दर्दुरपर्वतसे वहाँके राजालोग सोनेके घड़ोंमें रखे हुए सुगन्धित चन्दन-रस तथा चन्दन एवं अगुरुके ढेर भेंटके लिये लेकर आये थे
ମଲୟ ଓ ଦର୍ଦୁର ପର୍ବତରୁ ସେଠାର ରାଜାମାନେ ସୁନାର ଘଡ଼ାରେ ଭରା ସୁଗନ୍ଧିତ ଚନ୍ଦନ-ରସ ଏବଂ ଚନ୍ଦନ ଓ ଅଗୁରୁର ଢେର ଉପହାରରୂପେ ଆଣି ଅର୍ପଣ କଲେ।
Verse 343
चोलपाण्ड्यावपि द्वारं न लेभाते ह्ुपस्थितौ । चोल और पाण्ड्यदेशोंके नरेश चमकीले मणि-रत्न, सुवर्ण तथा महीन वस्त्र लेकर उपस्थित हुए थे; परंतु उन्हें भी भीतर जानेके लिये रास्ता नहीं मिला
ଚୋଳ ଓ ପାଣ୍ଡ୍ୟ ଦେଶର ନରେଶମାନେ ଝଲମଲ ମଣି-ରତ୍ନ, ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଓ ସୂକ୍ଷ୍ମ ବସ୍ତ୍ର ନେଇ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ; କିନ୍ତୁ ଦ୍ୱାରେ ସେମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶର ପଥ ମିଳିଲା ନାହିଁ।
Verse 386
सर्वे म्लेच्छा: सर्ववर्णा आदिमध्यान्तजास्तथा | सभी म्लेच्छ तथा आदि, मध्य और अन्तमें उत्पन्न सभी वर्णके लोग विशेष प्रेम और आदरके साथ युधिष्ठिरके पास भेंट लेकर आये थे
ସମସ୍ତ ମ୍ଲେଚ୍ଛ ଏବଂ ଆଦି, ମଧ୍ୟ, ଅନ୍ତରେ ଜନ୍ମିତ ସମସ୍ତ ବର୍ଣ୍ଣର ଲୋକେ ବିଶେଷ ସ୍ନେହ ଓ ଆଦର ସହିତ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଖକୁ ଭେଟ ନେଇ ଆସିଥିଲେ।
Verse 396
पर्यस्त इव लोको<यं युधिष्ठटिरनिवेशने । अनेक देशोंमें उत्पन्न और विभिन्न जातिके लोगोंके आगमनसे युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें मानो यह सम्पूर्ण लोक ही एकत्र हुआ जान पड़ता था
ଅନେକ ଦେଶରେ ଜନ୍ମିତ ଓ ବିଭିନ୍ନ ଜାତିର ଲୋକଙ୍କ ଆଗମନରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଯଜ୍ଞମଣ୍ଡପରେ ମାନୋ ସମଗ୍ର ଲୋକ ଏକଠା ହୋଇଛି ବୋଲି ପ୍ରତୀତ ହେଉଥିଲା।
Verse 423
रथानामर्बुदं चापि पादाता बहवस्तथा । युधिष्ठिरके यहाँ तीन पद्म दस हजार हाथीसवार और घुड़सवार, एक अर्बुद (दस करोड़) रथारोही तथा असंख्य पैदल सैनिक हैं
ଏଠାରେ ରଥାରୋହୀ ଏକ ଅର୍ବୁଦ, ଏବଂ ସେହିପରି ଅସଂଖ୍ୟ ପାଦାତ ସେନା ମଧ୍ୟ ଅଛନ୍ତି; ଗଜାରୋହୀ ଓ ଅଶ୍ୱାରୋହୀ ଦଳ ମଧ୍ୟ ବହୁତ।
Verse 436
विसृज्यमान चान्यत्र पुण्याहस्वन एव च । युधिष्ठिरके यज्ञमें कहीं कच्चा अन्न तौला जा रहा था, कहीं पक रहा था, कहीं परोसा जाता था और वहीं ब्राह्मणोंके पुण्याहवाचनकी ध्वनि सुनायी पड़ती थी
ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଯଜ୍ଞ-ପରିସରରେ କେଉଁଠି କଚ୍ଚା ଅନ୍ନ ମାପାଯାଉଥିଲା, କେଉଁଠି ରନ୍ଧାଯାଉଥିଲା, କେଉଁଠି ପରିବେଶନ ହେଉଥିଲା; ଏହି ସମୟରେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ପୁଣ୍ୟାହ-ପାଠର ମଙ୍ଗଳ ଧ୍ୱନି ନିରନ୍ତର ଶୁଣାଯାଉଥିଲା।
Verse 443
अपश्यं सर्ववर्णानां युधिष्ठिरनिवेशने । मैंने युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें सभी वर्णके लोगोंमेंसे किसीको ऐसा नहीं देखा, जो खा- पीकर आभूषणोंसे विभूषित और सत्कृत न हुआ हो
ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ନିବେଶନରେ ସମସ୍ତ ବର୍ଣ୍ଣର ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ମୁଁ ଏମିତି କାହାକୁ ଦେଖିଲି ନାହିଁ, ଯେ ଖାଇ-ପିଇ, ଆଭୂଷଣରେ ବିଭୂଷିତ ହୋଇ, ସତ୍କୃତ ନ ହୋଇଥାଏ।
Verse 453
त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिर: । राजा युधिष्ठिर घरमें बसनेवाले जिन अट्ठासी हजार स्नातकोंका भरण-पोषण करते हैं, उनमेंसे प्रत्येककी सेवामें तीस-तीस दास-दासी उपस्थित रहते हैं
ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଯେ ସ୍ନାତକମାନଙ୍କୁ ପାଳନ-ପୋଷଣ କରନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କ ପ୍ରତ୍ୟେକଙ୍କ ସେବାରେ ତିରିଶ ତିରିଶ ଦାସ-ଦାସୀ ସଦା ଉପସ୍ଥିତ ରହନ୍ତି।
Yudhiṣṭhira must choose between prudential ethics (avoiding gambling known to cause conflict and exploitation) and perceived rājadharma/social obligation (not refusing a formal royal summons and public challenge).
Procedural legitimacy is not equivalent to moral legitimacy: an action can be socially sanctioned (a courtly dice game) yet ethically corrosive when engineered through deception and power asymmetry.
No explicit phalaśruti appears; however, the chapter includes reflective meta-commentary on daiva’s capacity to eclipse discernment, functioning as a thematic warning about compromised agency under coercive circumstances.